UP Board Class 11 Samanya hindi chapter 8 गेहूँ बनाम गुलाब (रामवृक्ष बेनीपुरी) FREE PDF

UP Board Class 11 Samanya hindi chapter 8 गेहूँ बनाम गुलाब (रामवृक्ष बेनीपुरी) सम्पूर्ण हल

घुमक्कड़
UP Board Class 11 Samanya hindi chapter 8
गेहूँ बनाम गुलाब (रामवृक्ष बेनीपुरी)

लेखक पर आधारित प्रश्न__
1 — रामवृक्ष बेनीपुरी का जीवन-परिचय देते हुए इनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए ।।
उत्तर — – लेखक परिचय- प्रसिद्ध साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी का जन्म बिहार के जिला मुजफ्फरपुर के बेनीपुर’ नामक गाँव में 23 दिसम्बर, सन् 1899 ई० को हुआ था ।। इनके पिता फूलवन्त सिंह एक साधारण कृषक थे ।। अल्पायु में ही रामवृक्ष माता-पिता के वात्सल्य से वंचित हो गए थे ।। इनका पालन-पोषण इनकी मौसी की छत्र-छाया में हुआ ।। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा इनकी ननिहाल में हुई ।। ये गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन से बहुत प्रभावित हुए; अत: मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद पढ़ाई छोड़कर स्वतन्त्रता संग्राम में कूद पड़े ।। स्वाध्याय के बल पर ही इन्होंने हिन्दी साहित्य की ‘विशारद’ परीक्षा उत्तीर्ण की ।। राष्ट्र-सेवा के साथ ही साहित्य के इस पुजारी ने स्वाध्याय व साहित्य-सृजन
का क्रम जारी रखा ।। अनेक बार इनको जेल यातना भी सहन करनी पड़ी ।। इन्होंने अपने निबन्धों के माध्यम से जन-मानस में देश-भक्ति की भावना जाग्रत की ।। मात्र पन्द्रह वर्ष की अवस्था में ये पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादन में योगदान करने लगे थे ।। इसी से साहित्य के प्रति प्रेम इनके मन में उत्पन्न हुआ ।। इनके साहित्य में इनके उच्च विचारों एवं गहन अनुभूतियों की स्पष्ट झलक दिखाई देती है ।। इन्होंने विशेष रूप से निबन्ध व रेखाचित्र विधा के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया ।। स्वतन्त्रता व साहित्य का यह प्रेमी 9 सितम्बर, सन् 1968 ई० में चिर-निद्रा में विलीन हो गया ।।

कृतियाँ– बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न बेनीपुरी जी की प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं –

निबन्ध और रेखाचित्र– गेहूँ और गुलाब, वन्दे वाणी विनायकौ, मशाल, (निबन्ध) माटी की मूरतें, लाल तारा (रेखाचित्र) ।।

संस्मरण– जंजीरें और दीवारें, मील के पत्थर आदि भावपूर्ण संस्मरण हैं ।।

नाटक– सीता की माँ, अम्बपाली, रामराज्य आदि राष्ट्रप्रेम को उजागर करने वाले नाटक हैं ।।

उपन्यास और कहानी– ‘पतितों के देश में’, उपन्यास और ‘चिता के फूल’ कहानी-संग्रह हैं ।।

जीवनी– कार्ल्स मार्क्स, जयप्रकाश नारायण, महाराणा प्रताप सिंह आदि जीवनियाँ हैं ।।

यात्रावृत्त– ‘पैरों में पंख बाँधकर’ तथा ‘उड़ते चलें’ इनके ललित यात्रा-वृत्तान्तों के संग्रह हैं ।।

आलोचना– ‘विद्यापति पदावली’ और ‘बिहारी सतसई की सुबोध टीका’ इनकी आलोचनात्मक प्रतिभा का परिचय देते हैं ।।
पत्र-पत्रिकाएँ (सम्पादन)- तरुण भारती, युवक, हिमालय, नई धारा, कैदी, जनता, योगी, बालक, किसान मित्र, चुन्नू-मुन्नू, तूफान, कर्मवीर आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं का इन्होंने बड़ी कुशलतापूर्वक सम्पादन किया था ।।


