Up board class 10 social science free solution chapter 42: व्यवसाय (पशुपालन, मत्स्य व्यवसाय, कृषि, खनन)

Up board class 10 social science free solution chapter 42: व्यवसाय (पशुपालन, मत्स्य व्यवसाय, कृषि, खनन)

लघु उत्तरीय प्रश्न


प्रश्न—-1. भारत में गेहूँ की खेती के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाओं का उल्लेख कीजिए तथा इसके प्रमुख उत्पादक राज्यों के नाम लिखिए।
उ०- गेहूँ की खेती के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ- गेहूँ की फसल उगाने के लिए निम्नलिखित भौगोलिक दशाओं की आवश्यकता होती है
(i) गेहूँ की फसल के लिए 12° सेल्सियस से 17° सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है। कोहरा, पाला तथा बदलीयुक्त मौसम इसके लिए हानिकारक होता है।
(ii) गेहूँ के लिए 50 सेमी से 75 सेमी वर्षा की आवश्यकता होती है।
(iii) गेहूँ की फसल के लिए उपजाऊ, समतल और भुरभुरी मिट्टी सर्वोत्तम होती है। चिकनी तथा बलुई दोमट मिट्टी में भी गेहूँ उगाया जा सकता है।
(iv) गेहूँ की फसल के लिए कंपोस्ट खाद या अमोनियम सल्फेट रासायनिक उर्वरक उपयोगी होता है।
(v) गेहूँ की फसल उगाने में ट्रैक्टर, हारवेस्टर तथा थ्रेसर कृषि यंत्रों की भी आवश्यकता होती है। गेहूँ उत्पादक राज्य- भारत का सर्वाधिक गेहूँ उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश है। इसके अतिरिक्त पंजाब, मध्यप्रदेश, हरियाणा, बिहार, झारखंड, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ तथा उत्तराखंड राज्यों के नाम भी गेहूँ उत्पादन में उल्लेखनीय हैं।

प्रश्न—-भारत में चावल की खेती के लिए उपयुक्त भौगोलिक दशाओं तथा उत्पादक राज्यों का वर्णन कीजिए।
उ०- भारत में चावल की खेती के लिए निम्नलिखित भौगोलिक दशाओं की आवश्यकता होती है –
(i) मिट्टी- चावल की खेती के लिए उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी सर्वाधिक उपयुक्त होती है।
(ii) तापमान- चावल उष्ण व नम जलवायु की फसल है। इसके लिए 20° सेल्सियस से 30° सेल्सियस तापमान की
आवश्यकता होती है। स्वच्छ आकाश और खिली धूप चावल के लिए अच्छी रहती है।
(iii) वर्षा- चावल अधिक वर्षा वाले भागों में उगाया जाता है। चावल के लिए 150 सेमी० से 200 सेमी० तक वर्षा की आवश्यकता होती है
(iv) उर्वरक- चावल की अच्छी पैदावार के लिए जैविक खाद एवं रासायनिक उर्वरकों का उपयोग किया जाता है। (v) मानवीय श्रम- चावल की फसल के लिए धान की पौध लगाने से लेकर निराई, गुड़ाई, सिंचाई, कटाई तथा धान की सफाई तक मानवीय श्रम की आवश्यकता होती है। भारत में चावल उत्पादक- भारत का सबसे बड़ा चावल उत्पादक राज्य है- आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, असम, मेघालय, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, कर्नाटक, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड तथा हरियाणा आदि चावल उत्पादक राज्य हैं।


प्रश्न—- 3. भारत में गन्ने की खेती के लिए उपयुक्त तापमान, वर्षा एवं मिट्टी का उल्लेख कीजिए।
उ०- गन्ना उगाने के लिए निम्नलिखित भौगोलिक दशाओं की आवश्यकता होती हैं
(i) तापमान- गन्ना उगाने के लिए 20° सेल्सियस से 30° सेल्सियस तक तापमान चाहिए। बदली, कोहरा तथा धुंध इसकी फसल को हानि पहुँचाते हैं। जाड़ों की गुलाबी धूप तथा चटक मौसम गन्ने के रस में मिठास बढ़ा देता है।
(ii) वर्षा- गन्ना उगाने के लिए अधिक नमी की आवश्यकता होती है। इसकी खेती 100 सेमी० से 200 सेमी० वर्षा वाले क्षेत्रों में सुगमता से हो जाती है। उत्तरी भारत में ग्रीष्म ऋतु में जब वर्षा नहीं होती, इसकी फसल की बार-बार सिंचाई की जाती हैं।
(iii) मिट्टी- गन्ना उगाने के लिए समतल, उपजाऊ, भुरभुरी दोमट जलोढ़ मिट्टी या चिकनी मिट्टी सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। इसके खेत को कई बार जोतकर भुरभुरा बनाया जाता है। गन्ना के पौधों की कई बार निराई गुड़ाई करनी आवश्यक होती है। गन्ने की अधिक उपज पाने के लिए कंपोस्ट, सल्फेट एवं सुपर फॉस्फेट उर्वरकों का प्रयोग करना लाभदायक माना जाता है।

