Up board social science class 10 chapter 27: पड़ोसी देशों से भारत के संबंध तथा दक्षेश

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Up board social science class 10 chapter 27:  पड़ोसी देशों से भारत के संबंध तथा दक्षेश
Up board social science class 10 chapter 27: पड़ोसी देशों से भारत के संबंध तथा दक्षेश
पाठ- 27  पड़ोसी देशों से भारत के संबंध तथा दक्षेश


प्रश्न—-1. भारत के पाकिस्तान के साथ मधुर संबंध क्यों नहीं हैं? किन्हीं दो कारणों का वर्णन कीजिए।

उ०- भारत के पाकिस्तान के साथ मधुर संबंध न होने के दो कारण
(i) कश्मीर के भारत में विलय के समय उसके कुछ भाग पर पाकिस्तान ने अपना अधिकार बताकर समस्या को जन्म दिया।
(ii) पाकिस्तान द्वारा आतंकवादियों को संरक्षण प्रदान करना तथा भारत में आतंकी गतिविधियाँ चलाना।

प्रश्न—-2 भारत-पाक संबंधों में कश्मीर की भूमिका का उल्लेख कीजिए।
उ०- भारत-पाक संबंधों में कश्मीर की समस्या दोनों देशों के मध्य तनाव का कारण है। कश्मीर का मुद्दा पाकिस्तान की भारत के प्रति घृणा का प्रतीक है। भारत कश्मीर को अपना अभिन्न अंग मानता है जबकि पाकिस्तान कश्मीर पर अपना अधिकार जताना चाहता है। कश्मीर समस्या भारत-विभाजन के समय से चली आ रही है जिसके चलते दोनों देशों के मध्य कई बार युद्ध की स्थिति बन चुकी है।

प्रश्न—-3 दक्षेश की स्थापना कब और कहाँ हुई? इसके दो सिद्धांत लिखिए।
उ०- दक्षेश की स्थापना दिसंबर, 1985 ई० में बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हुई। इस संगठन के दो सिद्धांत निम्नलिखित हैं
(i) दक्षिण एशिया की जनता के कल्याण को बढ़ावा देना तथा उनके जीवन स्तर में सुधार करना।
(ii) दक्षिण एशिया के देशों में सामूहिक आत्मनिर्भरता को मजबूत करना और बढ़ावा देना।

प्रश्न—-4 दक्षेश के दो उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।

उ०- दक्षेश के दो उद्देश्यों (सिद्धांतों) के लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या-3 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।
प्रश्न—-5. भारत-पाकिस्तान संबंधों पर संक्षेप में अपने विचार प्रकट कीजिए।
उ०- 1947 ई० में स्वाधीनता के समय भारत से पृथक होकर बना पाकिस्तान भारत का सबसे प्रमुख पड़ोसी देश है। जाति और धर्म के आधार पर बना यह देश भारत के साथ सदैव तनाव और विद्वेष का भाव बनाए रखता है। दोनों देशों के मध्य तनाव और टकराव का मुख्य कारण कश्मीर समस्या है। स्वाधीनता के बाद भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने पाकिस्तान के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने की चेष्टा की थी, किंतु पाकिस्तान प्रारंभ से ही बैर-भाव का पक्ष-पोषण करता रहा है। 1965 व 1971 ई० में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण कर शत्रुभाव एवं संकीर्ण मानसिकता का परिचय दिया। यद्यपि भारतीय सेना ने पाकिस्तान को बुरी तरह परास्त किया।
प्रश्न—-6. दक्षेश से क्या आशय है? इस संगठन के सदस्य देशों के नाम लिखिए ।
उ०- दक्षेश का अर्थ ‘दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन’ है इस संगठन की स्थापना 8 दिसंबर, 1985 ई० में बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हुई है। इस संगठन के सदस्य देशों में– भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, मालदीव और अफगानिस्तान हैं।

