up board class 10 social science full solution chapter 37 वर्षा जल संचयन, बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ जल संसाधन

up board class 10 social science full solution chapter 37 जल संसाधन (जल के विभिन्न स्रोत तथा उनकी उपयोगिता, भू-जल रिचार्ज,
वर्षा जल संचयन, बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ (रिहंद, दामोदर घाटी, भाखड़ा नागल, हीराकुंड, नागार्जुन सागर)

up board class 10 social science full solution chapter 37 वर्षा जल संचयन, बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ
up board class 10 social science full solution chapter 37 वर्षा जल संचयन, बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ
पाठ 37     जल संसाधन (जल के विभिन्न स्रोत तथा उनकी उपयोगिता, भू-जल रिचार्ज,
वर्षा जल संचयन, बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ (रिहद, दामोदर घाटी, भाखड़ा नागल, हीराकुंड, नागार्जुन सागर)


प्रश्न——1. भूमिगत जल से क्या तात्पर्य है? इसके उपयोग के दो साधनों का वर्णन कीजिए।
उ०- भूमिगत जल- वर्षा का वह जल जो भूमि द्वारा सोख लिया जाता है और पृथ्वी के अंदर कठोर चट्टानों पर जाकर एकत्र हो

जाता है, भूमिगत जल कहलाता है। उपयोग के साधन- भूमिगत जल को मानव कुआँ, नल व ट्यूबवेल आदि के माध्यम से प्राप्त करके उसका उपयोग घरेलू
कार्यों में, कृषि में तथा उद्योग-धन्धों में करता है।
प्रश्न—— 2. भारत में जल संकट का सामना करने हेतु दो सुझाव दीजिए ।
उ०- भारत में जल संकट का सामना करने हेतु दो सुझाव निम्नवत् हैं
(i) जल संसाधनों के संरक्षण की उचित व्यवस्था करना।
(ii) वर्षा जल का संचयन करके विभिन्न कार्यों में उसका सदुपयोग करना।
प्रश्न——3. नदी घाटी परियोजना के तीन प्रमुख लाभ लिखिए।
उ०- नदी घाटी परियोजनाओं के तीन प्रमुख लाभ निम्नवत् हैं
(i) नदी घाटी परियोजनाओं द्वारा कृत्रिम जलाशयों में विशाल जल राशि को संचित करके विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करना।
(ii) खेतों की सिंचाई के निए नहरों का जाल तैयार करना।
(iii) जल विद्युत शक्तिगृह स्थापित करके जलविद्युत का उत्पादन करना।
प्रश्न—— 4. भारत की किन्ही तीन बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं का एक-एक महत्त्व बताइए।
उ०- परियोजना का नाम (i) रिहंद बाँध परियोजना | (i) इस परियोजना से निकली नहरों ने उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश राज्यों में सिंचाई की सुविधा देकर अनाज के उत्पादन में वृद्धि की है।
(ii) दामोदर घाटी परियोजना |——इस परियोजना ने पश्चिमी बंगाल, बिहार तथा झारखंड राज्यों को दामोदर नदी में आने वाली विनाशकारी बाढ़ों द्वारा होने वाले विनाश से बचाया है।
(iii) भाखड़ा नागल बाँध परियोजना —–इस परियोजना के विद्युतगृहों में 12 लाख किलोवाट बिजली का उत्पादन किया जाता है।

प्रश्न——5. भारत की किन्हीं दो परियोजनाओं के नाम लिखिए तथा उनका महत्व बताइए। उ०- उत्तर के लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या-4 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।
प्रश्न——6. दामोदर घाटी परियोजना से होने वाले तीन प्रमुख लाभ बताइए।
उ०- परियोजना के लाभ- दामोदर घाटी परियोजना पं० बंगाल, बिहार तथा झारखंड राज्यों के लिए बड़ी उपयोगी सिद्ध हुई है। इस परियोजना के प्रमुख लाभ निम्नवत हैं
(i) इस परियोजना ने पं० बंगाल, बिहार तथा झारखंड राज्यों को दामोदर नदी में आने वाली विनाशकारी बाढ़ों द्वारा होने वाले विनाश से बचा दिया है।
(ii) इस परियोजना में निकाली गई नहरें लगभग 8 लाख हेक्टेयर भूमि सींचकर अन्न उत्पादन बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुई हैं।
(iii) इस परियोजना ने इस क्षेत्र में चावल, जूट और गन्ना का उत्पादन कई गुना बढ़ा दिया है।

