Up board social science class 10 chapter 32 भारत का भौतिक पर्यावरण भौतिक स्वरूप- स्थिति तथा विस्तार, उच्चावच एवं जल प्रवाह

Up board social science class 10 chapter 32 भारत का भौतिक पर्यावरण भौतिक स्वरूप- स्थिति तथा विस्तार, उच्चावच एवं जल प्रवाह

अनुभाग- 3 : पर्यावरणीय अध्ययन इकाई-1 (क): भारत का भौतिक पर्यावरण भौतिक स्वरूप- स्थिति तथा विस्तार,
उच्चावच एवं जल प्रवाह

लघुउत्तरीय प्रश्न
प्रश्न —-1 भारत को उपमहाद्वीप क्यों कहा जाता है?
उ०- अपनी केंद्रीय स्थिति के कारण भारत प्राचीन काल से एक सुस्पष्ट भौगोलिक इकाई बना रहा है ।। आकार की विशालता ने इसे विशिष्ट भौतिक विविधताएँ प्रदान की हैं। पड़ोसी देशों की भौगोलिक स्थिति, जलवायु, धरातलीय संरचना, सांस्कृतिक लक्ष्णों तथा जनसंख्या की विशेषताओं में विभिन्नताएँ एवं विविधताएँ होते हुए भी उनमें एकात्मकता दिखाई पड़ती है, इसलिए भारत को उपमहाद्वीप कहा जाता है ।।

  1. भारत के दो प्राकृतिक प्रदेशों का नाम लिखिए और उनकी स्थिति स्पष्ट कीजिए।
    उ०- भारत के दो प्राकृतिक प्रदेश और उनकी स्थिति निम्नलिखित है(i) हिमालय का पर्वतीय प्रदेश- भारत के उत्तर में हिमालय पर्वत-शृंखला चाप के आकार में पश्चिम से पूर्व 2500 किमी० तथा उत्तर से दक्षिण 150 से 400 किमी० तक विस्तृत है ।। वर्ष भर बर्फ से ढका रहने वाला विश्व का सर्वोच्च पर्वत हिमालय भारत और तिब्बत देश के मध्य में स्थित है ।। हिमालय के पर्वतीय प्रदेश का क्षेत्रफल 5 लाख वर्ग किमी० है ।।
    (ii) उत्तर का विशाल मैदान- हिमालय पर्वत का वरदान और भारत के हृदय के नाम से प्रसिद्ध उत्तर का विशाल मैदान हिमालय पर्वत के दक्षिण और दकन के पठार के शीघ्र तक स्थित है ।। इसका विस्तार पूर्व में असम और पश्चिम में पाकिस्तान की सीमा तक पाया जाता है ।। यह मैदान नवीन जलोढ़ मिट्टी से बना होने के कारण जलोढ़ मैदान के नाम से भी जाना जाता है ।। यह मैदान अत्यधिक उपजाऊ है ।। इसी कारण यहाँ जनसंख्या घनत्व अधिक है ।।
    प्रश्न—-3. भारत के उत्तरी मैदान की स्थिति तथा विस्तार बताइए।
    उ०- उत्तर के लिए लघुउत्तरीय प्रश्न संख्या- 2 के उत्तर में ‘उत्तर का विशाल मैदान’ का अवलोकन कीजिए।
    प्रश्न—-4. गंगा नदी की चार सहायक नदियों का विवरण दीजिए।
    उ०- गंगा नदी की चार सहायक नदियाँ- गोमती, घाघरा, गण्डक तथा सोन हैं।
    प्रश्न—-5. हिमालय पर्वत से होने वाले चार लाभ लिखिए।
    उ०- हिमालय पर्वत से होने वाले चार लाभ निम्नलिखित हैं__(i) हिमालय भारत की उत्तरी अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर अभेदम् दीवार के रूप में सजग प्रहरी बन कर खड़ा हुआ। upboardinfo.in/
    (ii) भारत की धरातलीय रचना में हिमालय पर्वत ने विशेष योगदान दिया है ।। भारत का हृदय कहलाने वाला उत्तर का विशाल मैदान हिमालय की नदियों के निक्षेप से बना है।
    (iii) हिमालय पर्वत के हिमनढ़ सिंधु गंगा तथा ब्रह्मपुत्र नदियों के उद्गम स्रोत हैं जो अपनी विरल और शीतल जल से बिजली, सिंचाई परिवहन तथा पेयजल सुलभ कराकर भारत में जीवन के अंकुर उपजाती रहती हैं। (iv) हिमालय प्राकृतिक वनस्पति का अतुल भंडार होने के कारण उपयोगी काष्ठ, औषधियों फलों तथा वन्य जंतुओं के रूप में अनेक उपहार देता है।

  2. प्रश्न—- 6. उत्तर के विशाल मैदान की जल प्रवाह प्रणाली का वर्णन कीजिए। upboardinfo.in/
    उ०- उत्तर के विशाल मैदान की सहानीरा नदियों का उद्गम स्थल हिमालय के हिमनद हैं। हिमालय के पश्चिम क्षेत्र में सिंधु तथा उसकी सहायक नदियाँ पूर्वोत्तर से निकलकर पश्चिम-दक्षिण को बहती हुई अरब सागर में गिर जाती हैं। हिमालय के मध्यवर्ती क्षेत्र के हिमनदों से गंगा तथा उसकी सहायक नदियाँ निकलकर दक्षिण-पूर्व को बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिर जाती हैं। उत्तर का विशाल मैदान गंगा नदी का वरदान है ।। पूर्वी भाग में ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियाँ पश्चिम-दक्षिण की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिर जाती हैं। उत्तर के विशाल मैदान की जलप्रवाह प्रणाली की ये समस्त नदियाँ जल विद्युत, निर्माण, सिंचाई, नौका चालन तथा पेयजल के रूप में उत्तरी भारत के लिए प्राकृतिक वरदान बनकर प्रवाहित होती upboardinfo.in/
