up board class 12 samanya hindi chapter 6 badal rag sandhya sundaree पाठ 6 सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला बादल-राग, सन्ध्या-सुन्दरी

up board class 12 samanya hindi chapter 6 badal rag sandhya sundaree पाठ 6 सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला बादल-राग, सन्ध्या-सुन्दरी का सम्पूर्ण हल

बादल-राग, सन्ध्या-सुन्दरी
up board class 12 samanya hindi chapter 6 badal rag sandhya sundaree पाठ 6 बादल-राग, सन्ध्या-सुन्दरी
कक्षा 12 हिंदी पाठ 6 बादल-राग, सन्ध्या-सुन्दरी

1 . सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का जीवन परिचय देते हुए हिन्दी साहित्य में इनका योगदान बताइए ।।


उत्तर – – कवि परिचय- हिन्दी-साहित्य जगत में सन्त कबीर के बाद यदि कोई फक्कड़ व निर्भीक कवि थे तो वे थे- महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ।। इनके काव्य में कबीर का फक्कड़पन और निर्भीकता, सूफियों का सादापन, सूर-तुलसी की प्रतिभा और प्रसाद की सौन्दर्य-चेतना साकार हो उठी है ।। ये एक ऐसे विद्रोही कवि थे, जिन्होंने निर्भीकता के साथ अनेक रूढ़ियों को तोड़ डाला और काव्य के क्षेत्र में अपने नवीन प्रयोगों से युगान्तरकारी परिवर्तन किए ।। महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म बंगाल के मेदिनीपुर जिले में सन् 1896 ई० में वसंत पंचमी के दिन हुआ ।। इनके पिता का नाम पं० रामसहाय तिवारी था ।। बाल्यावस्था में इन्हें कुश्ती, घुड़सवारी तथा कृषि कार्य का बड़ा शौक था ।। प्रारम्भिक शिक्षा के उपरांत ‘निराला’ जी ने हिन्दी व संस्कृत भाषाओं का अध्ययन किया लेकिन बँगला भाषा का भी इन्हें अच्छा ज्ञान था ।।

साहित्य क्षेत्र में रुचि रखने वाली युवती मनोहरा देवी से इनका विवाह हुआ; लेकिन वह एक पुत्र तथा एक पुत्री का दायित्व इन्हें सौंपकर स्वर्ग सिधार गई ।। ‘निराला’ जी जब महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में आए, तब उनकी प्रेरणा से इन्होंने ‘मतवाला’ व ‘समन्वय’ पत्रिका सम्पादित की ।। इसके उपरान्त ‘सुधा’ व लखनऊ से प्रकाशित होने वाली गंगा पुस्तकमाला’ का सम्पादन किया ।। अपने उदार स्वभाव के कारण ‘निराला’ जी का जीवन संघर्षमय रहा ।। आर्थिक कठिनाइयों को झेलते हुए ये जीवन-भर संघर्ष करते रहे ।। ये अनेक चिन्ताओं से घिरे हुए थे, तभी इनकी पुत्री ‘सरोज’ भी मृत्यु को प्राप्त हो गई ।। इस घटना से ये और भी अधिक व्यथित हो गए और उनकी करुणा का स्वर ‘सरोज-स्मृति’ नामक उनकी कृति में मुखरित हो उठा ।। 15 अक्तूबर, सन् 1961 ई० को सरस्वती के इस साधक का प्रयाग में देहावसान हो गया ।। हिन्दी साहित्य में स्थान- ‘निराला’ जी ने तत्कालीन काव्य-परम्परा पर आधारित छन्द एवं बिम्ब-विधान की उपेक्षा करके स्वच्छन्द एवं छन्दमुवत कविताओं की रचना आरम्भ की और नवीन बिम्ब-विधान एवं काव्य-चित्रों को प्रस्तुत किया ।।