प्रश्न—-7 जल संसाधन से क्या अभिप्राय है? इसका महत्व भी बताइए।
उ०- जल संसाधन- भूतल पर द्रव, ठोस तथा वाष्प के रूप में उपलब्ध जल को जल संसाधन कहते हैं। वायुमंडल में जल वाष्प के रूप में, भू-पृष्ठ के ऊपर तथा नीचे द्रव के रूप में जल विद्यमान है। पर्वतों के उच्च शिखरों पर जल बर्फ अथवा हिम के रूप में पाया जाता है। महत्व- जल मनुष्यों के साथ-साथ सभी जीवों के जीवन का आधार है। मनुष्य को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पग-पग पर जल की आवश्यकता पड़ती है। उसे केवल पीने के लिए ही नहीं अपितु खाना बनाने, कपड़े धोने, नहाने में भी जल की आवश्यकता होती है। कृषि विकास भी मुख्य रूप से पर्याप्त जलापूर्ति पर ही निर्भर है। पशुपालन, मछलीपालन तथा उद्योग भी जल की उपलब्धता पर ही निर्भर हैं।

प्रश्न—8 बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना से होने वाले तीन लाभ बताइए।
उ०- उत्तर के लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या-3 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।


प्रश्न——9. जल संरक्षण क्या है? इसकी आवश्यकता एवं महत्व पर प्रकाश डालिए।

उ०- जल संरक्षण- जल को सुरक्षित और उपयोगी बनाए रखना ही जल संरक्षण कहलाता है। दूसरे शब्दों में “सीमित जल संसाधनों की उपादेयता बनाए रखते हुए उन्हें भावी उपयोग के लिए संरक्षित करना ही जल संरक्षण कहलाता है।” आवश्यकता एवं महत्व- फसलों में सिंचाई, नगरीय एवं औद्योगिक कार्यों में जल के बढ़ते उपयोग के कारण देश में ताजे जल की कमी बढ़ती जा रही है। भविषय में जल संकट घातक रूप ले सकता है। इसलिए उपलब्ध जल संसाधनों के वैज्ञानितक उपयोग के साथ-साथ उनके संरक्षण की महता आवश्यकता है। समय रहते उपलब्ध जल संसाधनों के संरक्षण से भविष्य में जल संकट से बचा जा सकता है। प्रश्न——10. वर्षा जल संचयन की आवश्यकता और किन्हीं दो उपायों का वर्णन कीजिए। उ०- वर्षा जल संचयन की आवश्यकता- वर्तमान समय में जल संसाधनों की माँग ओर खपत तो बढ़ रही है, परंतु जलीय स्रोतनिरंतर घट रहे हैं। वर्षा का अधिकांश जल व्यर्थ बहकर समुद्र में चला जाता है। इसलिए वर्ष जल संचयन की महती आवश्यकता है, ताकि वर्षा के अपरिमित जल को व्यर्थ में बहकर जाने से रोककर उसे एकत्र करके पुनः प्रयोग में लाया जा सके। वर्षा जल संचयन के उपाय- वर्षा जल संचयन के दो उपाय निम्नलिखित हैं (i) रेनवाटर हार्वेस्टिंग विधि से भवनों की ऊपरी छत पर विशाल टैंक में वर्षा का जल एकत्रित करके उसे पाइपों द्वारा नीचे भूमिगत टैंकों में संचय कर लिया जाता है। इस जल का पुनः चक्रण करके उपयोग में लाया जाता है। (ii) गाँव में तालाबों का निर्माण करवाकर उनमें वर्षा जल का संचयन किया जा सकता है। तालाब का जल ग्रामीणों और पशुओं के लिए जलापूर्ति तो करेगा ही साथ ही भूमिगत जल के स्तर को ऊँचा बनाए रखने में भी सहायक होता है।


up board class 10 social science full solution chapter 37 वर्षा जल संचयन, बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

