Up board class 10 social science chapter 15 भारत छोड़ो आंदोलन

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भारत छोड़ो आंदोलन
लघुउत्तरीय प्रश्न
प्रश्न —-भारत छोड़ो आंदोलन कब प्रारंभ हुआ?
उत्तर —-इसके लिए उत्तरदायी दो कारण लिखिए। 1929 ई0 में कांग्रेस द्वारा पूर्ण स्वतंत्रता की प्राप्ति के लक्ष्य की घोषणा क्रिप्स मिशन के भारत से चले जाने के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने महात्मा गाँधी के नेतृत्व में 8 अगस्त, 1942 ई० को अगस्त क्रांति के रूप में भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ किया। इस आंदोलन के दो उत्तरदायी कारण निम्नलिखित हैं
(i) भारतीय जनता में ब्रिटिश शासकों के प्रति भारी रोष उत्पन्न हो गया था। अत: गाँधी जी ने अनुकूल परिस्थितियाँ देखकर भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ किया ।
(ii) द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजों ने, भारतीयों की जमीनें नष्ट कर डालीं, लोगों से रोजी-रोटी के व्यवसाय छीन लिए तथा आवश्यक वस्तुओं के मूल्य बढ़ा दिए गए, जिससे भारत की जनता आंदोलन करके उनसे छुटकारा पाना चाहती थी ।
प्रश्न —-2. भारत छोड़ो आंदोलन का भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति पर क्या प्रभाव पड़ा?
उ०- 1942 ई० का भारत छोड़ो आंदोलन भारत की स्वतंत्रता के लिए नींव का पत्थर सिद्ध हुआ। इस आंदोलन ने ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्य को ध्वस्त करके भारत की स्वतंत्रता के भवन की आधारशिला रखी, अंग्रेज शासक भारतीय जनता के रोष को पहचानकर भारतभूमि को छोड़ने के लिए तैयार हो गए। परिणाम स्वरूप आंदोलन के पाँच वर्ष बाद ही 15 अगस्त, 1947 ई० को भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हो गई।
प्रश्न —- 3. भारत छोड़ो आंदोलन पर एक टिप्पणी लिखिए।
उ०- 8 अगस्त, 1942 ई० को महात्मा गाँधी ने नेतृत्व में कांग्रेस ने बंबई अधिवेशन में भारत छोड़ो आंदोलन प्रारंभ करने का प्रस्ताव पारित किया। गाँधी जी ने देशवासियों को ‘करो या मरो’ का नारा दिया। किन्तु प्रस्ताव पास होने के अगले ही दिन गाँधी जी तथा कांग्रेस के अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारियों का समाचार पाकर भारत की जनता भड़क गई। समस्त भारत में हड़तालें, प्रदर्शन, तोड़-फोड़, सरकारी इमारतों को आग लगाना, थानों व पुलिस चौकियों पर हमले आदि की घटनाएँ हुईं। कारखाने, स्कूल व कॉलेज बंद हो गए। अनेक गाँवों तथा शहरों पर विद्रोहियों ने अस्थाई नियंत्रण कायम कर लिया। एक सप्ताह के लिए देश में काम-काज बंद रहा। रेल की लाइनें उखाड़ दी गईं। टेलीफोन के तार काट दिए गए। सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए भारी प्रयास किए। प्रदर्शनकारियों के विरूद्ध मशीनगनों का प्रयोग किया ओर हवाई जहाम से बम गिराए गए। आखिरकार सरकार आंदोलन को कुचलने में सफल हो गई। ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा आंदोलन था। यह महात्मा गाँधी का अंतिम आंदोलन था। इसका भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति पर गहरा प्रभाव पड़ा। यद्यपि अंग्रेजी सरकार ने इस विद्रोह को दबा दिया था तथापि इसने भारतवासियों में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध प्रबल भावनाएँ जाग्रत कर दीं। इस आंदोलन के बाद विश्व के अनेक देशों ने समझ लिया कि अब भारतियों को गुलाम रखना संभव नहीं। इसलिए अनेक राष्ट्रों ने भारत की स्वतंत्रता का न केवल समर्थन किया बल्कि इस संबंध में अंग्रेजों पर दबाव भी डाला। अंग्रेजी सरकार इस आंदोलन से भयभीत हो गई और उसने निकट भविष्य में भारत को स्वतंत्रता देने का निश्चय कर लिया ।
