up board class 12 samanya hindi jayshankar prasad अध्याय 5 जयशंकर प्रसाद परिचय गीत श्रद्धा मनु हिंदी में

up board class 12 samanya hindi jayshankar prasad अध्याय 5 जयशंकर प्रसाद परिचय गीत श्रद्धा मनु हिंदी में

कक्षा 12 हिंदी पाठ 5 गीत, श्रद्धा-मनु

1 . जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय देते हुए हिन्दी साहित्य में इनका योगदान बताइए ।।


उत्तर – – कवि परिचय- छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद का जन्म काशी के प्रसिद्ध वैश्य परिवार में 30 जनवरी, सन् 1889 ई० को हुआ था ।। उनका परिवार ‘सुँघनी साहू’ के नाम से प्रसिद्ध था ।। इनके यहाँ तम्बाकू का व्यापार होता था ।। ‘प्रसाद’ जी के पिता का नाम देवीप्रसाद तथा पितामह का नाम ‘शिवरत्न साहू’ था ।। ‘प्रसाद’ जी का बाल्यकाल सुखपूर्वक व्यतीत हुआ, लेकिन अल्पवय में ही ये माता-पिता की छत्र-छाया से वंचित हो गए ।। ‘प्रसाद’ जी की शिक्षा की व्यवस्था उनके बड़े भाई शम्भूरन ने की ।। प्रारम्भ में इनका प्रवेश क्वीन्स कॉलेज में हुआ लेकिन वहाँ इनका मन नहीं लगा ।। इसके बाद इन्होंने घर पर ही संस्कृत व अंग्रेजी भाषा का अध्ययन किया ।। प्रसाद जी की साहित्य में अभिरुचि आरम्भ से ही थी ।। ये कभी-कभी कविता स्वयं लिखते थे ।। इनके भाई ने जब देखा कि इनका मन कविता लिखने में लगता है, तब उन्होंने इन्हें इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया ।। ‘प्रसाद’ जी द्वारा रचित ‘कामायनी’ महाकाव्य पर ‘हिन्दी-साहित्य सम्मेलन’ द्वारा इन्हें ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ प्रदान किया गया ।।

कुछ समय के उपरान्त इनके भाई शम्भूरत्न का देहान्त हो गया, जिसका प्रसाद जी के हृदय पर गहन आघात हुआ ।। अब व्यापार का उत्तरदायित्व इन्हीं पर आ गया ।। पिता के सामने से ही व्यापार घाटे में चल रहा था, जिससे वे ऋणग्रस्त थे ।। उस ऋण को अदा करने के लिए प्रसाद जी ने सारी सम्पत्ति बेच दी लेकिन उसके बाद भी ये सुखमय जीवन व्यतीत नहीं कर सके ।। चिन्ताओं के कारण इनका स्वास्थ्य भी बिगड़ गया ।। ये क्षय-रोग से ग्रस्त हो गए ।। क्षय रोग के कारण ही 15 नवम्बर सन् 1937 ई० में बहुमुखी प्रतिभा के धनी इस साहित्यकार का स्वर्गवास हो गया ।। हिन्दी साहित्य में योगदान- महाकवि जयशंकर प्रसाद छायावादी काव्य के जन्मदाता एवं छायावादी युग के प्रवर्तक समझे जाते हैं ।। इनकी रचना ‘कामायनी’ एक कालजयी कृति है, जिसमें छायावादी प्रवृत्तियों एवं विशेषताओं का समावेश हुआ है ।। अन्तर्मुखी कल्पना एवं सूक्ष्म अनुभूतियों की अभिव्यक्ति प्रसाद जी के काव्य की मुख्य विशेषता रही है ।। प्रेम और सौन्दर्य इनके काव्य का प्रमुख विषय रहा है, किन्तु इनका दृष्टिकोण इसमें भी विशुद्ध मानवतावादी रहा है ।। इन्होंने अपने काव्य में आध्यात्मिक आनन्दवाद की प्रतिष्ठा की है ।। ये जीवन की चिरन्तन समस्याओं का मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित समाधान ढूँढने के लिए प्रयत्नशील रहे ।। ये किसी सीमित अथवा संकुचित राष्ट्रीयता पर आधारित भावना से आबद्ध होने के स्थान पर सम्पूर्ण विश्व से प्रेम करते थे ।।

प्रसाद जी की आरम्भिक रचनाओं में संकोच और झिझक होते हुए भी कुछ कहने को आकुल चेतना के दर्शन होते हैं ।। ‘चित्राधार’ में ये प्रकृति की रमणीयता और माधुर्य पर मुग्ध हैं ।। ‘प्रेम पथिक’ में प्रकृति की पृष्ठभूमि में कवि-हृदय में मानवसौन्दर्य के प्रति जिज्ञासा का भाव जागता है ।। ‘आँसू प्रसाद जी का उत्कृष्ट, गम्भीर, विशुद्ध मानवीय विरह-काव्य है, जो प्रेम के स्वर्गिक रूप का प्रभाव छोड़ता है ।। इसलिए कुछ लोग इसे आध्यात्मिक विरह का काव्य मानने का आग्रह करते हैं ।। ‘कामायनी’ प्रसाद के काव्य की सिद्धवस्था है और इनकी काव्य-साधना का पूर्ण परिपाक है ।। कवि ने मनु और श्रद्धा के बहाने पुरुष और नारी के शाश्वत स्वरूप एवं मानव के मूल मनोभावों का काव्यमय चित्र अंकित किया है ।। प्रसाद जी ने नारी को दया, माया, ममता, त्याग, सेवा, समर्पण, विश्वास आदि से युक्त बताकर उसे साकार श्रद्धा का रूप प्रदान किया है ।। काव्य, दर्शन और मनोविज्ञान की त्रिवेणी ‘कामायनी’ निश्चय ही आधुनिककाल की सर्वोत्कृष्ट सांस्कृतिक रचना है ।। प्रकृति को सचेतन अनुभव करते हुए उसके पीछे परम सत्ता का आभास कवि ने सर्वत्र किया है ।। यही इनका रहस्यवाद है ।। इनका रहस्यवाद साधनात्मक नहीं है, वह भाव-सौन्दर्य से संचालित प्रकृति का रहस्यवाद है ।। अनुभूति की तीव्रता, वेदना, कल्पना-प्रवणता आदि प्रसाद काव्य की कतिपय अन्य विशेषताएँ हैं ।।

2 . जयशंकर प्रसाद की कृतियों का उल्लेख कीजिए ।।

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उत्तर – – रचनाएँ- इन्होंने कुल 67 रचनाएँ प्रस्तुत की ।। इनमें से प्रमुख काव्य-रचनाओं का उल्लेख इस प्रकार है
कामायनी- यह महाकाव्य छायावादी काव्य का कीर्ति-स्तम्भ है ।। इस महाकाव्य में मनु और श्रद्धा के माध्यम से हृदय (श्रद्धा) और बुद्धि (इड़ा) के समन्वय का सन्देश दिया गया है ।। आँसू- यह वियोग पर आधारित काव्य है ।। इसके एक-एक छन्द में दुःख और पीड़ा साकार हो उठी है ।। चित्राधार- यह ब्रजभाषा में रचित काव्य-संग्रह है ।।
झरना- यह प्रसाद जी की छायावादी कविताओं का संग्रह है ।। इस संग्रह में सौन्दर्य और प्रेम की अनुभूतियों को मनोहारी रूप में वर्णित किया गया है ।।
लहर- इसमें प्रसाद जी की भावात्मक कविताएँ संगृहीत हैं ।। ‘कानन-कुसुम’ तथा ‘प्रेम पथिक’ भी इनकी महत्वपूर्ण काव्य-रचनाएँ हैं ।।
इसके अतिरिक्त प्रसाद जी ने अन्य विधाओं में भी साहित्य-रचना की है ।। उनका विवरण इस प्रकार हैनाटक- नाटककार के रूप में इन्होंने स्कन्दगुप्त, चन्द्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, जनमेजय का नागयज्ञ, एक घुट, कामना, विशाख, राज्यश्री, कल्याणी, अजातशत्रु और प्रायश्चित्त नाटकों की रचना की है ।।
उपन्यास- ‘कंकाल’, ‘तितली’ और ‘इरावती’ (अपूर्ण) ।। कहानी-संग्रह- प्रतिध्वनि, छाया, आकाशदीप, आँधी, इन्द्रजाल, ममता, मछुवा आदि ।।
निबन्ध- ‘काव्य और कला’ तथा अन्य निबन्ध ।।

