Up Board Class 10 hindi solution chapter 3 भारतीय संस्कृति डॉ राजेंद्र प्रसाद

Up Board Class 10 hindi solution chapter 3 भारतीय संस्कृति डॉ राजेंद्र प्रसाद

Up Board Class 10 hindi solution chapter 3
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     पाठ 4 भारतीय संस्कृति

प्रश्न 1- डॉ राजेंद्र प्रसाद का जन्म कब और कहां हुआ था ?
उत्तर – डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद का जन्म 3 दिसंबर 1884 ईसवी को बिहार के जीरोदेई नामक एक छोटे से गांव में हुआ था |
प्रश्न 2- डॉ राजेंद्र प्रसाद के पिता का क्या नाम था ?
उत्तर – डॉ राजेंद्र प्रसाद के पिता का नाम महादेव सहाय था |
प्रश्न 3 – राजेंद्र प्रसाद साहित्य के अतिरिक्त और अन्य किस क्षेत्र में भी कुशल माने जाते हैं ?
उत्तर- डॉ राजेंद्र प्रसाद साहित्य के अतिरिक्त राजनीति के क्षेत्र में भी कुशल माने जाते हैं |
प्रश्न 4 – डॉ राजेंद्र प्रसाद की शिक्षा दीक्षा बताइए |
उत्तर – राजेंद्र प्रसाद की प्रारंभिक शिक्षा इनके गांव में हुई उनके पश्चात कलकत्ता विश्वविद्यालय से m.a. की परीक्षा उत्तीर्ण की | उन्होंने वकालत की पढ़ाई के लिए कोलकाता प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश ले लिया और 1915 में कानून में मास्टर डिग्री में विशिष्टता पाने के लिए स्वर्ण पदक भी प्राप्त किया इसके बाद इन्होंने कानून में डॉक्टरेट की उपाधि भी प्राप्त की थी |


प्रश्न 5 – राजेंद्र प्रसाद ने वकालत कब और कहां से आरंभ की तथा उन्होंने वकालत कब और क्यों छोड़ी ?
उत्तर – डॉ राजेंद्र प्रसाद ने सन 1911 ईस्वी में कोलकाता में वकालत आरंभ की तथा सन् 1920 में गांधीजी के आदर्शों सिद्धांतों और आजादी के आंदोलन से प्रभावित होकर सन 1920 में वकालत का कार्य छोड़ दिया तथा पूरी तरह से देश सेवा में लग गए | सन 1934 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में अध्यक्ष चुने गए | नेताजी सुभाष चंद्र बोस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष पद का भार एक बार फिर 1939 में संभाला 15 अगस्त 1947 में देश के स्वतंत्र होने के बाद उन्होंने देश के पहले राष्ट्रपति का पदभार ग्रहण किया | भारतीय संविधान के लागू होने से 1 दिन पहले 25 जनवरी 1950 को इनकी बहन भगवती देवी का निधन हो गया किंतु यह भारतीय गणराज्य की स्थापना की प्रक्रिया के बाद ही दाह संस्कार के लिए गए| 12 वर्षों तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने के पश्चात उन्होंने 1962 में अपने अवकाश की घोषणा की इन्हें भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया डॉ राजेंद्र प्रसाद जिंदगी भर हिंदी साहित्य सृजन तथा देश सेवा में संलग्न रहे उन्होंने अपना अंतिम समय पटना के निकट सदाकत आश्रम में व्यतीत किया यहीं पर 28 फरवरी 1963 ईस्वी में उनकी मृत्यु हो गई |
साहित्यिक परिचय – राजेंद्र प्रसाद ने शिक्षा एवं संस्कृति भारतीय शिक्षा राजनीतिक विषयों को साहित्य सृजन किया इनकी कृतियां निम्नलिखित हैं आत्मकथा बापू के कदमों में इंडिया डिवाइडेड सत्याग्रह चंपारण गांधीजी की भारतीय संस्कृति का अर्थशास्त्र मेरी यूरोप यात्रा और संस्कृत राजेंद्र प्रसाद ने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय संस्कृत में अनेकता में एकता के दर्शन कराए हैं उन्होंने अपनी रचनाओं द्वारा हिंदी साहित्य की पर्याप्त सेवा की है राजेंद्र सादा जीवन और उच्च विचार में विश्वास रखते थे इसका परिचय इनकी रचनाओं से स्पष्ट किया जा सकता है यह हिंदी के एक महान साधक तथा एक महान देशभक्त के रूप में हमेशा भारत वासियों के हृदय में निवास करते रहेंगे इनकी साहित्यिक सेवाओं के कारण हिंदी साहित्य इनका सदैव ऋणी रहेगा |


