Up board class 10 social science full solution chapter 10

Up board class 10 social science full solution chapter 10 भारत में यूरोपीय शक्तियों का आगमन एवं प्रसार

UP BOARD CLASS 10 SOCIAL SCIENCE CHAPTER 6
UP BOARD CLASS 10 SOCIAL SCIENCE CHAPTER 4 FULL SOLUTION

इकाई-2 (क): आधुनिक भारत

पाठ 10 भारत में यूरोपीय शक्तियों का
आगमन एवं प्रसार-

Table of Contents

लघुउत्तरीय प्रश्न
1. भारत में अंग्रेजों की सफलता के तीन कारण लिखिए। उ०- भारत में अंग्रेजों की सफलता के तीन कारण निम्नलिखित हैं
(i) अंग्रेज कंपनी की आर्थिक दशा उन्नत होने के कारण अंग्रेजों के पास धन और संसाधन अधिक थे। (ii) पर्याप्त धन एवं अस्त्र-शस्त्रों के कारण अंग्रेज फ्रांसीसियों से सदैव जीतते रहे।
(iii) अंग्रेज सरकार ईस्ट इंडिया कंपनी को आर्थिक तथा अस्त्र-शस्त्र की मदद देती रहती थी, जिससे उसकी विजय होती थी।
2. भारत में फ्रांसीसियों की असफलता के लिए उत्तरदायी तीन कारण स्पष्ट कीजिए।
उ०- भारत में फ्रांसीसियों की असफलता के तीन कारण निम्नलिखित हैं(i) फ्रांसीसी कंपनी फ्रांस की सरकार पर पूरी तरह निर्भर थी। उसे आवश्यकता के समय न तो धन मिलता था और न तुरंत
कार्यवाही करने का आदेश, जिससे उसे असफलता का मुख देखना पड़ा। (ii) फ्रांसीसी कंपनी की आर्थिक दशा खराब थी, जिससे वह सैन्य उपकरण खरीदने में असमर्थ होकर असफल रही। (iii) फ्रांसीसी कंपनी के अधिकारियों में एकता, सहयोग तथा विश्वास का अभाव था। वे एकमत से निर्णय नहीं कर पाते थे,
जिससे उन्हें असफल रहना पड़ता था।
3. प्लासी का युद्ध किन-किन के बीच हुआ? इसके दो प्रमुख प्रभाव लिखिए।
उ०- प्लासी का युद्ध रॉबर्ट क्लाइव और बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के मध्य सन् 1757 ई० में हुआ। इस युद्ध के दो प्रमुख प्रभाव
निम्नलिखित हैं(i) इस युद्ध की विजय ने अंग्रेजों को बंगाल का स्वामी बनाकर उनके लिए भारत का भाग्यविधाता बनने के द्वार खोल दिए। (ii) प्लासी के युद्ध ने फ्रांसीसियों की असफलता के द्वार खोल दिए। 4. बक्सर का युद्ध कब और किसके बीच हुआ? इस युद्ध से अंग्रेजों को कौन-कौन से दो लाभ हुए। उ०- बक्सर का युद्ध 1764 ई० में बंगाल के नवाब मीरकासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा अंग्रेजों की सेनाओं के मध्य
हुआ। इस युद्ध से अंग्रेजों को निम्नलिखित दो लाभ हुए। (i) अंग्रेजों के यश और प्रभुत्व में वृद्धि हुई तथा उन्हें उत्तरी भारत में पैर पसारने का अवसर मिला। (ii) इस युद्ध ने अंग्रेजों को बिहार, उड़ीसा और बंगाल का शासक बना दिया।
5. ईस्ट इंडिया कंपनी का भार त में व्यापार करने के पीछे क्या लक्ष्य था? उसे उसने कैसे पूरा किया?
उ०- ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में व्यापार करने के पीछे लक्ष्य भारत के व्यापार तथा सत्ता पर अपना अधिकार जमाना था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत से फ्रांसीसियों को खदेड़ कर तथा देशी रियायतों को जीतकर अपने लक्ष्य को पूरा किया।
विस्तृत उत्तरीय प्रश्न
1. प्लासी और प्लासी के युद्ध ने किस प्रकार भारत में ब्रिटिश शासन की नींव डाली।