भारत के जल संसाधनों की विवेचना निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत कीजिए
(क) भूमिगत जल की उपयोगिता (ख) नदी जल का महत्व
उ०- भूमिगत जल की उपयोगिता- भूमिगत जल की उपयोगिता को निम्न बातों से भली-भांति समझा जा सकता है
(i) नमी- भूमिगत जल से नमी बनी रहती है।
(ii) फसलों का पोषण- पृथ्वी पर उगने वाली वनस्पति तथा फसलों का पोषण इसी जल से होता है।
(iii) विविध उपयोग- ऐसे जल को मानव स्वयं, पशुओं के माध्यम से, पम्पिंग सेट से, बिजली की मोटरों आदि के माध्यम से प्राप्त करके उसका उपयोग घरेलू कार्यों में, कृषि में तथा उद्योग-धंधों में करता है।
नदी जल का महत्व-किसी भी देश की भौतिक संरचना एवं उसके प्राकृतिक साधनों में नदियों का महत्वपूर्ण स्थान होता है। नदियों की किस्म और उनकी संख्या पर वहाँ का आर्थिक विकास निर्भर होता है। किसी भी देश की धरती पर जलधाराओं के रूप में बहने वाली नदियाँ मानव शरीर की रक्त-वाहिनी नसों के समान हैं। सामान्य रूप से नदियों के उद्गम स्रोत ऊँचे पहाड़ी भागों व हिमानियों में होते हैं। कुछ नदियाँ झीलों, झरनों व दलदली क्षेत्रों से भी फूटती हैं। हमारे देश के विशाल भू-भाग में एक कोने से दूसरे कोने तक छोटी-बड़ी दस हजार नदियाँ बहती है। संसार में भारत के अतिरिक्त शायद ही कोई ऐसा देश होगा, जहाँ नदियों ने वहाँ के निवासियों के दैनिक व आर्थिक जीवन पर इतना अधिक प्रभाव डाला हो। भारत की नदियाँ प्राचीन काल से ही यहाँ के आर्थिक एवं मानवीय विकास में महान योगदान करती रही हैं। आज भी ये नदियाँ हमारे देश की आर्थिक समृद्धि का एक मुख्य स्रोत बनी हुई हैं। उत्तरी भारत की प्रमुख नदियों में गंगा, रामगंगा, गोमती, बेतवा, सोन, सिन्धु, यमुना, ब्रह्मपुत्र, घाघरा, गण्डक, कोसी, चंबल, सतलुज, व्यास आदि प्रमुख हैं। गंगा नदी गंगोत्री व यमुना नदी यमनोत्री हिमानियों से निकलती है। इन दोनों के उद्गम स्रोत उत्तराखंड में स्थित है। सिन्धु व ब्रह्मपुत्र नदियों के उद्गम स्रोत तिब्बत के पठार पर मानसरोवर झील से हैं। तिब्बत में ब्रह्मपुत्र को सँपू कहा जाता है। दक्षिणी भारत की नदियों में महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, नर्मदा व ताप्ती मुख्य हैं। इनमें नर्मदा व ताप्ती पश्चिम की ओर बहती हुई अरब सागर में गिरती हैं तथा महानदी, गोदावरी, कृष्णा व कावेरी नदियाँ पूर्व की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं।


प्रश्न——2. बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं से आप क्या समझते हैं? इनके उद्देश्यों पर प्रकाश डालिए।
उ०- बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ- स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत के समक्ष उफनती नदियों की जलराशि द्वारा आने वाली बाढ़ों से होने वाले जन-धन के विनाश की समस्या थी। भारत के निर्माताओं ने नदियों के विनाशकारी जल दैत्य को नियंत्रित कर विकास के कार्यों में लगाने की योजनाएँ बनाने की ओर सोचना प्रारंभ किया। इसी सोच और संकल्पना ने राष्ट्र को बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं का उपहार दिया। “नदियों के विनाशकारी जल के अनेक उपयोगी उद्देश्यों की पूर्ति हेतु जो योजनाएँ बनाई गईं, उन्हें बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ कहा गया।” इन योजनाओं से अनेक उद्देश्यों की पूर्ति संभव हो जाने के कारण इन्हें बहुमुखी या बहुउद्देशीय परियोजनाएँ कहा गया। बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाएँ भारत के सर्वागीण आर्थिक विकास हेतु एक क्रांतिकारी कदम है।

बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं के उद्देश्य अथवा लाभ- बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं का निर्माण निम्नलिखित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया गया है
(i) नदियों पर विशाल बाँध बनाकर बाढ़ों पर नियंत्रण करना।
(ii) कृत्रिम जलाशयों में विशाल जलराशि को संचित करके जल की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करना।
(iii) खेतों की सिंचाई के लिए नहरों का जाल तैयार करना।
(iv) जलविद्युत शक्तिगृह स्थापित कर, जलविद्युत का उत्पादन करना।
(v) कृषि क्षेत्र तथा औद्योगिक क्षेत्र को सस्ती जलविद्युत सुलभ करना।
(vi) दलदल को सुखाकर, कृषि योग्य भूमि का क्षेत्रफल बढ़ाना।
(vii) स्थानीय संसाधनों के विकास तथा दोहन की सुविधाएँ जुटाना।
(viii) वृक्षारोपण करके वन क्षेत्र बढ़ाना तथा वनों का उचित तथा नियंत्रित दोहन करना।
(ix) जलाशयों में मछली पालन करके मत्स्य उद्योग को बढ़ावा देना।
(x) जलाभाव तथा सूखाग्रस्त क्षेत्रों को नहरों द्वारा जल पहुँचाना।
(xi) नौका-विहार की सुविधाएँ जुटाकर जल परिवहन की सुविधाओं का विकास करना।
(xii) नगरों के लिए शुद्ध पेयजल आपूर्ति की सुविधाएँ जुटाना। (xiii) बाँधों के निकट पर्यटक स्थल, होटल तथा पार्क विकसित करके पर्यटन को बढ़ावा देना।
(xiv) क्षेत्रीय नियोजन की व्यवस्था कर क्षेत्र के सर्वांगीण विकास पर बल देना।
(xv) राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए संसाधन जुटाना।
प्रश्न——3. बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना क्या है? भारत की किसी एक बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना का वर्णन कीजिए।
उ०- बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना- इसके लिए विस्तृत प्रश्न संख्या-2 के उत्तर का अवलोकन कीजिए। (i) रिहंद बाँध परियोजना- रिहंद बाँध परियोजना उत्तर प्रदेश की एक मात्र बहुउद्देशीय परियोजना है। इस परियोजना का निर्माण 1956 ई० में शुरू किया गया था, जिसे गोविंद बल्लभ सागर परियोजना और रेणुका बहुउद्देशीय परियोजना आदि नामों से भी पुकारा जाता है। सोनभद्र जनपद में रिहंद नदी पर लगभग 934 मीटर लंबा और लगभग 91.5 मीटर ऊँचा विशाल बाँध बनाकर इस योजना को 1966 में पूरा कर राष्ट्र को समर्पित कर दिया गया। इस बाँध के पीछे 460 वर्ग किमी० गोविंद बल्लभ पंत सागर नामक कृत्रिम झील बनाई गई है। यह कृत्रिम जलाशय उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश राज्यों की सीमा पर बनाया गया है। नदी की बाढ़ का जल इसमें लाने के लिए 13 फाटक बनाए गए हैं। इस जलाशय की जलधारण क्षमता 10,608 लाख घन मीटर है। इस परियोजना पर बने बाँध ने नदी के तूफानी जल प्रवाह पर नियंत्रण करके बाढ़ों को रोक दिया है। मुख्य रूप से इस परियोजना का निर्माण जलविद्युत निर्माण के लिए किया गया था।

परियोजना के लाभ- रिहंद बाँध परियोजना से निम्नलिखित लाभ प्राप्त हुए हैं
(i) इस परियोजना में बनने वाली बिजली का उपयोग उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में नलकूप चलाकर सिंचाई करने में किया जाता है। इस परियोजना से निकली नहरों ने उत्तर प्रदेश, बिहार तथा मध्य प्रदेश राज्यों में सिंचाई की सुविधा देकर
अनाज के उत्पादन में भारी वृद्धि कर दी है। रिहंद बाँध परियोजना से मिलने वाली बिजली ने सीमेंट, लोहा, कागज तथा सूती वस्त्र उद्योग का विकास कर दिया है।
(iv) इस परियोजना ने सोन और रिहंद नदी की बाढ़ों के द्वारा होने वाले विनाश से मुक्ति दिला दी है। (v) रेलों के संचालन तथा खनिजों की ढुलाई में योग देकर इस परियोजना ने उत्तर प्रदेश के दक्षिण पूर्वी भाग में
विकास और उन्नति की गंगा बहा दी है।