अवतरणों पर आधारित प्रश्न
1- कोई देशी, जो ……………………………………………………………………… को मिलेगी |
सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिन्दी के डा राजेंद्र प्रसाद द्वारा लिखित भारतीय संस्कृति नामक निबंध से लिया गया है |
प्रसंग- यहाँ पर लेखक डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भारत की भिन्नता का बहुत सुंदर वर्णन किया है कि भारत में एक स्थान से दूसरे स्थान पर भिन्नता को आसानी से देखा जा सकता है |
व्याख्या— डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भारत की भिन्नता को यहाँ की सुंदरता बताते हुए कहा है कि कोई भी व्यक्ति जो विदेश से आता है, और जो भारत की भिन्नताओं के बारे में कुछ भी नहीं जानता है, अगर वह भारत में एक छोर से दूसरे छोर तक यात्रा करे तो उसको यहाँ पर इतनी विभिन्नताएँ देखने को मिलेंगी, कि वह भारत को एक देश नहीं अपितु देशों का समूह (महाद्वीप) कहेगा, जैसे एक देश दूसरे देश से भिन्न होता है उसी प्रकार यहाँ पर एक स्थान व दूसरे स्थान में भिन्नता आसानी से देखने को मिल जाती है | यहाँ पर प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली भिन्नताएँ इतनी ज्यादा मात्रा में व उतने ही प्रकार की बहुत गहरी मिलती हैं, जो किसी महाद्वीप के अंदर ही हो सकती हैं | यहाँ उत्तर में हिमालय की बर्फ से ढ़की चोटियाँ स्थित हैं तो दक्षिण की ओर जाने पर, गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा सिंचित समतल और आगे बढ़ने पर विंध्य, अरावली, सतपुड़ा, नीलगिरी की पहाडियों में स्थित रंग-बिरंगे समतल देखने को मिलते हैं भारत में पश्चिम दिशा से पूर्व दिशा तक जाने में भी इसी प्रकार की बहुत सारी भिन्नताएँ देखने कोमिलती हैं |


प्रश्नोत्तर
1- इस गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए ।
उत्तर- पाठ का नाम- भारतीय संस्कृति ; लेखक- डॉ. राजेंद्र प्रसाद
2-कोई अपरिचित विदेशी अगर भारत की यात्रा करे तो वह क्या कह उठेगा ?
उत्तर- कोई अपरिचित विदेशी अगर भारत की यात्रा करे तो वह भारत को देशों का समूह (महाद्वीप) कह उठेगा ।
3- गद्यांश में किन-किन नदियों व पर्वत शिखरों के विषय में बताया गया है ?
उत्तर- गद्यांश में गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र नदियों व विंध्य, आरावली, सतपुड़ा, नीलगिरी के पर्वत शिखरों के विषय में बताया गया है |

असम की पहाडियों …………………………………………………………………. के लोग देते हैं |
सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- यहाँपर लेखक ने भारत की प्राकृतिक भिन्नता का वर्णन करते हुए विषमताओं को बताया है |
व्याख्या- हमारे देश भारत में इतनी प्राकृतिक विधताएँ देखने को मिलती है; जिनका किसी अन्य देश में मिलना दुर्लभ है | हाँ, इतनी विविधताएँ किसी महाद्वीप में तो हो सकती हैं | इस द्रष्टि से यदि कोई भारत को भिन्न देशों का समूह कहे तो अतिशयोक्ति न होगी | यहाँ अगर असम की पहाडियों में ३०० इंच तक की वर्षा वाले क्षेत्र उपस्थित हैं तो राजस्थान के जैसलमेर में दो-चार इंच वर्षा वाले क्षेत्र भी हैं | असम की जलवायु जहाँ अत्यधिक आद्रता से युक्त है, वहीं जैसलमेर की जलवायु अत्यधिक गर्म है लगता है कि जैसे भूमि न होकर आग से तपता हुआ तवा हो | संसार में पाया जाने वाला कोई अन्न अथवा फल ऐसा नहीं है, जो यहाँ पैदा नहीं होता अथवा जिसे पैदा न किया जा सके; क्योंकि यहाँ संसार में पाई जाने वाली सभी प्रकार की जलवायु मिलती हैं और मिट्टियाँ भी लगभग सभी प्रकार की पाई जाती हैं | थोड़ी बहुत मात्रा में संसार में पाए जाने वाले सभी खनिज यहाँ की मिट्टी में पाए जाते हैं, संसार का कोई ऐसा जानवर अथवा वृक्ष ऐसा नहीं, जो यहाँ के वनों में प्राप्त नहीं होता है भारत की प्राकृतिक विविधता का यहाँ के लोगों के रहन-सहन, वेशभूषा, खान-पान, शरीर और दिमाग पर भी खूब प्रभाव पड़ा है | यह वैज्ञानिक सिद्धांत भी है कि किसी स्थान की जलवायु व्यक्ति के रहन-सहन, वेष भूषा, खान-पान और शारीरिक विकास आदि को प्रभावित करती है विज्ञान के इस सिद्धांत का जीता-जागता प्रमाण अर्थात् व्यावहारिक रूप यहाँ के भिन्न राज्यों के लोगों में प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिलता है मतलब यही है कि भारत के विभिन्न राज्यों के लोगों की वेशभूषा, रहन-सहन, खान-पान तथा शारीरिक संरचना में जो विविधता देखने को मिलती है, उसका सबसे प्रमुख कारक यहाँ की प्राकृतिक विविधता अथवा जलवायु ही है |


