Up board class 9 hindi solution chapter 1 बात (गद्य खण्ड)

Up board class 9 hindi solution chapter 1 बात (गद्य खण्ड)

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बात (प्रतापनारायण मिश्र)


अभ्यास (क) लघु उत्तरीय प्रश्न


1– आधुनिक कालीन हिंदी-साहित्य के रचनाकारों की वृहत्त्रयी में किन लेखकों की गिनती होती है ?
उतर — आधुनिक कालीन हिंदी-साहित्य के रचनाकारों की वृहत्त्रयी में भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र की गिनती की जाती है।


2– प्रतापनारायण मिश्र की जन्म-तिथि और जन्म-स्थान के बारे में बताइए।
उतर — प्रतापनारायण मिश्र का जन्म 1856 ई० में उत्तर प्रदेश के बैजे (उन्नाव) नामक गाँव में हुआ था।


3– प्रतापनारायण मिश्र के पिताजी का क्या नाम था और वे मिश्रसे किस तरह की अपेक्षा रखते थे ?
उतर — प्रतापनारायण मिश्र के पिताजी का नाम संकटाप्रसाद था, जो एक प्रसिद्ध ज्योतिषी थे और वे मिश्र जी से अपेक्षा रखते थे | कि वे भी ज्योतिषी बनें।


4– घर में रहकर ही मिश्रजी ने किन-किन भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया ?
उतर — मिश्र जी ने घर में रहकर ही हिंदी, उर्दू, बंगला, फारसी, अंग्रेजी और संस्कृत भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया।


5– प्रतापनारायण मिश्र किस प्रकार साहित्य के संपर्क में आए ?
उतर — मिश्र जी छात्रावस्था से ही ‘कविवचन सुधा’ के गद्य-पद्य-मय लेखों का नियमित पाठ करते थे, जिससे हिंदी के प्रति उनका अनुराग उत्पन्न हुआ। लावनी गायकों की टोली में आशु रचना करने तथा ललित जी की रामलीला में अभिनय करते हुए उनसे काव्य रचना की शिक्षा ग्रहण करने से वे स्वयं मौलिक रचना का अभ्यास करने लगे। इसी बीच वे भारतेंदु जी के संपर्क में आए। उनका आशीर्वाद व प्रोत्साहन पाकर वे हिंदी गद्य तथा पद्य रचना करने लगे।


6– मिश्रजी ने भाषा की किन शैलियों का प्रयोग अपने साहित्य में किया ?किसी एक शैली का उदाहरण दीजिए।
उतर — मिश्र जी ने अपनी भाषा में वर्णनात्मक, विचारात्मक तथा हास्य-विनोद शैलियों का सफल प्रयोग किया है। इनकी शैली को दो प्रमुख प्रकारों में बाँटा जा सकता है— विचारात्मक शैली तथा व्यंग्यात्मक शैली।
व्यंग्यात्मक शैली से संबंधित एक उदाहरण है- “अपाणिपादो जवनो ग्रहीता’ पर हठ करने वाले को यह कह के बातों उड़ावेंगे कि हम लूले-लँगड़े ईश्वर को नहीं मान सकते, हमारा प्यारा तो कोटि काम सुंदर श्याम वर्ण विशिष्ट है।”


7– समय अभाव और सुविधाओं का अभाव होने पर भी मिश्र जी का हिंदी साहित्य में क्या योगदान है ?
उतर — मिश्र जी भारतेंदु मंडल के प्रमुख लेखकों में से एक थे। उन्होंने हिंदी साहित्य की विविध रूपों में सेवा की। वे कवि होने के अतिरिक्त उच्चकोटि के मौलिक निबंध लेखक और नाटककार थे। हिंदी गद्य के विकास में मिश्र जी का बड़ा योगदान रहा है। आचार्य शुक्ल जी ने पं० बालकृष्ण भट्ट के साथ मिश्र जी को भी महत्व देते हुए अपने हिंदी साहित्य के इतिहास में लिखा है-“पं०प्रतापनारायण मिश्र और बालकृष्ण भट्ट ने हिंदी गद्य साहित्य में वही काम किया है, जो अंग्रेजी गद्य साहित्य में एडीसन और स्टील ने किया।”

(ख) विस्तृत उत्तरीय प्रश्न ।
1– प्रतापनारायण मिश्र के जीवन परिचय एवं साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डालिए।
उतर — जीवन परिचय – हिंदी गद्य साहित्य के सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रतापनारायण मिश्र का जन्म 1856 ई० में उत्तर प्रदेश के
बैजे (उन्नाव) नामक गाँव में हुआ। वे भारतेंदु युग के प्रमुख साहित्यकार थे। उनके पिता संकटाप्रसाद एक प्रसिद्ध ज्योतिषी थे और अपने पुत्र को भी ज्योतिषी बनाना चाहते थे। किंतु मिश्र जी को ज्योतिष की शिक्षा रुचिकर नहीं लगी, पिता ने अंग्रेजी पढ़ने के लिए स्कूल भेजा किंतु वहाँ भी उनका मन नहीं रमा। लाचार होकर उनके पिता जी ने उनकी शिक्षा का प्रबंध घर पर ही किया। इस प्रकार मिश्र जी की शिक्षा अधूरी ही रह गई। किंतु उन्होंने प्रतिभा और स्वाध्याय के बल से अपनी योग्यता पर्याप्त बढ़ा ली थी। वह हिंदी, उर्दू और बंगला तो अच्छी तरह जानते ही थे, फारसी, अंग्रेजी और संस्कृत में भी उनकी अच्छी गति थी।

