Up board class 10 social science chapter 16 क्रांतिकारियों का योगदान

Up board class 10 social science chapter 16 क्रांतिकारियों का योगदान

UP BOARD CLASS 10 SOCIAL SCIENCE CHAPTER 6
UP BOARD CLASS 10 SOCIAL SCIENCE CHAPTER 4 FULL SOLUTION
क्रांतिकारियों का योगदान
  • लघुउत्तरीय प्रश्न *
    प्रश्न—– चंद्रशेखर आजाद के जीवन एवं आंदोलन का स्वतंत्रता संघर्ष में क्या योगदान था?
    उ०- चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 ई० में मध्यप्रदेश के बहोर नामक ग्राम में हुआ था। बचपन से ही वह बड़े साहसी और निडर थे। पढ़ाई में उनकी कोई विशेष रूचि नहीं थी। चंद्रशेखर आजाद देश की आजादी के दीवाने थे। 14 वर्ष की आयु में उन्होंने गाँधी जी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया तथा जेल गए। 1922 में जेल से छूटने के बाद आजाद क्रांतिकारी दल में शामिल हो गए। शीघ्र ही उन्होंने प्रमुख क्रांतिकारियों से अपना संबंध स्थापित किया। ज्यों-ज्यों अंग्रेजों के अत्याचार बढ़ रहे थे, त्यों-त्यों आजाद की क्रांतिकारी गतिविधियाँ तेज हो रहीं थीं। आजाद के नेतृत्व में लाला लाजपत राय के हत्यारे साण्डर्स को गोली मार कर हत्या की गई तथा 8 अप्रैल, 1929 में असेम्बली हॉल में बम फेंकने की योजना बनाई गई। आजाद कभी भी पुलिस के हाथों नहीं आए। एक दिन आजाद अपने साथी के साथ इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में विचार-विमर्श कर रहे थे, कि अचानक वहाँ पुलिस आ गई। पुलिस ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया। उन्होंने पुलिस का डटकर मुकाबला किया। परन्तु अंतिम गोली से स्वयं को उड़ाकर जीवन भर आजाद रहने का प्रण पूरा किया।

  • प्रश्न—- 2. भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में लाला लाजपत राय के योगदान का वर्णन कीजिए।
    उ०- लाला लाजपत राय- लाला लाजपत राय का जन्म पंजाब राज्य के फिरोजपुर जिले में 1865 ई० में हुआ था। उन्होंने स्नातक स्तर तक शिक्षा पाने के बाद भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभानी प्रारंभ कर दी। उन्होंने इंग्लैंड जाकर लोगों को भारतवासियों के कष्टों से परिचित करवाया। लाला लाजपत राय ने असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। 1923 ई० में वे केंद्रीय व्यवस्थापिका सभा के सदस्य चुने गए। वे एक साहसी और निर्भीक क्रांतिकारी थे, इसीलिए उन्हें ‘पंजाब केसरी’ कहा जाता था। 22 फरवरी, 1928 ई० को भारत का यह महान स्वतंत्रता सेनानी इस संसार से कूच कर गया था। 1928 ई० में साइमन कमीशन का विरोध करने पर पुलिस ने इन पर बर्बर लाठियाँ बरसाकर बुरी तरह घायल कर दिया। परिणामस्वरूप बाद में उसी से उनका स्वर्गवास हो गया। वे कांग्रेस के गरमदल के नेता थे। वे महान शिक्षाविद् समाज सुधारक और कट्टर देशभक्त थे ।
    प्रश्न—- 3. आजाद हिंद फौज के विषय में आप क्या जानते हैं ?
    उ०- आजाद हिंद फौज का पुनर्गठन सुभाष चंद्र बोस ने 23 अगस्त, 1943 ई० को सिंगापुर में किया था। वे उसके सेनापति बनकर भारत माता को सैन्यबल से स्वतंत्र कराने में जुट गए। उनका संदेश था- “तुम मुझे खून दो; मैं तुम्हें आजादी दूंगा” उनका नारा था, ‘जय हिंद’। उनका आह्वान था, “दिल्ली चलो”। सैनिक उन्हें श्रद्धा से नेताजी कहते थे। आजाद हिंद फौज ने कठोर संघर्ष करते हुए नागालैंड, कोहिमा और मणिपुर तक 150 किमी० भारत भूमि को ब्रिटिश सेना के चंगुल से मुक्त करा लिया था।
    द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की पराजय के साथ ही आजाद हिंद फौज ने भी 3 मई, 1945 ई० को आत्मसमर्पण कर दिया।
  • 4. बाल गंगाधर तिलक का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्या योगदान था?
