Up Board Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 7 नौका-विहार, परिवर्तन, बापू के प्रति सुमित्रानन्दन पन्त

Up Board Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 7 नौका-विहार, परिवर्तन, बापू के प्रति सुमित्रानन्दन पन्त

Up Board Class 12 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 7 नौका-विहार, परिवर्तन, बापू के प्रति सुमित्रानन्दन पन्त
नौका-विहार, परिवर्तन, बापू के प्रति

1 . सुमित्रानन्दन पन्त का जीवन परिचयदीजिए ।। इनकी कृतियों का भी उल्लेख कीजिए ।।

उत्तर – – कवि परिचय- प्रकृति के अनपम चितेरे समित्रानन्दन पन्त का जन्म 20 मई . सन 1900 ई० में अल्मोडा के समीप कौसानी नामक ग्राम में हुआ था ।। इनके पिता का नाम गंगादत्त पन्त था ।। जन्म के छह घंटे बाद ही इनकी माता का निधन हो गया था ।। अपनी दादी के वात्सल्य की छत्रछाया मे इनकी बाल्यावस्था व्यतीत हुई ।। सात वर्ष की अवस्था से ही इनमें काव्यात्मकता प्रतिभा के दर्शन होने लगे ।। इनकी शिक्षा का पहला चरण अल्मोड़ा में पूरा हुआ ।। पहले इनका नाम गुसाईंदत्त था लेकिन बाद में इन्होंने उसे बदलकर अपना नाम सुमित्रानन्दन पन्त रखा ।। बनारस के क्वीन्स कॉलेज से इन्होंने शिक्षा प्राप्त की ।। कुछ समय ये ऑल इण्डिया रेडियो के परामर्शदाता भी रहे ।। छायावादी युग के आधार-स्तम्भ सुमित्रानन्दन पन्त सात वर्ष की अल्पायु से ही कविताओं की रचना करने लगे थे ।। इनकी प्रथम रचना सन् 1916 ई० में सामने आई ।। ‘गिरजे का घण्टा’ नामक इस रचना के पश्चात् ये निरन्तर काव्य-साधना में तल्लीन रहे ।। सन् 1920 ई० में इनकी रचनाएँ ‘उच्छवास’ एवं ‘ग्रन्थि’ प्रकाशित हुईं ।। सन् 1921 ई० में इन्होंने महात्मा गाँधी के आह्वान पर कॉलेज छोड़ दिया और राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन में सम्मिलित हो गए परन्तु अपनी कोमल प्रकृति के कारण सत्याग्रह में सक्रिय रूप से सहयोग नहीं कर पाए और पुनः काव्य-साधना में तल्लीन हो गए ।।

सन् 1927 ई० में पन्त जी के ‘वीणा’ एवं सन् 1928 ई० में ‘पल्लव’ नामक काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए ।। इसके पश्चात् सन् 1939 ई० में कालाकाँकर आकर इन्होंने मार्क्सवाद का अध्ययन किया और प्रयाग आकर ‘रूपाभा’ नामक एक प्रगतिशील विचारों वाली पत्रिका का सम्पादन-प्रकाशन प्रारम्भ किया ।। सन् 1942 ई० के पश्चात् ये महर्षि अरविन्द घोष से मिले और उनसे प्रभावित होकर अपने काव्य में उनके दर्शन को मुखरित किया ।। इन्हें इनकी रचना ‘कला और बूढ़ा चाँद पर ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’, ‘लोकायतन’ पर ‘सोवियत पुरस्कार’ और ‘चिदम्बरा’ पर ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ मिले हैं ।। भारत सरकार ने सन् 1961 ई० में इन्हें ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से भी सम्मानित किया ।। सरस्वती के इस पुजारी ने 28 दिसम्बर, सन् 1977 ई० को इलाहाबाद में इस भौतिक संसार से सदैव के लिए विदा ले ली ।। रचनाएँ- अपने विस्तृत साहित्यिक जीवन में पन्त जी ने विविध विधाओं में साहित्य-रचना की ।। इनकी प्रमुख रचनाओं का विवरण इस प्रकार हैलोकायतन- इस महाकाव्य में कवि की सांस्कृतिक और दार्शनिक विचारधारा व्यक्त हुई है ।। इस रचना में पन्त जी ने ग्राम्यजीवन और जन-भावना को छन्दोबद्ध किया है ।। वीणा- इस रचना में पन्त जी के प्रारम्भिक गीत संगृहीत हैं ।। इसमें प्रकृति के अलौकिक सौन्दर्य के दर्शन मिलते हैं ।। गुंजन- इसमें प्रकृति-प्रेम और सौन्दर्य से सम्बन्धित कवि की गम्भीर एवं प्रौढ़ रचनाएँ संकलित हैं ।। पल्लव- इस संग्रह में प्रेम, प्रकृति और सौन्दर्य के व्यापक चित्र प्रस्तुत किए गए हैं ।। ग्रन्थि- इस काव्य-संग्रह में वियोग का स्वर प्रमुख रूप से मुखरित हुआ है ।। प्रकृति यहाँ भी पन्त जी की सहचरी रही है ।। अन्य रचनाएँ- स्वर्ण-किरण, स्वर्णधूलि, युगपंथ, उत्तरा, अतिमा, कला और बूढ़ा चाँद, चिदम्बरा आदि में पन्त जी महर्षि अरविन्द के नवचेतनावाद से प्रभावित हैं ।। ‘युगान्त’, ‘युगवाणी’ और ‘ग्राम्या’ में पन्त जी समाजवाद और भौतिक दर्शन की ओर उन्मुख हुए हैं ।। इन रचनाओं में उन्होंने दीन-हीन और शोषित वर्ग को अपने काव्य का आधार बनाया है ।।

2 . सुमित्रानन्दन पन्त की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए ।।

उत्तर – – भाषा शैली- पन्त जी के काव्य में कल्पना कविता का आधार है ।। पन्त जी का प्रिय रस शृंगार है परन्तु इनके काव्य में शान्त, करुण, अद्भुत, रौद्र आदि रसों का भी सुन्दर परिपाक हुआ है ।। कविवर पन्त कविता की भाषा में दो गुणों को आवश्यक मानते हैं- चित्रात्मकता और संगीतात्मकता ।। इन्होंने कविता की भाषा और भावों में पूर्ण सामंजस्य पर बल दिया है ।। चित्रात्मकता तो पन्त जी की कविता का प्राण है ।। दृश्यों का साकार चित्र खड़ा कर देने में ये अत्यन्त कुशल हैं ।। पन्त जी ने अलंकारों को भाषा की सजावट का मात्र माध्यम ही नहीं माना, वरन् इन्होंने अलंकारों को भावों की अभिव्यक्ति का द्वार भी माना है ।। छायावाद ने अभिव्यक्ति की नई शैली को अपनाया ।। इस नई शैली के कारण अलंकारों में भी नवीनता आई ।। पन्त जी के काव्य में भी कितने ही नवीन अलंकारों के दर्शन होते हैं ।। ऐसी उपमाएँ अन्य कवियों की रचनाओं में बहुत कम मिलती हैं ।। ये एक के बाद दूसरी सुन्दर उपमाओं की लड़ी-सी बाँधते हैं ।। कहीं सूक्ष्म की स्थूल से तथा कहीं स्थूल की सूक्ष्म वस्तुओं से उपमा देने में पन्त जी अत्यन्त निपुण हैं ।। पन्त जी का मत है कि मुक्तक छन्दों की अपेक्षा तुकान्त छन्दों के आधार पर ही काव्य-संगीत की रचना हो सकती है ।। इसी कारण इन्होंने ‘पल्लव’ की भूमिका में निराला के मुक्त-छन्द का विरोध किया था ।। पन्त ने काव्य में वर्णिक छन्दों की अपेक्षा मात्रिक छन्दों को अधिक महत्व दिया है परन्तु प्रगतिवादी विचारधारा में प्रवृत्त होने पर पन्त जी अलंकारों के समान छन्दों के बन्धन का भी विरोध करने लगे थे ।।

3 . पन्त जीको प्रकृति का सुकमार कवि’ क्यों कहा जाता है?

उत्तर – – सुमित्रानन्दन पन्त के काव्य में कल्पना एवं भावों की सुकुमार कोमलता देखने को मिलती है ।। इन्होंने प्रकृति एवं मानवीय भावों के चित्रण में विकृत तथा कठोर भावों को स्थान नहीं दिया है ।। इनकी छायावादी कविताएँ अत्यन्त कोमल एवं मृदुल भावों की अभिव्यक्ति करती हैं ।। इन्हीं कारणों से पन्त जी को ‘प्रकृति का सुकुमार कवि’ कहा जाता है ।।

पन्त जी सौन्दर्य के उपासक थे ।। इनकी सौन्दर्यानुभूति के तीन मुख्य केन्द्र रहे हैं- प्रकृति, नारी तथा कला-सौन्दर्य ।। इनके काव्य-जीवन का आरम्भ ही प्रकृति-चित्रण से हुआ ।। वीणा, ग्रन्थि, पल्लव आदि इनकी आरम्भिक कृतियों में प्रकृति का कोमल रूप परिलक्षित हुआ है ।। इनका सौन्दर्य-प्रेमी मन प्रकृति को देखकर भाव-विभोर हो उठता है ।। ‘वीणा’ में ये स्वयं को एक बालिका के रूप में अत्यधिक सहजता एवं कोमलता से चित्रित करते हैं ।। ऐसा वर्णन हिन्दी-साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है ।। आगे चलकर ‘गुंजन’ आदि काव्य-रचनाओं में पन्त जी का प्रकृति-प्रेम मांसल बन जाता है और नारी-सौन्दर्य का चित्रण करने लगता है ।। वस्तुतः ‘पल्लव’ और ‘गुंजन’ में प्रकृति और नारी मिलकर एक हो गए हैं और युवा कवि प्रकृति में ही नारी-सौन्दर्य का दर्शन करने लगता है, लेकिन प्रकृति के इस नारी-चित्रण में कवि सदैव पावनता ही देखना चाहता है ।।

व्याख्या सम्बन्धी प्रश्न

1 . निम्नलिखित पद्यावतरणों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए


(क) शान्त, स्निग्ध ज्योत्स्ना . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . मृदुल लहर!

शान्त, स्निग्ध ज्योत्स्ना उज्ज्वल!
अपलक अनन्त नीरव भतल!
सैकत शय्या पर दुग्ध धवल, तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म विरल.
लेटी है श्रान्त, क्लान्त. निश्चल!
तापस-बाला गंगा निर्मल, शशिमुख से दीपित मृदु करतल,
लहरें उर पर कोमल कुन्तल!
गोरे अंगों पर सिहर-सिहर, लहराता तार-तरल सुन्दर
चंचल अंचल-सा नीलाम्बर!
साड़ी की सिकुड़न-सी जिस पर, शशि की रेशमी विभा से भर
सिमटी हैं वर्तुल, मृदुल लहर!

सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘काव्यांजलि’ के ‘सुमित्रानन्दन पन्त’ द्वारा रचित काव्य ग्रन्थ ‘गुंजन’ से ‘नौका विहार’ शीर्षक से उद्धृत है ।।
प्रसंग- प्रस्तुत कविता में पन्त जी ने चाँदनी रात में अपनी मित्र-मण्डली के साथ गंगा में किए गए नौका-विहार का चित्रण किया है ।। क्षीण धारवाली गंगा की कल्पना पन्त ने पतली कमरवाली नायिका के रूप में की है ।। व्याख्या- चारों ओर शान्त, स्निग्ध और उज्जवल चाँदनी छिटकी हुई है ।। आकाश टकटकी बाँधे हुए पृथ्वी को देख रहा है ।। पृथ्वी शान्त और शब्दरहित है ।। ऐसे मनोहर और नि:स्तब्ध वातावरण में ग्रीष्म के कारण मन्द और क्षीण धारवाली गंगा बालू के बीच मन्द-मन्द बहती हुई ऐसी प्रतीत हो रही है, मानो कोई छरहरे, दुबले-पतले शरीरवाली सुन्दर युवती दूध जैसी सफेद शय्या पर गर्मी से व्याकुल होकर थकी, मुरझाई और शान्त लेटी हुई हो ।। गंगा-जल में झलकता चन्द्र बिम्ब प्रतीत हो रहा है, मानो गंगारूपी कोई तपस्विनी अपने चन्द्रमुख को, उसी के प्रकाश से प्रकाशित कोमल हथेली पर रखे लेटी हो और छोटीछोटी लहरें उसके वक्षस्थल पर लहराते कोमल केश हों ।। तारों-भरें आकाश की चंचल परछाई गंगा के जल में पड़ती हुई ऐसी प्रतीत होती है, मानो उस गंगारूपी तपस्विनी बाला के गोरे-गोरे अंगों के स्पर्श से बार-बार काँपता, तारों-जड़ा उसका नीला आँचल लहरा रही हो ।। उस आकाशरूपी नीले आँचल पर चन्द्रमा की कोमल चाँदनी में प्रकाशित छोटी-छोटी कोमल, टेढ़ी, बलखाती लहरें ऐसा प्रतीत होती हैं, मानो लेटने के कारण उसकी रोशमी साड़ी में सिलवटें पड़ गई हों ।।

काव्य-सौन्दर्य- 1 . यहाँ कवि ने गंगा का मानवीकरण करके उसे तपस्विनी बाला के रूप में प्रस्तुत किया है ।।
2 . पन्तजी की कल्पना के विविध रूप और उनकी वर्णन-योजना विशेष द्रष्टव्य है ।।
3 . भाषा- शुद्ध संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।।
4 . अलंकारमानवीकरण, सांगरूपक, उपमा, अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश एवं स्वभावोक्ति ।।
5 . रस- शृंगार ।।
6 . शब्दशक्ति- लक्षणा ।।
7 . गुण- माधुर्य ।।
8 . छन्द- स्वच्छन्द ।।

2- चाँदनी रात …………………………………………………….. स्वप्न सघन!


चाँदनी रात का प्रथम प्रहर,
हम चले नाव लेकर सत्वर
सिकता की सस्मित सीपी पर मोती की ज्योत्स्ना रही विचर
लो, पालें चढ़ीं, उठा लंगर!
मृदु मन्द-मन्द, मन्थर-मन्थर, लघु तरणि, हंसिनी-सी सुन्दर,
तिर रही, खोल पालों के पर!
निश्चल जल के शुचि दर्पण पर बिम्बित हो रजत पुलिन निर्भर
दुहरे ऊँचे लगते क्षण भर!
कालाकांकर का राजभवन सोया लज में निश्चिन्त, प्रमन ।
पलकों पर वैभव-स्वप्न सघन!

सन्दर्भ — पहले की तरह

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में चाँदनी रात में किए जाने वाले नौका-विहार का मनोरम चित्रण किया गया है।

व्याख्या कवि पन्त जी कहते हैं कि वे चाँदनी रात के प्रथम पहर में नौका-विहार करने के लिए एक छोटी-सी नाव लेकर तेज़ी से गंगा में आगे बढ़ जाते हैं। गंगा के तट के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए वे कहते हैं कि गंगा का तट ऐसा रम्य लग रहा है मानो खुली पड़ी रेतीली सीपी पर चन्द्रमा रूपी मोती की चमक यानी चाँदनी भ्रमण कर रही हो। ऐसे सुन्दर वातावरण में गंगा में खड़ी नावों की पालें नौका-विहार के लिए ऊपर चढ़ गई हैं और उन्होंने अपने लंगर उठा लिए हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि एक साथ अनेक नावें नौका-विहार के लिए गंगा तट से खुली हैं। लंगर उठते ही छोटी-छोटी नावें अपने पालरूपी पंख खोलकर सुन्दर हंसिनियों के समान धीमी-धीमी गति से गंगा में तैरने लगीं। गंगा का जल शान्त एवं निश्चल है, जो दर्पण के समान शोभायमान है। उस जलरूपी स्वच्छ दर्पण में चाँदनी में नहाया रेतीला तट प्रतिबिम्बित होकर दोगुने परिमाण में प्रकट हो रहा है। गंगा तट पर शोभित कालाकाँकर के राजभवन का प्रतिबिम्ब गंगा जल में झलक रहा है। ऐसा लग रहा है मानो यह राजभवन गंगा जलरूपी शय्या पर निश्चिन्त होकर सो रहा है और उसकी झुकी पलकों एवं शान्त मन में वैभवरूपी स्वप्न तैर रहे हैं।

काव्य सौन्दर्य
(i) प्रस्तुत पद्यांश में गंगा के पावन होने तथा इसके तट के अत्यन्त सुन्दर होने का भाव प्रस्तुत किया गया है।
(ii) रस शान्त
भाषा – संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली
शैली प्रतीकात्मक
छन्द स्वच्छन्द
अलंकार अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश, उपमा, उत्प्रेक्षा एवं रूपक
गुण प्रसाद शब्द शक्ति अभिधा

(ग) नौका से उठती जल . . . . . . . . . . . . . . . . . सा रुक-रुक !

नौका से उठतीं जल-हिलोर, .
हिल पड़ते नभ के ओर-छोर!
विस्फारित नयनों से निश्चल कुछ खोज रहे चल तारक दल
ज्योतित कर नभ का अन्तस्तल;
जिनके लघु दीपों को चंचल, अंचल की ओट किए अविरल
फिरती लहरें लुक-छिप पल-पल!
मल. पैरती परी-सी जल में कल,
रुपहरे कचों में हो ओझल!
लहरों के घूघट से झुक-झुक, दशमी का शशि निज तिर्यक मुख
दिखलाता मुग्धा-सा रुक-रुक!

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में गंगा में नौका-विहार के समय गंगा के मनमोहक सौन्दर्य का वर्णन किया गया है ।।

व्याख्या- जब गंगा में नौका चलती है तो उससे उठनेवाली लहरों के कारण गंगा में प्रतिबिम्बित सारा आकाश हिल उठता है ।। गंगा का जल शान्त हो जाने पर, उसमें प्रतिबिम्बित तारों की परछाई ऐसी प्रतीत होती है, मानो तारे जल के अन्दर के भाग को आलोकित करके उसमें अपनी आँखें फाड़-फाड़कर कुछ खोज रहे हों ।। इन तारोंरूपी लघु दीपों को छिपाए हुए गंगा की चपल लहरें इधर-उधर छिपती हुई-सी प्रतीत हो रही हों ।। सामने ही शुक्र तारा झिलमिला रहा है और उसकी शोभा जल में प्रतिबिम्बित होकर परी-सी तैर रही है, जो कभी-कभी चाँदी जैसे रुपहले बालों अर्थात् गंगा की लहरों में छिप जाती है ।। अपने यौवन से अनभिज्ञ नायिका जिस प्रकार कभी अपना सुन्दर मुख यूँघट में छिपा लेती है और कभी चूँघट उघाड़ देती है, उसी प्रकार गंगा में प्रतिबिम्बित दशमी का चन्द्र भी अपना तिरछा मुख दिखा देता है और कभी लहरों में चंचलता के कारण छिप जाता है ।।

काव्य सौन्दर्य-1 . गंगा के जल में मानवीकरण पर आधारित आकाश, तारों और चन्द्रमा की छटा का मनोहारी चित्रण हुआ है ।।
2 . भाषा-संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।।
3 . अलंकार-रूपक, उपमा और मानवीकरण ।।
4 . रस- शृंगार ।।
5 . शब्दशक्तिलक्षणा ।।
6 . गुण-प्रसाद और माधुर्य ।।

(घ) पतवार घुमा,अब ……………………………………………………………… को सहोत्साह !

पतवार घुमा, अब प्रतनु भार
नौका घूमी विपरीत धार।
डाँड़ों के चल करतल पसार, भर-भर मुक्ताफल फेन-स्फार।
बिखराती जल में तार-हार!
चाँदी के साँपों-सी रलमल नाचती रश्मियाँ जल में चल
रेखाओं-सी खिंच तरल-सरल!
लहरों की लतिकाओं में खिल, सौ-सौ शशि, सौ-सौ उडु झिलमिल
फैले फूले जल में फेनिल;
अब उथला सरिता का प्रवाह, लग्गी से ले-ले सहज थाह।
हम बढ़े घाट को सहोत्साह!

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- पन्त जी ने चाँदनी रात में गंगा नदी के बीच की धारा में नौका-विहार के समय की प्राकृतिक सुषमा का सुन्दर चित्रण किया है ।।

व्याख्या- जब नौका गंगा के बीच धारा में पहुँचती तो हमने देखा कि चाँदनी में चाँद-सा चमकता हुआ रेतीला कगार हमारी दृष्टि से ओझल हो गया ।। गंगा के दूर-दूर स्थित दोनों तट फैली हुई दो बाँहों के समान लग रहे थे, जो गंगा-धारा के दुबलेपतले कोमल नारी शरीर का आलिंगन करने के लिए अधीर थे; अर्थात् अपने में कस लेना चाहते थे ।। उधर, अत्यधिक दूर क्षितिज पर वृक्षों की पंक्ति थी जो धरती के सौन्दर्य को बिना पलक झपकाये निहारते हुए आकाश को नीले-नीले विशाल नयन की तिरछी भौंह के समान लग रही थी ।। निकट ही धारा के बीच एक छोटा सा द्वीप था, जो लहरों के प्रवाह को रोककर उलट देता था ।। धारा में स्थित वह शान्त द्वीप ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे माँ की छाती पर चिपककर कोई नन्हा-सा बालक सोया हुआ हो ।। वह उड़ता हुआ पक्षी कौन है? क्या वह अपनी प्रिया चकवी से रात्रि में बिछड़ा हुआ व्याकुल चकवा तो नहीं है? शायद वही है, जो जल में पड़े हुए प्रतिबिम्ब को देखकर उसे चकवी समझ बैठा है और विरह-वेदना मिटाने के लिए उससे मिलन हेतु उड़ रहा है ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . सम्पूर्ण वर्णन प्राकृतिक दृश्यावलियों की गतिशीलता मनोरम झाँकी को नेत्र पटल पर साकार कर देता है ।।
2 . तटों के बीच की दुबली-पतली धारा, दूर क्षितिज पर स्थित वृक्षों की पंक्ति, धारा के बीच स्थित द्वीप तथा उड़ते हुए पक्षियों को दर्शाकर कवि ने प्रकृति का सजीव चित्र प्रस्तुत कर दिया है ।।
3 . भाषा- संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।।
4 . रस- शृंगार ।।
5 . अलंकार- उपमा, रूपक, भ्रान्तिमान व मानवीकरण ।।
6 . छन्द- स्वच्छन्द ।।
7 . गुण- प्रसाद ।।
8 . शब्दशक्ति- अभिधा, लक्षणा ।।

(घ) ज्यों ज्यों लगती है . . . . . . . . . . . . अमरत्वदान !