प्रश्न —- 4. भारत छोड़ो आंदोलन के तीन प्रमुख प्रभाव बताइए ।
उ०- भारत छोड़ो आंदोलन के तीन प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं
(i) भारत छोड़ो आंदोलन ने भारत की जनता में एक ऐसी अपूर्व जागृति उत्पन्न कर दी, जिसके कारण ब्रिटेन के लिए भारत
पर अधिक लम्बे समय तक शासन करना संभव नहीं रहा।
(ii) ब्रिटिश सरकार इस आंदोलन से भयभीत हो गई और उसने निकट भविष्य में भारतियों को स्वतंत्रता देने का निश्चय
कर लिया।
(iii) ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए महात्मा गाँधी और कार्य समिति के सभी सदस्यों को जले भेज दिया
और कांग्रेस संस्था को कानून के विरूद्ध घोषित कर दिया।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न —- 1. भारत छोड़ो आंदोलन पर प्रकाश डालिए तथा भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर इसके प्रभावों की विवेचना कीजिए।
उ०- भारत छोड़ो आंदोलन- असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण भारतीय जनता में विद्रोह, क्रांति और विरोध की जो घनघोर घटाएँ उमड़ीं, वे 1942 ई० में ब्रिटिश साम्राज्य को आंदोलन की बाढ़ में बहाने के लिए घनघोर वर्षा के रूप में प्रकट हो गईं। भारत छोड़ो आंदोलन क्रिप्स मिशन की उग्र प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप उदित हुआ। ब्रिटिश सरकार ने 23 मार्च, 1942 ई० को स्टीफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा। 30 मार्च को उनके प्रस्ताव सार्वजनिक कर दिए गए। देश के सभी राजनीतिक दलों ने क्रिप्स मिशन के सभी सुझावों को नकार दिया। मुस्लिम लीग उससे इसलिए नाराज थी कि प्रस्ताव में पृथक पाकिस्तान बनाने की कोई व्यवस्था नहीं थी। क्रिप्स महोदय असफल होकर स्वदेश लौट गए। क्रिप्स मिशन के भारत से चले जाने पर महात्मा गाँधी जी ने अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा बुलंद कर दिया। अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 8 अगस्त, 1942 ई० को भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित कर दिया ।
इस आंदोलन के संचालन की संपूर्ण बागडोर गाँधी जी के हाथों में सौंप दी। बंबई के प्रसिद्ध अधिवेशन में अगस्त क्रांति करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया। गाँधी जी ने एक सफल और अहिंसात्मक जन आंदोलन चलाने का नेतृत्व सँभाल लिया। महात्मा गाँधी ने कहा- “मेरे जीवन का यह अंतिम संघर्ष होगा।” उन्होंने उद्घोष किया, “करो या मरो”। विश्व के इतिहास में यही आंदोलन अगस्त क्रांति या भारत छोड़ो आंदोलन के नाम से विख्यात हुआ। उन्होंने कहा था कि या तो हम भारत को स्वतंत्र कराएँगे या इस प्रयास में मारे जाएँगे। आंदोलन के प्रारंभ में ही ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस को गैरकानूनी संस्था घोषित करके गाँधी जी सहित कांग्रेस के नेताओं को बंदी बनाकर अज्ञात स्थानों पर ले जाकर कैद कर दिया। अंग्रेजों के अन्याय और कठोर दमनचक्र के कारण भारतीय जनमानस में खलबली मचना स्वाभाविक था। अत: कहीं-कहीं आंदोलन हिंसात्मक भी हो गया। बंबई, अहमदाबाद, दिल्ली आदि नगरों से निकलती आंदोलन की लपटों ने समूचे भारत को अपनी चपेट में ले लिया। सरकारी कार्यालयों, रेलवे स्टेशनो, पुलिस चौकियों और डाकखानों को जनता ने आग के हवाले कर दिया। रेलपथों और विद्युत लाइनों को तोड़ा गया। सरकार ने लाठीचार्ज करके तथा आंदोलनकारियों पर गोलियाँ बरसाकर आंदोलन की आग को बुझाना चाहा। मुस्लिम लीग ने इस आंदोलन में सहयोग नहीं किया। नेतृत्वविहीन हो जाने के कारण यह आंदोलन असफल हो गया।