प्रश्न– 4. दामोदर घाटी अथवा भाखड़ा नांगल बाँध बहुउद्देशीय परियोजना का सविस्तार वर्णन कीजिए।

उ०- दामोदर घाटी परियोजना- पं० बंगाल, बिहार तथा झारखंड राज्यों का शोक कहलाने वाली दामोदर तथा उसकी सहायकनदियों पर 1948 ई० में 8 बाँध बनाए गए। अतीत में दामोदर नदी अपनी भंयकर बाढ़ के लिए कुख्यात रही है। इसकी बाढ़ से लगभग 18,000 वर्ग किमी० भूमि प्रभावित रहती थी। पश्चिम बंगाल और बिहार राज्यों की यह सम्मिलित योजना दामोदर घाटी परियोजना के नाम से विख्यात है। इस परियोजना की व्यवस्था के लिए दामोदर घाटी विकास निगम की स्थापना की गई। इस निगम द्वारा दामोदर नदी की बाढ़ को नियंत्रित करने तथा छोटा नागपुर क्षेत्र के बहुमुखी विकास के लिए दामोदर घाटी परियोजना का निर्माण किया गया। यह विश्व की दूसरी सबसे बड़ी परियोजना है। इस परियोजना में तिलैया, मैथान, कोनार, पंचेत पहाड़ी, बोकारो, बाल पहाड़ी, बर्नपुर व दुर्गापुर नामक स्थानों पर आठ बाँध बनाए गए हैं। up board class 10 social science chapter 34 : प्राकृतिक आपदाएँ

परियोजना के लाभ- दामोदर घाटी परियोजना पं० बंगाल, बिहार तथा झारखंड राज्यों के लिए बड़ी उपयोगी सिद्ध हुई है। इस परियोजना के प्रमुख लाभ निम्नवत हैं
(i) इस परियोजना ने पं० बंगाल, बिहार तथा झारखंड राज्यों को दामोदर नदी में आने वाली विनाशकारी बाढ़ों द्वारा होने वाले विनाश से बचा दिया है।
(ii) इस परियोजना में निकाली गई नहरें लगभग 8 लाख हेक्टेयर भूमि सींचकर अन्न उत्पादन बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुई हैं।
(iii) इस परियोजना ने इस क्षेत्र में चावल, जूट और गन्ना का उत्पादन कई गुना बढ़ा दिया है। (iv) झारखंड राज्य में शहतूत के वृक्षों पर रेशम के कीड़े पालने का धंधा विकसित हुआ है।
(v) इस परियोजना में बनी बिजली ने औद्योगीकरण को सुदृढ़ आधार प्रदान किया है।
भाखड़ा नांगल बाँध परियोजना- यह देश की अब तक की सबसे बड़ी बहुउद्देशीय परियोजना है। पंजाब राज्य में सतलुज नदी के जल को सिंचाई और विद्युत निर्माण के उपयोग में लाने हेतु भाखड़ा नांगल परियोजना का निर्माण किया गया है। यह परियोजना सन् 1969 ई० में बनकर तैयार हुई जिस पर 235 करोड़ रूपए व्यय हुए। इसमें पंजाब के रोपड़ नामक स्थान से 80 किमी० ऊपर उत्तर की ओर ‘भाखड़ा’ नामक गाँव के निकट एक विशाल बाँध बनाया गया है। भाखड़ा बाँध के पीछे विशाल गोविंद सागर नामक कृत्रिम झील में जल एकत्र किया गया है, यह झील 88 किमी० लंबी तथा 2 से 8 किमी० चौड़ी है। इसकी जल धारण क्षमता लगभग 780 हजार हक्टेअर मीटर है। इस बाँध की ऊँचाई 235 मीटर तथा लंबाई 518 मीटर है। यह एशिया महाद्वीप का सबसे ऊँचा बाँध है। भाखड़ा बाँध से 13 किमी० नीचे नांगल नामक दूसरा बाँध बनाया गया है जो 29 मीटर ऊँचा, 315 मीटर लंबा तथा 121 मीटर चौड़ा है। इस बाँध से 64 किमी० लंबी नागल पन-विद्युत नहर निकाली गई है। इस परियोजना में निकाली गई नहरों की कुल लंबाई 4500 किमी० है। इन नहरों से 27 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है। परियोजना के लाभ- भाखड़ा नांगल परियोजना से मुख्य रूप में निम्नलिखित लाभ हुए हैं
(i) भाखड़ा नांगल परियोजना से निकाली गई नहरों ने पंजाब, हरियाणा तथा राजस्थान राज्यों में खेतों की सिंचाई करके कृषि उत्पादन को बढ़ा दिया है।
(ii) सिंचाई की सुविधाएँ बढ़ने से खेतों ने अधिक अन्न उगा कर, सोना पैदा कर दिया है। (iii) इस परियोजना के विद्युत गृहों में लगभग 12 लाख किलोवाट बिजली बनती है। (iv) बिजली का उपयोग नलकूप चलाने, नगरों में प्रकाश करने तथा उद्योग-धंधे चलाने में किया जाता है। (v) नांगल में स्थापित नांगल फर्टिलाइजर का कारखाना उर्वरक बनाने में अग्रणी बन गया है।
(vi) गोविंद सागर झील से मछलियाँ पकड़ी जाती हैं, तथा वन क्षेत्रों से लकड़ी के लठे ढोए जाते हैं।