प्रश्नोत्तर
1- इस गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर- पाठ का नाम -भारतीय संस्कृति; लेखक— डॉ. राजेंद्र प्रसाद
2- गद्यांश के अनुसार भारत में सबसे अधिक व सबसे कम वर्षा कहाँ होती है ?
उत्तर- गद्यांश के अनुसार भारत में सबसे अधिक वर्षा असम में तथा सबसे कम जैसलमेर में होती है |
3- भारत की भूमि की विशेषता बताइए ।
उत्तर- भारत की भूमि की यह विशेषता है कि यहाँ संसार में पाया जाने वाला प्रत्येक फल, अन्न, खनिज पदार्थ, वृक्ष और जानवर मिलता है |
4- मानव-जीवन पर प्राकृतिक विविधता का क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर- प्राकृतिक विविधता मानव के रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा, शरीर और दिमाग को प्रभावित करती है यही कारण है कि प्राकृतिक विविधताओं से परिपूर्ण भारत के भिन्न प्रांतों के लोगों के रहन-सहन, खान-पान, वेशभूषा और रंग-रूप में विविधता देखने को मिलती है |
3- पर चार ……………………………………………………………………. एक ही हो जाए।
सन्दर्भ- पहले की तरह |
प्रसंग- यहाँ लेखक ने भारत की भिन्नता में एकता के बारे में बताते हुए इस एकता को भारत की शक्ति बताया है |
व्याख्या-यहाँ पर लेखकबताते है कि बाहर से देखने पर भारतीय संस्कृति में भाषा, जाति, धर्म आदि के रूप में भिन्नता के दर्शन होते हैं | हमारे देश में अनेक भाषा-भाषी, अनेक जातियाँ तथा अनेक धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं, फिर भी उन सभी में एकता है और वे एक ही देश के नागरिक हैं; अत: उनकी संस्कृति एक है और वह है, “भारतीय संस्कृति”। इसकी अनेकता में एकता उसी प्रकार विद्यमान है, जिस प्रकार एक रेशमी धागा भिन्न प्रकार के पुष्पों अथवा मणियों को एक साथ गूँथ देता है और पुष्पों अथवा मणियों से मिलकर एक सुंदर माला बन जाती है | हमारी भिन्नताएँ भी तरह-तरह की मणियों या पुष्पों के समान ही हैं, जो एकतारूपी धागे में बँधकर एक सुंदर संस्कृति का निर्माण करती हैं | मणियाँ अथवा पुष्प एक दूसरों से तभी तक अलग-अलग दिखाई देते हैं, जब तक उन्हें एक धागे में पिरोया नहीं जाता है | एकता के रेशमी धागे में पिरोई हुई इन मणियों में प्रत्येक मणि दूसरी मणि को सुशोभित करती है और उसकी शोभा से स्वयं भी शोभायमान होती है | माला में गुँथे हुए भिन्न फूलों के साथ भी ऐसा ही होता है भारतीय संस्कृति में व्याप्त भिन्नताएँ भी ऐसी मणियों अथवा पुष्पों के समान हैं, जो एकता रूपी रेशमी धागे में गुँथी हुई हैं | इसी एकता के कारण भारतीय संस्कृति जैसी विशाल और आकर्षक माला का निर्माण हुआ है| इसकी भिन्नता में भी सुंदरता है ये भिन्नताएँ एक-दूसरे को और अधिक सुंदर बना रही हैं विशाल भारत की बहुरंगी संस्कृति की अनेकता में एकता व्याप्त है | यह किसी कवि की कल्पना मात्र नहीं है कि लेखक ने किसी भावावेश में भी ऐसा नहीं लिखा है कि भारतीय संस्कृति के मूल में एकता विद्यमान है यह एकता की उड़ान नहीं, वरन् एक ऐतिहासिक सत्य है जैसे भिन्न झरनों और नदियों के उद्गम-स्थल अलग-अलग होने पर भी उनका जल दूर-दूर से आकर सागर की गोद में समा जाता है और उनका संगम ‘सागर’ कहलाता है | उसी प्रकार भारत में अनेक विचार धाराओं के लोग रहते हैं और भिन्न धर्मों तथा संप्रदायों के झरने हजारों वर्षों से भारत में आकर मिलते रहे हैं | इन सबके मिलने से एक विशाल और गहरे सागर का निर्माण हुआ है इसी सागर को हम भारतीय संस्कृति कहते हैं | जिस प्रकार भिन्न नदियों के उद्गम स्थल और प्रवाह क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति अलग-अलग होती है और उन क्षेत्रों में अलग-अलग प्रकार के अन्न, फल-फूल आदि उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार भिन्न विचारधाराओं ने देश में भिन्न प्रकार के रहन-सहन, खान-पान, रीति रिवाज, आचार विचार आदि को जन्म दिया है | जिस प्रकार नदियों में प्रवाहित होने वाला जल शीतल, स्वच्छ और कल्याणकारी होता है; उसी प्रकार देश में व्याप्त इन विचारधाराओं में प्रेम, अहिंसा तथा लोक कल्याणरूपी जल प्रवाहित होता रहता है | यह जल अपने निकलने के स्थान (उद्गम) पर भी एक समान होता है और मिलन स्थल पर भी एक ही होता है ठीक इसी प्रकार हमारी सभ्यता और संस्कृति में जो भिन्नताएँ दिखाई देती हैं, वे सब बाहरी वस्तु हैं, आंतरिक रूप में हम सब में एक ही भाव बहता है ऊपर से दिखाई देने वाली ये भिन्नताएँ अंत में और आरंभ में एक ही हैं हाँ, अगर भिन्नता है तो वह केवल बाहरी प्रभाव में ही है |