2 — रामवृक्ष बेनीपुरी की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए ।।
उत्तर — – भाषा-शैली-बेनीपुरी जी ने प्राय: व्यावहारिक भाषा का प्रयोग किया है ।। सरलता, सुबोधता और सजीवता से युक्त बेनीपुरी जी की भाषा का अपना अलग ही प्रभाव है ।। इनका शब्द-चयन चमत्कारिक है ।। भाव, प्रसंग व विषय के अनुरूप ये तत्सम, तद्भव, देशज, उर्दू, फारसी आदि शब्दों का ऐसा सटीक प्रयोग करते हैं कि पाठक आश्चर्यचकित हो उठता है ।। इनकी इस विशेषता के कारण इन्हें शब्दों का जादूगर कहा जाता है ।। बेनीपुरी जी ने अपनी रचनाओं में मुहावरों व कहावतों का खुलकर प्रयोग किया है ।। इनके द्वारा प्रयुक्त भाषा में लाक्षणिकता, व्यंग्यात्मकता, प्रतीकात्मकता और अलंकारिकता विद्यमान है ।। इनके छोटे-छोटे वाक्य गहरी अर्थ-व्यंजना के कारण बड़ी तीखी चोट करते हैं ।।

बेनीपुरी जी की रचनाओं में हमें विषय के अनुरूप विविध प्रकार की शैलियों के दर्शन होते हैं ।। किसी वस्तु अथवा घटना का वर्णन करते समय बेनीपुरी जी ने वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया है ।। जीवनी, कहानी, यात्रावृत्त, निबन्धों और संस्मरणों में इनकी इसी शैली के दर्शन होते हैं ।। बेनीपुरी जी की रचनाओं की प्रधान शैली भावात्मक है ।। इसमें भावों का प्रबल वेग, हृदयस्पर्शी मार्मिकता और अलंकारिक सौन्दर्य विद्यमान है ।। रेखाचित्रों में बेनीपुरी जी ने शब्दचित्रात्मक शैली का प्रयोग किया है ।। कहानियों और ललित निबन्धों में भी कहीं-कहीं इस शैली के दर्शन हो जाते हैं ।। बेनीपुरी जी सीधे-सीधे बात न कहकर उसे प्रायः प्रतीकों के माध्यम से ही व्यक्त करते हैं; अत: इनके निबन्धों में प्रतीकात्मक शैली का प्रयोग अधिक हुआ है ।। ‘गेहूँ बनाम गुलाब’, ‘नींव की ईंट’ आदि ललित निबन्ध इनके द्वारा प्रयुक्त प्रतीकात्मक शैली के सुन्दर उदाहरण हैं ।। शैली के इन प्रमुख रूपों के अतिरिक्त बेनीपुरी जी ने बिहारी और विद्यापति की समीक्षाओं में आलोचनात्मक शैली अपनाई है ।। इनकी रचनाओं में डायरी शैली, संवाद शैली, सूक्ति शैली आदि के दर्शन भी होते हैं ।।

 UP Board Class 11 Samanya hindi chapter 8 गेहूँ बनाम गुलाब (रामवृक्ष बेनीपुरी)  व्याख्या संबंधी प्रश्न