ज्यों-ज्यों लगती है नाव पार
उर के आलोकित शत विचार।
इस धारा-सा ही जग का क्रम, शाश्वत इस जीवन का उद्गम,
शाश्वत है गति, शाश्वत संगम!
शाश्वत नभ का नीला विकास, शाश्वत शशि का यह रजत हास,
शाश्वत लघु लहरों का विलास!
हे जग-जीवन के कर्णधार! चिर जन्म-मरण के आरपार,
शाश्वत जीवन-नौका-विहार!
मैं भूल गया अस्तित्व ज्ञान, जीवन का यह शाश्वत प्रमाण,
करता मुझको अमरत्व दान!

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग-कवि ने यहाँ पर नौका-विहार के अनुभव का वर्णन किया है ।।

व्याख्या- कवि कहता है कि जैसे-जैसे हमारी नौका दूसरे किनारे की ओर बढ़ती जाती है, वैसे ही हमारे हृदय में सैकड़ों विचार उठने लगते हैं और हम सोचते हैं कि इस संसार का क्रम भी इस जलधारा के समान ही है ।। जिस प्रकार धारा निरन्तर बहती चली आ रही है, कभी समाप्त नहीं होती और जो जल आगे बह जाता है, उसका स्थान पीछे से आ रहा जल ले लेता है, इसी प्रकार जीवन का उद्गम भी शाश्वत है ।। जलधारा के समान ही जीवन की गति तथा मिलन भी शाश्वत है ।। चन्द्रमा की चाँदी जैसी हँसी अर्थात् चाँदनी भी चिरस्थायी है ।। इसी प्रकार लहरों का ऐश्वर्य भी निरन्तर बना रहता है ।। कवि भावनाओं के सागर में डूब गया और सोचने लगा ।। कि हे संसार की जीवनरूपी नौका को चलानेवाले भगवान्! जन्म के पश्चात् सदैव मृत्यु और मृत्यु के पश्चात् सदैव जन्म है ।। इसी प्रकार यह जीवनरूपी नौका का विहार निरन्तर चलता रहता है ।। भावनाओं में डूबा कवि कह उठता है कि मैं चिन्तनशील होकर भी अपनी सत्ता का ज्ञान भूल गया ।। जीवन की शाश्वता का जलधारारूपी यह प्रमाण ही मुझे अमरत्व प्रदान करता है ।।

काव्य-सौन्दर्य- 1 . नौका विहार के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कवि ने जीवन का शाश्वता को स्पष्ट किया है ।।
2 . कवि ने प्रकृति से उपदेश ग्रहण किया है ।।
3 . भाषा- संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।।
4 . अलंकार- उपमा एवं रूपक ।।
5 . रस- श्रृंगार ।।
6 . शब्दशक्ति-लक्षणा ।।
7 . गुण- माधुर्य ।।
8 . छन्द- स्वच्छन्द ।।

(क) कहाँ आज वह . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . भू-पात

कहाँ आज वह पूर्ण पुरातन, वह सुवर्ण का काल?
भूतियों का दिगन्त छवि जाल,
ज्योति चुम्बित जगती का भाल?
राशि-राशि विकसित वसुधा का वह यौवन-विस्तार?
स्वर्ग की सुषमा जब साभार।
धरा पर करती थी अभिसार!
प्रसूनों के शाश्वत श्रृंगार,
(स्वर्ण ,गों के गन्ध विहार)
गूंज उठते थे बारम्बार
सृष्टि के प्रथमोद्गार।
नग्न सुन्दरता थी सुकुमार
ऋद्धि औं सिद्धि अपार।
अये, विश्व का स्वर्ण स्वप्न, संसृति का प्रथम प्रभात,
कहाँ वह सत्य, वेद विख्यात?
दुरित, दुःख दैन्य न थे जब ज्ञात,
अपरिचित जरा-मरण भ्रू-पात।

सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘काव्यांजलि’ के ‘सुमित्रानन्दन पन्त’ द्वारा रचित काव्य-ग्रन्थ ‘पल्लव’ से ‘परिवर्तन’ नामक शीर्षक से उद्धृत है ।।
प्रसंग-इन पंक्तियों में कवि ने देश के वैभव और समृद्धि से परिपूर्ण प्राचीन युग का स्मरण और वर्णन किया है ।। परिवर्तन की निरन्तर गतिशीलता की ओर संकेत करते हुए कवि ने बताया है कि समय के अनुसार देश के भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक क्षेत्र में क्रान्ति और परिवर्तन होते रहते हैं ।।

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व्याख्या-समृद्धि और वैभव से परिपूर्ण हमारा वह प्राचीन युग, हमारे इतिहास का स्वर्ण-काल कहाँ विलीन हो गया? उस समय चारों दिशाओं में ऐश्वर्य और समृद्धि व्याप्त थी ।। चारों ओर ज्ञान का आलोक छाया रहता था तथा भारत का मस्तक ज्ञान की ज्योति से जगमगाता रहता था ।। चारों ओर लहलहाती खेती और हरियाली के रूप में मानो धरती का यौवन विकसित होता रहता था ।। उस युग की सुषमा को देखकर ऐसा प्रतीत होता था, मानो स्वर्ग की सुन्दरता ही धरती का आभार स्वीकार कर प्रेमक्रीड़ा करने के लिए धरती पर उतर आई हो ।। निरन्तर खिलते रहनेवाले अनेक प्रकार के पुष्प धरती का श्रृंगार करते थे, जिनकी गन्ध से मतवाले सुनहले भौरें उन पर मँडराते और गूंजते रहते थे ।। भौरों की गुंजार ऐसी प्रतीत होती थी, मानो सृष्टि अपने हृदय के प्रथम उद्गारों को व्यक्त कर रही हो ।। उस समय चारों ओर छाया हुआ उन्मुक्त सौन्दर्य सुकुमार था ।। उस सुकुमार सौन्दर्य को छिपाने की भावना भी नहीं थी ।। चारों ओर अपाव वैभव और समृद्धि छाई रहती थी ।। ऐसा वह युग विश्व के स्वर्णिम स्वप्न के समान मनोरम ओर सृष्टि का प्रथम प्रभात था ।। जिस प्रकार प्रभात जागृति, नवजीवन, उल्लास, सौन्दर्य तथा उत्साह का प्रतीक होता है, उसी प्रकार वह प्राचीन युग भी इन्हीं समस्त गुणों और विशेषताओं से परिपूर्ण था ।। कवि उस स्वर्ण-युग को याद करते हुए पूछता है आज जीवन का वह सत्य, जीवन को सहजता के साथ स्वीकार करने का उपदेश देनेवाले ये विश्वविख्यात वेद कहाँ लुप्त हो गए हैं? यह वह युग था जब मानव को पाप, दुःख, दीनता एवं गरीबी का सामना नहीं करना पड़ता था ।। उस युग में मानव वृद्धावस्था और मृत्यु की विभीषिकाओं से पूर्णतः अपरिचित था ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . अतीत के वैभव की कल्पना और भावना से अनुरंजित मनोरम चित्र प्रस्तुत हुए हैं ।।
2 . जगत् का सबसे बड़ा सत्य परिवर्तन है ।।
3 . कवि ने यहाँ भारत के प्राचीन स्वर्णिम युग को सृष्टि तथा मानव सभ्यता का ‘प्रथम-प्रभात’ कहा है ।।
3 . भाषा- संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।।
5 . अलंकार- रूपक, मानवीकरण, पुनरुक्तिप्रकाश एवं अनुप्रास ।।
6 . रस- भयानक ।।
7 . शब्दशक्ति- लक्षणा ।।
8 . गुण-ओज ।।
9 . छन्द-स्वच्छन्द ।।

(ख) हाय! सब मिथ्या …………………………………… फिर हाहाकर।

हाय! सब मिथ्या बात!
आज तो सौरभ का मधुमास
शिशिर में भरता सूनी साँस!
वही मधुऋतु की गुंजित डाल
झुकी थी जो यौवन के भार,
अकिंचनता में निज तत्काल
सिहर उठती, जीवन है भार!
आज पावस नद के उद्गार
काल के बनते चिह्न कराल,
प्रात का सोने का संसार,
जला देती सन्ध्या की ज्वाल!
अखिल यौवन के रंग उभार
हड्डियों के हिलते कंकाल
कचों के चिकने, काले व्याल ।
केंचुली, काँस सिवार,
गूंजते हैं सबके दिन चार
सभी फिर हाहाकर।

सन्दर्भ — पहले की तरह

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से कवि ने अतीत के गौरवपूर्ण समय से वर्तमान समय की तुलना की गई है।

व्याख्या – यहाँ पर अतीत के स्वर्णिम युग को स्मरण करते हुए पन्त जी कहते हैं कि । वर्तमान समय की दयनीय दशा को देखकर कल के वैभव व समृद्धि का भला कौन । विश्वास करेगा। आज तो अतीत की वे सारी बातें व्यर्थ व झूठी प्रतीत होती हैं। आज तो चारों ओर सुगन्ध बिखेर देने वाला बसन्त, शिशिर अर्थात् जाड़े का रूप धारण कर निर्जनता में गहरी साँसे भर रहा है अर्थात् मानव जीवन की सुख-समृद्धियाँ आज दुःख और दीनता में बदल गई हैं। बसन्त ऋतु में भौंरों के समूहों से गुंजायमान वृक्षों की जो डालियाँ नए-नए पत्तों और मंजरों-फूलों से लदकर झुक जाती थीं, आज वही डालियाँ नव पत्ते, मंजर व पुष्पों के लिए तरस रही हैं। दूसरों को सुख आनन्द पहुँचाने वाली डालियाँ आज अपने ही जीवन के लिए भार बन गई हैं। इस प्रकार, कवि उक्त उदाहरणों के द्वारा यह स्पष्ट करना चाहता है कि समय परिवर्तनशील है। समय की परिवर्तनशीलता का उल्लेख करते हुए कवि कहते हैं कि आज वर्षा ऋतु में बाढ़ लाकर जो नदियाँ चारों ओर भीषण तबाही मचाती हैं, वही नदियाँ वर्षा ऋतु के बीत जाने के पश्चात्, अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करती नजर आती हैं और रेत, कचरा, झाड़-झंखाड़ आदि के रूप में बस अपने कुछ चिह्न छोड़ जाती हैं। सुख के बाद दुःख के आने का दूसरा उदाहरण देते हुए कवि कहते हैं कि सवेरा होने पर सूर्य की प्रथम सुनहली किरणों के कारण समस्त धरती और पूरी प्रकृति सोने के रंग में रंग जाती है, पर दिन चढ़ने पर सूर्य की आग (लाल प्रकाश) उस सुनहले संसार को जला कर भस्म कर देती है।
यौवनावस्था में शरीर के सुन्दर रंग और उभार उसे मजबूत और आकर्षक बना देते हैं, किन्तु वृद्धावस्था आने पर वहीं मानव-शरीर हड्डियों का ढाँचा मात्र रह जाता है और उसमें कोई आकर्षण शेष नहीं रहता। काले सर्प के सदश चिकने सुन्दर। केश सर्प की केंचुली-सी मलिन (बेजान), काँस के पुष्प से सफेद एवं काई के समान। उलझे हुए दिखने लगते हैं। इस प्रकार, हमारे जीवन में सुख स्थायी रूप से नहीं। ठहरता। सुख के चार दिनों के बीतने के बाद दुःख का आना तय है।

काव्य सौन्दर्य
(i) प्रस्तुत पद्यांश के माध्यम से संसार की नश्वरता के भाव की पुष्टि की गई है।
(ii) रस शान्त
3- भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली
4-शैली प्रतीकात्मक
5-छन्द स्वच्छन्द
6-अलंकार अनुप्रास, उपमा, रूपक, रूपकातिशयोक्ति एवं मानवीकरण
7-गुण प्रसाद
8-शब्द शक्ति लक्षणा

(ग) आज बचपन का . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . काँटो-से हाय !

