Up board social science class 10 chapter 23 सर्वोच्च न्यायालय

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इकाई-1 (ख) : भारतीय न्याय व्यवस्था                                पाठ-23  सर्वोच्च न्यायालय


लघुउत्तरीय प्रश्न
प्रश्न–1. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति कौन करता है? इसके लिए क्या अर्हताएँ निर्धारित की गई हैं?
उ०- सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति में निम्नलिखित अर्हताएँ होनी चाहिए
(i) वह भारत का नागरिक हो।
(ii) वह 65 वर्ष से कम आयु का हो।
(iii) वह कम से कम 5 वर्ष तक किसी भी उच्च न्यायालय में न्यायाधीश रह चुका हो।
(iv) वह किसी उच्च न्यायालय में 10 वर्ष तक अधिवक्ता के रूप में कार्य कर चुका हो।
(v) वह राष्ट्रपति की दृष्टि से कुशल-विधिवेता हो ।
प्रश्न–2. सर्वोच्च न्यायालय के प्रारंभिक क्षेत्राधिकारों का वर्णन कीजिए ।
उ०- सर्वोच्च न्यायालय के प्रारंभिक क्षेत्राधिकार- सर्वोच्च न्यायालय के प्रारंभिक क्षेत्राधिकार के अंतर्गत वे अधिकार सम्मिलित किए गए हैं, जो अन्य किसी न्यायालय को प्राप्त नहीं हैं। वह उन विवादों पर विचार करता है, जिन पर अन्य कोई भी न्यायालय विचार नहीं करता। संविधान के अनुच्छेद 131 में वर्णित निम्नलिखित विवाद सीधे सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए जाते हैं
(i) भारत सरकार तथा एक या एक से अधिक राज्यों के मध्य उत्पन्न विवाद ।
(ii) वे विवाद, जिनमें एक ओर भारत सरकार तथा एक या एक से अधिक राज्य दूसरी ओर हों ।
(iii) वे विवाद, जो दो या दो से अधिक राज्यों के मध्य हो।
(iv) वे विवाद, जिनका संबंध संविधान या कानून की व्याख्या से जुड़ा हुआ हो।
मौलिक अधिकारों के हनन से संबंधित विवाद। सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए उचित आदेश,
निर्देश दे सकता है या लेख पत्र जारी कर सकता है।
प्रश्न– 3. सर्वोच्च न्यायालय की चार प्रमुख शक्तियों का उल्लेख कीजिए।
उ०- सर्वोच्च न्यायालय की चार प्रमुख शक्तियाँ निम्न प्रकार हैं
(i) संविधान की व्याख्या और सुरक्षा- संविधान की धारा के विषय में मतभेद हो जाने पर उसकी अंतिम व्याख्या करने
का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को है। इस प्रकार संविधान की मूल भावना की सुरक्षा होती है।
(ii) मौलिक अधिकारों की रक्षा- सर्वोच्च न्यायालय व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करता है।
वह मौलिक अधिकारों का हनन होने पर (i) बंदी प्रत्यक्षीकरण, (ii) परमादेश, (iii) प्रतिषेध, (iv) अधिकार पृच्छा, (v) उत्प्रेषण-लेख जारी कर उन्हें सुरक्षा प्रदान करता है। परंतु संकटकाल में मौलिक अधिकारों को लागू करवाने के सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार को राष्ट्रपति स्थगित कर सकता है।
(iii) राष्ट्रपति को कानूनी परामर्श देना- अनुच्छेद 143 के अनुसार राष्ट्रपति किसी भी सार्वजनिक महत्व के विषय
अथवा कानूनी उलझन पड़ने पर सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श माँग सकता है। परंतु सर्वोच्च न्यायालय अपनी राय देने
के लिए बाध्य नहीं है और न ही राष्ट्रपति उस परामर्श को मानने के लिए बाध्य है।
(iv) न्यायिक पुनरावलोकन- सर्वोच्च न्यायालय अपने निर्णयों पर पुनर्विचार भी करता है, जिसे न्यायिक पुनरावलोकन कहते हैं। इस व्यवस्था में कानूनी त्रुटि को सुधारा जा सकता है।


