Up Board Class 10 Hindi Solution chapter 1 mitrata: मित्रता गद्य खंड

Up Board Class 10 Hindi Solution chapter 1 mitrata: मित्रता गद्य खंड रामचन्द्र शुक्ल

Up Board Class 10 Hindi Solution chapter – 1 मित्रता पाठ पर आधारित पृष उत्तर

अध्याय 1 मित्रता आचार्य रामचंद्र शुक्ल


लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1- आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म कब और कहां हुआ था |
उत्तर- आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म 4 अक्टूबर सन 1884 ईस्वी को बस्ती जिले के अगोना नामक ग्राम में हुआ था |
प्रश्न 2 – शुक्ल जी के पिता का नाम और व्यवसाय क्या था |
उत्तर- शुक्ल जी के पिता का नाम चंद्रबली शुक्ल था जो हमीरपुर जिले की राठ तहसील में कार्यरत थे |
प्रश्न 3 – शुक्ल जी को काशी नागरी प्रचारिणी सभा से किसने सबद्ध किया था |
उत्तर- काशी नागरी प्रचारिणी सभा से बाबू श्यामसुंदर दास जी ने सबद्ध किया था |
प्रश्न 4 – आचार्य रामचंद्र शुक्ल को किन किन भाषाओं का ज्ञान था |
उत्तर – आचार्य रामचंद्र शुक्ल को बंगला संस्कृत अंग्रेजी उर्दू हिंदी फारसी आदि भाषाओं का ज्ञान था |
प्रश्न 5- आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने मिर्जापुर के किस स्कूल में नौकरी की थी |
उत्तर- आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने मिर्जापुर के मिशन स्कूल में नौकरी की थी |
प्रश्न 6 – आचार्य रामचंद्र शुक्ल किस विधा लेखन के लिए प्रसिद्ध हैं |
उत्तर- आचार्य रामचंद्र शुक्ल आलोचना विधा लेखन के लिए प्रसिद्ध हैं |
प्रश्न 7 – शुक्ल जी द्वारा रचित दो निबंध संग्रहों के नाम बताइए |
उत्तर- शुक्ल जी द्वारा रचित दो निबंध हैं विचार वीथी और चिंतामणि |

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प्रश्न 8- शुक्ल जी के दो आलोचना ग्रंथों के नाम बताइए |
उत्तर- शुक्ल जी के दो आलोचना ग्रंथ हैं भ्रमरगीत और रसमीसांसा |
प्रश्न 9 – आचार्य रामचंद्र शुक्ल एक सफल युग प्रवर्तक थे सिद्ध कीजिए|
उत्तर – आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपनी निबंध रचनाओं से हिंदी साहित्य को एक नवीन एवं उपयोगी दिशा प्रदान की | इन्होंने अपने महत्वपूर्ण कृतियों के द्वारा निबंध और आलोचना के क्षेत्र में एक नये युग को उपस्थित किया, और नवीन आलोचना पद्धति का विकास किया इनके इस अभूतपूर्व योगदान के कारण इनको उस युग का निर्माता माना गया तथा तत्कालीन युग को इनके नाम के अनुसार शुक्ल युग नाम दिया गया |
प्रश्न 10 – आचार्य रामचंद्र शुक्ल की भाषा शैली पर प्रकाश डालिए |
उत्तर- आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी अपनी रचनाओं में गद्य साहित्य की खड़ी बोली भाषा का प्रयोग करते थे | किसी बात को संक्षेप में कहते थे फिर उसे विस्तार से समझाते थे यही उनकी रचनाओं में विशेषता रही है शुक्ल जी ने मुख्य रूप से वर्णनात्मक शैली विवेचनात्मक शैली और निगमन शैली तथा व्याख्यात्मक शैली आदि शैलियों का अपनी रचनाओं में प्रयोग किया है |
प्रश्न 11 – आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जीवन परिचय और रचनाओं पर प्रकाश डालिए |
उत्तर – हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक और निबंधकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य में एक विशेष स्थान रखते हैं इन्होंने अपनी निबंध रचनाओं से हिंदी साहित्य को एक नई दिशा प्रदान की | इन्होंने अपने अद्वितीय आलोचनात्मक रचनाओं के द्वारा आलोचना के क्षेत्र में एक नया युग स्थापित किया नवीन आलोचना पद्धति का विकास किया हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार बाबू गुलाब राय ने हिंदी साहित्य में आचार्य रामचंद्र शुक्ल की भूर भूर प्रशंसा की और कहा कि- “ यह बात निर्विवाद रूप से सत्य है कि गद्य साहित्य की और विशेषत: निबंध साहित्य की प्रतिष्ठा बढ़ाने में शुक्ल जी का अनुपम और अद्वितीय स्थान है उपन्यास साहित्य में जो स्थान मुंशी प्रेमचंद जी का है वही स्थान निबंध साहित्य में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का है” इनके अभूतपूर्व योगदान के कारण ही इनके नाम के अनुसार इस समय को शुक्ल युग के नाम से जाना जाता है |


