up board class 10 social science full solution chapter 37 वन एवं जीव संसाधन

up board class 10 social science full solution chapter 38 वन एवं जीव संसाधन (उपयोगिता, सुरक्षा एवं संरक्षण से संबंधित राष्ट्रीय नीति तथा विभिन्न कार्यक्रम)

up board class 10 social science full solution chapter 37 वन एवं जीव संसाधन
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वन एवं जीव संसाधन ( उपयोगिता, सुरक्षा एवं संरक्षण से संबंधित राष्ट्रीय नीति तथा विभिन्न कार्यक्रम)


प्रश्न—-1. भारत में उगने वाले किन्हीं दो प्रकार के वनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर–-भारत में उगने वाले दो वनों का विवरण निम्नवत् है
(i) उष्णकटीबंधीय सदाबहार वन- ये वन उन क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहाँ वार्षिक वर्षा का औसत 200 सेमी तथा औसत तापमान 24° सेन्टीग्रेड रहता है ।। अधिक वर्षा के कारण ये वन वर्ष भर हरे-भरे रहते हैं ।। ये वन ऊँचे व घने होते हैं जिनमें 30 से 60 मीटर की ऊँचाई वाले वृक्ष पाए जाते हैं ।। इन वनों में मुख्य रूप से बाँस, ताड़, सिनकोना, महोगनी, रबड़ तथा आबनूस आदि के वृक्ष पाए जाते हैं ।। भारत में ये वन 2500 वर्ग किमी क्षेत्र में विस्तृत है ।। ये वन असम, मेघालय, कर्नाटक, केरल, गुजरात, अंडमान-निकोबार, द्वीप समूह, मणिपुर तथा त्रिपुरा आदि राज्यों में पाए जाते हैं ।।
(ii ) उष्णकटीबंधीय पतझड़ वाले (मानसून) वन- भारत के जिन भागों में सामान्य तापमान पाया जाता है और मध्यम
वर्षा होती है वहाँ उष्ण कटिबंधीय पतझड़ वाले (मानसूनी) वन उगते हैं ।। ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ होते ही वृक्ष गर्मी और वाष्पीकरण के प्रभाव से स्वयं को बचाने के लिए अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं, इसीलिए इन्हें ‘पर्णपाती वन’ भी कहा जाता है ।। कम वर्षा के कारण इन वृक्षों की ऊँचाई 30 से 45 मीटर तक होती है ।। इन वनों में छोटे आकार के मुलायम लकड़ी प्रदान करने वाले साल, शीशम, खैर, चंदन, सागौन, हल्दू, सेमल तथा महुआ आदि के उपयोगी वृक्ष उगते हैं ।। इन वनों के वृक्षों से फर्नीचर बनाने के लिए उत्तम और टिकाऊ लकड़ी प्राप्त होती है ।। भारत में इन वनों का विस्तार 7 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल आदि राज्यों में पाया जाता है ।। इन उपयोगी वनों को हल और खेती ने समाप्त करना प्रारंभ कर दिया है, अत: इनका क्षेत्र घटता जा रहा है ।।


प्रश्न—- 2. भारतीय वनों की तीन प्रमुख विशेषताएँ लिखिए ।।
उत्तर—- भारतीय वनों की तीन प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(i) भारत में वन क्षेत्र बहुत कम है ।। देश के 19.47% क्षेत्र पर ही वनों का विस्तार पाया जाता है ।।
(ii) भारतीय वन विविध प्रकार के हैं, जिनमें विविध प्रजातियों के वृक्ष उगते हैं ।। ये वन विविध अन्य जीवों के आश्रय स्थल भी हैं ।।
(iii) भारतीय वनों का वितरण बहुत असमान है, अधिकांश वन पर्वतीय ढालों और मैदानी क्षेत्रों में पाए जाते हैं ।।


प्रश्न—-3. मानसूनी वनों की तीन प्रमुख विशेषताएँ लिखिए ।।
उत्तर—- मानसूनी वनों की तीन प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(i) मानसूनी वन सामान्य तापमान वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं ।।
(ii) मानसूनी वनों के वृक्ष ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ होते ही गर्मी और वाष्पीकरण के प्रभाव से स्वयं को बचाने के लिए अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं ।।
(iii) कम वर्ष के कारण इन वनों के वृक्षों की औसत ऊँचाई 30 से 45 मीटर तक होती है ।। 4. वनों के चार प्रत्यक्ष ( आर्थिक) लाभ लिखिए ।।
वनों के चार प्रत्यक्ष लाभ निम्नलिखित हैं(i) उपयोगी लकड़ी की प्राप्ति।
(ii) उद्योगों के लिए कच्चे माल की प्राप्ति।
(iii) वनों से प्राणदायिनी औषधियों की प्राप्ति।
(iv) पशुओं के लिए हरे चारे की प्राप्ति।


