Up board class 10 social science chapter 12 नवजागरण तथा राष्ट्रीयता का विकास (उदारवादी अनुदारवादी )

Up board class 10 social science chapter 12 नवजागरण तथा राष्ट्रीयता का विकास

Up board class 10 social science chapter 12
Up board class 10 social science chapter 12
पाठ - 12          नवजागरण तथा राष्ट्रीयता का विकास
                             (उदारवादी, अनुदारवादी)


लघुउत्तरीय प्रश्न

1—-उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय पुनर्जागरण से क्या अभिप्राय है?

उ०- पुनर्जागरण का अर्थ- सोए हुए व्यक्ति का जागकर चेतन हो जाना और विद्या, विज्ञान तथा धर्म के अनुरूप आचरण करना ही पुनर्जागरण कहा जाता है। पुनर्जागरण का शाब्दिक अर्थ है ‘फिर से चेतना ग्रहण करना’। दूसरे शब्दों में, “अज्ञानता, अनैतिकता और अंधविश्वासों को छोड़कर विद्या, विज्ञान एवं धर्म के नवीनतम् सुधरे स्वरूप का आचरण करना ही पुनर्जागरण है।” भारतीय संस्कृति प्राचीन और शाश्वत है। बीच-बीच में बाह्य प्रभावों और समंवय से समाज, धर्म और संस्कृति के मूल्यों में विकृतियाँ उत्पन होती रही हैं; अतः सुधार आंदोलनों की छलनी में छानकर उहें शुद्ध और निर्मल बनाना आवश्यक हो जाता है। 19वीं शताब्दी भारत में बौद्धिक चिंतन तथा समाज और धर्म-सुधार की दृष्टि से बड़ी महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह काल भारतीय समाज और धर्म में आई कुरीतियों को दूर कर नई चेतना और सुधारों के द्वारा पुनर्जागरण लाने का साधन बना। भारत के इसी सामाजिक और धार्मिक पुनरुद्धार आंदोलन को पुनर्जागरण और राष्ट्रीयता के विकास का नाम दिया गया। पुनर्जागरण ने भारत के समाज, धर्म, कला और साहित्य को गहराई तक प्रभावित किया। इससे भारत का चहुंमुखी विकास ही नहीं हुआ वरन् वहाँ नवीन चेतना और राष्ट्रभक्ति का स्वर्णिम काल प्रारंभ हुआ।

2— भारत में नवजागरण के द्वारा किस प्रकार समाज-सुधार को प्रोत्साहन मिला?

उ०- उत्तर के लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या-1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।

3——गोपाल कृष्ण गोखले और बाल गंगाधर तिलक के विचारों में क्या अंतर है?
उ०- तिलक एवं गोखले दोनों उच्चकोटि के महान देशभक्त एवं राष्ट्रीय नेता थे किंतु दोनों के विचारों में मौलिक अंतर था। डॉ० पट्टाभि सीतारमैय्या ने अपने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इतिहास में तिलक और गोखले की तुलना इस प्रकार की हैतिलक और गोखले दोनों ऊँचे दर्जे के देशभक्त थे। दोनों ने जीवन में भारी त्याग किया था, परंतु उनके स्वभाव एक-दूसरे से बहुत भिन्न थे। यदि हम उस समय की भाषा का प्रयोग करें तो कह सकते हैं कि गोखले नरम विचारों के थे और तिलक गरम विचारों के। गोखले मौजूदा संविधान को मात्र सुधारना चाहते थे लेकिन तिलक उसे नए सिरे से बनाना चाहते थे। गोखले को नौकरशाही के साथ मिलकर कार्य करना था, तिलक को उससे अनिवार्यतः संघर्ष करना था। गोखले जहाँ संभव हो, सहयोग करने तथा जहाँ जरूरी हो, विरोध करने की नीति के पक्षपाती थे। तिलक का झुकाव रूकावट तथा अडंगा डालने की नीति की ओर था। गोखले को प्रशासन तथा उनके सुधार की मुख्य चिंता थी, तिलक के लिए राष्ट्र तथा उसका निर्णय मुख्य था। गोखले का आदर्श था- प्रेम और सेवा, तिलक का आदर्श था- सेवा और कष्ट सहना। गोखले विदेशियों
को अपने पक्ष में करने का प्रयत्न करते थे, तिलक का तरीका विदेशियों को देश से हटाना था। गोखले दूसरों की सहायता पर निर्भर करते थे, तिलक अपनी सहायता स्वयं करना चाहते थे। गोखले उच्च वर्ग और शिक्षित लोगों की ओर देखते थे, तिलक सर्वसाधारण या आम जनता की ओर। गोखले का अखाड़ा था- कौंसिल भवन, तिलक का मंच था— गाँव की चौपाल। गोखले अंग्रेजी में लिखते थे, तिलक मराठी में। गोखले का उद्देश्य था- स्वशासन, जिसके लिए लोगों को अंग्रेजों द्वारा पेश की गई कसौटी पर खरा उतरकर अपने को योग्य साबित करना था, तिलक का उद्देश्य था- स्वराज्य, जो प्रत्येक भारतवासी का जन्मसिद्ध अधिकार था और जिसे वे बिना किसी बाधा की परवाह किए लेकर ही रहेंगे। गोखले अपने समय के साथ थे, जबकि तिलक अपने समय के बहुत आगे।

4- राजाराम मोहन राय के जीवन एवं कार्यों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर–राजाराम मोहन राय की गणना भारत के महान समाज सुधारकों में की जाती है। उनका जन्म 1772 ई० में बंगाल में हुआ था। उनके पिता का नाम रमाकांत और माता का नाम तारणी देवी था। राजाराम मोहन राय ने अंग्रेजी, अरबी, फारसी तथा संस्कृत भाषाओं का ज्ञान प्राप्त कर रखा था। देश की सेवा करते हुए 27 सितंबर, 1833 ई० में वे स्वर्ग सिधार गए। राजाराम मोहन राय ने समाज सेवा का कार्य करते हुए भारत में नए युग का सूत्रपात किया। वे आधुनिक भारत के जनक कहे जाते हैं। सतीप्रथा तथा बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं को समाज से समाप्त कराने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। समाज और धर्म के क्षेत्र में सुधार के लिए राजाराम मोहन राय ने 1828 ई० में कोलकाता में ब्रह्मसमाज की स्थापना की।

5. स्वामी विवेकानंद कौन थे? रामकृष्ण मिशन के दो कार्यों का वर्णन कीजिए।

उ०- स्वामी विवेकानंद भारत के प्रसिद्ध विद्वान थे। स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम नरेंद्रनाथ था। इनका जन्म 12 जनवरी, 1863 ई० में कोलकाता में हुआ था। इनके पिता का नाम विश्वनाथ दंत तथा माता का नाम भुवनेश्वरी देवी था। इनके गुरू का नाम रामकृष्ण परमहंस था। विवेकानंद ने 1897 ई० में कोलकाता में रामकृष्ण मिशन की स्थापना कर धार्मिक एवं सामाजिक सुधार आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के शिकागो नगर में आयोजित विश्वधर्म सम्मेलन में भाग लेकर संपूर्ण विश्व में भारतीय संस्कृति और हिंदू धर्म का मान बढ़ाया। रामकृष्ण मिशन के दो कार्य निम्नलिखित हैं —
(i) मानव जाति की सेवा करना (ii) देश-विदेश में भारतीय संस्कृति का प्रचार करना।