जीवन परिचय — आचार्य शुक्ल के नाम से प्रसिद्द रामचंद्र शुक्ल जी का जन्म 4 अक्टूबर सन 1884 ईस्वी को बस्ती जिले के अगोना नामक ग्राम में हुआ था इनके पिता का नाम चंद्रबली शुक्ल था जो हमीरपुर जिले की राठ तहसील में कार्यरत थे | अपने पिता के पास ही रह कर इन्होंने हमीरपुर राठ में अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की | इनकी बचपन से ही हिंदी साहित्य मं बहुत रुचि थी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद यह मिर्जापुर चले गए और हाईस्कूल की परीक्षा इन्होंने मिर्जापुर में पूरी की | इनको गणित अच्छा नहीं लगता था इसलिए उन्होंने आगे की पढ़ाई में गणित छोड़ दिया तथा इंटरमीडिएट की परीक्षा भी बीच में ही छोड़ दी इनके पिता की इच्छा थी कि शुक्ल जी कचहरी में जाकर दफ्तर का काम सीखे इसलिए इनके पिताजी ने इन्हें वकालत पढ़ने के लिए इलाहाबाद भेज दिया पर इनकी वकालत में भी इच्छा न थी इसलिए वहां से भी वापस आए और उन्होंने अपना साहित्य में काम शुरू कर दिया फिर इन्होंने अपने खुद के अध्ययन से हिंदी अंग्रेजी उर्दू बंगला संस्कृत फारसी आदि भाषाओं का ज्ञान घर पर ही कर लिया | अतः परिणाम यह हुआ कि यह वकालत में फेल हो गए शुक्ल जी के पिताजी ने उन्हें नायब तहसीलदार की जगह दिलाने का प्रयास किया किंतु उनकी स्वाभिमानता के कारण उन्होंने यह पद स्वीकार नहीं किया इसके बाद कुछ समय तक इन्होंने मिर्जापुर में जाकर मिर्जापुर के मिशन स्कूल में चित्रकला के अध्यापन कार्य पर काम किया | इसके बाद काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में हिंदी के अध्यापक के रूप में भी कार्य किया फिर काशी नागरी प्रचारिणी सभा में संबंध होकर हिंदी शब्द सागर के सहायक संपादन का कार्यभार भी संभाला | जो इन से पूर्व उनके गुरु बाबू श्यामसुंदर दास संभालते थे | शुक्ल जी ने आजीवन हिंदी साहित्य की सेवा की 2 फरवरी सन 1941 को हृदय गति रुक जाने के कारण शुक्ला जी का देहांत हो गया |
रचनाएं – आचार्य रामचंद्र शुक्ल की प्रमुख रचनाएं निम्न प्रकार है
संपादन – नागरी प्रचारिणी पत्रिका और हिंदी शब्द सागर
कहानी – ग्यारह वर्ष का समय
काव्य रचना – अभिमन्यु वध
इतिहास लेखन – हिंदी साहित्य का इतिहास
आलोचना – रsस मीसांसा भ्रमरगीत जायसी ग्रंथावली गोस्वामी तुलसीदास सूरदास
निबंध लेखन – विचार वीथी चिंतामणि और मित्रता |