सन् 1916 ई० में प्रकाशित इनका काव्य-संग्रह ‘जुही की कली’ उस युग के साहित्यवेत्ताओं के लिए एक चुनौती बनकर सामने आया ।। इसमें अपनाई गई छन्दमुक्तता एवं इसके प्रणय-चित्र तत्कालीन मान्यताओं के सर्वथा विपरीत थे ।। फलस्वरूप ‘निराला’ को भारी विरोध का सामना करना पड़ा किन्तु इन्होंने सबकी उपेक्षा की और अपनी काव्य-प्रवृत्ति को ही महत्त्व देकर रचनाएँ करते रहे ।। ‘निराला’ जी ने देश के सांस्कृतिक पतन की ओर व्यापकता से संकेत किया है ।। इनका मत है कि देश के भाग्याकाश को विदेशी शासन के राह ने अपनी कालिमा से ढक रखा है ।। भारतीय वन्दना, जागो फिर एक बार, तुलसीदास, छत्रपति शिवाजी का पत्र आदि कविताओं में ‘निराला’ जी ने देशभक्ति पर आधारित भाव प्रकट किए हैं ।। ‘निराला’ जी समाज के प्रत्येक प्राणी को सुखी देखना चाहते थे ।। ‘सरस्वती वन्दना’ में इन्होंने यही भावना प्रकट की है ।। इनकी रचना ‘तुम और मैं’ में इनका रहस्यवादी स्वर मुखरित हुआ है ।। ‘निराला’ जी ने प्रकृति पर सर्वत्र चेतनता का आरोपण किया है ।। इनकी दृष्टि में बादल, प्रपात, यमुना आदि सभी कुछ चेतन है ।। निराला जी ने वीर, शृंगार, रौद्र आदि रसों का सफल प्रयोग किया है ।। ‘जुही की कली’ ने तो हिन्दी-साहित्य को श्रृंगार की मधुर अनुभूति से ही झंकृत कर दिया है ।।

साहित्यिक गतिविधियाँ

छायावाद के प्रमुख स्तम्भों में से एक कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की उपन्यास, कहानी, आलोचना, निबन्ध आदि सभी क्षेत्रों में ही रचनाएँ मिलती हैं तथापि यह कवि के रूप में अधिक विख्यात हुए। ‘निराला’ जी जब महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में आए, तब उनकी प्रेरणा से इन्होंने ‘मतवाला’ व ‘समन्वय’ पत्रिका सम्पादित की ।। इसके उपरान्त ‘सुधा’ व लखनऊ से प्रकाशित होने वाली गंगा पुस्तकमाला’ का सम्पादन किया ।। अपने उदार स्वभाव के कारण ‘निराला’ जी का जीवन संघर्षमय रहा | इनकी रचनाओं में छायावाद के साथ-साथ प्रगतिवादी युग का भी प्रभाव । पड़ा है। इन्होंने हिन्दी साहित्य की तत्कालीन काव्य परम्परा का खण्डन करते हुए स्वछन्द एवं छन्दमुक्त कविताओं की रचना आरम्भ की।

2 . सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’की रचनाओं का उल्लेख कीजिए ।।


उत्तर – – रचनाएँ- कविता के अतिरिक्त ‘निराला’ जी ने उपन्यास, कहानियाँ, निबन्ध, आलोचना और संस्मरण भी लिखे हैं ।। इनकी प्रमुख कृतियों का विवेचन इस प्रकार हैगीतिका- इसकी मूलभावना शृंगारिक है, फिर भी बहुत-से गीतों में मधुरता के साथ आत्मनिवेदन का भाव भी व्यक्त हुआ है ।। इसके अतिरिक्त इस रचना में प्रकृति-वर्णन तथा देश-प्रेम की भावना पर आधारित चित्रण भी हुआ है ।। अनामिका- इसमें संगृहित रचनाएँ ‘निराला’ के कलात्मक स्वभाव की परिचायक हैं ।। परिमल- इस रचना में अन्याय और शोषण के प्रति तीव्र विद्रोह तथा निम्नवर्ग के प्रति गहरी सहानुभूति प्रकट की गई है ।। राम की शक्ति-पूजा- इस महाकाव्य में कवि का ओज, पौरुष तथा छन्द-सौष्ठव प्रकट हुआ है ।। सरोज-स्मृति- यह हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ शोकगीत है ।।

अन्य रचनाएँ- कुकुरमुत्ता, बेला, अणिमा, अपरा, तोड़ती पत्थर, नये पत्ते, अर्चना, आराधना, रवीन्द्र कविता कानन, अर्चना आदि भी इनकी अन्य सुन्दर काव्य-रचनाएँ हैं ।।
गद्य-रचनाएँ-लिली, चतुरी-चमार, अलका, प्रभावती, बिल्लेसुर बकरिहा, निरुपमा आदि इनकी गद्य-रचनाएँ हैं ।।

3 . सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’की भाषा-शैली की विशेषाताएँबताइए ।।