प्रश्न—-5. वनों के ह्रास से क्या आशय है? वनों के हास से होने वाले दो दुष्प्रभावों को लिखिए ।।
उत्तर—- तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तथा उद्योगों में लकड़ी की बढ़ती खपत के कारण
वनों का अधिक कटना वनों का ह्रास कहलाता है ।। वनों के ह्रास से होने वाले दो दुष्प्रभाव निम्नवत् हैं
(i) पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि।
(ii) मृदा अपरदन एवं बाढ़ के प्रकोप में वृद्धि।
(iii) कम वर्ष के कारण इन वनों के वृक्षों की औसत ऊँचाई 30 से 45 मीटर तक होती है ।
प्रश्न—- 6. वनों के चार अप्रत्यक्ष लाभ लिखिए ।।
उत्तर—- वनों के चार अप्रत्यक्ष लाभ निम्नलिखित हैं
(i) वन वर्षा कराने में सहायक होते हैं ।। (ii) वन कार्बन डाइ ऑक्साइड गैस को ग्रहण करके तथा ऑक्सीजन छोड़कर पर्यावरण को शुद्ध बनाए रखते हैं ।। (iii) वन मृदा अपरदन को रोकने में सहायक होते हैं ।।
प्रश्न—-7. मानसूनी वन किसे कहते हैं? इनके दो महत्व लिखिए ।।
उत्तर—- मानसूनी जलवायु की विशिष्ट वनस्पति वाले वनों को मानसूनी वन कहते हैं ।। ये वन वर्षा की कमी के कारण ग्रीष्म ऋतु के आरंभ में अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं ।। इसलिए इन्हें पर्णपाती या पतझड़ वन भी कहते हैं ।। मानसूनी वनों के दो महत्व निम्नवत् हैं(i) मानसूनी वनों में पाए जाने वाले वृक्षों में साल, शीशम, सागौन, सेमल, महुआ आदि से फर्नीचर बनाने के लिए उत्तम व टिकाऊ लकड़ी प्राप्त होती है ।।
(ii) मानसूनी वनों से महुआ, चंदन, आँवला, कत्था, शहतूत आदि प्राप्त होता है ।।

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प्रश्न—- 8. जैव विविधता का संरक्षण क्या है? वन्य जीव संरक्षण के दो उपाय लिखिए ।।
उत्तर—- जैव विविधता के संरक्षण का सीधा अर्थ पशुधन का संरक्षण करना है ।। दूसरे शब्दों में, “वन्य पशुओं की प्रजातियों को

सुरक्षित रखते हुए उनके विकास और संवर्द्धन के उपाय अपनाना ही जैव संरक्षण है ।।”
(i) वन्य जीवों का शिकार करने पर कानूनी रोक लगाना।
(ii) पशु अभ्यारण्यों की अधिक संख्या में स्थापना करना। 9. वन्य संसाधन क्या हैं? इनके विकास में सहायक भौगोलिक कारक कौन से हैं?
उत्तर—- प्राकृतिक रूप से पृथ्वी पर स्वतः ही उगने-बढ़ने वाली समस्त वनस्पतियों के समुदाय को वन संसाधन कहते हैं ।। प्राकृतिक वनस्पति स्वतः उगती और नष्ट होती रहती है, उसके उगने में मानव का कोई प्रयास नहीं होता है ।। वन संसाधनों का उपहार प्रकृति द्वारा हर राष्ट्र व राज्य को एक समान नहीं दिया गया है ।। वन संसाधनों के विकास में सहायक भौगोलिक कारक निम्नलिखित हैं
() धरातलीय संरचना।
(ii) मृदा की प्रकृति।
(iii) जलवायु, तापमान तथा आर्द्रता।
(iv) वर्षा की मात्रा तथा अवधि।
प्रश्न—-10. भारत में वन संरक्षण के तीन उपाय सुझाइए।

उत्तर—- भारत में वन संरक्षण के तीन उपाय निम्नलिखित हैं
(i) वनों का नियंत्रित, योजनाबद्ध तथा वैज्ञानिक ढंग से दोहन करना।
(ii) वनों को काटने के साथ-साथ वृक्षारोपण पर ध्यान देना।
(iii) वनों को आरक्षित घोषित कर उनके काटने पर प्रतिबंध लगा देना


up board class 10 social science full solution chapter 37 वन एवं जीव संसाधन (उपयोगिता, सुरक्षा एवं संरक्षण से संबंधित राष्ट्रीय नीति तथा विभिन्न कार्यक्रम) विस्तृत उत्तरीय प्रश्न


प्रश्न—-1. भारतीय वनों का वर्णन उदाहरण सहित कीजिए।

उत्तर—- भारतीय वन का वर्गीकरण- भारत में कुल क्षेत्रफल के केवल 19.47% भाग पर वन पाए जाते हैं जो विश्व के कुल वन-क्षेत्र का मात्र 1.6% है ।। भारत विविधताओं का देश है ।। यहाँ मृदाओं में विविधता, जलवायु में विविधता तथा वर्षा में विविधता होने के कारण प्राकृतिक वनस्पति में भी विविधता पाई जाती है ।। भारतीय वन संसाधनों को निम्न प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है ।।
(i) उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन- इन वनों के उगने के लिए आदर्श परिस्थितियाँ-औसत 200 सेमी वर्षा तथा औसत 24° सेंटीग्रेड तापमान है ।। इसीलिए भारत के जिन भागों में सालभर ऊँचा तापमान और अधिक वर्षा होती है, वहाँ लंबे-लंबे कठोर लकड़ी के सालभर हरे-भरे बने रहने वाले वृक्ष उगते हैं, जिन्हें उष्ण कटिबंधीय सदाबहार या सदाहरित वन कहा जाता है ।। इन वनों में मुख्य रूप से ताड़, सिनकोना, महोगनी, रबड़ तथा आबनूस के वृक्ष तथा बाँस और बेंत की झाड़ियाँ उगती हैं ।। सिनकोना वृक्ष का उपयोग मलेरिया की औषधी बनाने में किया जाता है ।। ये वृक्ष कठोर लकड़ी के 30 से 60 मीटर तक ऊँचे होते हैं ।। वृक्षों की सघनता इन वनों के शोषण में बाधक बनती है ।। भारत में ये वन 25000 वर्ग किमी० क्षेत्र में विस्तृत हैं ।। जो असम, मेघालय, कर्नाटक, केरल, गुजरात, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, मणिपुर तथा त्रिपुरा राज्यों में फैले हुए हैं ।।
(ii) उष्ण कटिबंधीय पतझड़ वाले (मानसूनी) वन- भारत के जिन भागों में सामान्य तापमान पाया जाता है और मध्यम वर्षा होती है वहाँ उष्ण कटिबंधीय पतझड़ वाले (मानसूनी) वन उगते हैं ।। ग्रीष्म ऋतु का प्रारंभ होते ही वृक्ष गर्मी और वाष्पीकरण के प्रभाव से स्वयं को बचाने के लिए अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं, इसीलिए इन्हें ‘पर्णपाती वन’ भी कहा जाता है ।। कम वर्षा के कारण इन वृक्षों की ऊँचाई 30 से 45 मीटर तक होती है ।। इन वनों में छोटे आकार के मुलायम लकड़ी प्रदान करने वाले साल, शीशम, खैर, चंदन, सागौन, हल्दू, सेमल तथा महुआ आदि के उपयोगी वृक्ष उगते हैं ।। इन वनों के वृक्षों से फर्नीचर बनाने के लिए उत्तम और टिकाऊ लकड़ी प्राप्त होती है ।। भारत में इन वनों का विस्तार 7 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल आदि राज्यों में पाया जाता है ।। इन उपयोगी वनों को हल और खेती ने समाप्त करना प्रारंभ कर दिया है, अतः इनका क्षेत्र घटता जा रहा है ।।