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6–नवजागरण के भारतीय समाज पर पड़ने वाले तीन प्रमुख प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उ०- नवजागरण के भारतीय समाज पर पड़ने वाले तीन प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं
(i) नवजागरण के कारण अंधविश्वास और कुरीतियों का अंत होने से भारतीय समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उदय हुआ। (ii) वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने भारतीय समाज में प्रगतिवाद और विकास की नई धारा को जन्म दिया।
(iii) नवजागरण के कारण समाज सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से प्रबुद्ध बन गया।

7–ब्रह्म समाज का संस्थापक कौन था? ब्रह्म समाज के दो कार्यों पर प्रकाश डालिए।
उ०- ब्रह्म समाज के संस्थापक राजाराम मोहनराय थे। ब्रह्म समाज के दो कार्य निम्नलिखित हैं
(i) ब्रह्म समाज ने अंधविश्वास तथा रूढ़िवाद को दूर करते हुए बाल विवाह, सती प्रथा तथा बहु विवाह पर रोक लगाई।
(ii) ब्रह्म समाज ने लाखों हिंदुओं को ईसाई बनने से बचाया।

8— भारत में नवजागरण लाने में किहीं दो शक्तियों के योगदान को स्पष्ट कीजिए।
उ०- भारत में नवजागरण लाने में दो व्यक्तियों के योगदान निम्नलिखित हैं
(i) राजाराम मोहन राम का योगदान- भारतीय समाज एवं धर्म में व्याप्त बुराईयों को दूर करने के उद्देश्य से राजाराम मोहन राय ने 1828 ई० में ब्रह्म समाज की स्थापना की। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने ही सर्वप्रथम देश में नवजागरण का कार्य प्रारंभ करके अनेक सामाजिक तथा धार्मिक सुधार के कार्य किए। सती प्रथा, बाल विवाह, बहु विवाह, जाति प्रथा एवं छुआछूत आदि सामाजिक बुराइयों का उन्होंने जोरदार विरोध किया।
(ii) स्वामी विवेकानंद का योगदान- भारत में नवजागरण लाने के लिए स्वामी विवेकानंद ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
समाज के उत्थान और धर्म सुधार को ध्यान में रखकर स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। विवेकानंद ने देशभर में शिक्षा और ज्ञान का प्रकाश फैलाने के लिए रामकृष्ण मिशन के माध्यम से शिक्षण संस्थाएँ
स्थापित की। इनका भारतीय संस्कृति सभ्यता ओर राष्ट्रीयता के विकास में अद्वितीय योगदान दिया।

9—राष्ट्रीय भावना के विकास में आर्य समाज का क्या योगदान था?
उ०- राष्ट्रीय भावना के विकास में स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज का योगदान निम्न प्रकार है
(i) दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज के माध्यम से भारत में राष्ट्रीयता की ज्योति जगाई।
(ii) स्वदेशी व स्वराज्य का प्रयोग करके लोगों में देश प्रेम और स्वतंत्रता की अलाख जगाई।
(iii) आर्य समाज ने लोगों को हिंदी भाषा के हृदय से अपनाने का संदेश दिया।
(iv) दयानंद सरस्वती ने ‘भारत, भारतवासियों के लिए है’ का उद्घोष करके जन-जन में भारत माँ के प्रति अनुराग जगाया।
(v) आर्य समाज ने आर्थिक क्षेत्र में भारत को सबल बनाने के लिए स्वदेशी पर बल दिया।

10—-मुस्लिम-सुधार आंदोलन के महत्व पर प्रकाश डालिए।

उ०- हिंदू आंदोलनों के प्रतिक्रिया स्वरूप मुस्लिम समाज के आधुनिकरण के लिए भी मुस्लिम सुधार आंदोलन प्रारंभ हुए। इन आंदोलनों ने जहाँ सामाजिक कुरीतियों और धार्मिक अंधविश्वासों को दूर करने में योगदान दिया, वहीं भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना के उत्थान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बहाबी आंदोलन, अलीगढ़ आंदोलन, अहमदिया आंदोलन, देवबंद आंदोलन आदि द्वारा मुस्लिम समाज को राष्ट्रीय स्तर पर जागरूक बनाया गया। 11. अलीगढ़ एवं अहमदिया आंदोलनों के विषय में संक्षेप में लिखिए। उ०- अलीगढ़ आंदोलन- अलीगढ़ मुस्लिम आंदोलन के प्रणेता सर सैय्यद अहमद खाँ थे। वे मुसलमानों को अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से आधुनिक बनाना चाहते थे। इस महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने 1875 ई० में अलीगढ़ में मुस्लिम एंग्लो ओरियंटल कॉलेज की स्थापना की। कॉलेज के रूप में रोपा गया शिक्षा का यह पौधा कालांतर में अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी के रूप में वृक्ष बनकर शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति का आलोक फैलाने लगा। सर सैय्यद अहमद खाँ ने अपने इस मुस्लिम-सुधार आंदोलन से मुस्लिम समाज और धर्म में व्याप्त कुरीतियों को दूर किया। अंग्रेजी शिक्षा, ज्ञान, विज्ञान एवं प्रगतिशीलता के लिए मुस्लिम समाज उनका सदैव ऋणी रहेगा, क्योंकि उन्होंने मुस्लिम समाज को रूढ़िवादिता का त्याग कर बदलते विश्व के साथ चलने की प्रेरणा दी। अहमदिया आंदोलन- अहमदिया आंदोलन के सूत्रधार मिर्जा गुलाम अहमद थे। उनके इस आंदोलन का लक्ष्य इस्लाम धर्म को सार्वभौमिक धर्म बनाना था। उनका मत था कि मुसलमानों को प्रगतिशील, औद्योगिक और तकनीकी ज्ञान से युक्त बन जाना चाहिए। मिर्जा गुलाम अहमद साहब ने इस आंदोलन का सूत्रपात 1899 ई० में करके मुसलमानों में राष्ट्रीय चेतना
जगाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

11— भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विभाजन क्यों हुआ? कोई तीन कारण स्पष्ट कीजिए।
उ०- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विभाजन के तीन कारण निम्नलिखित हैं
(i) कांग्रेस विभाजन का मुख्य कारण उसमें दो विरोधी विचारधाराओं उदारवादी एवं उग्रवादी समर्थकों का होना था। (ii) 1907 में बंगाल-विभाजन के कारण दोनों दलों में मतभेद काफी बढ़ गए थे। उग्र राष्ट्रवादी नेताओं ने अपने समर्थकों के साथ पृथक बैठक कर ब्रिटिश शासन के विरूद्ध असहयोग, बहिष्कार तथा स्वदेशी आंदोलन चलाने पर जोर दिया जबकि उदारवादी नेताओं ने इन विचारों को स्वीकार नहीं किया। (iii) 1907 ई० को सूरत अधिवेशन में मुख्य विवाद ‘अध्यक्ष’ के प्रश्न को लेकर हुआ। उग्र राष्ट्रवादी लाला लाजपत राय को
तथा उदारवादी डॉ० रासबिहारी बोस को अधिवेशन का अध्यक्ष बनाना चाहते थे। इस प्रकार दोनो दलों में मतभेदों के कारण कांग्रेस का विभाजन हुआ।