up board class 10 full solution social science chapter 36 भूमि संसाधन (महत्व, विभिन्न उपयोग, मानव जीवन पर प्रभाव-मृदा के संदर्भ में)
प्रश्न——5. वर्षा जल के संचयन की आवश्यकता क्यों है? इसके संचयन की विधियाँ लिखिए।
उ०- वर्षा जल के संचयन की आवश्यकता- वर्तमान परिस्थितियों में वर्षा जल का संचयन आवश्यक ही नहीं अनिवार्य बन
गया है, अत: वर्षा जल के संचयन की आवश्यकता निम्नलिखित कारणें से है
(i) व्यर्थ बहकर चले जाने वाली वर्षा-जल की अपार राशि को भविष्य के लिए उपभोग में लाने के लिए ।
(ii) क्षेत्र को तीव्रगामी वर्षा जल से होने वाले विनाश, बाढ़ तथा भूक्षरण के प्रकोप से बचाने के लिए। (iii) बढ़ती जनसंख्या को उचित एवं आवश्यक जलापूर्ति कराने के लिए ।
(iv) ग्रीष्म ऋतु में वर्षा के अभाव में पेयजल तथा अन्य आवश्यक कार्यों के लिए जल का उपयोग करने के लिए।
(v) समूचे राष्ट्र को सूखा आपदा के महाविनाश से सुरक्षित बनाए रखने के लिए।
(vi) सड़कों, खाली स्थानों, गलियों तथा नालियों में वर्षा जल के अनावश्यक भराव को रोकने के लिए ।
(vii) भूमिगत जल के भंडार को बढ़ाकर उनका स्तर ऊँचा करने के लिए।
(viii) मृदा क्षरण, बाढ़ तथा जल भराव जैसी घातक समस्याओं का निश्चित समाधान खोजने के लिए।
(ix) भूस्तरीय जलराशियों में जल भंडारण को सुनिश्चित करने के लिए।
(x) वर्ष भर विविध कार्यों हेतु जल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए। वर्षा जल संचयन की विधियाँ ( उपाय )- वर्षा जल संचयन की अनिवार्यता को देखते हुए इसके संचयन हेतु निश्चित उपाय खोजना और अपनाना आवश्यक बन गया है। आज वर्षा जल के संचयन के लिए कई वैज्ञानिक विधियों को अपनाया जा रहा है।
(i) रेनवाटर हार्वेस्टिंग- भवनों की विशाल छतें वर्षा जल संग्रहण का मुख्य स्रोत बन सकती हैं। अतः वैज्ञानिकों ने इन्हीं के
माध्यम से वर्षा-जल का संचयन करने हेतु रेनवाटर हार्वेस्टिंग की विधि खोज निकाली है। इस विधि में भवन की ऊपरी छत पर एक विशाल टैंक में वर्षा का जल एकत्र कर उसे पाइपों द्वारा नीचे भूमिगत टैंक जो जोड़ा जाता है। वर्षा काल में छत पर गिरने वाली संपूर्ण जलराशि भूमिगत टैंक में एकत्र कर ली जाती है। इस जल का पुनः चक्रण करके प्रयोग में लाया जाता है। रेनवाटर हार्वेस्टिंग की यह विधि अस्पतालों, बारातघरों होटलों, विद्यालयों आदि के साथ-साथ आवासीय कालोनियों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त सिद्ध होंगी। इसीलिए नए बनने वाले भवनों के नक्शे बिना रेनवॉटर हार्वेस्टिंग व्यवस्था के पास नहीं किए जाते हैं। रेनवाटर हार्वेस्टिंग योजना जल संसाधनों का विकास, करने में सक्षम होगी।