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(iii) शुष्क मरुस्थलीय काँटेदार वन- शुष्क मरुस्थलीय क्षेत्रों में उच्च तापमान तथा आर्द्रता के अभाव में वृक्षों का आकार छोटा रहता है, तथा पत्तियों के स्थान पर काँटे पनप आते हैं ।। उष्णता के कारण इनके तनों से गोंद निकलता है ।। इस वनस्पति को काँटेदार झाड़ियाँ कहा जाता है ।। इन वनों में बबूल, खजूर, रामबाँस, खेजड़ा, नागफनी, कीकर, करील आदि वृक्ष उगते हैं ।। खजूर इनमें से सबसे उपयोगी वृक्ष है ।। भारत में इनका विस्तार दक्षिणी उत्तर प्रदेश, दक्षिण पंजाब, पश्चिमी मध्य प्रदेश तथा राजस्थान राज्य के पश्चिमी भाग में पाया जाता है ।।
(iv) तटीय या ज्वारीय या डेल्टाई वन- नदियों के डेल्टाओं में एक विशेष प्रकार की वनस्पति उगती है ।। समुद्रों में आने वाला ज्वार-भाटा सागर के खारे जल को डेल्टाई क्षेत्रों में पहुँचा देता है, अतः यहाँ मैंग्रोव वन उगते हैं ।। इन वृक्षों के तने कठोर तथा छाल क्षारीय होती है ।। इन वनों में जल सदैव भरा रहता है ।। अत: कठोर वृक्षों की लकड़ी से नाव बनाकर इन वनों में आया जाया जाता है ।। वृक्षों की क्षारीय छाल चमड़ा पकाने के काम आती है ।। ये वन महानदी, कृष्णा, कावेरी, गोदावरी, तथा गंगा नदी के डेल्टा में और समुद्रतटीय प्रदेशों में पाए जाते हैं ।। गंगा नदी के डेल्टा में सुंदरी नामक वृक्ष की अधिकता के कारण इसे सुंदरवन डेल्टा भी कहते हैं ।। यह विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा है ।। इन वनों में ताड, नारियल, फोनिक्स, गोरेन तथा सुंदरी आदि वृक्ष उगते हैं ।। ताड़ के बीजों से तेल निकाला जाता है, तथा नारियल का रेशा रस्सी बनाने तथा खोपरा तेल निकालने के काम आता है ।। नारियल का वृक्ष इस क्षेत्र के लोगों की आजीविका का आधार है ।।
(v) पर्वतीय वन- हिमालय पर्वत के क्षेत्र में ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ मृदा, तापमान और वर्षा में भिन्नता आने के कारण वनों में भी विविधता आती जाती है ।। ऊँचाई बढ़ने के साथ ही वृक्षों की जातियाँ और विशेषताएँ बदल जाती हैं ।। हिमालय के पर्वतीय क्षेत्र में कश्मीर से लेकर असम तक पर्वतीय वन पाए जाते हैं ।। पर्वतीय वनों का प्रारूप निम्नवत् है
(क) 1200 मीटर की ऊँचाई तक उष्णकटिबंधीय पतझड़ वन उगते हैं ।। जिनमें शिवालिक पर्वत क्षेत्र आता है ।।
(ख) 1200 से 2400 मीटर तक उष्णकटिबंधीय सदाहरित वन उगते हैं ।। जिनमें ओक, चीड़ तथा पाइन के वृक्ष प्रमुख हैं ।।
(ग) 2400 से 4500 मीटर तक कोणधारी वन उगते हैं जिसमें स्यूस, सनोवर तथा फर आदि वृक्ष प्रमुख हैं ।।
(घ) 4500 से 6000 मीटर तक अल्पाइन वृक्ष उगते हैं ।। इनमें फूलदार झाड़ियाँ उगती हैं ।।
6000 मीटर से ऊपर स्थायी हिम रेखा पाई जाती है, अत: वहाँ वनस्पति के उगने के अनुकूल परिस्थतियाँ नहीं पाई जाती हैं ।।

