Up board class 10 social science chapter 11प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कारण एवं परिणाम

Up board class 10 social science chapter 11प्रथम स्वतंत्रता संग्राम- कारण एवं परिणाम

 प्रथम स्वतंत्रता संग्राम- कारण एवं परिणाम

1—-भारत में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के लिए उत्तरदायी तीन कारण लिखिए।

उ०- भारत में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के लिए उत्तरदायी तीन कारण निम्नलिखित हैं(i) डलहौजी ने राज्य-हड़प नीति चलाकर भारतीय राजाओं के सतारा, नागपुर तथा झाँसी राज्यों को ब्रिटिश साम्राज्य में
मिलकार, इन्हें आंदोलित कर दिया। (ii) अंग्रेजों ने कूटनीति का सहारा लेकर भारत के कुटीर उद्योगों को नष्ट करके भारत की अर्थव्यवस्था को चौपट कर
दिया, जिससे बेरोजगार हुए कारीगर तथा व्यापारी रूष्ट हो गए। (iii) अंग्रेज भारतीयों के साथ हीनता का व्यवहार करते थे। उनकी रंग-भेद नीति से भारतीय समाज उनसे रूष्ट हो गया।

2. क्या 1857 ई० की क्रांति वास्तव में एक सैनिक क्रांति थी। स्पष्ट कीजिए।

उ०- 1857 ई० का स्वतंत्रता संग्राम भारत का प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन था। 1857 ई० की यह क्रांति केवल सैनिक क्रांति नहीं थी,
यद्यपि इसका विस्फोट सैनिक विद्रोह के रूप में हुआ था, जबकि यह शीघ्र ही जन विद्रोह के रूप में परिणित हो गया। वास्तव में भारत का यह एक गौरवमय संग्राम था, जिसमें देश के हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख और जैन लोगों ने कंधे से कंधा मिलाकर समान रूप से संघर्ष किया। सैनिक इस संघर्ष में मात्र अपने स्वार्थों के लिए लड़े, जबकि भारत के जन-गण का। लक्ष्य भारतमाता को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त करना तथा विदेशी शासन को भारत भूमि से उखाड़ फेंकना था।

3. 1857 ई० के स्वाधीनता संग्राम में रानी लक्ष्मीबाई के योगदान का उल्लेख कीजिए
उ0—जब झाँसी के राजा और रानी लक्ष्मीबाई के पति गंगाधर राव नि:स्तान स्वर्ग सिधार गए तब रानी लक्ष्मीबाई दामोदार राव नामक बालक को दत्तक पुत्र के रूप में स्वीकार करके स्वयं उसकी संरक्षिका बनकर झाँसी में शासन करने लगी। लार्ड डलहौजी ने रानी के दत्तक पुत्र को अस्वीकार करते हुए राज्य-हड़प नीति के अंतर्गत झाँसी के राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। रानी ने सिंह गर्जना कर कहा- “मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी” वह मर्दाने वेश में सेना के साथ अंग्रेजों का सामना करने के लिए मैदान में आ डटी। महारानी लक्ष्मीबाई 1858 ई० में ग्वालियर के किले के सामने अंग्रेजों से लोहा लेते समय शहीद हो गई। भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों में महारानी लक्ष्मीबाई का नाम विशेष रूप से स्मरण किया जाता है।

4. बेगम हजरत महल कौन थी? देश के स्वतंत्रता संग्राम में उसका योगदान बताइए

उ०- बेगम हजरत महल अवध के नवाब वाजिद अली शाह की पत्नी थीं। भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह किया। जब अंग्रेज अधिकारियों ने अवध राज्य को हड़पकर उसके पति को कोलकाता भेज दिया तब बेगम हजरत महल ने अवध की बागडोर को अपने हाथों में ले लिया। वीर और साहसी महिला ने लखनऊ में क्रांतिकारियों का नेतृत्व किया। उन्होंने अपने कौशल और सैन्यबल से लखनऊ से अंग्रेजों का सफाया ही कर दिया। परंतु अंग्रेज जनरल कैंपबेल की सेनाओं ने उन्हें देश छोड़ने पर विवश कर दिया।