प्रश्न–4. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का कार्यकाल कितना है? उन्हें उनके पद से कैसे हटाया जा सकता है?
उ०- सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक ही अपने पद पर कार्यरत रहते हैं। यदि आयु के विषय में कोई मतभेद हो जाए तो संविधान के 15 वें संशोधन के अनुसार राष्ट्रपति का निर्णय अंतिम होगा। इस आयु सीमा के पूर्ण होने से पूर्व वह स्वयं पद त्याग सकता है। अयोग्यता या दुराचार के आधार पर संसद के दो-तिहाई बहुमत से महाभियोग पारित करके उसे पद से हटाया जा सकता है।
प्रश्न–5. न्यायिक पुनरावलोकन से क्या तात्पर्य है? इस शक्ति का प्रयोग किस न्यायालय द्वारा किया जाता है?
उ०- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करने की प्रक्रिया को न्यायिक पुनरावलोकन कहते हैं। न्यायिक पुनरावलोकन शक्ति का प्रयोग भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया जाता है। इस शक्ति के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय कानून की संवैधानिकता की जाँच कर सकता है कि कानून संविधान के अनुकूल है या प्रतिकूल।
प्रश्न–6. भारत का सर्वोच्च न्यायालय किस प्रकार नागरिकों के मूल अधिकारों का संरक्षण करता है?
उ०- भारत का सर्वोच्च न्यायालय मूल अधिकारों का हनन होने पर (i) बंदी प्रत्यक्षीकरण, (ii) परमादेश, (iii) प्रतिषेध, (iv) अधिकार पृच्छा, (v) उत्प्रेक्षण-लेख आदि जारी करके उनकी सुरक्षा करता है।
प्रश्न– 7. सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का रक्षक क्यों कहा गया है?
उ०- सर्वोच्च न्यायालय नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा बंदी प्रत्यक्षीकरण परमादेश, प्रतिभेद अधिकार पृच्छा एवं उत्प्रेषण लेख जारी करके करता है, इसलिए सर्वोच्च न्यायालयों को संविधान का रक्षक कहा जाता है।
प्रश्न–8. संविधान में न्यायपालिका को स्वतंत्र बनाए रखने के लिए क्या उपाय किए गए हैं ?
उ०- संविधान में न्यायापालिका को स्वतंत्र बनाए रखने निम्नलिखित उपाय किए गए हैं
(i) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत का राष्ट्रपति उनकी योग्यता के आधार पर नियमानुसार करता है, जिससे वे बाह्य दबाव से मुक्त रहें।
(ii) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को उनके पद से हटाने के लिए महाभियोग की कठोर प्रक्रिया है, अत: वे अपनी अवधि पूरी होने तक सेवा सुरक्षा के प्रति निश्चित बने रहते हैं।
(iii) न्यायाधीशों को वेतन तथा भत्ते संचित निधि से दिए जाते हैं, उनमें कोई कटौती करने का प्रावधान नहीं रखा गया है।
(iv) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक निर्बाध रूप से सेवा में बने रहते हैं।
(v) सर्वोच्च न्यायालय का कोई भी न्यायाधीश सेवानिवृत होने के बाद वकालत नहीं कर सकता, ताकि बाद में वह अन्य
न्यायाधीशों को प्रभावित न कर सके।
(vi) सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों पर संसद में कोई वाद-विवाद नहीं किया जा सकेगा। इससे वह कार्यपालिका के दबाव
से वंचित रहेगा।
(vii) सर्वोच्च न्यायालय अपनी अवमानना करने वाले व्यक्ति को दोषी मानकर दंड दे सकता है।