उत्तर – – भाषा-शैली- ‘निराला’ जी की भाषा संस्कृतनिष्ठ है ।। कोमल कल्पना के अनुरूप इनकी भाषा की पदावली भी कोमलकान्त है ।। भाषा में खड़ी बोली की नीरसता नहीं है, वरन् उसमें संगीत की मधुरिमा विद्यमान है ।। यत्र-तत्र मुहावरों के प्रयोग ने भाषा को नई व्यञ्जना-शक्ति प्रदान की है ।। जहाँ दर्शन, चिन्तन अथवा विचार-तत्व की प्रधानता है, वहाँ इनकी भाषा दुरूह भी हो गई है ।। ‘निराला’ जी ने अलंकारों का प्रयोग आवश्यकता के अनुसार किया है ।। अलंकारों को इन्होंने काव्य का साधन माना है और इनका प्रयोग चमत्कार-प्रदर्शन के लिए नहीं किया है ।। अनुप्रास, सांगरूपक, सन्देह, यमक आदि अलंकारों के प्रयोग में निराला जी को विशेष सफलता मिली है ।। इन्होंने अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए प्रायः मुक्तक छन्द का प्रयोग किया है ।। ‘निराला’ जी ने बन्धनयुक्त छन्दों को कभी स्वीकार नहीं किया और अपनी ओजस्वी वाणी से यह सिद्ध कर दिया है कि छन्दों
का बन्धन व्यर्थ हैं ।। इनके मुक्त-छन्दों में भी संगीतात्मकता का गुण विद्यमान है ।।

1 . निम्नलिखित पद्यावतरणों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए


(क) झूम-झूम मृदु . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . भर निजरोर!

  1. झूम-झूम मृदु गरज-गरज घन घोर!
    राग-अमर! अम्बर में भर निऊ रोर!
    झर झर झर निर्झर-गिरि-सर में,
    घर, मरु तरु-मर्मर, सागर में,
    सरित-तड़ित-गति-चकित पवन में
    मन में, विजन-गहन-कानन में,
    आनन-आनन में, रव घोर कठोर-
    राग-अमर! अम्बर में भर निज रोर!

सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक काव्यांजलि के सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित काव्य ग्रन्थ ‘परिमल’ से ‘बादल-राग’ नामक शीर्षक से उद्धृत है ।।
प्रसंग- इन पंक्तियों में कवि ने बादलों को देखकर अपने मन में उमड़ते उल्लास को प्रकट करते हुए उससे क्रान्ति का सन्देश सर्वत्र पहुँचाने का अनुरोध किया है ।। कवि कहते हैं कि

व्याख्या- हे बादलो! तुम अपनी मस्ती में झूमते हुए, अपने कोमल स्पर्श तथा घनघोर गर्जन से सम्पूर्ण वातावरण को भर दो ।। अपनी गम्भीर ध्वनि से तुम आकाश में संगीत भर दो ।। हे बादलो! धरती पर बरसो, जिससे झरनों की झर-झर की मधुर ध्वनि पर्वतों और सरोवरों में व्याप्त हो जाए ।। सरिताएँ और सरोवर तुम्हारें जल से परिपूर्ण होकर सरसता का संचार करेंगे ।। हे बादलो! तुम अपने स्वर के, अमर संगीत से प्रकृति के कण-कण में नवजीवन का संचार कर दो, जिससे प्रत्येक घर उसी स्वर-लहरी से ध्वनित हो उठे ।। तुम बरसो, जिससे मरुस्थल के वृक्ष हरे-भरे होकर मर्मर ध्वनि के साथ लहराने लगें ।। समुद्र, नदी आदि में बिजली की-सी गति भर जाए उनके विकास की गति देखकर वायु भी आश्चर्यचकित हो जाए ।। प्रत्येक व्यक्ति के हृदय की गहराइयों में, वीरान स्थानों में, गहन जंगलों में तुम अपना संगीत भर दो ।। प्रत्येक व्यक्ति के चेहरे का स्वभाव की सरलता और परिस्थितियों को सहन करने की कठोरता प्रदान करो ।। तुम ऐसा मधुर और अमर संगीत पैदा करो, जिससे सम्पूर्ण आकाश आच्छादित हो जाए ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . यहाँ बादल क्रान्ति के सन्देशवाहक हैं ।।
2 . यह कविता कवि के जीवन के तेज और शैली के ओज को प्रकट करती है ।। कवि ने बादल के विभिन्न रूपों को शब्द-चित्रों द्वारा तथा ध्वनियों को अनुकरणात्मक शब्दों द्वारा प्रकट किया है ।।
3 . शैली- शैली की लाक्षणिकता और उससे उत्पन्न मानवीकरण आदि अलंकार दर्शनीय हैं ।।
4 . भाषा- संस्कृत खड़ीबोली ।।
5 . रस- वीर ।।
6 . शब्द-शक्ति- लक्षणा ।।
7 . गुण- ओज ।।
8 . अलंकार- अनुप्रास, पुनरुक्ति, वीप्सा और मानवीकरण ।।

(ख) अरे वर्ष के हर्ष ……………………………………………………………….. भरनिज रोर!