5. 1857 ई० के स्वतंत्रता संघर्ष की असफलता के क्या कारण थे? किन्हीं तीन का उल्लेख कीजिए

उ०- 1857 ई० के स्वतंत्रता संघर्ष की असफलता के तीन कारण निम्नलिखित हैं
(i) यह क्रांति उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों तक ही प्रभावी रही। भारत के संपूर्ण क्षेत्र में प्रभावी न होने से यह असफल रही।

(ii) इस क्रांति में देश की संपूर्ण जनता ने भागीदारी नहीं की, जिससे यह क्रांति असफल हो गई।
(iii) 1857 ई० की क्रांति का कोई एक नेता नहीं था। प्रत्येक क्षेत्र में लोग स्थानीय नेताओं के नेतृत्व में लड़े। एकता तथा संगठन का अभाव रहने से यह क्रांति असफल हो गई।

6. 1857 ई० की क्रांति में किहीं दो क्रांतिकारियों के योगदान का वर्णन कीजिए

Up board class 10 social science chapter 11प्रथम स्वतंत्रता संग्राम- कारण एवं परिणाम

उ०- 1857 ई० की क्रांति में दो क्रांतिकारियों के योगदान निम्नलिखित हैं (i) मगल पांडे- वीर मंगल पांडे बैरकपुर छावनी में भारतीय सैनिक था। उसके हृदय में भारतमाता को अंग्रेजों से स्वतंत्र
कराने की लालसा थी। उन्हें भारतीय क्रांतिकारियों का अग्रदूत कहा जाता है। 6 अप्रैल, 1857 ई० को छावनी में उन्होंने चर्बी लगे कारतूस को मुँह से खोलने से मना कर दिया, अतः अंग्रेज अधिकारियों ने उन्हें हथियार डाल देने का आदेश दिया। वीर सैनिक ने उत्तेजित होकर दो अंग्रेज अधिकारियों को गोलियों से भून डाला। उन्हें बंदी बनाकर जेल में डाल दिया गया तथा उन पर मुकदमा चलाकर 8 अप्रैल, 1857 ई० को बैरकपुर छावनी में फाँसी पर लटका दिया। मंगल पांडे का यही बलिदान 1857 ई० की क्रांति का मुख्य कारण बन गया। बहादुरशाह जफर- भारत के अंतिम मुगल सम्राट को 1857 ई० में क्रांतिकारियों ने पुनः सम्राट घोषित कर क्रांति का नेतृत्व सौंप दिया। दिल्ली का लालकिला क्रांतिकारियों का केंद्र बन गया। बहादुरशाह जफर के नेतृत्व में दिल्ली को अंग्रेजों के प्रभाव से मुक्त करा लिया गया। बाद में बहादुरशाह जफर को बंदी बनाकर रंगून की जेल में डाल दिया गया, जहाँ 1862 ई० में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का यह अग्रदूत स्वर्ग सिधार गया। भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में
बहादुरशाह जफर का नाम सदैव गौरव से स्मरण किया जाता रहेगा।

7. 1857 ई० की क्रांति के तीन प्रमुख परिणाम लिखिए।

उ०- 1857 ई० की क्रांति के तीन प्रमुख परिणाम निम्नलिखित हैं—
(i) इंग्लैंड की सरकार ने भारत को कंपनी के शासन से मुक्त करके सीधे ब्रिटिश ताज के अधीन कर दिया। (ii) महारानी विक्टोरिया ने हड़प नीति तथा गोद निषेध के कानूनों को समाप्त कर दिया। (iii) भारत में औपनिवेशिक प्रादेशिक विस्तारनीति के स्थान पर आर्थिक शोषण की नीति को लागू कर दिया गया।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
1——1857 ई० के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और सैनिक कारणों की विवेचना कीजिए।