Up board social science class 10 chapter 23 सर्वोच्च न्यायालय

  • विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
    प्रश्न–1. उच्चतम न्यायालय के संगठन, शक्तियों एवं कर्तव्यों (कार्यों ) का वर्णन कीजिए।
    उ०- सर्वोच्च न्यायालय का संगठन (रचना)- भारत का सर्वोच्च न्यायालय मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीशों से
    मिलकर बनता है। इस न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति भारत का राष्ट्रपति करता है। वह मुख्य न्यायाधीश से परामर्श कर अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति कर, सर्वोच्च न्यायालय के गठन का कार्य पूर्ण करता है। जनवरी, 2009 में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या 25 से बढ़ाकर 30 कर दी गई है। अतः अब सर्वोच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश व 30 सहायक न्यायधीश हैं। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति वरिष्ठता को ध्यान में रखकर की जाती है। कार्यकाल- सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक ही अपने पद पर कार्यरत होते हैं। यदि आयु के विषय में कोई मतभेद हो जाए तो संविधान के 15 वें संशोधन के अनुसार राष्ट्रपति का निर्णय अंतिम होगा। इस आयु सीमा के पूर्ण होने से पूर्व वह स्वयं पद त्याग सकता है। अयोग्यता या दुराचार के आधार पर संसद के दो-तिहाई बहुमत से महाभियोग पारित करके उसे पद से हटाया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की योग्यताएँ- सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिए
    (i) वह भारत का नागरिक हो।
    (ii) वह 65 वर्ष से कम आयु का हो।
    (iii) वह कम से कम 5 वर्ष तक किसी भी उच्च न्यायालय में न्यायाधीश रह चुका हो।
    (iv) वह किसी उच्च न्यायालय में 10 वर्ष तक अधिवक्ता के रूप में कार्य कर चुका हो।
    (v) वह राष्ट्रपति की दृष्टि में कुशल-विधिवेत्ता हो। सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार एवं कार्य- सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार और शक्तियाँ निम्नलिखित हैं(i) प्रारंभिक क्षेत्राधिकार- सर्वोच्च न्यायालय के प्रारंभिक क्षेत्राधिकार के अंतर्गत वे अधिकार सम्मिलित किए गए हैं, जो अन्य किसी न्यायालय को प्राप्त नहीं हैं। वह उन विवादों पर विचार करता है, जिन पर अन्य कोई भी न्यायालय विचार नहीं करता। संविधान के अनुच्छेद 131 में वर्णित निम्नलिखित विवाद सीधे सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए जाते हैं
    (क) भारत सरकार तथा एक या एक से अधिक राज्यों के मध्य उत्पन्न विवाद।
    (ख) वे विवाद, जिनमें एक ओर भारत सरकार तथा एक या एक से अधिक राज्य दूसरी ओर हों।
    (ग) वे विवाद, जो दो या दो से अधिक राज्यों के मध्य हो।
    (घ) वे विवाद, जिनका संबंध संविधान या कानून की व्याख्या से जुड़ा हुआ हो।
    (ङ) मौलिक अधिकारों के हनन से संबंधित विवाद। सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए उचित
    आदेश, निर्देश दे सकता है या लेख पत्र जारी कर सकता है।
    (च) राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के चुनाव से संबंधित विवाद। इस विषय में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय ही अंतिम होता है।
    (ii) अपीलीय क्षेत्राधिकार- वे विवाद, जो सीधे सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख नहीं लाए जा सकते, वह अधीनस्थ न्यायालय के निर्णयों के विरुद्ध अपील के रूप में यहाँ प्रस्तुत किए जाते हैं। अपीलें संवैधानिक, फौजदारी तथा दीवानी सभी प्रकार की हो सकती हैं। सर्वोच्च न्यायालय में अपीलें करने की शर्ते निम्नलिखित हैं
    (क) संविधान के अनुच्छेद 132 के अनुसार यदि उच्च न्यायालय किसी मुकदमे के विषय में यह प्रमाणित कर दे कि