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प्रश्न और उत्तर
1- इस गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर- पाठ का नाम- भारतीय संस्कृति लेखक- डॉ. राजेंद्र प्रसाद
2- भारतीय संस्कृति का नाम किसे दे सकते हैं ?
उत्तर- भारत की अनेकता में जो एकता की भावना विद्यमान है, उसे भारतीय संस्कृति का नाम दे सकते हैं
3-गद्यांश में भारत की किन विशेषताओं के बारे में बताया गया है ?
उत्तर- गद्यांश में भारत की भाषा, जाति, धर्म आदि में व्याप्त विभिन्नताओं की विशेषताओं के बारे में बताया गया है |
4- भारत की अनेकता में एकता को किस उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया गया है ?
उत्तर- भारत की अनेकता में एकता को विभिन्न रंगों की सुंदर मणियों अथवा फूलों को रेशमी धागे में पिरोकर बनाए गए सुंदर हार के उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया गया है |
4- आज हम इसी …………………………………………………………………………. दौरे जमाँ हमारा ।
सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने भारतीय संस्कृति को एक सागर के समान बताया है जिसमें अनेक जाति, धर्म, भाषा के लोग समाहित होते हैं |
व्याख्या- भारतीय संस्कृति रूपी विशाल सागर में आकर गिरने वाली जाति, धर्म, भाषारूपी आदि नदियों में एक ही भाव से शुद्ध, स्वच्छ, शीतल तथा स्वास्थ्यप्रद भारतीयता रूपी एकता का जल अमृत के समान प्रवाहित होता रहा है | आज यह जल राजनैतिक स्वार्थ, सांप्रदायिकता, आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता आदि के द्वारा मलीन हो गया है | हमें आज सदियों पहले प्रवाहित उसी अमृत तत्व की तलाश है, जिस अमृतरूपी जल में एक ही उदात्त भाव का समावेश रहा है, जो भारतीय संस्कृति को अमरता और स्थिरता प्रदान करता है | हमारी हार्दिक इच्छा है कि विभिन्न विचारधाराओं के रूप में इन नदियों में यह अमृतरूपी जल सदैव प्रवहित बना रहे, जिससे सभी लोगों में प्रेम और राष्ट्रीयता की भावना का संचार हो इस भावना का विशाल रूप ही सनातम धर्म है और यही भारतीय संस्कृति की उदात्त परंपरा है यद्यपि इस देश ने तरह-तरह के संकट झेले हैं, फिर भी भारतीय संस्कृति की भिन्नता में एकता एक ऐसा तत्व है, जो आज तक मिटाया नहीं जा सका है न जाने इस देश पर बाहरी लोगो द्वारा कितनी वार आक्रमण किया गया और आक्रमणकारियों की धर्मान्धता का शिकार हुआ परन्तु यहाँ पर एक एसा तत्व विद्यमान है जिसके कारन भारतीय संस्कृत का अस्तित्व आज तक विद्यमान है |वस्तुत: यह तत्व ही भारतीय संस्कृति का अमृत-तत्व है हमारी यही कामना है कि भारतीय संस्कृति को इस अमृत-तत्व की शक्ति सदैव प्राप्त होती रहे | इस शक्ति के द्वारा ही भारतीय संस्कृति भविष्य में स्थायी बनी रहेगी |