दक्षेस की सफलता के लिए चार सुझाव लिखिए। उ०- दक्षेश की सफलता के लिए चार सुझाव लिखिए
(i) सार्क (दक्षेश) संगठन के सदस्य राष्ट्रों मध्य सहयोग तथा भाईचारे का वातावरण बने, जिससे टकराव की स्थिति उत्पन्न न हो सके।
(ii) सार्क गठन को महाशक्तियों की छाया से भी दूर रखा जाए ।
(iii) इस संगठन का लक्ष्य द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय सहयोग को विकसित करना होना चाहिए।
(iv) अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं पर दक्षेश संगठन के सदस्य देशों में सर्वसम्मत होकर एकता का प्रदर्शन करना चाहिए ।
प्रश्न—- 8. दक्षेश के शिखर सम्मेलन आयोजित करने वाले किन्हीं चार देशों के नाम, उनकी राजधानी तथा आयोजन के वर्ष सहित लिखिए ।
उ०- चार देशों के दक्षेस शिखर सम्मेलनों का विवरण निम्नवत् है——-

शिखर सम्मेलन देश का नाम राजधानी वर्ष
पहला बांग्ला देश ढाका 1985
दूसरा भारत नई दिल्ली 1986
तीसरानेपाल काठमांडू1987
चौथापकिस्तान इस्लामाबाद 1988

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न–1. दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) की स्थापना का क्या उद्देश्य है? संयुक्त राष्ट्र संघ से यह किस
प्रकार भिन्न है?

उ०- दक्षिण एशियाई क्षेत्र में कृषि, उद्योग, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार, ग्रामीण विकास, यातायात तथा तकनीकी के विकास को

दृष्टिगत रखते हुए सार्क संगठन का निर्माण किया गया। सार्क संगठन के चार्टर के अनुसार इसके निम्नलिखित उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं
(i) दक्षिण एशिया की जनता के कल्याण को बढ़ावा देना तथा उसके जीवन-स्तर में सुधार लाना ।
(ii) क्षेत्र में आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति और सांस्कृतिक विकास में तेजी लाना तथा सभी व्यक्तियों को प्रतिष्ठा के साथ रहने का अवसर प्रदान करना व उनकी पूरी क्षमताओं को उपयोग में लाना।
(iii) दक्षिण एशिया के देशों में सामूहिक आत्मनिर्भरता को मजबूत करना और बढ़ावा देना।
(iv) परस्पर विश्वास व समझ-बूझ को बढ़ावा और उसी के आधार पर एक-दूसरे की समस्याओं का मूल्यांकन करना ।
(v) आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी तथा वैज्ञानिक क्षेत्रों में आपसी सहयोग को बढ़ाना। (vi) अन्य विकासशील देशों के साथ सहयोग को दृढ़ बनाना।
(vii) समान हितों के मामलों पर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर आपस में सहयोग से कार्य करना ।
(viii) अंतर्राष्ट्रीय संगठनों एवं इस क्षेत्रीय संगठन के साथ समान लक्ष्यों व उद्देश्यों में सहयोग करना।
सार्क और संयुक्त राष्ट्र संघ में अंतर- सार्क या दक्षेश दक्षिण एशिया के उद्देश्यों का नवीनतम अंतर्राष्ट्रीय संगठन है। इसका मुख्य उद्देश्य दक्षिण एशियाई क्षेत्र में कृषि, उद्योग, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार, ग्रामीण विकास, यातायात तथा तकनीकी विकास में परस्पर सहयोग करना है जबकि संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व का सबसे बड़ा अंतर्राष्ट्रीय संगठन है जिसकी वर्तमान सदस्य संख्या 193 है। संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रमुख उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की स्थापना करना है।