मिश्र जी छात्रावस्था से ही ‘कविवचनसुधा’ के गद्य-पद्य-मय लेखों का नियमित पाठ करते थे, जिससे हिंदी के प्रति उनका अनुराग उत्पन्न हुआ। लावनी गायकों की टोली में आशु रचना करने तथा ललित जी की रामलीला में अभिनय करते हुए उनसे काव्य रचना की शिक्षा ग्रहण करने से वह स्वयं मौलिक रचना का अभ्यास करने लगे।
इसी बीच वह भारतेंदु जी के संपर्क में आए। उनका आशीर्वाद तथा प्रोत्साहन पाकर वह हिंदी गद्य तथा पद्य रचना करने लगे। 1882 के आसपास उनकी रचना ‘प्रेमपुष्पावली’ प्रकाशित हुई और भारतेंदु जी ने उसकी प्रशंसा की तो उनका उत्साह बहुत बढ़ गया। मिश्र जी भारतेंदु जी के व्यक्तित्व से प्रभावित थे तथा उन्हें अपना गुरु और आदर्श मानते थे। ये अपने हाजिरजवाबी एवं विनोदी स्वभाव के लिए प्रसिद्ध थे।

15 मार्च, 1883 को, ठीक होली के दिन, अपने कई मित्रों के सहयोग से मिश्र जी ने ‘ब्राह्मण’ नामक मासिक पत्र निकाला। यह अपने रंग-रूप में ही नहीं, विषय और भाषा-शैली की दृष्टि से भी भारतेंदु युग का विलक्षण पत्र था। सजीवता, सादगी, बाँकपन और फक्कड़पन के कारण भारतेंदुकालीन साहित्यकारों में जो स्थान मिश्र जी का था, वही तत्कालीन हिंदी पत्रकारिता में इस पत्र का था। मिश्र जी परिहासप्रिय और जिंदादिल व्यक्ति थे, परंतु स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही के कारण उनका शरीर युवावस्था में ही रोग से जर्जर हो गया था। स्वास्थ्यरक्षा के नियमों का उल्लंघन करते रहने से उनका स्वास्थ्य दिनों-दिन गिरता गया। 1892 के अंत में वे गंभीर रूप से बीमार पड़े और लगातार डेढ़ वर्षों तक बीमार ही रहे। अंत में 38 वर्ष की अवस्था में 6 जुलाई, 1894 को दस बजे रात में भारतेंदुमंडल के इस नक्षत्र का अवसान हो गया।

साहित्यिक योगदान– प्रतापनारायण मिश्र भारतेंदु के विचारों और आदर्शों के महान प्रचारक और व्याख्याता थे। वह प्रेम को परमधर्म मानते थे। हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान उनका प्रसिद्ध नारा था। समाज-सुधार को दृष्टि में रखकर उन्होंने सैकड़ों लेख लिखे हैं। बालकृष्ण भट्ट की तरह मिश्र जी आधुनिक हिंदी निबंधों की परंपरा को पुष्ट कर हिंदी साहित्य के सभी अंगों की पूर्णता के लिए रचनारत रहे। एक सफल व्यंग्यकार और हास्यपूर्ण गद्य-पद्य-रचनाकार के रूप में हिंदी साहित्य में उनका विशिष्ट स्थान है। मिश्र जी की मुख्य कृतियाँ निम्नांकित हैं


(अ) नाटक– भारत दुर्दशा, गौ-संकट, कलि कौतुक, कलि प्रभाव, हठी हम्मीर, ज्वारी खुआरी
(ब) निबंध संग्रह-निबंध नवनीत, प्रताप पीयूष, प्रताप समीक्षा
(स) अनुदित गद्य कृतियाँ- नीति रत्नावली, कथामाला, संगीत शाकुंतल, सेनवंश का इतिहास, सूबे बंगाल का भूगोल, वर्ण परिचय, शिशु विज्ञान, राजसिंह, राधारानी, चरिताष्टक
(द) काव्य कृतियाँ– प्रेम पुष्पावली, मन की लहर, ब्रैडला-स्वागत, दंगल-खंड, कानपुर महात्म्य, शृंगारविलास, __ लोकोक्ति-शतक, दीवो बरहमन (उर्दू) मिश्र जी भारतेंदु मंडल के प्रमुख लेखकों में से एक थे। उन्होंने हिंदी साहित्य की विविध रूपों में सेवा की। वे कवि होने के अतिरिक्त उच्चकोटि के मौलिक निबंध लेखक और नाटककार थे। हिंदी गद्य के विकास में मिश्र जी का बड़ा योगदान रहा है।