    हैं। वर्षा ऋतु में इनमें आने वाली बाढ़े विनाश का कारण बनतीं हैं। 7. दक्षिण पठारी भाग की जल प्रवाह प्रणाली का वर्णन कीजिए। उ०- दक्षिण के पठार का प्रवाह तंत्र दो भागों में बँटा हुआ है ।। पूर्वी भाग का प्रवाह तंत्र उन नदियों के योग से बनता है जो मध्यवर्ती पठार से निकलकर बंगाल की खाड़ी में गिर जाती हैं। इनमें महानदी, दामोदर, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी नदियाँ आती हैं। पश्चिमी क्षेत्र का प्रवाह तंत्र उन नदियों के योग से बना है जो मध्य के पर्वतों से निकलकर पश्चिम में अरब सागर में गिर जाती है ।। इनमें नर्मदा, तापी, लूनी तथा साबरमती नदियाँ प्रमुख है।
    प्रश्न—- 8. भारत के उत्तरी मैदान का महत्व स्पष्ट कीजिए।
    उ०- उत्तरी मैदान का महत्व- श्रीकृष्ण, राम, महावीर और गौतम की भूमि के रूप में उत्तर का विशाल मैदान अपने आर्थिक महत्व के कारण भारत का भाग्यविधाता बना रहा है ।। इसका महत्व निम्नवत् है(i) उत्तर का विशाल मैदान उपजाऊ जलोढ़ मृदा से बना कृषि व्यवसाय का आधार होने के कारण महत्वपूर्ण है ।। यह भारतीय कृषि उपजों की प्रचुरता के कारण भारत का अन्न भंडार बन गया है ।। (ii) उत्तरी भारत की सदावाहिनी नदियाँ तथा नियतवाही नहरें सिंचाई व्यवस्था का जाल बनाकर कृषि विकास में वरदान सिद्ध हुई हैं।
    (iii) उत्तरी भारत में रेलमार्गों और सड़कों का जाल बिछा हुआ है जिससे यहाँ कृषि, उद्योग, वाणिज्य तथा परिवहन का खूब विकास हो गया है ।। (iv) यह मैदानी क्षेत्र, कच्चे माल, ऊर्जा, परिवहन, संचार तथा सुलभ श्रम के कारण चीनी उद्योग, सूती वस्त्र उद्योग तथा जूट उद्योग का केंद्र बनकर उभरा है ।।
    (v) उत्तम जलवायु, खाद्यान्न आपूर्ति, उद्योग, परिवहन, संचार तथा रोजगार के अवसरों ने उत्तरी मैदान को जनसंख्या के बसाव का आकर्षण केंद्र बना दिया है ।। भारत की 40% जनसंख्या का आश्रय स्थल यही मैदान बना हुआ है।
    (vi) उत्तर का विशाल मैदान प्राचीनकाल से ही सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है ।। भारत की प्राचीन सभ्यता इसी मैदान से विकसित हुई है तथा इसने देश के आर्थिक और सांस्कृतिक विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया है।
    प्रश्न—- 9. भारत के पश्चिमी तटीय मैदान की स्थिति तथा विस्तार का वर्णन कीजिए।
    उ०- गुजरात प्रदेश की खंभात की खाड़ी से लेकर कन्याकुमारी तक, अरबसागर और पश्चिमी घाट के मध्य जो उपजाऊ और समतल पट्टी पाई जाती है, पश्चिमी तटीय मैदान के नाम से जानी जाती है ।। यह मैदान उपजाऊ मिट्टी से युक्त तथा उत्तम जलवायु वाला क्षेत्र होने के कारण रबड़, नारियल, केला, गरम मसाले, चावल तथा तंबाकू उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हो गया है ।। पश्चिमी तटीय मैदान का उत्तरी भाग कोंकण तट तथा दक्षिणी तट मालाबार तट कहलाता है ।। कपास का प्रसिद्ध उत्पादन क्षेत्र होने के कारण यहाँ सूती वस्त्र उद्योग खूब उन्नति कर गया है ।। काँदला, मुंबई तथा कोच्चि इस क्षेत्र के प्रमुख बंदरगाह हैं।
    प्रश्न—-10. भारत के पूर्वी तटीय मैदान का वर्णन कीजिए।
    उ०- बंगाल की खाड़ी और पूर्वी घाट के मध्य संकरी पट्टी के रूप में पश्चिम बंगाल से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक जो समतल क्षेत्र फैला है, पूर्वी तटीय मैदान कहलाता है ।। यह मैदान बलुई तथा चीका मिट्टी के निक्षेपों से बना है ।। महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों ने अपने डेल्टाओं से इसे उपजाऊ बना दिया है ।। इस मैदानी भाग में चावल, जूट, तंबाकू, केला तथा नारियल खूब उगाए जाते हैं। पूर्वी तटीय मैदान का उत्तरी भाग उत्कल तट तथा दक्षिणी भाग कोरोमंडल तट कहलाता है ।। पूर्वी तट के सागरीय भाग में कोलकाता, पारादीप, विशाखापट्टनम, तथा चेन्नई बंदरगाह स्थित हैं। यह तट मछली उद्योग तथा नारियल उद्योग के लिए प्रसिद्ध है ।।
  3. दक्षिण के पठार की दो प्रमुख विशेषताएँ बताइए।
    उ०- दक्षिण के पठार की दो प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं(i) प्रकृति ने दक्षिण के पठार को पर्याप्त खनिज संसाधन प्रदान किए हैं। इस पठार की अग्नेय शैलों ने लोह अयस्क, कोयला, सोना, ताँबा, अभ्रक, मैगनीज तथा बाक्साइड आदि खनिजों को जन्म देकर इसे भारत का खनिज भंडार बना दिया है ।।
    (ii) दक्षिण का पठारी क्षेत्र साल, सागौन, चंदन आदि उपयोगी काष्ठ वृक्षों से घिरा है ।। साथ ही यहाँ पर तेंदूपत्ता, हरड़, बहेड़ा, आँवला तथा महुआ के उपयोगी वृक्ष बहुतायत में उगकर लोगों के कल्याण में योगदान दे रहे हैं।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न—-1. भारत को प्रमुख भू-आकृतिक ( प्राकृतिक ) प्रदेशों में विभाजित कीजिए। संक्षेप में इनका विवरण लिखिए।