अरे वर्ष के हर्ष!
बरस तू बरस-बरस रसधार!
पार ले चल तू मुझको
बहा, दिखा मुझको भी निज
गर्जन-भैरव-संसार!

देख-देख नाचता हृदय
बहने को महा विकल बेकल,

इस मरोर से—इसी शोर से-
सघन घोर गुरु गहन रोर से
मुझे गगन का दिखा सघन वह छोर!
रास अमर! अम्बर से भर निज रोर

सन्दर्भ– पहले की तरह
प्रसंग– कवि बादल का आह्वान करके उससे सृष्टि में नयी शक्ति भरने की प्रार्थना करता है ।। वह भी बादल के समान आकाश में उड़कर विश्व का अवलोकन करना चाहता है ।।

व्याख्या-हे बादल! तुम्हारे बरसने से खेत-खलिहान लहराने लगता हैं ।। खेत-खलिहानों से धनधान्य पाकर समस्त समाज वर्ष भर आनन्दमय रहता है ।। इसलिए तुम अपनी रसधारा बरसाकर पूरी धरती को रसक्कित कर दो ।। तुम इतना बरसो कि मुझे भी अपने साथ बही ले चलो, जिससे जगत् के उस पार पहुँचकर मैं भी तुम्हारे उस गर्जना भरे भयावह संसार को देख सकूँ ।। मस्ती में चलने वाले हे बादल! तुम अपने मार्ग पर गम्भीर गर्जना कर उठो ।। तुम्हारे चलने (बरसने) से दलदल धंस जाते हैं, समुद्र खिलखिलाकर हँसने लगता है, समस्त झरनों और नदियों की जल धारा कल-कल की ध्वनि में तुम्हारा ही यशोगान करने लगती है ।। तुम्हारे इस स्वरूप को देखकर मन प्रसन्नता से नाच उठता है ।। तुम्हारे गर्व-भरे किन्तु मोहक शोर तथा गम्भीर गर्जन से मेरा मन भी तुम्हारे साथ बहने को आतुर हो जाता है ।। इसीलिए मुझे तो अपने साथ बहाकर आकाश का वह किनारा दिखा दो, जो अत्यन्त सघन है ।। मेरे हृदय में भी आकाश की भाँति अपना गम्भीर स्वरयुक्त अमर संगीत भर दो ।।

काव्यसौन्दर्य-1 . यहाँ कवि ने बादल के जीवनदायी और कल्याणकारी रूप को दर्शाया है ।।
2 . कवि परतन्त्रता की बेड़ियों से मुक्त होने के लिए बादलों से शक्ति, उत्साह तथा क्रान्ति का संचार कराना चाहता है ।।
3 . भाषा-संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।।
4 . रस- वीर ।।
5 . शब्द-शक्ति – लक्षणा और व्यंजना ।।
6 . गुण-ओज ।।
7 . अलंकार- अनुप्रास, वीप्सा व मानवीकरण ।।

(ग) दिवसावसान का . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . है अभिषेक ।।

  1. दिवसावसान का समय
    मेघमय आसमान से उतर रही है
    वह सन्ध्या-सुन्दरी परी-सी
    धीरे धीरे धीरे।
    तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास,
    मधुर-मधुर हैं दोनों उसके अधर,
    किन्तु जरा गम्भीर, नहीं है उनमें हास-विलास।
    हँसता है तो केवल तारा एक
    गुंथा हुआ उन धुंघराले काले काले बालों से
    हृदयराज्य की रानी का वह करता है अभिषेक।

सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘काव्यांजलि’ के ‘सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित काव्य ग्रन्थ ‘अपरा’ से ‘सन्ध्या सुन्दरी’ नामक शीर्षक से उद्धृत है ।।
प्रसंग- इन पंक्तियों में दिन की समाप्ति पर भूतल पर सन्ध्या के धीरे-धीरे उतरने का सुन्दर चित्रण है ।।