13. कांग्रेस के गरमदल और नरमदल के नेताओं की नीतियों के तीन अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर नरमदल नेता और गरमदल नेता की नीतियों में अंतर- कांग्रेस के नरम दल तथा गरम दल की नीतियों में मुख्य रूप से निम्नलिखित अंतर थे(i) उदारवादियों के अनुसार भारत में सुधार लाने के लिए ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध संवैधानिक साधन अपनाकर शांतिपूर्ण
ढंग से आंदोलन चलाया जाए, जबकि अनुदारवादी उग्र आंदोलन चलाने के पक्षधर थे। (ii) उदारवादी नेता शिष्टाचारपूर्वक अंग्रेजों की नीतियों का विरोध करना चाहते थे, जबकि अनुदारवादी नेता उग्र
जन-आंदोलनों द्वारा लक्ष्य पाना चाहते थे। (iii) उदारवादी नेता ब्रिटिश शासन को भारत के लिए वरदान मानते थे क्योंकि इससे भारतवासियों को बहुत कुछ सीखने
और जानने को मिला, जबकि अनुदारवादी विदेशी शासन को कलंक मानकर उससे छुटकारा पाना चाहते थे।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

भारत में नवजागरण से आप क्या समझते हैं? नवजागरण के कारणों पर प्रकाश डालिए।

उ०- भारत में नवजागरण- उसके लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या-1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।
भारत में नवजागरण के कारण- भारत में नवजागरण की लहर अनायास ही प्रकट नहीं हुई वरन् यह धीरे-धीरे विकसित होकर धारा बन पाई। भारत में नवजागरण लाने के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे(i) भारत में अंग्रेजी शासन ने अपने अन्याय और आर्थिक शोषण से भारत के समाज की आर्थिक स्थिति को जर्जर बना
दिया था; अतः उसके लिए सुरक्षा का कवच बनकर नवजागरण उत्पन हुआ। (ii) अंग्रेज भारतीय नवयुवकों को सेना तथा प्रशासन के उच्च पदों से वंचित रख रहे थे, अतः नवयुवक अपने अधिकार
पाने के लिए चेतन हो उठे। (iii) पाश्चात्य शिक्षा और संस्कृति ने भारतीयों को अपने अधिकारों और स्वतंत्रता के महत्व से अवगत कराकर नवचेतना से भर दिया। (iv) सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलनों ने भारत में नवजागरण लाने में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। (v) अंग्रेज सरकार ने भारत में जनकल्याण के विकास कार्यों को बढ़ावा देने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। भारत के लोग
नवजागरण के माध्यम से अंग्रेजों का विरोध करने लगे। (vi) साहित्य और समाचार-पत्रों के माध्यम से भारतीय विद्वानों और विचारकों ने नए विचारों का प्रचार करके जनसाधारण
के हृदयों में नवचेतना का संचार कर दिया। (vii) भारत में यातायात एवं संचारतंत्र का विस्तार होते ही संपर्क का क्षेत्र बढ़ जाने से नवजागरण स्वतः आ गया। (viii) इटली तथा जर्मनी के एकीकरण तथा यूरोप में हुए पुनर्जागरण ने भारत में भी नवजागरण के बीज बो दिए। 2. उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में राष्ट्रीय चेतना के विकास के विभिंन कारणों की विवेचना कीजिए। उ०- भारत में राष्ट्रीय चेतना के विकास के कारणों के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-1 में भारत में नवजागरण के कारणों का अवलोकन कीजिए।