भारत छोड़ो आंदोलन का प्रभाव- ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा आंदोलन था। यह महात्मा गाँधी का अंतिम आंदोलन था। इसका भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति पर गहरा प्रभाव पड़ा। यद्यपि अंग्रेजी सरकार ने इस विद्रोह को दबा दिया था। तथापि इसने भारतवासियों में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध प्रबल भावनाएँ जाग्रत कर दीं। इस आंदोलन के बाद विश्व के अनेक देशों ने समझ लिया कि अब भारतियों को गुलाम रखना संभव नहीं। इसलिए अनेक राष्ट्रों ने भारत की स्वतंत्रता का न केवल समर्थन किया बल्कि इस संबंध में अंग्रेजों पर दबाव भी डाला। अंग्रेजी सरकार इस आंदोलन से भयभीत हो गई और उसने निकट भविष्य में भारत को स्वतंत्रता देने का निश्चय कर लिया। डॉ० कश्यप के विचारानुसार, “सन् 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन निःसन्देह सन् 1857 की असफल क्रांति के बाद भारत में अंग्रेजी राज्य की समाप्ति के लिए किया गया सबसे बड़ा प्रयास था।” वास्तव में भारतवासियों में इतनी निडरता व दृढ़ संकल्प पहले कभी नहीं देखा गया। डॉ० ईश्वरी प्रसाद के शब्दों में, ” अगस्त की क्रांति से आधुनिक भारत के इतिहास में एक नया युग प्रारंभ हुआ। यह सरकार की तानाशाही तथा अत्याचारों के विरूद्ध प्रजा का विद्रोह था और इसकी तुलना फ्रांस के इतिहास में बास्तील के पतन से या रूस की अक्टूबर क्रांति से की जा सकती है।”भारत छोड़ो आंदोलन’ के पाँच वर्ष बाद अगस्त 1947 में भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हो गई ।

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प्रश्न —-2. भारत छोड़ो आंदोलन के तीन कारण लिखिए। ब्रिटिश सरकार की इस पर क्या प्रतिक्रिया थी ? आपके मत से क्या यह असफल रहा ? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए ।
उ०- भारत छोड़ो आंदोलन के कारण————–
‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के अनेक कारण थे, जिनमें से तीन प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं
(i) क्रिप्स मिशन की असफलता- भारत के संवैधानिक गतिरोध को दूर करने के लिए तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के मार्ग की समस्याओं को सुलझाने के लिए मार्च, 1942 ई0 में सर स्टैफर्ड क्रिप्स की अध्यक्षता में क्रिप्स मिशन भारत आया। इस मिशन के प्रस्ताव व सुझाव दोषपूर्ण तथा अपर्याप्त थे।
(ii) युद्ध की भयंकरता व शरणार्थियों के प्रति कठोर व्यवहार- इधर भारत पर जापान के आक्रमण का भय लगातार बढ़ रहा था। अंग्रेजों द्वारा ऐसी स्थिति में भारतीयों को दिए जाने वाले प्रलोभन को महात्मा गाँधी ने ‘दिवालिया बैंक का उत्तर दिनांकित चैक’ कहा और प्रलोभन में न आने के लिए भारतीयों को आगाह किया। बर्मा (म्यांमार) से जो भारतीय शरणार्थी भारत आ रहे थे, वे दु:खभरी कहानियाँ सुनाते थे। बर्मा में रह रहे अंग्रेजों को बचाने के तो सतत प्रयत्न किए गए, लेकिन वहाँ रह रहे भारतीयों के साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया। बंगाल में आतंक का राज्य- पूर्वी बंगाल में भय और आतंक का साम्राज्य था। वस्तुओं के मूल्य बढ़ते जा रहे थे, मुद्रा पर से विश्वास हटता जा रहा था। गाँधी जी को भी यह विश्वास हो गया था कि अंग्रेज भारत की सुरक्षा करने में असमर्थ हैं। इसलिए गाँधी जी ने अंग्रेजों को भारत से चले जाने को कहा। ब्रिटिश सरकार प्रतिक्रिया- भारत छोड़ो आंदोलन के कारण ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया निम्नलिखित थी