व्याख्या- सायंकाल का समय है ।। मेघों से भरे आकाश से सुन्दरीरूपी सन्ध्या किसी परी के समान धीरे-धीरे धरती पर उतर रही है ।। सन्ध्या-सुन्दरी का अन्धकाररूपी आँचल हिल-डुल नहीं रहा हैं ।। इसके प्रकाश और अन्धकाररूपी दोनों होंठ बड़े सुन्दर, किन्तु गम्भीरता धारण किये हुए हैं ।। उनमें हास्य-विनोद की छटा नहीं दिखाई पड़ती, किन्तु इस कमी को एक नक्षत्र पूरा कर रहा है, जो उसके घुघराले काले बालों में गुँथा हुआ उसको शृंगारिकता करता हुआ चमक रहा है और इस प्रकार वह सबके हृदयों को प्रिय लगने वाली उस सन्ध्या-सुन्दरी को मानो अपनी कान्ति से स्नान कर रहा है ।। अर्थात् उसकी शोभा बढ़ा रहा है ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . आशय यह है कि दिन और रात के सन्धिकाल में प्रकृति शान्त और निस्तब्ध हो जाती है ।। उस समय न प्रकाश अधिक होता है और न अन्धकार ।। इसी मध्य अवस्था को कवि ने सन्ध्या के दो मधुर अधरों का गम्भीर भाव धारण करना बताया है ।। सायंकालीन अकेला नक्षत्र आकाश में अपनी ज्योति विकीर्ण करता हुआ सन्ध्या को उसी प्रकार शोभा प्रदान कर रहा है, जिस प्रकार किसी परी के केशों में गुंथा हुआ रत्नाभरण ।।
2 . भाषा- संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।।
3 . रस-शृंगार ।।
4 . शब्द-शक्ति- लक्षणा ।।
5 . गुण-माधुर्य ।।
6 . अलंकार- रूपक, मानवीकरण, उपमा व अनुप्रास ।।

(घ) व्योम-व्योम . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . रहा सब कहीं ।।

व्योम-मण्डल में-जगतीतल में-
सोती शान्त सरोवर पर उस अमल-कमलिनी-दल में-
सौन्दर्य-गर्विता के अति विस्तृत वक्षःस्थल में-
धीर वीर गम्भीर शिखर पर हिमगिरि-अटल-अचल में-
उत्ताल-तरंगाघात-प्रलय-घन-गर्जन-जलधि प्रबल में-
क्षिति में-जल में-नभ में-अनिल-अनल में-
सिर्फ एक अव्यक्त शब्द-सा

सन्दर्भ- पहले की तरह ।।
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में प्रकृति के कठोर एवं कोमल दोनों रूपों का वर्णन किया गया है ।।

व्याख्या- कवि कहता है कि सम्पूर्ण विश्व में ‘चुप चुप’ का अस्फुट'(धीमा) शब्द व्याप्त हो रहा है ।। यह धीमा शब्द आकाश में, पृथ्वी में, शान्त सरोवर पर सोती निर्मल कमलिनी की पंखुड़ियों में, अपनी सुन्दरता का अभिमान करने वाली नदी के विस्तृत वक्ष पर, धीर, वीर, गम्भीर और अटल हिमालय के शिखरों पर, ऊँची-ऊँची लहरों के टकराने से उद्वेलित समुद्र में, जो कि प्रलयकाल के गरजते हुए मेघों के समान प्रतीत होता है; जल में, वायु और अग्नि में सर्वत्र गूंज रहा है ।।
काव्य सौन्दर्य– 1 . सायंकाल में सब ओर सहसा छा जाने वाली निस्तब्धता का सुन्दर चित्रण है ।। ध्वन्यात्मकता का प्रयोग सराहनीय है ।। 2 . भाषा-संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।। 3 . रस-शृंगार ।। 4 . शब्द-शक्ति-लक्षणा ।। 5 . गुण- माधुर्य ।।

(ङ) और क्या है? . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . तब एक विहाग ।।

और क्या है? कुछ नहीं।
मदिरा की वह नदी बहाती आती,
थके हुए जीवों को वह सस्नेह
प्याला एक पिलाती.
सुलाती उन्हें अंक पर अपने,
दिखलाती फिर विस्मृति के अगणित मीठे सपने,
अर्धरात्रि की निश्चलता में हो जाती जब लीन,
कवि का बढ़ जाता अनुराग,
विरहाकुल कमनीय कण्ठ से
आप निकल पड़ता तब एक विहाग।


सन्दर्भ
– पहले की तरह
प्रसंग-इन पंक्तियों में सांयकाल के आज जाने से उत्पन्न नीरवता, शान्ति-विश्रान्ति आदि का वर्णन किया गया है ।।