उ०- उच्चावच की दृष्टि से भारत को निम्नलिखित भूआकृतिक प्रदेशों (प्राकृतिक प्रदेशों) में बाँटा गया है
(i) हिमालय का पर्वतीय प्रदेश (ii) उत्तर का विशाल मैदानी प्रदेश (iii) दक्षिण का पठारी प्रदेश (iv) थार का मरुस्थल (v) समुद्रतटीय मैदान एवं द्वीप समूह – (क) पूर्वी तटीय मैदान, (ख) पश्चिमी तटीय मैदान (vi) दीपमालाएँ (i) हिमालय का पर्वतीय प्रदेश- भारत के उत्तर में पर्वतराज हिमालय स्थित है ।। सालभर हिमकणिकाओं से लदा रहने वाला संसार का सर्वोच्च पर्वत हिमालय भारत और तिब्बत देश के बीच में एक भू-अवरोधक की। भाँति विराजमान है ।। यह पर्वतमाला एक चाप के रूप में पश्चिम से पूर्व 2500 किमी० तथा // 27.7% उत्तर से दक्षिण 150 से 400 किमी० तक विस्तृत है ।। हिमालय के पर्वतीय प्रदेश का क्षेत्रफल / 29.3% | पठारी भाग | पर्वतीय भाग 5 लाख वर्ग किमी० है ।। भारत की धरातलीय बनावट से लेकर जलवायु, आर्थिक विकास तथा 43.0% सांस्कृतिक परिवेश के निर्माण में हिमालय पर्वत ने भारत के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका मैदानी भाग निभाई है ।। भारत का हृदय कहे जाने वाला उत्तर का विशाल मैदान हिमालय की नदियों के निपेक्ष से बना है ।। उत्तर का विशाल मैदानी प्रदेश- हिमालय पर्वत का वरदान तथा भारत के हृदय के नाम से प्रसिद्ध उत्तर का विशाल मैदान विश्व के समतल और उपजाऊ मैदानों में गिना जाता है ।। उत्तरी मैदान हिमालय पर्वत के दक्षिण और दकन के पठार के शीर्ष तक स्थित है ।। इसका विस्तार पूर्व में असम तक तथा पश्चिम में पाकिस्तान की सीमा तक पाया जाता है ।। भारत के मध्य में स्थित होने के कारण इस मैदान को भारत भूमि का हृदय कहा जाता है ।। इसकी धड़कन से ही समूचा भारत जीवन पाता है ।। इसे जलोढ़ मैदान के नाम से जाना जाता है जो नवीन जलोढ़ मिट्टी से बना है और अत्यधिक उपजाऊ है ।। इसी कारण यहाँ आबादी का घनत्व अधिक है ।। नदियों की उपजाऊ जलोढ़ मृदा से बना यह समतल तथा उपजाऊ मैदान भारत भूमि के 7.5 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र पर फैला हुआ है ।। पूर्व से पश्चिम इसकी लंबाई 2414 किमी० तथा उत्तर से दक्षिण चौड़ाई 145 किमी० है ।। श्रीराम, कृष्ण, महावीर और गौतम की भूमि के रूप में उत्तर का विशाल मैदान अपने आर्थिक महत्व के कारण भारत का भाग्य विधाता है ।। (iii) दक्षिण का पठारी प्रदेश- उत्तर के विशाल मैदान के धुर दक्षिण में कठोर चट्टानों से बना जो त्रिभुजाकार पठार फैला है, उसे दक्षिण का पठारी प्रदेश कहा जाता है ।।
(क) स्थिति- दक्षिण का पठारी प्रदेश उत्तर के विशाल मैदान के दक्षिण में तीन ओर से सागर से घिरा हुआ है ।। इसके पूर्व में पूर्वी तटीय मैदान तथा पश्चिम में पश्चिमी तटीय मैदान स्थित हैं।
(ख) धरातलीय रचना- दक्षिण का पठारी प्रदेश प्राचीन कठोर आग्नेय चट्टानों से बना है ।। अपरदन के कारकों ने काट छाँट-कर इस प्रदेश को अत्यंत ऊबड़-खाबड़ बना दिया है ।। इसमें कहीं समतल मैदान, कहीं चोटियाँ तो कहीं-कहीं गहरी घाटियाँ पाई जाती हैं। इस पठारी प्रदेश के उत्तरी पश्चिमी भाग में उपजाऊ काली मिट्टी का भारी जमाव पाया जाता है ।। धरातलीय रचना की दृष्टि से इसे निम्न उपविभागों में बाँटा गया है
(क) दक्कन का पठार- मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक राज्यों में फैला पठारी भू–भाग दक्कन का पठार कहलाता है ।। इसके उत्तरी-पश्चिमी भाग में विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वत, मैकाल और महादेव पहाड़ियाँ हैं, जबकि पूर्व में पूर्वी घाट तथा पश्चिम में पश्चिमी घाट स्थित है ।। रवेदार चट्टानों से बना इस पठारी क्षेत्र का ढाल पश्चिम से पूर्व की ओर है ।। यहाँ महाराष्ट्र में सह्याद्रि, कर्नाटक में नीलगिरि तथा अन्नामलाई की पहाड़ियाँ पाई जाती हैं। इसके पश्चिमी घाट में थालघाट, भोरघाट तथा पालघाट के दरें आवागमन की सुविधाएँ प्रदान करते हैं। इसके उत्तरी क्षेत्र में भीमा, गोदावरी, तुंगभद्रा और कृष्णा तथा दक्षिण में कावेरी नदियाँ बहती हैं। कृष्णा के उद्गम के निकट महाबलेश्वर नामक प्रसिद्ध पर्वतीय नगर स्थित है ।। तमिलनाडु में प्रसिद्ध पर्वतीय नगर उटकमंड (ऊटी) स्थित है।