    • उ०- “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, मैं इसे लेकर रहूँगा।” की हुँकार भरने वाले, मराठा तथा केसरी पत्रों का प्रकाशन करने वाले तथा गणपति उत्सव के माध्यम से भारतीयता का भाव जगाने वाले बाल गंगाधर तिलक का नाम भारत के स्वतंत्रता संग्राम के आकाश में सदैव ध्रुव तारा बनकर चमकता रहेगा। बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई, 1856 ई० को महाराष्ट्र के एक कट्टर हिंदू परिवार में हुआ था। तिलक कांग्रेस के गरमदल के नेता थे। उन्होंने होमरूल आंदोलन चलाया। तिलक ने स्वराज प्राप्ति के लिए निम्नलिखित साधन बताए(i) स्वदेशी भावना का प्रचार।।
      (ii) विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार। (iii) राष्ट्रीय शिक्षा का प्रचार-प्रसार।
      (iv) शांतिपूर्वक सक्रिय विरोध।
      तिलक ने अपने पत्रों में राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत प्रेरणादायक लेख लिखकर राष्ट्रीयता का विकास किया। उन्होंने सच्चे हृदय से कांग्रेस की नि:स्वार्थ भाव से सेवा की। वे स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लेते हुए कई बार जेल गए। बाल गंगाधर तिलक ने क्रांति की मशाल लेकर देश के नवयुवकों का मार्गदर्शन किया। श्रीराम गोपाल ने उनके विषय में ये उद्गार व्यक्त किए हैं”तिलक चारों ओर के अँधेरे में मशाल लेकर सामने आए।” भारत माता की तन-मन-धन से सेवा करने वाला यह महान सेनानी 1920 ई० में स्वर्ग सिधार गया।
      प्रश्न—-अब्दुल कलाम आजाद की भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति में क्या भूमिका थी?
      उ०- मौलाना अब्दुल कलाम आजाद का जन्म 1880 ई० में मक्का में हुआ था। आजाद उनका उपनाम था। इनकी गणना भारतीयस्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेताओं में की जाती है। उन्होंने अल-हिलाल नामक पत्र का प्रकाशन किया तथा ‘इंडिया विन्स फ्रीडम’ नामक पुस्तक लिखी। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में निम्नवत् भूमिका निभाई
      (i) अब्दुल कलाम आजाद ने मुस्लिम लीग की नीतियों का विरोध करके मुसलमानों को राष्ट्रीय धारा के साथ जोड़ने का
      प्रयास किया। (ii) उन्होंने अंग्रेजों की फूट डालो शासन करो की नीति का डटकर विरोध किया।
      (iii) अब्दुल कलाम मुसलमानों में बड़े लोकप्रिय थे, अत: उनके प्रयासों से ही 1916 ई० में कांग्रेस और मुस्लिम लीग में
      समझौता हुआ। (iv) असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेने के कारण उन्हें जेल भेजा गया।
      (v) 1923 ई० में वे कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए।
      (vi) सविनय अवज्ञा आंदोलन में उन्होंने बहुत योगदान दिया।
      (vii) 1947 ई० में बनी अंतरिम सरकार में वे शिक्षा मंत्री बने।
  • विस्तृत उत्तरीय प्रश्न *
    प्रश्न—-1. भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों की भूमिका की विवेचना कीजिए ।
    उ०- भारत के स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों की भूमिका- गाँधी जी के अहिंसात्मक आंदोलनों और सत्याग्रह के सिद्धांतों से साम्राज्यवादी सरकार पर कोई भी प्रभाव न पड़ता देख, माँ भारती के प्रेम में पगे स्वतंत्रता के दीवानों के मन में क्रांति की ज्वाला भड़क उठना स्वाभाविक था। स्वतंत्रता पाने के लिए अहिंसात्मक क्रांति को त्यागकर, जो नौजवान हिंसा और बल का प्रयोग करके भी, स्वतंत्रता की बलिवेदी पर बलिदान होने के लिए तत्पर थे, उन्हें क्रांतिकारी कहा गया। क्रांतिकारियों का मुख्य लक्ष्य था, भारत माता के पैरों में पड़ी गुलामी की बेड़ियाँ काटना।
