up board class 10 social science chapter 34 : प्राकृतिक आपदाएँ

up board class 10 social science chapter 34 : प्राकृतिक आपदाएँ

UP BOARD CLASS 10 SOCIAL SCIENCE CHAPTER 6
UP BOARD CLASS 10 SOCIAL SCIENCE CHAPTER 4 FULL SOLUTION

पाठ–34 प्राकृतिक आपदाएँ (भूस्खलन, बाढ़, सूखा, भूकंप, चक्रवाती तूफान एवं लहरें)

प्रश्न—-1 प्राकृतिक आपदा किसे कहते हैं? दो प्राकृतिक आपदाओं के प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उ०- प्राकृतिक आपदा- प्रकृति द्वारा जल, स्थल अथवा वायुमंडल में उत्पन्न विनाशकारी घटना या बदलाव को प्राकृतिक आपदा कहते हैं। भूस्खलन, बाढ़ सूखा, भूकम्प, चक्रवाती तूफान एवं लहरें प्राकृतिक आपदाएँ हैं। बाढ़ के दुष्प्रभाव- बाढ़ आपदा के दुष्प्रभाव निम्नलिखित हैं
(i) बाढ़ आने से मनुष्य और पशु मर जाते हैं, तथा सम्पत्ति को भारी क्षति पहुँचती हैं। (ii) बाढ़ का जल खेतों में भरकर लहलहाती फसलों को चौपट कर देता है।
(iii) बाढ़ का जल समतल भूमि में कटाव करके उसे कृषि के लिए अयोग्य बना देता है। (iv) बाढ़ का जल सड़कों को तोड़ देता है, रेलवे लाइनों तथा विद्युत खम्बों को उखाड़ डालता है। (v) बाढ़ के जल से भवन, दुकान, कार्यालय तथा अन्य संस्थान नष्ट हो जाते हैं।
(vi) बाढ़ का जल एकत्र हो जाने से क्षेत्र में मलेरियार, डेंगू तथा पेचिश आदि रोगों का प्रकोप बढ़ जाता है।
सूखे के दुष्परिणाम- सूखा आपदा के मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं
(i) सूखे के कारण फसलें सूख जाती हैं, और कृषि उत्पादन घट जाता है।
(ii) सूखा पड़ने से प्रतिव्यक्ति और राष्ट्रीय आय घटने से अर्थव्यवस्था दुर्बल हो जाती है। (iii) सूखा पड़ने से पेयजल का अभाव उत्पन्न हो जाता है।
(iv) सूखा पड़ने से पशुओं के लिए चारे का अभाव उत्पन्न हो जाता है। (v) सूखा जलाभाव का कारण बनता है, अत: लोग दूषित जल पीकर घातक बीमारियों का शिकार बन जाते हैं।
(vi) सूखे के कारण पेड़ पौधे सूख जाते हैं, और वन्य जंतु नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न—-3आपदा प्रबंधन से आप क्या समझते हैं? उदाहरण देकर समझाइए।

उ०- आपदा प्रबंधन- आपदा प्रबंधन का सामान्य अर्थ आपदाओं को रोकने तथा नियंत्रण के प्रयासों से लगाया जाता है। दूसरे शब्दों में, “आपदा से होने वाली क्षति को न्यूनतम करना ही आपदा प्रबंधन है।” प्राकृतिक आपदाओं के लिए सुरक्षा तथा उपचार की सुव्यवस्था भी आपदा प्रबंधन के अंतर्गत आती है। आपदा प्रबंधन के चरण- आपदा प्रबंधन की व्यवस्था के निम्नलिखित चरण हैं(i) प्रथम चरण- प्रथम चरण में आपदा के विषय में भविष्यवाणी करना, आपदा के कारणों की जाँच और समीक्षा करना तथा आपदा आने के बाद प्रबंधन के कार्य सम्मिलित हैं।
(ii) द्वितीय चरण- इस चरण में आपदा ग्रस्त क्षेत्रों में प्रशिक्षित बचाव टीम भेजना, आपदाग्रस्त लोगों की चिकित्सा की
उचित व्यवस्था करना तथा उन्हें सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाना आदि कार्यों को सम्मिलित किया जाता है।
(iii) तृतीय चरण- इस चरण में आपदा प्रबंधन के दीर्घकालीन निवारक तथा सुरक्षात्मक उपाय अपनाए जाते हैं। भारत सरकार ने 2005 ई० में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान की स्थापना करके इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है।