(ii) गाँवों में तालाबों का पुनर्निमाण- प्राचीन काल में प्रत्येक गाँव में एक तालाब या पोखर अवश्य होता था। जिसके चारों ओर गाँव का सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जन-जीवन फलीभूत होता था। ग्रामीण क्षेत्रों में वर्षा का अतिरिक्त जल इन्हीं तालाबों और पोखरों में एकत्र होकर वर्षभर गाँव के लोगों और पशुओं को जलापूर्ति करता था। राजनीतिक संरक्षण, व्यक्तिगत स्वार्थ और बढ़ते भूमि के मूल्यों ने गाँवों की इस सांस्कृतिक धरोहर को नष्ट कर दिया है। किंतु गाँवों में तालाबों का निर्माण कर या पुराने तालाबों की मरम्मत करवाकर वर्षा जल के संचयन की समुचित व्यवस्था की जा सकती है। तालाब का जल वर्षभर लोगों और पशुओं को जलीय सुविधाएँ तो देगा ही, साथ ही भूमिगत जल के स्तर को भी ऊँचा बनाए रखेगा।
(iii) कुओं का पुनर्भरण- ग्रामीण परिवेश में पेयजल की आपूर्ति का मुख्य स्रोत कुएँ होते थे। किंतु हैंडपंपों, नलकूपों तथा टंकी के पाइपों द्वारा होने वाली जलापूर्ति ने कुओं के अस्तित्व को लील लिया है। गाँव, कस्बों और नगरों में पुराने कुओं को साफ करके उनमें जल पुनर्भरण की व्यवस्था करके वर्षा जल का संचयन किया जा सकता है। कुएँ वर्षभर पेयजल देकर जलाभाव की पूर्ति तथा जल संचयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में सक्षम बन जाएँगे।
(iv) नगरों में सड़कों के निकट गहरे कुएँ बनाना- नगरों में सड़कें, गलियाँ, चौराहे तथा आँगन सभी सीमेंट से बने हुए होने के कारण जल सोखने में असमर्थ हैं, अतः सड़कों के निकट खाली भूमि में जगह-जगह गहरे तथा पक्के कुएँ (टैंक) बनाकर तथा उन्हें भूमिगत पाइपों से जोड़कर व्यर्थ बहकर जाते हुए वर्षा जल का संग्रहण सुविधापूर्वक किया जा सकता है। पाइपों के माध्यम से वर्षा का जल इन कुओं में एकत्र होकर जलभराव की समस्या का सुगम हल निकाल देगा तथा बाद में इस जल को स्वच्छ बना विविध कार्यों में उपयोग में लाया जा सकेगा।
(v) कृषि क्षेत्रों में पक्के टैंक बनाना- गाँवों के विशाल कृषि भूमि क्षेत्रों में चौड़े तथा कम गहरे पक्के टैंक बनाकर नालियों या पाइपों द्वारा वर्षा के जल को एकत्र करने की समुचित व्यवस्था की जा सकती है। इन टैंकों में एकत्र वर्षा का जल सालभर पशुओं को जल पिलाने, कृषि के विविध कार्यों के साथ-साथ खेती की सिंचाई के लिए प्रयुक्त किया जा सकेगा। कृषि क्षेत्रों में बने ये कृत्रिम लघु तालाब वर्षा जल संचयन का उपयोगी साधन बन सकते है।
(vi) कृत्रिम झीलों का निर्माण- मानसूनी वर्षा बड़ी तीव्रगति से घनघोर रूप में होती है अतः उस जल को भूमि सोखने में असमर्थ रहने के कारण अधिकांश वर्षा जल बहकर नदियों में पहुँच जाता है। यह वर्षा जलराशि अपने साथ मिट्टी तथा अन्य अवसाद लाकर नदियों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न कर देती हैं। ह्वांग्हो नदी चीन का शोक और दामोदर नदी बंगाल, बिहार का शोक इसी कारण कही जाती हैं। नदियों पर बाँध बनाकर जल की अतिरिक्त राशि को कृत्रिम झीलों में एकत्र कर विनाशक से हितकारी बनाया जा सकता है। गोविंद सागर झील तथा गोविंद बल्लभ सागर झीलें इसका उदाहरण हैं।