भारतीय समाज के नवजागरण में सहायक सुधार आंदोलनों का उल्लेख कीजिए तथा उनके योगदान का वर्णन कीजिए।
उ०- भारत में सामाजिक और धार्मिक सुधार- 19 वीं शताब्दी में समाज सुधारकों एवं धार्मिक संतों ने सुधार की जो गंगा बहाई, उसमें अवगाहन करके भारत का जनमानस धंय हो गया। इन सुधार आंदोलनों ने अपने सद् प्रयासों से भारतीय समाज
और धर्म को शुद्ध बना दिया। भारत में धर्म-सुधार और धार्मिक शुद्धिकरण के क्षेत्र में निम्नलिखित कार्य हुएब्रह्म समाज- राजाराम मोहन राय ने समाज और धर्म के क्षेत्र में सुधार की मंदाकिनी प्रवाहित करने के लिए जिस संस्था की स्थापना की, उसे ब्रह्म समाज का नाम दिया गया। उन्होंने 1828 ई० में कोलकाता में ब्रह्म समाज की स्थापना की। अपने महान उद्देश्यों एवं कार्यों से यह एक राष्ट्रीय संस्था बनकर उभरी। ब्रह्म समाज का योगदान- ब्रह्म समाज ने समाज सेवा और धर्म सुधार के क्षेत्र में निम्नवत् योगदान दिया(i) ब्रह्म समाज ने समाज से भेदभाव को दूर किया। (ii) ब्रह्म समाज ने अंधविश्वास और रूढ़िवाद को दूर किया। (iii) बालविवाह, बहुविवाह तथा बाल हत्या पर रोक लगवाई। (iv) ब्रह्म समाज ने सतीप्रथा का अंत करवाकर विधवा पुनर्विवाह को प्रचलित कराया। (v) ब्रह्म समाज ने लाखों हिंदुओं को ईसाई बनने से बचाया। (vi) ब्रह्म समाज ने जातिप्रथा और अस्पृश्यता का विरोध किया। ब्रह्म समाज ने भारतीय समाज एवं धर्म-सुधार के क्षेत्र में अतुलनीय कार्य किए।
इस संस्था का भारतीय समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा। श्री पणिक्कर के शब्दों में, “ब्रह्म समाज की स्थापना से भारत में एक नई सभ्यता ने जम लिया, जिसमें पूर्वी और पश्चिमी सभ्यता का मिश्रण था।” वास्तव में राजाराम मोहन राय भारतीय नवजागरण के अग्रदूत थे। राजाराम मोहन राय को भारत का आध्यात्मिक यूरेशियन कहा जाता है। उनके विषय में कहे गए मैकमिलन के ये उद्गार उल्लेखनीय बन जाते हैं- “राजाराम मोहन राय ने धार्मिक एवं सामाजिक सुधार की जो ज्योति जलाई, उसने भारतीय जीवन के अंधकार को नष्ट कर दिया।” दयानंद सरस्वती तथा आर्य समाज का योगदान- दयानंद सरस्वती का लक्ष्य कर्मकांड तथा पाखंडों का विरोध करके वेद और वैदिक धर्म की सर्वोच्चता सिद्ध करना था, अत: दयानंद जी तथा उनकी संस्था ने समाज-सुधार तथा धर्म-सुधार के क्षेत्र में निम्नलिखित कार्यों द्वारा अपना योगदान दिया —
(i) दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज के माध्यम से भारत में राष्ट्रीयता की ज्योति जलाई।
(ii) उन्होंने सर्वप्रथम ‘स्वेदशी’ तथा ‘स्वराज्य’ शब्दों का प्रयोग करके लोगों में देश-प्रेम और स्वतंत्रता की अलख जगाई।
(iii) दयानंद सरस्वती ने लोगों को हिंदी भाषा को हृदय से अपनाने का संदेश दिया।
(iv) उन्होंने ‘भारत, भारतवासियों के लिए है’ का उद्घोष करके जन-जन में भारत माँ के प्रति अनुराग जगाया।
(v) आर्य समाज ने एक स्वस्थ और प्रगतिशील समाज की स्थापना की। (vi) आर्य समाज ने छुआछूत और जातिप्रथा का घोर विरोध किया।
(vii) आर्य समाज ने मात्र स्त्री शिक्षा पर बल ही नहीं दिया वरन् उन्हें पुरुषों के समान अधिकार भी दिलवाए।
(viii) दयानंद सरस्वती ने भारत को आर्थिक क्षेत्र में सबल बनाने के लिए ‘स्वदेशी’ पर बल दिया।
(ix) आर्य समाज ने देशभर में दयानंद एग्लो वैदिक (डी०ए०वी०) कॉलेजों की स्थापना कर विद्या और ज्ञान का प्रकाश Up board class 10 social science chapter 12 नवजागरण तथा राष्ट्रीयता का विकास (उदारवादी अनुदारवादी ) फैलाया।
(x) 1908 ई० में आर्य समाज ने दलित वर्ग के उत्थान हेतु जो आंदोलन चलाया, उससे उनके जीवन में गुणात्मक सुधार आया।
(xi) आर्य समाज ने शुद्धि आंदोलन चलाकर हिंदू धर्म को छोड़कर दूसरे धर्मों में चले गए लोगों को पुन: हिंदू बनाया।
(xii) 1900 ई० में स्वामी श्रद्धानंद ने हरिद्वार में गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना कर संस्कृत भाषा तथा आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार किया। रामकृष्ण मिशन- स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरुदेव के नाम पर आधारित कोलकाता में बेल्लूर मठ में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। उन्होंने 1899 ई० में यहाँ रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय भी स्थापित किया। उनका लक्ष्य अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस का संदेश इस मिशन के द्वारा यूरोप तथा अमेरिका तक पहुँचाना था।
विवेकानंद और रामकृष्ण मिशन की समाज-सेवा तथा धर्म-सुधार के क्षेत्र में भूमिका(i) विवेकानंद ने देशभर में शिक्षा और ज्ञान का प्रकाश फैलाने के लिए रामकृष्ण मिशन के माध्यम से शिक्षण संस्थाएँ
स्थापित कराईं। (ii) विवेकानंद ने नौजवानों को अपने देश पर गर्व करने की प्रेरणा दी। (iii) विवेकानंद और रामकृष्ण मिशन ने विदेशों में भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया। (iv) रामकृष्ण मिशन संस्था के स्वयंसेवक मानवजाति की सेवा में जुटे रहे। (v) रामकृष्ण मिशन के माध्यम से स्वामी विवेकानंद ने जनता की दशा सुधारने का भरपूर प्रयास किया। (vi) स्वामी विवेकानंद ने समाज में फैली कुरीतियों को दूर किया। (vii) विवेकानंद को सृजन की प्रतिमा तथा तूफानी हिंदू कहा जाता था। (viii) विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति, सभ्यता तथा राष्ट्रीयता के विकास में अद्वितीय योगदान दिया। थियोसोफिकल सोसाइटी- थियोसोफिकल सोसाइटी की स्थापना 1875 ई० में मैडम ब्लावेट्स्की और कर्नल आल्काट ने यूयार्क नगर में की थी। 1882 ई० में इस संस्था का मुख्यालय भारत में चेनई के निकट अड्यार में स्थापित किया गया। बाद में आयरिश महिला श्रीमती एनी बेसेंट थियोसोफिकल सोसाइटी की अध्यक्षा बनी। अपनी महान सेवाओं और कार्यों द्वारा उन्होंने इस सोसाइटी के कार्यों को आगे बढ़ाया। श्रीमती एनी बेसेंट का जंम 1847 ई० में इंग्लैंड में हुआ था। 1893 ई० में वे आयरलैंड से थियोसोफिकल सोसाइटी का कार्य करने के लिए भारत आयीं। श्रीमती एनी बेसेंट भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति से बहुत प्रभावित थीं। वे विचारों, खान-पान, आचार-विचार से हिंदू ही हो गई थीं। मुस्लिम-सुधार आंदोलन- 19वीं शताब्दी में कुप्रथाओं और सामाजिक बुराइयों से मुस्लिम समाज और इस्लाम धर्म भी विकृत होने से नहीं बचा। सामाजिक कुरीतियों और धार्मिक अंधविश्वासों के कारण मुसलमान सुधारकों का ध्यान इस ओर जाना स्वाभाविक ही था। इसका परिणाम था, मुस्लिम समाज का धर्म-सुधार आंदोलन। मुस्लिम-सुधार आंदोलनों को निम्नवत् व्यक्त किया जा सकता है
(i) बहावी आंदोलन- मुस्लिम समाज और संस्कृति में बढ़ती पश्चिमी सभ्यता की दुष्प्रवृत्तियों की प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप जो मुस्लिम धर्म-सुधार आंदोलन छेड़ा गया, उसे बहावी आंदोलन का नाम दिया गया। इस आंदोलन के प्रणेता भारतीय मुस्लिम समुदाय के नेता शाह वलीउल्लाह साहब थे। इस आंदोलन के द्वारा भारतीय मुस्लिम समाज में प्रवेश कर गई कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया गया। भारत में बहावी आंदोलन के विचारों का प्रचार-प्रसार सैयद अहमद बरेलवी ने किया। इस आंदोलन का लक्ष्य मुस्लिम समाज का विस्तार करके इस्लाम धर्म में प्रविष्ट कुरीतियों को दूर करना था। इस आंदोलन द्वारा धन एकत्र कर स्वयंसेवकों द्वारा समाज-सुधार के साथ-साथ ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध भी संघर्ष किया। इस सुधार आंदोलन ने मुस्लिम समाज और इस्लाम धर्म में आए अनेक दोषों का अंत कर दिया ।
(ii) अलीगढ़ आंदोलन- अलीगढ़ मुस्लिम आंदोलन के प्रणेता सर सैय्यद अहमद खाँ थे। वे मुसलमानों को अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से आधुनिक बनाना चाहते थे। इस महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने 1875 ई० में अलीगढ़ में मुस्लिम एंग्लो ओरियंटल कॉलेज की स्थापना की। कॉलेज के रूप में रोपा गया शिक्षा का यह पौधा कालांतर में अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी के रूप में वृक्ष बनकर शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति का आलोक फैलाने लगा। सर सैय्यद अहमद खाँ ने अपने इस मुस्लिम-सुधार आंदोलन से मुस्लिम समाज और धर्म में व्याप्त कुरीतियों को दूर किया। अंग्रेजी शिक्षा, ज्ञान, विज्ञान एवं प्रगतिशीलता के लिए मुस्लिम समाज उनका सदैव ऋणी रहेगा, क्योंकि उन्होंने मुस्लिम समाज
को रूढ़िवादिता का त्याग कर बदलते विश्व के साथ चलने की प्रेरणा दी ।
(iii) अहमदिया आंदोलन- अहमदिया आंदोलन के सूत्रधार मिर्जा गुलाम अहमद थे। उनके इस आंदोलन का लक्ष्य इस्लाम धर्म को सार्वभौमिक धर्म बनाना था। उनका मत था कि मुसलमानों को प्रगतिशील, औद्योगिक और तकनीकी ज्ञान से युक्त बन जाना चाहिए। मिर्जा गुलाम अहमद साहब ने इस आंदोलन का सूत्रपात 1899 ई० में करके मुसलमानों
में राष्ट्रीय चेतना जगाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
(iv) देवबंद आंदोलन- देवबंद आंदोलन का आरंभ कुछ मुस्लिम विद्वानों ने एक पुनर्जागरण आंदोलन के रूप में किया था। इस आंदोलन के पीछे मुख्य उद्देश्य कुरान’ तथा ‘हदीस’ की शिक्षाओं को मुस्लिम समाज के जन-जन तक पहुँचाना था। Up board class 10 social science chapter 12 नवजागरण तथा राष्ट्रीयता का विकास (उदारवादी अनुदारवादी )