आज बचपन का कोमल गाता
जरा का पीला पात
चार दिन सुखद चाँदनी रात
और फिर अन्धकार, अज्ञात!
शिशिर-सा झर नयनों का नीर
झुलस देता गालों के फूल!
प्रणय का चुम्बन छोड़ अधीर
अधर जाते अधरों को भूल!
मृदुल होठों का हिमजल हास
उड़ा जाता नि:श्वास समीर;
सरत भौंहों का शरदाकाश
घेर लेते घन, घिर गम्भीर।
शून्य साँसों का विधुर वियोग
छुड़ाता अधर मधुर संयोग!
मिलन के पल केवल दो चार,
विरह के कल्प अपार!
अरे, वे अपलक चार नयन
आठ आँसू रोते निरुपाय,
उठे रोओं के आलिंगन
कसक उठते काँटों-से हाय!

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- कालचक्र द्वारा उत्पन्न किए गए परिवर्तनों के अन्य उदाहरण प्रस्तुत करते हुए पन्तजी कहते हैं

व्याख्या- आज बचपन का जो कोमल, सुन्दर शरीर है, वृद्धावस्था आ जाने पर वही शरीर पीले, सूखे, खुरदरे पत्ते के समान हो जाएगा ।। जीवन में सुख देनेवाली चाँदनी रातें और सुख के क्षण बहुत थोड़े समय तक ही रहते हैं, शेष जीवन में तो अज्ञात अन्धकार से परिपूर्ण रात्रि भर जाती है और सारे सुख नष्ट हो जाते हैं ।। दु:ख के क्षणों में आरौँ, पुष्पों के समान गालों को इस प्रकार झुलसा देते हैं, जैसे शिशिर की ओस फूल और पत्तों को झुलसा देती है ।। उस समय प्रेमी के अधर प्रणय के चुम्बनों को भूलकर अपने प्रिय के अधरों को भूल जाते हैं ।। आज दिन होंठों पर ओस की बूंद के समान निर्मल और मोहक हँसी छाई रहती है, वृद्धावस्था आ जाने पर उठती गहरी साँसें उन होंठों की हँसी को उड़ा ले जाती हैं ।। तात्पर्य यह है कि मानव निर्मल एवं मुक्त हँसी हँसना भूल जाता है ।। चिन्ताहीन जो भौंहें शरद्-ऋतु के स्वच्छ, मेघहीन आकाश के समान अपने स्वाभाविक, सरल रूप में स्थित रहती हैं, समय बीतने पर चिन्ता के सघन मेघ घिरकर उन्हें गम्भीर और कुंचित बना देते हैं; अर्थात् भौंहे चिन्ताओं के कारण सिकुड़ी बनी रहती है ।। उनकी सरलता नष्ट हो जाती है ।। संयोग के समय, प्रिय-प्रियतमा के जो अधर आपस में जुड़ जाते हैं अथवा चुंबन के आबद्ध हो जाते हैं, बिछोह हो जाने पर वही अधर वियोग के दुःख से कातर हो गहरी साँसें भरते रहते हैं ।। इस संसार में मिलन के क्षण केवल दोचार होते हैं, परन्तु विरह असंख्य कल्पों के समान लम्बा होता है; अर्थात् जीवन में सुख के क्षण बहुत कम होते हैं, अधिकांश जीवन तो दुःख भोगते हुए ही रहना पड़ता है ।। पन्त जी कहते हैं कि प्रिय-विरह के कारण उत्पन्न दुःख से व्यक्ति की आँखें पथरा जाती हैं ।। वह बिना पलक झपकाए अपने प्रिय की यादों में खोया फूट-फूटकर रोता रहता है; उस समय वह पूरी तरह असहाय होता है, उसे अपने दुःख से पार पाने का कोई उपाय दृष्टिगत नहीं होता ।। अपनी विवशता, असहायता और एकाकीपन के कारण जीवन में आगे आनेवाले दुःखों की कल्पना करके व्यक्ति सिहर उठता है और भय से उसके शरीर का एक-एक रोम ऐसे उठ खड़े होता है, मानो वे रोम एकदूसरे का आलिंगन करने के लिए उठ खड़े हुए हैं ।। भय से खड़े वे रोम उसके मन में पीड़ा की ऐसी कसक उत्पन्न करते हैं, मानो उसके शरीर में काँटों को चुभो दिया जाता है ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . परिवर्तन की शक्ति का वर्णन हुआ है ।।
2 . सांसारिक दुःख का ऐसा कारण चित्र उपस्थित किया गया है कि उसको देखकर प्रत्येक सहृदय के मन में शूल-सा उभरकर उसको चीरने लगता है ।।
3 . भाषा- शुद्ध साहित्यिक मुहावरेदार खड़ीबोली ।।
4 . ‘आठ-आठ आरौँ रोना’ मुहावरे का सार्थक प्रयोग द्रष्टव्य है ।।
5 . अलंकार- रूपक, उपमा, अनुप्रास और लोकोक्ति ।।
6 . रस- भयानक ।। 7 . शब्दशक्ति- लक्षणा; व्यंजना ।।
8 . छन्द-स्वच्छन्द ।।

(ग) किसी को ……………………………………………….. बयार


किसी को सोने के सुख साज
मिल गया यदि ऋण भी कुछ आज,
चुका लेता दु:ख कल ही ब्याज
काल को नहीं किसी की लाज!
विपुल मणि रत्नों का छविजाल,
इन्द्रधनुष की सी जटा विशाल
विभव की विद्युत ज्वाल |
चमक, छिप जाती है तत्काल;
मोतियों जड़ी ओस की डार
हिला जाता चुपचाप बयार!

सन्दर्भ – पहले की तरह

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश में सुख-दुःख के चक्र को समय के साथ जोड़कर स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।

व्याख्या प्रस्तुत पंक्तियों में कवि पन्त जी कहते हैं कि सुख मानव का स्थायी साथी नहीं होता। यदि आज किसी को सुख-सुविधाओं के साधन उधार प्राप्त हो भी जाएँ तो समय का चक्र कल उसे इतना कमजोर और दुःखी बना देता है कि उसे प्राप्त सारे साधन ब्याज सहित चुकाने पड़ जाते हैं और उसकी दशा पहले से भी खराब हो जाती है। इस प्रकार यहाँ कवि ने समय को निर्लज्ज महाजन की तरह माना है। कवि कहते हैं कि मानव द्वारा असंख्य मणियों व रत्नों के रूप में संचित सम्पत्ति इन्द्रधनुष की तरह चकाचौंध करने वाली और अत्यन्त मोहक होती है, पर वह उसी क्षण भर में नष्ट हो जाने वाली भी है। जिस प्रकार बिजली की आग अपनी चमक बिखेर कर क्षण-भर में किसी अज्ञात संसार में विलुप्त हो जाता है, उसी प्रकार वैभव व सुख-सम्पत्ति का भी मानव-जीवन में क्षणिक प्रभाव रहता है। WWW.UPBOARDINFO.IN

जिस प्रकार किसी डाल पर पड़ी मोतियों के समान चमकती मन को मुग्ध कर देने वाली ओस की बूंदें हवा के एक ही झोंके से डाल से अलग होकर धरती पर गिर जाती हैं और डाल को शोभाहीन कर जाती हैं, उसी प्रकार समयरूपी क्रूर हवा के झोंके क्षणभर में व्यक्ति द्वारा अर्जित किए गए ऐश्वर्य व सुख-समृद्धि के सारे साधनों को अपने साथ उड़ा ले जाती है अर्थात् मानव सुख-सुविधाओं के सारे साधनों से हीन होकर जीने के लिए विवश हो जाता है।

काव्य सौन्दर्य के तत्व
(i) प्रस्तुत पद्यांश में इस सत्य को स्थापित करने की कोशिश की गई है कि मानव-जीवन में दुःख-दर्द की प्रधानता है।
(ii) रस करुण
३-भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली
4-शैली प्रतीकात्मक
5-छन्द स्वच्छन्द
6-अलंकार अनुप्रास, उपमा, रूपक एवं मानवीकरण
7-गुण प्रसाद 8-शब्द शक्ति लक्षणा

(छ) खोलता इधर . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . उठते उडुगन !

खोलता इधर जन्म लोचन
मूंदती उधर मृत्यु क्षण-क्षण
अभी उत्सव औ हास हुलास
अभी अवसाद, अश्रु, उच्छवास!
अचरिता देख जगत् की आप
शून्य भरता समीर नि:श्वास,
डालता पातों पर चुपचाप
ओस के आँसू नीलाकाश,
सिसक उठता समुद्र का मन,
सिहर उठते उहुगन!

सन्दर्भ- पहले की तरह ।।
प्रसंग- इसमें कवि ने संसार की परिवर्तनशीलता का करुणापूर्ण चित्र अंकित किया है ।।

व्याख्या- यह संसार परिवर्तनशील है ।। एक ओर जन्म की कोमल अंगुलियाँ जीवन की पलक उघाड़कर उसकी आँखें खोल देती हैं तो दूसरी ओर मृत्यु का हाथ आगे बढ़कर अगले ही पल उन्हें मूंद देता है ।। जहाँ अभी कुछ समय पहले ही उत्सव हो रहा था, लोग हँस-हँसकर उल्लास जता रहे थे, वहीं अब मौत के ताण्डव का दुःख आँसू और आहे शेष रह गयी हैं ।। विधाता का यह कैसा खेल है कि जहाँ हर्ष और उल्लास का सागर हिलोरे ले रहा होता है, वहीं अगले ही क्षण दुःख का विशाल पहाड़ टूट पड़ता है ।। संसार की इस अस्थिरता को देखकर पवन भी दु:खी है ।। वह दुःख से आहें भरता हुआ सारे शून्यांक को भर देता है ।। उधर आकाश के नयन भी इस परिवर्तनशीलता को देखकर करुणावश गीले हो गये हैं और वह चोट खाया हुआ (नीला) आकाश ओस की बूंदों के रूप में अपने आउ वृक्ष के पत्तों पर चुपचाप टपका देता है ।। गहन गम्भीर सागर भी सिसकने लगता है और असंख्य तारे इस कारुणिक दृश्य को देखकर सिहर उठते है ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . भाषा-संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।।
2 . रस- भयानक ।।
3 छन्द-स्वच्छन्द ।।
4 . गुण- प्रसाद ।।
5 . अलंकारअनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश व मानवीकरण ।।
6 . यहाँ पर कवि ने संसार में निष्ठुर परिवर्तन के दुःखद प्रभाव का मर्मस्पर्शी चित्रण किया है ।।
7 . प्रकृति के विविध उपादानों को व्यथित दिखाकर प्रकृति का संवेदनात्मक रूप प्रस्तुत किया गया है ।।

(ज) अहे निष्ठुर . . . . . . . . . . . . . . . . . . . दिङ्मंडल !