प्रश्न—- 2. सार्क (दक्षेश) पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
उ०- दक्षेश या सार्क संगठन का पूरा नाम दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन है। सार्क विश्व का नवीनतम अंतर्राष्ट्रीय संगठन है, जिसका जन्म 7 एवं 8 दिसंबर, 1985 ई० में सात राष्ट्रों के सेनाध्यक्षों के सम्मिलित प्रयास से हुआ। इस संगठन की स्थापना पर भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और मालदीव के रूप में सात सदस्य राष्ट्र सम्मिलित थे। बाद में इसमें अफगानिस्तान और जुड़ गया, अतः सार्क संगठन के परिवार में आठ सदस्य हो गए। सार्क संगठन के सदस्य देश सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, भौगोलिक तथा एक समान ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की उपज होने के कारण एक जुट हुए हैं। सार्क संगठन के सदस्य देशों के भू-भाग में लगभग 142 करोड़ जनशक्ति का बसाव होने के कारण यह विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला संगठन बनने का गौरव पा गया है। वर्तमान में आठ सदस्यीय देशों के संगठन वाले दक्षेश का मुख्यालय नेपाल देश की राजधानी काठमांडू में बनाया गया है। धीरे-धीरे विकसित होने वाला यह देश अब दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन का महत्वपूर्ण देश बन चुका है। सार्क संगठन की स्थापना के उद्देश्य- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए। सार्क संगठन के सिद्धांत- सार्क संगठन के उपर्युक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए इसके निम्नलिखित सिद्धांत निश्चित किए गए हैं
(i) सदस्य राष्ट्र एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। (ii) संगठन के ढाँचे के अंतर्गत, सहयोग, प्रभुसत्तासंपन्न समानता, क्षेत्रीय अखंडता, राजनीतिक स्वतंत्रता, दूसरे देशों के मामलों में हस्तक्षेप न करना तथा आपसी हित के सिद्धांतों का आदर करना।
(iii) सदस्य राष्ट्रों का सहयोग, द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहयोग का स्थान नहीं लेगा, वरन् वह परस्पर पूरक होगा। सार्क संगठन का ताना-बाना- सार्क संगठन के ढाँचे या ताने-बाने के निर्माण में निम्नलिखित संस्थाओं का योगदान रहा है
(i) शिखर सम्मेलन- सार्क संगठन के चार्टर के अनुच्छेद 3 के अनुसार प्रतिवर्ष इसका एक शिखर सम्मेलन आयोजित किया जाएगा, जिसमें सभी सदस्य देशों के शासनाध्यक्षों को भाग लेना चाहिए। अब तक इसके 19 शिखर सम्मेलन आयोजित किए जा चुके हैं।
(ii) मंत्रिपरिषद्- सार्क संगठन की मंत्रिपरिषद् के सदस्य, समस्त सदस्य राष्ट्रों के विदेशमंत्री होते हैं। इसकी बैठक 6 माह में एक बार अवश्य होनी चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर अन्य बैठकें भी बुलाई जा सकती हैं। इसका कार्य परिषद् के नये क्षेत्रों को निश्चित करना और सामान्य हित के अन्य विषयों पर निर्णय करना है ।
(iii) स्थायी समिति- सार्क संगठन की स्थायी समिति में सदस्य देशों के विदेश सचिव होते हैं। ये संगठन के कार्यों पर दृष्टि रखने तथा कार्यक्रमों में तालमेल बैठाने का कार्य करते हैं ।