1 — निम्नलिखित गद्यावतरणों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए


(क) रात का काला — — — — — — — — — — — — — — — — — — — में रँग दिया
।। सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य गरिमा’ में ‘रामवृक्ष बेनीपुरी’ द्वारा लिखित निबन्ध ‘गेहूँ बनाम गुलाब’ से
नामक शीर्षक से उद्धृत है ।। UP Board Class 11 Samanya hindi chapter 7 अथातो घुमक्कड़-जिज्ञासा (राहुल सांकृत्यायन)
प्रसंग- प्रस्तुत अवतरण में लेखक ने स्पष्ट किया है कि मनुष्य अपने जीवन में केवल शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति ही नहीं चाहता, वरन् वह मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक आवश्यकताओं की सन्तुष्टि के लिए भी प्रयास करता है ।।
व्याख्या- सर्वप्रथम मानव अपनी भूख मिटाने के लिए प्रयासरत हुआ ।। जिस प्रकार काली रात के व्यतीत हो जाने के बाद मनुष्य प्रात:काल की लालिमा और सौन्दर्य के प्रति आकर्षित होता है, उसी प्रकार पेट की आग बुझ जाने के बाद वह प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य की ओर उन्मुख हुआ ।। जब उसने उषा की अलौकिक लालिमा सूर्य के दिव्य प्रकाश और मधुरिम हरियाली के अनेक दृश्य अपने नेत्रों से निहारे तो वह उल्लास और प्रसन्नता से उछल पड़ा ।। आकाश में गरजती-चमकती श्यामल घटाओं को देखकर आदिमानव केवल इसीलिए प्रसन्न नहीं हुआ कि ये घटाएँ बरसकर तथा खेतों में अन्न उगाकर उसके पेट को भर देगी, वरन् प्रकृति के अद्वितीय और अनुपम सौन्दर्य से आकर्षित होकर ही उसका मनरूपी मयुर नाचने लगा ।। इसी प्रकार आकाश में सतरंगे इन्द्रधनुष के बिंब को निहारकर भी मानव-मन उल्लास से भर गया ।। तात्पर्य यह है कि मनुष्य ने केवल अपनी भूख ही नहीं मिटाई, वरन् उसने प्रकृति के सौन्दर्य को भी निहारा ।। उसने केवल शारीरिक तृप्ति ही नहीं प्राप्त की, वरन् उसका मन भी तृप्त हुआ ।। UP Board Class 11 Samanya hindi chapter 7 अथातो घुमक्कड़-जिज्ञासा (राहुल सांकृत्यायन)
साहित्यिक सौन्दर्य- (1) प्रस्तुत पंक्तियों में मनुष्य के सौन्दर्य बोध को एक अलौकिक गुण के रूप में चित्रित किया गया हैं (2) यह सच है कि भूख या कष्ट की अवस्था में सौन्दर्य बोध का उल्लास प्रभावित नहीं करता, परन्तु जब पेट भरा होता है तो व्यक्ति नि:स्वार्थ भाव से ओर स्वाभाविक रूप से सौन्दर्य की ओर आकर्षित होता हैं ।। (3) भाषा- आलंकारिक ।। (4) शैलीविचारात्मक एवं विश्लेषणात्मक ।। (5) वाक्य-विन्यास- सुगठित, (6)शब्द-चयन- विषय वस्तु के अनुरूप ।।

(ख) मानव शरीर में — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — — रूप रहे हैं ।।
सन्दर्भ- पहले की तरह ।। प्रसंग- मनुष्य के लिए यह आवश्यक है कि वह जीवित रहने हेतु अपना पेट भरे, किन्तु लेखक का मत है कि उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य पेट भरना ही नहीं है ।। शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति की अपेक्षा, मानसिक वृत्तियों की तृप्ति को अधिक महत्व दिया गया है ।।
व्याख्या – मानव के शरीर में पेट, हृदय और मस्तिष्क- ये तीन प्रमुख अंग है ।। इनके महत्व के अनुसार ही शरीर में इनका क्रम ऊपर से नीचे का है ।। मानव की शरीर-रचना में मस्तिष्क का स्थान सर्वोपरि है ।। हृदय का स्थान उसके नीचे तथा पेट का स्थान मस्तिष्क और हृदय से भी नीचे हैं इसका अर्थ यह है कि मनुष्य के लिए सर्वाधिक महत्व मस्तिष्क (बुद्धि) का; उससे कम, किन्तु पेट से अधिक महत्व हृदय (भाव) का है और सबसे कम महत्व पेट (शारीरिक भूख) को दिया गया है ।। यदि पशु की शरीर-रचना को देखा जाए तो उसका पेट और मस्तिष्क समानान्तर रेखा (बिलकुल सीध) में होता है ।। पशु के लिए शारीरिक भूख और मानसिक तृप्ति का समान महत्व है ।। इसी कारण पशुओं की पेट भरने से ही तृप्ति हो जाती है ।। जब तक मनुष्य पैरों के बल चलना नहीं सीखता और घुटनों के बल चलता है, तब तक वह पशु की तरह पेट भरने मात्र से सन्तुष्ट रहता है, लेकिन जब वह सीधे तनकर खड़ा हो जाता है तो पशु के स्तर से ऊपर उठकर पेट से अधिक मन की आवश्यकताओ की पूर्ति को महत्व देने लगता है ।। मानसिक तृप्ति के अभाव में वह पशु के समान ही है ।। मानसिक तृप्ति को महत्व देना ही, मनुष्य के हृदय की उसके पेट पर विजय है ।। UP Board Class 11 Samanya hindi chapter 7 अथातो घुमक्कड़-जिज्ञासा (राहुल सांकृत्यायन)


