up board class 10 hindi full solution chapter 6 mahadevi verma

up board class 10 hindi full solution chapter 6 mahadevi verma महादेवी वर्मा वर्षा सुन्दरी के प्रति पदों की सन्दर्भ सहित व्याख्या

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up board class 10 hindi full solution chapter 6 mahadevi verma महादेवी वर्मा वर्षा सुन्दरी के प्रति पदों की सन्दर्भ सहित व्याख्या

रूपसि तेरा घन-केश-पाश !

श्यामल श्यामल कोमल कोमल

लहराता सुरभित केश पाश ||

नभ-गंगा की रजतधार में ।

धो आयी क्या इन्हें रात ?

कम्पित हैं तेरे सजल अंग

सिहरा सा तन है सद्यस्नात

भीगी अलकों के छोरों से

चूती बूंदें कर विविध लास !

रूपसि तेरा घन केश पाश !

शब्दार्थ –

रूपसि = सुन्दरी। घन = बादल । केश पाश = बालों का समूह । नभ गंगा = आकाश गंगा। रजत_धार = चाँदी के समान सफेद- जल की धारा । सद्यस्नात = तुरंत स्नान की हुई । अलकों = बालों के किनारे के सिरे । चूती = टपकती। लास = आनन्दपूर्वक ।

सन्दर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ श्रीमती महादेवी वर्मा द्वारा रचित “”नीरजा”” नामक ग्रन्थ से हमारी पाठ्य पुस्तक “हिन्दी” के काव्य-खण्ड में संकलित “”वर्षा सुन्दरी के प्रति”” नामक शीर्षक कविता से अवतरित हैं ||

प्रसंग – यहाँ कवयित्री महादेवी वर्मा ने वर्षा को सुन्दरी नायिका के रूप में चित्रित करके उसके सौन्दर्य का बड़ा ही मनोहर वर्णन किया है ।

व्याख्या – कवयित्री श्रीमती महादेवी वर्मा वर्षा को एक सुन्दरी की तरह सम्बोधित करती हुई कहती है कि हे वर्षा सुन्दरी ! तेरा बादलरूपी काले-काले बालों का समूह बहुत सुन्दर है । तुम्हारे कोमल, काले और सुगन्धित बाल हवा में लहरा रहे हैं, जो कि बहुत अच्छे लग रहे हैं। अर्थात वायु से लहराते हुए बादल ही तुम्हारे सुन्दर बाल हैं। कवयित्री पूछती है कि हे वर्षा सुन्दरी ! क्या तुम अपने इन बालों को रात में आकाश गंगा की चाँदी के समान उज्जवल सफ़ेद जल धारा में धोकर आयी हो ? क्योंकि तुम्हारे सम्पूर्ण अंग जल में भीगे होने के कारण शीत से काँप रहे हैं । तुम्हारे रोमांचित और सिहरते शरीर को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे तुम अभी अभी स्नान करके आयी हो, क्योंकि तुम्हारे भीगे बालों से जल की बूंदें नृत्य करती हुई सी नीचे टपक रही हैं । हे वर्षा सुन्दरी , तुम्हारे बादलरूपी घने बालों का समूह बहुत ही सुन्दर प्रतीत हो रहा है ||

काव्यगत सौन्दर्य

1. वर्षा को एक सुन्दरी के रूप में चित्रित किया गया है ।

2.भाषा – साहित्यिक खड़ी बोली ।

3.शैली – चित्रात्मक शैली ||

4.रस – शृंगार ।

5.गुण – माधुर्य ।

6.छन्द – अतुकान्त ।

7.अलंकार – रूपसि तेरा घन केश पाश में रूपक अलंकार “”श्यामल श्यामल कोमल कोमल”” में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार वर्षा के सुन्दरी रूप में चित्रित करने के कारण मानवीकरण अलंकार ।

सौरभ भीणा झीना गीला

लिपटा मृदु अंजन सा दुकूल

चल अंचल में झर झर झरते ।

पथ में जुगनू के स्वर्ण फूल

दीपक से देता बार बार ||

तेरा उज्ज्वल चितवन-विलास !

रूपसि तेरा घन केश पाश !