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प्रश्नोत्तर
1- इस गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए ।
उत्तर- पाठ का नाम भारतीय संस्कृति लेखक- डॉ. राजेंद्र प्रसाद
2- इकबाल ने क्या कहा है ? अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर- इकबाल ने कहा है कि न जाने इस देश पर बाहरी लोगो द्वारा कितनी वार आक्रमण किया गया और आक्रमणकारियों की धर्मान्धता का शिकार हुआ परन्तु यहाँ पर एक एसा तत्व विद्यमान है जिसके कारन भारतीय संस्कृत का अस्तित्व आज तक विद्यमान है |
3- इस गद्यांश में अमर-तत्व का क्या अर्थहै ?
उत्तर- इस गद्यांश में अमर-तत्व से तात्पर्य भारतीय संस्कृति की अनेकता में एकता से है
यह एक नैतिक ………………………………………………………………………………. पथ अहिंसा के हों |
सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- यहाँ पर लेखक ने हमारे देश की संस्कृति में निहित अमृत तत्व के स्रोत को नैतिक और आध्यात्मिक बताया है |
व्याख्या- डॉ. राजेंद्र प्रसाद कहते हैं कि भारत की राष्ट्रीय एकता की प्राण शक्ति इसकी नीति और इसके अध्यात्म मंा निहित है | वास्तविकता यह है कि भारतीय संस्कृति में पवित्र चरित्र तथा आत्मा संबंधी चिंतन का झरना सदा से ही अबाध गति से बहता चला आ रहा है यह झरना कभी स्पष्ट दिखता हुआ और कभी परोक्ष रूप में बहता रहा है | हमारे सामने समय-समय पर उत्तम चरित्र वाले तथा धार्मिक एवं आध्यात्मक चेतना से संपन्न महापुरुष आते रहे हैं | यह हमारा सौभाग्य ही कहा जाएगा कि आधुनिक युग में इस चरित्र और अध्यात्म की सजीव एवं साकार मूर्ति, महात्मा गाँधी के रूप में हमारा नेतृत्व कर रही थी | नैतिक एवं आध्यात्मिक चेतना के इस मूर्त रूप को अर्थात् महात्मा गाँधी को प्रत्यक्ष रूप से हमने चलते फिरते तथा हँसते हुए रोते हुए भी देखा है | ये भारतीय संस्कृति के उसी सनातन अमृत-तत्व के प्रत्यक्ष मूर्त स्वरूप थे, जिसने इस संस्कृति को अमरता प्रदान कर रखी है | इस महान विभूति ने भारत को उसकी अमरता का फिर से स्मरण कराया । परिणाम यह हुआ कि शिथिल पड़े भारत में एक बार फिर से नव प्राणों का संचार हो उठा । ऐसा लगने लगा कि हमारे शरीर की सूखी हड्डियों में नवीन मज्जा भर गई और निराशा से मुरझाए हुए हमारे मन में आशा का संचार हो गया । जिस तत्व ने भारत को नवीन जीवन और स्फूर्ति प्रदान की, वह तत्व है “सत्य और अहिंसा” । यह अमर तत्व मिटाने से मिटता नहीं है | समस्त मानव जाति को इसकी आवश्यकता अनुभव हो रही है; क्योंकि सभी यह बात अच्छी प्रकार समझ गए हैं कि इस अमर तत्व से ही मानवता की रक्षा हो सकती है लेखक कहते हैं कि अब भारत में प्रजातंत्र चल रहा है अर्थात यहाँ पर जनता का ही शासन है जिसमें व्यक्ति को पूर्ण स्वतंत्रता मिलती है, जिससे वह अपना सर्वागीण विकास करके सामूहिक व सामाजिक एकता को बढ़ाने का प्रयास करता है | कभी-कभी व्यक्ति व समाज के बीच बिरोधाभास भी हो सकता है प्रत्येक व्यक्ति अपनी उन्नति और विकास का प्रयास करता है, यदि एक व्यक्ति के विकास के परिणामस्वरूप दूसरे व्यक्ति के विकास में अवरोध उत्पन्न होता है तो संघर्ष उत्पन्न हो जाता है, इसलिए यह हमारा नैतिक कर्तव्य है कि हम अपने कार्य को इस प्रकार संपन्न करें, जिससे किसी दूसरे की उन्नति में बाधा न उत्पन्न हो | इस संघर्ष को टालने का एकमात्र उपाय अहिंसा या त्याग की भावना का अनुसरण करना है |