Up Board Class 10 Hindi Solution chapter 1 mitrata: मित्रता गद्य खंड रामचन्द्र शुक्ल
प्रश्न – 2 आचार्य रामचंद्र शुक्ल की भाषा गत विशेषताओं के साथ साथ उनके साहित्यिक परिचय पर भी प्रकाश डालिए |
उत्तेर – आचार्य रामचंद्र शुक्ल की मुख्य भाषा खड़ी बोली है संक्षेप में कहना उसके बाद विस्तार से समझाना यह उनकी रचनाओं की विशेषता है | जगह जगह पर मुहावरे और लोकोक्तियां का प्रयोग भी इनकी रचनाओं में देखने को मिलता है मुख्य रूप से शुक्ल जी की रचनाओं में वर्णनात्मक शैली विवेचनात्मक शैली और व्याख्यात्मक शैली आदि शैलियों का प्रयोग देखने को मिलता है जिसके कारण इनकी रचनाएं अत्यंत व्यवहारिक होती हैं | विवेचनात्मक शैली शुक्ल जी की प्रमुख शैली है इन्होंने ज्यादातर निबंधों में इसी शैली का प्रयोग किया है | शुक्ल जी एक शिक्षक थे इसलिए कठिन विषयों को समझाने के लिए जगह-जगह पर एक एक शब्द की व्याख्या करना इनका प्रमुख विषय रहा है इसलिए व्याख्यात्मक शैली का प्रयोग भी इनकी रचनाओं में बहुतायात मिलता है निबंधों में मुख्य रूप से आलोचनात्मक शैली का प्रयोग किया है “कविता क्या है” “तुलसी की भावुकता” यह निबंध इन शैलियों के मुख्य उदाहरण हैं वास्तव में हिंदी की आलोचनात्मक शैली के जन्मदाता आचार्य शुक्ल जी ही हैं इनकी रचनाओं में बीच-बीच में हास्य व्यंग के टुकड़े भी मिलते हैं कहने का तात्पर्य है कि इनकी शैली समय-समय पर और स्थान स्थान पर विषय के अनुसार बदलती रहती है |


साहित्यिक परिचय – शुक्ल जी ने अपने साहित्यिक जीवन का प्रारंभ एक कवि के रूप में किया था लेकिन इनकी मुख्य रुचि साहित्य और निबंध के क्षेत्र में थी इसलिए उनकी ज्यादातर रचनाएं एक निबंधकार और साहित्यकार के रूप में होती हैं | उन्होंने सैद्धांतिक और व्यवहारिक दोनों प्रकार की आलोचनाएं लिखी हैं इनके द्वारा लिखे हुए निबंध संकलन रस मीसांसा और चिंतामणि भाग 1 और भाग 2 सैद्धांतिक आलोचनाओं के अंतर्गत आते हैं | इन्होंने व्यवहारिक रूप में तुलसी व जायसी की ग्रंथावलियों और भ्रमरगीत सार की भूमिका लिखी | इनके द्वारा रचित हिंदी साहित्य का इतिहास हिंदी साहित्य को एक अभूतपूर्व देन है आनंद कादम्बिनी नामक पत्रिका में इनकी रचनाएं प्रकाशित होती थी |


अवतरणों पर आधारित प्रश्न
(क) जब कोई युवा……………………………………… परिणत हो जाता है |
सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के गद्य खंड के आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा लिखित “मित्रता” नामक निबंध से लिया गया है |
प्रसंग- यहां लेखक आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने युवा पुरुष के घर से बाहर निकलने पर किस प्रकार मित्र बनाना चाहिए इस पर प्रकाश डाला है |
व्याख्या – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी कहते हैं कि जब कोई युवा पुरुष अपने घर से बाहर निकलता है और बाहरी वातावरण में अपने को स्थापित करने का प्रयास करता है तो उसे सबसे ज्यादा कठिनाई मित्र चुनने में आती है अपना सबसे अच्छा मित्र चयन करने में वह सोचता है कि मेरा सबसे अच्छा मित्र ऐसा होना चाहिए कि जो मुझे हर कदम पर सहायता प्रदान करें| यदि वह युवक विचित्र प्रकृति का एकांत प्रिय नहीं होता है अर्थात वह युवक सबसे अलग-थलग रहने वाला नहीं होता है तो उसके जान पहचान में लोग बढ़ते जाते हैं और वह युवक दूसरे लोगों से कुछ ही समय में हिल मिल जाता है और कुछ ही दिनों में उसका मेल मिलाप बहुत सारे लोगों से हो जाता है अर्थात बहुत कम समय में उसके बहुत सारे मित्र बन जाते हैं और यही जो मेल मिलाप है कुछ समय बाद मित्रता का रूप ले लेता है |


प्रश्न-
(1)- उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम बताइए |
उत्तर- पाठ का नाम मित्रता लेखक का नाम रामचंद्र शुक्ल
(2)- घर से बाहर निकल कर युवा पुरुष को किस कठिनाई का सामना करना पड़ता है |
उत्तर – घर से बाहर निकल कर युवा पुरुष को एक अच्छा मित्र का चयन करने में सबसे ज्यादा कठिनाई का सामना करना पड़ता है |
(3)- हेल मेल बाद में किस में बदल जाता है |
उत्तर- हेल मेल बाद में मित्रता में बदल जाता है |
(ख) हम लोग ऐसे समय……………………………………..राक्षस बनावे चाहे देव |

सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक हिंदी के गद्य खंड के आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा लिखित “मित्रता” नामक निबंध से लिया गया है |
प्रसंग – आचार्य शुक्ल जी ने इस गद्यांश में किशोरावस्था में युवकों पर अच्छे और बुरे प्रभाव का वर्णन किया है |
व्याख्या – आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी कहते हैं किकोई नवयुवक किशोरावस्था में होता है और घर की सीमाओं को लांघकर जब बाहर निकलता है तथा बाहरी समाज और संसार में जब वह प्रवेश करता है उस समय उस युवक को समाज और संसार का अनुभव नहीं होता है तब दुनियादारी की बातों से अनभिज्ञ युवक कच्ची मिट्टी की मूर्ति के समान होता है | जिसे तोड़कर किसी भी प्रकार का रूप दिया जा सकता है अर्थात उस युवक को संसार की वास्तविकता का ज्ञान ना होने के कारण उसे बाहरी समाज चाहे जिस अवस्था में मोड सकता है | यदि वह व्यक्ति किसी दुष्ट व्यक्ति की संगति करता है, to वह राक्षस और दुष्ट बन जाता है तथा जब कोई सज्जन व्यक्ति उस पर अपना प्रभाव डालता है तो वह सज्जन बन जाता है तथा वह अच्छी संगति के प्रभाव में चला जाता है इस प्रकार संगति के कारण देवताओं की भांति उसमें भी अच्छे गुण आ सकते हैं |


प्रश्न उत्तर
(1)- उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम बताइए |
उत्तर- पाठ का नाम मित्रत, लेखक का नाम रामचंद्र शुक्ल
(2) कच्ची मिट्टी की मूर्ति के समान से लेखक का क्या आशय है
उत्तर- कच्ची मिट्टी की मूर्ति के समान से लेखक का आशय युवकों की किशोरावस्था से है |
(3) जब हम समाज में कोई कार्य आरंभ करते हैं तोहमारे चित्त की क्या स्थिति होती है |
उत्तर- जब हम समाज में कोई कार्य आरंभ करते हैं तो हमारे चित्त की स्थिति कोमल और संस्कारों को ग्रहण करने वाली होती है जिसमें हम अच्छी और बुरी बातों को ग्रहण करते हैं |


[ग] छात्रावास में तो मित्रता………………………………………… मानना मनाना होता है |
सन्दर्भ- पहले तरह |
प्रसंग- प्रस्तुत गद्यांश में शुक्ल जी ने छात्रावास में रहने वाले विद्यार्थियों की मित्र बनाने की ललक का सुंदर वर्णन किया है |
व्याख्या – शुक्ल जी जी कहते हैं कि छात्रावास में जो विद्यार्थी रहते हैं उनके मन में हमेशा एक ही बात दौड़ती है कि मैं ज्यादा से ज्यादा मित्र बनाऊं उनके हृदय में मित्रता की भावना पूरे वेग से उमड़ती रहती है हालांकि युवावस्था अथवा वृद्धावस्था में भी लोग एक दूसरे के स्नेह में बंधते हैं एक दूसरे को मित्र बनाते हैं परंतु फिर भी जो उमंग किशोरावस्था में छात्रावास में होती है वैसी स्थिति वयस्क और वृद्धावस्था में नहीं होती है | वास्तव में बचपन की मित्रता में उस आनंद की अनुभूति होती है जिसमें हमारा मन सब कुछ भूलकर मित्रता की स्मृतियों में ही तल्लीन हो जाता है इस अवस्था में जेसी तीव्र ईर्ष्याऔर मन को गहन दुख पहुंचाने वाली अनुभूति होती है, वह अन्य किसी अवस्था में दिखाई नहीं देती है | बाल मित्रों से संबंध अत्यंत मधुरता पूर्ण और एक दूसरे के परम विश्वास पर आधारित होते हैं बाल मैत्री में हृदय से अनूठे भावों की अभिव्यक्ति होती है उस समय वर्तमान आनंद में निमग्न करने वाला दिखाई देता है और भविष्य के संबंध में हमारा मन अनेक कल्पनाएँ करता है किसी को कोई बात तत्काल आहत कर देती है और हम उसे रूठ जाते हैं यही नहीं रूठ कर कुछ ही देर से उनसे प्रसन्न हो जाते हैं और अपनी नाराजगी वापस कर लेते हैं अपने जिस मित्र को हम नाराज कर दिया करते हैं कुछ समय बाद हम उसे मनाने में लग जाते हैं सहपाठी की मित्रता देखने में बहुत छोटी होती है परंतु इसमें उस व्यक्ति के हृदय में हलचल मचा देने वाले अनेक भाव विद्यमान होते हैं |