राजाराम मोहन राय के जीवन एवं मुख्य कार्यों का वर्णन कीजिए ।
उ०- राजाराम मोहन राय – राजाराम मोहन राय की गणना भारत के महान समाज सुधारकों में की जाती है। सुभाषचंद्र बोस के शब्दों में- “राजाराम मोहन राय धार्मिक पुनरुत्थान के अग्रदूत थे।” राजाराम मोहन राय का जम 1772 ई० में बंगाल में हुआ था। इनके पिता का नाम रमाकांत तथा माता का नाम तारणी देवी था। राजाराम मोहन राय ने अंग्रेजी, अरबी, फारसी तथा संस्कृत भाषाओं का गहन अध्ययन किया और ईस्ट इंडिया कंपनी में नौकर हो गए। देश की सेवा करते हुए राजाराम मोहन राय 27 सितंबर, 1833 ई० में स्वर्ग सिधार गए। राजाराम मोहन राय के समाज सेवा के कार्य- राजाराम मोहन राय का जम समाज सेवा करने के लिए ही हुआ था। उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर समाज सेवा के क्षेत्र में अग्रलिखित कार्य किए
(i) धर्म-सुधार के कार्य———–
(क) राजाराम मोहन राय ने हिंदू धर्म एवं संस्कृति को अंधविश्वासों और आडंबरों से मुक्त कराया।
(ख) राजाराम मोहन राय ने ईसाई मिशनरियों के प्रचार से हिंदू धर्म की रक्षा की।
(ग) उन्होंने हिंदू धर्म के सिद्धांतों की पुन: व्याख्या करके उसकी प्रतिष्ठा को बचाया।
(घ) उन्होंने हिंदू धर्म को मूर्ति पूजा, कर्मकांड तथा जातिवाद के दोषों से मुक्त किया।
(ङ) उन्होंने एकेश्वरवाद, मानवधर्म तथा बुद्धिवादी दृष्टिकोण के सिद्धांत अपनाकर धर्म का शुद्धिकरण किया ।
राजाराम मोहनराय भारतीय प्राचीन संस्कृति एवं आधुनिक प्रगतिवादी युग के मध्य सेतु थे। मिस काटेल के शब्दों में,”इतिहास में राजाराम मोहन राय का नाम उस महासेतु के समान है, जिस पर चढ़कर भारतवर्ष अपने अथाह अतीत से अज्ञात भविष्य में प्रवेश करता है।”
(ii) समाज सुधार के कार्य- ——————-राजाराम मोहन राय ने समाज सुधार के क्षेत्र में निम्नलिखित कार्य किए
(क) राजाराम मोहन राय ने बालविवाह तथा बहुविवाह प्रथा का घोर विरोध किया।
(ख) राजाराम मोहन राय ने समाज का कलंक कही जाने वाली सतीप्रथा को लार्ड विलियम बैंटिक की मदद से बंद कराया। (ग) उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन करके बाल विधवाओं को नारकीय जीवन से मुक्त कराया।
(घ) राजाराम मोहन राय ने अंग्रेजी भाषा का प्रचार-प्रसार करके भारतीय समाज को प्रगति के मार्ग पर अग्रसरकराया।
(ङ) राजाराम मोहन राय ने 1819 ई० में कोलकाता में हिंदू कालेज की स्थापना कर शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया ।
राजाराम मोहन राय के समाज सेवा के कार्यों की उपादेयता को इन शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है- “राजाराम मोहन राय ने भारत में नए युग का सूत्रपात किया, वस्तुतः वे आधुनिक भारत के जनक थे।” ब्रह्म समाज- राजाराम मोहन राय ने समाज और धर्म के क्षेत्र में सुधार की मंदाकिनी प्रवाहित करने के लिए जिस संस्था की स्थापना की, उसे ब्रह्म समाज का नाम दिया गया। उन्होंने 1828 ई० में कोलकाता में ब्रह्म समाज की स्थापना की। अपने महान उद्देश्यों एवं कार्यों से यह एक राष्ट्रीय संस्था बनकर उभरी। ब्रह्म समाज ने भारतीय समाज एवं धर्म-सुधार के क्षेत्र में अतुलनीय कार्य किए। इस संस्था का भारतीय समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा। श्री पणिक्कर के शब्दों में, “ब्रह्म समाज की स्थापना से भारत में एक नई सभ्यता ने जम लिया, जिसमें पूर्वी और पश्चिमी सभ्यता का मिश्रण था।” वास्तव में राजाराम मोहन राय भारतीय नवजागरण के अग्रदूत थे। राजाराम मोहन राय को भारत का आध्यात्मिक यूरेशियन कहा जाता है। उनके विषय में कहे गए मैकमिलन के ये उद्गार उल्लेखनीय बन जाते हैं- “राजाराम मोहन राय ने धार्मिक एवं सामाजिक सुधार की जो ज्योति जलाई, उसने भारतीय जीवन के अंधकार को नष्ट कर दिया।” |