उ०- 1857 ई० के स्वतंत्रता संग्राम के कारण- भारत में जन-भावनाएँ दीर्घकाल से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध उमड़-घुमड़ रही. थीं, जो उपयुक्त परिस्थितियाँ पाकर 1857 ई० में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में विद्रोह की बूंदें बनकर बरस पड़ी। 1857 ई० के भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को जन्म देने के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे(i) राजनीतिक कारण- भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को जन्म देने में निम्नलिखित राजनीतिक कारण उत्तरदायी थे

(क) डलहौजी ने राज्य-हड़प नीति चलाकर भारतीय राजाओं के सतारा, नागपुर तथा झाँसी राज्यों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाकर, इन्हें आंदोलित कर दिया।

(ख) डलहौजी ने हैदराबाद तथा अवध के नवाब पर कुशासन का दोषारोपण करके, उन्हें अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाकर क्रांति का वातावरण बना दिया।

(ग) डलहौजी ने नाना साहब की पेंशन छीनकर, उन्हें ब्रिटिश शासन का घोर शत्रु बना दिया।

(घ) अंग्रेजी शासन अनैतिक और स्वेच्छाचारी होने के कारण राजनीतिक दृष्टि से भारतीय जनता का विश्वास खो
चुका था। अत: इससे बचने के लिए क्रांति के पथ पर चलना उनकी नियति बन गया। (ii) आर्थिक कारण- भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के लिए निम्नलिखित आर्थिक कारण उत्तरदायी थे

(क) अंग्रेजों ने कूटनीति का सहारा लेकर भारत के कुटीर उद्योगों को नष्ट करके भारत की अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया, जिससे बेरोजगार हुए कारीगर तथा व्यापारी रुष्ट हो गए। (ख) अंग्रेजों ने भारत में जमींदारी प्रथा प्रारंभ करके, किसानों के शोषण का मार्ग खोलकर, उन्हें नाराज कर दिया था।
अतः उन्होंने क्रांति करने का मन बना लिया।

(ग) अंग्रेज भारत से सस्ते मूल्य पर कच्चा माल इंग्लैंड ले जाते तथा वहाँ से तैयार माल भारत में लाकर बेचते थे। इससे भारतीय उद्योग नष्ट हो गए। अत: भारत का व्यावसायिक वर्ग अंग्रेजों के विरुद्ध उठ खड़ा हुआ।

(घ) भारत में मशीनों का प्रयोग बढ़ने से बेरोजगारों की फौज खड़ी हो गई, जो ब्रिटिश शासन को भारत से उखाड़. फेंकने के लिए कटिबद्ध हो गई। (iii) सामाजिक कारण- अंग्रेज भारतीय सामाजिक परंपराओं का विरोध ही नहीं उनमें हस्तक्षेप भी करने लगे थे। अतः

1857 ई० के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के लिए निम्नलिखित सामाजिक कारण भी उत्तरदायी बने(क) अंग्रेज भारतीयों के साथ हीनता का व्यवहार करते थे। उनकी रंग-भेद की नीति से भारतीय समाज उनसे रुष्ठ हो गया। (ख) अंग्रेज भारतीयों को ब्लैक डॉग या सुअर कहकर संबोधित करके, उनका सामाजिक अपमान करते थे, जिससे

भारतीय उनके विरुद्ध हो गए। अंग्रेज पाश्चात्य सभ्यता में रचे-बसे लोगों को उच्च राजकीय पदों पर नियुक्त करते थे, जबकि क्लर्क का पद
भारतीयों को दिया जाता था। यह पक्षपात विद्रोह का कारण बन गया। (घ) अंगेजों ने आंग्ल भाषा तथा पाश्चात्य सभ्यता के प्रचार-प्रसार पर बल देकर, भारतीय सामाजिक व्यवस्था को
नष्ट करने का प्रयास किया। जिससे जन-जन उनके विरुद्ध उठ खड़ा हुआ। (ङ) भारतीयों द्वारा गाँव-गाँव, नगर-नगर में चपातियाँ बाँटकर तथा सामाजिक जागरण कर क्रांति की अलख जगाई