up board class 10 social science chapter 33: भारत की जलवायु


प्रश्न——6. जल संरक्षण क्या है? भारत में जल प्रबंधन के लिए कौन-कौन से उपाय किए गए हैं?
उ०- जल संरक्षण- जल अमूल्य है-जल बचेगा तो धरा पर जीवन बचेगा। जल संरक्षण का सामान्य अर्थ है, “जल को सुरक्षित और उपयोगी बनाए रखना”। दूसरे शब्दों में जल की बरबादी रोकना ही जल संरक्षण है। आइए इसे इस प्रकार समझें, “सीमित जल संसाधनों की उपादेयता बनाए रखते हुए उन्हें भावी उपयोग के लिए संरक्षित करना ही जल संरक्षण कहलाता है।” बढ़ती जनसंख्या तथा वर्षा की अनिश्चितता ने मानव मात्र को जल संसाधनों के महत्व से परिचित कराकर इसके संरक्षण का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। भारत में जल प्रबंधन- जल संसाधनों के उचित संरक्षण तथा जल के राष्ट्रीय बजट के सदुपयोग की व्यवस्था को जल प्रबंधन कहा जाता है। भारत में जल प्रबंधन के क्षेत्र में निम्नलिखित उपाय किए गए हैं
(i) केंद्रीय जल आयोग की स्थापना- भारत में जल प्रबंधन की आधुनिकतम तकनीक स्थापित करने के लिए 1945 ई० में केंद्रीय जल आयोग स्थापित किया गया। इस आयोग ने जल प्रबंधन के लिए नए-नए साधन जुटाए हैं।
(ii) केंद्रीय भू-जल बोर्ड का गठन- भारत सरकार ने केंद्रीय भू-जल बोर्ड की स्थापना 1970 ई० में की थी। जिसका मुख्यालय फरीदाबाद नगर में है। यह बोर्ड जल प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक प्रौद्योगिकी का विकास करता है तथा राष्ट्रीय नीति की निगरानी में उन्हें वितरित करता है।
(iii) राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी- सरकार ने 1980 ई० में राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी बनाकर नदी, घाटियों के जल प्रबंधन की उचित व्यवस्था बनाई है। जिससे सिंचाई की सुविधाएँ बढ़ाई जा रही हैं।
(iv) राष्ट्रीय जल बोर्ड- भारत ने 1990 ई० में राष्ट्रीय जल बोर्ड के माध्यम से राष्ट्रीय जल नीति निर्धारित कर जल प्रबंधन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है।
(v) भू-जल की कृत्रिम भू-जल पुनर्भरण योजना- भारत सरकार ने 2007 ई० में भू-जल की कृत्रिम भू-जल पुनर्भरण योजना प्रारंभ करके जल प्रबंधन के लिए नाबार्ड द्वारा वित्तीय व्यवस्था जुटाने का सद्प्रयास किया है।
(vi) राष्ट्रीय जल नीति का निर्धारण- भारत सरकार ने 2013 ई० में राष्ट्रीय जल नीति बनाकर जल प्रबंधन के लिए नवीनतम प्रौद्योगिकी विकसित करने तथा अपनाने के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम उठाया है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top