स्वामी विवेकानंद सरस्वती का संक्षिप्त जीवन परिचय देते हुए आर्य समाज की स्थापना एवं नवजागरण में उसके योगदान का वर्णन कीजिए ।
उ०- स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज- स्वामी दयानंद सरस्वती का नाम भारत के उन महान समाज और धर्म सुधारकों में सम्मिलित है, जो पुरातन धर्म एवं संस्कृति के मूल्यों तथा नवीन और सुधारवादी मूल्यों के समंवय पर बल देते रहे हैं। दयानंद सरस्वती ने ‘वेदों की ओर लौटो’ के भाव को आगे बढ़ाकर आर्य समाज के माध्यम से सुधार, प्रगति और विकास की त्रिवेणी प्रवाहित की। स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 1824 ई० में गुजरात प्रांत के टंकारा नामक ग्राम में हुआ था। उनका बचपन का नाम मूलशंकर देसाई था। इनके पिता श्री अंबाशंकर वेदों के प्रकांड पंडित थे। दयानंद जी ने वैदिक धर्म-ग्रंथों का गहन अध्ययन किया और 1847 ई० में घर छोड़कर सत्य की खोज में निकल पड़े। 1860 ई० में वे मथुरा में स्वामी विरजानंद के संपर्क में आए और उंहें अपना गुरु मानकर तथा उनके श्रीचरणों में ध्यान लगाकर वेदों के शुद्ध अर्थ तथा वैदिक धर्म की गरिमा का ज्ञान प्राप्त किया। उनका लक्ष्य धर्म, समाज, राजनीति तथा शिक्षा के क्षेत्र में सुधार का आलोक फैलाना था। स्वामी दयानंद सरस्वती 30 अक्टूबर, 1883 ई० में परलोक सिधार गए। आर्य समाज- दयानंद सरस्वती ने वेदों की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए तथा निराकार परमात्मा का बोध करने के उद्देश्य से 10 अप्रैल, 1875 ई० में मुंबई में ‘आर्य समाज’ की स्थापना की। उन्होंने सत्य-धर्म का आलोक फैलाने के लिए ‘वेदभाष्य’, ‘ऋग्वैदिक भाष्य भूमिका’ तथा ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना की। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ आर्य समाज का पवित्र धर्मग्रंथ है। धीरे-धीरे आर्य समाज का प्रभाव पूरे भारत में व्याप्त होता चला गया। आर्य समाज के सिद्धांत
(i) ईश्वर एक है, वह सर्वगुण संपन्न और सर्वव्यापक है।
(ii) ईश्वर अजंमा, अजर और अमर है।
(iii) मूर्तिपूजा निरर्थक है, केवल ईश्वर की ही भक्ति करनी चाहिए। वेद ईश्वर के कहे वचन हैं, जो सत्य और शाश्वत हैं ।
(iv) व्यक्ति को समस्त कार्य धर्मानुसार- उचित-अनुचित तथा सत्य-असत्य का विचार करके ही करने चाहिए ।
(v) व्यक्ति को स्वयं तथा समाज के कल्याण के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए ।
(vi) सर्वसाधारण की उनति में ही व्यक्ति को अपनी उंनति खोजनी चाहिए ।
(vii) अविद्या और अज्ञान के विनाश पर बल देना चाहिए ।
(viii) ऊँच-नीच, छुआछूत तथा जात-पाँत सभी वेदों की मांयताओं के विरुद्ध हैं। इनका त्याग कर देना चाहिए ।
(ix) पारस्परिक संबंधों का आधार प्रेम, त्याग और धर्म होना चाहिए ।
(x) संपूर्ण विश्व की सामाजिक, शारीरिक तथा आध्यात्मिक उनति के प्रयास किए जाने चाहिए ।
दयानंद सरस्वती तथा आर्य समाज का नवजागरण योगदान— दयानंद सरस्वती का लक्ष्य कर्मकांड तथा पाखंडों का विरोध करके वेद और वैदिक धर्म की सर्वोच्चता सिद्ध करना था, अतः दयानंद जी तथा उनकी संस्था ने समाज-सुधार तथा धर्म-सुधार के क्षेत्र में निम्नलिखित कार्यों द्वारा अपना योगदान दिया ———-
(i) दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज के माध्यम से भारत में राष्ट्रीयता की ज्योति जलाई।
(ii) उन्होंने सर्वप्रथम ‘स्वेदशी’ तथा ‘स्वराज्य’ शब्दों का प्रयोग करके लोगों में देश-प्रेम और स्वतंत्रता की अलख जगाई। (iii) दयानंद सरस्वती ने लोगों को हिंदी भाषा को हृदय से अपनाने का संदेश दिया।
(iv) उन्होंने ‘भारत, भारतवासियों के लिए है’ का उद्घोष करके जन-जन में भारत माँ के प्रति अनुराग जगाया।
(v) आर्य समाज ने एक स्वस्थ और प्रगतिशील समाज की स्थापना की ।
(vi) आर्य समाज ने छुआछूत और जातिप्रथा का घोर विरोध किया ।
(vii) आर्य समाज ने मात्र स्त्री शिक्षा पर बल ही नहीं दिया वरन् उंहें पुरुषों के समान अधिकार भी दिलवाए।
(viii) दयानंद सरस्वती ने भारत को आर्थिक क्षेत्र में सबल बनाने के लिए ‘स्वदेशी’ पर बल दिया ।
(ix) आर्य समाज ने देशभर में दयानंद एग्लो वैदिक (डी०ए०वी०) कॉलेजों की स्थापना कर विद्या और ज्ञान का प्रकाश फैलाया।
(x) 1908 ई० में आर्य समाज ने दलित वर्ग के उत्थान हेतु जो आंदोलन चलाया, उससे उनके जीवन में गुणात्मक सुधार आया।
(xi) आर्य समाज ने शुद्धि आंदोलन चलाकर हिंदू धर्म को छोड़कर दूसरे धर्मों में चले गए लोगों को पुनः हिंदू बनाया ।
(xii) 1900 ई० में स्वामी श्रद्धानंद ने हरिद्वार में गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना कर संस्कृत भाषा तथा आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार किया ।
दयानंद सरस्वती तथा उनके द्वारा स्थापित संस्था आर्य समाज ने सोए हुए भारतीय जनमानस को जगाने के क्षेत्र में अविस्मरणीय कार्य किए। रवींद्रनाथ टैगोर ने उनकी प्रशंसा इन शब्दों में व्यक्त की है- “स्वामी दयानंद आधुनिक भारत के पथ-प्रदर्शक थे।” आर्य समाज ने भारत के पुनुरुत्थान का जो आंदोलन चलाया, उससे भारत में नवजागृति के साथ-साथ राष्ट्र-प्रेम का भी संचार हुआ। आर्य समाज के विषय में श्री आर. सी. मजूमदार के ये उद्गार उल्लेखनीय हैं- “आर्य समाज प्रारंभ से ही ऐसा संप्रदाय था, जिसका मुख्य उद्देश्य तीव्र राष्ट्रीयता थी।” दयानंद सरस्वती की महान सेवाओं को श्री अरविंद घोष ने इस प्रकार व्यक्त किया है- “दयानंद सरस्वती परमात्मा की विचित्र सृष्टि के अद्वितीय योद्धा तथा मनुष्य और मानवीय संस्थानों का सत्कार करने वाले अद्भुत शिल्पी थे।” दयानंद सरस्वती को भारतवासी उनकी महान सेवाओं के लिए युगों-युगों तक श्रद्धा से स्मरण करते रहेंगे। उनके द्वारा प्रतिपादित आर्य समाज वर्तमान में भारत का प्रमुख संप्रदाय बन गया है।