3 . जयशंकर प्रसाद की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए ।।
उत्तर – – भाषा शैली- प्रसाद जी ने काव्य-भाषा के क्षेत्र में भी युगान्तर उपस्थित किया है ।। द्विवेदी युग की अभिधाप्रधान भाषा और इतिवृत्तात्मक शैली के स्थान पर प्रसाद जी ने भावानुकूल चित्रोपम शब्दों का प्रयोग किया है ।। लाक्षणिकता और प्रतीकात्मकता से युक्त प्रसाद जी की भाषा में अद्भुत नाद-सौन्दर्य और ध्वन्यात्मकता है ।। चित्रात्मक भाषा में संगीतमय चित्र अंकित किए हैं ।। प्रसाद जी ने प्रबन्ध तथा गीति दोनों काव्य-रूपों में समान अधिकार से श्रेष्ठ काव्य-रचना की है ।। लहर’, ‘झरना’ आदि इनकी मुक्तक काव्य-रचनाएँ हैं ।। प्रबन्ध-काव्यों में कामायनी’ जैसा रत्न इन्होंने दिया है ।। प्रसाद जी का काव्य अलंकारों की दृष्टि से भी अत्यन्त समृद्ध है ।। सादृश्यमूलक अर्थालंकारों में ही प्रसाद जी की वृत्ति अधिक रमी है ।। परम्परागत अलंकारों को ग्रहण करते हुए भी प्रसाद जी ने नवीन उपमानों का प्रयोग करके उन्हें नई भंगिमा प्रदान की है ।। अमूर्त उपमान-विधान इनकी विशेषता है ।। मानवीकरण, ध्वन्यर्थ-व्यंजना, विशेषण-विपर्यय जैसे पाश्चात्य प्रभाव से गृहीत आधुनिक अलंकारों के भी सुन्दर प्रयोग प्रसाद जी की रचनाओं में मिलते हैं ।। विविध छन्दों का प्रयोग और नवीन छन्दों की उद्भावना भी इन्होंने की है ।। ‘आँसू’ के छन्द हिन्दी-साहित्य की अनुपम निधि हैं ।। वस्तुतः प्रसाद जी का साहित्य अनन्त वैभवसम्पन्न है ।। प्रसाद जी भाव और शिल्प दोनों दृष्टियों से हिन्दी के युग-प्रवर्तक कवि के रूप में हमारे सम्मुख आते हैं ।। इन्होंने एक नवीन काव्यधारा के रूप में छायावाद को पुष्ट किया ।। भाव और कला, अनुभूति और अभिव्यक्ति, वस्तु और शिल्प सभी क्षेत्रों में प्रसाद जी ने युगान्तरकारी परिवर्तन किए ।। साहित्य के क्षेत्र में इनके महत्वपूर्ण योगदान को कभी भी विस्मृत नहीं किया जा सकता ।। हिन्दी-साहित्य सदैव इनका ऋणी रहेगा ।।

1 . निम्नलिखित पद्यावतरणों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए

(क) बीती विभावरी . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . भरे विहागरी ।।

बीती विभावरी जाग री।
अम्बर-पनघट में डुबो रही-
तारा-घट ऊषा नागरी।
खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर लाई-
मधु-मुकुल नवल रस-गागरी।
अधरों में राग अमन्द पिए,
अलकों में मलयज बन्द किए-
तू अब तक सोई है आली!
आँखों में भरे विहाग री।

सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ के ‘जयशंकर प्रसाद’ द्वारा रचित काव्य ग्रन्थ ‘लहर’ से ‘गीत’ नामक शीर्षक से उद्धृत है ।।
प्रसंग- इस गीत में कवि ने प्रातः कालीन सौन्दर्य के माध्यम से प्रकृति के जागरण का आह्वान किया है ।।

व्याख्या- एक सखी दूसरी सखी से कहती है कि हे सखी! रात्रि व्यतीत हो गई; अतः अब तेरा जागना ही उचित है ।। गगनरूपी पनघट में ऊषारूपी नायिका तारा (नक्षत्र) रूपी घड़े को डुबो रही है; अर्थात् समस्त नक्षत्र प्रभात के आगमन के कारण आकाश में लीन हो गए हैं ।। प्रात:काल के आगमन पर पक्षी-समूह कलरव कर रहा है तथा पल्लवों का आँचल हिलने लगा है ।। शीतल-मन्द-सुगन्धित समीर प्रवाहित हो रहा है ।। लो, यह लता भी नवीन परागरूपी रस से युक्त गागर (घड़े) को भर लाई है ।। (समस्त कलियाँ पुष्पों में परिवर्तित होकर पराग से युक्त हो गई हैं, परन्तु) हे सखी! तू अपने अधरों में प्रेम की मदिरा को पीए हुए, अपने बालों में सुगन्ध को समाए हुए तथा आँखों में आलस्य भरे हुए सो रही है ।। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रातः काल होने पर सर्वत्र जागरण हो गया है, परन्तु हे सखी! तू अब तक सो रही है, जबकि यह सोने का समय नहीं है ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . प्रस्तुत गीत ‘जागरण-गीत’ की कोटि में आता है ।। 2 . यह गीत प्रसादजी के संगीत-ज्ञान का परिचायक है ।। 3 . विहाग-रात्रि के अन्तिम पहर में गाए-बजाए जानेवाले राग को ‘विहाग’ कहते हैं ।। 4 . भाषा-शुद्ध संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।। 5 . शैली- गीति-शैली का सुन्दर प्रयोग ।। 6 . अलंकार- सागंरूपक, ‘कुल-कुल’ में पुनरुक्तिप्रकाश, मानवीकरण, उपमा, श्लेष एवं ध्वन्यर्थ-व्यंजना ।। 7 . रस-संयोग शृंगार ।। 8 . शब्दशक्ति- लक्षणा एवं व्यंजना ।। 9 . गुण- माधुर्य ।।

(ख) “कौन तुम? . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . मन का आलस्य !”

“कौन तुम! संसृति-जलनिधि तीर
तरंगों से फेंकी मणि एक,
कर रहे निर्जन का चुपचाप
प्रभा की धारा से अभिषेक!
मधुर विश्रांत और एकांत
जगत का सुलझा हुआ रहस्य,
एक करुणामय सुंदर मौन
और चंचल मन का आलस्य!”

सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘काव्यांजलि’ के ‘जयशंकर प्रसाद’ द्वारा रचित महाकाव्य ‘कामायनी’ के ‘श्रद्धासर्ग’ से ‘श्रद्धा-मनु’ शीर्षक से उद्धृत है ।।
प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश में श्रद्धा मनु से उनका परिचय पूछ रही है ।।

व्याख्या– संसाररूपी सागर के तट पर तरंगों (लहरों) द्वारा फेंकी गयी किसी मणि के सदृश तुम कौन हो, जो चुपचाप बैठे अपनी शोभा की किरणों से इस निर्जन प्रदेश को स्नान करा रहे हो; अर्थात् जिस प्रकार लहरें समुद्र के तल से किसी मणि को उठाकर तट पर पटक देती हैं, उसी प्रकार सांसारिक आघातों से ठुकराये हुए हे भव्य पुरुष! तुम कौन हो? जिस प्रकार मणि अपने किरणों की कान्ति से सूनेपन को जगमगा देती है, उसी प्रकार तुम भी चुपचाप बैठे इस वीराने को अपने सौन्दर्य की छटा से शोभाशाली बना रहे हो ।। ।। हे अपरिचित! मधुरता, थकावट और नीरवता से परिपूर्ण तुम कुछ ऐसे शान्त भाव से एकान्त में बैठे हो, जैसे तुमने संसार के रहस्य को भली-भाँति समझ लिया हो ।। इसी कारण तुम्हारे मन की सारी चंचलता दूर हो गयी है और तुम मौन बैठे हो ।। तुम्हारे इस मौन से जहाँ एक ओर तुम्हारी बाह्य सुन्दरता प्रकट हो रही है, वहीं दूसरी ओर तुम्हारे हृदय की कोमलता भी व्यक्त हो रही है ।। भाव यह है कि संसार के रहस्य को जानने की उत्सुकता के कारण ही मानव-मन चंचल और अस्थिर रहता है, यदि वह रहस्य मनुष्य को पता चल जाए, तो उसका मन पूर्णतः शान्त हो जाता है ।। योगीजन तप द्वारा इस रहस्य को जान लेते हैं, इसी कारण उनके मौन से उनका तेज एवं उनके हृदय की करुणा दोनों प्रकट होते हैं ।। मनु भी उसी योगी के सदृश मौन हैं ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . मानव-व्यक्तित्व के दो पक्ष होते हैं- बाह्य और आन्तरिक ।। सुन्दरता या कुरूपता बाह्य पक्ष है तो सद्गुण या दुर्गुण आन्तरिक पक्ष ।। इसे शील भी कहते हैं ।। सुन्दरता और शील दोनों के सम्मिलन से ही व्यक्तित्व पूर्ण बनता है ।। श्रद्धा ने मनु के व्यक्तित्व को पूर्ण पाया ।। उनकी आकृति से उनकी सुन्दरता और उनके हृदय की करुणा अर्थात् सौन्दर्य और शील दोनों प्रकट हो रहे थे; अतः मनु पूर्ण मानव थे ।। 2 . सागर की लहरों द्वारा फेंकी हुई मणि से मनु की तुलना करके प्रसाद जी ने उनके एकाकी जीवन की निराशा का सुन्दर चित्रण किया है ।। 3 . भाषा-खड़ीबोली ।।
4 . रस- शृंगार ।।
5 . शब्द-शक्ति- लक्षणा ।।
6 . गुण- माधुर्य ।।
7 . अलंकार-रूपक और अनुप्रास ।।
8 . शैली-प्रबन्ध ।।
9 . छन्द- श्रृंगार छन्द ।। (इसके प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं) ।।