रामवृक्ष बेनीपुरी जी का कहना है कि मनुष्य को गेहूँ की आवश्यकता इसलिए पड़ती है क्योंकि उसे अपना पेट भरना होता है और शरीर की रक्षा भी करनी होती है ।। लेकिन मानव चिरकाल से यह प्रयत्न करता रहा है कि वह मात्र पेट भरने के लिए ही अपनी सारी शक्ति न लगा दे ।। पेट भरने को वह केवल साधन ही समझे, साध्य नही ।। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही वह उपवास, व्रत और तपस्या करता रहा है ।। इससे यह सिद्ध होता है कि वह प्रारंभ से ही अपनी इस मूलभूत आवश्यकता पर विजय प्राप्त करने की चेष्टा करता रहा है ।। वह इस ओर ध्यान देता रहा है कि पेट की भूख के ऊपर मन या हृदय और मस्तिष्क की भूख भी है और इनकी सन्तुष्टि हेतु प्रयास करना भी उसके लिए परम आवश्यक है ।।
साहित्यिक सौन्दर्य- (1) लेखक ने प्राणि-विज्ञान का प्रस्तुतीकरण बहुत ही कुशलता से किया है तथा मानव की शरीर-रचना में उसके अंगों का महत्व शरीर-रचना के आधार पर बताया गया है ।। (2) मनुष्य के लिए शारीरिक भूख शान्त करने की अपेक्षा मानस की सन्तुष्टि का महत्व अधिक है ।। (3) यहाँ पर गेहूँ को पेट की भूख और धन दौलत का प्रतीक माना गया है ।। (4) भाषा- शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली ।। (5) शैली- प्रतीकात्मक, आलंकारिक और विवेचनात्मक ।। (6) वाक्य-विन्याससुगठित ।। (7) शब्द-चयन- विषय के अनुरूप एवं उपयुक्त ।।


(ग) अपनी वृत्तियों को — — — — के उन्नयन का ।।
सन्दर्भ- पहले की तरह ।।
प्रसंग- प्रस्तुत गद्यांश में बेनीपुरी जी ने शारीरिक आवश्यकताओं पर मानसिक वृत्तियों की प्रभुता स्थापित करने पर बल दिया है ।।
व्याख्या- लेखक ने गेहूँ को भौतिक, आर्थिक एवं राजनीतिक प्रगति का प्रतीक माना है और गुलाब को मानसिक अर्थात् सांस्कृतिक प्रगति का ।। लेखक के अनुसार मन की अवस्थाओं का अध्ययन करने वाले अर्थात् मनोवैज्ञानिक मन को नियंत्रित करने के लिए दो उपाय बतलाते हैं ।। उनका प्रथम उपाय इन्द्रियों (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ-आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा तथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ- हाथ, पाँव, वाक, गुदा और उपस्थ) द्वारा होने वाले क्रिया-कलापों के नियमन-संयमन से है तथा दूसरा उपाय वृत्तियों अर्थात् मन की अवस्थाओं के उन्नयन अर्थात् उनका उच्चस्तरीय विकास करने से है ।। UP Board Class 11 Samanya hindi chapter 7 अथातो घुमक्कड़-जिज्ञासा (राहुल सांकृत्यायन)