2– पं० प्रतापनारायण मिश्र की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
उतर — भाषा- खड़ीबोली के रूप में प्रचलित जनभाषा का प्रयोग मिश्र जी ने अपने साहित्य में किया। प्रचलित मुहावरों, कहावतों तथा विदेशी शब्दों का प्रयोग इनकी रचनाओं में हुआ है। भाषा की दृष्टि से मिश्र जी ने भारतेंदु जी का अनुसरण किया और जन साधारण की भाषा को अपनाया। भारतेंदु जी के समान ही मिश्र जी की भाषा भी कृत्रिमता से दूर है। वह स्वाभाविक है। पंडिताऊपन और पूर्वीपन अधिक है। उसमें ग्रामीण शब्दों का प्रयोग स्वच्छंदतापूर्वक हुआ है। संस्कृत, अरबी, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी आदि भाषाओं के प्रचलित शब्दों को भी ग्रहण किया गया है। भाषा विषय के अनुकूल है। मुहावरों का जितना सुंदर प्रयोग उन्होंने किया है, वैसा बहुत कम लेखकों ने किया है। कहीं-कहीं तो उन्होंने मुहावरों की झड़ी-सी लगा दी है। शैली- मिश्र जी की शैली में वर्णनात्मक, विचारात्मक तथा हास्य-विनोद शैलियों का सफल प्रयोग किया गया है। इनकी शैली को दो प्रमुख प्रकारों में बाँटा जा सकता है।

विचारात्मक शैली– साहित्यिक और विचारात्मक निबंधों में मिश्र जी ने इस शैली को अपनाया है। इस शैली में प्रयुक्त भाषा संयत और शिष्ट है। वस्तुतः मिश्र जी के स्वभाव के विपरीत होने के कारण इस शैली में स्वाभाविकता का अभाव है।

व्यंग्यात्मक शैली– इस शैली में मिश्र जी ने अपने हास्य-व्यंग्य पूर्ण निबंध लिखे हैं। यह शैली मिश्र जी की प्रतिनिधि शैली है। जो सर्वथा उनके अनुकूल है। वे हास्य और विनोदप्रिय व्यक्ति थे। अतः प्रत्येक विषय का प्रतिपादन हास्य और विनोदपूर्ण ढंग से करते थे। हास्य और विनोद के साथ-साथ इस शैली में व्यंग्य के दर्शन होते हैं। विषय के अनुसार व्यंग्य कहीं-कहीं बड़ा तीखा और मार्मिक हो गया है। इस शैली में भाषा सरल, सरस और प्रवाहमयी है। उसमें उर्दू, फारसी, अंग्रेजी और ग्रामीण शब्दों का प्रयोग हुआ है। लोकोक्तियाँ और मुहावरों के कारण यह शैली अधिक प्रभावपूर्ण हो गई है।


(ग) अवतरणों पर आधारित प्रश्न
1– यदि हम वैद्य ——————– करती रहती है।
संदर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी’ के ‘गद्य खंड’ में संकलित एवं ‘प्रतापनारायण मिश्र’ द्वारा लिखित ‘बात’ नामक शीर्षक से उद्धृत है।
प्रसंग- प्रस्तुत अवतरण में बात के विभिन्न अर्थों को रोचक शैली में प्रस्तुत किया गया है। प्रतापनारायण मिश्र ने बात के संबंध में बात करते हुए आयुर्वेद व भूगोल आदि की भी चर्चा की है।

व्याख्या- मिश्र जी कहते हैं कि यदि हम आयुर्वेद के आधार पर चिकित्सा करने वाले वैद्य होते तो कफ और पित्त से संबंधित बात की चर्चा करते, क्योंकि आयुर्वेद के अंतर्गत शारीरिक रोगों का प्रधान कारण – वात (वायु), कफ और पित्त का असंतुलित हो जाना है। इसी प्रकार भूगोल के ज्ञाता (जानने वाला) जलबात’ की चर्चा करते हुए किसी देश की जलवायु का विवरण प्रस्तुत करते हैं। किंतु यहाँ बात का प्रयोजन न तो आयुर्वेद के वात-पित्त-कफ से है और न ही भूगोल के अंतर्गत अध्ययन की जाने वाली किसी देश की जलवायु से है। बल्कि यहाँ ‘बात’ का तात्पर्य उन वचनों या बातचीत से है, जो बातचीत करते समय हम लोगों के मुख से निकलती है और जिसके द्वारा हम अपने हृदय के भाव (विचार) प्रकट करते हैं अर्थात् पारस्परिक बातचीत के द्वारा ही हम दूसरों के भावों को समझते हैं और उन्हें अपने विचारों को समझाते हैं। प्रश्नोत्तर (अ) उपर्युक्तगद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उतर — पाठ क नाम – बात
लेखक क नाम – प्रतापनारायण मिश्र
(ब) लेखक यदि वैद्य होते तो वह किस बात की बात करते ?
उतर — यदि लेखक वैद्य होते तो वह वात-पित्त-कफ की चर्चा करते।
(स) लेखक यदि भूगोल-वेत्ता होते तो वह किस विषय पर बात करते ?
उतर — यदि लेखक भूगोल-वेत्ता होते तो वह किसी देश की जलवायु पर चर्चा करते।
(द) हम अपने भावों को किस प्रकार अभिव्यक्त करते हैं ?
उतर — हम अपने भावों को बातचीत के द्वारा अभिव्यक्त करते हैं।