(ख) मध्यवर्ती उच्च भूमि- मालवा का पठार इस भू-भाग में आता है ।। ग्रेनाइट चट्टानों से संपन्न यह पठारी भू-भाग सागर तल से लगभग 800 मीटर तक ऊँचा है ।। इसके उत्तर में चंबल तथा बेतवा नदियाँ अनेक गहरे खड्ड या गड्ढे बनाती हैं। इसका पूर्वी क्षेत्र बुंदेलखंड का पठार जबकि सोन नदी के पूर्व का भाग मालवा का पठार कहा जाता है ।। इस भाग में राजमहल तथा पारसनाथ की पहाड़ियाँ स्थित हैं। दामोदर नदी इस पठार के मध्य में एक भ्रंशघाटी में बहती है ।। (iv) थार का मरुस्थल- राजस्थान के उत्तरी पश्चिमी क्षेत्र में शुष्क बलुई मिट्टी का जो क्षेत्र पाया जाता है, वह भारतीय मरुस्थल है जिसे थार का मरुस्थल भी कहते हैं। यह मरुस्थल क्षेत्र वर्षा न होने के कारण शुष्क और उष्ण क्षेत्र बन गया है ।। इस क्षेत्र में सर्वत्र रेत और बालू के टीले पाए जाते हैं। दिन में भयंकर धूल भरी गर्म आँधियाँ चलती हैं, जबकि रात में ठंड हो जाती है ।। इस क्षेत्र में नागफनी के वृक्ष या काँटेदार झाँड़ियाँ ही उगती हैं। कहीं-कहीं खजूर का उपयोगी वृक्ष भी उगता है ।। वर्षा के अभाव में इस क्षेत्र में सिंचाई की सुविधाएँ जुटाकर ज्वार-बाजरा उगाए जाते हैं। आर्थिक क्षेत्र में पिछड़ा यह भू-भाग विरल जनसंख्या वाला है ।। थार के मरुस्थल में साँभर तथा डिंडवाना की खारे जल से युक्त झीले हैं जिनके जल का उपयोग नमक बनाने में किया जाता है ।। परिवहन के साधनों के अभाव तथा संसाधनों की कमी के कारण यह क्षेत्र कृषि, उद्योग तथा व्यापारिक क्षेत्र में अत्यंत पिछड़ा हुआ है।
(v) समुद्र तटीय मैदान- भारत के पूर्व में बंगाल की खाड़ी तथा पश्चिम में अरब सागर है ।। कन्याकुमारी बंगाल की खाड़ी, हिंद महासागर और अरब सागर की त्रिवेणी है ।। भारत के पूर्वी तथा पश्चिमी तटों पर जो संकरी तथा समतल मैदानी पट्टियाँ पाई जाती हैं, उन्हें समुद्रतटीय मैदान कहकर पुकारा जाता है ।। ये मैदान निम्नलिखित हैं
(क) पूर्वी तटीय मैदान- बंगाल की खाड़ी और पूर्वी घाट के मध्य संकरी पट्टी के रूप में पश्चिम बंगाल से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक जो समतल क्षेत्र फैला है, पूर्वी तटीय मैदान कहलाता है ।। यह मैदान बलुई तथा चीका मिट्टी के निक्षेपों से बना है ।। महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों ने अपने डेल्टाओं से इसे उपजाऊ बना दिया है ।। इस मैदानी भाग में चावल, जूट, तंबाकू, केला तथा नारियल खूब उगाए जाते हैं। पूर्वी तटीय मैदान का उत्तरी भाग उत्कल तट तथा दक्षिणी भाग कोरोमंडल तट कहलाता है ।। पूर्वी तट के सागरीय भाग में कोलकाता, पारादीप, विशाखापट्टनम, तथा चेन्नई बंदरगाह स्थित हैं। यह तट मछली उद्योग तथा नारियल उद्योग के लिए प्रसिद्ध है ।। (ख) पश्चिमी तटीय मैदान- गुजरात प्रदेश की खंभात की खाड़ी से लेकर कन्याकुमारी तक, अरबसागर और पश्चिमी घाट के मध्य जो उपजाऊ और समतल पट्टी पाई जाती है, पश्चिमी तटीय मैदान के नाम से जानी जाती है ।। यह मैदान उपजाऊ मिट्टी से युक्त तथा उत्तम जलवायु वाला क्षेत्र होने के कारण रबड़, नारियल, केला, गरम मसाले, चावल तथा तंबाकू उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हो गया है ।। पश्चिमी तटीय मैदान का उत्तरी भाग कोंकण तट तथा दक्षिणी तट मालाबार तट कहलाता है ।। कपास का प्रसिद्ध उत्पादन क्षेत्र होने के कारण यहाँ
सूती वस्त्र उद्योग खूब उन्नति कर गया है ।। काँदला, मुंबई तथा कोच्चि इस क्षेत्र के प्रमुख बंदरगाह हैं। (vi) द्वीप मालाएँ- भारत की दो द्वीप मालाएँ भी हैं जो बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में स्थित है ।। ये द्वीप ज्वालामुखी से निकले अवसादों से बने हैं। बंगाल की खाड़ी में अंडमान निकोबार द्वीप समूह हैं। इस क्षेत्र में 204 द्वीप हैं। यह द्वीप समूह भारत का केंद्र शासित प्रदेश है ।। इस द्वीप समूह की राजधानी पोर्टब्लेयर है ।। भारत की नौसैनिक सामरिक सुरक्षा की दृष्टि से इन द्वीपों का विशेष महत्व है ।। ये द्वीप समूह सदाबहार वर्षा वनों से संपन्न है ।। यहाँ के मैदानी क्षेत्रों में चावल, गन्ना, केला और नारियल उगाए जाते हैं। अरब सागर में लक्षद्वीप समूह स्थित है ।। यह द्वीप समूह भारतीय तट से लगभग 250 किमी० दूर हैं। यह भी भारत का संघ शासित प्रदेश है, जिसकी राजधानी कवारत्ती है ।। इन द्वीपों के लोगों का मुख्य धंधा मछलियाँ पकड़ना तथा नारियल उगाना है ।। ये दोनों द्वीप समूह भारत संघ के ही अभिन्न अंग है ।।


प्रश्न—2. हिमालय के पर्वतीय प्रदेश का विवरण निम्न शीर्षकों के अंतर्गत कीजिए।
(क) स्थिति तथा विस्तार (ख) धरातलीय बनावट (ग) जलप्रवाह प्रणाली (घ) महत्व
उ०- हिमालय का पर्वतीय प्रदेश