प्रथम उपाय के सफल न हो पाने के लेखक दो उदाहरण प्रस्तुत करता है-एक प्राचीन काल से और दूसरा वर्तमान काल से ।। प्राचीन काल से ही हमारे ऋषि-मुनि इन्द्रियों को संयमित करने के उपदेश जन-मानस को देते रहते हैं ।। इससे अच्छे परिणामों के साथ-साथ बुरे परिणाम भी हमारे सामने आए ।। ऐसे कई तपस्वी जिन्होंने अपनी इन्द्रियों को संयमित करने के लिए दीर्घकालीन तपस्याएँ की, उनकी ये तपस्याएँ स्थूलवासना के क्षेत्र से ऊपर नहीं उठ पाई थी और यही कारण था कि ये किसी रम्भा, मेनका और उर्वशी (अप्सराएँ, भारतीय पौराणिक आख्यानों में अत्यधिक सुन्दर स्त्रियों के रूप में प्रसिद्ध) के कारण असमय ही भंग हो गई ।। वर्तमान काल में हमारे तपस्वी अर्थात् भारतीय नेतृत्व ने महात्मा गाँधी के इन्द्रिय- संयम के आदर्श पर चलने का जो मार्ग अपनाया, वह भी दिन-प्रतिदिन पतन के मार्ग पर ही अग्रसर है ।। श्री बेनीपुरी जी के अनुसार वृत्तियों को वश में करने का एकमात्र उपाय है उनके उन्नयन का, उनके संयम का नहीं ।। इसीलिए उनका कहना है कि व्यक्ति को अपनी सर्वांगीण उन्नति के लिए अपनी इच्छाओं को ऐन्द्रिक धरातल के चिन्तन से ऊपर उठाकर सूक्ष्म मानवीय भावनाओं की ओर उन्मुख करना चाहिए और ऐसा तब ही संभव हो सकता है जब इन्द्रियों अर्थात् शरीर पर मन का साम्राज्य स्थापित हो ।। तात्पर्य यह है कि मानव के मन-मस्तिष्क पर गेहूँ की नहीं गुलाब की सत्ता स्थापित हो ।।

साहित्यिक सौन्दर्य- (1) लेखक ने पौराणिक और आधुनिक काल के उद्धरण के माध्यम से गुलाब की सत्ता को प्रमुखता दी है ।। (2) भाषा- शुद्ध, साहित्यिक, तत्सम शब्दों से युक्त खड़ी बोली ।। (3) शैली- उद्धरणों से युक्त लाक्षणिक और विवेचनात्मक ।। (4) शब्द-चयन- विषय के अनुरूप एवं उपयुक्त ।। (5) वाक्य-विन्यास- सुगठित ।। (6) विचार-सौष्ठवयही कारण है कि कुछ दार्शनिकों ने एकादश इन्द्रयों में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियों के ऊपर मन को माना है ।। इसीलिए भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवद् गीता में कहा है- ‘मनो दुर्निग्रहं चलम् ।।

(घ) गेहूँ की दुनिया — — — — — — — — — — — — — — — — — — लोक बसाएँगे ।।
सन्दर्भ- पहले की तरह ।।
प्रसंग- लेखक ने गेहूँ को भौतिकता और गुलाब को आध्यात्मिकता का प्रतीक माना हैं और विश्वास व्यक्त किया है कि भविष्य में भौतिकवाद पर आध्यात्मिक मानसिकता का आधिपत्य होगा ।।
व्याख्या- लेखक भौतिकवादी मानसिकता के स्थान पर आध्यात्मिक मानसिकता को महत्व देते हुए कहता है कि भौतिकता पर आधारित यह जगत्, जो आर्थिक और राजनैतिक रूप में हम पर शासन करता रहा, अब समाप्त होने वाला है ।। मनुष्य की वह भौतिक मानसिकता अब समाप्त होने वाली है, जो अब तक आर्थिक शोषण के रूप में निर्धन का रक्त पीती रही है और तुच्छ राजनैतिक गतिविधियों के रूप में बढ़ती रही ।। लेखक का विश्वास है कि अब मानसिक सन्तोष का युग आने वाला है ।। यह ऐसा संसार होगा, जिसमें मन को सन्तोष मिल सकेगा और मानव की संस्कृति विकसित हो सकेगी ।। लेखक ने अपना हर्ष प्रकट करते हुए लिखा है कि वह शुभ दिन कैसा होगा जब हम शरीर की बाह्य आवश्यकताओं के बन्धन से मुक्त हो सकेंगे और हमारे मन में आध्यात्मिकता का नवीन संसार विकसित होगा ।। लेखक उस शुभ दिवस की कल्पना करता है, जब हम गुलाब की सांस्कृतिक धरती पर स्वछन्दता के साथ विचरण कर सकेंगे ।।
साहित्यिक सौन्दर्य- (1) यहाँ पर लेखक ने मानसिक सुख और समृद्धि से परिपूर्ण भविष्यलोक की कल्पना की है ।। (2) लेखक को विश्वास है कि शीघ्र ही भौतिकवादी दृष्टिकोण की समाप्ति होगी और सौन्दर्यवादी दृष्टिकोण विकसित होगा ।। (3) भाषा- काव्यात्मक और प्रवाहपूर्ण ।। (4) शैली- प्रतीकात्मक और लाक्षणिक ।। (5) शब्द-चयन- विषय के अनुरूप ।। (6) वाक्य-विन्यास- सुगठित ।।