प्रश्न—- 3. भूस्खलन क्या है? इसके दो दुष्प्रभाव लिखिए।
उ०- भूस्खलन का सामान्य अर्थ है भूखंड का फिसल जाना। पृथ्वी पर शैलों का अपक्षय होने से अपक्षय हुए पदार्थ गुरुत्वाकर्षण शक्ति द्वारा ढलान की तरफ खिसकना शुरु हो जाते हैं। यह प्रक्रिया पर्वतीय ढालों पर अधिक होती है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में त्वरित वर्षा होने से अपक्षरित खंडो का ढाल के साथ नीचे फिसल जाने की क्रिया को भूस्खलन कहते हैं। भूस्खलन के कारण फिसलती हुई चट्टान मार्ग में पड़ने वाले वृक्षों, बाँधों तथा आवासों को नष्ट कर डालती हैं। भूस्खलन दो प्रकार का होता है। चट्टानी खिसकाव में चट्टानें अपने आधार से दूर चली जाती हैं तथा धीरे-धीरे नीचे की ओर खिसकती हैं। यह कम विनाशक होती हैं। अचानक भूस्खलन तीव्र गति से अनायास होने वाली प्रक्रिया है जो भयंकर विनाश का कारण बनता है। भूस्खलन के दो दुष्प्रभाव निम्नवत् हैं(i) भूस्खलन से सड़कें टूट-फूटकर परिवहन की दृष्टि से बेकार हो जाती हैं। (ii) भूस्खलन के कारण अवसाद तथा चट्टानें नदी के मार्ग में गिरकर विनाशक बाढ़ को जन्म देती हैं।


प्रश्न—- 4. सूखा क्या है? इसे रोकने के दो उपाय लिखिए।
उ०- जल जीवन है और सूखा मृत्यु। किसी क्षेत्र विशेष में जल स्रोतों का अभाव हो जाना सूखे का प्रतीक है। जल के अभाव में आर्द्रता घट जाती है जो सूखा आपदा को जन्म देती है, सूखा इन शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है, “किसी क्षेत्र विशेष में औसत वार्षिक वर्षा के 75% से कम वर्षा होने की स्थिति को सूखा पड़ना कहा जाता है।” सूखा भयंकर आपदा बनकर टूट पड़ता है। सूखा आपदा फसलों, वृक्षों तथा जीव जंतुओं को लील जाती है। सूखा आपदा को रोकने के दो उपाय निम्नलिखित हैं(i) सिंचाई के लिए जल संसाधनों की उचित व्यवस्था करनी चाहिए। (ii) नदियों को परस्पर जोड़कर सूखाग्रस्त क्षेत्रों में जलापूर्ति करनी चाहिए।


प्रश्न—- 5. बाढ़ आने के क्या कारण हैं? इसके प्रबंधन का उपाय लिखिए।
उ०- बाढ़ आने के निम्नलिखित कारण हैं\
बाढ़ के कारण- बाढ़ को जन्म देने के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं
(i) तीव्रगति से होने वाली दीर्घकालीन भारी वर्षा।
(ii) जल के साथ अवसादों का नदी की तली में जमाव हो जाना।
(iii) नदियों में एक साथ अत्यधिक जल राशि का पहुँच जाना।
(iv) नदी के प्रवाह मार्ग में अवरोध उत्पन्न हो जाना।
(v) नदी में एकत्र जल राशि का दोनों किनारों को तोड़कर दूर तक फैल जाना।
(vi) वनों को अंधाधुंध काटकर हरित आवरण को नष्ट कर देना।
(vii) भूमि का अवैज्ञानिक ढंग से उपयोग करना।
(viii) कृषि भूमि में अत्यधिक सिंचाई करना।
(ix) बाँध में अचानक दरार पड़ जाना या बाँध टूट जाना।
(x) बादल फट जाना। बाढ़ आपदा का प्रबंधन- बाढ़ आपदा प्रबंधन हेतु बाढ़ से पूर्व, बाढ़ के दौरान तथा बाढ़ के बाद निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए
(i) बाढ़ संभावित क्षेत्रों की पहचान करके उन्हें मानचित्र पर प्रदर्शित कर देना चाहिए।
(ii) ऐसे क्षेत्रों में जल भराव रोकने के प्रयास किए जाने चाहिए।
(iii) बाढ़ संभावित क्षेत्रों से जल निकासी की समुचित व्यवस्था कर देनी चाहिए।
(iv) नदियों के किनारों पर पक्के तटबंध बनवा देने चाहिए।
(v) आवासों को बाढ़ संभावित क्षेत्रों में नहीं बनने देना चाहिए।
(vi) लोगों को बाढ़ से बचने के लिए उचित प्रशिक्षण देने की व्यवस्था करनी चाहिए।
(vii) बाढ़ आ जाने पर बचाव कार्य प्रारंभ कर देना चाहिए।
(viii) बाढ़ प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाकर उन्हे भोजन- वस्त्र तथा दवाइयाँ दी जानी चाहिए।
(ix) बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में महामारी फैलने से रोकने की उचित व्यवस्था कर देनी चाहिए।
(x) बाढ़ से प्रभावित लोगों के पुनर्वास की उचित व्यवस्था कर देनी चाहिए।