    मुकदमे की किसी धारा में कानून का महत्वपूर्ण प्रश्न छिपा है, तब उसकी अपील सर्वोच्च न्यायालय में की जा सकती है।
    (ख) संविधान के अनुच्छेद 133 के अनुसार दीवानी के मुकदमों की अपीलें सर्वोच्च न्यायालय में की जा सकती हैं,
    यदि उच्च न्यायालय ने मुकदमें के विषय में यह प्रमाणपत्र दे दिया है कि मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय में सुनने योग्य है।
    (ग) संविधान के अनुच्छेद 134 के अनुसार निम्नलिखित फौजदारी मुकदमों में उच्च न्यायालय के निर्णयों के
    विरुद्ध, सर्वोच्च न्यायालय को अपीलें सुनने का अधिकार है(अ) किसी निचले न्यायालय से बरी किए गए अपराधी को उच्च न्यायालय ने मृत्युदंड दे दिया हो।
  • (ब) उच्च न्यायालय ने निचले न्यायालय से विवाद अपने पास मँगा लिया हो तथा उसमें आरोपित को दोषी मानकर मृत्युदंड दिया हो।
  • (स) किसी मुकदमे को उच्च न्यायालय यह प्रमाणपत्र दे दे, कि यह मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने के योग्य है।
    (द) सर्वोच्च न्यायालय किसी फौजदारी मुकदमे में स्वयं ही अपील करने की आज्ञा प्रदान कर दे।
  • (य) संविधान का अनुच्छेद 136 सर्वोच्च न्यायालय को यह विशेष अधिकार प्रदान करता है कि उच्चतम न्यायालय किसी भी उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील सुन सकता है। परंतु सैनिक न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती।
    (iii) संविधान की व्याख्या और सुरक्षा- संविधान की धारा के विषय में मतभेद हो जाने पर उसकी अंतिम व्याख्या करने
    का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को है। इस प्रकार संविधान की मूल भावना की सुरक्षा होती है।
    (iv) मौलिक अधिकारों की रक्षा- सर्वोच्च न्यायालय व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करता है।
    वह मौलिक अधिकारों का हनन होने पर (i) बंदी प्रत्यक्षीकरण, (ii) परमादेश, (iii) प्रतिषेध, (iv) अधिकार पृच्छा, (v) उत्प्रेषण-लेख जारी कर उन्हें सुरक्षा प्रदान करता है। परंतु संकटकाल में मौलिक अधिकारों को लागू करवाने के सर्वोच्च
    न्यायालय के अधिकार को राष्ट्रपति स्थगित कर सकता है।
  • (v) राष्ट्रपति को कानूनी परामर्श देना- अनुच्छेद 143 के अनुसार राष्ट्रपति किसी भी सार्वजनिक महत्व के विषय
    अथवा कानूनी उलझन पड़ने पर सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श माँग सकता है। परंतु सर्वोच्च न्यायालय अपनी राय देने
    के लिए बाध्य नहीं है और न ही राष्ट्रपति उस परामर्श को मानने के लिए बाध्य है।
    (vi) न्यायिक पुनरावलोकन- सर्वोच्च न्यायालय अपने निर्णयों पर पुनर्विचार भी करता है, जिसे न्यायिक पुनरावलोकन
    कहते हैं। इस व्यवस्था में कानूनी त्रुटि को सुधारा जा सकता है।
    (vii) अभिलेख न्यायालय- सर्वोच्च न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय के रूप में कार्य करता है। वह अपनी समस्त
    कार्यवाहियों और निर्णयों को प्रकाशित कराकर अभिलेखों के रूप में सुरक्षित रखता है। ये निर्णय अन्य वादों में
    ‘मिसाल’ के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं।
    (viii) न्यायालय की कार्यवाही और कार्यविधि के लिए नियम बनाना- संविधान के अनुच्छेद 145 के अधीन सर्वोच्च
    न्यायालय को न्यायालय की कार्यवाही और कार्यविधि के संबंध में समय-समय पर नियम बनाने का अधिकार है ।
    (ix) विवादों को स्थानांतरित करना- सर्वोच्च न्यायालय किसी मुकदमे में शीघ्र न्याय दिलाने के लिए वाद को एक उच्च
    न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर सकता है।
    (x) कानूनों की वैधता पर निर्णय- सर्वोच्च न्यायालय संसद या विधानमंडलों द्वारा पारित ऐसे कानूनों को अवैध घोषित
    कर सकता है, जो संविधान के अनुरूप नहीं हैं।
    (xi) विविध कार्य- सर्वोच्च न्यायालय के पास निम्नलिखित विविध कार्य करने की भी शक्तियाँ हैं