प्रश्न—-चाय की खेती के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ बताइए तथा दो प्रमुख चाय उत्पादक राज्यों के नाम लिखिए।
उ०- चाय की फसल के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाएँ- चाय के बागान लगाकर चाय की फसल उगाने के लिए
निम्नलिखित भौगोलिक दशाओं की आवश्यकता होती हैतापमान- चाय उष्ण-नम मानसूनी जलवायु की मुख्य फसल है। इसके पौधों के लिए 20° सेल्सियस से 30° सेल्सियस तक सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है। स्वच्छ मौसम और चटकती धूप चाय की झाड़ियों के लिए लाभकारी होते हैं, जबकि कोहरा और पाला इन्हें विशेष हानि पहुँचाते हैं। वर्षा- चाय की झाड़ियों के लिए 100 सेमी० से 150 सेमी० वर्षा आवश्यक मानी जाती है। वर्षा हल्की और नियमित होती रहनी चाहिए। चाय की झाँड़ियों की जड़ों में पानी रुकना हानिकारक होता है। इसलिए चाय के बागानों की भूमि ढालदार होनी चाहिए।
मिट्टी- चाय की झाड़ियाँ लगाने के लिए उपजाऊ और ढालू भूमि सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। पहाड़ी ढालू भूमि में जल नहीं ठहर पाता है, जबकि उपजाऊ मिट्टी पौधों का उत्तम पोषण करती है।


सस्ता श्रम- चाय की खेती श्रम पर आधारित है। चाय की झाड़ियाँ लगाने तथा उनसे वर्ष में दो से तीन बार तक पत्तियाँ चुनने के लिए पर्याप्त संख्या में सस्ते श्रमिकों की आवश्यकता होती है। झाड़ियों से पत्तियाँ चुनने का कार्य स्त्रियाँ बड़े मनोयोग से करती हैं। पूँजी और तकनीक- चाय की खेती पर्याप्त पूँजी और तकनीक का प्रयोग करके व्यापारिक कंपनियों द्वारा कराई जाती है चाय की पत्तियाँ कारखानों में निश्चित प्रक्रिया से गुजरकर चाय बन पाती है। चाय की खेती प्रायः व्यावसायिक संगठनों द्वारा वैज्ञानिक ढंग से तथा व्यापारिक उद्देश्य से की जाती है।
दो प्रमुख चाय उत्पादक राज्य- असम, पश्चिम बंगाल।

प्रश्न—भारत में कपास किन राज्यों में पैदा होती है? कपास की उपज के लिए आवश्यक भौगोलिक दशाएँ कौन-सी हैं?
उ०- भारत में कपास उत्पादक राज्य- महाराष्ट्र भारत का प्रमुख कपास उत्पादक राज्य है। इसके अतिरिक्त कपास मुख्य रूप से गुजरात, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम तथा मेघालय आदि राज्यों में भी उगाई जाती है। कपास की फसल के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाएँ- भारत में कपास की खेती के लिए सभी आदर्श भौगोलिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जो निम्नलिखित हैं
तापमान- कपास उष्ण जलवायु की उपज है। इसके लिए 20° सेल्सियस से 35° सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है। साफ स्वच्छ मौसम और चटक धूप कपास की खेती के लिए सर्वोत्तम है। बादल, कोहरा या धुंध कपास की फसल को हानि पहुँचाते हैं।
वर्षा- कपास के पौधों के लिए पर्याप्त नमी की आवश्यकता होती है। पौधों की जड़ों में नमी सदैव बनी रहनी चाहिए, परंतु जल का भरा रहना पौधों को गला देता है। इसकी फसल के लिए 50 सेमी० से 100 सेमी० हल्की, परंतु निरंतर वर्षा की आवश्यकता होती है।

मिट्टी- कपास की खेती करने के लिए अधिक नमी धारण करने की क्षमता रखने वाली उपजाऊ काली मिट्टी सर्वोत्तम होती है। काली मिट्टी उपजाऊ और नमी धारण करने की क्षमता रखने के कारण कपास की मिट्टी कहलाती है।
श्रम- कपास की खेती व्यापारिक स्तर पर करने के लिए कपास के पौधों से कपास चुनने तथा कारखानों तक पहुँचाने के लिए सस्ते श्रमिकों की आवश्यकता होती है। कपास चुनने का कार्य स्त्रियाँ सुगमता से कर लेती हैं।


प्रश्न—- 6. जूट की उपज के लिए किन चार आवश्यक भौगोलिक दशाओं की आवश्यकता होती है? दो प्रमुख जूट उत्पादक राज्य कौन-से हैं?
उ०- जूट की फसल के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाएँ- जूट की खेती करने के लिए निम्नलिखित भौगोलिक दशाओं की आवश्यकता होती हैंतापमान- जूट उगाने के लिए उष्ण और नम जलवायु की आवश्यकता होती है। इसकी फसल उगाने के लिए 25° सेल्सियस से 35° सेल्सियस तक तापमान की आवश्यकता होती है। चमचमाती खिली धूप तथा उच्चताप मान में जूट का पौधा खूब विकसित होता है। वर्षा- जूट का पौधा अधिक नमी ग्रहण करता है। अतः इसकी खेती 200 सेमी० से 250 सेमी० वर्षा वाले क्षेत्रों में खूब की जाती है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में जूट की फसल को सींचना आवश्यक हो जाता है। मिट्टी- जूट का पौधा मिट्टी से अधिक उर्वरता ग्रहण करता है। अतः उपजाऊ जलोढ़ या डेल्टाई मिट्टी जूट की खेती के लिए आदर्श मानी जाती है। सस्ता श्रम- जूट की खेती के लिए सस्ता श्रम अपेक्षित है। खेतों से पौधों को काटकर तालाबों के जल में गलने के लिए डालने, उनसे रेशा पृथक करने तक श्रम ही श्रम करना पड़ता है।
जूट उत्पादक दो प्रमुख राज्य- पश्चिम बंगाल व असम।