2– सच पूछिए ———— जाते हैं
संदर्भ- पूर्ववत् प्रसंग- प्रस्तुत अवतरण में लेखक ने प्राणि-जगत के समस्त जीवधारियों की सर्वोपरि जाति का उल्लेख किया है।
व्याख्या- लेखक के अनुसार बात का प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह बात की ही महिमा है कि मनुष्य जाति को समस्त प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। समस्त प्राणियों में केवल मनुष्य ही भली-भाँति बातें कर सकता है। तोता, मैना आदि कुछ पक्षी भी अनुकरण कर कुछ बातें कर लेते हैं। इसी बात के कारण ही उनको भी अन्य पक्षियों की अपेक्षा श्रेष्ठ एवं आदरणीय माना जाता है। प्रश्नोत्तर
(अ) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उतर — पाठ- बात
लेखक- प्रतापनारायण मिश्र
(ब) मानव जाति सभी जीवधारियों से श्रेष्ठतम क्यों है ?
उतर — समस्त जीवधारियों में केवल मानव जाति ही बात के माध्यम से अपनी भावाभिव्यक्ति करने में समर्थ है, इसलिए
वह समस्त जीवधारियों से श्रेष्ठतम है।
(स) कौन-से पक्षी अन्य नभचर से श्रेष्ठ हैं ?
या कौन-सा गुण उन्हें अन्य नभचारियों से श्रेष्ठ बनाता है ?
उतर — तोता, मैना आदि पक्षी अन्य नभचर से श्रेष्ठ हैं। उनका मनुष्यों की तरह बात करने का गुण उन्हें अन्य नभचारियों
से श्रेष्ठ बनाता है।


3— वेद ईश्वर————— मान रखी है।
संदर्भ- पूर्ववत् प्रसंग- प्रस्तुत अवतरण में बात के महत्व को बताते हुए लेखक ने धर्म के क्षेत्र में बात का महत्व बताया है। व्याख्या- वेद को उसी निराकार ईश्वर का ‘वचन’, कुरान शरीफ को ‘कलाम’ और बाइबिल को उसी निराकार का ‘वर्ड’ (शब्द) कहा जाता है। ‘वचन’, ‘कलाम’, और ‘वर्ड’, ये सभी बात के ही दूसरे नाम या समानार्थी तो हैं। इस प्रकार बात की महिमा के कारण ही हम आकाररहित ईश्वर को भी महत्व प्रदान करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने इसीलिए वाणीविहीन होने पर भी ईश्वर को श्रेष्ठ वक्ता और महान योगी कहा है।
प्रश्नोत्तर
(अ) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उतर — पाठ-बात
लेखक- प्रतापनारायण मिश्र
(ब) इन पंक्तियों में कौन-से शब्द बात शब्द के पर्याय हैं ? उतर—
वचन, कलाम और वर्ड इन पंक्तियों में बात शब्द के पर्याय हैं।
(स) ‘बिन वाणी वक्ता बड़ जोगी’का आशय स्पष्ट कीजिए।
उतर — ‘बिन वाणी वक्ता बड़ जोगी’ से तात्पर्य है- वाणीविहीन होने पर भी ईश्वर श्रेष्ठ वक्ता और योगी है।

4– जब परमेश्वर —– ——- सब बात ही तो हैं।
संदर्भ- पूर्ववत् प्रसंग- लेखक ने ‘बात’ के महत्व पर प्रकाश डालते हुए ईश्वर को भी बात से मुक्त नहीं माना है तथा बात के विविध रूपों का उल्लेख किया है।
व्याख्या- मिश्र जी का कथन है कि जब संसार का निर्माणकर्ता ईश्वर भी बात के प्रभाव से मुक्त नहीं हो सका है तो उसके द्वारा बनाए गए साधारण मनुष्य में भला इतनी शक्ति कहाँ कि वह बात से प्रभावित हुए बिना रह सके। मनुष्य का शरीर ही वात; अर्थात् श्वास के कारण प्राणवान् है। हमारे देश में अनेक प्रकार के शास्त्रों, पुराणों, काव्यों, इतिहास-ग्रंथों एवं कोशग्रंथों की रचना की गई है। इन सभी ग्रंथों में बात का ही विस्तार किया गया है। पुराणों और शास्त्रों में विभिन्न प्रकार की कहानियाँ कही गई हैं तथा दर्शन के तत्वों का उल्लेख किया गया है। इतिहास-ग्रंथों में भी अनेक घटनाओं का वर्णन हुआ है। ये वर्णन भी बात के प्रयोग से ही संभव हुए हैं। काव्य की पुस्तकें भी बात के ही विविध रूपों को अपने में सँजोए हुए हैं। इसके अतिरिक्त शास्त्रों और पुराणों में कही गई बातों को पढ़कर हमारी बुद्धि निर्मल होती है और मन शुद्ध होता है। इनके अध्ययन से चेतना जाग्रत होती है और चित्त ऐसी स्थिति में आ जाता है कि वह लोक और परलोक का चिंतन करने लगता है। इससे यह सिद्ध होता है कि बात का महत्व प्रत्येक क्षेत्र में है। लेखक का कथन है कि बात के वास्तविक स्वरूप का वर्णन नहीं किया जा सकता। जब हम ‘बात’ के संबंध में चर्चा करते हैं तो यह बात पता चलती है कि ईश्वर के असंख्य रूपों की तरह बात के भी असंख्य रूप हैं। कोई बात बड़ी और महत्वपूर्ण होती है तो कोई छोटी और तुच्छ। बात मधुर और मन को छूने वाली भी होती है। इसी प्रकार कुछ बातें भली होती हैं तो कुछ बातें मन को चुभने वाली होती हैं। इस प्रकार बात के अनेक रूप देखे जा सकते हैं।