उ०- सन् 1756 ई० में सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना। परन्तु कंपनी उसकी शक्ति को देखते हुए किसी अन्य को नवाब बनाना चाहती थी जो उन्हें व्यापारिक सुविधाएं तथा अन्य रियायतें आसानी से दे सके। परन्तु वे कामयाब न हो सके। सिराजुद्दौला ने कंपनी को किलेबंदी रोकने तथा बकाया राजस्व चुकाने का आदेश दिया। कंपनी के ऐसा न करने पर नवाब ने कलकत्ता (अब कोलकाता) स्थित कंपनी के किले पर कब्जा कर लिया। कलकत्ता की खबर सुनकर कंपनी के अफसरों ने रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में सेनाओं को रवाना कर दिया। आखिरकार सन् 1757 ई0 में प्लासी के मैदान में रॉबर्ट क्लाइव तथा सिराजुद्दौला अपनी-अपनी सेनाओं के साथ आमने-सामने थे। सिराजुद्दौला को हार का सामना करना पड़ा, जिसका एक बड़ा कारण उसके सेनापति मीरजाफर का षड्यंत्र था। प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों की जीत अत्यंत महत्वपूर्ण थी क्योंकि भारत में यह कंपनी की पहली बड़ी जीत थी। इस युद्ध के बाद मीरजाफर को बंगाल का कठपुतली नवाब बनाया गया। इस युद्ध ने ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन को भारत में स्थिरता प्रदान करते हुए ब्रिटिश उपनिवेशवाद का बीजारोपण किया। बक्सर का युद्ध- जल्दी ही कंपनी को यह एहसास हो गया कि कठपुतली नवाब हमेशा उनका साथ देने वाला नहीं है। अतः जब मीरजाफर कंपनी का विरोध करने लगा तो उसे हटाकर मीरकासिम को नवाब बना दिया गया। परन्तु जब मीरकासिम भी देशहित में स्वतंत्र निर्णय लेने लगा और अंग्रेजों के हित प्रभावित होने लगे तो अंग्रेजों को 1764 ई० में एक दूसरा युद्ध करना पड़ा जिसे ‘बक्सर का युद्ध’ कहा जाता है। इस युद्ध में एक ओर अंग्रेजों की सेना तथा दूसरी ओर बंगाल के पूर्व नवाब मीरकासिम, अवध के नवाब शुजाउद्दौला तथा मुगल सम्राट शाहआलम की संयुक्त सेनाएँ थीं। इस युद्ध में भी अन्ततः ‘हेक्टर मुनरो’ के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना विजयी हुई। इस युद्ध ने न केवल प्लासी के अपूर्ण कार्य को पूरा किया बल्कि उसने ब्रिटिश कंपनी को एक पूर्ण प्रभुता संपन्न बना दिया।
2. भारत में यूरोप से किन-किन देशों के लोग व्यापार करने आए? उनमें किस देश के लोगों को सफलता मिली और क्यों?
उ०- भारत में यूरोप से आने वाले देशों के व्यापारियों की श्रृंखला निम्नवत् रही(i) पुर्तगालियों का आगमन- 17 मई, 1498 ई० में पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा ने भारत के पश्चिमी सागर तट पर
स्थित कालीकट के बंदरगाह पर पहुँचकर अपने देश के व्यापारियों के लिए भारत का समुद्री मार्ग खोज लिया। भारत में सर्वप्रथम आने वाले पुर्तगाली ही थे। उन्होंने व्यापारिक संबंधों का सूत्रपात कर एक नए युग का शुभारंभ किया। भारत में पुर्तगाल की शक्ति की नींव डालने का श्रेय अलफांसों अल्बुकर्क को है, जो 1503 ई० में भारत आया। उसने कोचीन में पुर्तगालियों के लिए एक किले का निर्माण करवाया। 1505 ई० में फ्रांसिस्को डी-अल्मीडा पुर्तगाली गवर्नर बनकर भारत पहुँचा। उसने भारत-प्रवास की अवधि में पुर्तगाली नौसेना का गठन किया। 1509 ई० में अल्बुकर्क भारत में पुनः पुर्तगाली कार्यों का गर्वनर बनकर आया। उसने गोवा के बंदरगाह पर अधिकार जमाकर, दुर्ग को शक्तिसंपन्न बनाकर व्यापार को बढ़ाने का प्रयास किया। गोवा पुर्तगाली संस्कृति का केंद्र बन गया। पुर्तगालियों ने दीव, दमन, चोल, चेन्नई
तथा हुगली में अपनी बस्तियाँ स्थापित की। पुर्तगालियों का गोवा, दमन और दीव पर 1961 ई० तक अधिकार बना रहा। (ii) डचों का आगमन- पुर्तगाल के निवासियों के भारत आगमन से उत्साहित होकर हॉलैंड के निवासी ‘डच’ भी भारत आए। 1602 ई० में हॉलैंड ने भारत में व्यापार करने के उद्देश्य से ‘डच इंडिया कंपनी’ की स्थापना की। 1596 ई० में कार्निलियस यूटमैन भारत में आने वाला प्रथम डच नागरिक था। डचों ने भारत में आकर मसालों के व्यापार पर अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया। दक्षिण भारत में उनका प्रभाव बढ़ गया। उन्होंने सूरत, भड़ौंच, अहमदाबाद, कोचीन, मछलीपट्टनम, चिंसुरा तथा पटना में अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापित की। डच शीघ्र ही अंग्रेजों तथा