गई, जिससे क्रांति का वातावरण तैयार हो गया। (iv) सैनिक कारण- भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सैनिकों ने भी बढ़-चढ़कर भागीदारी की। अतः

निम्नलिखित सैनिक कारण भी इसके लिए उत्तरदायी थे(क) अंग्रेज सेना में उच्च पदों पर अंग्रेज सैनिकों को नियुक्त करते थे। उनके इस पक्षपातपूर्ण व्यवहार से भारतीय
सैनिक रुष्ट हो रहे थे। (ख) भारतीय सैनिकों को अंग्रेज सैनिकों की अपेक्षा कम वेतन दिया जाता था। इस अनैतिक व्यवहार ने भारतीय. सैनिकों को आंदोलित कर दिया।

(ग) भारतीय सैनिकों को सेना में सबसे आगे रखा जाता था, जिससे उन्हें जान गँवानी पड़ती थी। अंग्रेजों की यह नीतिभारतीय सैनिकों को रुष्ठ बनाएँ हुए थी।

(घ) अंग्रेजों ने गाय और सुअर की चर्बी लगे कारतूस सेना के प्रयोग हेतु बनवाए, जिन्हें मुँह से खोलकर प्रयोग करना. पड़ता था। इसे हिंदू तथा मुस्लिम सैनिकों ने धर्म विरुद्ध मानकर क्रांति करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। (ङ) सैनिक छावनियों में ‘लाल कमल’ बाँटकर क्रांति करने का आह्वान किया गया था, जिससे सैनिकों ने इस क्रांति में जनसाधारण का साथ देने का मन बना लिया। (v) धार्मिक कारण- अंग्रेजों ने भारत के धार्मिक क्रिया-कलापों में भी हस्तक्षेप करना प्रारंभ कर दिया था, जिसे भारतीय जनता ने अपने धार्मिक विश्वासों का हनन मानकर निम्नलिखित कारणों से क्रांति का मंत्र फूंक दिया ।

(क) अंग्रेज मिशनरी भारतीयों को ईसाई धर्म स्वीकार कराने में जुटी थीं। ईसाई धर्म स्वीकार करने वालों को आर्थिक
मदद तथा सरकारी नौकरियाँ दी जाती थीं। इस व्यवस्था से भारतीय जनमानस भड़क उठा और उसने क्रांति करने
की ठान ली। (ख) अंग्रेज भारत में अंग्रेजी शिक्षा तथा पाश्चात्य धर्म और संस्कृति का धुंआधार प्रचार करने में जुटे थे। इसे भारतीयों
ने अपने धर्म और संस्कृति पर प्रहार मानकर अंग्रेजों के प्रति विद्रोह करने का मन बना लिया ।

(ग) डलहौजी ने धार्मिक अयोग्यता नियम पारित करके भारतीय धार्मिक नियमों को उलटकर लोगों को आंदोलन के लिए तैयार कर दिया।

(घ) अंग्रेज हिंदू और मुस्लिम धर्मों की अवहेलना ही नहीं करते थे वरन् वे दोनों को परस्पर लड़ाते भी थे। अत: दोनों धर्मों के अनुयायी इस शासन के विरुद्ध विद्रोह कर उठे।

2. 1857 ई० के स्वतंत्रता संग्राम की असफलताओं के कारणों की विवेचना कीजिए।

उ०- भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम ( 1857 की क्रांति) की असफलता के कारण- 1857 ई० में भारतवासियों ने संगठित
होकर विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंकने तथा अंग्रेजों को भारत भूमि से बाहर खदेड़ने के लिए जो गौरवशाली महासंग्राम किया, वह असफल रहा। इसकी असफलता के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे

(i) 1857 ई० की क्रांति करने के लिए 31 मई की तिथि निश्चित हुई थी; परंतु उसे 10 मई को ही मेरठ से प्रारंभ कर
दिया, जिससे इसे सफलता नहीं मिल सकी। (ii) यह क्रांति उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों तक ही प्रभावी रही। भारत के संपूर्ण क्षेत्र में प्रभावी न होने से यह असफल रही। (iii) इस क्रांति में देश की संपूर्ण जनता ने भागीदारी नहीं की, जिससे यह क्रांति असफल हो गई। (iv) 1857 ई० की क्रांति का कोई एक नेता नहीं था। प्रत्येक क्षेत्र में लोग स्थानीय नेताओं के नेतृत्व में लड़े। एकता तथा
संगठन का अभाव रहने से यह क्रांति असफल हो गई। (v) 1857 ई० की क्रांति किसी एक लक्ष्य को लेकर नहीं लड़ी गई, जिसके कारण यह असफल हो गई। (vi) इस क्रांति में नवाबों तथा देशी रियासतों के नरेशों ने अंग्रेजों के स्वामिभक्त बनकर, उनका साथ दिया और क्रांति को
असफल कर दिया। (vii) क्रांतिकारियों के पास अस्त्र-शस्त्रों तथा संसाधनों का नितांत अभाव था, जिसके कारण उन्हें तथा क्रांति को असफलता
का मुख देखना पड़ा। (viii) अंग्रेज देश के शासक थे। उनके पास सेना, अस्त्र-शस्त्र तथा संसाधन पर्याप्त मात्रा में थे। इसीलिए वे क्रांति को
असफल करने में सफल हो गए। (ix) अंग्रेजों ने क्रांति को कुचल डालने के लिए लोगों को तोप से उड़वाया, गाँवों को आग से जलाया तथा क्रांतिकारियों को
जलती हुई आग में झोंककर भय तथा आतंक फैलाकर क्रांति को असफल बना दिया। लार्ड कैनिंग ने उदारता तथा कूटनीति दिखाकर यह घोषणा कर दी कि जो हथियार डाल देगा उसे क्षमा कर दिया जाएगा। लोगों ने हथियार डालकर क्रांति को असफल बना दिया। 1857 ई० की क्रांति में भारतीय जनता में एकता और सहयोग का अभाव होने से इस महान क्रांति को असफलता का मुख देखना पड़ा। सर डब्लू रसरन के अनुसार, “यदि समस्त भारतवासी सर्वतोभाव से अंग्रेजों के विरुद्ध हो गए होते,
तो अपने साहस के रहते भी अंग्रेज पूर्णतया नष्ट कर दिए गए होते।” 3. 1857 ई० के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के परिणामों की विवेचना कीजिए। उ०- भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857 ई० की क्रांति ) के परिणाम- ग्राफिन महोदय ने लिखा है, “1857 ई० के
संघर्ष से भाग्यशाली घटना शायद भारत के इतिहास में कोई नहीं हुई।” यह एक जन आंदोलन और राष्ट्रीय संघर्ष था। यद्यपि भारत का यह प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सफलता का लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सका, फिर भी इसके बड़े दूरगामी और महत्वपूर्ण परिणाम हुए। 1857 ई० की क्रांति के परिणाम निम्नलिखित रहे(i) इंग्लैंड की सरकार ने भारत को कंपनी के शासन से मुक्त करके सीधे ब्रिटिश ताज के अधीन कर दिया। (ii) महारानी विक्टोरिया ने हड़प नीति तथा गोद निषेध के कानूनों को समाप्त कर दिया। (iii) भारत में अब औपनिवेशिक प्रादेशिक विस्तारनीति के स्थान पर आर्थिक शोषण की नीति को लागू कर दिया गया। (iv) भारतीय जनमानस में अंग्रेजों के विरुद्ध घृणा तथा द्वेष का भाव जागृत होने से राष्ट्रप्रेम की भावना बलवती हो गई। (v) भारतीय राजनेताओं का एकमात्र लक्ष्य ब्रिटिश शासन से मुक्ति पाना तथा अंग्रेजों को भारत से बाहर भगाना बन गया। (vi) 1857 ई० की क्रांति ने हिंदू-मुस्लिम विभेद की खाई को पाटकर, हिंदू-मुस्लिम एकता का नया अध्याय प्रारंभ कर दिया। (vii) ब्रिटिश शासन ने मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाकर ‘फूट डालो शासन करो’ के माध्यम से भारत के विभाजन का
रास्ता बना दिया। (viii) उनकी इस नीति ने जातिय भेदभाव को बढ़ा दिया। (ix) अंग्रेज सेना का पर्नुगठन करने पर विवश हो गए तथा सेना में भारतीय सैनिकों की संख्या कम कर दी गई। (x) इस क्रांति ने ब्रिटिश को भारी क्षति पहुँचाई और पूरा शासन डाँवाडोल हो गया। भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम ने
भारतीय गगन मंडल को अनेक शंकाओं से मुक्त करके संवैधानिक सुधारों के इस युग का सूत्रपात कर दिया। इस
आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी तथा भावी आंदोलनों के लिए पथ प्रशस्त कर दिया।