(i) स्थिति एवं विस्तार- भारत के उत्तर में पर्वतराज हिमालय स्थित है ।। सालभर हिमकणिकाओं से लदा रहने वाला संसार का सर्वोच्च पर्वत हिमालय भारत और तिब्बत देश के बीच में एक भू-अवरोधक की भाँति विराजमान है ।। यह पर्वतमाला एक चाप के रूप में पश्चिम से पूर्व 2500 किमी० तथा उत्तर से दक्षिण 150 से 400 किमी० तक विस्तृत है ।। हिमालय के पर्वतीय प्रदेश का क्षेत्रफल 5 लाख वर्ग किमी० है।
(ii) प्राकृतिक (धरातलीय ) बनावट- विद्वानों का मत है कि हिमालय पर्वत की रचना आज से लगभग 5 करोड़ वर्ष पूर्व सागर तल में जमी तलछटों में आंतरिक बलों के प्रभाव से पड़ने वाले मोड़ों के फलस्वरूप हुई है ।। इसीलिए इसकी प्राकृतिक बनावट कठोर चट्टानों वाली अत्यंत ऊँची नीची है ।। इसकी गगनचुंबी और कठोर चट्टानों वाली पर्वत चोटियाँ सालभर बर्फ से ढकी रहती हैं, जबकि निचले ढालों पर हरी घास तथा प्राकृतिक वनस्पति का आवरण पाया जाता है ।। निम्न भागों में चट्टानें बालू तथा कंकड़ पत्थर वाली हैं जो वर्षा में घुल कर बहती और फिसलती रहती हैं। हिमालय के पर्वतीय प्रदेश को अग्रलिखित तीन भागों में बाँटा गया है(क) महान (वृहद् ) हिमालय- हिमालय पर्वत का सर्वोच्च उत्तरी भाग जो समुद्रतल से लगभग 6000 मीटर से भी
अधिक ऊँचा है, हिमाद्री या महान हिमालय कहलाता है ।। यह पश्चिम में सिंधु नदी के मोड़ से पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी के मोड़ तक विस्तृत है ।। यह उत्तर से आने वाली ठंडी हवाओं को रोकता है और मानसूनी हवाओं को रोककर भारत में वर्षा कराने में सहायक है ।। इसके संदर्भ में निम्न तथ्य जानने योग्य है ।।
(अ) पर्वत शिखर- (1) माउंट एवरेस्ट विश्व का सर्वोच्च पर्वत शिखर ऊँचाई 8848 मीटर, स्थिति नेपाल में।
(2) गॉडविन ऑस्टिन (के-2) ऊँचाई 8611 मीटर, स्थिति पाक अधिकृत कश्मीर में
(3) कंचनजंघा ऊँचाई, 8598 मीटर, स्थिति भारत में।
अन्य मकालू, धौलागिरी, नंगापर्वत, नंदादेवी आदि।
(ब) दर्रे- शिपकीकला, जोजिला, नीति, नाथूला, जेलेपा तथा बोमडिला आदि प्रमुख हैं। जिनके संकरे रास्तों से तिब्बत के पठार तथा हिमालय पर्वत होकर भारत आया-जाया जाता है ।।
(ख) मध्य (लघु) हिमालय- महान हिमालय से निचला दक्षिणी भाग मध्य हिमालय कहलाता है ।। इस क्षेत्र की समुद्रतल से औसत ऊँचाई 2000 से 3500 मीटर तक है ।। इसे कश्मीर में पीरपंजाल तथा हिमाचल में धौलाधार कहा जाता है ।। इस क्षेत्र की आकर्षक प्राकृतिक सुषमा और सुहावनी जलवायु ने पर्वतीय नगरों को पर्यटन का केंद्र बना दिया है ।। डलहौजी, शिमला, मसूरी, नैनीताल तथा दार्जिलिंग आदि नगर पर्यटकों के आकर्षण के केंद्र बने रहते हैं। इस क्षेत्र में कश्मीर, काँगड़ा, कुल्लू तथा पोखरा की घाटियाँ सौंदर्य और प्राकृतिक दृश्यावली के कारण लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती रहती हैं। यह क्षेत्र फल, सब्जी और चाय उगाने के लिए भी प्रसिद्ध है।
(ग) बाह्य ( उप ) हिमालय- हिमालय पर्वत का सबसे दक्षिणी भाग शिवालिक के नाम से प्रसिद्ध है ।। यह क्षेत्र समुद्रतल से 600 मीटर से 1500 मीटर तक ऊँचा है ।। इस क्षेत्र में असमान ऊँची तथा नीची चोटियाँ पाई जाती हैं। यहाँ की पश्चिमी क्षेत्र की घाटियों को दून तथा पूर्व की घाटियों को द्वार कहा जाता है ।। इसका पूर्वी भाग नागा, लुशाई, गारो, खासी और जयंतिया की पहाड़ियों से घिरा है।


(iii) जल प्रवाह प्रणाली- उत्तरी भारत की सदानीरा नदियों के उद्गम स्थल हिमालय पर्वत के हिमनद ही हैं। इसके पश्चिमी क्षेत्र में सिंधु तथा उत्तर की सहायक नदियाँ पूर्वोत्तर से निकलकर पश्चिम-दक्षिण को बहती हुई अरब सागर में गिर जाती हैं। हिमालय पर्वत के मध्यवर्ती क्षेत्र के हिमनदों से गंगा और उसकी सहायक नदियाँ निकलकर दक्षिण पूर्व को बहती हुई बंगाल की खाड़ी में गिर जाती हैं। उत्तर का विशाल मैदान गंगानदी का वरदान ही है ।। पूर्वी भाग में ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियाँ पश्चिम-दक्षिण की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिर जाती हैं। हिमालय पर्वत की जल प्रवाह प्रणाली से ये समस्त नदियाँ जलविद्युत निर्माण, सिंचाई, नौकाचालन तथा पेयजल के रूप में उत्तरी भारत के लिए प्राकृतिक वरदान बनकर प्रवाहित होती हैं। वर्षा ऋतु में इनमें आने वाली बाढ़े विनाश का भी कारण बनती हैं। महत्व- भारत की धरातलीय बनावट से लेकर जलवायु, आर्थिक विकास तथा सांस्कृतिक परिवेश के निर्माण में हिमालय पर्वत ने भारत के लिए बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है ।। हिमालय पर्वत पर