प्रश्नोत्तर
(अ) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उतर — पाठ- बात
लेखक- प्रतापनारायण मिश्र
(ब) ‘गात माँहि बात करामात है’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
उतर — ‘गात माँहि बात करामात है’ का तात्पर्य है कि मनुष्य के शरीर में तो बात की ही करामात (जादू) है अर्थात् मनुष्य का शरीर श्वास (वायु) के कारण ही प्राणवान् है।
(स) ‘बड़ी बात’ और छोटी बात’ मुहावरों का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उतर — ‘बड़ी बात’ का अर्थ है- इज्जत अथवा प्रतिष्ठावाला होना और छोटी बात का अर्थ है- गलत अथवा अनुचित वचन।
(द) क्या मनुष्य की पहचान बात से होती है ? स्पष्ट कीजिए।
उतर– मनुष्य की पहचान बात से ही होती है, क्योंकि बात ही कहने वाले और सुनने वाले दोनों के मस्तिष्क, बुद्धि और हृदय पर अनोखा प्रभाव डालती है।

5– हमारे तुम्हारे ————- बन जाते हैं।
संदर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग- यह एक हास्य-व्यंग्यप्रधान निबंध है। लेखक ने इस गद्य-खंड में बात के विभिन्न रूपों की चर्चा करने के पश्चात् ‘बात’ के विभिन्न प्रभावों का रोचक वर्णन किया है।

व्याख्या- मिश्र जी कहते हैं कि बात का प्रभाव बहुत व्यापक होता है। बात कहने के ढंग से ही उसका प्रभाव घटता अथवा बढ़ता है। निश्चय ही हमारे बात करने के ढंग से हमारा प्रत्येक कार्य प्रभावित होता है। बात के प्रभावशाली होने पर कवि अथवा चारण, राजाओं से पुरस्कार में हाथी प्राप्त कर लेते थे किंतु कटु बात कहने से राजाओं द्वारा हाथी के पाँव के नीचे कुचलवा भी दिए जाते थे। यह बात भी सिद्ध है कि वात अर्थात वायु-प्रकोप से ‘हाथी-पाँव’ नामक रोग भी हो जाता है। किसी की वाणी से प्रभावित होकर बड़े-बड़े कंजूस भी उदार-हृदय बन जाते हैं और अपनी संपत्ति परोपकार के लिए अर्पित कर देते हैं। इसके विपरीत कटु वाणी के प्रभाव से उदार-हृदय व्यक्ति भी अपने साधनों को समेट लेता है। युद्ध-क्षेत्र में चारणों की ओजपूर्ण वाणी सुनकर कायरों में भी वीरता का भाव उत्पन्न हो जाता है और यदि बात लग जाए तो युद्ध चाहने वाला व्यक्ति भी शांतिप्रिय बन जाता है। बात के प्रभाव से बुरे रास्ते पर चलने वाला व्यक्ति सन्मार्ग पर चलने लगता है और बात की शक्ति द्वारा सन्मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति भी दुष्टों जैसा व्यवहार करने लगता है। तात्पर्य यह है कि बात कहने का ढंग और शब्दों के प्रयोग मनुष्य पर आश्चर्यजनक रूप से प्रभाव डालते हैं।
प्रश्नोत्तर
(अ) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उतर— पाठ-बात
लेखक- प्रतापनारायण मिश्र
(ब) ‘मक्खीचूस’ और ‘कापुरुष’शब्दों के अर्थ लिखिए और उनका वाक्य में प्रयोग कीजिए।
उतर — ‘मक्खीचूस’ का अर्थ है- अत्यधिक कंजूस।
वाक्य प्रयोग- सेठ रतनलाल एक मक्खीचूस व्यक्ति है। ‘कापुरुष’ का अर्थ है- कायर।।
वाक्य प्रयोग – वीरों की संगति से कापुरुष भी वीर बन जाते हैं।
(स) क्या बात के प्रभाव से कुमार्गी सुपथगामी हो सकता है ? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उतर— हाँ, बात के प्रभाव से बुरे मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति सन्मार्ग पर चलने लगता है; जैसे- भगवान बुद्ध की बात की क्ति के प्रभाव से ही बुरे मार्ग पर चलने वाला अंगुलिमाल अच्छे रास्ते पर चलने लगा।
(द) वह कौन-सी चीज है, जो अपनों को पराया कर देती है ?
उतर — वह कटु बात है, जो अपनों को पराया कर देती है।