व्याख्या– इस समय सर्वत्र सन्ध्या का ही राज्य है और ऐसा प्रतीत होता है कि उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है ।। वह अपने आगमन से सारे संसार में एक समान मस्ती की धारा प्रवाहित कर देती है और दिनभर के थके प्राणियों को, उसमें से स्नेहपूर्वक एक-एक प्याला पिलाकर अपनी गोद में सुला लेती है; अर्थात् दिन भर की कार्य-व्यस्तता से थके हुए प्राणी सन्ध्या के समय काम-काज से छुट्टी पाकर शान्ति का अनुभव करते हुए सो जाते है ।। वह उनके दुःख को भुलवाकर उन्हें ऐसे अनेक प्रिय सपने दिखाती है, जो उनकी वांछित कल्पनाओं पर आधारित होते हैं- तत्पश्चात् वह स्वयं रात्रि की निस्तब्धता में विलीन हो जाती है ।। सन्ध्या के सौन्दर्य को देखकर स्मृति का हृदय भी प्रेम में तरंगायित हो उठता है ।। उसे अपनी प्रिया की स्मृति आन्दोलित कर देती है और अपनी प्रिया के विरह से व्याकुल होकर, उसके मधुर कण्ठ से स्वतः ही विहाग राग के स्वरों में गीत मुखरित हो उठता है ।।

काव्य सौन्दर्य- 1 . कवि ने सन्ध्या के चित्र को साकार कर दिया है ।। सन्ध्या की व्यापकता दर्शनीय है ।।
2 . भाषा -संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।।
3 . रस- श्रृंगार ।।
4 . अलंकार- मानवीकरण और रूपकातिशयोक्ति ।।

2 . निम्नलिखित सूक्तिपरक पंक्तियों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए

(क) तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास ।।


सन्दर्भ-प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित ‘सन्ध्या सुन्दरी’ शीर्षक से अवतरित है ।।
प्रसंग- प्रस्तुत सूक्तिपरक पंक्ति में कवि ने सन्ध्या के सौन्दर्य का वर्णन किया है


व्याख्या- कवि कहते हैं कि सन्ध्या के समय अन्धकाररूपी सन्ध्या सुन्दरी का आँचल हिल-डुल नहीं है उसमें कहीं भी चंचलता का आभास नहीं है ।। यह अन्धकाररूपी आँचल संसार को अपनी ओट में ले चुका है इस सन्ध्या सुन्दरी के आँचल से तनिक भी प्रकाश पार नहीं होता है ।। सम्पूर्ण पृथ्वी पर सिर्फ रात का साम्राज्य स्थापित हो चुका है ।।

(ख) मदिरा की वह नदी बहाती आती, थकेहए जीतों को वह सस्नेह प्याला एक पिलाती ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह ।।
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने सन्ध्या के आगमन तथा मनुष्यों पर उसके प्रभाव का वर्णन किया है ।। व्याख्या- कवि कहते हैं कि जब सन्ध्या सुन्दरी प्रवेश करती है तो वह सारे संसार में एक समान मस्ती की धारा प्रवाहित कर देती है और दिनभर के थके हुए प्राणियों को, उसमें से स्नेहपूर्वक एक-एक प्याला पिलाकर अपनी गोद में सुला लेती है; अर्थात् दिन भर की कार्य-व्यस्तता से थके प्राणी सन्ध्या के समय काम-काज से छुट्टी पाकर शांति का अनुभव करते हैं और सो जाते हैं ।। अर्थात सन्ध्या सुन्दरी थके हुए प्राणियों को शांति व विश्राम प्रदान करती है ।।

(ग) विरहाकुल कमनीय कंठ से आप निकाल पड़ता तब एक विहाग ।।


सन्दर्भ- पहले की तरह ।।
प्रसंग-प्रस्तुत सूक्ति में विरह में व्यथित कवि की मनोदशा का वर्णन हुआ है ।।

व्याख्या-निराला जी कहते हैं कि सन्ध्या के सौन्दर्य को देखकर कवि के हृदय में भी प्रेम की तरंगे हिलोरे लेने लगती है ।। उसे अपनी प्रिया की स्मृति आन्दोलित कर देती है और अपनी प्रिया के विरह से व्याकुल होकर, उसके मधुर कण्ठ से स्वतः ही विहाग राग (रात में विशेष रूप से गाया जाने वाला राग) के स्वरों में गीत मुखरित हो उठता है अर्थात् सन्ध्या के समय किसी कवि के हृदय में भी प्रेम के अंकुर प्रस्फुटित होने लगते हैं ।।

अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्न


1 . ‘बादल-राग’ कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखिए ।।


उत्तर – – ‘बादल-राग’ कविता में कवि ने बादलों को देखकर अपने मत में उमड़ते उल्लास को प्रकट करते हुए उससे क्रान्ति का सन्देश सर्वत्र पहुँचाने का अनुरोध किया है ।। कवि बादलों से कहता है कि तुम अपनी मस्ती में झूमते हुए, अपने कोमल स्पर्श तथा घनघोर गर्जन से सम्पूर्ण वातावरण को भर दो ।। अपनी गम्भीर ध्वनि से आकाश में अमर संगीत भर दो ।। धरती पर बरसो, जिससे झरनों की ध्वनि पर्वतों और सरोवरों में व्याप्त हो जाए ।। घर, रेगिस्तान, वृक्षों, सागरों, नदियों आदि में तुम अपने संगीत से नवजीवन का संचार कर दो ।। तथा उनके विकास की गति देखकर वायु भी आश्चर्यचकित हो जाए ।। प्रत्येक व्यक्ति के हृदय की गहराइयों में, वीरान स्थानों में, गहन जंगलों में अमर संगीत भर दो ।। तुम ऐसा मधुर संगीत पैदा करो, जिससे सम्पूर्ण आकाश आच्छादित हो जाए ।। वह बादल से कहता है कि तुम्हारे बरसने से खेत खलिहान लहराते हैं जिससे, समस्त समाज वर्ष भर आनन्दमय रहता है ।। इसलिए तुम अपनी रसधारा से धरती को रसासिक्त कर दो तुम मुझे अपने साथ ले चले जिससे जगत के पार पहुँचकर मैं भी तुम्हारे उस गर्जना भरे भयावह संसार को देख सकूँ ।। हे मस्त बादल! तुम अपने मार्ग पर गम्भीर गर्जना कर उठो ।। हे बादल! तुम्हारे कारण दलदल धंस जाते हैं, समुद्र खिलखिलाकर हँसता है ।। समस्त झरने और नदियाँ तुम्हारा गुणगान करते हैं ।। तुम्हारे इस स्वरूप को देखकर मन प्रसन्नता से नाचने लगता है ।। तुम्हारे गर्व-भरे किन्तु मोहक शोर तथा गम्भीर गर्जना से मेरा मन भी तुम्हारे साथ बहने को आतुर हो जाता है ।। इसलिए मुझे तो अपने साथ बहाकर आकाश का वह कोना दिखा दो, जो अत्यन्त सघन है ।। मेरे हृदय में भी आकाश की भाँति अपनी गम्भीर स्वरयुक्त अमर संगीत भर दो ।।

2- क्या आप सहमत हैं कि ‘बादल-राग’ कविता में ‘निराला’ जी का देश-प्रेम भली प्रकार प्रकट हुआ है? स्पष्ट कीजिए ।।

उत्तर – – ‘बादल-राग’ कविता के माध्यम से कवि ने अपने देश-प्रेम को बादलों के द्वारा व्यक्त किया है ।। कवि बादलों के द्वारा क्रान्ति का सन्देश सर्वत्र पहुँचाने का प्रयास कर रहा है ।। कवि बादलों के द्वारा भारतीय जनता से विनती करता है कि जिस प्रकार बादल नदी, घरों, सागरों को आनंदित करते हैं उसी प्रकार वे भी अपने देश-प्रेम व समर्पण से भारत माता को परतन्त्रता की बेड़ियों से मुक्ति दिलाकर आनंदित करें तथा ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेकें ।। ‘निराला’ जी बादलों के साथ सभी जगहों पर जाकर क्रान्ति का बिगुल बजाना चाहते हैं ।। वे भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए एक नया संचार भरना चाहते है ।। इस कविता में ‘निराला’ जी को देश-प्रेम की भावना भली प्रकार से प्रकट हुई है ।। वह कविता के माध्यम से भारतवासियों को क्रान्ति की राह दिखा रहे हैं ।।

3 . ‘सन्च्या-सुन्दरी’ कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखिए ।।