6. स्वामी विवेकानंद के जीवन, कार्य एवं समाज-सुधार में योगदान का वर्णन कीजिए।
उ०- स्वामी विवेकानंद एवं रामकृष्ण मिशन- भारतमाता अपने जिस महान सपूत पर गर्व कर सकती है, |
उसे स्वामी विवेकानंद कहा जाता है। स्वामी विवेकानंद का बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। इनका जन्म 12 जनवरी, 1863 ई० में कोलकाता में हुआ था। इनके पिताजी का नाम ‘विश्वनाथ दत्त’ एंव माताश्री का नाम ‘भूवनेश्वरी देवी’ था। नरेंद्रनाथ दत्त प्रारंभ से ही धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में रुचि रखते थे। उन्होंने बौद्ध ग्रंथ तथा अंग्रेजी और संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया। उन्होंने सत्य और ईश्वर की खोज थी। 1880 ई० में उनकी भेंट रामकृष्ण परमहंस से हुई। नरेंद्रनाथ दत्त ने उनसे प्रश्न किया- “क्या आपने ईश्वर को देखा है?” रामकृष्ण परमहंस ने उत्तर दिया, “हाँ, मैं ईश्वर को वैसे ही देखता हूँ, जैसे मैं तुम्हें देखता हूँ। तुम चाहो तो उसे देख सकते हो।” नरेंद्रनाथ उनसे बहुत प्रभावित हुए और उन्हें अपना गुरु मान लिया। रामकृष्ण परमहंस जी के निर्देशन और छत्र-छाया में यही नरेंद्रनाथ दत्त नामक नवयुवक भारत का प्रसिद्ध विद्वान स्वामी विवेकानंद बन गया। उनके आध्यात्मिक विकास और उन्नयन में स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी का अद्वितीय योगदान रहा। रामकृष्ण परमहंस के विषय में महात्मा गाँधी ने यह उद्बोधन दिया, “रामकृष्ण परमहंस के जीवन की कहानी, व्यवहारिक धर्म है, उनका जीवन हमें ईश्वर को हमारे सामने दिखाता है।” रामकृष्ण परमहंस वह पारसमणि थे, जिसके स्पर्शमात्र ने नरेंद्रनाथ दत्त को स्वामी विवेकानंद के रूप में खरे सोने में बदल दिया। स्वामी विवेकानंद ने 1893 ई० में अमेरिका के शिकागो नगर में आयोजित सर्वधर्म सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में भाग लेकर समूचे विश्व में हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति का मान बढ़ाया। उन्होंने समूचे विश्व के लिए एक ऐसी नवीन संस्कृति की अवधारणा प्रस्तुत की, जो पश्चिम के भौतिकवाद और पूर्व के आध्यात्मवाद का सफल समंवय थी। उनके महान कार्यों और सिद्धांतों से प्रभावित होकर रवींद्रनाथ टैगोर ने उनके विषय में ये उद्गार प्रस्तुत किए- “यदि कोई भारत को समझना चाहता है, तब उसे विवेकानंद को पढ़ना चाहिए।” रामकृष्ण मिशन- स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरुदेव के नाम पर आधारित कोलकाता में बेल्लूर मठ में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। उन्होंने 1899 ई० में यहाँ रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय भी स्थापित किया। उनका लक्ष्य अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस का संदेश इस मिशन के द्वारा यूरोप तथा अमेरिका तक पहुँचाना था। रामकृष्ण मिशन के सिद्धांत- समाज के उत्थान तथा धर्म-सुधार को ध्यान में रखकर विवेकानंद जी ने रामकृष्ण मिशन के लिए निम्नलिखित सिद्धांतों का प्रतिपादन किया
(i) ईश्वर अजमा और संपूर्ण संसार का निर्माणकर्ता है।
(ii) प्रत्येक व्यक्ति को आचरण तथा चरित्र की पवित्रता बनाए रखनी चाहिए।
(iii) वेद, वेदांत और उपनिषद् ही सच्चे ग्रंथ हैं।
(iv) आत्मा, परमात्मा का ही एक अंश है।
(v) भारतीय सभ्यता और संस्कृति विश्व की सभी सभ्यताओं और संस्कृतियों से श्रेष्ठ है।
(vi) समस्त धर्म अच्छे हैं, प्रत्येक प्राणी को अपने धर्म में आस्था रखनी चाहिए।
(vii) मानवमात्र की सेवा करना ही ईश्वर की सच्ची पूजा है।
(viii) व्यक्ति को सरल, पवित्र और त्यागमय जीवन जीना चाहिए।
(ix) मूर्तिपूजा ईश्वरीय उपासना का प्रमुख साधन है।

विवेकानंद और रामकृष्ण मिशन की समाज-सेवा तथा धर्म-सुधार के क्षेत्र में भूमिका
(i) विवेकानंद ने देशभर में शिक्षा और ज्ञान का प्रकाश फैलाने के लिए रामकृष्ण मिशन के माध्यम से शिक्षण संस्थाएँ स्थापित कराईं।
(ii) विवेकानंद ने नौजवानों को अपने देश पर गर्व करने की प्रेरणा दी।
(iii) विवेकानंद और रामकृष्ण मिशन ने विदेशों में भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया।
(iv) रामकृष्ण मिशन संस्था के स्वयंसेवक मानवजाति की सेवा में जुटे रहे।
(v) रामकृष्ण मिशन के माध्यम से स्वामी विवेकानंद ने जनता की दशा सुधारने का भरपूर प्रयास किया।
(vi) स्वामी विवेकानंद ने समाज में फैली कुरीतियों को दूर किया।
(vii) विवेकानंद को सृजन की प्रतिमा तथा तूफानी हिंदू कहा जाता था।
(viii) विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति, सभ्यता तथा राष्ट्रीयता के विकास में अद्वितीय योगदान दिया।
स्वामी विवेकानंद की प्रशंसा में सुभाषचंद्र बोस के ये उद्गार उल्लेखनीय हैं, “स्वामी विवेकानंद में बुद्ध का हृदय और शंकराचार्य की बुद्धि थी तथा वे आधुनिक भारत के निर्माता थे।” विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन ने
भारतवासियों में आत्म-विश्वास और आत्म-सम्मान की भावना जगाई।