प्रश्न—-2. भारत की प्राकृतिक वनस्पति का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत कीजिए। (क) प्रकार (ख) आर्थिक महत्व
(ग) क्षेत्र (क) भारत की प्राकृतिक वनस्पति के प्रकार- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 1 के उत्तर में भारतीय वनों
के प्रकार का अवलोकन कीजिए।
(ख) भारत की प्राकृतिक वनस्पति (वनों) का आर्थिक महत्व- भारतीय प्राकृतिक वनस्पति (वनों) का महत्व
निम्नलिखित है—

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(i) उपयोगी लकड़ी की प्राप्ति- वन ईंधन तथा इमारती लकड़ी के स्रोत हैं ।। वन 15% ईंधन तथा 85% औद्योगिक काष्ठ प्रदान कर हमारी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं ।।
(ii) कच्चे माल की सुलभता- वृक्ष अनेकों उत्पादों का उपहार देकर उद्योगों को कच्चा माल सुलभ कराते हैं ।। वनों से कागज निर्माण उद्योग, फर्नीचर निर्माण उद्योग, प्लाईवुड निर्माण उद्योग रबड़ निर्माण उद्योग, रंग रोगन निर्माण उद्योग तथा दियासलाई (माचिस) निर्माण उद्योग को कच्चा माल मिलता है ।। इस प्रकार वन विभिन्न उद्योगों का पोषण करने में सक्षम हैं ।।
(iii) उपयोगी वस्तुओं की उपलब्धता- वनों के वृक्ष गोंद, लाख, कत्था, चंदन, तेंदूपत्ता, रबड़ का दूध आदि पदार्थ
देकर हमारा उपकार करते हैं ।। इन पदार्थों का दैनिक जीवन के साथ-साथ औद्योगिक क्षेत्र में भी उपयोग किया जाता है ।। हरे चारे की प्राप्ति- वनों में उगने वाली हरी मुलायम घास पशुओं का प्रिय और पौष्टिक चारा है ।। वृक्षों की हरी पत्तियाँ भी अनेक पशुओं का आहार बनकर, उन्हें हरा चारा उपलब्ध कराती हैं ।। वनों के चरागाह राष्ट्र के पशुधन विकास के आधार होते हैं ।। कुटीर उद्योग-धंधों के विकास में सहायक- वन शहद एकत्र करने, मधुमक्खी पालन करने, गोंद एकत्र करने, तेदूपंता, कच्चा रेशम उगाने, कत्था बनाने, रस्सी तथा टोकरियाँ बनाने जैसे कुटीर उद्योगों को कच्चा माल देकर उनके विकास में सहायक बनते हैं ।।
(vi) औषधियों की सुलभता- वृक्ष रोगों के उपचार के लिए प्राणदायिनी औषधियों के स्रोत हैं ।। इनसे हरड़ या हर्र बहेड़ा, आँवला, बनफ्शा, शहद, चंदन, नीम आदि औषधीय गुण वाली वस्तुओं के साथ उपयोगी जड़ी बूटियाँ भी मिलती हैं, जो विविध रोगों में संजीवनी का काम करती हैं ।। भारतीय वनों से 500 प्रकार की औषधियाँ प्राप्त होती हैं ।।
(vii) रोजगार के स्रोत- भारतीय वन जहाँ अनेक जनजातियों और वनवासियों की आजीविका के स्रोत हैं, वहीं ये लगभग 1 करोड़ लोगों को नौकरी प्रदान कर उनके रोजगार के स्रोत बन गए हैं ।।
(viii) प्रतिव्यक्ति और राष्ट्रीय आय के स्रोत- वन लोगों को जहाँ रोजगार तथा आजीविका के स्रोत देकर प्रति व्यक्ति आय बढ़ाते हैं, वहीं वनों की लकड़ी से सरकार को रॉयल्टी के रूप में करोडों रुपयों की आय होती है ।। वन्य उत्पादों का निर्यात करके भी सरकार राष्ट्रीय आय में वृद्धि करती है ।। वन राष्ट्र को एक संपन्न अर्थव्यवस्था प्रदान करने में सक्षम होते हैं ।।
(ix) वन्य जीवों से उपयोगी पदार्थों की प्राप्ति- वन वन्य जीवों के शरण स्थल हैं ।। वन्य पशु और पक्षी मांस, चमड़ा, बाल, ऊन तथा पंख प्रदान कर हमारे लिए उपयोगी बनते हैं ।। इन पदार्थों पर अनेक उद्योग धंधे निर्भर होते है |