6– बात का तत्व ——- —— कहना चाहिए।
संदर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग- प्रस्तुत गद्यांश में बात के विभिन्न रूपों और उनके प्रभावों का उल्लेख करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि बात को समझना और समझाना सरल नहीं है।

व्याख्या- बात के सार अथवा वास्तविक स्वरूप को प्रत्येक व्यक्ति नहीं समझ सकता । इसी प्रकार बात तो कोई भी कर सकता है, परंतु ऐसी बात कह देना कि वह दूसरे की बुद्धि पर अपना अधिकार जमा ले, सामान्य व्यक्तियों के वश की बात नहीं है। विलक्षण प्रतिभासंपन्न व्यक्ति ही किसी को अपनी बात से प्रभावित कर सकते हैं। वस्तुत: बात के मर्म या रहस्य को समझना अत्यंत कठिन है। बड़े-बड़े विद्वानों और महाकवियों का समग्र जीवन जीव, जगत् और परमात्मा संबंधी बातों को समझने और अपनी बात दूसरों को समझाने में ही व्यतीत हो जाता है। जो लोग सद्भावना वाले होते हैं; अर्थात् जिनके हृदय में प्राणियों के प्रति प्रेम, करुणा, स्नेह और सहयोग का भाव होता है, उनकी बातें अत्यधिक आनंददायी प्रतीत होती हैं।
यहाँ तक कि उनकी बातों की तुलना में संसार का समस्त सुख और ऐश्वर्य तुच्छ लगने लगता है। इसी प्रकार बालकों की मन हर्षाने वाली तोतली बातें, सुंदर नारियों की प्रिय और मधुर बातें, श्रेष्ठ कवियों की मनोहारी काव्य-पंक्तियाँ तथा श्रेष्ठ वक्ताओं की प्रभावपूर्ण बातें भी व्यक्ति को आनंदित करती हैं। इस प्रकार की आनंददायी बातों से भी जिनका हृदय प्रभावित न हो, उन्हें तो पशु से भी हीन अथवा पत्थर का टुकड़ा ही कहना चाहिए।
प्रश्नोत्तर
(अ) उपर्युक्तगद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उतर — पाठ- बात
लेखक-प्रतापनारायण मिश्र। (ब) कवियों और विद्वानों का जीवन किस प्रकार व्यतीत होता है ?
उतर — कवियों और विद्वानों का जीवन संसार की गूढ़ बातों को समझने और दूसरों के जीवन को सफल बनाने वाली बातों को समझने में व्यतीत होता है।
(स) किन लोगों को पशु नहीं पाषाणखंड कहना चाहिए ?
उतर — जिन लोगों के मन को बच्चों की मधुर तोतली बातें, स्त्रियों की प्यारी मीठी बातें, कवियों की रसपूर्ण
बातें और विद्वान की प्रभावपूर्ण जीवनोपयोगी बातें आनंदित नहीं करती हैं, उन्हें पशु नहीं पाषाणखंड कहना चाहिए।
(द) ऐसों-वैसों का क्या साध्य नहीं है ?
उतर — अपनी बातों से दूसरों की बुद्धि पर प्रभाव जमाकर उन पर अपना शासन करना ऐसों-वैसों का साध्य नहीं है।

7– हमारे परम पूजनीय ————–लिखी रहेगी।
संदर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग- प्रस्तुत अवतरण में भारत के प्राचीन सांस्कृतिक गौरव का वर्णन किया गया है। मिश्र जी ने बताया है कि प्राचीनकाल में लोग वचन-पालन को सर्वाधिक महत्व देते थे परंतु वर्तमान युग में वचन का कोई महत्व नहीं रह गया है।