अहे निष्ठुर परिवर्तन!
तुम्हारा ही ताण्डव नर्तन
विश्व का करुण विवर्तन!
तुम्हारा ही नयनोन्मीलन,
निखिल उत्थान, पतन !
अहे वासुकि सहस्रफन!
लक्ष अलक्षित चरण तुम्हारे चिह्न निरन्तर
छोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षःस्थल पर !
शत शत फेनोच्छ्वसित, स्फीत फूत्कार भयंकर
घुमा रहे हैं घनाकार जगती का अम्बर
मृत्यु तुम्हारा गरल दन्त, कंचुक कल्पान्तर
अखिल विश्व ही विवर,
वक्र-कुण्डल दिङ्मण्डल ।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- यहाँ कवि ने परिवर्तन के भयंकर रूप का चित्रण किया है ।।

व्याख्या- हे हृदयहीन परिवर्तन! तुम्हारे ही प्रलंयकारी नृत्य के फलस्वरूप विश्व में करुणोत्पादक उलट-फेर होते रहते हैं ।। एक क्षण में किसी भी स्थिति का कायापलट हो जाता है ।। तुम्हारे आँख खोलते ही संसार में उथल-पुथल मच जाती है ।। सारी उन्नति और अवनति का कारण तुम ही हो ।। तात्पर्य यह है कि विश्व में परिवर्तन का चक्र निरन्तर घूमता रहता है और उसी के फलस्वरूप सम्पूर्ण विश्व में उलट-फेर तथा उत्थान-पतन होता है ।। हजारों फन वाले वासुकि नाग के सदृश हे परिवर्तन! तुम्हारे दिखाई न पड़ने वाले किन्तु हर क्षण गतिमान लाखों चरण इस विश्व की घायल छाती पर दिन-रात अपने चिह्न छोड़ते चलते हैं ।। आशय यह है कि विश्व में नित्यप्रति असंख्य परिवर्तन हो रहे हैं, पर वे सामान्यतः दृष्टिगोचर नहीं होते (साँप के चरण दिखाई नहीं पड़ते, पर जब वह रेंगता है तो उसके रेंगने से एक लकीर-सी खींच जाती है ।। ) जहरीले फेन (झाग) से युक्त तुम्हारी श्वासोच्छ्वासरूपी भयंकर फुकारे सारे संसार में उथल-पुथल मचाती रहती हैं ।। मृत्यु ही तुम्हारा विषैला दाँत है, अर्थात् सर्प के विषैले दाँत के दंश से कोई जीवित नहीं बच सकता ।। भाव यह है कि संसार के प्राणियों की मृत्यु अवश्यम्भावी है ।। प्रलय के बाद नवीन सृष्टि का उद्भव ही तुम्हारा केंचुली बदलना है ।। सम्पूर्ण विश्व ही तुम्हारी बाँबी है ।। दिशाओं का घेरा ही तुम्हारी मण्डलाकार कुण्डली है: अर्थात् दिशाओं तक विस्तृत समस्त विश्व तुम्हारी जकड़ में है ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . कवि पन्त अपनी सुकुमार कल्पना के लिए प्रसिद्ध हैं, परन्तु यहाँ उन्होंने परिवर्तन का अतीव भयंकर एव विराट रूप बड़ी कुशलतापूर्वक अंकित किया है ।।
2 . भाषा- संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।।
3 . रस- शान्त ।।
4 . शब्द-शक्तिअभिधा और लक्षणा ।।
5 . गुण- प्रसाद ।।
6 . अलंकार- मानवीकरण, रूपक और ध्वन्यर्थव्यंजना ।।
7 . छन्द- मुक्त ।।
8 . भावसाम्य- इसी भाव को जगदीश गुप्त जी कुछ इन शब्दों में कहते हैं
जब तक बँधी है चेतना
तब तक हृदय दुःख से घना ।।

(क) तुम मांसहीन . . . . . . . . . . . . . . . . . . से मानवपन !

तुम मांसहीन, तुम रक्तहीन
हे अस्थिशेष! तुम अस्थिहीन,
तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल ।
हे चिर पुराण! हे चिर नवीन!
तुम पूर्ण इकाई जीवन की,
जिसमें असार भव-शून्य लीन,
आधार अमर, होगी जिस पर
भावी की संस्कृति समासीन ।
तुम मांस, तुम्ही हो रक्त-अस्थि
निर्मित जिनसे नवयुग का तन,
तुम धन्य! तुम्हारा नि:स्व त्याग
हे विश्व भोग का वर साधन;
इस भस्म-काम तन की रज से,
जग पूर्ण-काम नव जगजीवन,
बीनेगा सत्य-अहिंसा के
ताने-बानों से मानवपन !

सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘काव्यांजलि’ के ‘सुमित्रानन्दन पन्त’ के द्वारा रचित काव्य ग्रन्थ ‘युगान्त’ से ‘बापू के प्रति’ नामक शीर्षक से उद्धृत है ।।
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में कविवर पन्त ने युगपुरुष महात्मा गाँधी की स्तुति की है ।। WWW.UPBOARDINFO.IN

व्याख्या- युगपुरुष महात्मा गाँधी की स्तुति करते हुए कविवर पन्त कहते हैं कि हे बापू! तुम शरीर से दुर्बल तथा मांस और रक्त से हीन हो एवं तुम्हारा शरीर हड्डियों का ढाँचामात्र है ।। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हारा शरीर में अस्थियाँ भी शेष नहीं हैं ।। तुम पवित्र ज्ञान से युक्त आत्मावाले हो ।। तुममें प्राचीन और नवीन आदर्शों का समन्वय है; अर्थात् तुम प्राचीन आदर्शों के साथ-साथ नवीन आदर्शों को भी स्वीकार करते हो ।। हे बापू! तुममें जीवन की पूर्णता है, जिसमें विश्व की समस्त असारता लीन हो जाएगी ।। हे बाप! तुम्हारे ही जीवन के आदर्शों पर भविष्य की संस्कृति और सभ्यता उचित प्रकार से प्रतिष्ठित होगी ।। जिस प्रकार मांस, रक्त तथा हड्डियों से शरीर का निर्माण होता है, उसी प्रकार तुम्हारे सद्-आदर्शों से नवयुग का निर्माण होगा ।। तुम और तुम्हारा स्वार्थरहित त्याग भी धन्य है ।। तुम्हारा नि:स्वार्थ भावना से किया गया त्याग ही मानव-जाति के कल्याण का कारण बनेगा ।। तात्पर्य यह है कि तुमने अपनी समस्त कामनाओं को त्यागकर भारत को स्वतन्त्र कराकर भारतवासियों को स्वतन्त्रता प्रदान की ।। यह नवीन जगत् अब अपनी इच्छाओं और भावनाओं को भस्म करके उसकी धूलि से सत्य और अहिंसा के सिद्धान्त को प्राप्त करेगा ।। जिस प्रकार ताने-बानों के योग से सुन्दर वस्त्र बनकर तैयार हो जाता है, उसी प्रकार आपके द्वारा निर्धारित सत्य और अहिंसारूपी ताने-बानों से मानव-जीवन सुखी और समृद्ध बन सकेगा ।

काव्य-सौन्दर्य- 1 . कवि ने गाँधीजी के आदर्शों को श्रेष्ठ मानकर उन्हें विश्व-एकता में सहायक बताया है ।।
2 . भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।।
3 . अलंकार- उल्लेख, विरोधाभास, यमक एवं रूपक ।।
4 . रस- भक्ति ।।
5 . शब्दशक्ति- अभिधा एवं लक्षणा ।।
6 . गुण-प्रसाद ।।

(ञ) सुख भोग खोजने . . . . . . . . . . . . . . . . . . मानवताका सरोज!

सुख भोग खोजने आते सब,
आए तुम करने सत्य-खोज
जग की मिट्टी के पुतले जन,
तुम आत्मा के, मन के मनोज!
जड़ता, हिंसा, स्पर्धा में भर
चेतना, अहिंसा, नम्र ओज,
पशुता का पंकज बना दिया
तुमने मानवता का सरोज!

सन्दर्भ- पहले की तरह ।।
प्रसंग- प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने बताया है कि गाँधी जी की आत्मा एवं मन दोनों ही पवित्र, कोमल एवं सुन्दर थे ।। वे सत्य और अहिंसा के अनन्य पुजारी थे तथा उनका जीवन त्यागमय था ।।

व्याख्या- संसार में जन्म लेकर अधिकांश मनुष्य सुख-भोग की खोज में लग जाते है; अर्थात् सासांरिक सुख को जुटाने मे सारा जीवन खपा देते हैं, किन्तु तुम तो साधारण मानव नहीं थे ।। तुमने यहाँ जीवन की सच्ची सार्थकता को पाने का उपाय खोजा ।। संसार के अधिकांश लोग शुद्ध भौतिकवादी हैं ।। वे किसी उच्चतर आदर्श की कल्पना नहीं करते, केवल शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति में ही लगे रहते हैं, किन्तु तुम शरीर से बँधकर रहने वाले न थे ।। तुम तो आत्मस्वरूप थे, आत्मिक विकास के कामदेव के समान सुन्दरतम रूप थे ।। तुमको इस भौतिक शरीर में सुख के दर्शन ही नहीं होते थे, वरन् आत्मा के सुख में ही तुमने वास्तविक सुख देखा ।। समस्त भारतवासियों के लिए भोजन और वस्त्र देने में ही आपको सुख मिलता था, वही आपका आत्मिक सुख सन्तोष था ।। संसार में व्याप्त जड़ता (भौतिकता) में तुमने चेतनता (आत्मिक शक्ति) का संचार किया, हिंसा के स्थान पर अहिंसा का प्रचार किया और अन्धी प्रतिस्पर्धा के स्थान पर नम्रतापूर्ण तेजस्विता का सन्देश दिया; अर्थात् दूसरों के प्रति विनम्र और सहनशील रहते हुए भी अपनी उन्नति करना, न कि दूसरे को गिराकर स्वयं उठने का प्रयास करना ।। सासांरिक मनुष्य घोर स्वार्थपरायणता के कारण पशुवत् बन गया था ।। वह पशुता की कीचड़ से उत्पन्न कमलवत् था ।। तुमने उसे मानवीयतारूपी निर्मल जल वाले सरोवर से उत्पन्न कमल बना दिया; अर्थात् तुमने भौतिकवादी मनुष्य को अध्यात्मवादी बना दिया ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . गाँधी जी का आचरण बौद्ध मत के इस सिद्धान्त के अनुरूप था कि क्रोधी को अक्रोध (शान्ति) से, दुर्जन व्यक्ति को सज्जनता से, कृपण (कंजूस) को दान से और मिथ्याभाषी को सत्य से जीते ।।
2 . भाषा-संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।।
3 . रस-शान्त ।।
4 . शब्द-शक्ति – लक्षणा ।।
5 . गुण- प्रसाद ।। 6 . अलंकार- परिकरांकुर (मनोज, सरोज) व रूपक ।।
7 . छन्दस्वच्छन्द ।।

(ट) उर के चरखे में . …………………………………………………… कौशल प्रवाद !