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(x) पर्यटन उद्योग का विकास- हरे-भरे वन प्राकृतिक सौंदर्य की खान होते हैं ।। वृक्षों से घिरे हरे-भरे घास के मैदान पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं ।। भारत में फूलों की घाटी ऐसा ही एक पर्यटनस्थल है ।। राष्ट्रीय पार्कों में वन्य जीवों को साक्षात आँखों से देखने के लिए लाखों पर्यटक प्रतिवर्ष पहुँच जाते हैं ।।
कार्बेट नेशनल पार्क तथा काजीरंगा पार्क इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं ।। पर्यटन उद्योग राष्ट्रीय आय का उत्तम स्रोत बन जाता है ।।
(ग) भारत में प्राकृतिक वनस्पति (वनों) के क्षेत्र- देहरादून स्थित फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया प्रति दो वर्षों के अंतराल पर वन स्थिति रिपोर्ट जारी करता है ।।
सन् 2011 की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार देश में वन एवं वृक्षाच्छादित कुल क्षेत्र अब 78.29 मिलियन हेक्टेयर है जो कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 23.81 प्रतिशत है ।। देश में सर्वाधिक वन-क्षेत्र वाला राज्य मध्य प्रदेश है ।। जहाँ कुल 77,770 वर्ग किमी० वनाच्छादित है ।। 67,410 वर्ग किमी० वन-क्षेत्र के साथ अरूणाचल प्रदेश का इस संबंध में दूसरा स्थान है ।। कुल भौगोलिक क्षेत्र में वन-क्षेत्र के प्रतिशत की दृष्टि से पहला स्थान मिजोरम का है जहाँ 90.68 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र वनाच्छादित है ।। बिहार, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, गुजरात आदि कम वन-क्षेत्र वाले राज्यों में आते हैं ।। रिपोर्ट के अनुसार, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में सुनामी के कारण वन-क्षेत्र में कमी आयी है जबकि मध्य प्रदेश में पर्याप्त वन-क्षेत्र के विद्युत परियोजनाओं के अधीन आ जाने के कारण वन-क्षेत्र घटा है ।।


प्रश्न—-3. भारतीय वनों का वर्गीकरण कीजिए। किसी एक प्रकार के वन की प्रमुख विशेषताएँ एवं आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर—- उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 1 के उत्तर का तथा प्रश्न संख्या- 2 के उत्तर में (ख) ‘आर्थिक महत्व’ का अवलोकन कीजिए।

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प्रश्न—-4. वन संरक्षण से क्या तात्पर्य है? वन संरक्षण का महत्व बताइए तथा संरक्षण हेतु सुझाव दीजिए।
उत्तर—- वन संरक्षण- वन संरक्षण से तात्पर्य है कि वनों की अनावश्यक खपत और विनाश की रोकथाम करते हुए उनको वैज्ञानिक
उपायों से उपयोगी बनाए रखकर भावी पीढ़ियों के उपभोग के लिए सुरक्षित करना है ।। वन संरक्षण के अंतर्गत उन प्रयासों को सम्मिलित किया जाता है, जिनमें वनों का विवेकपूर्ण दोहन, परिरक्षण एवं नवीनीकरण संभव होता है ।। वनों के प्रत्यक्ष (आर्थिक) लाभ- स्पष्ट दिखाई देने वाले लाभ, वनों के प्रत्यक्ष लाभ कहलाते हैं ।। वनों के प्रत्यक्ष लाभ निम्नलिखित हैं
(i) उपयोगी लकड़ी की प्राप्ति- वन ईंधन तथा इमारती लकड़ी के स्रोत हैं ।। वन 15% ईंधन तथा 85% औद्योगिक काष्ठ प्रदान कर हमारी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं ।।
(ii) कच्चे माल की सुलभता- वृक्ष अनेकों उत्पादों का उपहार देकर उद्योगों को कच्चा माल सुलभ कराते हैं ।। वनों से कागज निर्माण उद्योग, फर्नीचर निर्माण उद्योग, प्लाईवुड निर्माण उद्योग रबड़ निर्माण उद्योग, रंग रोगन निर्माण उद्योग तथा दियासलाई (माचिस) निर्माण उद्योग को कच्चा माल मिलता है ।। इस प्रकार वन विभिन्न उद्योगों का पोषण करने में
सक्षम हैं ।।
(iii ) उपयोगी वस्तुओं की उपलब्धता- वनों के वृक्ष गोंद, लाख, कत्था, चंदन, तेंदूपत्ता, रबड़ का दूध आदि पदार्थ देकर
हमारा उपकार करते हैं ।। इन पदार्थों का दैनिक जीवन के साथ-साथ औद्योगिक क्षेत्र में भी उपयोग किया जाता है ।।
(iv) हरे चारे की प्राप्ति- वनों में उगने वाली हरी मुलायम घास पशुओं का प्रिय और पौष्टिक चारा है ।। वृक्षों की हरी
पत्तियाँ भी अनेक पशुओं का आहार बनकर, उन्हें हरा चारा उपलब्ध कराती हैं ।। वनों के चरागाह राष्ट्र के पशुधन विकास के आधार होते हैं ।।
(v) कुटीर उद्योग-धंधों के विकास में सहायक- वन शहद एकत्र करने, मधुमक्खी पालन करने, गोंद एकत्र करने,
तेदूपंता, कच्चा रेशम उगाने, कत्था बनाने, रस्सी तथा टोकरियाँ बनाने जैसे कुटीर उद्योगों को कच्चा माल देकर उनके विकास में सहायक बनते हैं ।।
(vi) औषधियों की सुलभता- वृक्ष रोगों के उपचार के लिए प्राणदायिनी औषधियों के स्रोत हैं ।। इनसे हरड़ या हर्र बहेड़ा,
आँवला, बनफ्शा, शहद, चंदन, नीम आदि औषधीय गुण वाली वस्तुओं के साथ उपयोगी जड़ी बूटियाँ भी मिलती हैं,
जो विविध रोगों में संजीवनी का काम करती हैं ।। भारतीय वनों से 500 प्रकार की औषधियाँ प्राप्त होती हैं ।।