2 — निम्नलिखित सूक्तिपरक वाक्यों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए — UP Board Class 11 Samanya hindi chapter 8 गेहूँ बनाम गुलाब (रामवृक्ष बेनीपुरी) सम्पूर्ण हल


(क) गेहूँ हम खाते हैं,गुलाब सूंघते हैं ।। एक के शरीर की पुष्टि होती है, दूसरे से हमारा मानस तृप्त होता है ।।
सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘गद्य गरिमा’ के ‘रामवृक्ष बेनीपुरी’ द्वारा लिखित पुस्तक ‘गेहूँ बनाम गुलाब’ से नामक शीर्षक से अवतरित है ।।
प्रसंग– प्रस्तुत सूक्ति में बेनीपुरी जी ने गेहूँ और गुलाब दोनों को ही जीवन के लिए उपयोगी बताया है ।। यहाँ पर गेहूँ भौतिकता का और गुलाब मानसिक तृप्ति एवं सांस्कृतिक प्रगति का प्रतीक है ।।
व्याख्या– जिस प्रकार मानव-शरीर में पेट और मस्तिष्क का महत्तवपूर्ण स्थान है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में गेहूँ और गुलाब का भी महत्त्व है ।। गेहूँ हम खाते हैं, उससे हमारी भूख शान्त होती है ।। वह हमारी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है ।। वह हमारी आर्थिक उन्नति का भी प्रतीक है ।। गुलाब हम सूंघते हैं ।। वह मन को सन्तोष और सुख प्रदान करता है ।। तात्पर्य यह है कि शरीर और मन में अर्थात् आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में समन्वय बना रहना चाहिए ।।

(ख) जब मानव पृथ्वी पर आया, भूख लेकर ।। क्षुधा,क्षुधा; पिपासा, पिपासा ।। UP Board Class 11 Samanya hindi chapter 7 अथातो घुमक्कड़-जिज्ञासा (राहुल सांकृत्यायन)
सन्दर्भ- पहले की तरह ।। प्रसंग- प्रस्तुत सूक्ति में लेखक बता रहा है कि शारीरिक सन्तुष्टि मनुष्य की प्राथमिकताओं में प्रथम स्थान पर आती है ।। इसके लिए उसने सभी उचित-अनुचित कार्य किए ।।

व्याख्या– मनुष्य जब शिशु-रूप में पृथ्वी पर आया, तब वह भूख-प्यास से व्याकुल रोता हुआ आया ।। उस समय उसके सामने सबसे बड़ी समस्या अपनी भूख प्यास शांत करने की थी ।। अपनी भूख-प्यास की व्याकुलता के कारण वह खूब रोया-चिल्लाया, किन्तु समस्या का कोई समाधान न निकला; अन्ततः उसने उसे शान्त करने के लिए स्वयं प्रयास किए ।। उसका एक ही लक्ष्य था, किसी प्रकार अपनी भूख-प्यास शान्त करना; अतः इसके लिए उसने बड़े वहशीपन से काम लिया ।। उसके सामने जो कुछ आया, उसने उसी को चबाना और चूसना शुरु कर दिया ।। इस प्रयास में उसका पहला शिकार स्वयं उसकी माँ बनी ।। उसने सर्वप्रथम अपनी माँ के स्तनों को निचोड़ा ।। जब उनसे भी काम न चला तो उसने पेड़-पौधों को झकझोर डाला और उनके कन्दमूल-फल-पत्ते आदि जिससे भी उसकी भूख-प्यास मिट सकती थी, उसको चबा डाला ।। यहाँ तक कि कीट-पतंग और पशुपक्षियों तक को उसने अपनी भूख अर्थात शारीरिक सन्तुष्टि का साधन बना डाला ।।


(ग) बाँस से उसने लाठी ही नहीं बनाई, वंशी भी बजाई ।।
सन्दर्भ- पहले की तरह ।।
प्रसंग- प्रस्तुत सूक्ति-वाक्य में लेखक ने मनुष्य के द्वारा किसी वस्तु के एकाधिक प्रकार से उपयोग करने का वर्णन किया है |