निवास करने वाले देवताओं ने भारत को निम्न महत्त्वपूर्ण वरदानों से लाभान्वित किया है ।। (i) हिमालय भारत की उत्तरी अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर अभेदम् दीवार के रूप में सजग प्रहरी बन कर खड़ा हुआ। (ii) भारत की धरातलीय रचना में हिमालय पर्वत ने विशेष योग दिया है ।। भारत का हृदय कहलाने वाला उत्तर का विशाल मैदान हिमालय की नदियों के निक्षेप से बना है ।। भारत की जलवायु को वर्षा का जल सुलभ कराने में तथा साइबेरिया की ओर से बर्फीली हवाओं से बचाने में इसी देव भूमि का योगदान रहता है ।। (iii) हिमालय पर्वत के हिमनढ़ सिंधु गंगा तथा ब्रह्मपुत्र नदियों के उद्गम स्रोत हैं जो अपनी विरल और शीतल जल से बिजली, सिंचाई परिवहन तथा पेयजल सुलभ कराकर भारत में जीवन के अंकुर उपजाती रहती हैं। (iv) हिमालय प्राकृतिक वनस्पति का अतुल भंडार होने के कारण उपयोगी काष्ठ, औषधियों फलों तथा वन्य जंतुओं के रूप में अनेक उपहार देता है ।। हिमालय पर्वत के उपजाऊ ढाल, चाय, फल, चावल तथा अनेक फलों का उत्पादन भारत के आर्थिक विकास में सहयोगी बनते हैं।
(vi) हिमालय पर्वत में स्थित धरती का स्वर्ग कश्मीर घाटी, अन्य घाटियां, जलप्रपात तथा पर्वतीयनगर देश तथा विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।।
(vii) हिमालय पर्वत की नदियों पर पाए जाने वाले प्राकृतिक जल प्रपात जलविद्युत उत्पादन करके भारत के औद्योगिकरण
तथा आर्थिक विकास में भरपूर सहयोग देते हैं।


प्रश्न—-3. उत्तर के विशाल मैदान का वर्णन निम्न शीर्षकों के अंतर्गत कीजिए।
(i) विस्तार व स्थिति (ii) उच्चावच (iii) जल प्रवाह प्रणाली (iv) महत्व
उ०- उत्तर का विशाल मैदानी प्रदेश- हिमालय पर्वत का वरदान तथा भारत के हृदय के नाम से प्रसिद्ध उत्तर का विशाल मैदान विश्व के समतल और उपजाऊ मैदानों में गिना जाता है ।। (i) स्थिति- उत्तरी मैदान हिमालय पर्वत के दक्षिण और दकन के पठार के शीर्ष तक स्थित है ।। इसका विस्तार पूर्व में असम तक तथा पश्चिम में पाकिस्तान की सीमा तक पाया जाता है ।। भारत के मध्य में स्थित होने के कारण इस मैदान को भारत भूमि का हृदय कहा जाता है ।। इसकी धड़कन से ही समूचा भारत जीवन पाता है ।। इसे जलोढ़ मैदान के नाम से जाना जाता है जो नवीन जलोढ़ मिट्टी से बना है और अत्यधिक उपजाऊ है ।। इसी कारण यहाँ आबादी का घनत्व अधिक है ।।
(ii) विस्तार एवं प्राकृतिक बनावट- नदियों की उपजाऊ जलोढ़ मृदा से बना यह समतल तथा उपजाऊ मैदान भारत भूमि के 7.5 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र पर फैला हुआ है ।। पूर्व से पश्चिम इसकी लंबाई 2414 किमी० तथा उत्तर से दक्षिण चौड़ाई 145 किमी० है ।। इस मैदान का विस्तार निम्न तीन क्षेत्रों में बँटा है

(क) पश्चिमी मैदान- राजस्थान, पंजाब तथा हरियाणा राज्यों में फैला यह मैदानी भाग उत्तरी मैदान का पश्चिमी शुष्क भाग कहलाता है ।। यह 1.75 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र में फैला हुआ। इस मैदानी क्षेत्र का निर्माण पंजाब की पाँचों नदियों तथा यमुना नदी के अवसादों के जमने के कारण हुआ है ।। (ख) गंगा का मैदान- यह मैदानी भाग उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग से लेकर बिहार तक विस्तृत है ।। यह मध्यवर्ती मैदान भी कहलाता है ।। इसका निर्माण यमुना और गंगा की सहायक नदियों ने भारी जलोढ़ मिट्टी बिछाकर किया है ।। इस मैदान का पुरानी जलोढ़ मिट्टी का क्षेत्र बाँगर तथा प्रतिवर्ष नई जलोढ़ मिट्टी के जमाव वाला क्षेत्र खादर कहलाता है ।। खादर क्षेत्र में बाढ़ का जल प्रतिवर्ष नई काँप मिट्टी जमा करके उर्वरता में वृद्धि करता रहता है ।।
(ग) बमपुत्र का मैदान- बिहार, झारखंड, पश्चिमी बंगाल तथा असम तक विस्तृत यह मैदान पूर्वी मैदान के नाम से भी जाना जाता है ।। इसका निर्माण गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों ने काँप मिट्टी बिछाकर किया है ।। (iii) जल प्रवाह प्रणाली- उत्तर के विशाल मैदान की जल प्रवाह प्रणाली का निर्माण हिमालय पर्वत से निकलने वाली वे समस्त नदियाँ करती हैं जिनका वर्णन हिमालय पर्वत की जलप्रवाह प्रणाली के रूप में किया जा चुका है ।।
(iv) उत्तर के विशाल मैदान का महत्व- श्रीकृष्ण, राम, महावीर और गौतम की भूमि के रूप में उत्तर का विशाल मैदान अपने आर्थिक महत्व के कारण भारत का भाग्य विधाता बना रहा है ।। इसका महत्व निम्नवत् है—-