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(vii) रोजगार के स्रोत- भारतीय वन जहाँ अनेक जनजातियों और वनवासियों की आजीविका के स्रोत हैं, वहीं ये लगभग
1 करोड़ लोगों को नौकरी प्रदान कर उनके रोजगार के स्रोत बन गए हैं ।।
(viii) प्रतिव्यक्ति और राष्ट्रीय आय के स्रोत- वन लोगों को जहाँ रोजगार तथा आजीविका के स्रोत देकर प्रति व्यक्ति
आय बढ़ाते हैं, वहीं वनों की लकड़ी से सरकार को रॉयल्टी के रूप में करोड़ों रुपयों की आय होती है ।। वन्य उत्पादों का निर्यात करके भी सरकार राष्ट्रीय आय में वृद्धि करती है ।। वन राष्ट्र को एक संपन्न अर्थव्यवस्था प्रदान करने में सक्षम
होते हैं ।।
(ix) वन्य जीवों से उपयोगी पदार्थों की प्राप्ति- वन वन्य जीवों के शरण स्थल हैं ।। वन्य पशु और पक्षी मांस, चमड़ा, बाल, ऊन तथा पंख प्रदान कर हमारे लिए उपयोगी बनते हैं ।। इन पदार्थों पर अनेक उद्योग धंधे निर्भर होते हैं ।।
(x) पर्यटन उद्योग का विकास- हरे-भरे वन प्राकृतिक सौंदर्य की खान होते हैं ।। वृक्षों से घिरे हरे-भरे घास के मैदान
पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं ।। भारत में फूलों की घाटी ऐसा ही एक पर्यटनस्थल है ।। राष्ट्रीय पार्कों में वन्य जीवों को साक्षात आँखों से देखने के लिए लाखों पर्यटक प्रतिवर्ष पहुँच जाते हैं ।। कार्बेट नेशनल पार्क तथा काजीरंगा पार्क इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं ।। पर्यटन उद्योग राष्ट्रीय आय का उत्तम स्रोत बन जाता है ।। up board class 10 social science full solution chapter 37 वर्षा जल संचयन, बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ जल संसाधन
वनों के अप्रत्यक्ष ( अनार्थिक) लाभ- वनों के वृक्षों से होने वाले वे लाभ जो स्पष्ट दिखाई नहीं पड़ते, अप्रत्यक्ष लाभ कहलाते हैं ।। वनों से हमें निम्नलिखित अप्रत्यक्ष लाभ होते हैं(i) वर्षा कराने में सहायक- वृक्ष पत्तियों से हवा में नमी छोड़ते हैं जिससे वातावरण में आर्द्रता की मात्रा बढ़ती है ।। इसी प्रकार वृक्ष बादलों को रोककर वर्षा कराने में सहायक हैं ।। वनों का विनाश ही वर्षा की कमी तथा सूखा आपदा का कारण बन रहा है ।
(ii) पर्यावरण की स्वच्छता- वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड गैस को ग्रहण कर वायुमंडल में ऑक्सीजन तथा नमी छोड़कर उसे स्वच्छ बनाते हैं ।। पर्यावरण शुद्ध होगा तो पूरा विश्व स्वस्थ्य रहेगा।
(iii) प्रदूषण पर नियंत्रण- वृक्ष वायु प्रदूषण के प्रदूषकों को समाप्त कर वायु को प्रदूषण रहित बनाते हैं ।। ऑक्सीजन प्राण वायु है, अतः प्रदूषण रहित वायु जीवधारियों के जीवन का आधार होती हैं ।।
(iv) भूमि की उर्वरता बढ़ाना- वृक्ष पत्तियाँ भूमि पर गिराते हैं, जो सड़-गल कर उर्वरक में बदल कर भूमि की उर्वरता बढ़ाते हैं ।। इसके अतिरिक्त वन्य जीव भी अपने मल-मूत्र से भूमि को उर्वरक बनाते हैं ।।
(v) भूक्षरण पर रोक- वृक्ष तीव्र गति से बह रही जल धाराओं की गति को कम करके, भूक्षरण रोकने में सहयोग देते है ।। जिससे कृषि योग्य भूमि की कार्य-क्षमता बनी रहती है ।। up board class 10 social science full solution chapter 37 वर्षा जल संचयन, बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ जल संसाधन
(vi) बाढ़ों पर नियंत्रण- वृक्ष नदियों से उत्पन्न बाढ़ पर रोक लगाने में सक्षम हैं ।। ये, बाढ़ों पर नियंत्रण कर भूक्षरण तथा विनाश को रोक देते हैं ।।
(vii) मरुस्थल प्रसार पर रोक- पवन बालू को उड़ाकर मरुस्थल को आगे बढ़ाने के कार्य में लगी रहती है ।। किंतु पवन के इस कार्य में वृक्षारोपण द्वारा बनाई गई हरित पट्टियाँ अवरोधक बनकर मरुस्थल के प्रसार को रोकती है जिससे उपजाऊ
तथा उपयोगी कृषि भूमि की सुरक्षा में सहयोग मिलता हैं ।।
(viii) भूमिगत जल-स्तर में सुधार- भूमिगत जल हमारे लिए बहुत उपयोगी हैं ।। वृक्षों की जड़ों के माध्यम से वर्षा का जल भूगर्भ में पहुँचकर भूमिगत जल-स्तर में सुधार लाकर हमारा उपकार करता है ।।
(ix) प्राकृतिक सौंदर्य में वृद्धि- हरी-भरी घास तथा वृक्षों की हरितिमा भूतल को आकर्षक और आनंददायक बनाकर,
उसके सौंदर्य में वृद्धि कर देती हैं ।। हरा-भरा राष्ट्र सौंदर्य और आर्थिक समृद्धि का प्रतीक है ।।
(x) वन्य जीवों का शरण स्थल- वन पशुओं और पक्षियों के, पालक और शरणदाता हैं ।। वन्य जीव पर्यावरण के आवश्यक अंग है ।। वन्य जीव हमारा अनेकों प्रकार से उपकार करते हैं ।। वन संरक्षण हेतु सुझाव- वन संसाधनों के संरक्षण हेतु निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए
(i) वनों का नियंत्रित, योजनाबद्ध तथा वैज्ञानिक ढंग से दोहन करना।।
(ii) वन के वृक्षों को भीषण अग्निकांड तथा हानिकारक कीड़ों से बचाना।
(iii) वृक्षों को काटने के साथ-साथ वृक्षारोपण पर ध्यान देना।
(iv) वनों में पशुचारण तथा शिकार करने पर प्रभावी रोक लगाना।
(v) वनों को आरक्षित घोषित कर उनके काटने पर प्रतिबंध लगा देना।
(vi) नगरों में ‘ग्रीन एरिया’ बनाकर वृक्षों को विकसित कराने के प्रयास करना।
(vii) कृषि, आवास तथा कारखानों के लिए वृक्षों के कटान पर कानूनी रोक लगाना ।।
(viii) विशाल बाँध बनाने के लिए वन संसाधनों के विनाश को रोकना।
(ix) “बच्चे दो, वृक्ष सौ” तथा “घर-घर में गूंजे यह नारा, हरा भरा हो देश हमारा” जैसे नारों से जन-जागृति फैलाना।
(x) सुनियोजित वन-संरक्षण के लिए ‘वन प्रबंधन’ आवश्यक है ।। इसके अंतर्गत जिन विषयों को शामिल किया जाता है, वे
हैं- वन सर्वेक्षण, वनों का वर्गीकरण, प्रशासनिक व्यवस्था, वनों का आर्थिक उपयोग, वन संरक्षण की नई विधियों का विकास, सामाजिक वानिकी, पर्यटन हेतु वन-क्षेत्रों का विकास, वन अनुसंधान तथा वनों की सुरक्षा व महत्व के बारें में
सामाजिक चेतना जागृत करना। अत: सरकार को वन-प्रबधन कर वनों का संरक्षण करना चाहिए।