प्रश्न—-7. ऑपरेशन फ्लड क्या है? इसके दो महत्व लिखिए।
उ०- ऑपरेशन फ्लड- सन् 1964-1965 में ‘सघन पशुविकास कार्यक्रम’ चलाया गया, जिसके अंतर्गत ‘धवल-क्रांति’ अथवा खेत-क्रांति लाने के लिए पशु मालिकों को पशु पालन के विकसित तरीकों का ज्ञान कराया गया तथा दुग्ध उत्पादन की गति तेज करने के लिए एक अभियान चलाया गया, जिसे ‘ऑपरेशन फ्लड़’ नाम दिया गया। ऑपरेशन फ्लड कार्यक्रम विश्व का सबसे बड़ा समन्वित डेयरी विकास कार्यक्रम है, जिसे 1970 में ‘राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड’ द्वारा आरंभ किया गया था। महत्व- ऑपरेशन फ्लड के दो महत्व निम्नलिखित हैं—
(i) ऑपरेशन फ्लड कार्यक्रम के अंतर्गत सहकारी दुग्ध समितियाँ गठित कर दुग्ध उद्योग का विकास किया गया।
(ii) पशुओं की दशा में गुणात्मक सुधार होने से, पशुपालन एक अच्छे लाभ का व्यवसाय बन गया।

प्रश्न—-8. भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुधन के तीन योगदान ( महत्व) स्पष्ट कीजिए।
उ०- भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुधन का महत्व (लाभ)- पशुओं की संख्या की दृष्टि से विश्व में भारत का प्रथम स्थान तथा पशु-घनत्व की दृष्टि से डेनमार्क के बाद दूसरा स्थान है। भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुओं का महत्व निम्न प्रकार से है

(i) कृषि-कार्यों में विभिन्न पशु चालक-शक्ति प्रदान करते हैं। हल चलाने, सिंचाई, पटेला, ढुलाई, गन्ना पेरने आदि अनेक
कृषि-कार्यों में पशुओं का प्रयोग होता है।
(ii) विभिन्न पशुओं के गोबर तथा मूत्र से अच्छी प्रकार की खाद तैयार की जाती है।
(iii) पशुओं के गोबर से उपले बनाकर ईंधन के रूप में उपयोग किए जाते हैं।

प्रश्न—9. भारत में पशुओं की हीन दशा सुधारने के उपाय सुझाइए।

उ०- भारत में पशुओं की हीन दशा होने के कारण- भारत में विश्व के सर्वाधिक पशु होते हुए भी वे अत्यंत दीन-हीन दशा में हैं। उनकी हीन दशा के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं
(i) भारत में पशुओं की संख्या अधिक होना।
(ii) भारत की उष्ण जलवायु होना।
(iii) भारतीय पशुपालकों का अशिक्षित और निर्धन होना।
(iv) भारत में पशु चरागाह न होना।
(v) पशुओं को प्राणघातक रोग लगना।
(vi) पशुओं के लिए पौष्टिक और हरा चारा न मिलना।
(vii) पशु-बाड़ों की समुचित व्यवस्था न होना।
(viii) पशु-चिकित्सालयों का अभाव होना।
(ix) पशुपालन करने की वैज्ञानिक विधि का ज्ञान न होना।
(x) सरकार द्वारा पशु-बीमा योजना व अन्य पशु-सुधार योजनाएँ न चलाए जाना।

प्रश्न—-10. भारत में हरित क्रांति की प्रमुख उपलब्धियों पर प्रकाश डालिए।
उ०- हरित क्रांति की उपलब्धियाँ- हरित क्रांति भारत की मृतप्राय कृषि में नव जीवन लाने में सहायक सिद्ध हुई है। हरित क्रांति ने भारतीय कृषि व्यवसाय में आमूलचूल परिवर्तन करके इसकी गौरवशाली प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हरित क्रांति की उपलब्धियाँ को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है
(i) हरित क्रांति ने भारतीय कृषि की दयनीय स्थिति को सुधारकर, उसमें गुणात्मक सुधार ला दिया है।
(ii) हरित क्रांति ने कृषि उत्पादन में आश्चर्यजनक वृद्धि करके इसे लाभकारी व्यवसाय बना दिया है।
(iii) हरित क्रांति के कारण कृषकों की आय के साथ-साथ, राष्ट्रीय आय में भी वृद्धि हो गई है।
(iv) भारत पहले खाद्यान्नों का आयात करता था, हरित क्रांति ने उसे खाद्यान्नों का निर्यातक बना दिया है।
(v) हरित क्रांति ने कृषि व्यवसाय को लाभकारी व्यवसाय बनाकर, एक सुदृढ़ अर्थव्यवस्था के निर्माण का सुदृढ़ आधार प्रदान किया है। हरित क्रांति की सफलता देखते हुए, भारत में द्वितीय हरित क्रांति लागू करने की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी है।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न–up board class 10 social science full solution chapter 37 वन एवं जीव संसाधन