(क) उत्तर का विशाल मैदान उपजाऊ जलोढ़ मृदा से बना कृषि व्यवसाय का आधार होने के कारण महत्वपूर्ण है ।। यह भारतीय कृषि उपजों की प्रचुरता के कारण भारत का अन्न भंडार बन गया है ।। (ख) उत्तरी भारत की सदावाहिनी नदियाँ तथा नियतवाही नहरें सिंचाई व्यवस्था का जाल बनाकर कृषि विकास में वरदान सिद्ध हुई हैं।
(ग) उत्तरी भारत में रेलमार्गों और सड़कों का जाल बिछा हुआ है जिससे यहाँ कृषि, उद्योग, वाणिज्य तथा परिवहन का खूब विकास हो गया है।
(घ) यह मैदानी क्षेत्र, कच्चे माल, ऊर्जा, परिवहन, संचार तथा सुलभ श्रम के कारण चीनी उद्योग, सूती वस्त्र उद्योग तथा जूट उद्योग का केंद्र बनकर उभरा है ।।
(ड) उत्तम जलवायु, खाद्यान्न आपूर्ति, उद्योग, परिवहन, संचार तथा रोजगार के अवसरों ने उत्तरी मैदान को जनसंख्या के बसाव का आकर्षण केंद्र बना दिया है ।। भारत की 40% जनसंख्या का आश्रय स्थल यही मैदान बना हुआ है ।।
(च) उत्तर का विशाल मैदान प्राचीनकाल से ही सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है।


प्रश्न—- 4. भारत के दक्षिण के पठारी भाग का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत कीजिए।
(i) स्थिति तथा विस्तार (ii) उच्चावच (iii) जल प्रवाह प्रणाली (iv) खनिज संपदा
उ०- दक्षिण का पठारी प्रदेश- उत्तर के विशाल मैदान के दक्षिण में कठोर चट्टानों से बना जो त्रिभुजाकार पठार फैला है, उसे दक्षिण का पठारी प्रदेश कहा जाता है।
(i) स्थिति एवं विस्तार- दक्षिण का पठारी प्रदेश उत्तर के विशाल मैदान के दक्षिण में तीन ओर से सागर से घिरा हुआ है।
इसके पूर्व में पूर्वी तटीय मैदान तथा पश्चिम में पश्चिमी तटीय मैदान स्थित हैं। यह पहाड़ी प्रदेश 16 लाख वर्ग किमी० क्षेत्रफल में विस्तृत है ।। इस पठारी प्रदेश का विस्तार उत्तर में राजस्थान से लेकर दक्षिण में कुमारी अंतरीप तक 1700 किमी० की लंबाई तथा पश्चिम में गुजरात राज्य से लेकर पूर्व में पश्चिमी बंगाल तक 1400 किमी० की चौड़ाई में है। प्राकृतिक दृष्टिकोण से उसकी उत्तरी सीमा अरावली, कैमूर तथा राजमहल की पहाड़ियों द्वारा निर्धारित होती हैं।
(ii) उच्चावच या धरातलीय रचना- दक्षिण का पठारी प्रदेश प्राचीन कठोर आग्नेय चट्टानों से बना है ।। अपरदन के कारकों ने काट छाँट कर इस प्रदेश को अत्यंत ऊबड़-खाबड़ बना दिया है ।। इसमें कहीं समतल मैदान, कहीं चोटियाँ तो कहीं-कहीं गहरी घाटियाँ पाई जाती हैं। इस पठारी प्रदेश के उत्तरी पश्चिमी भाग में उपजाऊ काली मिट्टी का भारी जमाव पाया जाता है ।। धरातलीय रचना की दृष्टि से इसे निम्न उपविभागों में बाँटा गया है
(क) दक्कन का पठार- मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक राज्यों में फैला पठारी भू–भाग दक्कन का पठार कहलाता है ।। इसके उत्तरी-पश्चिमी भाग में विंध्याचल और सतपुडा पर्वत, मैकाल और महादेव पहाड़ियाँ हैं, जबकि पूर्व में पूर्वी घाट तथा पश्चिम में पश्चिमी घाट स्थित है ।। रवेदार चट्टानों से बना इस पठारी क्षेत्र का ढाल पश्चिम से पूर्व की ओर है ।। यहाँ महाराष्ट्र में सह्याद्रि, कर्नाटक में नीलगिरि तथा अन्नामलाई की पहाडियाँ पाई जाती हैं। इसके पश्चिमी घाट में थालघाट, भोरघाट तथा पालघाट के दरें आवागमन की सुविधाएँ प्रदान करते हैं। इसके उत्तरी क्षेत्र में भीमा, गोदावरी, तुंगभद्रा और कृष्णा तथा दक्षिण में कावेरी नदियाँ बहती हैं। कृष्णा के उद्गम के निकट महाबलेश्वर नामक प्रसिद्ध पर्वतीय नगर स्थित है ।। तमिलनाडु में प्रसिद्ध पर्वतीय नगर उटकमंड (ऊटी) स्थित है ।।

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(ख) मध्यवर्ती उच्च भूमि- मालवा का पठार इस भू-भाग में आता है ।। ग्रेनाइट चट्टानों से संपन्न यह पठारी भू–भाग सागर तल से लगभग 800 मीटर तक ऊँचा है ।। इसके उत्तर में चंबल तथा बेतवा नदियाँ अनेक गहरे खड्ड या गड्ढे बनाती हैं। इसका पूर्वी क्षेत्र बुंदेलखंड का पठार जबकि सोन नदी के पूर्व का भाग मालवा का पठार कहा जाता है ।। इस भाग में राजमहल तथा पारसनाथ की पहाड़ियाँ स्थित हैं। दामोदर नदी इस पठार के मध्य में एक भ्रंशघाटी में बहती है ।।
(ग) जल प्रवाह प्रणाली- दक्षिण के पठार का प्रवाह तंत्र दो भागों में बँटा हुआ है ।। पूर्वी भाग का प्रवाह तंत्र उन नदियों के योग से बनता है जो मध्यवर्ती पठार से निकलकर बंगाल की खाड़ी में गिर जाती हैं। इनमें महानदी, दामोदर, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी नदियाँ आती हैं। पश्चिमी क्षेत्र का प्रवाह तंत्र उन नदियों के योग से बना है जो मध्य के पर्वतों से निकलकर पश्चिम में अरब सागर में गिर जाती है ।। इनमें नर्मदा, तापी, लूनी तथा साबरमती नदियाँ प्रमुख है।