  1. प्रथम स्वतंत्रता की असफलता के कारणों पर प्रकाश डालते हुए बताइए कि किस प्रकार उसके परिणाम महत्वपूर्ण
    एवं दूरगामी थे?
  2. उ०- प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की असफलता के कारण- उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 2 के उत्तर का
    अवलोकन कीजिए।
    प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के परिणाम- उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-3 के उत्तर का अवलोकन कीजिए। 8. 1857 ई० के भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महत्व पर प्रकाश डालिए। उ०- सन् 1857 ई० का प्रथम स्वाधीनता संग्राम असफल रहा, तथापि इसके परिणाम बहुत महत्वपूर्ण और दूरगामी हुए। इसके
    फलस्वरूप भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का अंत हो गया और भारत पर ब्रिटिश संसद की सम्प्रभुता स्थापित हो गई। बोर्ड ऑफ कण्ट्रोल तथा बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर्स को भंग करके उनके स्थान पर भारत मंत्री का पद तथा उसकी काउंसिल की स्थापना कर दी गई। इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया ने सन् 1858 में एक घोषणा की, जिसमें भारतीयों को उदारवादी शासन तथा अनेक प्रकार की सुविधाएँ देने का वचन दिया। भारत में ब्रिटिश सेना के अंतर्गत अंग्रेज सैनिकों की संख्या में वृद्धि कर दी गई। इस क्रांति के फलस्वरूप अंग्रेजों और भारतीयों में कटुता उत्पन्न हो गइ।। अत: अंग्रेज शासकों ने आगे चलकर हिन्दुओं और मुसलमानों को अलग-अलग रखने के लिए ‘फूट डालो-शासन करो’ की नीति अपनाई। इस क्रांति के परिणामस्वरूप भारत में राष्ट्रीय जागरण को अत्यधिक प्रोत्साहन मिला। इस क्रांति के बाद भारत में वैधानिक शासन का विकास शुरू हो गया, जो स्वाधीनता प्राप्त करने तथा लोकतंत्र की स्थापना तक निरंतर चलता रहा। इस क्रांति के फलस्वरूप भारतीयों के मन में अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने की प्रवृत्ति बढ़ने लगी, जिसके फलस्वरूप सन् 1885 में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन का सूत्रपात हुआ, जो स्वाधीनता प्राप्त होने तक निरंतर चलता रहा।
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