शब्दार्थ –

सौरभ = सुगन्ध । भीना = सुरभित हुआ । झीना = पतला सा। अंजन = काजल । दुकूल = रेशमी वस्त्र, दुपट्टा । चल = हिलते हुए ,चलायमान । जुगनू के स्वर्ण फूल = जुगनूरूपी सुनहरे फूल | देता बार बार = जला देता है। चितवन विलास = प्रेम रुपी दृष्टि ||

सन्दर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ श्रीमती महादेवी वर्मा द्वारा रचित “”नीरजा”” नामक ग्रन्थ से हमारी पाठ्य पुस्तक “हिन्दी” के काव्य-खण्ड में संकलित “”वर्षा सुन्दरी के प्रति”” नामक शीर्षक कविता से अवतरित हैं ||

प्रसंग – प्रस्तुत पंक्तियों में कवियित्री ने वर्षा सुन्दरी के श्रृंगार का मनोहार वर्णन किया गया है ।

व्याख्या – कवयित्री कहती है कि हे वर्षा रूपी नायिका ! तुमने काले बादलों के रूप में एक सुगन्धित, पारदर्शक, कुछ गीला एवं हल्का काले रंग का झीना रेशमी वस्त्र धारण कर लिया है। आकाश में चमकते हुए जुगनू ऐसे लग रहे हैं मानो तुम्हारे हिलते हुए आँचल से मार्ग में सोने के फूल झर रहे हों । बादलों में चमकती हुई बिजली ही तुम्हारी उज्ज्वल चितवन है । जब तुम अपनी ऐसी सुन्दर दृष्टि किसी पर डालती हो तो उसके मन में प्रेम के दीपक जगमगाने लगते हैं। हे रूपवती वर्षा सुन्दरी , तुम्हारी बादलरूपी केश राशि अत्यधिक सुन्दर है ।

काव्यगत सौन्दर्य –

  • कवयित्री ने प्रकृति के मानवीकरण मानकर उसकी मनोदशा का सुन्दर वर्णन किया है ।
  • वर्षाकाल की विभिन्न वस्तुओं का वर्षा सुन्दरी के श्रृंगार के साधनों के रूप में प्रयोग किया गया है।
  • भाषा – साहित्यिक खड़ी बोली।
  • शैली – चित्रात्मक और प्रतीकात्मक ।
  • रस – शृंगार।
  • गुण – माधुर्य
  • छन्द-अतुकान्त
  • अलंकार – रूपक एवं मानवीकरण ।

उच्छवसित वक्ष पर चंचल हे

बक पाँतों का अरविन्द हार

तेरी निश्वासें छू भू को

बन बन जाती मलयज बयार

केकी-रव की नूपुर-ध्वनि सुन

जगती जगती की मूक प्यास !

रूपसि तेरा घन-केश-पाश !

शब्दार्थ –

उच्छवसित = श्वास के कारण ऊपर-नीचे उठता हुआ, प्रसन्न , गदगद । वक्ष पर = छाती पर। चंचल = चलायमान है, हिल-डुल रहा है। बक-पाँत = बगुलों की पंक्ति। अरविन्द = कमल। निश्वास = बाहर निकलने वाली श्वास। मलयज = मलय (चन्दन) के पर्वत से आने वाली। बयार = वायु। केकी रव = मयूरों की ध्वनि। नूपुर = पायल। जगती = जाग्रत होती है, संसार ।

सन्दर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ श्रीमती महादेवी वर्मा द्वारा रचित “”नीरजा”” नामक ग्रन्थ से हमारी पाठ्य पुस्तक “हिन्दी” के काव्य-खण्ड में संकलित “”वर्षा सुन्दरी के प्रति”” नामक शीर्षक कविता से अवतरित हैं ||

प्रसंग – इन पंक्तियों में वर्षारूपी सुन्दरी के रमणीय सौन्दर्य का आलंकारिक वर्णन किया गया है।