(घ) खनिज संपदा- प्रकृति ने दक्षिण के पठार को पर्याप्त खनिज संसाधन प्रदान किए हैं। इस पठार की आग्नेय शैलों ने लौह अयस्क, कोयला, सोना, ताँबा, अभ्रक, मैंगनीज तथा बॉक्साइट आदि खनिजों को जन्म देकर इसे भारत का खनिज भंडार बना दिया है ।। ये खनिज पदार्थ दक्षिण भारत के राज्यों के साथ-साथ भारत के अन्य राज्यों के औद्योगिक विकास में सहायक बने हैं। इस क्षेत्र में पाए जाने वाले संगमरमर तथा चूना पत्थर ने भवन निर्माण के साथ-साथ उद्योगों को विकसित करने में भी सहयोग प्रदान किया है ।। दक्कन के पठार में स्थित ओडिशा, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, झारखंड तथा तमिलनाडु खनिज भंडारों के कारण सर्वांगीण उन्नति कर गए हैं।
प्रश्न—-5. भारत के पूर्वी तथा पश्चिमी तटीय मैदानों का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत कीजिए। (i) स्थिति तथा विस्तार (ii) मुख्य फसलें व उद्योग
उ०- (i) पूर्वी तटीय मैदान
(क) स्थिति एवं विस्तार- बंगाल की खाड़ी एवं पूर्वी घाट के मध्य संकरी पट्टी के रूप में पश्चिमी बंगाल से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक तो समतल क्षेत्र फैला हुआ है, पूर्वी तटीय मैदान कहलाता है ।। उत्तर में स्वर्ण रेखा नदी से दक्षिण में कुमारी अंतरीय तक विस्तृत यह मैदान पश्चिमी तटीय मैदान की अपेक्षा अधिक चौड़ा है।
इसकी औसत चौड़ाई 161 किमी० से 480 किमी० तक है ।। (ख) फसलें एवं उद्योग- पूर्वी तटीय मैदान बुलई तथा चीका मिट्टी के निक्षेपों से बना है ।। महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों ने अपने डेल्टाओं से उपजाऊ बना दिया है ।। यहाँ की मुख्य फसलें गन्ना, चावल, तम्बाकू,
जूट और नारियल हैं। यह तट मछली तथा नारियल उद्योग के लिए प्रसिद्ध है ।। (ii) पश्चिमी तटीय मैदान(क) स्थिति एवं विस्तार- गुजरात प्रदेश की खंबात की खाड़ी से लेकर कन्याकुमारी तक, अरब सागर और पश्चिमी घाट के मध्य जो उपजाऊ और समतल पट्टी पाई जाती है, पश्चिमी तटीय मैदान के नाम से जानी जाती है ।। इस मैदान की औसत चौड़ाई 165 किमी० है ।। यह मध्य में संकीर्ण है किन्तु इसका उत्तरी और दक्षिणी भाग चौड़ा है ।। दमन से गोवा तक के 500 किमी० तक के प्रदेश को कोकण तट, मध्य भाग में गोवा से मंगलौर तक के 225 किमी० के विस्तार को कोंकण तट तथा मंगलौर व कन्याकुमारी के बीच के 500 किमी० क्षेत्र को मालाबार तट कहते हैं।
(ख) फसलें एवं उद्योग- पश्चिमी तटीय मैदान उपजाऊ मिट्टी से युक्त तथा उत्तम जलवायु वाला क्षेत्र होने के कारण रबड़, नारियल, केला, गरम मसाले, कपास, चावल तथा तम्बाकू उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है ।। नमक बनाना, मत्स्य संग्रहण, नारियल से रेशे बनाना तथा सूती वस्त्र यहाँ के प्रसिद्ध उद्योग हैं।
प्रश्न—- 6. भारत के पूर्वी व पश्चिमी तटीय मैदानों की तुलना कीजिए। उ०- भारत के पूर्वी तथा पश्चिमी मैदानों की तुलनाभारत के पूर्वी तटीय मैदान भारत के पश्चिमी तटीय मैदान ।

पूर्वी तटीय मैदान का विस्तार प्रायद्वीप के पूर्वी किनारों पर पश्चिमी तटीय मैदान का विस्तार प्रायद्वीप के पश्चिमी | पश्चिमी बंगाल से लेकर कन्याकुमारी तक है।
किनारों पर खंभात की खाड़ी से लेकर कन्याकुमारी अंतरीम तक है ।।

पूर्वी तटीय मैदान की औसत चौड़ाई 64 किमी० है ।। | पश्चिमी तटीय मैदान की औसत चौड़ाई 161 से 483 किमी० है ।। |
प्रश्न—-3. यह मैदान चावल, जूट, तंबाक, केला तथा नारियल आदि इस मैदान की प्रमुख फसलें रबड़, कपास, नारियल, केला, | फसलों के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है | गरम मसाले, चावल तथा तंबाकू आदि प्रमुख हैं। 4. पूर्वी तट के सागरीय भाग में कोलकाता, पारा द्वीप, इस क्षेत्र के प्रमुख बंदरगाह काँदला, मुम्बई तथा कोच्चि हैं। विशाखापट्टनम तथा चैन्नई बंदरगाह प्रमुख हैं। 5. इस क्षेत्र के प्रमुख उद्योग मत्स्य संग्रहण एवं नारियल इस क्षेत्र के प्रमुख उद्योग नमक बनाना, मत्स्य संग्रहण एवं उद्योग है ।। नारियल से रेशे बनाना सूती वस्त्र उद्योग आदि हैं।
प्रश्न—-7. भारत को प्राकृतिक भौतिक प्रदेशों में विभाजित कीजिए तथा इनमें से किसी एक का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत कीजिए। (i) स्थिति व विस्तार प्राकृतिक स्वरूप
उ०- उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए।

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