व्याख्या- हमारे पूर्वज अपने वचन के पक्के होते थे। अपने वचन से वह तनिक भी नहीं डिगते थे। वचन के सामने वे शरीर, स्त्री, पुत्र, धन, भूमि आदि सभी वस्तुओं को तिनके के समान तुच्छ समझते थे। अपने वचन का पालन करने के लिए आर्यगण इन सब वस्तुओं का मोह त्याग देते थे। सत्यवादी हरिश्चंद्र ने अपने वचनों का पालन करने के लिए राज-पाट, पुत्र, स्त्री, स्वजन आदि का त्याग कर दिया था। वचन-पालन का महत्व समझाते हुए मिश्रजी ने एक काव्य-पंक्ति का प्रयोग किया है, जिसका तात्पर्य है कि पुत्र प्राणों से अधिक प्यारा होता है और प्राण पुत्र से भी अधिक प्रिय होते हैं किंतु राजा दशरथ ने अपने वचन का पालन करने के लिए दोनों का त्याग कर दिया था। उन्होंने अपने वचनों का पालन करने के लिए अपने प्राणों से भी प्रिय पुत्र को त्याग दिया था, क्योंकि उन्होंने अपने वचन को तोड़ना अपनी मर्यादा के विरुद्ध समझा था। हमारा इतिहास इस प्रकार के अनेक उदाहरणों से भरा हुआ है। अपने वचनों का निर्वाह करने के कारण ही हमारे पूर्वजों का यश सर्वत्र फैला हुआ है और उनकी कीर्ति संसार-पटल पर स्वर्ण-अक्षरों में अंकित है।
प्रश्नोत्तर-
(अ) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उतर — पाठ- बात
लेखक- प्रतापनारायण मिश्र
(ब) ‘तनतिय तनय धाम धन धरनी।सत्यसंध कहँतृन सम बरनी’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उतर — इसका अर्थ है कि हमारे पूर्वज आर्य अपने वचनों की रक्षा के लिए स्त्री, पुत्र, घर, धन, पृथ्वी को भी तृण के समान
त्याग देते थे। (स) दशरथ ने ऐसा क्या किया कि उनकी कीर्ति स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गई ?
उतर— दशरथ ने अपने प्राणों से प्रिय पुत्र और पुत्र से प्रिय प्राण दोनों को अपने वचनों की रक्षा के लिए त्याग दिया। उनकी यह कीर्ति स्वर्णाक्षरों में अंकित है।
(द) प्राचीन काल में बात का क्या महत्व था ? सोदाहरण बताइए।
उतर — प्राचीन काल में लोग अपने वचन का पालन करने के लिए प्राण भी न्योछावर कर देते थे। महाराज दशरथ के जीवन से यह बात स्पष्ट होती है।

8– पर आजकल—– —— पापी पेट के लिए।
संदर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग- लेखक ने स्पष्ट किया है कि प्राचीनकाल में हमारे पूर्वज अपने वचनपालन के लिए प्राणों की भी चिंता नहीं करते थे। इसी प्रसंग में लेखक ने आधुनिक युग के लोगों पर व्यंग्य भी किया है।

व्याख्या- आज कलियुगी लोग वचन पालन को उतना महत्व नहीं देते, जितना प्राचीनकाल में हमारे पूर्वज दिया करते थे। वचन पालन को गंभीरता से न लेने के लिए लोग यह तर्क देते हैं कि आदमी की जुबान और गाड़ी का पहिया चलताफिरता ही अच्छा लगता है। यह कथन उन्हीं स्वार्थी लोगों का है, जिनके लिए जाति, देश और संबंधों का कोई महत्व नहीं होता। महत्व होता है तो केवल धन का, जिसके लिए वे अपनी बात को हजार बार भी बदलें तो कम है। जिस देश की प्राचीन संस्कृति गौरवमयी हो उस देश के नागरिक अपने चरित्र से इतने गिर जाएँ कि वे प्रत्येक कार्य स्वार्थपूर्ति के लिए ही करें तो इससे अधिक लज्जा की बात और क्या हो सकती है। प्रायः अपने अधिकारी को प्रसन्न करने के लिए लोग अपनी बात को तुरंत बदल देते हैं। देशहित की कामना अथवा समाज-कल्याण के लिए कभी-कभी वचनों में की गई हेरा-फेरी भी बुरी नहीं है, क्योंकि इसके पीछे एक अच्छा उद्देश्य छिपा रहता है। इसके विपरीत अपने पेट के लिए अथवा अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए अपने वचनों का पालन न करना अत्यंत निंदनीय कार्य है।
प्रश्नोत्तर–
(अ) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
उतर — पाठ- बात
लेखक- प्रतापनारायण मिश्र
(ब) ‘मर्द की जबान और गाड़ी का पहिया चलता-फिरता ही रहता है’ से लेखक का क्या आशय है ?
उतर — ‘मर्द की जबान और गाड़ी का पहिया चलता-फिरता ही रहता है’ से आशय है कि कुछ निम्नस्तरीय लोग परिस्थितियों के अनुरूप अपने स्वार्थ के लिए अपनी बातों को बदलते रहने अथवा कुछ भी उल्टा-सीधा कहते रहने में अपनी शान समझते हैं, भले ही वे अपने द्वारा कही गई बातों में से एक भी बात को पूरा न करते हों।
(स) बातों में मन के अनुसार परिवर्तन किस स्थिति में उचित नहीं है ?
उतर — अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए मन के अनुसार बातों में परिवर्तन उचित नहीं है।
(द) ‘जात्युपकार’ तथा देशोद्धार’ में संधि विच्छेद कीजिए।
उतर — जात्युपकार – जाति + उपकार
देशोद्धार – देश + उद्धार