व्याख्या – हे वर्षारूपी सुन्दरी ! साँस लेने और छोड़ने के कारण ऊपर उठे तथा कम्पित तेरे वक्ष स्थल पर आकाश में उड़ते हुए बगुलों की पंक्तियां, श्वेत कमलों के हार के सामान हिलती हुई सी मालूम पड़ रहीं है। जब तुम्हारे मुख से निकली बूंदरूपी साँसें पृथ्वी पर गिरती हैं तो एसा लगता है मनो उसके पृथ्वी के स्पर्श से उठने वाली एक प्रकार की सुगंध , मलयगिरि की सुगन्धित वायु के समान प्रतीत होती है । तुम्हारे आगमन पर चारों ओर नृत्य करते हुए मोरों की मधुर ध्वनि सुनाई पड़ने लगती है, जो एसा लगता है कि तुमने अपने पैरों में धुंघरू बाँध लिए हो , जिसको सुनकर लोगों के मन में मधुर प्रेम की प्यास जाग्रत होने लगती है। तात्पर्य यह है, कि मोरों की मधुर आवाज से वातावरण में जो मधुरता छा जाती है, वह लोगों को आनन्द और उल्लास से जीने की प्रेरणा देता है। उनके हृदय में मौन रूप में छिपा हुआ प्यार स्पष्ट शब्दों का रूप धारण कर लेता है जो उनकी जीने की इच्छा को अधिक बलवती बनाता है। हे वर्षा रूपी सुन्दरी नायिका ! तुम्हारी बादल रूपी बालों की राशि अत्यधिक सुन्दर है ।

काव्यगत सौन्दर्य –

  • 1.कवयित्री ने वर्षा का मानवीकरण करके उसके मोहक रूप का चित्रण किया है।
  • भाषा – साहित्यिक खड़ी बोली।
  • .शैली – चित्रात्मक।
  • रस – शृंगार रस ।
  • गुण – माधुर्य।
  • छन्द-अतुकान्त ।
  • अलंकार- उच्छवसित वक्ष पर चंचल है में रूपक अलंकार , बन बन में पुनरुक्तिप्रकाश, जगती_ जगती में यमक और अनुप्रास ।

इन स्निग्ध लटों से छा दे तन

पुलकित अंकों में भर विशाल

झुक सस्मित शीतल चुम्बन से ।

अंकित कर इसका मृदल भाल

दुलरा दे ना, बहला दे ना ,,

यह तेरा शिशु जग है उदास !

रूपसि तेरा घन-केश-पाश ! WWW.UPBOARDINFO.IN

शब्दार्थ –

स्निग्ध = चिकनी । पुलकित = रोमांचित । सस्मित = मुस्कराते हुए । अंकित = चिह्नित । मृदल = सुन्दर। दुलराना = प्यार करना। शिशु जग = संसाररूपी बालक।

सन्दर्भ – प्रस्तुत पंक्तियाँ श्रीमती महादेवी वर्मा द्वारा रचित “”नीरजा”” नामक ग्रन्थ से हमारी पाठ्य पुस्तक “हिन्दी” के काव्य-खण्ड में संकलित “”वर्षा सुन्दरी के प्रति”” नामक शीर्षक कविता से अवतरित हैं ||

प्रसंग-इन पंक्तियों में महादेवी वर्मा ने वर्षा रूपी सुन्दरी को एक माता के रूप में चित्रित किया है।

व्याख्या – कवयित्री वर्षा रूपी सुन्दरी से आग्रह करती हुई कहती है कि हे वर्षा सुन्दरी ! तुम अपने कोमल बालों की छाया में इस संसाररूपी अपने बालक (शिशु) को समेट लो। उसे अपनी रोमांचित एवं विशाल गोद में रखकर उसका सुन्दर मस्तक को अपने बादल रूपी बालों से ढककर अपने हसते हुए चेहरे से शीतल चुम्बन से चूम लो । हे सुन्दरी ! तुम्हारे बादल रूपी बालों की छाया से, मधुर चुम्बन और दुलार से इस संसाररूपी शिशु का मन बहल जाएगा और उसकी उदासी दूर हो जाएगी। हे वर्षारूपी सुन्दरी ! तुम्हारी बादल रूपी काली केश राशि बड़ी मोहक लग रही है ।

काव्यगत सौन्दर्य –

  • वर्षा में इस संसार की माता का मातृत्व का दिखाई दिया है तथा संसार रुपी बच्चे के प्रति माता के कर्तव्य को समझाया गया हैं ।
  • वर्षा का पूर्ण रूप से मानवीकरण किया गया है ।
  • भाषा – साहित्यिक खड़ी बोली।
  • शैली – चित्रात्मक और भावात्मक।
  • रस – शृंगार एवं वात्सल्य।
  • गुण – माधुर्य।
  • छन्द – अतुकान्त ।
  • अलंकार – रूपक और मानवीकरण ।

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