र के चरखे में कात सूक्ष्म,
युग-युग का विषय-जनित विषाद
गुंजित कर दिया गगन जग का
भर तुमने आत्मा का निनाद।
रँग-रँग खद्दर के सूत्रों में,
नव जीवन आशा, स्पृहाह्लाद,
मानवी कला के सूत्रधार।
हर लिया यन्त्र कौशल प्रवाद


सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- यहाँ गाँधी जी के आत्मिक विकास और नवयुग-निर्माण में उनकी भूमिका का उल्लेख किया गया है ।।

व्याख्या-कवि गाँधी जी को सम्बोधित करते हुए कहता है कि आपके द्वारा संचालित चरखा आन्दोलन केवल भौतिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए ही नहीं था, वह केवल आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर ही नहीं चलाया गया था, बल्कि उस आन्दोलन का उद्देश्य अपनी आध्यात्मिक शुद्धि करना भी था ।। आपने उस चरखे के समान ही अपने हृदय के चरखे पर कितने ही युगों से छिपी हुई वेदना को कातकर, उसका रूप परिवर्तित कर दिया ।। भौतिक वासनाओं का परित्याग करके, आपने चरखे की गूंज के साथ, आत्मा के आनन्दमीय संगीत को गगन में गुंजायमान् कर दिया ।। चरखे से काती गई सूत से बनी खादी को रँगने के साथ ही, आपने उस खादी में जीवन की नवीन आशा और उल्लास को भर दिया तथा मानव जीवन के लिए नवीन युग और एक नवीन कला का सूत्रपात किया ।। हे नव आदर्शों के निर्माता! जहाँ आपने एक ओर युग-युग की वासना से उत्पन्न वेदना का अन्त किया, वहीं आपने यन्त्रीकरण से उत्पन्न संघर्ष एवं दुःख को भी दूर किया और आत्मिक ज्योति से प्रकाशमान एक नवीन सभ्यता को प्रारम्भ किया ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . चरखा आन्दोलन के माध्यम से गाँधी जी द्वारा किए गए आत्मिक शुद्धि के प्रयास और नवयुग के सूत्राधार के रूप में उनके कार्यों की प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति हुई है ।।
2 . भाषा- परिष्कृत खड़ीबोली ।।
3 . अलंकार- रूपक ।।
4 . रसशान्त ।।
5 . शब्दशक्ति- लक्षणा ।।
6 . गुण- ओज ।।

पशु ……………………………….. बना मुक्ति

पशु-बल की कारा से जग को
दिखलाई आत्मा की विमुक्ति,
विद्वेष घृणा से लड़ने को
सिखलाई दुर्जय प्रेम-युक्ति,
वर श्रम-प्रसूति से की कृतार्थ
तुमने विचार परिणीत उक्ति
विश्वानुरक्त हे अनासक्त,
सर्वस्व-त्याग को बना मुक्ति !

सन्दर्भ पहले की तरह

प्रसंग — प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने बापू को ‘जग का उद्धारक’ के रूप में दर्शाया है।

व्याख्या– पन्त जी राष्ट्रपिता का गुणगान करते हुए कहते हैं कि हे बापू! जब सम्पूर्ण मानव समुदाय पाश्विक शक्ति के कारागृह में कैद होकर बाहि-त्राहि पुकार रहा था, तब तुमने सत्य-अहिंसा का पाठ पढ़ाते हुए उसे आत्मा की मुक्ति का मार्ग दिखाया। प्रेम से घृणा, द्वेष जैसे अवगुणों को जीतने का ऐसा मन्त्र दिया जो कभी निष्फल नहीं जाता। तुमने केवल कहे गए शब्दों के द्वारा अपने विचारों को अभिव्यक्त न कर उन्हें परिश्रम और। तप के बल पर अपने आचरण में उतारा अर्थात् तुम कथनों की अपेक्षा कर्म के द्वारा सन्देश देने को अधिक महत्त्वपूर्ण मानते थे। आसक्ति से विरक्त रहने वाले और विश्व के प्रति सदा अनुराग रखने वाले हे बापू! तुमने सर्वस्व त्याग करके मुक्ति अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति कर ली है।

काव्य सौन्दर्य के तत्व
(i) प्रस्तुत पद्यांश में गाँधीजी की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए उनके प्रति श्रद्धा का भाव व्यक्त किया गया है।
2-रस शान्त
३-भाषा संस्कृतनिष्ठ, शुद्ध परिष्कृत खड़ीबोली
4- शैली गीतात्मक मुक्त
5-छन्द स्वच्छन्द
6-अलंकार रूपक एवं उपमा
7-गुण प्रसाद
8-शब्द शक्ति लक्षणा

उर के ………………………………… कौशल प्रवाद

उर के चरखे में कात सूक्ष्म,
युग-युग का विषय-जनित विषाद
गुंजित कर दिया गगन जग का
भर तुमने आत्मा का निनाद ।
रँग-रँग खद्दर के सूत्रों में,
नव जीवन आशा, स्पृहाह्लाद,
मानवी कला के सूत्रधार।
हर लिया यन्त्र कौशल प्रवाद !

सन्दर्भ– पहले की तरह

प्रसंग — प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने गाँधीजी को जगत की आत्मा का परिष्कार करने वाला बताया है।

व्याख्या — कवि गाँधीजी के प्रति श्रद्धा भाव दर्शाते हुए कहते हैं कि हे बापू! तुमने चरखे को महत्त्व देकर न केवल लोगों को भौतिक आवश्यकता की पूर्ति हेतु कर्म में जुड़े रहने की सीख दी, बल्कि अपने हृदयरूपी चरखे के माध्यम से युग-युग से मानव-हृदय में व्याप्त वासनाजन्य विकारों को दूर करने का महत्त्वपूर्ण कार्य भी किया। तुमने चरखा आन्दोलन के साथ-साथ सत्य और अहिंसा की पवित्र गँज से उत्पन्न आत्मिक संगीत के द्वारा सम्पूर्ण धरती और आकाश को गुंजायमान कर दिया। खादी के वस्त्रों पर रंग चढ़ाने के साथ-साथ खादी को जन-जन से जोड़कर लोगों के जीवन में आशाओं और उल्लास का रंग भर दिया। इस प्रकार तुम्हारे माध्यम से एक नई मानवीय कला का सूत्रपात किया गया। हे बापू! चरखा के माध्यम । से एक ओर तो तुमने वासनाजन्य पीड़ाओं से छुटकारा दिलाया तो दूसरी ओर मशीनीकरण को चुनौती देकर लोगों को कर्म में रत रहने का सन्देश भी दिया।

काव्य सौन्दर्य WWW.UPBOARDINFO.IN
1- प्रस्तुत पद्यांश में बापू का आत्मिक शुद्धि के अग्रदूत व नवयुग के सूत्रधार के रूप। में प्रतिष्ठित किया गया है।
2- रस शान्त
३-भाषा संस्कृतनिष्ठ, शुद्ध परिष्कृत खड़ीबोली
4-शैली गीतात्मक मुक्त शैली
5-छन्द स्वच्छन्द
6-अंलकार रूपक एवं पुनरुक्तिप्रकाश गुण ओज
7-शब्द शक्ति लक्षणा

(ठ) साम्राज्यवाद था कंस . . . . . . . . . . . . . . पद-प्रणत शान्त !

साम्राज्यवाद था कंस, बन्दिनी
मानवता, पशु-बलाऽक्रान्त,
श्रृंखला-दासता, प्रहरी बहु
निर्मम शासन-पद शक्ति-भ्रान्त,
कारागृह में दे दिव्य जन्म
मानव आत्मा को मुक्त, कान्त,
जन-शोषण की बढ़ती यमुना
तुमने की नत, पद-प्रणत शान्त !

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- यहाँ पन्त जी ने स्पष्ट किया कि गाँधी जी ने कैसे विदेशियों को भगाकर भारतवर्ष को मुक्त कराया ।।

व्याख्या- अंग्रेजी साम्राज्यवाद भारतवासियों के लिए कंस के समान था ।। भारतवासी जेल की कैदी देवकी के समान पीड़ित थे तथा मानवता अंग्रेजी साम्राज्यवाद पर आधारित अत्याचारों से पीड़ित थी ।। उसके पैर परतन्त्रारूपी बेड़ियों से जकड़े हुए थे ।। पद और शक्ति के कारण भ्रमित शासन के उच्चपदों पर कार्य करनेवाले निर्दयी अधिकारी ही जेल के पहरेदार थे ।। जिस प्रकार देवकी ने श्रीकृष्ण को जेल में जन्म देकर कंस के अत्याचारों का दमन कराया, उसी प्रकार हे बापू! तुमने भी देश के कल्याण के लिए अनेक बार जेल जाकर मानव-जाति को मुक्त कराया ।। भाव यह है कि जिस प्रकार बढ़ती हुई यमुना बालक श्रीकृष्ण के चरणों का स्पर्श करके, अपनी चंचलता छोड़कर समान गति से प्रवाहित होने लगी थी; उसी प्रकार अत्याचारी, अन्यायी और शोषणकारी विदेशी राज्य-सत्ता बापू के समक्ष झुक गई और भारत देश कंस जैसे आततायी शासक से मुक्त हो गया ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने विदेशी शासन के अत्याचार और शोषण-वृत्ति का चित्रण किया है ।।
2 . कवि ने बापू को ईश्वर का अवतार मानकर उन्हें युगपुरुष के रूप में चित्रित किया है ।।
3 . भाषा- संस्कृतमिश्रित खड़ीबोली ।।
4 . अलंकार- रूपक, दृष्टान्त और अनुप्रास ।।
5 . रस-वीर ।।
6 . शब्दशक्ति -लक्षणा ।।
7 . गुण- ओज ।।

निम्नलिखित सूक्तिपरक पंक्तियों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए

(क) हे जग-जीवन के कर्णधार! चिर जन्म-मरण के आरपार, शाश्वत जीवन नौका-विहार ।।

सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘काव्यांजलि’ मे संकलित ‘सुमित्रानन्दन पन्त’ द्वारा रचित नौका-विहार’ शीर्षक से अवतरित है ।।
प्रसंग- इस सूक्ति में जीवन और जगत् का उद्गम एवं क्रम, गंगा की धारा के समान बताया गया है ।।

व्याख्या —जिस प्रकार गंगा की धारा अनादिकाल से प्रवाहित हो रही है, उसी प्रकार यह जगत भी अनादिकाल से चला आ रहा है ।। जैसे गंगा का उद्गम स्थल चिरन्तन (सदा से) है वैसे ही इस जीवन का उद्गम भी शाश्वत है ।। जिस प्रकार गंगा में नाव कभी इस ओर से उस ओर जाती है तथा उस ओर से इस ओर आती है, वैसे ही मनुष्य का जीवन भी है ।। मनुष्य जीवनरूपी नौका में बैठकर उस लोक (परलोक) में चला जाता है और फिर इस लोक में जन्म लेता है ।। उसकी यह आवाजाही नौका-विहार की भाँति निर्बाध रूप से चलती रहती है ।।

(ख) कहाँ आज वह पूर्ण पुरातन,वह सुवर्णकाल?

सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘काव्यांजलि’ मे संकलित ‘सुमित्रानन्दन पन्त’ द्वारा रचित ‘परिवर्तन’ नामक शीर्षक से अवतरित है ।।

प्रसंग- इसमें कवि भारत के गौरवशाली अतीत की याद दिलाते हुए सतत गतिमान परिवर्तन की ओर संकेत करता है ।।

व्याख्या- भारत का प्राचीन अतीत बहुत समृद्ध था ।। यहाँ अपार धन-सम्पत्ति तथा ज्ञान का प्रकाश था, किन्तु आज वह स्वर्ण युग कहीं नहीं दिखाई पड़ रहा हैं ।। परिवर्तन के चक्र ने सब कुछ परिवर्तित कर दिया है, अर्थात् परिवर्तन बड़ा बलवान है ।। परिवर्तन की यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है और बार-बार उस पुरातन की मधुर स्मृति याद आती रहती है ।।


(ग) गूंजते है सबके दिन चार,
सभी फिर हाहाकार !

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- प्रस्तुत सूक्ति में कवि ने बताया है कि जीवन में सुखद क्षणों की तुलना में दुःखद क्षण अधिक समय तक रहते हैं ।।

व्याख्या- पन्त जी कहते हैं कि प्रत्येक प्राणी के जीवन में सुखद समय केवल कुछ ही दिनों के लिए आता है ।। इसके उपरान्त पुनः वही दुःखद समय लौट आता है ।। इस दुःख के कारण सर्वत्र हाहाकार मचा रहता है ।। आशय यह है कि सुख तो चार दिन के लिए अर्थात् क्षणिक होता है, जब कि दुःखद अनन्त समय के एि अर्थात् दीर्घकालिक होता है ।।

(घ) चार दिन सुखद चाँदनी रात
और फिर अंधकार, अज्ञात !