(क) ब्रिटिश सरकार ने महात्मा गाँधी और कांग्रेस को कार्य समिति के सभी सदस्यों को जल भेज दिया। कांग्रेस संस्था को कानून विरोधी घोषित कर दिया और उसके कार्यालय पर पुलिस ने कब्जा कर लिया।
(ख) ब्रिटिश सरकार ने देश में अपनी सत्ता को फिर से स्थापित करने के लिए निर्दोष पुरूषों, स्त्रियों तथा बच्चों को गोलियों से उड़ा दिया ।
(ग) अनेक क्रांतिकारियों को आंदोलन से अलग रखने के लिए ‘काला पानी’ की सजा दी गई।
भारत छोड़ो आंदोलन की असफलता- भारत छोड़ो आंदोलन अन्ततः असफल रहा। इसकी असफलता के
प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं
(i) संगठित शक्ति का अभाव- ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन एक जन-आंदोलन था, जिसके लिए संगठित शक्ति की आवश्यकता थी। लेकिन जब अचानक सभी नेता गिरफ्तार कर लिए गए, तब किसी को पता नहीं था कि अब क्या करना है। आंदोलन अचानक नेतृत्वविहीन हो गया था तथा जनता की समस्त शक्तियाँ बिखर गईं। हिंसा के विचार पर दृष्टिकोण का मतभेद बना रहा। इससे सरकार के विरूद्ध संगठित मोर्चा नहीं बन सका ।
(ii) नेताओं में मत-वैभिन्यता- प्रमुख नेताओं के गिरफ्तार हो जाने पर शेष नेता यह निर्णय न ले सके कि कौन-सी
कार्यवाही हिंसात्मक है और कौन-सी अहिंसात्मक। इस मतभेद और वैचारिक विभिन्नता ने आंदोलन को शिथिल कर दिया ।
(iii) साधनों का अभाव- आंदोलनकारियों के पास साधनों का अभाव था जबकि सरकार के पास अस्त्र-शस्त्रों के साथ
सशस्त्र सेना व पुलिस बल पर्याप्त संख्या में था। इसी कारण आंदोलनकर्ता सभी कार्य छिपकर कर रहे थे ।
(iv) आंदोलन और दमन-चक्र के मध्य अत्यधिक अल्प समय- आंदोलन का दमन सरकार ने बहुत ही शीघ्र आरंभ कर
दिया। इससे आंदोलनकारियों को अपने कार्यक्रम के क्रियान्वयन हेतु पर्याप्त समय भी नहीं मिल पाया। सभी नेताओं को
गिरफ्तार कर लिया गया और दमन-चक्र द्वारा देश में आतंक फैला दिया गया ।
(v) अन्य दलों द्वारा असहयोग- ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की असफलता का प्रमुख कारण था- अन्य दलों द्वारा
असहयोग। साम्यवादी दल, मुस्लिम लीग, एंग्लो इण्डियन समुदाय व अकाली दल आदि ने इसके साथ कोई सहयोग
नहीं किया। अत: यह आंदोलन सफल न हो सका ।
(vi) सरकारी सेवाओं के प्रति निष्ठा- ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की असफलता का प्रमुख कारण था कि देश में सेना,पुलिस, देशी राजाओं तथा जमींदारों ने सरकार का साथ दिया और आंदोलन में भाग नहीं लिया।
यह आंदोलन संगठनात्मक कमजोरियों के कारण अपने निर्दिष्ट लक्ष्यों की प्राप्ति में असफल सिद्ध हुआ, परंतु इस आंदोलन ने यह अवश्य स्पष्ट कर दिया कि अब अंग्रेज भारत में अधिक समय तक नहीं रह सकते हैं । उन्हें भारत को स्वतंत्रता प्रदान करने के लिए विवश होना ही पड़ेगा ।


प्रश्न —- 3. भारत छोड़ो आंदोलन की सफलताओं एवं असफलताओं का वर्णन कीजिए।
उ०- भारत छोड़ो आंदोलन की सफलता- ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ पूर्ण रूप से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल नहीं हो सका, परन्तु फिर भी इस आंदोलन के महत्व को नकारा नहीं जा सकता है। इस आंदोलन की सफलता के परिप्रेक्ष्य में इसके महत्व को निम्न प्रकार समझा जा सकता है