प्रश्न उत्तर
(1) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ का नाम व लेखक का नाम बताइए
उत्तर – मित्रता और रामचंद्र शुक्ल
(2) छात्रावास में मित्रता की धुन किस प्रकार सवार रहती है
उत्तर छात्रावास में मित्रता की धुन बहुत अधिक सवार रहती है क्योंकि ह्रदय में मित्रता की भावना पूरे वेग से उमड़ती रहती है |
(3) बाल मैत्री की क्या-क्या विशेषताएं होती हैं |
उत्तर- बाल मैत्री में हृदय में बहुत उमंग और आनंद होता है उसमें हृदय को भेदने वाली ईर्ष्या और खिन्नता के बजाय मधुरता और अनुराग की भावना होती है | मित्र के प्रति अपार विश्वास और भविष्य की लुभावनी कल्पनाएं भी होती हैं |
(4) प्रस्तुत गद्यांश का साहित्य सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए |
उत्तर- साहित्य सौन्दर्य – (क) छात्रावास में रहने वाले विद्यार्थियों के मन में मित्र बनाने की ललक का वर्णन किया है,
(ख) बाल मैत्री का सुंदर वर्णन किया गया है
(ग) भाषा- साहित्य खड़ी बोली है
(घ) शैली- वर्णनात्मक है
(च) मुहावरे- बातें लगाना का प्रयोग किया गया है |

[घ] इसी प्रकार ……………………………………………………..मित्रता खूब निभा |
संदर्भ – पूर्व की तरह
प्रसंग- इसमें मित्रता के लिए व्यक्तियों के व्यवहार और स्वभाव का एक समान होना आवश्यक नहीं है ऐसा वर्णन किया है
व्याख्या- सच्ची मित्रता के लिए दो व्यक्तियों के स्वभाव अथवा आचरण में समानता होना इनमें कोई संबंध नहीं है यदि व्यक्ति परस्पर एक दूसरे के प्रति सहानुभूति का भाव रखते हैं एक दूसरे के सुख और दुख को अपने सुख और दुख के समान मानते हैं तो उनके स्वभाव विपरीत होने पर भी उनकी मित्रता हो सकती है इसके विपरीत यदि ये भाव विद्यमान नहीं है तो उनके स्वभाव तथा आचरण में पर्याप्त समानता होने पर भी उनमें मित्रता नहीं हो सकती | इस बात को सिद्ध करने के लिए राम और लक्ष्मण कर्ण और दुर्योधन की मित्रता का उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकता है | राम धैर्य शाली और शांत स्वभाव के थे तथा लक्ष्मण उग्र स्वभाव के थे परंतु फिर भी दोनों भाइयों में बहुत असीम प्रेम था और एक दूसरे के मित्र भी थे | इसी प्रकार कर्ण दयालु स्वभाव और उच्च विचारों का धनी व्यक्ति था | जबकि दुर्योधन दुष्ट और लोभी प्रकृति का व्यक्ति था परंतु फिर भी दोनों में अटूट मित्रता थी इसका प्रमुख कारण था दोनों को एक दूसरे के प्रति सुख-दुख को समझना एक दूसरे के सुख दुख में हमेशा तैयार रहना तथा एक दूसरे के प्रति सहानुभूति का भाव होना |


प्रश्न और उत्तर
(1) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ का नाम और लेखक का नाम लिखिए |
उत्तर- पाठ का नाम मित्रता लेखक का नाम रामचंद्र शुक्ल
(2) मित्रता के लिए किन चीजों की समानता आवश्यक नहीं है |
उत्तर- मित्रता होने के लिए व्यक्तियों के व्यवहार और स्वभाव की समानता होना आवश्यक नहीं है |
(3) राम और लक्ष्मण के स्वभाव में क्या अंतर था |
उत्तर – राम परमवीर और शांत स्वभाव के थे जबकि लक्ष्मण उग्र स्वभाव के थे दोनों के स्वभाव में यही मूल अंतर था |
(4) गद्यांश में कर्ण और दुर्योधन की प्रवृत्ति कैसी बताई गई है |
उत्तर- इस गद्यांश में कर्ण को उदार एवं उच्च प्रवृत्ति का तथा दुर्योधन की प्रवृत्ति का बताया गया है |