प्रश्न—-1. पशुधन का भारतीय अर्थव्यवस्था में क्या महत्व है? भारतीय पशुओं की हीन दशा के क्या कारण हैं? पशुओं की
दशा सुधारने के उपाय बताइए ।
उ०- भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुधन का महत्व (लाभ)- पशुओं की संख्या की दृष्टि से विश्व में भारत का प्रथम स्थान तथा
पशु-घनत्व की दृष्टि से डेनमार्क के बाद दूसरा स्थान है। भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुओं का महत्व निम्न प्रकार से है
(i) कृषि-कार्यों में विभिन्न पशु चालक-शक्ति प्रदान करते हैं। हल चलाने, सिंचाई, पटेला, ढुलाई, गन्ना पेरने आदि अनेक
कृषि-कार्यों में पशुओं का प्रयोग होता है।
(ii) विभिन्न पशुओं के गोबर तथा मूत्र से अच्छी प्रकार की खाद तैयार की जाती है।
(iii) पशुओं के गोबर से उपले बनाकर ईंधन के रूप में उपयोग किए जाते हैं।
(iv) गाय, भैंस तथा बकरियों से दूध प्राप्त होता है जिससे घी, मट्ठा, मक्खन, मावा आदि तैयार किए जाते हैं। दुग्ध अथवा डेयरी उद्योग पशुओं पर भी आधारित होते हैं।
(v) बकरा, मुर्गा, सुअर आदि पशुओं का मांस तथा मुर्गियों के अंडों का खाद्य-पदार्थ के रूप में उपयोग होता है।
(vi) आधुनिक युग में भी परिवहन के साधन के रूप में बैल, भैंसे, ऊँट, घोड़े, गधे, खच्चर आदि अपना अलग ही महत्व रखते हैं।
(vii) भारत में अनेक उद्योग पशुओं पर ही आधारित है; जैसे- डेयरी उद्योग, ऊन उद्योग, चमड़ा उद्योग, मछली पालन उद्योग, मुर्गी पालन तथा मांस उद्योग।
(viii) पशुओं से हमें चमड़ा, हड्डियाँ, बाल व खाल प्राप्त होती है जो औद्योगिक व व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
(ix) पशु-पदार्थों के निर्यात से देश को लगभग 1200 करोड़ रूपए की वार्षिक आय होती है जिससे राष्ट्रीय आय में वृद्धि के
साथ-साथ विदेशी मुद्रा की प्राप्ति भी होती है। भारत में पशुओं की हीन दशा होने के कारण- भारत में विश्व के सर्वाधिक पशु होते हुए भी वे अत्यंत दीन-हीन दशा में हैं। उनकी हीन दशा के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं
(i) भारत में पशुओं की संख्या अधिक होना।
(ii) भारत की उष्ण जलवायु होना।
(iii) भारतीय पशुपालकों का अशिक्षित और निर्धन होना।
(iv) भारत में पशु चरागाह न होना।
(v) पशुओं को प्राणघातक रोग लगना।
(vi) पशुओं के लिए पौष्टिक और हरा चारा न मिलना।
(vii) पशु-बाड़ों की समुचित व्यवस्था न होना। up board class 10 social science full solution chapter 37 वन एवं जीव संसाधन
(viii) पशु-चिकित्सालयों का अभाव होना।
(ix) पशुपालन करने की वैज्ञानिक विधि का ज्ञान न होना।
(x) सरकार द्वारा पशु-बीमा योजना व अन्य पशु-सुधार योजनाएँ न चलाए जाना।

पशुओं की हीन दशा सुधारने के उपाय- भारतीय पशुओं की हीन दशा सुधारने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए
(i) पशुओं की नस्लों में सुधार किया जाए।
(ii) साफ, स्वच्छ और शीतल पशु-बाड़े बनाए जाएँ।
(iii) पशु चरागाहों की व्यवस्था कराई जाए।
(iv) पशुओं के लिए पौष्टिक और हरे चारे की व्यवस्था की जाए।
(v) पशुओं के लिए पशु-चिकित्सालयों की व्यवस्था की जाए।
(vi) पशुपालन के वैज्ञानिक प्रशिक्षण की व्यवस्था कराई जाए।
(vii) पशु-उत्पादों को सुरक्षित रखने के लिए शीतलन की व्यवस्था कराई जाए।
(viii) पशु-उत्पादों पर आधारित उद्योगों का समुचित विकास कराया जाए।
(ix) पशुपालकों को आर्थिक तथा तकनीकी सहायता प्रदान की जाए।
(x) सरकार द्वारा पशु-सुधार हेतु योजनाएँ चलायी जानी चाहिए।