व्याख्या — प्रारंभ में मनुष्य भी अन्य जीवधारियों के ही समान था, जिसके लिए शारीरिक सन्तष्टि सर्वप्रमख थी ।। जैसे-जैसे उसका विकास होता गया, उसे शारीरिक सन्तुष्टि के साथ-साथ मानसिक सन्तुष्टि की आवश्यकता का भी अनुभव होने लगा ।। इस मानसिक सन्तुष्टि की पूर्ति के लिए उसके द्वारा ध्वनि या संगीत की खोज हुई ।। शारीरिक सन्तुष्टि के लिए वह पशुओं को मारकर खा जाता था और मानसिक सन्तुष्टि के लिए उसने उनकी खाल से ढोल बनाए और सींग से तुरही ।। ये दोनों ही आरंभिक वाद्ययंत्र उसकी मानसिक सन्तुष्टि में सहायक थे ।। इसी क्रम में उसने आगे जो कार्य किए वे भी ऐसे ही थे ।। शारीरिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए जब उसने बाँस से लाठी बनाई तो मानसिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए उसने बाँस से ही बाँसुरी भी बनाई और उसे बजाया भी ।। तात्पर्य यह है कि जैसे-जैसे मानवीय सभ्यता विकास प्राप्त करती गई उसने मानसिक आवश्यकताओं को भी वरीयता देना प्रारंभ कर दिया ।।

(घ) मानव शरीर में पेट का स्थान नीचे है, हृदय का ऊपर और मस्तिष्क का सबसे ऊपर ।।
सन्दर्भ- पहले की तरह ।।
प्रसंग- प्रस्तुत सूक्ति में शारीरिक सन्तुष्टि अथवा अनियंत्रित भावनाओं की तुष्टि की अपेक्षा बुद्धि की तुष्टि पर अधिक बल दिया गया है ।।
व्याख्या- विधाता ने एक सुनिर्धारित क्रम में ही मानव-शरीर के विभिन्न अंगों की रचना की है ।। उसने सबसे ऊपर मस्तिष्क की और सबसे नीचे पेट की रचना की है ।। हृदय को इन दोनों के मध्य स्थान दिया गया है ।। इन तीनों को इनकी स्थिति के अनुसार ही महत्व प्रदान किया गया है ।। मस्तिष्क बुद्धि के माध्यम से व्यक्ति को विचारशील बनाता है, हृदय भावनाओं को जन्म देता है और पेट शारीरिक भूख उत्पन्न करता है ।। इस दृष्टि से व्यक्ति को मानसिक तुष्टि को ही सबसे अधिक महत्व प्रदान करना चाहिए ।। इसके उपरान्त भावनात्मक तुष्टि पर और सबसे अन्त में शारीरिक सन्तुष्टि पर ध्यान दिया जाना चाहिए ।।

(ङ) जब तक मानस के जीवन में गेहूँ और गुलाब का सन्तुलन रहा, वह सुखी रहा,सानन्द रहा ।।
सन्दर्भ- पहले की तरह ।।
प्रसंग- इस सूक्ति के माध्यम से लेखक ने आर्थिक आवश्यकताओं तथा सौन्दर्य-बोध में सामंजस्य बैठाने की प्रेरणा दी है ।।
व्याख्या- यहाँ गेहूँ से तात्पर्य है- स्थूल शारीरिक, आर्थिक और राजनीतिक आवश्यकताएँ ।। इसी प्रकार गुलाब का अर्थ सूक्ष्म मानस-जगत अथवा सांस्कृतिक-जगत की आवश्यकताओं से है ।। लेखक का कथन है कि जब तक इन दोनों में सन्तुलन बना रहा, तब तक मनुष्य सुखी रहा, परन्तु जैसे ही शरीर और मन की आवश्यकताओं का सन्तुलन बिगड़ा, मनुष्य अपना आनन्द एवं सुख-चैन खो बैठा ।।

(च) गेहूँ सिरघुन रहा है खेतों में;गुलाबरोरहा है बगीचों में- दोनों अपने-अपने पालनकर्ताओं के भाग्य पर,दुर्भाग्य पर-!