(ग) और देखा वह . . . . . . . . . . . . . . . . . . . सौरभ संयुक्त ।।

और देखा वह सुंदर दृश्य
नयन का इंद्रजाल अभिराम;
कुसुम-वैभव में लता समान
चंद्रिका से लिपटा घन श्याम।
हृदय की अनुकृति बाह्य उदार
एक लंबी काया, उन्मुक्त;
मधु पवन क्रीड़ित ज्यों शिशु साल
सुशोभित हो सौरभ संयुक्त।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग-प्रस्तुत छन्द में श्रद्धा के आन्तरिक और बाह्य गुणों का सुन्दर एवं मनोहारी चित्रण हुआ है ।।


व्याख्या- जब मनु ने कुतूहलवश ऊपर की ओर देखा तो उन्हें सौन्दर्य से परिपूर्ण श्रद्धा अपने निकट खड़ी हुई दिखाई दी ।। यह एक अभूतपूर्व और सुन्दर दृश्य था ।। यह दृश्य उनके नेत्रों का जादू के समान अपनी ओर आकर्षित कर रहा था ।। मनु ने श्रद्धा को देखा तो उन्हें लगा कि वह फूलों से लदी हुई सौन्दर्यमयी लता के समान है ।। उन्होंने अनुभव किया कि जैसे चन्द्रमा की शीतल चाँदनी से लिपटा हुआ बादल का कोई टुकड़ा उनके सामने खड़ा है ।। श्रद्धा के शरीर का अधिकांश भाग खुला हुआ था और उसकी देहयष्टि (शरीर) पर्याप्त लम्बी थी ।। उसे देखकर ऐसा आभास हो रहा था, मानो वह उदार और विस्तृत हृदय की प्रतिमूर्ति हो; अर्थात् विस्तृत और उदार हृदय के समान ही उसका शरीर भी विशाल और लम्बा था ।। मधुर वार्तालाप के समय श्रद्धा का वह लम्बा और सुन्दर शरीर वसन्त की सुगन्धित और मन्द-मन्द बहनेवाली पवन के साथ अठखेलियाँ करता हुआ साल के छोटे वृक्ष के समान सुगन्ध से परिपूर्ण होकर वहाँ शोभामान् था ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . श्रद्धा में हृदय के सभी उदात्त गुण- उदारता, विशालता, गम्भीरता, मधुरिमा आदि दर्शाए गए हैं ।। 2 . ‘शिशु साल’ से श्रद्धा की लम्बाई, स्वाभाविक सुगन्ध, मस्ती और युवावस्था की ओर संकेत हुआ है ।। 3 . भाषा-संस्कृत खड़ीबोला ।। 4 . अलंकार- उपमा, रूपकातिशयोक्ति एवं अनुप्रास ।। 5 . रस- शृंगार ।। 6 . शब्दशक्ति- लक्षणा ।। 7 . गुण- माधुर्य ।। 8 . छन्द-शृंगार छन्द ।।

(घ) नील परिधान . . . . . . . . . . . . . होछ विधाम!

सन्दर्भ- पहले की तरह प्रसंग- इन पंक्तियों में कवि ने श्रद्धा की वेशभूषा का चित्रात्मक वर्णन किया है ।।

व्याख्या- श्रद्धा अपने शरीर पर नीले रंग का मेष-चर्म (भेड़ की खाल) धारण किए है ।। उसकी वेशभूषा में से कहीं-कहीं उसके कोमल और सुकुमार अंग दिखाई दे रहे हैं ।। उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो नीले बादलों के वन में गुलाबी रंग का सुन्दर बिजली का फूल खिला हुआ हो ।। श्रद्धा का वह कान्तिमय और ललितायुक्त मुख काले रंग के बादलों से घिरा हुआ प्रतीत हो रहा था, मानो सन्ध्या के समय पश्चिम की ओर आकाश में काले बादल घिर आए हों और लालिमायुक्त सूर्य उन काले बादलों को भेदकर आकाश में सुशोभित हो ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . यहाँ कवि ने श्रद्धा के अलौकिक और असीम सौन्दर्य का चित्र प्रस्तुत किया है ।।
2 . कवि ने श्रद्धा के रूपसौन्दर्य का चित्रण करते हुए उसके गौर वर्ण पर नीले रंग के परिधान का उल्लेख किया है ।।
3 . भाषा- खड़ीबोली ।।
4 . अलंकार- उत्प्रेक्षा, रूपक एवं विरोधाभास ।।
5 . रस- श्रृंगार ।।
6 . शब्दाशक्ति- अभिधा और लक्षणा ।।
7 . गुण- माधुर्य ।।
8 . छन्द- शृंगार छन्द ।।

(ङ) घिर रहे थे ……………………………………………………. होअभिराम ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- इन पंक्तियों में श्रद्धा की छवि का मनोहारी चित्रण किया गया है ।। मनु जब उसे देखते हैं तो वे उस पर मुग्ध होकर ठगेसे रह जाते हैं ।।

व्याख्या- श्रद्धा के कन्धे पर लटकी हुई घुघराले बालों की लट उसके मुख के पास झूल रही थी, मानो कोई नन्हा-सा बादल का टुकड़ा अमृत पीने के लिए चन्द्रमा के तल को छूने का प्रयत्न कर रहे हो ।। उसके मुख पर मोहक मुस्कान ऐसी लग रह थी, मानो लाल नयी कोपल पर सूर्य की स्निग्ध किरण अलसायी-सी विश्राम कर रही हो ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . कवि ने श्रद्धा के सौन्दर्य का अत्यन्त सूक्ष्म और मनोहारी चित्रण किया है ।। 2 . श्रद्धा का सौन्दर्य-चित्रण उदात्त भाव से परिपूर्ण है ।। 3 . इस पद में प्रकृति ने चेतन स्वरूप की कल्पना करके उसे नायिका पर आरोपित किया गया है ।। 4 . भाषा- संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।। 5 . शब्द-शक्ति- लक्षणा ।। 6 . रस- शृंगार ।। 7 . अलंकार- रूपक, उपमा एवं उत्प्रेक्षा ।। 8 . शैली- प्रबन्ध ।। 9 . छन्द- श्रृंगार छन्द ।।

(च) कहा मनु ने . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . मंद बयार!’

सन्दर्भ- पहले की तरह प्रसंग- श्रद्धा मनु से उनका परिचय पूछती है ।। इस पर मनु उसे अपनी दयनीय स्थिति का परिचय देते हैं ।।
व्याख्या- मनु अपना परिचय श्रद्धा को देते हुए कहते हैं कि पृथ्वी और आकाश के बीच में इस नीरव स्थान पर मेरा एकाकी जीवन एक पहेली बना हुआ है ।। उसे सुलझाने को मेरे पास कोई उपाय भी नहीं है ।। मैं इस निर्जन स्थान में असहाय (बेसहारा) होकर अपनी वेदना से जलता हुआ उसी प्रकार इधर-उधर भटक रहा हूँ, जिस प्रकार एक जलता हुआ तारा टूटकर बिना किसी आश्रय के आकाश में इधर-उधर भटकता रहता है ।। अपना परिचय देने के बाद मनु श्रद्धा से प्रश्न करते हैं कि हे सुकुमार अंगोवाली, तुम कौन हो? अचानक इस निर्जन स्थान में आकर तुमने मेरे इस अभावयुक्त और निराश जीवन को उसी प्रकार आशा का सन्देश दिया है, जिस प्रकार पतझड़ के समय कोयल अपने मीठे स्वर से वसन्त के आगमन की सूचना देती है ।। मेरे इस अतिशय निराशापूर्ण जीवन में तुम आशा की किरण जैसी दिखाई दे रही हो ।। साथ ही वेदना और व्यथा से तप्त मेरे जीवन में शीतल और मन्द पवन की भाँति नवीन चेतना उत्पन्न कर रही हो ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . टूटे हुए उस तारे से मनु की स्थिति की तुलना करके कवि ने उनकी निराश्रित और उद्देश्यहीन स्थिति का चित्रण किया है ।।
2 . श्रद्धा को वसन्त का दूत बताकर कवि ने यह संकेत किया है कि वह मनु के जीवन में आशाओं का संचार करने के लिए उपस्थित हुई है ।।
3 . भाषा- साहित्यिक खड़ीबोली ।। 4 . शैली- प्रतीकात्मक और लाक्षणिक ।।
5 . अलंकारश्लेष, उपमा, रूपक एवं रूपकातिशयोक्ति ।।
6 . रस- शृंगार ।। 7 . शब्दशक्ति- लक्षणा ।।
8 . गुण- प्रसाद एवं माधुर्य ।।
9 . छन्द–शृंगार छन्द ।।

(छ) यहाँ देखा कुछ …………………………………………………यह कैसा उद्वेग?