प्रश्न—-2. भारत में जूट उत्पादन के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाओं तथा उत्पादन क्षेत्रों का वर्णन कीजिए।
उ०- भारत में जूट उत्पादन के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाएँ- जूट की खेती करने के लिए निम्नलिखित भौगोलिक दशाओं की आवश्यकता होती हैंतापमान- जूट उगाने के लिए उष्ण और नम जलवायु की आवश्यकता होती है। इसकी फसल उगाने के लिए 250 सेल्सियस से 35° सेल्सियस तक तापमान की आवश्यकता होती है। चमचमाती खिली धूप तथा उच्चताप मान में जूट का पौधा खूब विकसित होता है। वर्षा- जूट का पौधा अधिक नमी ग्रहण करता है। अतः इसकी खेती 200 सेमी० से 250 सेमी० वर्षा वाले क्षेत्रों में खूब की जाती है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में जूट की फसल को सींचना आवश्यक हो जाता है। मिट्टी- जूट का पौधा मिट्टी से अधिक उर्वरता ग्रहण करता है। अतः उपजाऊ जलोढ़ या डेल्टाई मिट्टी जूट की खेती के लिए आदर्श मानी जाती है। सस्ता श्रम- जूट की खेती के लिए सस्ता श्रम अपेक्षित है। खेतों से पौधों को काटकर तालाबों के जल में गलने के लिए डालने, उनसे रेशा पृथक करने तक श्रम ही श्रम करना पड़ता है।

भारत में जूट उत्पादन वाले क्षेत्र- भारत के निम्नलिखित क्षेत्रों में जूट की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है
(i) पश्चिम बंगाल- जूट पश्चिम बंगाल के कृषकों की महत्वपूर्ण नकदी फसल है। यह राज्य भारत की 65% जूट उगाकर भारत में पहले स्थान पर है। यहाँ हुगली, जलपाईगुड़ी, नदिया, हावड़ा, कूचबिहार तथा मालदा आदि जिलों में जूट उगाई जाती है।
(ii) असम- असम भारत की 12% जूट का उत्पादन करता है। यहाँ गोलपाडा, नौगाँव, कामरूप आदि जिलों में जूट की खेती की जाती है।
(iii) बिहार तथा झारखंड- बिहार तथा झारखंड दोनों राज्य मिलकर भारत की 10% से अधिक जूट उगाते हैं, यहाँ कोसी
नदी तथा गंगा नदी की घाटी में खूब जूट उगाई जाती है।
(iv) अन्य जूट उत्पादक क्षेत्र- भारत के अन्य जूट उत्पादक क्षेत्रों में मणिपुर, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, आंध्र प्रदेश
तथा मेघालय आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।


प्रश्न—- 3. खनन व्यवसाय से आपका क्या आशय है? भारत में खनन व्यवसाय की मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उ०- खनन व्यवसाय- मानव के आर्थिक विकास की गाथा, प्रकृति के साथ उसके संघर्ष से जुड़ी है। उसे प्रकृति से जहाँ भी लाभ मिला, उसने प्रकृति से जीभर लाभ उठाया। खनन धरती का सीना चीरकर खनिज पदार्थों को निकालने की व्यवस्था को कहा जाता है। उपयोगी और मूल्यवान खनिज मानव के बहुमुखी आर्थिक विकास के स्रोत बन गए हैं। अतः मानव ने इस लुटेरे उद्योग खनन को एक व्यवसाय के रूप में ग्रहण कर लिया। खनन उद्योग का आधार खान होती है। खान वह क्षेत्र है, जिसमें छेद बनाकर भूगर्भ से अयस्क निकाले जाते हैं। अयस्क खान से निकाले गए अशुद्ध पदार्थ हैं। इस प्रकार खान से खोदकर अयस्कों को निकालना ही खनन व्यवसाय है। भारत में भारी मात्रा में खनिज; जैसे- लोहा, मैंगनीज, अभ्रक, कोयला आदि खानों में से निकाले जाते हैं। वर्तमान समय में खनन प्राथमिक व्यवसाय न रहकर एक गौण व्यवसाय बन गया है। वर्तमान समय में इस खनन कार्य में बहुत अधिक लोग लगे हुए हैं।
विशेषताएँ :-
(i) भारत खनिजों के मामले में एक भाग्यशाली देश है, परंतु यहाँ खनन कार्य में आधुनिक तकनीक का प्रयोग बहुत ही कम किया जाता है। देश में 3,600 खदानों में से मात्र 880 खदानें की यन्त्रीकृत है, जो देश के 85% खनिजों का उत्पादन करती हैं। शेष 2,720 खदानों से केवल 15% खनिज उत्पादन प्राप्त होता है।
(ii) भारत का अधिकांश खनन व्यवसाय व्यक्तिगत क्षेत्र में हैं, जिसके कारण वह व्यवस्थित नहीं है। इसी कारण भारत सरकार ने अभ्रक व कोयले की खदानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया है।up board class 10 social science free solution chapter 41: जनसंख्या (जनसंख्या का घनत्व, वितरण, लिंग अनुपात, बढ़ती जनसंख्या की समस्याएँ, जनसंख्या नियंत्रण के उपाय)
(iii) भारत के अधिकांश खनिज छोटानगर का पठार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ व मध्यप्रदेश में पाये जाते हैं।
कुछ राज्य खनिज प्राप्ति में शून्य है। तथा कुछ राज्यों- ओडिशा, आन्ध्रप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, तमिलनाडु,
असम कर्नाटक, गोआ आदि में विविध प्रकार के खनिज पदार्थ मिलते हैं।
(iv) भारत में हिमालय क्षेत्र में विभिन्न खनिजों के विशाल भंडार है। भारत में बॉम्बे हाई से खनिज तेल प्राप्त कर लिया गया
है। यहाँ अनेक क्षेत्रों में खनिजों के अन्वेषण का काम चल रहा है।
(v) भारत में लौह-अयस्क, मैंगनीज व अभ्रक के विशाल भंडार हैं। भारत इन खनिजों का निर्यात करता है।