प्रश्न—-6. सुनामी क्या है? सुनामी आपदा प्रबंधन का वर्णन कीजिए।
उ०- महासागरों में उठने वाली विनाशकारी लहरों को सुनामी कहते हैं। सुनामी जापानी भाषा का शब्द है जो दो शब्दों सू (बंदरगाह) और नामी (लहर या तरंग) से बना है, अर्थात् सुनामी बंदरगाह की ओर आने वाली राक्षसी समुद्री लहरें हैं जो महासागर की तली के नीचे भूकंप आने के कारण उत्पन्न होती हैं।
सुनामी आपदा प्रबंधन- सुनामी आपदा प्रबंधन हेतु सुरक्षात्मक तथा प्रतिरोधस्वरूप निम्न कार्य किए जाने चाहिए
(i) सुनामी की पूर्व सूचना प्रसारित करने वाली उच्च कोटि की तकनीक खोजी जाए। अब उपग्रह प्रौद्योगिकी तथा
सुनामीटर के कारण सुनामी की आशंका की चेतावनी जारी करना संभव हो गया है।
(ii) सुनामी आने की संभावना होने पर तुरंत चेतावनी प्रसारित की जाए।
(iii) सुनामी आपदा के जोखिम और खतरों से बचाव के लिए विशेषज्ञों की टीम बनाई जाए।
(iv) आवासों को सागरीय तटों से दूर, ऊँचे तथा सुरक्षित स्थानों पर बनाया जाए।
(v) मकानों के निर्माण में स्टील के बने ढाँचों का प्रयोग किया जाए। (vi) मकान ऊँचे तथा मजबूत छतों वाले बनाए जाएँ, ताकि आवश्यकता पड़ने पर छतों पर शरण ली जा सके। (vii) चेतावनी की घोषणा होते ही सागर में तैर रही नौकाओं को बाहर तथा जलयानों को सुरक्षित डॉक्स में ले जाया जाए। (viii) सुनामी आपदाग्रस्त क्षेत्रों के लिए तुरंत बचाव दल भेजे जाएँ।
(ix) मलवे में दबे शवों को निकालते समय सावधानी बरती जाए।
(x) घायलों को सुरक्षित शिविरों में पहुँचा कर उनकी उचित देखभाल की जाए तथा उनके पुनर्वास की उचित व्यवस्था की जाए।