(i) जन-जागृति उत्पन्न की- यद्यपि ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन अपने मूल लक्ष्य- भारत से ब्रिटिश शासन की समाप्ति को तात्कालिक रूप में प्राप्त नहीं कर सका, परंतु इस आंदोलन ने भारत की जनता में एक ऐसी अपूर्व जागृति उत्पन्न कर दी, जिसके कारण ब्रिटेन के लिए भारत पर अधिक लंबे समय तक शासन करना संभव नहीं रहा। ए०सी० बनर्जी के शब्दों में, “इस विद्रोह के परिणामस्वरूप अधिराज्य की पुरानी माँग सर्वथा समाप्त हो गई और इसका स्थान पूर्ण स्वराज्य की माँग ने ले लिया।” इस संबंध में डॉ० ईश्वरी प्रसाद का वक्तव्य उल्लेखनीय है- “अगस्त क्रांति अत्याचार और दमन के विरूद्ध भारतीय जनता का विद्रोह था और इसकी तुलना फ्रांस के इतिहास में बास्तील के पतन या सोवियत संघ की अक्टूबर क्रांति से की जा सकती है। यह क्रांति जनता में उत्पन्न नवीन उत्साह तथा गरिमा की सूचक थी।”
डॉ० अम्बाप्रसाद के शब्दों में- “इस आंदोलन ने 1947 ई० में भारतीय स्वतंत्रता के लिए पृष्ठभूमि तैयार की।”
(ii) नौसेना का विद्रोह- इसी आंदोलन के फलस्वरूप 1946 ई० में नौसेना का विद्रोह हुआ।
(iii) अंतर्राष्ट्रीय जनमत की जागृति- इस आंदोलन से विदेशों में भारत के पक्ष में जनमत प्रबल हुआ। च्यांग काइ-शेक के अनुसार- “अंग्रेजों के लिए श्रेष्ठ नीति यही है कि वे भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दे दें।” इस आंदोलन का परिणाम यह भी निकला कि अंग्रेज और मुस्लिम लीग एक-दूसरे के समीप आने लगे क्योंकि दोनों ही एक-दूसरे के सहायक ओर कांग्रेस के विरोधी थे। मुहम्मद अली जिन्ना ने दूसरे विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का साथ दिया तथा हिंदुओं से वैमनस्यपूर्ण व्यवहार रखा। पाकिस्तान बनवाने की नापाक नीयत तथा हठधर्मिता का त्याग वह कभी नहीं कर सका तथा अंग्रेजों ने भी उसे उपकृत करना चाहा। इसीलिए जब बाद में भारत की स्वतंत्रता प्रदान की गई तो उन्होंने जिन्ना का साथ दिया और उपकार के रूप में उसको पाकिस्तान भी दे दिया ।
पं० जवाहरलाल नेहरू ने आंदोलन के संदर्भ में कहा था- “सन् 1942 में जो कुछ हुआ, उसका मुझको अवश्य गर्व है। मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि उनकी निन्दा नहीं कर सकता हूँ, जिन्होंने आंदोलन में भाग लिया।” डॉ० ईश्वरी प्रसाद ने लिखा है- “इस विद्रोह की आग में औपनिवेशिक स्वराज्य की पूरी बात जल गई। भारत अब पूर्ण स्वतंत्रता से कम कुछ नहीं चाहता था। अंग्रेजों का भारत छोड़ना निश्चित हो गया। यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद को बड़ा भारी धक्का था ।”
भारत छोड़ो आंदोलन की असफलता- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-2 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।

4. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गाँधी जी के योगदान ( भूमिका) की विवेचना कीजिए।

उ०- भारत के स्वतंत्रता संग्राम में गाँधी जी का योगदान ( भूमिका)- महात्मा गाँधी भारत के राष्ट्रीय संग्राम के अगुवा ही नहीं, सेनापति भी थे। 1915 ई० से गाँधी जी के हाथों में जो राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व आया, वह 1947 ई० तक गाँधी युग की धारा बनकर बहता रहा। महात्मा गाँधी भारत के स्वतंत्रता संग्राम का वह इंजन थे, जिसके पीछे समस्त राष्ट्र जुड़ा हुआ था। साबरमती का यह संत भारत का महात्मा ही नहीं, विश्व इतिहास में युगपुरुष बनकर उभरा। उन्होंने सत्याग्रह के अमोघ अस्त्र से ब्रिटिश साम्राज्यवादी दानव का शिकार कर लिया। इसीलिए आज भी समूचा देश प्रत्येक स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रपिता के प्रति नतमस्तक हो जाता है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के नेतृत्व से लेकर भारत को स्वतंत्रता दिलवाने तक गाँधी जी का योगदान (भूमिका) निम्नवत् रहा है(i) कांग्रेस को जनसामान्य से जोड़ना- गाँधी जी के कुशल नेतृत्व ने कांग्रेस को जमींदारों, वकीलों तथा डॉक्टरों के चंगुल से निकाल, किसान, मजदूर और आम आदमी से जोड़कर स्वतंत्रता आंदोलनों में जन-जन का सहयोग प्राप्त किया।