प्रश्न—-4. भारत में कम कृषि उत्पादकता के क्या कारण हैं? उत्पादकता बढ़ाने के उपाय सुझाइए।
भारत में कम कृषि उत्पादकता के कारण- भारत में कृषि उत्पादकता कम होने के कारण निम्नलिखित हैं
(i) कृषि भूमि पर जनसंख्या का अत्यधिक दबाव- भारत में कृषि भूमि पर जनसंख्या का अत्यधिक दबाव है। यह दबाव मुख्यतः दो कारणों से है- पहला भारत की जनसंख्या में तीव्र वृद्धि तथा दूसरा गैर-कृषि क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों का विकास न होना। 2001 में लगभग तीन चौथाई ग्रामीण जनसंख्या कृषि क्षेत्र में रोजगार पाए हुए थी। भारत में कृषि भूमि के बंटवारे का मुख्य कारण जनसंख्या में वृद्धि है जिसकी वजह से प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम रहता है।
(ii) सामाजिक वातावरण- भारत में सामाजिक वातावरण जैसे- निरक्षरता, आधुनिक तकनीकी के प्रति उदासीनता, आदि कृषि उत्पादकता में कमी के कारण हैं। कृषि क्षेत्र में रोजगार कृत व्यक्ति खराब स्वास्थ्य की वजह से सबसे ज्यादा असंतुष्ट है।up board class 10 social science free solution chapter 41: जनसंख्या (जनसंख्या का घनत्व, वितरण, लिंग अनुपात, बढ़ती जनसंख्या की समस्याएँ, जनसंख्या नियंत्रण के उपाय)
(iii) भूमि की गुणवत्ता में कमी- ग्रामीण क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों की गुणवत्ता में लगातार ह्रास हुआ है। गुणवत्ता में यह हास मुख्यतः दो कारणों से हुआ है। पहला कारण जनसंख्या दबाव है जिसकी वजह से वन क्षेत्रों में कमी हुई है तथा दूसरा कारण भूमि की ऊपरी परत का कटाव है। भूमि की गुणवत्ता में कमी का मुख्य कारण कृषि रसायनों का उपयोग तथा नहर के पानी की खराब गुणवत्ता है। इसकी वजह से भूमि में पोषक तत्वों में कमी हुई है तथा उत्पादकता में कमी दर्ज की गई है।
(iv) सामान्यतः आधारभूत संरचना की सुविधाओं का अभाव, भारत में सड़क, बिजली, ऊर्जा तथा यातायात आदि जैसी आर्थिक आधारभूत संरचनाओं की कमी है। ग्रामीण क्षेत्रों पर होने वाला सरकारी व्यय लगातार कम हुआ है। कृषि क्षेत्रों में पूँजी निर्माण की कमी हुई है। कृषि क्षेत्रों में निवेश जो 1990 में कुल व्यय का 1.92 प्रतिशत था, जो कम होकर 2003 में 1.31 प्रतिशत रह गया है।


संस्थागत कारण::– up board class 10 social science free solution chapter 41: जनसंख्या (जनसंख्या का घनत्व, वितरण, लिंग अनुपात, बढ़ती जनसंख्या की समस्याएँ, जनसंख्या नियंत्रण के उपाय)


(i) खराब भूमि व्यवस्था- भारत में जमींदारी के रूप में प्रचलित भूमि व्यवस्था ने उत्पादकता को कम बनाए रखने में अहम भूमिका अदा की है। जमींदारी प्रथा के कारण कृषकों में भूमि की उत्पादकता बढ़ाने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं था। जमींदारी व्यवस्था के अंतर्गत ज्यादा भूमि लगान, भूमि पट्टे की असुरक्षा और भूमि पर कोई स्वामित्व अधिकार न होने के कारण, कृषकों को अपनी फसल का एक बड़ा हिस्सा जमींदारों को देना पड़ता था। इसके कारण उनके पास संसाधनों की कमी रहती थी और वे कृषि में नयी तकनीकी का प्रयाग करने में असमर्थ रहते थे। कृषि में नयी तकनीकी का प्रयोग न होने के कारण उत्पादकता में कमी बनी रही।
(ii) आर्थिक भूमि वितरण- भारत में औसत भूमि वितरण छोटा है। भूमि का वितरण छोटा ही नहीं है अपितु यह छोटे-छोटे खेतों के रूप में भी बिखरा हुआ है। भारत में औसम भूमि उपलब्धता 2.30 हेक्टेयर है। जब कृषि योग्य खेतों का आकार छोटा हो तो उसमें नयी तकनीकी के प्रयोग की संभावना कम रहती है जिससे भूमि उत्पादकता में कमी होती है।
(iii) वित्त व विपणन सुविधाओं का अभाव- भारत में कृषि के लिए वित्त सुविधाओं का अभाव रहा है। संस्थागत वित्त सुविधाओं में कमी कृषि में उत्पादकता का कम होने का एक महत्वपूर्ण कारण है। यदि हम तथ्यों पर नजर डालें तो यह स्पष्ट है कि 1990 के दशक में कृषि को उपलब्ध संस्थागत वित्त, 1980 के दशक में उपलब्ध वित्तर से कम था। बैंक व अन्य वित्तीय संस्था कृषि को कम ब्याज दर पर ऋण देने के लिए सहर्ष तैयार नहीं रहे। यद्यपि 2003 के पश्चात सभी व्यापारिक बैंकों द्वारा कृषि को दिए जाने वाले ऋण में निरपेक्ष वृद्धि हुई है परंतु इन वर्षों में सबसे खतरनाक प्रवृत्ति जो उभरकर सामने आई वह इन संस्थानों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से दिए जाने में वृद्धि है। कृषि को प्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध वित्त में लगातार कमी हुई है। इस कारण से, कृषकों के एक बड़े समूह को गैर-संस्थागत वित्त पर निर्भर रहना पड़ता है। यह गैर संस्थागत वित्त ज्यादातर उच्च ब्याज दर पर होता है। इससे किसानों की बचत करने की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कृषि अलाभकारी होती जा रही है। क्योंकि वित्त तथा ऋण की कमी है जो भी उपलब्ध है वह ऊँची ब्याज दर पर ही उपलब्ध है तो इस स्थिति में कृषि सुधार कार्यक्रमों में निवेश कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। निवेश की कमी के कारण कृषि उत्पादकता में वृद्धि बहुत कठिन है तथा कृषि उत्पादकता निम्न स्तर पर बनी रहती है।
तकनीकी कारण:- up board class 10 social science free solution chapter 41: जनसंख्या (जनसंख्या का घनत्व, वितरण, लिंग अनुपात, बढ़ती जनसंख्या की समस्याएँ, जनसंख्या नियंत्रण के उपाय)