फ्रांसीसियों की स्पर्धा के शिकार होकर असफल हो गए तथा हारकर भारत से लौट गए। (iii) अंग्रेजों का आगमन- साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं से ओत-प्रोत और विस्तारवादी यूरोपीय शक्तियों में अग्रणी अंग्रेज
जाति भारत के प्राकृतिक संसाधनों के साथ गरम मसालों तथा हस्तशिल्प की वस्तुओं का व्यापार करके पर्याप्त धन कमाने के मोह में बंधकर भारत भूमि में आ धमकी। 1600 ई० में ‘ईस्ट इंडिया’ कंपनी बनी। विलियम हॉकिंस के नेतृत्व में अंग्रेजों का पहला जहाजी बेड़ा 1608 ई० में भारत पहुँचा। 1613 ई० में अंग्रेजों ने सूरत में अपनी व्यापारिक कोठी की स्थापना की। 1615 ई० में सर टॉमस रो भारत आया और उसने मुगल सम्राट जहाँगीर से भारत में व्यापार करने की अनुमति प्राप्त की। इस अवधि में अंग्रेजों ने अपनी व्यापारिक कोठियाँ सूरत, अहमदाबाद और भड़ौंच में स्थापित कर लीं। 1640 ई० में ईस्ट इंडिया कंपनी ने मद्रास में एक किला स्थापित किया। कंपनी ने बाद में बंगाल तथा कोलकाता में भी व्यापारिक कोठियाँ बनाकर अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाया। ईस्ट इंडिया कंपनी का संघर्ष डचों तथा
फ्रासीसियों से होता रहा। क्योंकि वह भारत के व्यापार और सत्ता पर अपना अधिकार जमाना चाहते थे। (iv) फ्रांसीसियों का आगमन- भारत-भूमि में प्रवेश करने वाले फ्रांसीसी सबसे बाद में पहुँचे। 1664 ई० में फ्रैंच ईस्ट
इंडिया कंपनी की स्थापना की गई। भारत पहुँचकर उन्होंने पांडिचेरी और चंद्रनगर में अपनी व्यापारिक कोठियों की स्थापना की। 1742 ई० में डूप्ले पांडिचेरी का गर्वनर बनकर भारत आया। वह 12 वर्ष तक भारत में फ्रांसीसी प्रभुत्व बढ़ाने में लगा रहा। डूप्ले भारत में फ्रांसीसी राज्य स्थापित करना चाहता था। सूरत और मसुलीपट्टम फ्रांसीसियों के प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र बन चुके थे। भारत में व्यापार के वर्चस्व तथा सत्ता स्थापना को लेकर अंग्रेज और फ्रांसीसी आमने-सामने आ गए। अंग्रेज और फ्रांसीसियों के मध्य सत्ता को लेकर कर्नाटक के तीन युद्ध हुए। 1760 ई० में वॉडीवाश के युद्ध में अंग्रेजों ने फ्रांसीसियों को बुरी तरह परास्त किया। 1763 ई० में पेरिस संधि के साथ ही
फ्रांसीसियों का प्रभुत्व समाप्त हो गया और भारत में सत्ता स्थापित करने का अवसर अंग्रेजों के पास ही रह गया। भारत में अंग्रेजों की सफलता के कारण- भारत में व्यापार और सत्ता का जो संघर्ष फ्रांसीसियों और अंग्रेजों के बीच हुआ, उसमें निम्नलिखित कारणों से अंग्रेजों को सफलता प्राप्त हुई(i) अंग्रेज कंपनी की आर्थिक दशा उन्नत होने के कारण अंग्रेजों के पास धन और संसाधन अधिक थे। (ii) पर्याप्त धन तथा अस्त्र-शस्त्रों के कारण अंग्रेज फ्रांसीसियों से सदैव जीतते रहे। (iii) ईस्ट इंडिया कंपनी सर्वाधिकार रखती थी, अत: उसे परिस्थितियों के अनुरूप निर्णय लेने में कोई भी कठिनाई नहीं होती थी। (iv) अंग्रेज सरकार ईस्ट इंडिया कंपनी को आर्थिक तथा अस्त्र-शस्त्रों की मदद देती रहती थी, जिससे उसकी विजय होती थी। (v) अंग्रेज कंपनी के अधिकारियों में परस्पर सहयोग तथा विश्वास बना रहता था, जिससे वे सही निर्णय लेकर अपनी
सफलता का मार्ग खोज लेते थे।