प्रश्न—-7. ज्वालामुखी विस्फोट के कारण तथा इससे निकलने वाली गैसों के नाम बताइए।
उ०- ज्वालामुखी क्रिया के कारण- ज्वालामुखी क्रिया का संबंध भूगर्भीय हलचल से होता है। पृथ्वी के आंतरिक तापमान में वृद्धि, रेडियोधर्मी विखंडन, जलवाष्प की उत्पत्ति, भूकंप इत्यादि कारणों से ज्वालामुखी विस्फोट होते हैं। ज्वालामुखी विस्फोट से निकलने वाली गैंसे- ज्वालामुखी विस्फोट से कार्बन डाइ ऑक्साइड, कार्बन मोना ऑक्साइड, सल्फर डाई ऑक्साइड, हाइड्रोक्लोरीन, नाइट्रोजन, अमोनिया एवं अन्य अम्लीय-प्रभाव वाली जहरीली गैसें निकलकर वायुमंडल में फैल जाती हैं।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न—-1 प्राकृतिक आपदा किसे कहते हैं? किन्हीं दो प्राकृतिक आपदाओं का वर्णन कीजिए।
उ०- प्राकृतिक आपदा- प्रकृति बड़ी ममता और स्नेह से मानव का पालन पोषण शिशु की भाँति करती है। उदंड बालक से कभी-कभी माँ रुष्ठ होकर उसे प्रताड़ित भी कर देती है, ठीक उसी प्रकार प्रकृति भी रौद्र रूप धारण करके विनाशक हो जाती है। प्रकृति द्वारा जल, स्थल अथवा वायुमंडल में उत्पन्न विनाशकारी घटना या बदलाव प्राकृतिक आपदा कहलाता है। भूस्खलन, बाढ़, सूखा, भूकंप, चक्रवाती तूफान एवं लहरें प्राकृतिक आपदाओं के उदाहरण है।

बाढ़– बाढ़ का शाब्दिक अर्थ है जल की मात्रा या संख्या में अत्यधिक वृद्धि हो जाना। देश में बढ़ती जनसंख्या को कहा जाता है कि देश में लोगों की बाढ़ ही आ गई है। बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा के रूप में जल प्लावन से जुड़ी हुई है। नदी का जल जब अपने तटों को तोड़कर दूर तक भूमि पर फैलकर विनाश का कारण बनता है, बाढ़ कहलाता है। सितंबर 2014 ई० में आई बाढ़ ने विश्व का स्वर्ग कहलाने वाली कश्मीर घाटी में विनाश का भयंकर तांडव मचाया था। बाढ़ के कारण- बाढ़ को जन्म देने के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं
(i) तीव्रगति से होने वाली दीर्घकालीन भारी वर्षा।।
(ii) जल के साथ अवसादों का नदी की तली में जमाव हो जाना।
(iii) नदियों में एक साथ अत्यधिक जल राशि का पहुँच जाना।
(iv) नदी के प्रवाह मार्ग में अवरोध उत्पन्न हो जाना।
(v) नदी में एकत्र जल राशि का दोनों किनारों को तोड़कर दूर तक फैल जाना।
(vi) वनों को अंधाधुंध काटकर हरित आवरण को नष्ट कर देना।
(vii) भूमि का अवैज्ञानिक ढंग से उपयोग करना।
(viii) कृषि भूमि में अत्यधिक सिंचाई करना।
(ix) बाँध में अचानक दरार पड़ जाना या बाँध टूट जाना।\
(x) बादल फट जाना।