(i) तकनीकी पिछड़ापन- भारत में ज्यादातर कृषक परंपरावादी तकनीक का प्रयोग करते हैं क्योंकि उनके पास संसाधनों की कमी है अतः वे नयी तकनीक का प्रयोग नहीं कर पाते हैं। उच्च उत्पादकता वाले बीजों व रासायनिक उर्वरक का प्रयोग बहुत ही सीमित है। 1990 के दशक में आर्थिक सुधारों के पश्चात कृषि व अनुसंधान व ट्रेनिंग कार्यक्रमों में सरकारी निवेश कम हुआ जिसके कारण तकनीक की खोज व प्रयोग और भी सीमित हो गए है। कृषि विश्वविद्यालय तथा अन्य संसाधनों की कमी महसूस कर रहे हैं जिसका कृषि उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। कृषक को नई तकनीकी के लिए, सरकारी प्रयासों के अभाव में ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है इसलिए नई तकनीकी को उपयोग में लाने की उसकी क्षमता व इच्छाशक्ति दोनों में ही कमी हो रही है। जिसके कारण कृषि उत्पादकता का स्तर निम्न है।
(ii) आगत लागतों में वृद्धि- उर्वरक, उच्च गुणवत्ता के बीज व कीटनाशकों आदि को मिलने वाली आर्थिक सहायता में लगातार कमी हो रही है। जिसकी वजह से इनकी कीमतों में वृद्धि हो रही है क्योंकि ये कृषि उत्पादन में प्रयोग होने वाले महत्वपूर्ण आगत हैं। जिसके कारण कृषि उत्पादन की लागत में वृद्धि हो रही है। जिसके कारण कृषि लगातार अलाभकारी होती जा रही है। अलाभकारी कृषि का उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है। भारत में उत्पादकता बढ़ाने के लिए सुझाव- भारत में कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए जा सकते हैं Up board class 10 full solution social science chapter 39 ऊर्जा संसाधन (कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस, परमाणु खनिज, जल, वैकल्पिक साधन-उपयोग एवं संरक्षण)

(i) चकबंदी।
(ii) उन्नतशील तथा परिष्कृत बीजों का प्रयोग।
(iii) खेतों में रसायनों एवं कीटनाशकों, कृमिनाशकों तथा खरपतवारनाशकों का उपयोग।
(iv) रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग एवं मिट्टी का परीक्षण करने वाली प्रयोगशालाड़ों की सुविधा।
(v) नवीन कृषि-पद्धतियों का विकास।
(vi) आधुनिक कृषि यंत्रों तथा उपकरणों का प्रयोग।
(vii) बहुफसली कृषि प्रणाली को अपनाया जाना।
(viii) शीतभंडार गृहों की सुविधाओं में वृद्धि।
(ix) सिंचाई सुविधाओं में वृद्धि।
(x) जिसमें गेहूँ, चावल, चना, मटर, मक्का एवं मोटे अनाजों का महत्वपूर्ण स्थान है।

प्रश्न—-5. भारत में चाय अथवा कपास की खेती का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत कीजिए
(क) उपज की भौगोलिक दशाएँ
(ख) उपज के क्षेत्र
उ०- कपास की फसल के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाएँ- भारत में कपास की खेती के लिए सभी आदर्श भौगोलिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जो निम्नलिखित हैंतापमान- कपास उष्ण जलवायु की उपज है। इसके लिए 20° सेल्सियस से 35° सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है। साफ स्वच्छ मौसम और चटक धूप कपास की खेती के लिए सर्वोत्तम है। बादल, कोहरा या धुंध कपास की फसल को हानि पहुंचाते हैं। वर्षा- कपास के पौधों के लिए पर्याप्त नमी की आवश्यकता होती है। पौधों की जड़ों में नमी सदैव बनी रहनी चाहिए, परंतु जल का भरा रहना पौधों को गला देता है। इसकी फसल के लिए 50 सेमी० से 100 सेमी० हल्की, परंतु निरंतर वर्षा की आवश्यकता होती है।
मिट्टी- कपास की खेती करने के लिए अधिक नमी धारण करने की क्षमता रखने वाली उपजाऊ काली मिट्टी सर्वोत्तम होती है। काली मिट्टी उपजाऊ और नमी धारण करने की क्षमता रखने के कारण कपास की मिट्टी कहलाती है।