Up board class 10 social science full solution chapter 10 भारत में यूरोपीय शक्तियों का आगमन एवं प्रसार

2. भारत में व्यापार तथा सत्ता जमाने के संघर्ष में फ्रांसीसियों की असफलता के कारणों की समीक्षा कीजिए।
उ०- फ्रांसीसियों की असफलता के कारण- अंग्रेज और फ्रांसीसियों में साम्राज्यवादी स्पर्धाएँ तो पहले से ही चली आ रही थीं, भारत में दोनों ही देश व्यापार और सत्ता पर एकाधिकार जमाना चाहते थे, अत: दोनों के स्वार्थ आपस में टकराने से संघर्ष होना स्वाभाविक था। इस संघर्ष में अंग्रेजों के मुकाबले फ्रांसीसी असफल रहे। फ्रांसीसियों की असफलता के कारणों को निम्नवत् स्पष्ट किया जा सकता है(i) फ्रांसीसी कंपनी फ्रांस की सरकार पर पूरी तरह निर्भर थी। उसे आवश्यकता के समय न तो धन मिलता था और न तुरंत _ कार्यवाही करने का आदेश, जिससे उसे असफलता का मुख देखना पड़ा। (ii) फ्रांसीसी कंपनी की आर्थिक दशा खराब थी, जिससे वह सैन्य उपकरण खरीदने में असमर्थ होकर असफल रही। (iii) फ्रांसीसी कंपनी के अधिकारियों में एकता, सहयोग तथा विश्वास का अभाव था। वे एकमत से निर्णय नहीं कर पाते थे, जिससे उन्हें असफल रहना पड़ता था। (iv) यूरोप में इंग्लैंड और फ्रांस परस्पर टकराते रहते थे। वहाँ भी फ्रांस पराजित हो जाता था, जिसका प्रभाव भारतीय
फ्रांसीसी कंपनी पर भी पड़ता था। (v) फ्रांसीसियों की नौसैनिक शक्ति अंग्रेजों की अपेक्षा दुर्बल थी, जिसके कारण उन्हें असफलता ही मिलती थी। (vi) भारत में बंगाल अंग्रेजों के अधिकार में था, जो पर्याप्त आय देकर उन्हें शक्तिसंपन्न बना रहा था। इसके अभाव में
फ्रांसीसी दुर्बल रह गए, अतः उन्हें असफलता ही हाथ लगी।

Up board class 10 social science full solution chapter 9 द्वितीय विश्वयुद्ध कारण एवं परिणाम

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