(ग) वस्तुनिष्ठ प्रश्न
1– प्रतापनारायण मिश्र किस युग के लेखक हैं ?
(अ) छायावादी युग (ब) भारतेंदु युग (स) छायावादोत्तर युग (द) द्विवेदी युग
2– भारतेंदु हरिश्चंद्र को अपना गुरु मानते थे(अ) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(ब) जयशंकर प्रसाद (स) प्रतापनारायण मिश्र (द) काका कालेलकर
3– मिश्र जी का प्रचलित कहावतों पर आधारित निबंध कौन-सा है ?
(अ) बात (ब) दाँत (स) समझदार की मौत (द) बुढ़ापा
4– प्रतापनारायण मिश्र ने किस पत्र का सफलतापूर्वक संपादन किया ?
(अ) मर्यादा (ब) ब्राह्मण (स) इंदु (द) सरस्वती
5– ‘बात’मिश्रजी की किस शैली का निबंध है ?
(अ) गंभीर विचारात्मक (ब) विवेचनात्मक (स) विवरणात्मक और विवेचनात्मक (द) हास्य व्यंग्यपूर्ण वनोदात्मक (ड– ) व्याकरण एवं रचनाबोध ।

1– निम्नलिखित मुहावरों और कहावतों का अर्थ लिखकर उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए
बात आ पड़ना ( किसी कार्य का उत्तरदायित्व आना)- जब बात आ पड़ी तो मुझे मंच का संचालन सँभालना ही पड़ा।

बात जाते रहना (प्रतिष्ठा का समाप्त हो जाना)- अपने व्यवहार के कारण वर्तमान समय में नवाबों की बात जाती रही।

बात की बात (इज्जत के लिए किसी बात पर अटल रहना)- राम ने बात की बात में शिव का धनुष तोड़ डाला।

बात जमना ( विश्वसनीयता स्थापित होना)- राम को श्याम की बात जम गई, इसलिए वह साझे में व्यापार करने के लिए तैयार हो गया।

बात का बतंगड़ बनाना ( साधारण-सी बात को विवादास्पद बनाना)- बात का बतंगड़ बनते देर नहीं लगती, अतः हमें सोच समझकर बोलना चाहिए।

बातें बनाना (बढ़-चढ़कर कहना)- आजकल के नेता चुनाव के समय बहुत बातें बनाते हैं, किंतु जीतने के बाद शक्ल भी नहीं दिखाते।

बात बनना (काम बनना)- यदि आप प्रधानाचार्य से मेरी सिफारिश कर दें तो मेरी बात बन जाएगी।

बात बिगड़ना (काम बिगड़ जाना)- आपस की फूट से निश्चित रूप से बात बिगड़ ही जाती है।

बातों में उड़ाना (गंभीरता से न लेना)- रावण ने राम की चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया और उसे बातों में उड़ा दिया।

मक्खीचू (कंजूस होना)- श्याम धनी व्यक्ति है परंतु वह अत्यावश्यक कार्यों के लिए भी धन खर्च नहीं करता क्योंकि वह बहुत मक्खीचूस है।

उँगलियों पर गिनने भर को (संख्या में कम होना)- रामप्रसाद की पुत्री के विवाह में उँगलियों पर गिनने भर को मेहमान पहुँचे।

बड़ी बात होना (बात का महत्वपूर्ण होना)- राधा का PCS की परीक्षा उत्तीर्ण करना एक बड़ी बात है।

हाथ समेट लेना (पीछे हट जाना)- धनीराम ने जगत सेठ की काफी मदद की थी। परंतु जब धनीराम को अपनी लड़की
की शादी में धन की आवश्यकता पड़ी, तो जगत सेठ ने अपने हाथ समेट लिए।

2– निम्नलिखित पदों का समास विग्रह करके समास का नाम लिखिए
समस्तपद विग्रह समास का नाम
कुमार्गी———- गलत मार्ग पर चलने वाला ——- उपपद तत्पुरुष समास
सुपथ———- — सही मार्ग——————- —- कर्मधारय समास
कापुरुष ———— कायर है जो पुरुष———- कर्मधारय समास
आजकल———– आज और कल—————— द्वंद्व समास
अपाणिपाद———— बिना हाथ-पैर वाला———– तत्पुरुष समास
पाषाणखंड————– पाषाण का खंड—————- तत्पुरुष समास
यथासामर्थ्य ———— सामर्थ्य के अनुसार————- अव्ययीभाव समास
3– निम्नलिखित पदों का सनियम संधि विच्छेद कीजिए
संधि शब्द ———————— संधि विच्छेद——————- नियम
धर्मावलंबी ———— धर्म + अवलंबी—————- अ+अ = आ
मनोहर ————— मनः + हर—————– न:+ह = नोह
कवीश्वर ————कवि + ईश्वर————इ+ ई = ई
निराकार———— निः + आकार———— निः + आ = निरा
शुकसारिकादि ——-शुकसारिका + आदि——आ + आ = आ
जात्युपकार———— जाति + उपकार————इ+उ = यु
युद्धोत्साही ————युद्ध + उत्साही————अ+ उ = ओ
निरवयव———— निः + अवयव————निः + अ = निर
परमेश्वर ————परम + ईश्वर————अ+ई = ए
विदग्धालाप ————विदग्ध + आलाप————अ+ आ = आ

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