बाढ़ के दुष्प्रभाव- बाढ़ आपदा के दुष्प्रभाव निम्नलिखित हैं

(i) बाढ़ आने से मनुष्य और पशु मर जाते हैं, तथा संपत्ति को भारी क्षति पहुँचती है। (ii) बाढ़ का जल खेतों में भरकर लहलहाती फसलों को चौपट कर देता है। (iii) बाढ़ का जल समतल भूमि में कटाव करके उसे कृषि के लिए अयोग्य बना देता है। (iv) बाढ़ का जल सड़कों को तोड़ देता है, रेलवे लाइनों तथा विद्युत खंभों को उखाड़ डालता है। (v) बाढ़ के जल से भवन, दुकान, कार्यालय तथा अन्य संस्थान नष्ट हो जाते हैं। (vi) बाढ़ का जल एकत्र हो जाने से क्षेत्र में मलेरिया, डेंगू तथा पेचिश आदि रोगों का प्रकोप बढ़ जाता है। बाढ़ आपदा का प्रबंधन- बाढ़ आपदा प्रबंधन हेतु बाढ़ से पूर्व, बाढ़ के दौरान तथा बाढ़ के बाद निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए(i) बाढ़ संभावित क्षेत्रों की पहचान करके उन्हें मानचित्र पर प्रदर्शित कर देना चाहिए। (ii) ऐसे क्षेत्रों में जल भराव रोकने के प्रयास किए जाने चाहिए। (iii) बाढ़ संभावित क्षेत्रों से जल निकासी की समुचित व्यवस्था कर देनी चाहिए। (iv) नदियों के किनारों पर पक्के तटबंध बनवा देने चाहिए। (v) आवासों को बाढ़ संभावित क्षेत्रों में नहीं बनने देना चाहिए। (vi) लोगों को बाढ़ से बचने के लिए उचित प्रशिक्षण देने की व्यवस्था करनी चाहिए। (vii) बाढ़ आ जाने पर बचाव कार्य प्रारंभ कर देना चाहिए। (viii) बाढ़ प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाकर उन्हें भोजन-वस्त्र तथा दवाइयाँ दी जानी चाहिए। (ix) बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में महामारी फैलने से रोकने की उचित व्यवस्था कर देनी चाहिए। (x) बाढ़ से प्रभावित लोगों के पुनर्वास की उचित व्यवस्था कर देनी चाहिए। सूखा- जल जीवन है और सूखा मृत्यु। किसी क्षेत्र विशेष में जल स्रोतों का अभाव हो जाना सूखे का प्रतीक है। जल के अभाव में आर्द्रता घट जाती है जो सूखा आपदा को जन्म देती है, सूखा इन शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है, “किसी क्षेत्र विशेष में औसत वार्षिक वर्षा के 75% से कम वर्षा होने की स्थिति को सूखा पड़ना कहा जाता है।” सूखा भयंकर आपदा बनकर टूट पड़ता है। सूखा आपदा फसलों, वृक्षों तथा जीव जंतुओं को लील जाती है।


सूखा पड़ने के कारण- सूखा आपदा का प्रत्यक्ष संबंध जल के अभाव में आर्द्रता का न होना है। इसके लिए अलग-अलग कई कारण उत्तरदायी होते हैं
(i) कम वर्षा या वर्षा न होना।
(ii) राष्ट्र के 33% क्षेत्र का वर्षा से वंचित रह जाना या कम वर्षा होना।
(iii) सिंचाई की सुविधाएँ कम हो जाना।
(iv) लंबी गर्मी की ऋतु होने के कारण शुष्कता बढ़ जाना।
(v) भूस्तरीय तथा भूगर्भीय जल स्रोतों का अत्यधिक दोहन होना।
(vi) मानसून पवनों का असफल हो जाना।


सूखे के दुष्परिणाम- सूखा आपदा के मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं
(i) सूखे के कारण फसलें सूख जाती हैं, और कृषि उत्पादन घट जाता है।
(ii) सूखा पड़ने से प्रतिव्यक्ति और राष्ट्रीय आय घटने से अर्थव्यवस्था दुर्बल हो जाती है।
(iii) सूखा पड़ने से पेयजल का अभाव उत्पन्न हो जाता है।
(iv) सूखा पड़ने से पशुओं के लिए चारे का अभाव उत्पन्न हो जाता है।
(v) सूखा जलाभाव का कारण बनता है, अत: लोग दूषित जल पीकर घातक बीमारियों का शिकार बन जाते हैं।
(vi) सूखे के कारण पेड़ पौधे सूख जाते हैं, और वन्य जंतु नष्ट हो जाते हैं।