(क) सर्वोच्च न्यायालय अपने कार्यों के संपादन हेतु अधिकारियों की नियुक्ति करता है।
(ख) वह अधीनस्थ न्यायालयों की कार्यविधि पर पूरी दृष्टि रखता है। (ग) सर्वोच्च न्यायालय संघीय लोकसभा के अध्यक्ष तथा सदस्यों के कार्यकलापों की जाँच करके, उन्हें हटाने के लिए राष्ट्रपति को परामर्श देता है।
(घ) सर्वोच्च न्यायालय याचिकाओं पर लगने वाले शुल्क को रद्द कर सकता है।
प्रश्न–2. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति कैसे होती है? उनको अपदस्थ करने की क्या प्रक्रिया है?
उ०- उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।
प्रश्न–___3. सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार या प्रमुख कार्यों पर प्रकाश डालिए।
उ०- उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।
प्रश्न–___4. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए क्या अर्हताएँ निर्धारित हैं? इनकी नियुक्ति कौन करता है?
उन्हें अपदस्थ करने की क्या प्रक्रिया है?
उ०- उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।

  1. भारत के सर्वोच्च न्यायालय के महत्व पर प्रकाश डालिए।
    उ०- सर्वोच्च न्यायालय का महत्व- सर्वोच्च न्यायालय भारत की सर्वोच्च न्यायिक संस्था है। इसके महत्व को निम्नलिखित
    बिंदुओं के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है(i) भारतीय संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखने में सर्वोच्च न्यायालय बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। (ii) यह संविधान की सार्थक व्याख्या करके उसे सुरक्षा प्रदान करने में उपयोगी है।
    (iii) सर्वोच्च न्यायालय केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की शक्तियों को अक्षुण्ण बनाए रखने में प्रमुख भूमिका निभाता है। (iv) यह केंद्र तथा राज्यों के मध्य शक्ति विभाजन का प्रहरी है।
    (v) सर्वोच्च न्यायालय व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करता है।
    (vi) राष्ट्र की आर्थिक और सामाजिक उन्नति में सर्वोच्च न्यायालय का योगदान अद्वितीय रहता है।
    (vii) यह न्यायालय उच्च न्यायालयों के संवैधानिक, फौजदारी तथा दीवानी मुकदमों के निर्णयों के विरुद्ध अपीलें सुनकर राष्ट्र की जनता को न्याय देता है।
    (viii) वह राष्ट्रपति को न्यायिक समस्याओं पर उचित परामर्श देकर समस्याओं का उचित समाधान करता है।
    सर्वोच्च न्यायालय के महत्व को डॉ० भीमराव अंबेडकर ने इन शब्दों में व्यक्त किया है, “हमारे संघ में एकीकृत न्यायपालिका की व्यवस्था है, उसका क्षेत्राधिकार संवैधानिक, दीवानी तथा फौजदारी के अंतर्गत सभी मामलों तक विस्तृत है और यह सब में उपचार की व्यवस्था कर सकती है।

Up board social science class 10 chapter 21 राज्य की कार्यपालिका (राज्यपाल और मंत्रिपरिषद्)

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