श्रम- कपास की खेती व्यापारिक स्तर पर करने के लिए कपास के पौधों से कपास चुनने तथा कारखानों तक पहुँचाने के लिए सस्ते श्रमिकों की आवश्यकता होती है। कपास चुनने का कार्य स्त्रियाँ सुगमता से कर लेती हैं। भारत में कपास उगाने वाले क्षेत्र- भारत के विविध क्षेत्रों में कपास की कृषि की जाती है। यहाँ कपास उगाने के लिए प्रसिद्ध राज्य निम्नवत हैं–


(i) महाराष्ट्र- कपास महाराष्ट्र राज्य की प्रमुख नकदी फसल है। यह राज्य भारत की 30% कपास उगाता है। यहाँ नागपुर, शोलापुर, वर्धा, पुणे, नासिक तथा अमरावती जिलों में कपास की खूब खेती की जाती है। कपास के बल पर ही यह राज्य सूती वस्त्र उद्योग का केंद्र बन गया है।


(ii) गुजरात- गुजरात के कृषक बड़े परिश्रम से कपास की खेती करते हैं। यह राज्य देश की 22% कपास उगाने के कारण भारत का दूसरा बड़ा कपास उत्पादक राज्य बन गया है। यहाँ अहमदाबाद, सूरत, भकुँच, तथा औरंगाबाद जिलों में पर्याप्त कपास उगाई जाती है। कपास की खपत के लिए यहाँ पर्याप्त कपड़ा मिलें भी हैं।


(iii) पंजाब- पंजाब उत्तरी भारत का सबसे बड़ा तथा भारत का तृतीय बड़ा कपास उत्पादक राज्य है। यह राज्य भारत की 12% उत्तम कोटि की कपास उगाता है।
(iv) अन्य कपास उत्पादक राज्य- भारत के अन्य कपास उत्पादक राज्यों में हरियाणा, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम तथा मेघालय आदि उल्लेखनीय हैं।
अथवा चाय की फसल के लिए अनुकूल भौगोलिक दशाएँ- चाय के बागान लगाकर चाय की फसल उगाने के लिए निम्नलिखित भौगोलिक दशाओं की आवश्यकता होती है| Up board class 10 full solution social science chapter 39 ऊर्जा संसाधन (कोयला, खनिज तेल, प्राकृतिक गैस, परमाणु खनिज, जल, वैकल्पिक साधन-उपयोग एवं संरक्षण)


तापमान- चाय उष्ण-नम मानसूनी जलवायु की मुख्य फसल है। इसके पौधों के लिए 20° सेल्सियस से 30° सेल्सियस तक सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है। स्वच्छ मौसम और चटकती धूप चाय की झाड़ियों के लिए लाभकारी होते हैं, जबकि कोहरा और पाला इन्हें विशेष हानि पहुँचाते हैं।


वर्षा- चाय की झाड़ियों के लिए 100 सेमी० से 150 सेमी० वर्षा आवश्यक मानी जाती है। वर्षा हल्की और नियमित होती रहनी चाहिए। चाय की झाँड़ियों की जड़ों में पानी रुकना हानिकारक होता है। इसलिए चाय के बागानों की भूमि ढालदार होनी चाहिए। मिट्टी- चाय की झाड़ियाँ लगाने के लिए उपजाऊ और ढालू भूमि सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। पहाड़ी ढालू भूमि में जल नहीं ठहर पाता है, जबकि उपजाऊ मिट्टी पौधों का उत्तम पोषण करती है।


सस्ता श्रम- चाय की खेती श्रम पर आधारित है। चाय की झाड़ियाँ लगाने तथा उनसे वर्ष में दो से तीन बार तक पत्तियाँ चुनने के लिए पर्याप्त संख्या में सस्ते श्रमिकों की आवश्यकता होती है। झाड़ियों से पत्तियाँ चुनने का कार्य स्त्रियाँ बड़े मनोयोग से करती हैं।
पूँजी और तकनीक- चाय की खेती पर्याप्त पूँजी और तकनीक का प्रयोग करके व्यापारिक कंपनियों द्वारा कराई जाती है चाय की पत्तियाँ कारखानों में निश्चित प्रक्रिया से गुजरकर चाय बन पाती है। चाय की खेती प्रायः व्यावसायिक संगठनों द्वारा वैज्ञानिक ढंग से तथा व्यापारिक उद्देश्य से की जाती है। भारत में चाय उत्पादक क्षेत्र- भारत का उत्तर पूर्वी और दक्षिणी क्षेत्र चाय उगाने में अग्रणी हैं। भारत की 53% चाय असम उगाता है। यहाँ सूरमा और ब्रह्मपुत्र नदियों की घाटियों में चाय के बागान लगे हैं। पश्चिम बंगाल भारत की 20% चाय उगाता है। इनके अतिरिक्त तमिलनाडु, केरल, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, मणिपुर तथा अरुणाचल प्रदेश आदि राज्यों में भी चाय उगाई जाती है।

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