up board class 10 social science full solution chapter 37 वर्षा जल संचयन, बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ जल संसाधन
प्रश्न—-5. भारत में वनों के ह्रास के क्या कारण हैं? वनों के संरक्षण के उपाय लिखिए ।।
उत्तर—- भारत में वनों का ह्रास- वन किसी राष्ट्र की अमूल्य संपत्ति हैं ।। ये वहाँ की जलवायु, कृषि, उद्योग तथा पर्यावरण को अत्यधिक प्रभावित करते हैं ।। किंतु कुछ कारणों से भारत के वनों का ह्रास होता जा रहा है ।। इसके लिए उत्तरदायी कुछ कारण निम्नलिखित हैं
(i) तीव्र गति से बढ़ रही जनसंख्या की बढ़ती आवासीय आवश्यकताओं और कृषि तथा उद्योग में लकड़ी की बढ़ती खपत के कारण वृक्षों का अधिक कटान होने से वनों का ह्रास हुआ है ।।
(ii) बढ़ती जनसंख्या को भोजन सुलभ कराने के लिए, कृषि भूमि बढ़ाने के लिए वनों का सफाया होने से उसके क्षेत्रफल
में कमी हो रही है ।।
(iii) कुकरमुत्ते की तरह बढ़ते बहुमंजिले आवास, कारखाने तथा औद्योगिक संस्थान वनों के ह्रास का कारण बन रहे हैं ।।
(iv) ईंधन, फर्नीचर तथा भवन निर्माण के लिए, काष्ठ प्राप्त करने के लिए वनों का ह्रास किया जा रहा है ।।
(v) स्वार्थी मानव ने अपने हित साधने के लिए वृक्षों पर कुल्हाड़ा चलाकर वनों का ह्रास कर डाला है ।।
(vi) वनों में लगने वाली भीषण आग विशाल वन क्षेत्र को जलाकर वनों के ह्रास का कारण बनती है ।।
(vii) वृक्षों में लगने वाले घातक रोग तथा हानिकारक कीड़े, वृक्षों को नष्ट कर वनों के ह्रास का कारण बनते हैं ।।
(viii) वन संरक्षण तथा वृक्षों के प्रति संवेदनशीलता का अभाव होने के कारण, जनसाधारण वनों का सफाया करने में लगा
रहता है ।।
(ix) भारत में वन क्षेत्रों के संवर्द्धन की समुचित व्यवस्था न होने के कारण वनों का ह्रास हुआ है ।। (x) भारत में वृक्षारोपण के प्रति उदासीनता का भाव होने के कारण, काटे गए वृक्षों के स्थान पर नए वृक्ष न लगाने से वनों
का ह्रास हो गया है ।
वन संरक्षण के उपाय- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 4 के उत्तर में ‘वन संरक्षण हेतु सुझाव’ का अवलोकन
कीजिए।up board class 10 social science full solution chapter 37 वर्षा जल संचयन, बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ जल संसाधनup board class 10 social science full solution chapter 37 वर्षा जल संचयन, बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ जल संसाधन