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(ii) असहयोग आंदोलन- यह महात्मा गाँधी जी द्वारा चलाए गए आंदोलनों में प्रथम महत्वपूर्ण आंदोलन था। पंजाब में हो रहीं नृशंस घटनाओं पर रोक लगाने के उद्देश्य से गाँधी जी ने 1920 ई० में असहयोग आंदोलन किया। इस आंदोलन का उद्देश्य सरकार से किसी भी प्रकार का सहयोग न करना था। इसका आरंभ गाँधीजी ने अपनी ‘कैसर-ए-हिंद’ की उपाधि को गवर्नर जनरल को लौटाकर किया। जनता ने भी बड़ा उतसाह दिखाया। सैकड़ों व्यक्तियों ने अपनी उपाधियाँ त्याग दीं। हजारों छात्रों ने स्कूल और कॉलेज छोड़ दिए। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया तथा विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई। चुनावों, सरकारी नौकरियों, संस्थाओं तथा उत्सवों का बहिष्कार किया गया। गाँधी जी के आह्वान पर प्रिंस ऑफ वेल्स (ब्रिटेन के युवराज) के भारत-आगमन पर उनका देशभर में बहिष्कार किया गया। 5 फरवरी, 1922 ई० को चौरी चौरा गाँव में हुई हिंसात्मक घटना से दु:खी होकर गाँधी जी ने इस आंदोलन को स्थगित कर दिया। इस आंदोलन से गाँधी जी ने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा दी और स्वराज्य की लड़ाई को गाँव-गाँव तथा घर-घर तक पहुँचा दिया। इस आंदोलन के स्थगित होने पर सरकार पे राजद्रोह के आरोप में गाँधी जी को 6 वर्ष के लिए बंदी बना लिया ।
(iii) सविनय अवज्ञा आंदोलन– 1922 ई० में कांग्रेस ने लाहौर अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज्य की प्राप्ति’ को अपना लक्ष्य घोषित किया जिसकी प्राप्ति के लिए गाँधी जी के नेतृत्व में ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ चलाया गया। इस आंदोलन का प्रारंभ महात्मा गाँधी जी के डांडी नामक स्थान पर नमक बनाकर सरकार के नमक-कानून को तोड़कर किया। 1931 ई० में गाँधर-इर्विन समझौता हुआ। गाँधी जी ने आंदोलन स्थगित करके द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेना स्वीकार किया। किंतु वार्ता के विफल होने पर आंदोलन पुनः प्रारंभ कर दिया गया। यह आंदोलन 1934 ई० तक चला ।
(iv) व्यक्तिगत सत्याग्रह- अंग्रेजी सरकार ने भारतीयों को द्वितीय विश्व युद्ध में नेताओं के साथ कोई परामर्श किए बिना ही धकेल दिया था । परिणामत: 1940-41 में महात्मा गाँधी के नेतृत्व में सरकार के इस कदम का विरोध करने हेतु सतयाग्रह आंदोलन चलाया गया। भारत छोड़ो आंदोलन- 8 अगस्त, 1942 ई० को कांग्रेस पार्टी के अधिवेशन में ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पास किया गया। गाँधी जी ने देशवासियों को ‘करो या मरो’ का नारा दिया। किंतु अगले दिन 9 अगस्त की सुबह ही महात्मा गाँधी तथा महत्वपूर्ण नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इस गिरफ्तारियों की जनता में भयंकर प्रतिक्रिया हुई और समस्त भारत में प्रदर्शन, हड़तालें, तोड़फोड़, सरकारी इमारतों को आग लगाना, थानों व पुलिस चौकियों पर हमले आदि की घटनाएँ हुईं। अनेक स्थानों पर विद्रोहियों ने अस्थायी नियंत्रण कायम कर लिया। यद्यपि अंग्रेज-सरकार अंततः आंदोलन को कुचलने में सफल हो गई तथापि पाँच वर्ष बाद ही भारत को छोड़ने के लिए विवश हो गई। यह एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन था