    अतः उन्होंने आजादी के वृक्ष को अपने रक्त से सींचने का मन बना लिया। स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले इन राष्ट्रभक्त क्रांतिकारियों ने जनता के सामने यह सिद्धांत रखा, “परतंत्र रहने से मृत्यु का वरण करना श्रेष्ठ है।” भारत माता के ये वीर सपूत देश की एकता, अखंडता और स्वतंत्रता के लिए हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गए। फ्रांस, रूस, चीन तथा मित्र आदि देशों में जो क्रांतिकारी आंदोलन हुए, उन्होंने भारतीय क्रांतिकारियों को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ उनका पथ भी प्रशस्त किया। देश के विभिन्न क्षेत्रों में क्रांतिकारी दलों ने अपने संगठन बना लिए। भारत के क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता संग्राम में प्राणपण से भागीदारी निभाई। उन्होंने अपना तन, मन और धन सब कुछ स्वातंत्र्य बलिवेदी पर न्योछावर कर दिया। यद्यपि उनका यह प्रयास असफल रहा; परंतु उनके द्वारा बहाया गया रक्त ही 1947 ई० में स्वतंत्रता की स्वर्णिम रश्मियों के रूप में चमका। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका को निम्नवत् प्रस्तुत किया जा सकता है—
    (i) स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु क्रांतिकारियों के ने अपने प्राणों की भी परवाह नहीं की।
    (ii) क्रांतिकारियों ने भारतीय जनमानस को आततायी ब्रिटिश शासन से सीधी टक्कर लेने का प्रशिक्षण दिया।
    (iii) गाँधी जी के अहिंसात्मक, निर्जीव आंदोलन में क्रांतिकारी आंदोलन ने चेतना के प्राण फूंक दिए। (iv) क्रांतिकारियों के बलिदानों ने जनसाधारण की मनोवृत्ति को राष्ट्रभक्ति एवं स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ दिया।
    (v) क्रांतिकारियों ने अपने बलिदान और त्याग से भारत के स्वतंत्रता संग्राम को गौरवशाली बना दिया।
    (vi) क्रांतिकारियों ने अपनी गतिविधियों से जनसाधारण के समक्ष यह सिद्धांत रख दिया कि ‘गुलामी से मौत उत्तम है।’
    (vii) क्रांतिकारी गतिविधियों ने विदेशी शासकों के हृदय में भय उत्पन्न कर भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति को निश्चित बना दिया।
    (viii) क्रांतिकारियों ने अपनी गतिविधियों से देशप्रेम और स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए समूचे राष्ट्र को एकता और अखंडता के सूत्र में बाँध दिया।
    प्रश्न—- 2. गोपाल कृष्ण गोखले तथा दादाभाई नौरोजी की स्वतंत्रता संग्राम में उपलब्धियों की भूमिका का वर्णन कीजिए ।
    उ०- गोपाल कृष्ण गोखले की स्वतंत्रता संग्राम में उपलब्धियाँ- गोपाल कृष्ण गोखले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रसिद्ध सेनानी थे। उन्होंने जीवनभर कांग्रेस के सान्धिय में भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी निभाई। गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई, 1866 ई० को महाराष्ट्र राज्य में हुआ था। वे प्रारंभ से ही एक प्रतिभाशाली और जुझारू नेता थे। 22 वर्ष की आयु में उन्हें बंबई की लेजिस्लेटिव असेंबली का सदस्य चुना गया। 29 वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद को सुशोभित किया। उन्होंने 1905 ई० से 1907 ई० तक ब्रिटिश सरकार का कड़ा विरोध करते हुए हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया। 1905 ई० में गोखले ने ‘भारत सेवक समाज’ संस्था की स्थापना की। इन्होंने राजनीतिक वसीयत के रूप में सुधारों के लिए एक अभिनव योजना प्रस्तुत की। गोपाल कृष्ण गोखले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उत्कृष्ट सेनानी, अद्भुत कूटनीतिज्ञ तथा उदारवादी नेता थे। बाल गंगाधर तिलक ने गोखले की प्रशंसा इन शब्दों में की है- “गोखले, भारत का हीरा, महाराष्ट्र का रत्न एवं मजदूरों का राजा था।” 1915 ई० में स्वतंत्रता का यह महान सेनानी इतिहास में अपना नाम अमर करके इस संसार से विदा हो गया ।