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में श्रद्धा मनु को अपना परिचय देती हुई बताती है कि वह किस प्रकार उनके समीप तक पहुँची है? इसके साथ ही वह उन्हें हताशा-निराशा से उबरने के लिए प्रेरित भी करती है ।।

व्याख्या- श्रद्धा कहती हैं कि वे हिमालय की शोभा देखते-देखते जब यहाँ तक पहुँची, तब मैंने यहाँ संसार के सभी प्राणियों के भरण-पोषण के लिए गृहस्थी द्वारा प्रतिदिन अपने भोजन में से निकाले जानेवाले अन्न के अंश को बिखरे देखा ।। उस अन्न को देखकर मैं चौंक उठी कि बलि के रूप में दान किया गया यह अन्न यहाँ निर्जन प्रान्त में कहाँ से आया? तब मैंने अनुमान लगाया कि यहाँ आस-पास में कोई जीवित व्यक्ति अवश्य रहता है, उसी ने यह बलि का अन्न यहाँ बिखराया होगा और मैं उस व्यक्ति को ढूँढते-ढूँढते आप तक आ पहुँची हूँ ।। मगर हे तपस्वी! तुम्हें देखकर मेरी समझ में यह नहीं आता कि तुम इतने थके हुए, उदास और मुरझाए हुए-से क्यों हो? तुम्हारे मन में यह वेदना क्यों इतनी तीव्रता से उमड़ रही है? ओह! तुम जीवन से इतने निराश क्यों हुए हो, जबकि तुम सब प्रकार से सक्षम एक दृढ़ पुरुष हो ।। आप मुझे समझाएँ कि आपका मन क्षोभ से क्यों भरा है?

काव्य-सौन्दर्य-1 . श्रद्धा के बौद्धिक एवं वाक्चातुर्य को बड़ी कुशलता से स्पष्ट किया गया है ।।
2 . गृहस्थों द्वारा प्रतिदिन किए जानेवाले पाँच यज्ञों में से एक भूतयज्ञ का यहाँ उल्लेख किया गया है ।।
3 . भाषा- शुद्ध साहित्यिक खड़ीबोली ।।
4 . शैलीप्रबन्धात्मक ।।
5 . अलंकार- प्रश्न तथा अनुप्रास ।।
6 . रस- शान्त ।।
7 . छन्द- शृंगार छन्द ।।
8 . गुण- प्रसाद ।।
9 . शब्दशक्तिअभिधा ।।

(ज) जिसे तुम समझे …………………………………………………….. कल्पित गेह!

जिसे तुम समझे हो अभिशाप,
जगत की ज्वालाओं का मूल;
ईश का वह रहस्य वरदान,
कभी मत इसको जाओ भूल।
विषमता की पीड़ा से व्यस्त
हो रहा स्पंदित विश्व महान;
यही दु:ख सुख विकास का सत्य
यही भूमा का मधुमय दान।
नित्य समरसता का अधिकार,
उमड़ता कारण जलधि समान;
व्यथा से नीली लहरों बीच
बिखरते सुखमणि गण द्युतिमान!”
लगे कहने मनु सहित विषाद:-
“मधुर मारुत से ये उच्छ्वास
अधिक उत्साह तरंग अबाध
उठाते मानस में सविलास।
किंतु जीवन कितना निरुपाय!
लिया है देख नहीं संदेह
निराशा है जिसका परिणाम
सफलता का वह कल्पित गेह।“

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- श्रद्धा मनु को निराशा से निकालने के लिए विभिन्न तर्क देकर उसे उत्साहित करती है, तब मन उसके कथन के प्रत्युत्तर में जो कुछ कहते हैं, उसी का वर्णन इन पंक्तियों में किया गया है ।।

व्याख्या- श्रद्धा मनु को सांत्वना देते हुए कहती है जिस दुःख को तुम शाप समझते हो और यह समझते है कि वह संसार की पीड़ा का कारण है, वह ईश्वर का रहस्यमय वरदान है; क्योंकि यही पीड़ा मनुष्य को सुख प्राप्ति के लिए प्रेरित करती है ।। इसे तुम कभी न भूलना ।। श्रद्धा की बातें सुनकर मनु दुःख से भरकर उससे कहना आरम्भ करते हैं कि तुमने तन-मन को आहूदित करनेवाली शीतलमन्द-सुगन्ध वायु के समान प्रदान करनेवाले उच्छ्वासों के द्वारा जो विलासपूर्ण बातें कही हैं, वे निरन्तर मन में उत्साह की अत्यधिक ऊँची तरंगें उमगानेवाली हैं, किन्तु इस बात में भी कोई सन्देह नहीं है कि मनुष्य का जीवन बहुत विवश है, उसके अपने हाथ में कुछ भी नहीं है, यह सब मैंने अपने जीवन में अनुभव करके देख लिया है ।। उन अनुभवों के द्वारा मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि मनुष्य अपने जीवन में नित नई सफलताओं की कल्पना करता रहता है या यह भी कह सकते हैं कि जीवन सफलता की कल्पनाओं का घर है, किन्तु वास्तव में यदि विचार करके देखा जाए तो अन्तत: इस जीवन का परिणाम निराशाजनक ही है; क्योकि मृत्यु अवश्यंभावी और अनिश्चित है तथा कोई भी मनुष्य सहर्ष मृत्यु का वरण नहीं करना चाहता ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . श्रद्धा की बातों को सविलास बताकर कवि प्रसाद ने श्रद्धा को मुग्धा नायिका के रूप में प्रस्तुत किया है ।।
2 . भाषा- संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।।
3 . शैली- प्रबन्धात्मक ।।
4 . अलंकार- उपमा तथा अनुप्रास ।।
5 . रस- शान्त ।।
6 . छन्द-शृंगार छन्द ।।
7 . गुण-प्रासाद ।।
8 . शब्दाशक्ति- अभिधा एवं व्यंजना ।।

(झ) प्रकृति के यौवन . . . . . . . . . . . . . . . . . चेतन आनंद ।।

प्रकृति के यौवन का शृंगार
करेंगे कभी न बासी फूल;
मिलेंगे वे जाकर अति शीघ्र
आह उत्सुक है उनकी धूल।
पुरातनता का यह निर्मोक
सहन करती न प्रकृति पल एक;
नित्य नूतनता का आनंद

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में प्रसाद ने श्रद्धा के द्वारा मनु के निराश मन को प्ररणा दी है ।।

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व्याख्या- जिस प्रकार युवतियों का श्रृंगार बासी फूलों से नहीं वरन् नित्य नवीन (ताजे) फूलों से होता है, उसी प्रकार प्रकृतिरूपी युवती भी अपना शृंगार नित्य नूतन प्रसाधनों से करती है ।। बासी फूलों का उपयुक्त स्थान तो धूल है, जो उन्हें अपने में मिलाने के लिए लालायित रहती है ।। आशय यह है कि जीवन में जो हताश हो जाता है, निरुत्साहित होकर पिछड़ जाता है, वह कभी सुखों से अपने जीवन का श्रृंगार नहीं कर सकता और जो नित्य जीवन उत्साह से भरकर आशापूर्वक आगे बढ़ने का प्रयास करता है, वह निरन्तर प्रगति करता जाता है ।। क्योंकि प्रकृति या संसार ऐसे कर्मशील व्यक्तियों से ही अपना रूप सँवारता है; अत: तुम भी मन में नवीन आशा सँजोकर सोत्साह आगे बढ़ो ।।

श्रद्धा कहती है कि इस संसार में सभी जड़-चेतन आनन्द से परिपूर्ण हैं और एक तुम हो कि निराशा का लवादा ओढ़कर बैठे हो ।। देखो, विभिन्न प्राकृतिक सम्पदाओं से परिपूर्ण यह विशाल पृथ्वी तुम्हारे उपभोग के लिए ही तो है, तुम अपने कर्म और कठोर परिश्रम के द्वारा इस सम्पूर्ण प्रकृति का उपभोग कर सकते हो हम इस जीवन में अपने पूर्वजन्मों में संचित पुण्यकर्मों के परिणामस्वरूप इस धरती पर उपस्थित प्राकृतिक विभवों का उपभोग करते हैं और आगामी जन्मों के उपभोग के लिए इस जीवन में सद्कर्मों का संचय करते हैं ।। हमारी पुण्य भारतीय संस्कृति का सन्देश भी यही है कि फल की चिन्ता किए बिना ही मनुष्य को निरन्तर सद्कर्म करते रहना चाहिए ।। यह प्रकृति भी यही सब कर रही है, तभी तो जड़ वृक्ष भी चेतन मनुष्य की भाँति बिना किसी स्वार्थ के फलते-फूलते हुए आनन्द का अनुभव करते हैं ।। यही तो जड़ प्रकृति का चेतन आनन्द है ।।

काव्य-सौन्दर्य- 1 . जीवन के उल्लास और नवोत्साह के लिए ताजे फूलों का उपमान अत्यधिक उपयुक्त है ।। फूल ताजगी, आशा और जीवन में अनुरक्ति के प्रतीक हैं ।। 2 . भाषा- खड़ीबोली ।। 3 . रस- शांत ।। 4 . शब्द-शक्ति- लक्षणा ।। 5 . गुणप्रसाद ।। 6 . अलंकार- मानवीकरण व प्रतीकात्मक (‘बासी फूल निराशा, हतात्सोह एवं अकर्मण्यता के प्रतीक है ।। ) 7 . शैलीप्रबन्ध ।। 8 . छन्द- शृंगार छन्द ।।

(ञ) समर्पण लो सेवा . . . . . . . . . . . . . . .. . . . . . . . . . . . . . . सुन्दर खेल ।।