(iv) तकनीकी समिति- सार्क संगठन के सदस्य देशों में तकनीकी विकास कराने का उत्तरदायित्व इस समिति का होता है। (v) कार्यकारी समितियाँ- इन समितियों का कार्य संगठन के लिए विविध कार्यक्रमों का संपादन करना है ।
(vi) सचिवालय (मुख्यालय)- इस संगठन का मुख्यालय नेपाल की राजधानी काठमांडू में है। इसके महासचिव की
नियुक्ति मंत्रिपरिषद् द्वारा दो वर्ष के लिए की जाती है। सार्क के सदस्य देश इस पर बारी-बारी से किसी व्यक्ति को मनोनीत करते हैं।
(vii) वित्तीय व्यवस्थाएँ- सार्क संगठन के सचिवालय तथा कार्यक्रमों के संचालन के व्यय के लिए आठों सदस्य राष्ट्रों
को भागीदारी सौंपी गई है। इसके लिए भारत 32%, पाकिस्तान 25%, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका प्रत्येक 11% एवं भूटान और मालदीव प्रत्येक 5% अंश प्रदान करते हैं। पर्यवेक्षक दल- सार्क संगठन के कार्यों का पर्यवेक्षण करने वाले राष्ट्र संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, जापान, तथा दक्षिणी कोरिया हैं। सार्क संगठन का महत्व- यद्यपि सदस्य राष्ट्रों के मन-मुटाव के चलते यह संगठन अधिक सफल नहीं हो पाया है, फिर भी क्षेत्र के विकास की दृष्टि से सार्क संगठन की उपलब्धियों का मूल्यांकन करते हुए उसके निम्नलिखित महत्वों का बोध होता है
(i) सार्क संगठन दक्षिणी एशिया के पिछड़े हुए देशों के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं तकनीकी विकास के क्षेत्र में
ब्रह्मस्त्र सिद्ध हो रहा है।
(ii) सार्क संगठन दक्षिण एशियाई क्षेत्र के लिए प्रगति और विकास का नवप्रभात बनकर उदित हुआ है ।
(iii) सार्क संगठन के महत्व को देखते हुए भूटान नरेश ने इस संदर्भ में यह टिप्पणी की है, “सार्क संगठन सामूहिक
बुद्धिमत्ता और राजनीतिक इच्छा शक्ति का परिणाम बन गया है।”
(iv) इस संगठन ने ‘खाद्य कोष’ की स्थापना करके इस क्षेत्र की खाद्य समस्या और कुपोषण का सही निराकरण खोज लिया है ।
(v) सार्क संगठन ने इस क्षेत्र में कृषि, पर्यावरण सुरक्षा, शिक्षा तथा सांस्कृतिक विकास की गंगा प्रवाहित कर दी है ।
(vi) यह संगठन समझौतों के माध्यम से कृषि, औद्योगिक और वैज्ञानिक विकास के महान कार्यों में जुटा हुआ है।
(vii) इस संगठन ने इस क्षेत्र की गरीबी, भुखमरी, आतंकवाद, महिला तथा बाल कल्याण की समस्याओं का निश्चित समाधान खोज निकाला है ।
(viii) सार्क संगठन ने मुक्त व्यापार के सिद्धांत को लागू करके तथा परस्पर कानूनी सहायता उपलब्ध कराकर अनेक समस्याओं का सहज निराकरण खोज निकाला है। यदि सार्क संगठन की उपलब्धियों का विश्लेषण किया जाए, तो इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि यह संगठन पाकिस्तान जैसे सदस्यों की विद्वेषपूर्ण नीति तथा आतंकवाद को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति के कारण लक्ष्य प्राप्ति में पिछड़ गया है। अत: इसे सबल और सफल बनाने की नितांत आवश्यकता है। सार्क संगठन की सफलता हेतु सुझाव- दक्षिण एशियाई क्षेत्र के आर्थिक विकास, सुख, समृद्धि और शांति तथा सुरक्षा के लिए सार्क संगठन का सफल होना नितांत आवश्यक है। सार्क संगठन की सफलता हेतु निम्नलिखित सुझाव प्रस्तुत किए जा सकते हैं ।
(i) सार्क संगठन के सदस्य राष्ट्रों के मध्य सहयोग तथा भाईचारे का वातावरण बने, जिससे टकराव की स्थिति उत्पन्न न हो सके ।
(ii) सार्क संगठन को महाशक्तियों की छाया से भी दूर रखा जाए ।
(iii) इस संगठन का लक्ष्य द्विपक्षीय तथा बहुपक्षीय सहयोग को विकसित करना होना चाहिए ।
(iv) अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं पर सार्क संगठन के सदस्य देशों को सर्वसम्मत होकर एकता का प्रदर्शन करना चाहिए ।
(v) संगठन का लक्ष्य सदस्य राष्ट्रों में ऊर्जा, परिवहन, संचार, कृषि, उद्योग, व्यापार तथा प्रौद्योगिकी का विकास होना चाहिए।
(vi) सार्क संगठन का मंच आर्थिक विकास के चितंन के साथ-साथ, राजनीतिक विचार का मंच भी बन जाना चाहिए। भारत पर कभी-कभी सार्क संगठन पर अपनी प्रभुता थोपने का आरोप लगाया जाता है, जो सर्वथा असत्य है। यह तथ्य स्व० श्री राजीव गाँधी के इन शब्दों से प्रमाणित हो जाता है, “हम किसी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते हैं और न किसी देश पर अपनी चौधराहट ही स्थापित करना चाहते हैं ।