[च] मित्र का कर्तव्य…………………………………………………….. धोखा ना होगा |

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग – यहां पर शुक्ल जी ने सच्चे मित्र का कर्तव्य अपने मित्र का हित करना बताया है जैसे राम ने सुग्रीव का मकिया था |
व्याख्या– सच्चे मित्र का कर्तव्य होता है की वह अपने मित्र को हमेशा अच्छे काम करने के लिए प्रोत्साहित करें संकट और विपत्ति के क्षणों में वह अपने मित्र को उत्साहित करें तथा उसका मनोबल बढ़ाए | जिससे वह किसी भी संकट का सामना दृढ़ता पूर्वक कर सके अर्थात एक सच्चा मित्र अपने मित्र के अच्छे एवं महान कार्यों को करने के लिए प्रेरित करता है और उसकी उस कार्य को करने में सहायता करता है इस प्रकार उसका मित्र साहस और दृढ़ संकल्प के बल पर अपनी सामर्थ्य से भी अधिक कार्य कर जाता है | लेकिन ऐसे सच्चे मित्र आसानी से नहीं मिलते संकट में अपने मित्र की सहायता वही करता है जिसका मन शक्तिशाली हो तथा जो स्वभाव से दृढ़ निश्चय वाला हो | शक्तिशाली मन तथा सत्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति संकट आने पर मित्र की सहायता कर सकता है | मित्र का चुनाव करते समय हमें क्या-क्या बातें ध्यान में रखनी चाहिए जिसे हम उसको अपना मित्र बनाएं सबसे पहले उसका आत्मबल देखना चाहिए आत्मबल से युक्त व्यक्ति का सहारा हम पूरे विश्वास के साथ ले सकते हैं भगवान राम के आत्मशक्ति के विषय में विश्वास हो जाने पर ही बानरो के राजा सुग्रीव ने उनका आशय ग्रहण किया था | श्री राम की शक्ति के बल पर ही अपना राज्य और अपनी पत्नी को प्राप्त कर सका था | वास्तव में राम जैसा मित्र पाकर सुग्रीव धन्य हो गया मित्र का चुनाव करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मित्र ऐसा हो जिसका समाज में सम्मान हो या जो सत्य में निष्ठा रखने वाला हो निष्कपट हो परिश्रमी हो सत्य पर चलने वाला हो ऐसा मित्र किसी को धोखा नहीं दे सकता अर्थात हमें हमारे जीवन के लिए सच्चे मित्र की बहुत आवश्यकता होती है |


[प्रश्न और उत्तर]
(1) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ का नाम और लेखक का नाम लिखिए |
उत्तर- पाठ का नाम मित्रता लेखक का नाम रामचंद्र शुक्ल
(2) सुग्रीव ने राम के साथ मित्रता क्यों की ?
ऊतर- सुग्रीव ने राम के साथ मित्रता इसलिए की क्योंकि उसे भगवान राम की आत्मशक्ति के विषय में ज्ञान हो गया था वह राम की शक्ति के बल पर ही अपना राज्य और अपनी पत्नी को प्राप्त करना चाहता था |
(3) उक्त गद्यांश के अनुसार मित्र का क्या कर्तव्य होना चाहिए |
उत्तर- उक्त गद्यांश के अनुसार मित्र का कर्तव्य है कि वह अपने मित्र के साहस और आत्मबल की प्रशंसा करें और उच्च और महान कार्यों में उसकी हर प्रकार से सहायता करें जिससे उसका मित्र अपनी सामर्थ्य के बाहर जाकर कार्यों को पूरा कर पाए |
(4) मित्रता के सही कर्तव्य का निर्वाह किस प्रकार का व्यक्ति कर सकता है ?
ऊतर- मित्रता के सही कर्तव्य का निर्वाह सत्य संकल्प वाला व्यक्ति ही कर सकता है जिसका मनोबल बहुत उच्च हो |
(5) मित्र में किस प्रकार की विशेषताएं होनी चाहिए और क्यों ?
उत्तर- मित्र प्रतिष्ठित होना चाहिए शुद्ध हृदय वाला होना चाहिए विनम्र पुरुषार्थी शिष्ट और सत्य निष्ठा वाला होना चाहिए जिससे हम उस पर भरोसा कर सके और विश्वास कर सकें कि वह हमें किसी भी प्रकार से धोखा ना दे ऐसा मित्र होना चाहिए |