समर्पण लो सेवा का सार
सजल संसृति का यह पतवार,
आज से यह जीवन उत्सर्ग
इसी पद तल में विगत विकार।
दया, माया, ममता लो आज,
मधुरिमा लो, अगाध विश्वास;
हमारा हृदय रत्न निधि स्वच्छ
तुम्हारे लिए खुला है पास।
बनो संसृति के मूल रहस्य
तुम्हीं से फैलेगी वह बेल;
विश्व भर सौरभ से भर जाए
सुमन खेलो सुंदर खेल।

सन्दर्भ- पहले की तरह ।।
प्रसंग- श्रद्धा मानवता को समृद्ध बनाने तथा उसके अस्तित्व को बचाए रखने के लिए मनु के सम्मुख आत्मसमर्पण करती है और उनसे सृष्टि का प्रवर्तक बनने का आग्रह करती है ।।

व्याख्या- श्रद्धा मनु से कहती है कि मानवता के कल्याण हेतु मैं स्वयं को तुम्हें समर्पित करके तुम्हारी सेवा करना चाहती हूँ ।। अर्थात् मैं तुम्हारी जीवनसंगिनी बनकर तुम्हारे साथ-साथ मानवता की भी सेवा करना चाहती हूँ, तुम इसे स्वीकार करो ।। मेरी इस सेवा-भावना का सारत्तत्व यह है कि मेरी यह सेवा भावना जलमग्न संसार के लिए पतवार का कार्य करेगी और इससे खोती मानवता को एक नई दिशा मिल जाएगी ।। आज से मेरा यह जीवन तुम्हारे चरणों की सेवा में समर्पित रहेगा ।। मेरा यह नि:स्वार्थ जीवन-त्याग का निर्णय कभी नहीं बदलेगा और आपके जीवन की पिछली बुराइयों अथवा दोषों को भी इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ।। श्रद्धा के कहने का आशय यही है कि आज से पहले आपमें चाहे जितनी बुराइयाँ अथवा दोष हों, मुझे उनसे कोई लेना-देना नहीं है ।। मैंने आपके सम्मुख आत्मसमर्पण करके आपको जो अपना जीवन साथी बनाने का निर्णय किया है, उसमें कभी भी कोई बदलाव अथवा परिवर्तन नहीं होगा ।। श्रद्धा मनु को अपना समर्पण स्वीकार करने के लिए प्रेरित करती हुई कहती है कि आप मेरे इस समर्पण को स्वीकार करके सृष्टि के क्रम को अनवरत जारी रखते हुए जीवन-मरण के मूल-रहस्यों को जाननेवाले बनो ।। यदि तुम अब भी जीवन से तटस्थ बने रहे तो इस सृष्टि का यहीं अन्त हो जाएगा ।। इसलिए मेरा समर्पण स्वीकार करके अर्थात् मुझे अपनी जीवन-संगिनी बनाकर इस मानव-सृष्टि की बेल को आगे बढ़ाओ ।। तुम मेरे संयोग से मानवरूपी सुमनों की रचना करके जीवन के सुन्दर खेल को जीभरकर खेलो, जिससे सारा संसार उन सुमनों की किलकारियोंरूपी सुगन्ध से महक उठे ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . ‘इसी पद ताल में विगत विकार’ के द्वारा कवि ने भारतीय नारी के जीवन-विधान के आदर्श को प्रस्तुत किया है कि भारतीय नारी जिसे एक बार अपना जीवन साथी चुन लेती है, वह जीवनभर उसका साथी निभाती है, भले ही उसमें कितने भी दोष क्यों न हों ।।
2 . श्रद्धा ने यह कहकर मनु को अपने सच्चे समर्पण का प्रमाण दिया है कि तुम्हारे विगत दोषों को हमारी जीवन-यात्रा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ।।
3 . सृष्टि-क्रम को बनाए रखने के लिए श्रद्धा मनु को अपने साथ रमण करने के लिए प्रेरित करती है ।।
4 . भाषा- परिष्कृत साहित्यिक खड़ीबोली ।।
5 . शैली- प्रबन्धात्मक ।।
6 . अलंकार- रूपक तथा अनुप्रास ।।
7 . रस-संयोग शृंगार ।।
8 . छन्द- शृंगार छन्द ।।
9 . गुण- माधुर्य ।।
10 . शब्दशक्ति – अभिधा ।।

(ट) और यह क्या . . ………………………………………..जय गान ।।

और यह क्या तुम सुनते नहीं
विधाता का मंगल वरदान
‘शक्तिशाली हो, विजयी बनो,
विश्व में गूँज रहा जय गान।

सन्दर्भ- पहले की तरह ।। प्रसंग- मन के एकान्तत और निराश जीवन में आशा का संचार करती हुई श्रद्धा मनु को नवीन-मानव सृष्टि का प्रवर्तक बनने की प्रेरणा देती है ।। व्याख्या- और क्या तुम सृष्टिकर्ता (भगवान्) की यह मंगलमय वरदान-वाणी नहीं सुन रहे हो कि शक्तिशाली बनकर विजय प्राप्त करो ।। यह ध्वनि तो सारे संसार में फैल रही है ।। तुम भी इससे कुछ शिक्षा ग्रहण करो ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . शक्ति-संचय के द्वारा ही विजयश्री एवं सफलता प्राप्त की जा सकती हैं जो लोग दुर्बल है, उन्हें सभी दबाते और सताते हैं ।। संसार सबल के सामने झुकता है ।। प्रसाद जी इसी सन्देश को अपने राष्ट्र को सुनकर उसे शक्तिशाली बनने की प्रेरणा देते हैं ।।
2 . भावसाम्य- कहा भी गया है- ‘वीरभोग्या वसुन्धरा’; अर्थात् यह पृथ्वी केवल वीरों द्वारा ही भोगी जाती है ।।
3 . भाषा- खड़ीबोली ।।
4 . रस- शान्त ।।
5 . शब्द-शक्ति – अभिधा ।।
6 . गुण- प्रसाद ।।
7 . शैली- प्रबन्ध ।।
8 . छन्द- शृंगार छन्द ।।

(ठ) डरो मत अरे . . . . . . . . . . . . . . सकल समृद्धि!

डरो मत अरे अमृत संतान
अग्रसर है मंगलमय वृद्धि;
पूर्ण आकर्षण जीवन केंद्र
खिंची आवेगी सकल समृद्धि ।

सन्दर्भ- पहले की तरह ।। प्रसंग-प्रसाद जी के ‘कामायनी’ महाकाव्य की नायिका श्रद्धा निवृत्ति पथ पर अग्रसर मनु को प्रवृत्ति पथ पर लाने का प्रयास करती है ।। मनु ने संसार को निराशा से भरा और जीवन का उपायहीन मान लिया था ।। श्रद्धा उनमें जीवन के प्रति उत्साह भरती हुई कहती है किव्याख्या- तुम कभी न मरने वाले देवताओं की सन्तान हो; अतः भयभीत क्यों होते हो? तुम्हारे सामने मंगलों की भरपूर समृद्धि है ।। तुम उसे पाने का साहस तो करके देखो ।। तब तुम्हारा जीवन आकर्षण का केन्द्र बन जाएगा और सारी सम्पन्नता स्वयं ही तुम्हारे पास खिंचकर चली आएगी ।। इसलिए विरक्ति त्यागकर जीवन की ओर प्रवृत्त हो जाओ ।।

काव्य-सौन्दर्य-1 . प्रसाद जी के नारी-पात्र शक्ति और चेतना के साक्षात् अवतार हैं ।। यहाँ पर श्रद्धा की वाणी में तेज, ओज एवं चैतन्य भरा हुआ है ।।
2 . भाषा- संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।।
3 . शैली- प्रबन्ध ।।
4 . अलंकार- अनुप्रास ।।
5 . रस-शान्त ।।
6 . गुण- प्रसाद ।।
7 . छन्द- शृंगार छन्द ।।
8 . भाव-साम्य- मानवता के विकास के लिए श्रद्धा ने यहाँ कर्मण्यता का सन्देश दिया है ।। सन्त तुलसीदास ने कहा है
सकल पदारथ एहि जग माहीं ।।
करमहीन नर पावत नाहीं ॥

(ड) शक्ति के विद्युत्कण . . . . . . . . . . . . . . . . . . . मानवता हो जाय!”

शक्ति के विद्युत्कण, जो व्यस्त
विकल बिखरे हैं, हो निरुपाय;
समन्वय उसका करें समस्त
विजयिनी मानवता हो जाए ।

सन्दर्भ- पहले की तरह प्रसंग- इन पंक्तियों में श्रद्धा ने मानवता की विजय का उपाय बताया है ।। व्याख्या- इस सृष्टि की रचना शक्तिशाली विद्युत्कणों (मनुष्यों) से हुई है ।। किन्तु जब तक ये विद्युत्कण अलग-अलग होकर भटकते रहते हैं, तब तक ये शक्तिहीन बने रहते हैं; अर्थात् किसी भी प्रकार के निर्माण में असमर्थ रहते हैं; पर जिस क्षण ये परस्पर मिल जाते हैं, तब इनमें से अपार शक्ति का स्त्रोत प्रस्फुटित होता है ठीक इसी प्रकार जब तक मानव अपनी शक्ति को संचित न करके उसे बिखेरता रहता है, तब तक वह शक्तिहीन बना रहता है; किन्तु यदि वह समन्वित हो जाए तो उसमें विश्वभर को जीत लेने की अपार शक्ति प्रकट होगी और मानवता अपने पूर्ण विकसित रूप में प्रतिष्ठित हो जाएगी ।।

काव्य-सौन्दर्य- 1 . श्रद्धा के माध्यम से कर्मण्यता का सन्देश दिया गया है ।।
2 . विश्व-कल्याण और विश्व-निर्माण के लिए समन्वय की व्यापक भावना अपेक्षित है ।।
3 . भाषा- संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली ।।
4 . रस- शान्त ।।
5 . शब्दशक्ति- लक्षणा ।।
6 . गुण- प्रसाद ।।
7 . छन्द- शृंगार छन्द ।।

निम्नलिखित सूक्तिपरक पंक्तियों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए

(क) कुसुम-वैभव में लता समान
चन्द्रिका से लिपटा घनश्याम !

सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘जयशंकर प्रसाद’ द्वारा रचित ‘श्रद्धा-मनु’ शीर्षक से अवतरित है ।।

प्रसंग-प्रस्तुत सूक्तिपरक पंक्ति में कवि ने श्रद्धा के रूप और सौन्दर्य का वर्णन किया है ।। व्याख्या- जीवन से निराश मनु पर्वत की चोटी पर चिन्तामग्न बैठे हैं ।। उसी समय अनिन्द्य सुन्दरी श्रद्धा वहाँ पहुँचती है ।। मनु श्रद्धा के रूप-माधुर्य से सम्मोहित-से हो जाते हैं ।। श्रद्धा का कुसुम के सदृश कोमल मुख मनु को उस समय ऐसा लगता है मानो वह चाँदनी में लिपटा हुआ बादल का कोई टुकड़ा हो ।। इस पंक्ति में कवि ने श्रद्धा के मुख की तुलना चन्द्रमा से, मुख-दीप्ति की तुलना चन्द्रमा की चाँदनी से की है ।। श्रद्धा के केशों को मेघ (बादल) के सदृश बताया है, जो कि चन्द्रमा की चाँदनी को आवृत्त किये रहता है ।।

(ख) नील परिधान बीच सुकुमार
खुल रहा मृदुल अधखुला अंग ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- इस सूक्ति में श्रद्धा के अनुपम सौन्दर्य का चित्रण किया गया है ।।

व्याख्या- श्रद्धा की मधुर वाणी सुनकर समाधि में लीन मनु का ध्यान भंग हो गया ।। उनकी आँखें खुली तो उन्होंने सौन्दर्य की अद्भुत प्रतिमा, श्रद्धा को अपने समक्ष खड़े पाया ।। उस समय श्रद्धा ने नीले रंग के सुन्दर वस्त्र पहन रखे थे, जिनमें से अति कोमल, उसके शरीर के अधखुले अंग दिख रहे थे ।।

(ग) दुःख की पिछली रजनी बीत
विकसतासुख का नवल प्रभात ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- इस सूक्तिपरक वाक्य में कवि ने दुःख और सुख के चक्र का प्रतीकात्मक वर्णन किया है ।।

व्याख्या- कामायनी महाकाव्य की श्रद्धा मनु से कहती है कि जिस प्रकार रात के बाद नया सवेरा आता है, उसी प्रकार दुःख के बाद सुख प्राप्त होता है ।। इसलिए दुःख को अभिशाप न समझकर ईश्वर का वरदान समझना चाहिए ।। इस प्रकार श्रद्धा ने निराश मनु में आशा का संचार किया है ।। महर्षि वेदव्यास ने ‘महाभारत’ में सुख-दुःख की व्याख्या करते हुए कहा है कि मनुष्य के सुख-दुःख रथ के पहिये की भाँति घूमते रहते हैं ।। सुख के बाद दुःख आता है और दुःख के बाद सुख ।। इसलिए मनुष्य को निराश न होकर उचित समय आने की प्रतिक्षा करनी चाहिए ।।

(घ) निराशा है जिसका परिणाम
सफलता का वह कल्पित गेह ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- जब मनु जीवन से निराश हो जाते हैं और श्रद्धा उन्हें जीवन के सार के बारे में बताती है तो वे कहते हैं किव्याख्या- किन्तु यह जीवन कितना अशक्त है ।। मैंने भली-भाँति देख लिया है, इसमें कोई सन्देह भी नहीं है ।। जीवन में कर्मरत रहने के पश्चात् भी मनुष्य को निराशा ही हाथ लगती है ।। कर्म के फल व्यक्ति के अधीन नहीं है ।। जीवन में कर्म के प्रतिफल के रूप में सफलता मिलेगी केवल यह हम कल्पना ही कर सकते हैं ।। इसकी कोई अनिर्वायता नहीं है ।।

(ङ) हार बैठे जीवन का दाँव
जीतते मर कर जिसको वीर

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग-प्रस्तुत सूक्ति में श्रद्धा ने निराश मनु को जीवन के प्रति उत्साहित करने का प्रयास किया है ।।

व्याख्या- मनु के हताश मन को प्रेरित करती हुई श्रद्धा कहती है कि ऐसा प्रतीत होता है कि तुम अपने जीवन की बाजी हार चुके हो, अपना धैर्य खो बैठे हो और अपने जीवन में उस सफलता को प्राप्त करने के लिए निराश हो चुके हो, जिसे कर्मठ एवं साहसी पुरुष, अपने कठिन परिश्रम के आधार पर प्राप्त करते हैं ।। लेकिन तुम्हारा हताश होना उचित नहीं है ।। कर्मठ पुरुष तो सफलता प्राप्त करने के लिए जीवन की अन्तिम साँस तक संघर्ष करते रहते हैं ।।

(च) प्रकृति के यौवन का श्रृंगार
करेंगे कभी न बासी फूल

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- श्रद्धा द्वारा निराश मनु को प्रेरणा देने के प्रसंग में इस सूक्ति का प्रयोग हुआ है ।।

व्याख्या- श्रद्धा कहती है कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है ।। प्रकृति अपने यौवन का शृंगार मुरझाए हुए बासी फूलों से नहीं करती, वरन् नव-विकसित पुष्पों को ही अपने शृंगार हेतु उपयोग में लाती है ।। विशेष- पुराने दुःखों को याद करके अपने जीवन को निराशा के गर्त में ढकेल देना उचित नहीं है ।। जिस प्रकार से प्रकृति नवीनता पसन्द करती है, उसी प्रकार हमें नवीन उत्साह और ताजगी के साथ कर्म-पथ पर आगे बढ़ना चाहिए ।।

(छ) शक्तिशाली हो, विजयी बनो
विश्व में गूंज रहा, जय गान WWW.UPBOARDINFO.IN

सन्दर्भ- पहले की तरह प्रसंग- इस सूक्ति में श्रद्धा, मनु को जीवन में प्रवृत्त होने के लिए उत्साहित करती है ।।

व्याख्या- मानवता को जीवित और समृद्ध रखने के लिए श्रद्धा, मनु के समक्ष आत्मसमर्पण करती है और जीवन के प्रति आशा और उत्साह जगाती हुई शक्तिशाली बनने की प्रेरणा देती है ।। श्रद्धा चाहती है कि मानवता विजयिनी बने और सदैव फलतीफूलती रहे ।। विश्व में विजय उसी को प्राप्त होती है, जो शक्तिशाली होता है ।। अतः तुम स्वयं को इतना शक्तिशाली बनाओ कि समस्त सुख मंगल तुम्हारी ओर खिंचे चले आयें ।।

(ज) समन्वय उसका करे समस्त
विजयिनी मानवता हो जाय ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- प्रस्तुत सूक्ति में श्रद्धा मनु को लोक-मंगल के कार्य में लगने के लिए प्रेरित कर रही है ।।

व्याख्या-श्रद्धा मनु से कहती है कि जीवन के प्रति हताशा और निराशा को त्यागकर आपको लोक-मंगल के कार्यों में लगना चाहिए ।। इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण और मुख्य कार्य संसार की विभिन्न शक्तियों में पारस्परिक समन्वय स्थापित करना है ।। विश्व की विद्युत्-कणों के समान जो भी करोड़ों-करोड़ शक्तियाँ हैं, वे सब बिखरी पड़ी हैं, जिस कारण जीवन में उसका कोई भी उपयोग नहीं हो पा रहा है ।। उन सब शक्तियों को एकत्रित कीजिए और उनमें आया समन्वय स्थापित कीजिए, जिससे उन शक्तियों का अधिक-से-अधिक उपयोग हो सके ।। इसी में मानवता का कल्याण निहित है ।। यदि आप यह समन्वय स्थापित करने में सफल हो गए तो सर्वत्र मानवता का साम्राज्य स्थापित हो जाएगा ।।

अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्न
1 . गीत बीती विभावरी जागरी’ का मूलभाव अपने शब्दों में लिखिए ।।