प्रश्न—- 6. भारतीय वनों के प्रकारों का नाम लिखिए तथा वनों की मुख्य विशेषताएँ लिखिए ।।
उत्तर—- भारत विविधताओं का देश है ।। यहाँ मृदाओं में विविधता, जलवायु में विविधता तथा वर्षा में विविधता होने के कारण यहाँ
पाई जाने वाली वनस्पति में भी विविधता पाई जाती है ।। भारतीय वनों को निम्न प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है ।।
() उष्ण कटीबंधीय सदाबहार वन up board class 10 full solution social science chapter 36 भूमि संसाधन (महत्व, विभिन्न उपयोग, मानव जीवन पर प्रभाव-मृदा के संदर्भ में)
(ii) उष्ण कटीबंधीय पतझड़ वाले (मानसूनी) वन
(iii) शुष्क मरुस्थलीय काँटेदार वन
(iv) तटीय या ज्वारीय या डेल्टाई वन
(v) पर्वतीय वन भारतीय वनों की विशेषताएँ- भारतीय वनों में कुछ विलक्षणताएँ पाई जाती हैं, जो उनकी निम्नलिखित विशेषताओं की ओर इंगित करती हैं
(i) भारत में वन क्षेत्र बहुत कम है ।। देश के 19.47% क्षेत्र पर ही वनों का विस्तार पाया जाता है ।।
(ii) भारतीय वन विविध प्रकार के हैं, जिनमें विविध प्रजातियों के वृक्ष उगते हैं ।। ये वन विविध अन्य जीवों के आश्रय स्थल भी हैं ।।
(iii) भारतीय वनों का वितरण बहुत असमान है, अधिकांश वन पर्वतीय ढालों और मैदानी क्षेत्रों में पाए जाते हैं ।।
(iv) भारतीय वनों में एक ही प्रजाति के उपयोगी वृक्ष एक स्थान पर न होकर दूर-दूर छिटके हुए हैं ।
(v) भारतीय वनों में मुलायम और टिकाऊ लकड़ी के वृक्षों का निरंतर अभाव होता जा रहा है, क्योंकि इन्हें खेती करने के लिए काट दिया जाता है ।।
(vi) भारत में उष्णकटिबंधीय पतझड़ वाले वनों की अधिकता है ।। इनमें उगने वाले वृक्ष ग्रीष्म ऋतु के प्रारंभ में अपनी पत्तियाँ
गिरा देते हैं ।।
(vii) भारतीय वन आर्थिक दृष्टि से बड़े उपयोगी हैं ।। इनसे उपयोगी काष्ठ के साथ-साथ उद्योगों के लिए कच्चे माल, जड़ी बूटियों और वन्य जीवों की प्राप्ति होती हैं ।। up board class 10 social science chapter 34 : प्राकृतिक आपदाएँ
प्रश्न—-7. वन्य जीव संरक्षण क्या है? इसकी क्या आवश्यकता है? वन्य जीव संरक्षण के उपाय सुझाइए।
उत्तर—- वन्य जीव संरक्षण- वन्य जीव संरक्षण का सीधा अर्थ वनों में पाए जाने वाले जीवों का संरक्षण करना है ।।
दूसरे शब्दों में,
“वन्य जीवों की प्रजातियों को सुरक्षित करते हुए उनके विकास और संवर्द्धन के उपाय अपनाना ही वन्य जीव संरक्षण कहलाता है ।।” वन्य जीव संरक्षण की आवश्यकता- वन्य-जीव संरक्षण की आवश्यकता निम्नलिखित दो कारणों से होती है ।। (i) प्राकृतिक संतुलन में सहायक- वन्य जीवन वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए प्रकृति का अनुपम उपहार है ।। किंतु वर्तमान समय में अत्यधिक वन दोहन तथा अनियंत्रित और गैर कानूनी आखेट के कारण भारत की वन्य-संपदा का तेजी से ह्रास हो रहा है ।। अनेक महत्वपूर्ण पशु-पक्षियों की प्रजातियाँ विलोप के कगार पर हैं ।। प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के लिए वन्य-जीव संरक्षण की बहुत आवश्यकता है ।।
(ii) पर्यावरणीय प्रदूषण- पर्यावरण प्रदूषण पर प्रभावी रोक लगाने के लिए भी पशुओं एवं वन्य जीवों का संरक्षण आवश्यक है, क्योंकि इनके द्वारा पर्यावरण में उपस्थित बहुत-से प्रदूषित पदार्थों को नष्ट कर दिया जाता है ।। इसके साथ
ही वन्य-जीव पर्यावरण को स्वच्छ बनाये रखने में अपना अमूल्य योगदान देते हैं ।।
वन्य जीव संरक्षण के उपाय- वन्य जीवों के संरक्षण हेतु निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं
(i) वन्य जीवों का शिकार करने पर कानूनी रोक लगाना ।।
(ii) वन्य जीवों और पक्षियों को पालतू बनाने पर कठोर प्रतिबंध लगाना ।।
(iii) सर्कस में शेर, चीतों, भालुओं तथा अन्य जीवों के करतब दिखाने पर रोक लगाना ।।
(iv) राष्ट्रीय पशु-पार्कों की स्थापना करना।
(v) विलुप्त होती प्रजातियों के बचाव और संवर्द्धन के लिए टाइगर प्रोजेक्ट जैसे कार्यक्रम लागू कराना।
(vi) पशु अभ्यारण्यों की अधिक संख्या में स्थापना करना।
(vii) वन्य जीव जंतु सुरक्षा अधिनियम 1972 ई० का कठोरता से पालन करवाना।
(viii) वन्य जंतु संरक्षण सप्ताह के माध्यम से वन्य जीव संरक्षण के लिए जन-जागृति फैलाना।
प्रश्न —8. भारतीय वनों के पाँच प्रत्यक्ष तथा पाँच अप्रत्यक्ष लाभ लिखिए ।।
उत्तर—- उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-4 के उत्तर में वन संरक्षण का महत्व’ का अवलोकन कीजिए।

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