  1. उन्नीसवीं शताब्दी के मुस्लिम-सुधार आंदोलनों का वर्णन कीजिए। तत्कालीन समाज पर उनका क्या प्रभाव पड़ा?
    उ०- उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-3 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
  2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना किसने और कब की थी? इसकी स्थापना के क्या उद्देश्य थे? इसका विभाजन क्यों हुआ?
    उ०- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना- भारत में उभरते राष्ट्रवाद को क्रियात्मक रूप देने के लिए एक राजनीतिक रंगमंच की आवश्यकता थी। राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और राष्ट्रीय स्तर की संस्था ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना करने का श्रेय 1885 ई० में एक अंग्रेज अधिकारी ए.ओ. ह्यूम को जाता है। इस संस्था को भारत के उदारवादी बुद्धिजीवी वर्ग का विशेष सहयोग मिला। कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन व्योमेशचंद्र बनर्जी की अध्यक्षता में बंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत विद्यालय में संपन हुआ। शीघ्र ही यह संस्था भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन तथा स्वाधीनता संघर्ष का माध्यम एवं केंद्र बन गई। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना भारतीय राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक और राष्ट्रीय जागृति की चरम सीमा के रूप में अवतरित हुई। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के उद्देश्य- ए.ओ. ह्यूम महोदय ने भारत में अंग्रेजों और भारतीयों के बीच विभेदों की बढ़ती खाई को पाटने के उद्देश्य से कांग्रेस की स्थापना की थी। 28 दिसंबर, 1885 ई० में कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष श्री व्योमेशचंद्र बनर्जी ने कांग्रेस की स्थापना के निम्नलिखित उद्देश्यों को इंगित किया था(i) साम्राज्य के विभिन्न भागों में देशहित के लिए लगन से काम करने वालों की आपस में घनिष्ठता तथा मित्रता बढ़ाना। (ii) राष्ट्रीय एकता की भावना बढ़ाना और जाति, धर्म या प्रादेशिकता के आधार पर उपजे भेदभाव को दूर करना। (iii) महत्वपूर्ण एवं आवश्यक सामाजिक प्रश्नों पर भारत के प्रशिक्षित लोगों में चर्चा करने के बाद परिपक्व समितियाँ तथा
    प्रमाणिक तथ्य स्वीकार करना। (iv) उन उपायों और दिशाओं का निर्णय करना जिनके द्वारा भारत के राजनीतिज्ञ देशहित के कार्य करें। यद्यपि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश शासन के ‘सेफ्टी वाल्व’ के रूप में हुई थी, किंतु शीघ्र ही इसकी राजभक्ति राजद्रोह में बदल गई। 1890 ई० में कांग्रेस श्री सुरेंद्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध भारतीय शासन में सुधार कराने हेतु विद्रोह की आवाज उठाने वाली संस्था बन गई। 1907 ई० के अधिवेशन में भारतीय कांग्रेस नरमदल तथा गरमदल के मतभदों के कारण दो दलों में विभाजित हो गई। 9. ब्रिटिश शासन की नीतियों का भारत के नवजागरण पर क्या प्रभाव पड़ा? किंहीं चार प्रभावों का वर्णन कीजिए। उ०- भारतीय नवजागरण पर ब्रिटिश शासन की नीतियों के प्रभाव- 200 वर्षों के शासनकाल में ब्रिटिश शासकों ने भारत के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया। इस शासन ने भारत को आंग्ल भाषा, पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के रंग में पूरी तरह रंगने का प्रयास किया। ब्रिटिश शासन ने भारतीय नवजागरण को निम्नलिखित प्रकार से प्रभावित किया(i) राजनीतिक जीवन पर प्रभाव- ब्रिटिश शासन ने भारतीय राजनीतिक जीवन को निम्नवत् प्रभावित किया
    (क) अंग्रेजी शासन ने एक शक्तिशाली केंद्रीय सत्ता का सिद्धांत दिया। (ख) अंग्रेजों ने समूचे भारत में एक शासन प्रणाली लागू की। (ग) भारत के लोगों ने अंग्रेजी प्रशासन से राजनीतिक अधिकारों का पाठ पढ़ा।
    (घ) भारत को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जैसी राजनीतिक संस्था प्राप्त हुई। (ii) सामाजिक जीवन पर प्रभाव- ब्रिटिश शासन के भारत के सामाजिक जीवन पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े
    (क) भारतीय सामाजिक संगठन की आधार वर्णव्यवस्था ढीली पड़ गई। (ख) सामाजिक विधान पारित होने से सामाजिक मूल्यों का बुरी तरह ह्रास हो गया। (ग) समाज में किसान वर्ग के साथ-साथ मध्यम वर्ग का भी उदय हो गया। (घ) भारतीय समाज की प्राचीन परंपरा संयुक्त परिवार टूटने लगे। (ङ) भारतीय समाज में ईसाई धर्म का प्रभाव बढ़ने लगा।
    (च) भारतीय समाज रूढ़िवाद का चोगा छोड़कर आधुनिकीकरण की ओर कदम बढ़ाने लगा। (iii) आर्थिक जीवन पर प्रभाव- ब्रिटिश शासन के भारत के आर्थिक जीवन पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े
    (क) ब्रिटिश शासन भारत का आर्थिक शोषण करने पर तुल गया।
    (ख) ब्रिटिश शासन ने भारतीय कुटीर उद्योगों का विनाश कर भारतीय शिल्पियों को बेरोजगार बना दिया।
    (ग) भारत में जमींदारी प्रथा प्रारंभ हो गई।
    (घ) भारत का धन इंग्लैंड जाने लगा।
    (ङ) भारत आर्थिक दृष्टि से निरंतर दुर्बल होता चला गया ।
  3. भारतीय समाज के उत्थान में श्रीमती ऐनी बेसेंट की भूमिका की विवेचना कीजिए।
    उ०- श्रीमती ऐनी बेसेंट एक आयरिश महिला थीं जो 1893 ई० में प्रमुख सुधारवादी संस्था ‘थियोसोफिकल सोसाइटी’ का कार्य करने हेतु भारत आईं थीं। उन्होंने हिंदू धर्म के मानवतावादी एवं कल्याणकारी स्वरूप को उजागर करके उसे एक श्रेष्ठ धर्म सिद्ध किया। भारतीयों में उन्होंने राष्ट्रीय भावना का संचार किया। भारतीय समाज के उत्थान में श्रीमती ऐनी बेसेंट ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका वर्णन निम्नलिखित है(i) श्रीमती एनी बेसेंट ने थियोसोफिकल सोसाइटी के माध्यम से हिंदू धर्म के विचारों का प्रचार और प्रसार किया। (ii) उन्होंने शोषण, आडंबर, कुरीतियों और भेदभाव से मुक्त समाज की स्थापना का प्रयास किया। (ii) उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। (iv) श्रीमती एनी बेसेंट ने बाल गंगाधर तिलक के सहयोग से होमरूल आंदोलन चलाया। श्रीमती एनी बेसेंट ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में बड़ा सहयोग दिया तथा 1917 ई० में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। (vi) श्रीमती एनी बेसेंट ने 1898 ई० में बनारस में सेंट्रल हिंदू कॉलेज स्थापित किया, जिसे 1916 ई० में पं० मदन मोहन मालवीय जी ने अपने प्रयासों से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का स्वरूप प्रदान किया। (vii) थियोसोफिकल सोसाइटी ने हिंदू धर्म, दर्शन और पूजा पद्धति का पुनुरुत्थान किया। (viii) श्रीमती एनी बेसेंट ने थियोसोफिकल सोसाइटी के माध्यम से भारतीयों के हृदयों में हिंदू धर्म तथा स्वदेश के प्रति स्वाभिमान जागृत किया ।

Up board class 10 social science chapter 11 प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कारण एवं परिणाम

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