सूखे से बचाव के उपाय- सूखा आपदा से बचाव हेतु निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं(i) सिंचाई के लिए जल संसाधनों की उचित व्यवस्था करनी चाहिए।
(ii) नहरों द्वारा सिंचाई की व्यवस्था सीमित रखनी चाहिए।
(iii) जल संसाधनों का उचित प्रयोग करने की योजना बना लेनी चाहिए।
(iv) नदियों को परस्पर जोड़कर सूखाग्रस्त क्षेत्रों में जलापूर्ति करनी चाहिए।
(v) सिंचाई के लिए टपकन सिंचाई प्रणाली अपनानी चाहिए। (vi) देश में शुष्क कृषि विधि को बढ़ावा देना चाहिए।
(vii) बाँध बनाकर नदियों में कृत्रिम जल संचयन की उचित व्यवस्था करनी चाहिए। (viii) वर्षा जल का उचित संचयन करके जलाभाव की कमी को पूरा किया जा सकता है। (ix) वृक्षारोपण को बढ़ावा देकर हरित आवरण को बढ़ाया जाना चाहिए।
(x) राष्ट्रीय जल बजट का उचित प्रयोग किया जाना चाहिए। भारत के सूखा प्रभावित क्षेत्र- भारत में सूखा आपदा प्रभावित क्षेत्र निम्नवत हैं
(i) गुजरात का कच्छ क्षेत्र, कर्नाटक का पठार, तमिलनाडु का पठार, झारखंड, ओडिशा तथा राजस्थान का थार मरूस्थलीय क्षेत्र और जैसलमेर तथा बाड़मेर जिले भारत के अत्यधिक सूखा प्रभावित क्षेत्र हैं।
(ii) राजस्थान का पूर्वी भाग, हरियाणा, उत्तर प्रदेश का दक्षिणी भाग, महाराष्ट्र का पूर्वी भाग तथा ओडिशा का आंतरिक भाग भारत के मध्यम सूखाग्रस्त क्षेत्र हैं।
(iii) राजस्थान का उत्तरी भाग, हरियाणा का उत्तरी भाग, महाराष्ट्र, तमिलनाडु में कोयमबटूर के पठार तथा आंतरिक कर्नाटक के कुछ जिले सामान्य सूखाग्रस्त क्षेत्र है। सूखा आपदा प्रबंधन- सूखा आपदा निरंतर बढ़ने की स्थिति में है, अतः उसका उचित प्रबंधन करना आवश्यक है। इसके लिए निम्नलिखित तात्कालिक तथा दीर्घकालिक उपाय किए जा सकते हैं
(i) सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पेय जल की आपूर्ति की उचित तथा त्वरित व्यवस्था कराई जानी चाहिए।
(ii) आपदा संभावित क्षेत्रों में पर्याप्त जल संचयन की व्यवस्था की जानी चाहिए।
(iii) सूखा आपदा को जन्म देने वाले कारणों का उचित निराकरण किया जाना चाहिए।
(iv) यहाँ पशुओं के लिए चारे और पानी की उचित व्यवस्था की जानी चाहिए। (v) बीमार लोगों के लिए दवाइयाँ तथा भोजन सुलभ कराया जाना चाहिए। (vi) सूखे के प्रभावों को हर तरह से कम से कम करने के प्रयास किए जाने चाहिए।


प्रश्न—- 2. सूखा आपदा का वर्णन निम्न शीर्षकों के अंतर्गत कीजिए। (क) सूखा आपदा के कारण (ख) दुष्प्रभाव
(ग) प्रबंधन
उ०- उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।
प्रश्न—-3. बाढ़ से आप क्या समझते हैं? बाढ़ आने के कारण तथा रोकने के उपायों का वर्णन कीजिए।
उ०- उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।