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- इस सूक्ति में कवि परिवर्तन की विश्वव्यापी विनाशकारी शक्ति का चित्रण कर रहा है ।।

व्याख्या- संसार में दुःख-दैन्य ही शाश्वत है, स्थायी है ।। यदि दो-चार दिनों के लिए किसी की उन्नति हो भी जाए, उसकी सुख-समृद्धि की भी चर्चा होने लगे तो शीघ्र ही उसका अवसान (अन्त) दुःख, दैन्य और क्रन्दन में होता है ।। जिस प्रकार चाँदनी रात चार दिन रहती है और उसके बाद अँधेरा छा जाता है, ऐसे ही जीवन में सुख कम है और उस क्षणिक सुख के बाद चिरकालीन दु:ख आ जाता है ।। जैसे शहनाई के स्वर थोड़ी देर उठकर और सर्वत्र हर्षोल्लास का संचार करके अन्त में मौन में, निस्तब्धता में विलीन हो जाते हैं, उसी प्रकार व्यक्ति का सुख-सौभाग्य भी दो-चार दिन उत्कर्ष को प्राप्त होकर अन्त में विनष्ट हो जाता है ।।

(ङ) मिलन के पल केवल दो चार,
विरह के कल्प अपार !

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- इस सूक्ति में सुख की क्षणभंगुरता और दुःख की चिरन्तनता बताकर कवि ने जीवन का निराशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है ।।

व्याख्या- मनुष्य को इस संसार में प्रियजनों से मिलने का सुख बहुधा कुछ ही पल मिल पाता है ।। अभी वह उन क्षणों का पूर्ण आनन्द भी नहीं ले पाता कि वियोग का क्षण आ पहुँचता है, जो अनन्त काल तक खिंचता चला जाता है ।। वस्तुतः समय की गति संयोग में अत्यधिक अल्पकालिक और वियोग में अत्यन्त दीर्घकालिक हो जाती है ।। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता ।। मिलनविरह समकालिक है ।। मिलन के क्षण आनन्द की अनुभूति कराते है इसलिए वे शीघ्र बीत गये प्रतीत होते हैं, जबकि विरह के क्षण दुःखपूर्ण होते हैं ।। कष्ट से व्यतीत होने के कारण स्थायी रूप से रुक गये प्रतीत होते हैं ।।

(च) चुका लेता दुःख कल की ब्याज
काल को नहीं किसी की लाज!

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- इस सूक्ति में यह स्पष्ट किया गया है कि समय अथवा काल किसी का भी सगा नहीं होता है तथा वह क्षणभर में ही व्यक्ति के सुख को दुःख में परिवर्तित कर सकता है ।।

व्याख्या- लेखक श्री सुमित्रानन्दन पन्त का कहना है कि इस संसार में सुखी लोग बहुत कम हैं और दुःखी अधिक ।। सुख का समय कम होता है और उसे दुःख में परिवर्तित होते देर नहीं लगती ।। यदि किसी को कुछ समय के लिए सुख प्राप्त हो भी जाता है तो दुःख उसे शीघ्र ही ब्याजसहित चुकता कर लेता है ।। एक महाजन तो लोक-लज्जावश किसी को ऋणमुक्त कर सकता है, अथवा उसकी वसूली कुछ समय के लिए टाल भी सकता है परन्तु समय को किसी की लज्जा नहीं होती, वह तो तत्काल की अपने सुखरूपी ऋण को ब्याजसहित वसूल लेता है ।। जिस प्रकार वैभव की चमक बिजली की कौंध के समान क्षणिक और अति-अल्पकालिक होती है, उसी प्रकार संसार के सम्मुख सुख-वैभव भी हैं, जो क्षणमात्र के लिए दिखाई पड़ते हैं और तुरन्त ही नष्ट हो जाते हैं ।।

(छ) मोतियों जड़ी ओस की डार हिला जाता चुपचाप बयार!

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- इस सूक्ति में परिवर्तन की भयंकरता को बताया गया है ।।

व्याख्या- पन्त जी का कहना है कि इस संसार में परिवर्तन के कारण सुख क्षणिक है ।। व्यक्ति की सुख-समृद्धिरूपी फूलपत्तियों से युक्त जीवनरूपी शाखा पर छितराये ओसरूपी हर्ष के मोतियों को परिवर्तन और समयरूपी हवा का झोंका कब धीरे से हिलाकर धूल-धूसरित कर देता है, किसी को मालूम ही नहीं पड़ता ।। यहाँ ओसरूपी मोतियों से जड़ी डाली, क्षणिक समृद्धि का प्रतीक है ।। हवा का एक ही झोंका उन मोतियों जैसी ओस की बूंदों को गिराकर उस डाली का अकिंचनता की स्थिति में ला देता है ।। आशय यह है कि अपनी सुख-समृद्धि पर घमण्ड करने वाले व्यक्तियों को यह ज्ञात रहना चाहिए कि सब कुछ परिवर्तनशील है ।।

(ज) खोलता इधर जन्म लोचन मूंदती उधर मृत्यु क्षण-क्षण;

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- इसमें कवि ने संसार की परिवर्तनशीलता का करुणापूर्ण चित्र अंकित किया है ।।

व्याख्या- यह संसार परिवर्तनशील है ।। एक ओर जन्म की कोमल अंगुलियाँ जीवन की पलक उघाड़कर उसकी आँखें खोल देती हैं तो दूसरी ओर मृत्यु का हाथ आगे बढ़कर अगले ही पल उन्हें मूंद देता है ।। जहाँ अभी कुछ समय पहले ही उत्सव हो रहा था तथा लोग हँस-हँस कर उल्लास जता रहे थे, वहीं अब मौत के ताण्डव का दुःख, आँसू और आहे शेष रह गई हैं ।।

(झ) तुम्हाराही ताडंव नर्तन
विश्व का करुण विवर्तन!

सन्दर्भ- पहले की तरह प्रसंग- इस सूक्ति में परिवर्तन की विनाशकारिता का चित्रण किया गया है ।।

व्याख्या- कवि परिवर्तन को सम्बोधित करता हुआ कहता है कि हे परिवर्तन! तुम बड़े कठोर हो ।। तुम समय-असमय कुछ भी नहीं देखते, निरन्तर गतिमान रहते हो ।। तुम पर न किसी के आँसुओं का असर होता है, न किसी के अनुनय-विनय का ।। तुम देखते-ही-देखते जीवन को मृत्यु में, उत्सव को शोक और अश्रुओं में एवं उत्थान को पतन में परिवर्तित कर डालते हो ।। इस सुन्दर संसार को तुम्हारे ही कारण क्षणभंगुर कहा जाता है ।। कवि के कहने का आशय यही है कि संसार में हमें जो गति दिखाई देती है, उसका एकमात्र कारण परिवर्तन है ।। यदि प्रकृति के परिवर्तन का यह चक्र रुक गया तो संसार निर्जीव और मूर्तिवत् हो जाएगा ।। परिवर्तन पर भावनाओं और समय-असमय का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, इसलिए उसे ‘निष्ठुर’ उचित ही कहा गया है ।।

(ञ) सुख भोगखोजने आते सब,
आए तुम करने सत्य खोज ।।
सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘काव्यांजलि’ के ‘सुमित्रानन्दन पन्त’ द्वारा रचित ‘बापू के प्रति’ नामक शीर्षक से अवतरित है ।।

प्रसंग- इस सूक्ति में गाँधी जी के व्यक्तित्व की उल्लेखनीय विशेषता को स्पष्ट किया गया है ।। व्याख्या- कविवर पन्त महात्मा गाँधी को सम्बोधित करते हुए कहते है कि इस संसार में लोग सुख-सुविधाओं को भोगने के लिए आते हैं ।। उन्हें दूसरों के सुख-दुःख में कोई मतलब नहीं होता ।। वे तो अपने लिए अधिकतम सुख सुविधा जुटाकर उसका उपयोग करते हुए अधिकतम आनन्द उठाना चाहते हैं ।। किन्तु महात्मा गाँधी ने इस सब के विपरीत न्यूनतम सुख-सुविधाओं का उपयोग करते हुए मानव-मात्र के दुःख-दर्द को समझा और उस सत्य को खोजने का प्रयत्न किया, जिसके कारण मनुष्य दारुण दु:ख अर्थात् घोर कष्ट उठाता है ।।

(ट) पशुता का पंकज बना दिया
तुमने मानवताका सरोज!

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- प्रस्तुत सूक्ति में गाँधी जी के द्वारा पशुता को मानवता में परिवर्तित करने की बात कही गयी है ।। व्याख्या- कविवर सुमित्रानन्दन पन्त जी का कहना है कि राष्ट्रपति महात्मा गाँधी ने पाशविक प्रवृत्ति वालों को मानवीय गुणों के आधार पर जीवन जीना सिखाया ।। गाँधी जी ने अंग्रेजों पर यह स्पष्ट कर दिया कि उन्होंने भारतीयों का रक्तपात करके जो सफलता प्राप्त की, वह उनकी हिसंक प्रवृत्ति की विजय थी ।। लेकिन गाँधी जी ने अंग्रेजों के खिलाप जो जंग जीती, वह सत्य अहिंसार-प्रेम के बल पर जीती ।। अतः गाँधी जी के द्वारा जीती गयी जंग मानवता की विजय प्रतीत होती है ।।

अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्न

1 . ‘नौका-विहार’ कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखिए ।।

उत्तर – – प्रस्तुत कविता में पन्त जी ने चाँदनी रात में अपनी मित्र-मण्डली के साथ गंगा में किए गए नौका-विहार का चित्रण किया है ।। पन्त ने गंगा की कल्पना पतली कमरवाली नायिका के रूप में की है ।। कवि कहते हैं कि चारों ओर शांत, स्निग्ध चाँदनी छिटकी हुई है ।। आकाश टकटकी बाँधे पृथ्वी को देख रहा है ।। ग्रीष्म के कारण मन्द और क्षीण धारा वाली गंगा बालू के बीच बहती ऐसी प्रतीत हो रही है, जैसे कोई छरहरे शरीर वाली सुन्दर युवती दूध जैसी सफेद शैय्या पर गर्मी से व्याकुल होकर थकी, मुरझाई और शांत लेटी हो ।। गंगा-जल में झलकता चन्द्र बिम्ब ऐसा लग रहा है जैसे, कोई तपस्विनी अपने चन्द्रमुख को उसी के प्रकाश से प्रकाशित कोमल हथेली पर रखे हो ।। छोटी-छोटी लहरें उसके वक्षस्थल पर लहराते कोमल केश हों ।। तारों से भरे आकाश की परछाईं गंगा के जल में ऐस लग रही है जैसे तपस्विनी का तारों जड़ा नीला आँचल लहरा रहा हो ।। गंगा की लहरें ऐसी प्रतीत हो रही है जैसे तपस्विनी के लेटने के कारण उसकी रेशमी साड़ी में सिलवटे पड़ गई हो ।। WWW.UPBOARDINFO.IN