उत्तर – – प्रस्तुत गीत में कवि ने प्रातः कालीन सौन्दर्य के माध्यम से प्रकृति के जागरण का आह्वान किया है ।। एक सखी अपनी दूसरी सखी से कहती है कि रात्रि बीत गई है अब तेरा जागना ही उचित है ।। समस्त नक्षत्र प्रभात के आगमन के कारण आकाश में लीन हो गए है ।। पक्षियों के समूह कलख कर रहे हैं ।। सुगन्धित पवन प्रवाहित हो रही है ।। प्रातः काल होने पर सर्वत्र जागरण हो गया है, इसलिए हे सखी! तू अब मत सो, तू अब झटपट उठ बैठा ।। अर्थात् प्रातःकाल होने पर सृष्टि में अनेकों लक्षणों के द्वारा प्रात: काल होने का पता चल जाता है ।। इसलिए तू आलस्य न त्यागकर झटपट उठ जा ।।

2 . ‘श्रद्धा-मनु’ प्रसंग का सारांश अपने शब्दों में लिखिए ।।

उत्तर – – ‘श्रद्धा-मनु’ प्रसंग में मनु को निर्जन स्थान पर बैठे देखकर श्रद्धा उससे प्रश्न करती है कि वे कौन हैं और इस निर्जन स्थान में क्यों बैठे हैं? श्रद्धा कहती है कि हे अपरिचित! तुम मुझे मधुरता, थकावट और नीरवता से परिपूर्ण इस संसार में सुलझे हुए रहस्य की भाँति प्रतीत हो रहे हो ।। तुम्हारा सुन्दर और मौन रूप करूणा से परिपूर्ण है और तुम्हारे चंचल मन ने आलस्य धारण कर लिया है ।। जब मनु ने श्रद्धा का स्वर सुना तो उसे वह स्वर उस निर्जन प्रान्त में भौंरों की मधुर गुन-गुन के समान आनन्द प्रदान करने वाला लगा ।। अनजान व्यक्ति से मिलने के कारण श्रद्धा ने लज्जावश अपना मुख नीचे झुका रखा था और पृथ्वी को देख रही थी ।। उसके मुख से निकले मधुर शब्द मनु को किसी कवि की सुन्दर कविता को समान मधुर लगे ।। मनु ने जब अचानक प्रकट हुई श्रद्धा को देखा तो उन्हें खुशी का झटका-सा लगा और श्रद्धा की मोहक छवि पर सर्वस्व लुटाकर तथा सुध-बुध खोकर मनु उसे देखने
लगे कि इस निर्जन वन में कौन यह मधुर गीत गा रहा है? उनके मन में श्रद्धा के विषय में सब कुछ जानने की जिज्ञासा जाग उठी ।। जब मनु में जिज्ञासा वश ऊपर देखा तो उसे श्रद्धा खड़ी हुई दिखाई दी ।। यह दृश्य उनके नेत्रों को जादू के समान अपनी ओर आकर्षित कर रहा था ।। उ

न्हें श्रद्धा फूलों से लदी लता के समान प्रतीत हुई ।। उन्होंने अनुभव किया कि जैसे चन्द्रमा की शीतल चाँदनी से लिपटा हुआ बादल का कोई टुकड़ा उनके सामने खड़ा है ।। श्रद्धा के शरीर का अधिकांश भाग खुला था और उसका शरीर पर्याप्त लम्बा था ।। मधुर वार्तालाप के समय श्रद्धा का वह लम्बा और सुन्दर शरीर वसन्त की सुगन्धित और मन्दमन्द बहने वाली पवन के साथ अठखेलियाँ करता हुआ साल के वृक्ष के समान सुगन्ध से परिपूर्ण होकर वहाँ शोभायमान था ।। श्रद्धा ने गान्धार देश में पाई जाने वाली नीले बालों वाली भेड़ों की खाल से बने अत्यन्त कोमल, सुन्दर वस्त्र धारण कर रखे थे ।। वे कोमल वस्त्र न केवल श्रद्धा के कोमल शरीर को ढके थे, अपितु कोमल हुए भी उसे सुरक्षा कवच प्रदान कर रहे थे ।। नीले वस्त्रों के बीच में से कहीं-कहीं उसके कोमल और सुकुमार अंग दिखाई पड़ रहे थे ।। जो ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो नीले बादलों के तन में गुलाबी रंग का फूल खिला हो ।।

श्रद्धा का कान्तिमय मुख काले बादलों से घिरा लग रहा था, मानों सन्ध्या के समय पश्चिम की ओर आकाश में काले बादल घिर आए हों और ललिमायुक्त सूर्य उनको भेदकर आकाश में सुशोभित हो ।। उसके कन्धों पर लटकी हुई घुघराले बालों की लट उसके मुखड़े पर ऐसे झूल रही थी जैसे कोई नन्हा बादल का टुकड़ा अमृत पीने के लिए सागर के तल को छूने का प्रयत्न कर रहा हो ।। उसके मुख पर मुस्कान ऐसी लग रही थी, जैसे लाल रक्तिम नवीन कोपल पर सूर्य की एक अलसायी-सी स्निग्ध किरण विश्राम कर रही हो ।। मनु अपना परिचय देते हुए कहते हैं कि पृथ्वी और आकाश के बीच में इस नीरव स्थान पर मेरा एकाकी जीवन एक पहेली बना हुआ है ।। मैं असहाय होकर अपनी वेदन में जलता हुआ इधर-उधर भटक रहा हूँ ।। मनु श्रद्धा से प्रश्न करते हैं कि तुम कौन हो? जिस प्रकार पतझड़ के समय कोयल अपने मीठे स्वर में वसन्त के आगमन की सूचना देती है, उसी प्रकार मेरे निराशापूर्ण जीवन में तुम आशा की किरण जैसी दिख रही हो ।। वेदना और व्यथा से तप्त मेरे जीवन में शीतल पवन की भाँति नवीन चेतना उत्पन्न कर रही हो ।। कुछ समय पहले आने वाली श्रद्धा ने अपने विषय में मनु की उत्कंठ जिज्ञासा शांत करने के लिए अपना परिचय देना प्रारम्भ किया ।।

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उसकी वाणी ऐसी लग रही थी, मानो कोयल आनंद में भरकर फलों को मधुमय वसन्त के आने का सन्देश सुना रही हो ।। श्रद्धा कहती है मेरा मन नवीन उत्साह से परिपूर्ण है, इस कारण मेरे मन में ललितकलाओं को सीखने की इच्छा जागृत हुई इसलिए मैं उन्हें (गायन, वादन, नृत्य) को सीखने के लिए गन्धर्वो के देश में निवास करती हूँ ।। मैं अपने पिता की प्रिय सन्तान हूँ ।। वह कहती हैं कि जब मेरी दृष्टि इस उच्च हिमालय पर पड़ती है, तब इसके सन्दर्भ में विस्तार से जानने के लिए मेरे मन में उठने वाले अनेकों प्रश्न मुझे व्यथित कर देते हैं ।। पृथ्वी की सिकुड़न के समान मन को भयभीत कर देने वाले विशाल हिमालय का स्वरूप क्या है और इसमें रहने वाले लोगों की पीड़ा क्या है? अपने इन प्रश्नों का समाधान प्राप्त करने के लिए ही मैंने निश्चय किया कि क्यों न इस क्षेत्र में घूमकर ही इसके विषय में जाना जाए ।। और इसी उत्साह में मेरे पैर स्वयं ही इन पर्वतमालाओं का सौन्दर्य देखने के लिए बढ़ते चले गए ।। हिमालय के सौन्दर्य को देखकर मेरी उत्कंठ अब शांत हो गई है ।।

श्रद्धा कहती हैं कि मैं हिमालय की शोभा देखते-देखते जब यहाँ पहुँची, तब मैंने यहाँ गृहस्थों द्वारा संसार के जीवों के कल्याण के लिए प्रतिदिन घर से बाहर रखा जाने वाला अन्न देखा ।। तब मैंने सोचा जीवों की भलाई के लिए ये दान किसने किया है? तब मैंने अनुमान लगाया कि यहाँ आस-पास में अवश्य ही कोई जीवित व्यक्ति है ।। उसी की तलाश करते-करते मैं आप तक पहुँची ।। वह मनु से कहती है कि हे तपस्वी! तुम इतने थके हुए, उदास और मुरझाए हुए क्यों हो? तुम्हारे मन में यह वेदना क्यों इतनी तीव्रता से उमड़ रही है? तुम जीवन से इतने निराश क्यों हो ।। आप मुझे बताइए कि आपका मन क्षोभ से क्यों भरा है? श्रद्धा मनु से कहती है कि दुःख की पिछली काली रात के बीच जो सुख का नया सवेरा विकसित होता है ।। वह सुखमय अन्न के प्रकट होने का ही पूर्व संकेत है ।। जिस दुःख को तुम शाप समझ रहे हो वह संसार की पीड़ा का कारण है, वह ईश्वर का रहस्यमय वरदान है ।। इसे तुम कभी मत भूलना ।। श्रद्धा की बातें सुनकर मनु उससे कहते है कि तुमने तन-मन को आहृादित करने वाली शीतल-मन्द-सुगन्ध वायु के समान आनन्द प्रदान करने वाले उच्छवासों के द्वारा जो विलासपूर्ण बाते कहीं हैं वे मन में उत्साह भरने वाली हैं, किन्तु इस बात में संदेह नहीं है कि मनुष्य जीवन बहुत विवश है ।। यह मैंने अपने जीवन में अनुभव किया है ।। और उन अनुभवों के द्वारा मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि मनुष्य अपने जीवन में नई सफलताओं की कल्पना करता रहता है या यह भी कह सकते हैं कि जीवन सफलता की कल्पनाओं का घर है ।।