जिसका श्रेय मुख्यतया महात्मा गाँधी को प्राप्त है ।
(vi) सत्याग्रह का अभिनव प्रयोग- गाँधी जी ने सत्य और अंहिसा को आधार बनाकर सत्याग्रह के अस्त्र का प्रयोग किया। तभी तो कवि कह उठा- “दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।” Up board class 10 social science chapter 15 भारत छोड़ो आंदोलन
(vii) हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्षधर– गाँधी जी जीवन में हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए प्रयासरत रहे। उनका सिद्धांत था- ‘ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान।’ इसीलिए भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उन्हें जनसाधारण का भरपूर सहयोग मिला ।
(viii) छुआछूत का विरोध- गाँधी जी मनुष्य-मनुष्य में भेद नहीं करते थे। जिन्हें सवर्ण अछूत कहते थे, गाँधी जी ने उन्हें हरिजन कहा। ऊँच-नीच की खाई पाटकर ही गाँधी जी भारत को स्वतंत्र कराने में सफल हो सके ।
(ix) स्वराज और स्वदेशी का समर्थन- गाँधी जी का नारा स्वराज था, जिसे स्वदेशी भावना को अपनाकर ही पूरा किया जा सकता था। उन्होंने गरीबी दूर करने के लिए चरखे और खादी का प्रचार किया। स्वराज और स्वदेशी ने ही उन्हें उनके महान लक्ष्य तक पहुँचाया। जेल यातनाएँ और अनशन- गाँधी जी ने जो भी आंदोलन चलाए या अनशन किए, उनके लिए जेलों में डालकर कठोर यातनाएँ दी गईं। उन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने के लिए उन्हें हँसते-हँसते झेला। Up board class 10 social science chapter 15 भारत छोड़ो आंदोलन
(xi) त्याग की प्रतिमूर्ति– गाँधी जी एक संत का त्यागमय जीवन व्यतीत करते थे। एक लंगोटी और एक लकुटी उनके साथ रहती थी। उन्हें न तो राजनीतिक पद से लगाव था और न सत्ता के प्रति कोई मोह। स्वतंत्रता प्राप्ति और राष्ट्रीय एकता की स्थापना का मूल्य उन्होंने गोली खाकर चुकाया। गाँधी जी के स्वतंत्रता संग्राम के योगदान के विषय में विभिन्न विचारकों ने अपने उद्गार निम्नवत् प्रस्तुत किए हैं”गाँधी जी ने राष्ट्रीय आंदोलन को जनप्रिय बनाया” “बहुत समय बाद तक लोगों में गाँधी जी के नाम की इज्जत बनी रहेगी। हिंदुस्तान की सब माताएँ युगों तक अपने बच्चों को उनका नाम सम्मान के साथ बताएँगी ।”
———————सी0एफ0 डंडूज “गाँधी जी ही केवल भारत के राष्ट्रीय आंदोलन तथा स्वतंत्रता इतिहास के ऐसे नायक हैं, जिनकी कहानियाँ युगों तक प्रसिद्ध रहेंगी।”
—————————–रोम्यारोला “30 जनवरी, 1948 को गाँधी युग का अंत हुआ। इससे एक ऐसा शून्य पैदा हुआ, जिसे भरा भी नहीं जा सकता था।”
——————————-दुर्गादास” वास्तव में गाँधी जी भारत के स्वतंत्रता संग्राम की धुरी थे। उनके जैसा जुझारू नेता आज तक दूसरा पैदा ही नहीं हुआ। उन्होंने असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा भारत छोड़ो आंदोलन चलाकर जनसहयोग से आततायी और अन्यायी
शासन के घातक पंजों से भारत को स्वतंत्र कराया। युगों-युगों तक भारत का जनमानस उनका आभारी रहेगा ।

  1. महात्मा गाँधी द्वारा चलाए गए दो महत्वपूर्ण राष्ट्रीय आंदोलनों पर प्रकाश डालिए। –
    उ०- महात्मा गाँधी द्वारा चलाए गए दो महत्वपूर्ण राष्ट्रीय आंदोलन असहयोग आंदोलन व भारत छोड़ो आंदोलन हैं। इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-4 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

Up board class 10 social science chapter 13 गाँधी विचारधारा- असहयोग आंदोलन

Up board class 10 social science chapter 14 सविनय अवज्ञा आंदोलन

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