प्रश्न—-4 चक्रवात क्या है? चक्रवात के किन्हीं पाँच प्रभावों को स्पष्ट कीजिए।
उ०- चक्रवात- चक्रवात, पवनों में पड़ने वाले गतिरोधों से उत्पन्न गर्तों के झंझावतों को कहा जाता है। चक्रवात उन चक्करदार पवनों के गर्त को कहते हैं, जिनके मध्य में निम्न वायुदाब तथा किनारे की ओर उच्च वायुदाब होता है। चक्रवाक वह समुद्री तूफान होता है जो समुद्री क्षेत्र से निकलकर तटीय भागों में पहुँच जाता है और भारी विनाश करता है। चक्रवात की गति 100 किमी० प्रतिघंटा से सैकड़ों किमी० प्रति घंटा तक होती है। इसमें पवनें किनारे से केंद्र की ओर झपट कर तूफान उत्पन्न कर देती हैं। द्रुत गति से दौड़ने वाला चक्रवात घनघोर वर्षा तथा अंधड़ के साथ भयंकर विनाश उत्पन्न कर देता है। चक्रवाती तूफान जब एक प्राकृतिक आपदा बनकर टूटता है, तो प्रभावित क्षेत्र में सब कुछ नष्ट कर देता है। चक्रवाक मुख्य रूप से उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में आते हैं। चक्रवात की उत्पत्ति दो भिन्न तापमान वाली वायु राशियों के मिलने से होती है। चक्रवात उष्णता का वह यंत्र है, जिसको सागरीय जल से ऊर्जा मिलते ही वह भयंकर तूफान के रूप में तटवर्ती भागों में विनाश का हृदय विदाकर दृश्य प्रस्तुत कर देता है। गतिज ऊर्जा के कारण चक्रवात और अधिक वेगवान बनकर विनाशक तूफान बन जाता है। चक्रवात के दुष्प्रभाव- चक्रवात स्वयं एक प्राकृतिक प्रलयकारी आपदा है, और जब वह तूफान बन जाता है, महाविनाशक राक्षस का रूप धारण कर लेता है।
चक्रवाती तूफान के दुष्प्रभाव अग्रलिखित हैं
(i) चक्रवात तूफान बनकर मूसलाधार वर्षा को जन्म देकर धरती को जल मग्न कर फसलों को तहस-नहस कर डालता है।
(ii) इससे घर, दुकान, कारखाने टूट जाते हैं, तथा अनेकों लोग अकाल काल के मुख में चले जाते हैं।
(iii) अनिवार्य सेवाएँ; जैसे- विद्युत, जलापूर्ति, टेलीफोन तथा संचार प्रणाली नष्ट अथवा बुरी तरह प्रभावित हो जाती है।
(iv) इसके कारण परिवहन सेवाएँ तथा संचार तंत्र अस्त व्यस्त हो जाते हैं।
(v) चक्रवात, बाढ़, तूफान, भूस्खलन, तथा मृदा अपरदन जैसी समस्याओं को जन्म दे डालता है। (vi) चक्रवात महामारी के साथ-साथ वायरल रोगों को भी जन्म दे देता है।
(vii) चक्रवात सागर में तैरती नौकाओं और जलयानों को नष्ट कर देता है। (viii) चक्रवात से बंदरगाह के डॉक्स भी टूट-फूट जाते हैं।
(ix) चक्रवात मार्ग में आने वाले मनुष्यों, पशुओं तथा वृक्षों को नष्ट कर डालता है।


प्रश्न—-5. चक्रवात तथा प्रति चक्रवात से आप क्या समझते हैं?
उ०- चक्रवात- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-4 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।
प्रतिचक्रवात- प्रतिचक्रवात या विलोम चक्रवात, चक्रवात का एकदम उल्टा होता है। “प्रतिचक्रवात उन चक्करदार हवाओं से घिरे क्षेत्र को कहते हैं, जिसके बीच में उच्च वायुदाब तथा किनारे पर निम्न वायु दाब होता है।” प्रतिचक्रवात में पवनें केंद्र से बाहर की ओर चलती हैं। इन पवनों की गति मंद होती है। प्रतिचक्रवात वर्षा नहीं करता, बस इसके आगमन से आकाश बादलों से ढक जाता है और दीर्घकाल तक शीतलहर आ जाती है। ये न तो किसी प्रकार का विनाश करते हैं, और न इससे मौसम ही अधिक प्रभावित होता है।