  1. दक्षेश की स्थापना कब और कहाँ हुई? इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डालिए। उ०- दक्षेश संगठन की स्थापना दिसम्बर, 1985 ई० को बांग्लादेश की राजधानी में हुई थी।
    दक्षेश संगठन के उद्देश्य- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।
  2. भारत के किन्हीं दो पड़ोसी देशों के साथ संबंधों की विवेचना कीजिए।
    उ०- भारत के पाकिस्तान के साथ संबंध
    परिचय- पाकिस्तान भारत के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। 14 अगस्त, 1947 को भारत-विभाजन के फलस्वरूप इसका निर्माण हुआ। 1971 में पाकिस्तान के विभाजन से बांग्लादेश बना। पाकिस्तान एक मुस्लिम देश है। इसकी सीमाएँ ईरान, अफगानिस्तान तथा भारत से मिली हुई हैं। इसका क्षेत्रफल 8,81,913 वर्ग किमी, जनसंख्या लगभग 20 करोड़, राजधानीइस्लामाबाद, मुख्य धर्म- इस्लाम, भाषा- उर्दू, पंजाबी, सिंधी, अंग्रेजी, बलूची तथा पश्तो और मुद्रा पाकिस्तानी रुपया है। अंग्रेजी शासन की कूटनीति के कारण भारत से पृथक होकर बना, पाकिस्तान भारत का सबसे प्रमुख पड़ोसी देश है। जाति और धर्म के आधार पर बना यह देश भारत के साथ सदैव तनाव और विद्वेष का भाव बनाए रखता है। दोनों देशों के मध्य तनाव और टकराव का मुख्य कारण कश्मीर समस्या है। डॉ० मावेत्कर के अनुसार, “पाकिस्तान की भारत के प्रति घृणा का प्रतीक कश्मीर समस्या है।” कश्मीर की समस्या को निम्नलिखित परिपेक्ष्य में समझा जा सकता है() कश्मीर के भारत में विलय के समय उसके कुछ भाग पर पाकिस्तान ने अपना अधिकार बताकर समस्या को जन्म दिया।
    (ii) पाक अधिकृत कश्मीर आजाद कश्मीर कहलाता है। (iii) पाकिस्तान समूचे कश्मीर को हड़पना चाहता है।
    (iv) 1951 ई० की जम्मू-कश्मीर विधानसभा की इस घोषणा को कि कश्मीर भारत संघ का अंग है’ पाकिस्तान ने स्वीकार
    नहीं किया ।
    (v) 1965 ई० में पाकिस्तान ने युद्ध विराम सीमाओं का उल्लंघन करके कच्छ पर आक्रमण कर दिया, जिसे बाद में कश्मीर तक बढ़ा दिया ।
    (vi) सुरक्षा परिषद् के प्रयास से दोनों देशों में युद्ध विराम हुआ। इसी संदर्भ में 1966 ई० में ताशकंद समझौता तथा 1972 ई० में शिमला समझौता संपन्न हुआ। 1982 ई० में पाकिस्तान ने पंजाब के आतंकवादियों को प्रशिक्षण तथा हथियार देकर वहाँ आतंकवाद फैलाया, जिससे पुनः दोनों में तनाव उत्पन्न हो गया। मई 1999 ई० में पाकिस्तान ने भारत के समक्ष कारगिल संकट खड़ा कर दिया, जिसमें भारतीय सेना ने कारगिल को पाकिस्तानी सेना से मुक्त करा लिया। 2001 ई० में पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ तथा भारतीय प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई के मध्य ‘आगरा शिखर वार्ता’ हुई, जो पूर्णतः असफल रही।