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प्रश्नोत्तर
1- इस गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर- पाठ का नाम- भारतीय संस्कृति; लेखक— डॉ. राजेंद्र प्रसाद
2- नैतिक और आध्यात्मिक स्रोत को स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर- नैतिक और आध्यात्मिक स्रोत राष्ट्रीय एकता की भावना ही है
3- संघर्ष कब पैदा होता है और यह कैसे दूर हो सकता है ?
उत्तर- एक दूसरे के स्वार्थ आपस में टकराने पर संघर्ष पैदा होता है, इसे दूर करने के लिए अहिंसा या त्याग की भावना का अनुसरण करना होगा।
4- देश में किस प्रकार के प्रजातंत्र की स्थापना हो चुकी है ?
उत्तर- देश में प्रजातंत्र की स्थापना हो चुकी है, जिसमें व्यक्ति को पूर्ण स्वतंत्रता दी गई है जिससे वह अपना विकास कर सके और सामूहिक व सामाजिक एकता को भी बढ़ा सके ।
6- हमारी सारी …………………………………………………………………………………‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:।
सन्दर्भ- पहले की तरह |
प्रसंग- लेखक ने अहिंसा को भारतीय संस्कृति का मूल आधार बताया है और कहा है कि अहिंसा का ही दूसरा नाम या दूसरा रूप त्याग है |
व्याख्या- डॉ राजेंद्र प्रसाद जी कहते हैं कि हमारी भारतीय संस्कृति का मुख्य आधार अहिंसा रूपी तत्व ही है इसलिए हमारे ग्रंथों में जहाँ कहीं भी नैतिक सिद्धांतों की बात कही गई है, वहाँ मन, वचन और कर्म से हिंसा न करने का उल्लेख अवश्य किया गया है | लेखक ने अहिंसा को त्याग का नाम दिया है त्याग करना ही अहिंसा है और दूसरे रूप में अहिंसा ही त्याग है अहिंसा और त्याग दोनों में कोई अंतर नहीं है ठीक इसी तरह हिंसा का दूसरा नाम अथवा दूसरा रूप ही स्वार्थ है हिंसा ही स्वार्थ है और स्वार्थ का पयार्य हिंसा है दोनों में उतना ही गहरा संबंध है, जितना अहिंसा और त्याग में एक मानव दूसरे मानव को स्वार्थ के वशीभूत होकर ही हानि पहुंचाता है | अत: स्वार्थ का दूसरा नाम हिंसा है और हिंसा अथवा स्वार्थ का अर्थ है भोग । भारतीय दर्शन के अनुसार भोग की उत्पत्ति त्याग से हुई है और त्याग भी भोग में ही पाया जाता है | उपननिषद् में कहा गया है कि संसार का भोग, त्याग की भावना से करो यहाँ त्याग में ही भोग माना गया है |
प्रश्नोत्तर—Up Board Class 10 hindi solution chapter 3 भारतीय संस्कृति डॉ राजेंद्र प्रसाद
1- इस गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम बताइए ।
उत्तर- पाठ का नाम- भारतीय संस्कृति लेखक- डॉ. राजेंद्र प्रसाद
2- हिंसा का दूसरा रूप क्या है ?
उत्तर- स्वार्थ हिंसा का ही दूसरा रूप है |
3- भारतीय संस्कृति का मूलाधार बताइए ।
उत्तर- भारतीय संस्कृति का मूलाधार अहिंसा है
4- अहिंसा का दूसरा नाम बताइए ।
उत्तर- त्याग अहिंसा का दूसरा नाम है |
5- ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर- ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा: से तात्पर्य यह है कि त्याग की भावना से ही भोग करना चाहिए क्योंकि त्याग की भावना से ही सभी आपसी संघर्ष समाप्त हो जाते हैं |