कवि कहते हैं कि चाँदनी रात के प्रथम पहर में हम नौका लेकर निकल पड़े हैं ।। गंगा का तट ऐसा रम्य लग रहा है, जैसे मुस्काती अर्थात् खुली पड़ी रेतीली सीपी पर चन्द्रमा रूपी मोती की चमक (चाँदनी) विचरण कर रही हो ।। गंगा में खड़ी नावों की पालें विहार के लिए ऊपर चढ़ गई है और उन्होंने लंगर उठा लिए है ।। इन लंगरों के उठते ही छोटी-छोटी नावें अपने पालरूपी पंख खोलकर सुंदर हंसनियों की तरह धीरे-धीरे गंगा में तैरने लगी ।। गंगा का जल शांत और निश्छल है, जो दर्पण के समान सुशोभित है ।। गंगा तट पर सुशोभित कालाकाँकर के राजभवन का प्रतिबिम्ब गंगा जल में ऐसा लगता है जैसे वह गंगाजलरूपी शैय्या पर निश्चिन्त होकर सो रहा है और उसकी झुकी पलकों में वैभवरूप स्वप्न तैर रहे हो ।। कवि कहते हैं कि गंगा में नौका चलने से उठने वाली लहरों से उसमें प्रतिबिम्बित सारा आकाश हिल उठता है ।। उसमें प्रतिबिम्बित तारों की परछाई ऐसी लगती है जैसे तारे जल के अंदर अपनी आँखे फाड़-फाड़कर कुछ खोज रहे हो ।। इन तारों रूपी लघु दीपों को छिपाए हुए गंगा की लहरें इधर-उधर छिपती दिख रही हैं ।। सामने ही शुक्र तारा झिलमिला रहा है और उसकी शोभा परी के समान जल में तैर रही है, जो कभी-कभी चाँदी जैसे रूपहले बालों अर्थात् गंगा की लहरों में छिप जाती है ।। दशमी का चन्द्र भी यौवन से परिपूर्ण नायिका के समान लहरों रूपी घूघट में अपना मुख कभी छिपा लेता है और कभी उघाड़ लेता है ।।

कवि कहते हैं कि जब नौका गंगा की धारा के बीच में पहुँची तब हमारी दृष्टि से रेतीला कगार ओझल हो गया ।। उस समय गंगा के दोनों तट पर फैली हुई दो बाँहें प्रतीत हो रहे थे जो गंगा की धारा के क्षीणकाय कोमल नारी शरीर को आलिंगन करने के लिए आतुर थे ।। इन क्षितिज पर पेड़ों की पंक्तियाँ तिरछी भौंह के समान लग रही थी ।। गंगा की धारा के पास में ही एक छोटा-सा द्वीप था, जो लहरों के प्रवाह को रोककर उलट देता था ।। वह द्वीप ऐसा लग रहा था जैसे कोई शिशु अपनी माँ की छाती से लिपटकर सो रहा हो ।। गंगा के ऊपर उड़ता हुआ पक्षी कौन है? क्या वह कोई चकवा है जो प्रतिबिम्ब को अपनी चकवी समझकर अपनी विरह-वेदना शांत करने को उससे मिलने के लिए उड़ा जा रहा है ।। कवि कहते हैं कि गंगा के अथाह जल में पहुँचकर नौका का भार कम हो गया और हमने पतवार घुमाकर नौका को धारा की विपरित दिशा से मोड़ दिया ।। डाँडों के चलने से जल में अत्यधिक झाग उठ रहे थे ।। पतवारों के कारण शांत जल में लहरें उठ रही थी जो चाँदी के साँपों के समान रेंगती लगती थी ।। उन लहरों और झागों से झिलमिलाता चन्द्रमा सौ-सौ चन्द्रमा बनकर एक-एक तारा सौ-सौ तारे बनकर सुशोभित हो रहे थे ।। WWW.UPBOARDINFO.IN

कवि कहते हैं कि फिर वे नौका को धारा के बीच से निकालकर किनारे पर स्थित घाट की ओर चल पड़ते हैं ।। जैसे-जैसे नाव किनारे की ओर बढ़ती जाती है कवि के मन में विचार उठते हैं कि संसार का क्रम भी जलधारा के समान ही है ।। इसकी लहरें शाश्वत है इसी प्रकार जीवन का उद्गम भी शाश्वत है ।। जलधारा के समान ही जीवन की गति तथा मिलन भी शाश्वत है ।। कवि सोचता है कि हे संसार की नौका को चलाने वाले ईश्वर! जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद जन्म है ।। इसी प्रकार यह जीवनरूपी नौका का विहार चलता रहता है ।। मैं चिन्तनशील होकर भी अपनी सत्ता का ज्ञान भूल गया ।। जीवन की शाश्वता का जलधारारूपी यह प्रमाण ही मुझे अमरत्व प्रदान करता है ।।

2 . पन्त जीने परिवर्तन’शीर्षक के माध्यम से क्या सन्देश दिया है?
उत्तर— ‘परिवर्तन’ शीर्षक के माध्यम से पन्त जी ने परिवर्तन को सष्टि का शाश्वत नियम बताया है ।। परिवर्तन की निरन्तर गतिशीलता की ओर संकेत करते हुए पन्त जी कहते हैं कि समय के अनुसार देश के भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक क्षेत्र में क्रान्ति और परिवर्तन होते रहते हैं ।। पन्त जी ने इस कविता के माध्यम से संदेश दिया है कि परिवर्तन सदैव सुखों को दुःखों में बदलता रहता है ।। परिवर्तन होने पर ही आज का कोमल, सुन्दर शरीर वृद्धावस्था आ जाने पर पीले, सूखे, खुरदरे पत्ते के समान हो जाता है ।। जीवन में सुख देनेवाले क्षण बहुत कम समय तक ही रहते हैं, शेष जीवन में तो अज्ञात अन्धकार रहता है और सारे सुख नष्ट हो जाते हैं ।। यह संसार सतत परिवर्तनशील है ।। यह परिवर्तन बहुत निष्ठुर होता है ।। अतः मनुष्य को इन परिवर्तनों के लिए तैयार रहना चाहिए और परिवर्तनों से घबरा कर निराश नहीं होना चाहिए ।।

3 . सुमित्रानन्दन पन्त जीने महात्मा गाँधी के प्रति क्या विचार व्यक्त किए हैं?

उत्तर – – सुमित्रानन्दन पन्त जी ने महात्मा गाँधी को युगपुरुष कहा है, महात्मा गाँधी का शरीर दुर्बल और हड्डियों का ढाँचा मात्र था परन्तु वे प्राचीन व नवीन आदर्शों का समन्वय थे ।। पन्त जी के अनुसार बापू के जीवन के आदर्शों पर चलकर ही भविष्य की संस्कृति और सभ्यता प्रतिष्ठित होगी ।। महात्मा गाँधी ने जिस प्रकार अपने स्वार्थ को त्यागकर भारत को अंग्रेजों से स्वतंत्र कराकर भारतवासियों को स्वतन्त्रता प्रदान की है, यह संसार भी उनके सिद्धान्त सत्य और अहिंसा का पालन करेगा ।। गाँधी जी मानवता के सच्चे सेवक थे ।। पन्त जी कहते हैं कि गाँधी जी ने मानव समाज में व्याप्त वर्गभेद, जातिभेद, हिंसा आदि की कीचड़ में उत्पन्न कमल को सत्य, अहिंसा, त्याग और मानवतारूपी स्वच्छ सरोवर में उत्पन्न कमल बना दिया है ।। कवि पन्त कहते हैं कि गाँधी जी ने ही द्वेष, ईर्ष्या एवं घृणा का भाव रखनेवालों को प्रेम का व्यवहार सिखलाया ।। गाँधी जी ने केवल भौतिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए ही चरखा नहीं चलाया अपितु अपने हृदय में छपी वेदना को कातकर उसका रूप परिवर्तित कर दिया ।। गाँधी जी ने अपने कर्मों के द्वारा विदेशी साम्राज्य की नींव हिला दी तथा भारत को उनसे मुक्त कराया ।। गाँधी जी ने भारत में व्याप्त क्षेत्रीयता, भाषावाद, धर्म-जाति, ऊँच-नीच, गोरे-काले की दीवारों को तोड़कर समाज में सामंजस्य स्थापित कर भारत देश को महान बना दिया ।। पन्त जी ने गाँधी जी को ‘मुक्त पुरुष’ और ‘ज्ञान ज्योति’ कहकर सम्मानित किया है ।।

4 . ‘नौका विहार’ कविता के अन्त में कवि के मन में क्या भाव जागृत होते हैं?

उत्तर – – ‘नौका विहार’ कविता के अन्त में जैसे-जैसे नौका किनारे की ओर बढ़ती जा रही थी, वैसे ही कवि के मन में भाव जागृत हुए कि इस संसार का क्रम भी इस जलधारा के समान ही है ।। जिस प्रकार धारा निरन्तर बहती चली आ रही है, कभी समाप्त नहीं होती और जो जल आगे बह जाता है, उसका स्थान पीछे से आने वाला जल ले लेता है, इसी प्रकार जीवन का उद्गम भी शाश्वत है ।। जलधारा के समान ही जीवन की गति तथा मिलन भी शाश्वत है ।। आकाश का विस्तार शाश्वत है ।। चन्द्रमा की चाँदनी चिरस्थायी है ।। इसी प्रकार लहरों का अस्तित्व भी निरन्तर बना रहता है ।। कवि से कहता हे ईश्वर! जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद सदैव जन्म है यह जीवनरूपी नौका का विहार सदैव चलता रहता है ।। मैं चिन्तनशील होकर भी अपनी सत्ता का ज्ञान भूल गया ।। जीवन की शाश्वता का जलधारारूपी यह प्रमाण ही मुझे अमरत्मव प्रदान करता है ।।

काव्य-सौन्दर्य से सम्बन्धित प्रश्न

1 . “शान्त, स्निग्ध . . . . . . . . . . . . . . . . . . . मृदुल लहर!”पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार का नाम लिखिए ।।

उत्तर – – प्रस्तुत पंक्तियों में मानवीकरण, सांगरूपक, उपमा, अनुप्रास एवं पुनरुक्तिप्रकाश आदि अलंकारों का प्रयोग हुआ है ।।

2 . “चाँदनी रात . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . सघन!” पंक्तियों का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।।

उत्तर – – काव्य-सौन्दर्य- 1 . गंगा-तट की शोभा का स्वाभाविक, वैज्ञानिक एवं मनोरम चित्रण किया गया है ।।
2 . दर्पण के आगे की भूमि का उतना ही बड़ा वैसा ही बिम्ब दर्पण में बनता है ।। तब दर्पण में देखने पर वह वस्तु दुगुनी बड़ी दिखाई देती है ।। ठीक वैसा ही गंगाजल में हो रहा है ।। गंगा-तट का बिम्ब जल में पड़ रहा है, जिससे उसका परिणाम दुगुना हो गया है ।। 3 . भाषासंस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।। 4 . अलंकार- उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा तथा अनुप्रास ।। 5 . रस- शान्त ।। 6 . छन्द-स्वच्छन्द ।। 7 . गुण
प्रसाद ।। 8 . शब्दशक्ति- अभिधा ।।

3 . “आज बचपन का . . . . . . . . . . . . . . . कल्प अपार!”पंक्तियों में निहित रस व उसका स्थायी भाव लिखिए ।।

उत्तर – – प्रस्तुत पंक्तियों में भयानक रस है, जिसका स्थायी भाव भय है ।।

4 . “साम्राज्यवाद था . . . . . . . . . . . . . . . . . . शान्त!”पंक्तियों में निहित रस व उसका स्थायी भाव लिखिए ।।

उत्तर – – प्रस्तुत पंक्तियों में वीर रस है, जिसका स्थायी भाव उत्साह है ।।

5 . “उर के . . . . . . . . . . . . कौशल प्रवाद”पंक्तियों का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।।
उत्तर – – काव्य-सौन्दर्य-1 . चरखा आन्दोलन के माध्यम से गाँधी जी द्वारा किए गए आत्मिक शुद्धि के प्रयास और नवयुग के सूत्रधार के रूप में उनके कार्यों की प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति हुई है ।।
2 . भाषा- परिष्कृत खड़ीबोली ।। 3 . अलंकार- रूपक ।।
4 . रस शान्त ।।
5 . शब्दशक्ति- लक्षणा ।।
6 . गण- ओज ।।

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