    दादा भाई नौरोजी की स्वतंत्रता संग्राम में उपलब्धियाँ– महात्मा गाँधी के राजनीतिक गुरु तथा ‘ग्रेट ओल्डमैन ऑफ इंडिया’ के नाम से विख्यात दादा भाई नौरोजी का नाम भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों में अग्रिम पंक्ति में अंकित है। उनका जन्म 4 सितंबर, 1825 ई० को बंबई के निकट एक पारसी परिवार में हुआ था। वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के साथ ऐसे जुड़े कि जीवनभर संघर्ष करते रहे। उन्होंने 1866 ई० में ‘ईस्ट इंडिया एसोसिएशन’ की स्थापना कर भारतीयों की समस्याओं को उजागर किया। उनकी सेवाओं का सम्मान करते हुए 1866 ई० में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अध्यक्ष का पद देकर इन्हें गौरवान्वित किया। 1891 ई० में उन्हें इंग्लैंड की कॉमनसभा के लिए चुना गया।
    • इन्होंने ‘पावर्टी एंड द अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ नामक पुस्तक की रचना की। उनका मत था, “हम दया की भीख नहीं माँगते। हम तो केवल न्याय चाहते हैं, हम स्वशासन चाहते हैं।” उन्होंने अंग्रेजी सरकार से भारतीयों के लिए निम्नलिखित तीन अधिकारों की खुली माँग की(i) स्वराज पाने का अधिकार। (ii) उच्च सरकारी पदों पर अधिक से अधिक भारतीयों की नियुक्ति का अधिकार। (iii) भारत और इंग्लैंड में न्यायपूर्ण आर्थिक संबंधों की स्थापना। 30 जून, 1917 ई० को भारत माँ का यह लाड़ला सपूत और स्वतंत्रता सेनानी चिरनिद्रा में लीन हो गया। भारतवासी उनकी सेवाओं के लिए सदैव उनके ऋणी रहेंगे।
      प्रश्न—-3. सुभाष चंद्र बोस के जीवन तथा भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान का विवरण दीजिए ।
      उ०- सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 ई० में कटक में हुआ था। वह जन्मजात क्रांतिकारी थे। अपनी आई०सी०एस० की नौकरी को छोड़कर सुभाष राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े। ‘असहयोग आंदोलन’ को सफल बनाने के लिए उन्होने गाँधी जी को पूरा सहयोग दिया। प्रिंस ऑफ वेल्स’ के बहिष्कार आंदोलन में भी उन्होने बढ़-चढ़कर भाग लिया जिस कारण अंग्रेज-सरकार ने उन्हें दिसंबर 1921 में 6 महीने के लिए जेल भेज दिया। जब गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन स्थगित किया तो सुभाष को बड़ा दुःख हुआ और उन्होने गाँधी जी का साथ छोड़ दिया। तत्पश्चात् आप स्वराज्य पार्टी की स्थापना के कार्य में लग गए। 1924 ई० में सरकार ने उन पर क्रांतिकारी षडयंत्र का आरोप लगाकर उन्हें बन्दी बना लिया। 1929 ई० में उन्हें रिहा कर दिया गया। 1929 ई० में जब कांग्रेस ने अपना उद्देश्य पूर्ण स्वराज्य’ घोषित किया तो वह फिर से कांग्रेस में शामिल हो गए। 1938 ई० में सुभाष कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए किन्तु बोस कांगेस की उदारवादी नीति से बहुत असंतुष्ट थे क्योंकि वह तो सशस्त्र क्रांति के पक्ष में थे ।
      कुछ समय पश्चात् बोस कांग्रेस से अलग हो गए ओर ‘फारवर्ड ब्लॉक’ नाम का एक नया संगठन बना लिया। मार्च 1941 ई० में सुभाष ब्रिटिश सरकार को चकमा देकर भारत से बाहर चले गये और जर्मनी पहुँच गए। जापानी सहायता से ब्रिटिश शासन के विरूद्ध संघर्ष करने के लिए फरवरी 1943 ई० में वे जापान पहुंचे। जापानी सरकार की सहायता से उन्होंने ‘आजाद हिंद फौज‘ का गठन किया और अपने अनुयायियों को ‘जय हिंद’ का नारा दिया। भारत को स्वतन्त्रता दिलाने हेतु उनकी सेना ने उत्तर-पूर्व की ओर से भारत पर आक्रमण कर दिया। ‘आजाद हिन्द फौज’ आगे बढ़ती हुई आसाम तक पहुँची। किन्तु उसी समय द्वितीय विश्व युद्ध में जापान हार गया। परिणामतः आजाद हिन्द फौज को जापान से सहायता मिलनी बंद हो गई और इसे पराजय का मुँह देखना पड़ा। उन्ही दिनों एक वायुयान दुर्घटना में सुभाष की मृत्यु हो गई। सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज का भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है। भारत की आजादी के लिए उन्होने जो बलिदान किए उन्हें कभी नहीं भुलाया जला सकता

Up board class 10 social science chapter 15 भारत छोड़ो आंदोलन

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