7- वैज्ञानिक और औद्योगिक ………………………………………………………. अधिक व्यापक है |
सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने बताया है कि किस प्रकार प्रकृतिजन्य व मानवजन्य आपदाओं के पड़ने पर भी हम लोगों की सृजनात्मक शक्ति बनी रही |
व्याख्या- लेखक कहता है कि वैज्ञानिक और औद्योगिक विकास के दुष्परिणामों से अपने आप को सुरक्षित रखकर हमें उनका उपयोग किस प्रकार करना है | इस विषय पर हमें अधिक ध्यान देना पड़ेगा । लेखक आगे दो महत्वपूर्ण बातों के विषय में चिंतन करते हुए उनमें से एक के विषय में बताता है कि हमारे ऊपर प्राकृतिक व मानवकृत ढेरों आपदाएँ आईं; परंतु हमारी सृजनात्मक शक्ति पर इसका कोई अधिक प्रभाव नहीं पड़ा । हमारे देश में अनेक शासकों का राज्य रहा और उनका पतन भी हुआ। भिन्न संप्रदाय बनते व मिटते रहे | विदेशियों ने आक्रमण करके हमें बुरी तरह रौंदा, प्रकृति ने भी हम पर कई मुसीबतें गिराई । परंतु फिर भी हमारी संस्कृति नष्ट नहीं हुई और हमारी सृजनात्मक शक्ति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा । हमारे बुरे दिनों में भी हमारे देश में बहुत से महान विद्वान व कर्मयोगी पैदा हुए | जब हम गुलाम थे, हमारे देश में गाँधी जैसे कर्मनिष्ठ व धर्मात्मा क्रांतिकारी पैदा हुए, उन्हीं दिनों रवींद्रनाथ टैगोर जैसे महान कवि का जन्म हुआ, जिन्होंने अपनी ओजपूर्ण कविताओं से स्वतंत्रता प्रेमियों में उत्साह का संचार कर दिया । महर्ष अरविंद तथा रमण जैसे महान योगियों का भी जन्म हुआ, जिन्होंने जन मानस में भारतीय संस्कृति का जमकर प्रचार प्रसार किया । उसी समय अनेक महान विद्वानों व वैज्ञानिकों का भी जन्म भी हुआ, जिन्हें संसार आज भी सम्मान की द्रष्टि से देखता है | लेखक आगे कहता है कि जिन हालात में संसार की बहुत सारी सभ्यताएँ नष्ट हो गईं, उन्हीं हालात में भारतीय संस्कृति न केवल टिकी रही अपितु उसने आध्यात्मिक व बौद्धिक विकास भी किया । इसका मुख्य कारण हमारी सामूहिक चेतना व नैतिकता थी, जो पर्वतों से भी अधिक शक्तिशाली, सागर से भी अधिक गहरी व आकाश से भी अधिक ऊंची व विशाल थी | सारांश रूप में हमारी संस्कृति, संसार की अन्य संस्कृतियों से अधिक श्रेष्ठ है |

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प्रश्नोत्तर
1- इस गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए ।
उत्तर- पाठ का नाम – भारतीय संस्कृति लेखक- डॉ. राजेंद्र प्रसाद
2- वैज्ञानिक और औद्योगिक विकास के परिणामों को लेखक ने उद्दंड क्यों कहा है ?
उत्तर – वैज्ञानिक और औद्योगिक विकास के परिणामों को उद्दंड कहने से लेखक का अभिप्राय है कि इनके विकास से
मनुष्य को लाभ होने के साथ साथ हानि भी होती है, जिसके भयंकर परिणाम होते हैं
3- गद्यांश में किन बुरे दिनोंके विषय में बताया गया है ?
उत्तर- लेखक गद्यांश में उन बुरे दिनों के विषय में बता रहा है जब हम विदेशियों से आक्रांत और पददलित हुए । प्रकृति और मानव दोनों ने हम पर मुसीबतों के पहाड़ ढहाए ।
4- हम अभी तक किन किन हालातों में जीत रहे हैं ?
उत्तर- हम अभी तक उन हालातों में जीत रहे हैं, जिन हालातों के कारण संसार की प्रसिद्ध जातियाँ नष्ट हो गई हैं |