उत्तर – – ‘सन्ध्या-सुन्दरी’ कविता में निराला जी ने सन्ध्या को एक सुन्दरी के रूप में प्रस्तुत किया है ।। कवि कहता है कि सायंकाल के समय बादलों से भरे आसमान से सुन्दरी रूपी सन्ध्या किसी परी के समान धीरे-धीरे धरती पर उतर रही है ।। उस सुन्दरी का आँचल बिलकुल भी हिल नहीं रहा है ।। इसके प्रकाश और अन्धकार दोनों होंठ बड़े सुन्दर तथा गम्भीरता धारण किए हैं ।। उनमें हास्य-विनोद की छटा नहीं दिखाई पड़ती है ।। किन्तु एक तारा(नक्षत्र) इसी कमी को पूरा कर रहा है, जो उसके काले घुघराले बालों में गुंथा हुआ चमक रहा है ।। वह सबके हृदय को प्रिय लगने वाली सन्ध्या सुन्दरी की शोभा बढ़ा रहा है ।। यह सन्ध्या सुन्दरी आलस्य की लता पर रखी किसी कली के समान है ।। यह सुन्दरी अपनी सखी नीरवता के कन्धे पर बाँह रखे छाया के सामान आकाश-मार्ग से चली ।। जिस प्रकार परी वीणा बजाती, प्रेम का राग अलापते हुए आकाश से जाती है सन्ध्या सुन्दरी इस प्रकार से नहीं उतर रही है ।। वह शांत और धीमी चाल से उतर रही है, पर उसके उतरने के साथ सबको मौन रहने का आदेश देता हुआ एक अस्पष्ट शब्द सर्वत्र व्याप्त होता जा रहा है ।। यह धीमा शब्द आकाश में, पृथ्वी में, शान्त सरोवर पर सोती निर्मल कमलिनी की पंखुड़ियों में, अपनी सुंदरता का अभिमान करने वाली नदी के विस्तृत वक्ष पर, धीर, वीर, गम्भीर, और अटल हिमालय के शिखरों पर, ऊँची-ऊँची लहरों के टकराने से उद्वेलित समुद्र में जो कि प्रलयकाल के गरजते हुए मेघों के समान प्रतीत होता है; जल में, वायु और अग्नि में सर्वत्र गूंज रहा है ।। कवि कहता है कि इस समय सर्वत्र सन्ध्या का ही राज्य है ।। और उसके अतिरिक्त कुछ नहीं है ।। अपने आगमन पर वह समस्त संसार में एक मस्ती की धारा प्रवाहित कर देती है ।। और दिनभर के थके हुए प्राणियों को, उसमें से स्नेहपूर्वक एक-एक प्याला पिलाकर अपनी गोद में सुला लेती है ।। वह उनके दुःख दर्द भुलाकर उन्हें ऐसे प्रिय सपने दिखाती है, जो अपनी वांछित कल्पनाओं पर आधारित होते हैं ।। सन्ध्या के सौन्दर्य को देखकर कवि का हृदय भी प्रेम से वरंगायित हो उठता है ।। उसे अपनी प्रिय की स्मृति हो जाती है और अपनी प्रिया के विरह से व्याकुल होकर, उसके मधुर कंठ से स्वत: ही विहाग राग के स्वरों में गीत मुखरित हो उठता है ।।

4 . ‘सन्ध्या-सुन्दरी’ कविता में कवि ने सन्ध्या का मानवीकरण किस रूप में किया है?

उत्तर – – सन्ध्या-सुन्दरी कविता में कवि ने सन्ध्या को एक सुन्दरी तथा परी के रूप में प्रस्तुत करकर सन्ध्या का मानवीकरण किया है ।। कवि कहते हैं कि, सन्ध्या एक परी की भाँति धीरे-धीरे भूतल पर उतरती है ।। जिसका आँचल बिल्कुल नहीं हिलता है ।। कवि ने सुन्दरी की भाँति प्रकाश और अंधकारमय को सन्ध्या सुन्दरी के होंठ बताया है तथा अंधकार तथा तारों को उसके बाल तथा पुरुष के समान बताया है ।। कवि ने कहा है कि सन्ध्या रूपी परी (सुन्दरी) हाथों में वीणा लेकर नहीं बजाती तथा प्रेम-गीत नहीं गाती उसके नुपुर झंकार उत्पन्न नहीं करते ।। इस प्रकार कवि ने सन्ध्या को एक सुन्दरी के रूप में प्रस्तुत किया है ।।

काव्य-सौन्दर्य से संबंधित प्रश्न

1 . “झूम-झूम मृदु . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . भर निजरोर ।। “पंक्तियों में निहित अलंकार का नाम लिखिए ।।

उत्तर – – प्रस्तुत पंक्तियों में अनुप्रास, पुनरुक्तिप्रकाश, वीप्सा और मानवीकरण अलंकारों का प्रयोग हुआ है ।।

2 . “व्योम-मण्डल में . . . . . . . . . . . . . . सब कहीं-“पंक्तियों में निहित रस का नाम बताइए ।।
उत्तर – – प्रस्तुत पंक्तियों में शृंगार रस का प्रयोग हुआ है ।।


3 . “मदिरा की . . . . . . . . . . . . . . . . . . . एक विहाग ।। “पंक्तियों का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।।
उत्तर – – काव्य सौन्दर्य-1 . कवि ने सन्ध्या के चित्र को साकार कर दिया है ।। सन्ध्या की व्यापकता दर्शनीय है ।। 2 . भाषा-संस्कृतनिष्ठ–खड़ीबोली ।। 3 . रस- शृंगार, 4 . अलंकार- मानवीकरण एवं रूपकातिशयोक्ति ।।

4 . “मेघमय आसमान . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . परी-सी” पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार कौन-सा है ।।
उत्तर – – प्रस्तुत पंक्तियों में मानवीकरण, तथा उपमा अलंकार का प्रयोग हुआ है

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