प्रश्न—-6. भूकंप के आने के क्या कारण हैं? भूकंप के दुष्प्रभाव बताइए।
उ०- भूकंप वह प्राकृतिक आपदा है, जो अचानक प्रकट होकर आपदाग्रस्त क्षेत्र में तबाही मचा सकती है। किसी भूगर्भीय हलचल के कारण भूकंप से पृथ्वी का एक भाग अचानक हिल जाता है या जोरों से काँप उठता है। इस कंपन को भूचाल या भूकंप कहा जाता है। प्रो० सैल्सिबरी ने भूकंप को इन शब्दों में व्यक्त किया है, “भूकंप वे प्राकृतिक कंपन हैं जो व्यक्ति से असंबंधित क्रियाओं के परिणामस्वरूप होते हैं।” पृथ्वी के आंतरिक बलों के कारण चट्टानों पर आघात पड़ने पर भूपटल का एक विशेष क्षेत्र काँप उठता है। भूपटल के जिस केंद्र से भूकंप की लहरें उत्पन्न होती है, भूकंप उद्गम केंद्र कहलाता है। मूंकप उद्गम-केंद्र के ठीक ऊपर धरातल के जिस बिंदु पर भूकंप का प्रभाव होता वह भूकंप का अधिकेंद्र कहलाता है। विश्व में सर्वाधिक भूकंप जापान में आते हैं। भूकंप की उत्पत्ति के कारण- भूकंप आपदा की उत्पत्ति के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं
(i) भूकंप की उत्पत्ति का मुख्य कारण ज्वालामुखी का उदगार है। ज्वालामुखी का विस्फोट होते ही दूर-दूर तक के क्षेत्र काँप उठते हैं।
(ii) भूपटल पर दबाव अथवा तनाव के कारण भूगर्भीय चट्टानों में वलन, संपीडन तथा भ्रंशन की क्रियाएँ होने से भूकंप उत्पन्न होते हैं।
(iii) भूगर्भ में तापमान तथा वायुदाब बढ़ने से शैलों में जो असंतुलन उत्पन्न होता है, वह भूकंप को जन्म देने के लिए
उत्तरदायी बन जाता है।
(iv) झील, तालाब आदि जल राशियों में भरा जल, नीचे की चट्टानों पर भार डालकर उनमें भूकंप उत्पन्न कर देता है।
(v) महाद्वीपों की प्लेटों में विर्वतनिक हलचलों द्वारा मुख्यतः भूकंपों की उत्पत्ति होती है।
(vi) महाद्वीप प्लेटों के साथ जुड़े हुए हैं, इन प्लेटों में खिसकने की क्रियाएँ भूकंप को जन्म देती हैं। भूकंप की माप
भूकंपलेखी यंत्र द्वारा की जाती है। भूकंप के दुष्प्रभाव- भूकंप आपदा महाविनाश लेकर आती है। इसके मानव जीवन पर निम्नलिखित प्रभाव पडते हैं।
(i) भूकंप आपदा अचानक प्रकट होकर जन-धन का भारी विनाश कर देती है। 1991 में उत्तरकाशी, 1992 में लातूर तथा 26 जनवरी, 2001 को गुजरात के भुज में आए विनाशकारी भूकंपों में कई हजार व्यक्तियों की मृत्यु हो चुकी है। (ii) भूकंप के कारण नदियों के मार्ग बदल जाने से भयंकर बाढ़ आ जाती है।
(iii) भूकंप के कारण धरातल में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ने से समतल क्षेत्र ऊबड़-खाबड़ बन जाता है।
(iv) भूकंप के कारण समुद्रों में ऊँची और भयानक सुनामी लहरें उठकर विनाश का कारण बन जाती हैं।
(v) भूकंप के कारण सड़कें टूट जाती हैं, जबकि रेलवे लाइनें मुड़कर यातायात के लिए बेकार हो जाती है।

up board class 10 social science chapter 33: भारत की जलवायु
प्रश्न—-7. सुनामी क्या है? सुनामी के दुष्प्रभाव तथा प्रबंधन के उपाय सुझाइए।
सुनामी- समुद्री लहरें कभी-कभी अत्यधिक विनाशकारी रूप धारण कर लेती हैं। इनकी ऊँचाई 10 से 15 मीटर होती है। ये लहरें मिनटों में ही तट तक पहुँच जाती हैं तथा भयानक शक्ति के साथ तट से टकराकर कई मीटर ऊपर तक उठती हैं। तटवर्ती मैदानी क्षेत्रों में इनकी चाल 50 किमी/घंटा से भी अधिक होती है। ये समुद्री लहरें तट के आस-पास की बस्तियों को पूर्णरूपेण तबाह कर देती है। इन विनाशकारी समुद्री लहरों को सुनामी कहते हैं। सुनामी के दुष्प्रभाव- सुनामी लहरों के कहर से पूरे विश्व में लाखों लोग काल-कलवित हो जाते हैं। संपूर्ण सुनामी प्रभावित क्षेत्र विनाश और तबाही का प्रतिरूप बन जाता है। भारत तथा इसके निकट तटीय देशों म्यांमार, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाइलैंड, मालदीव आदि में सुनामी विनाश का ताँडव करती है। तटीय बस्तियाँ तहस-नहस हो जाती हैं। लाखों लोगों को जान-माल की हानि होती है।
सुनामी आपदा प्रबंधन- इसके लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या- 6 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।

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