सन्दर्भ- पहले की तरह ।। UP Board Class 11 Samanya hindi chapter 7 अथातो घुमक्कड़-जिज्ञासा (राहुल सांकृत्यायन)
प्रसंग-सुखी जीवन के लिए गेहूँ और गुलाब दोनों में समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया गया है ।।
व्याख्या- बेनीपुरी जी का मत है कि गेहूँ भूख और श्रम का प्रतीक है और गुलाब सौन्दर्य का, किन्तु सम्पन्न लोगों ने गेहूँ को शारीरिक श्रम के शोषण का और गुलाब को विलासिता का प्रतीक मान लिया है ।। प्राचीन काल में गेहूँ और गुलाब दोनों में सन्तुलन था ।। मनुष्य शारीरिक क्षुधा शान्त करने के साथ-साथ मानसिक सुख पर भी ध्यान देता था, परन्तु आज मनुष्य ने भौतिक प्रगति अधिक कर ली है, जिसके कारण हमारे जीवन का उद्देश्य शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना मात्र रह गया है ।।

अपनी शारीरिक आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए किसान कड़ी धूप और भयानक ठण्ड में भी खेतों में कठिन परिश्रम करता है, किन्तु उसे भरपेट भोजन नहीं मिलता ।। सौन्दर्य, कला और संस्कृति के लिए उसे पास समय कहाँ? अतः गेहूँ अपने पालनकर्ता बड़े किसानों, जमींदारों के संरक्षण में रहकर सिर धुनता रहता है ।। दूसरी ओर गुलाब विलासिता और भ्रष्टाचार का प्रतीक बन रहा है ।। संपन्न व्यक्ति कला और सौन्दर्य के नाम पर विलासिता में डूब रहा है, जिससे वह अपने शरीर को नष्ट करने के साथ मन को भी कलुषित कर रहा है ।। इस कारण गुलाब भी अमीर लोगों के संरक्षण में रहकर रो रहा है ।।

UP Board Class 11 Samanya hindi chapter 8 गेहूँ बनाम गुलाब (रामवृक्ष बेनीपुरी) सम्पूर्ण हल
1 — लेखक ने मानव तथा पशुओं में क्या अंतर बताया है?
उत्तर — – लेखक ने मानव तथा पशुओं में अंतर बताते हुए कहा है ।। पशुओं का मस्तिष्क, हृदय तथा पेट सामान्तर रेखा में होता है ।। इसलिए पशुओं के लिए शारीरिक भूख और मानसिक तृप्ति का समान महत्व है ।। जबकि मानव की शरीर रचना में, मस्तिष्क का स्थान सर्वोपरि, हृदय का स्थान उसके नीचे तथा पेट का स्थान सबसे नीचे है ।। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य के लिए सर्वाधिक महत्व मस्तिष्क (बुद्धि) का उससे कम हृदय (भाव) का और सबसे कम पेट (शारीरिक भूख) का है ।। इस प्रकार व्यक्ति के लिए मानसिक तुष्टि का ही सबसे अधिक महत्व है ।।


२ — आज गेहूँ तथा गुलाब किसके प्रतीक बन गए है?
उत्तर — – लेखक के अनुसार आज गेहूँ राजनैतिक एवं आर्थिक प्रगति का तथा गुलाब सांस्कृतिक प्रगति का प्रतीक बन गए हैं ।। हम गेहूँ खाते हैं, उससे हमारी भूख शांत होती है ।। वह हमारी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है ।। वह हमारी आर्थिक उन्नति तथा भौतिकता का भी प्रतीक है ।। जबकि गुलाब मन को संतोष और सुख प्रदान करता है जो सांस्कृतिक प्रगति का प्रतीक है ।।


4 — अपनी वृत्तियों को वश में करने के लिए लेखक ने क्या उपाय बताए हैं?
उत्तर — – अपनी वृत्तियों को वश में करने के लिए इनका उन्नयन ही एकमात्र उपाय लेखक ने बताया है ।। व्यक्ति को अपनी सर्वांगीण उन्नति के लिए अपनी इच्छाओं को ऐन्द्रिक धरातल के चिन्तन से ऊपर उठाकर सूक्ष्म मानवीय भावनाओं की ओर उन्मुख करना चाहिए और ऐसा तब ही संभव है जब इन्द्रियों अर्थात् शरीर पर मन का साम्राज्य स्थापित हो ।।

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