मनु की बात सुनकर श्रद्धा ने स्नेह भाव से कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि तुम अपना धैर्य खो बैठे हो और जीवन में सफलता प्राप्त करने के प्रति निराश हो चुके हो ।। जिसे कर्मशील व साहसी पुरुष अपने कठिन परिश्रम से प्राप्त करते हैं ।। केवल तपस्या करना जीवन का सत्य नहीं है ।। दीनता और करुणा के भावों से ओत-प्रोत तुम्हारी यह मनः स्थिति क्षणिक है ।। अतः तुम अपनी अभिलाषाओं एवं इच्छाओं को जगाओ तथा उत्साहपूर्वक जीवन व्यतीत करो ।। श्रद्धा-मनु के निराश मन को प्रेरणा देते हुए कहती है कि प्रकृति में प्राकृतिक छटा कभी भी बासी और मुरझाए हुए फूल से नहीं आती है ।। निर्जीव फूल प्रकृति को नया उल्लास नहीं प्रदान कर सकते इन फूलों का हश्र तो धूल में मिलकर काल कवलित होना ही है ।। इसी प्रकार निस्तेज लोगों का जीवन भी सारहीन होता है ।। श्रद्धा कहती है कि संसार में सभी जड़-चेतन आनंद से परिपूर्ण हैं केवल तुम ही निराशाग्रस्त हो ।। तुम अपने कर्म और कठोर परिश्रम से प्रकृति का उपभोग कर सकते हो ।। यही तो जड़-प्रकृति का चेतन आनंद है ।। तुम कहते हो कि मैं अकेला व असहाय हूँ फिर तुम यज्ञ कैसे कर सकते हो ।।

यज्ञ अकेले नहीं किया जाता अपितु पति-पत्नी दोनों मिलकर इसे करते हैं ।। हे तपस्वी! तुमने इस संसार को सारहीन मानकर स्वयं को जो जीवन से विरत कर लिया है वह ठीक नहीं है ।। वह मनु से कहती है कि मानवता के कल्याण के लिए मैं स्वयं को तुम्हें समर्पित कर तुम्हारी सेवा करना चाहती हूँ मेरी यह सेवा-भावना जलमग्न संसार के लिए पतवार का कार्य करेगी ।। इससे अस्तित्व खोती मानवता को नई दिशा मिलेगी ।। मेरा यह त्याग का निर्णय कभी नहीं बदलेगा और आपके जीवन की बुराइयों का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा ।। श्रद्धा कहती है कि आप मेरे इस समर्पण को स्वीकार करके सृष्टि के क्रम को अनवरत जारी रखते हुए जीवन-मरण के मूल रहस्यों को जानने वाले बनो ।। तुमसे ही इस सृष्टि का सृजन होगा ।। तुम मेरे संयोग से मानवरूपी सुमनों की रचना करके जीवन के सुन्दर खेलों को खेलो ।। जिससे संसार इन सुमनों की सुगंध से महक उठे ।।

श्रद्धा मनु से कहती है कि तुमने इस सृष्टि की रचना करने वाले विधानता का वरदान नहीं सुना ।। उन्होंने कहा है “शक्तिशाली बनकर विजय प्राप्त करो ।। ” यही विजयगान आज विश्वभर में गूंज रहा है ।। तब कहती है कि हे देवपुत्र! आप किसी भी आशंका से भयभीत मत होइए, क्योंकि कल्याणकारी उन्नति आपके सम्मुख उपस्थित है ।। तुम नवीन उत्साह के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वाह करो ।। तुम्हारे प्रयासों से उफनते समुद्र पट जाएंगे ।। ग्रह-नक्षत्र तुम्हारे चारों ओर बिखर जाएँगे और ज्वालामुखी चूर्ण-चूर्ण होकर सदैव के लिए शांत हो जाएंगे इसलिए तुम निराशा त्यागकर दृढ़ निश्चय से अपने कर्मों में लग जाओ ।। प्राकृतिक आपदाओं को अपने पैरों से कुचलकर मानवता गर्वित हो जाएगी ।। श्रद्धा मनु को समझाती है कि इस प्रलयकाल में सम्पूर्ण सृष्टि को निगलने के लिए समुद्र के कितने स्रोत फूट पड़े थे, जिनके कारण द्वीप और कच्छप उसमें डूब गए थे, परन्तु हम दोनों के रूप में यह मानवता आज भी सुदृढ़ मूर्ति के समान खड़ी हुई अपने उत्थान का प्रयास कर रही है ।। इस सृष्टि की रचना जिन मनुष्यों से हुई है, जब तक ये अलग-अलग भटकते रहेंगे तब तक शक्तिहीन रहेंगे ।। किन्तु यदि ये समन्वित हो जाएँ तो उसमें विश्वभर को जीत लेने की अपार शक्ति प्रकट होगी और मानवता की विजय होगी ।। \

3 . संकलित अंश के आधार पर श्रद्धा के रूप सौन्दर्य का वर्णन कीजिए ।।
उत्तर – – श्रद्धा के शरीर का अधिकांश भाग खुला था और उसकी देह पर्याप्त लम्बी थी ।। उसने अपने शरीर पर नीले बालों वाली भेड़ों की खाल से बने अत्यन्त कोमल, सुंदर एवं चमकदार वस्त्र धारण कर रखे थे ।। उसकी वेशभूषा में से कहीं-कहीं उसके कोमल और सुकुमार अंग दिखाई दे रहे थे ।। मानो नीले बादलों के वन में गुलाबी रंग का बिजली का फूल खिला हो ।। श्रद्धा का कान्तिमय और ललितायुक्त मुख काले रंग के बादलों से घिरा हुआ प्रतीत हो रहा था जैसे सन्ध्या के समय पश्चिम की ओर आकाश में काले बादल घिर आए हों ।। उसके कंधे पर लटकी हुई घुघराले बालों की लट उसके मुख पर ऐसे झूल रही थी जैसे कोई नन्हा बादल का टुकड़ा अमृत पीने के लिए सागर के तल को छूने का प्रयत्न कर रहा हो ।। उसके मुख की मोहक मुस्कान ऐसी लग रही थी, जैसे लाल रक्तिम नवीन कोंपलों पर सूर्य की किरण विश्राम कर रही हो ।।

4 . ‘श्रद्धा-मनु’ के संवाद से जयशंकर प्रसाद जी क्या संदेश देना चाहते हैं?

उत्तर – – श्रद्धा-मनु के संवाद के द्वारा जयशंकर प्रसाद जी निराशा से परिपूर्ण व्यक्ति को कर्मपथ पर आगे बढ़ने का संदेश देना चाहते है ।। जिस प्रकार श्रद्धा मनु को कर्म पथ पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करती है तथा मानवता के कल्याण के लिए स्वयं का निस्वार्थ भाव से समर्पण करती है, जिससे मानवता का कल्याण हो तथा इसे एक नई दिशा मिले, उसी प्रकार प्रसाद जी संसार के जीवों को कर्मपथ पर बढ़ने तथा मानवता के कल्याण के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने का संदेश देते हैं ।।

काव्य-सौन्दर्य से सम्बन्धित प्रश्न
1 . “खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा ।। ” पंक्ति में प्रयुक्त अलंकार का नाम बताइए ।।
उत्तर – – प्रस्तुत पंक्ति में यमक, अनुप्रास तथा पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है ।।

2 . “सुना यह मनु . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . फिर मौन ।। “पंक्तियों में किस रस का प्रयोग किया गया है?
उत्तर – – प्रस्तुत पंक्तियों में शृंगार रस का प्रयोग हुआ है ।।

4- नील परिधान बीच सुकुमार
खुल रहा मृदुल अधखुला अंग;
खिला हो ज्यों बिजली का फूल
मेघ-बन बीच गुलाबी रंग।
आह! वह मुख! पश्चिम के व्योम
बीच जब घिरते हो घन श्याम;
अरुण रवि-मंडल उनको भेद
दिखाई देता हो छविधाम ।
पंक्तियों का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।।

उत्तर – – काव्य-सौन्दर्य-1 . यहाँ कवि ने श्रद्धा के अलौकिक एवं असीम सौन्दर्य का चित्र प्रस्तुत किया है ।।
2 . कवि ने श्रद्धा के रूप सौन्दर्य का चित्रण करते हुए उसके गौर वर्ण पर नीले रंग के परिधान का उल्लेख किया है ।। 3 . भाषा- खड़ीबोली, 4 . अलंकार- उत्प्रेक्षा और रूपक, 5 . रस- शृंगार, 6 . शब्दशक्ति- अभिधा और लक्षणा, 7 . गुण- माधुर्य, 8 . छन्द- शृंगार छन्द ।।

4 . “घिर रहे थे घुँघराले बाल
अंस अवलंबित मुख के पास;
नील घन-शावक से सुकुमार
सुधा भरने को विधु के पास। ।।
“पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार का नाम लिखिए ।।

उत्तर – – प्रस्तुत पंक्तियों में रूपक, उपमा एवं उत्प्रेक्षा अलंकारों का प्रयोग हुआ है ।।

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