संस्कृति अथवा सामूहिक ………………………………………………………………. उनकी सफलता थी |
सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- लेखक ने भारतीय लोगों में भिन्नता के बाद भी भारत में व्याप्त एकता को ही भारतीय संस्कृति बताया है |
व्याख्या- किसी समूह की एक जैसी सोच अथवा विचारधारा ही असली रूप में संस्कृति कहलाती है | हमारे देश की संस्कृति की यही विशेषता है कि उसमें विविधता होते हुए भी किसी एक विंदु पर जाकर समानता अवश्य दिखाई देती है | यही समानता अथवा एकता ही हमारे देश की जीवंतता का मूल तत्व अर्थात् प्राण है | हमारे मन-दिमाग में बसी एकता की यही नैतिक भावना हमें असंख्य नगर, ग्राम, प्रदेश, संप्रदाय, जाति और वर्ग आदि में बँटा होने के बाद भी आपस में एक दूसरे से जोड़े हुए है | और उसी जुड़ाव के कारण हम सब स्वयं को एक ही जाति भारतीयता का अंग मानते हैं एक जाति और एक भारतमाता की संतान होने के कारण हम सब आपस में भाई-भाई हैं | एकता का ऐसा उदाहरण संसार में अन्यत्र कहीं नहीं दिखाई देता । भिन्न जाति, धर्म और प्रदेश में बँटा होने के कारण हमारी वेशभूषा, खानपान, रहन-सहन और भाषा में भिन्नता दिखती ही है, परन्तु फिर भी भारतीयता की भावना हमें एक बनाती है | हमारे भीतर एक-दूसरे से लगाव और अपनत्व की इस भावना का अत्यधिक महत्व है | इसके महत्व को महात्मा गाँधी ने भली-भाँति पहचाना और इसका राष्ट्र तथा जनहित में उपयोग भी किया । महात्मा गाँधी ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए जिस क्रांति का आह्वान किया, उसका मूलाधार जनसाधारण की भावनात्मक एकता ही थी | महात्मा गाँधी ने भावनात्मक एकता के सूत्र में बँधे जनसाधारण का नेतृत्व करने के लिए बुद्धिजीवियों को तैयार किया, जिन्होंने भारतीयता के नाम पर जनसाधारण को एक हो जाने के लिए प्रेरित किया । जब जनसाधारण ने एक स्वर से स्वतंत्रता की माँग की तो विदेशी शासकों ने उसे कुचलने का प्रयास किया, जिसके प्रतिरोध के कारण क्रांति का बिगुल बज उठा और अंतत: हम स्वतंत्र हो गए। बापू के अहिंसा, सेवा और त्याग के उपदेशों से भारतीय जनता इसलिए आंदोलित हुई क्योंकि उनका जीवन सैकड़ों वर्षों से इन्हीं आदर्शो से प्रेरित रहा था और बापू ने उनके आदर्शो को ही जाग्रत किया। सामान्य जनता के मन में धड़कती हुई इस चेतना को जाग्रत करके क्रांति का हथियार बनाने में बापू ने दूरदशिता का कार्य किया। जिसके कारण वे सफल हो सके।
प्रश्नोत्तर
1- इस गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उत्तर- पाठ का नाम – भारतीय संस्कृति लेखक- डॉ. राजेंद्र प्रसाद
2- हमारे भिन्न वर्ग और जातियाँ आपस में किस प्रकार बँधी हुई हैं ?
उत्तर- हमारे भिन्न वर्ग और जातियाँ सामूहिक एकता की नैतिक चेतना से बँधी हुई हैं |
3- बापू की सफलता का राज क्या था?
उत्तर- बापू ने भारतीयों के आदर्शो मूल्यों त्याग, अहिंसा, सेवा को जाग्रत किया, जो भारतीयों में सैकड़ों वर्षों से विद्यमान थे | इन्हीं के बल पर बापू अपने प्रयासों में सफल हो सके ।
(घ) वस्तुनिष्ठ प्रश्न
१. डॉ. राजेद्र प्रसाद का जन्म किस राज्य में हुआ था?
1-उत्तर प्रदेश 2-राजस्थान 3-बिहार 4-गुजरात
2- डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने वकालत का कार्यकब छोड़ा?
1-सन् 1850 में 2-सन् 1902 में 3-सन् 1920 में 4-सन् 1907 में
3- डॉ. राजेंद्र प्रसाद को ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ से किस रचना के लिए सम्मानित किया गया ?
1-मेरी आत्मकथा 2-भारतीय संस्कृति 3-मेरी यूरोप यात्रा 4-जड़ और चेतन
4- निम्न में से डॉ. राजेद्र प्रसाद की कृति कौन-सी नहीं है ?
1-मेरी यूरोप यात्रा 2-भारतीय संबिधान 3-शिक्षा और संस्कृति 4-गाँधी जी की देन
(ङ) व्याकरण एवं रचनाबोध
1- निम्न लिखित शब्दों में से उपसर्ग अलग करके लिखो |
शब्द उपसर्गशब्द शेष
अपरिचित अ परिचित
अत्याचार अति आचार
उपार्जन उप अर्जन
प्रत्येक प्रति एक
2- निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द लिखिए-
शब्द विलोम
विदेशी स्वदेशी
आसान कठिन
अपरिचित परिचित
निर्मल मलिन
अनिवार्य एच्छिक

निम्नलिखित शब्दों के तीन-तीन पर्यायवाची शब्द लिखिए—
पहाड़ – शैल, गिरि, पर्वत ।
प्रचलित – प्रसिद्ध, लोकप्रीय, चलनसार ।
जल – नीर, पानी, तोय ।
आनंद – हर्ष, मोद, प्रसन्नता।
अनिवार्य- आवश्यक, जरूरी, अटल।

‘हट’ तथा ‘वट’ प्रत्ययों का प्रयोग करते हुए दो-दो शब्द बनाइए ।
उत्तर-
हट – मुस्कुराहट, घबराहट ।
वट – बनावट, सजावट ।

Up Board Class 10 hindi solution chapter 3 क्या लिखूँ पाठ का सम्पूर्ण हल

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