    13 दिसंबर, 2001 ई० में भारतीय संसद पर पाकिस्तानी आतंकवादियों ने हमला करके दोनों देशों के मध्य तनाव और युद्ध की स्थिति उत्पन्न कर दी। 2004 ई० में सार्क संगठन सम्मेलन में दोनों देशों के मध्य सुलह वार्ता हुई और भारत ने बंद पड़ी विमान सेवा, रेल सेवा और बस सेवा पाकिस्तान के लिए फिर से शुरू कर दीं। 26 नवंबर, 2008 ई० में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने मुंबई पर हमला करके शांत संबंधों के समुद्र में तूफान ला दिया। 8 जनवरी, 2013 ई० में पाकिस्तानी सैनिकों ने युद्ध विराम रेखा का उल्लंघन करके दो भारतीय सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। भारत लगातार पाकिस्तान के साथ बड़ा भाई बनकर प्रेम और मैत्री का व्यवहार करता रहता है, परंतु पाकिस्तान ने 27 मई, 2014 ई० में संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर का राग अलाप कर शांतिवार्ता के द्वार पुनः बंद कर दिए। भारत, कश्मीर समस्या का निराकरण द्विपक्षीय वार्ता द्वारा करने के लिए हर समय तैयार रहता है। भारत जैसे ही कश्मीर समस्या समाधान का वातावरण बनाता है, पाकिस्तान के अलगाववादी विष वमन करके शांति और प्रेम के रास्ते में शत्रुता के काँटे बिखेर देते हैं। इसीलिए श्री लाल बहादुर शास्त्री जी को यह घोषणा करने पर विवश होना पड़ा, “यदि पाकिस्तान तर्क के द्वारा समस्या को सुलझाने में विश्वास नहीं रखता, तो भारतीय सेनाएँ भी देश की रक्षा करने में पीछे नहीं रहेंगी।” आशा है भारत के कुशल प्रधानमंत्री अपने नेतृत्व में इस समस्या का उचित हल निकाल लेंगे ।
    भारत के अफगानिस्तान के साथ संबंध परिचय- अफगानिस्तान मध्य एशिया तथा भारतीय उपमहाद्वीप के बीच में स्थित है। सन् 1747 ई० में अहमद शाह दुर्रानी ने इसकी स्थापना की थी। इनका क्षेत्रफल- 6,52,864 वर्ग किमी, जनसंख्या- 3.33 करोड़, राजधानी- काबुल, धर्मइस्लाम (सुन्नी), सरकारी भाषा– पश्तो, दारी और मुद्रा- अफगानी है। भारत और अफगानिस्तान के मध्य प्राचीनकाल से ही मधुर संबंध रहे हैं। सम्राट अशोक के शासनकाल में यह देश बौद्ध धर्म तथा भारतीय संस्कृति का केंद्र रहा है। भारत और अफगानिस्तान अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान एकजुट होकर करते रहे हैं। 1950 ई० में उसने भारत के पंचशील के सिद्धांत को स्वीकार किया। अफगान नेता बड़ी सूझबूझ के साथ भारत के साथ मैत्री संबंध बनाए रहे। सोवियत संघ ने अफगानिस्तान को हथियाने की कोशिश की। गुट–निरपेक्ष नीति का अनुसरण करते हुए भारत ने सोवियत संघ के हस्तक्षेप की आलोचना की। अमेरिका तथा चीन के वहाँ जुट जाने पर, भारत ने सोवियत संघ को वहाँ से चले जाने के लिए मनाकर तृतीय विश्वयुद्ध का खतरा टाल दिया। भारत ने अफगानिस्तान के विकास हेतु पर्याप्त सहयोग दिया। दोनों देश परस्पर मिल-जुलकर उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं। 2014 ई० में भारत के प्रधानमंत्री शपथ ग्रहण समारोह में अफगानिस्तान के प्रधानमंत्री ने उपस्थित होकर भारत के प्रति सम्मान और प्रेम दर्शा दिया है। अफगानिस्तान सार्क संगठन का नया सदस्य बन, भारत से और अधिक जुड़ गया है |

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