[छ] कुसंग का ज्वर…………………………………………………………….. उठाती जाएगी |
सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग – इस अवतरण में शुक्ल जी ने बुरी संगति के प्रभाव का वर्णन किया है
व्याख्या — जीवन में संगति के प्रभाव को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानते हुए आचार्य शुक्ल जी कहते हैं कि बुरे और दुष्ट व्यक्ति की संगति एक ज्वर की समान होती है जिस प्रकार ज्वर आने पर शरीर की सारी शक्ति क्षीण हो जाती है उसी प्रकार दुष्ट की संगति पाने पर बुद्धि विवेक सदाचार आदि सब क्षीण हो जाता है बुरी संगति के प्रभाव में पड़कर व्यक्ति अच्छे बुरे उचित अनुचित का ज्ञान भी खो देता है | वास्तव में जो लोग युवावस्था में बुरी संगति में पड़ जाते हैं, वह कभी उन्नति की ओर अग्रसर नहीं हो पाते | अर्थात उनका जीवन आगे चलकर दुष्ट प्रवृत्ति का हो जाता है मानव जीवन में सबसे ज्यादा असर युवावस्था में होता है इसलिए जब युवावस्था हो उस समय हमें अपनी संगति सोच समझकर बनानी चाहिए इस समय बुद्धि और विवेक दोनों से कार्य करना आवश्यक है | बुरी संगति पत्थर की चक्की के समान होती है जो पैरों में बांधे जाने पर व्यक्ति को गतिहीन बना देती है | अर्थात उसकी उन्नति का मार्ग रोक देती है जिससे व्यक्ति का पतन होने लगता है और किसी दिन जाकर वह किसी गहरे गड्ढे (पतन) में गिर जाता है इसके विपरीत अच्छी संगति एक ऐसी भुजा के समान होती है जो किसी गिरे हुए व्यक्ति को उठाती है गिरते हुए को सहारा देती है अर्थात सत्संगति मिल जाने पर बुरी संगति में कोई व्यक्ति पड़ा हुआ है वह भी उन्नति के मार्ग पर चल सकता है |


[ प्रश्न और उत्तर ]
(1) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ का नाम और लेखक का नाम लिखिए |
उत्तर- पाठ का नाम मित्रता लेखक का नाम रामचंद्र शुक्ल
(2) लेखक के अनुसार पैरों में बंधी चक्की के समान क्या होगी |
उत्तर लेखक के अनुसार बुरी संगति पैरों में बंधी चक्की के समान होगी जो व्यक्ति को गतिहीन बना देती है |
(3) किस ज्वर को सबसे भयानक कहा गया है और क्यों ?
उत्तर- कुसंगति का ज्वर सबसे भयानक कहा गया है क्योंकि कुसंगति व्यक्ति की बुद्धि और विवेक सदाचार आत्मबल सब का नाश कर देती है जिससे व्यक्ति का आत्मबल कमजोर हो जाता है और उसका आगे चलकर के पतन होना निश्चित हो जाता है |
(4) अच्छी संगति से होने वाले लाभ को बताइए |
उत्तर- अच्छी संगति व्यक्ति को सहारा देने वाली भुजा के समान होती है जो व्यक्ति को पतन के गड्ढे में गिरने से बचाती है और उसे उन्नति के मार्ग की ओर अग्रसर करती है |
(5) बुरी संगति से क्या क्या हानियां हैं ?
उत्तर- बुरी संगति व्यक्ति को लगातार पतन के गड्ढे में गिराती जाती जाती है क्योंकि बुरी संगति से उसकी बुद्धि विवेक और आत्मबल सब का नाश हो जाता है |


[ज] सावधान रहो……………………………………………पहचाना ना रह पाएगी |
संदर्भ – पूर्व की तरह
प्रसंग- इस अवतरण में लेखक ने बुरे लोगों की बातों को हल्के में न लेने के लिए कहा है |


व्याख्या – शुक्ल जी कहते हैं कि व्यक्ति को बुरे लोगों के साथ को और उनकी बातों को हल्के में नहीं लेना चाहिए और इसे एक सामान्य बात समझ कर इसकी अनदेखी भी नहीं करनी चाहिए, कि चलो उसने यह बातें केवल हमें हंसाने के लिए ही तो कहीं है | हमें यह भी नहीं सोचना चाहिए चलो इस बार तो इसने ऐसी ही बातें की हैं आगे से ऐसा नहीं करेगा | हमें ऐसा भी नहीं सोचना चाहिए कि कोई ऐसी बातें करता भी है तो हमें क्या मतलब, हमारे ऊपर इसका क्या फर्क पड़ता है हमारा चरित्र to पवित्र और उत्तम है | जब तक हम ऐसी बातें करते रहेंगे तब तक हम अपने आप को नहीं सुधार पाएंगे | शुक्ल जी कहते हैं यदि तुम ऐसा सोचते हो की हम नहीं बिगड़ेंगे तो यह बिल्कुल गलत है क्योंकि ऐसा कभी भी नहीं होगा इसका कारण स्पष्ट करते हुए शुक्ल जी आगे कहते हैं कि जब मनुष्य बुराई की ओर एक कदम बड़ा लेता है अर्थात बुराई को एक बार अपना लेता है तो फिर वह यह सोचना छोड़ देता है कि जिस बुराई की ओर वह बढ़ रहा है उससे उसके चरित्र पर कितना बड़ा कलंक लग सकता है उससे उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा और चरित्र का कितना पतन हो सकता है वह तो यह सोचने लगता है कि इस बुरे काम को एक बार करके भी उतना ही पाप लगता है जितना इसे हजार बार करने से लगता है यह सोचकर वह धीमे धीमे बुराइयों में लिप्त होता जाता है | तब व्यक्ति धीरे-धीरे बुरी बातों का अभ्यस्त हो जाता है | फिर वह बुरी बातों में बुरी तरह से उलझ जाता है और फिर वह बुरी बातों से घृणा करना बंद कर देता है और इसी प्रकार वह सोचता है कि बुरी बातों से और बुरे व्यक्तियों से चिढ़ने वाली तो कोई बात ही नहीं है इस प्रकार उसकी उचित और अनुचित देखने और सोचने की क्षमता नष्ट हो जाती है |


[प्रश्न और उत्तर ]
(1) लेखक के किस बात के लिए सावधान कर रहा है स्पष्ट कीजिए |
उत्तर- लेखक उन लोगों को सावधान कर रहा है जो फूहड़ और अश्लील बातें करते हैं और उन बातों से हमें हंसाना चाहते हैं |
(2) चरित्र बल का क्या अर्थ है |
उत्तर- चरित्र बल का अर्थ किसी व्यक्ति के चरित्र की शक्ति और पवित्रता से है और उसका चरित्र बल उत्तम है तो उस पर किसी को संगति का प्रभाव नहीं पड़ेगा |
(3) कीचड़ में पैर डालने से क्या अभिप्राय है
उत्तर- इस अवतरण में कीचड़ में पैर डालने से अभिप्राय बुराई में प्रवेश करने से है |

up board class 10 hindi solution: हिन्दी गद्य का इतिहास- हिन्दी गद्य साहित्य के विकास पर आधारित प्रश्न ओर उत्तर

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

  1. मित्रता किस विधा से संबंधित है
    [अ] नाटक [ब] कहानी [स] संस्मरण [द] निबंध √
  2. शुक्ल युग के किसके नाम पर पड़ा |
    [अ] चंद्रबली शुक्ल [ब] रामचंद्र शुक्ल [स] श्याम चंद्र शुक्ला [द] राम कुमार शुक्ल
    3.रस मीसांसा किस प्रकार की कृति है |
    [अ] आलोचना [ब] कहानी [स] इतिहास [द] निबंध
  3. निम्न में शुक्ल जी की रचना कौन सी है |
    [अ] युगांधर [ब] बात [स] पुरस्कार [द] रस मीसांसा √
  4. निम्नलिखित प्रश्नों से नए शब्दों का निर्माण कीजिए :-
    ता— आवश्यकता मधुरता
    त्व —- देवत्व कवित्व
    ईय —–राष्ट्रीय भारतीय
    आवट—— बनावट लिखावट
    आई ——– लिखाई पढ़ाई
    हार ——- आहार निराहार
  5. निम्नलिखित शब्दों से मूल शब्द अलग कीजिए
    ग्रंथकार ग्रंथ
    सत्य निष्ठा सत्य
    कलुषित कलुष
    उपयुक्तता उपयुक्त
    सात्विक सत्व
  6. निम्न शब्दों के बिलोम शब्द लिखो
    शब्द विलोम शब्द
    साहस कायरता
    मित्रता शत्रुता
    निर्मल सबल
    सदाचार दुराचार

संस्कृत खंड पाठ 4 प्रबुद्ध ग्रामीण सम्पूर्ण पाठ का हल

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