up board class 12th civics chapter 13 Composition and Functioning of State Government राज्य सरकार का गठन तथा उसकी कार्यविधि free pdf

up board class 12th civics chapter 13 Composition and Functioning of State Government राज्य सरकार का गठन तथा उसकी कार्यविधि free pdf

UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 1 Principles of Origin of State
up board class 12th civics chapter 13 Composition and Functioning of State Government राज्य सरकार का गठन तथा उसकी कार्यविधि

पाठ - 13 राज्य सरकार का गठन तथा उसकी कार्यविधि (Composition and Functioning of State Government)

लघु उत्तरीय प्रश्न

1– राज्यपाल पद के लिए निर्धारित योग्यताओं का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर– – संविधान के अनुच्छेद 157 में राज्यपाल के पद के लिए निम्नलिखित योग्यताएँ निर्धारित की गई हैं(i) वह भारत का नागरिक हो ।
(ii) वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो ।
(iii) वह भारतीय संघ व उसके अन्तर्गत किसी राज्य के विधानमण्डल या सदन का सदस्य न हो । यदि वह नियुक्ति के समय किसी विधानमण्डल या सदन का सदस्य हो, तो उसके पद-ग्रहण करने की तिथि से यह स्थान रिक्त समझा जाएगा । (iv) राज्यपाल कोई अन्य लाभ का पद धारण नहीं करेगा ।

2– राज्यपाल की शक्तियों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए । अथवा
राज्यपाल के चार विवेकाधीन अधिकारों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर– – राज्यपाल की शक्तियाँ निम्न प्रकार हैं
(i) कार्यकारिणी शक्तियाँ
(ii) विधायी शक्तियाँ (iii) वित्तीय शक्तियाँ
(iv) न्यायिक शक्तियाँ (v) संकटकालीन अधिकार
(vi) स्वविवेक से किए जाने वाले कार्यों की शक्ति

3– राज्यपाल की किन्हींचार कार्यपालिका शक्तियों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर– – कार्यपालिका शक्तियाँ- राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होती है तथा उस शक्ति का प्रयोग राज्यपाल स्वयं या अपने अधीन अधीनस्थ कर्मचारियों के माध्यम से करता है । ये शक्तियाँ उन विषयों तक सीमित है जिनका उल्लेख राज्य सूची और समवर्ती सूची में किया गया है । संघ सूची के विषयों के संबंध में उसको कोई शक्ति प्राप्त नहीं है संक्षेप में उसकी कार्यपालिका शक्तियाँ निम्नलिखित हैं

(i) कार्यपालिका का संचालन- राज्यपाल राज्य का अध्यक्ष है तथा शासन संबंधी समस्त कार्यवाही उसी के नाम पर होती
है । वह कार्यपालिका का संचालन करता है तथा आवश्यकतानुसार उसमें परिवर्तन भी कर सकता है ।

(ii) राज्य सूची पर आधारित अधिकार- संविधान के अनुसार जो विषय राज्य सूची में रखे गए हैं, उनके संबंध में उसको
समस्त अधिकार प्राप्त है । समवर्ती सूची के विषयों पर भी उसका अधिकार है किन्तु इस क्षेत्र में वह केंद्रीय शासन की
कार्यकारिणी शक्ति के अधीन है ।

(iii) मंत्रियों के कार्यों का विभाजन- राज्यपाल ही मंत्रिपरिषद् के मंत्रियों को कार्यों का विभाजन मुख्यमंत्री के परामर्श के
अनुसार करता है । वह राज्य के शासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए नियम भी बनाता है ।

(iv) नियुक्ति संबंधी शक्तियाँ- विधानसभा के बहुमत प्राप्त दल के नेता को राज्यपाल मुख्यमंत्री के पद पर नियुक्त करता है
और मुख्यमंत्री के परामर्श के अनुसार मंत्रिपरिषद् के अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता है । इसके साथ-साथ वह राज्य के
महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल), राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों आदि की नियुक्ति भी करता है ।

4– राज्यपाल की नियुक्ति स्थानान्तरण वह हटाने का अधिकार किसको है? क्या एक ही व्यक्ति एक ही समय में एक से
अधिक राज्यों का राज्यपाल रह सकता है?

उत्तर– – राज्यपाल की नियुक्ति, स्थानान्तरण व हटाने का अधिकार राष्ट्रपति को है । हाँ, एक ही व्यक्ति एक ही समय में दो राज्यों का राज्यपाल रह सकता है ।

5– किसी राज्य के मुख्यमंत्री की नियुक्ति किस प्रकार होती है?
उत्तर– – मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है । विधानसभा में जिस राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त होता है, उसी दल के नेता को राज्यपाल मुख्यमंत्री नियुक्त करता है । यदि किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता है, तो राज्यपाल स्वविवेक से ऐसे दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है, जो बहुमत प्राप्त करने में सक्षम हो ।

6– राज्य प्रशासन में मुख्यमंत्री का क्या स्थान है?
उत्तर– – केन्द्रीय प्रशासन में जो स्थान प्रधानमंत्री का होता है, वहीं राज्य प्रशासन में मुख्यमंत्री का होता है । मुख्यमंत्री राज्य प्रशासन का प्रधान होता है । सत्ता की राजनीति में मुख्यमंत्री की स्थिति परिवर्तनशील होती है । साठ और सत्तर के दशक में मुख्यमंत्री राज्य की शक्ति के स्तम्भ समझे जाते थे, किन्तु बाद में मुख्यमंत्री पद की गरिमा निरन्तर घटती गई और आज मिली-जुली सरकारों के युग में तो मुख्यमंत्री को स्वयं अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए दाँव पेंच से काम लेना पड़ता है ।

7– मुख्यमंत्री के चार अधिकारों और कार्यों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर– – मुख्यमंत्री के चार अधिकार और कार्य निम्न हैं
(i) मंत्रिपरिषद् का गठन
(ii) मंत्रियों के विभागों का वितरण
(iii) नियुक्ति संबंधी अधिकार
(iv) शासन व्यवस्था का संचालन

8– मुख्यमंत्री के महत्वपूर्ण कार्यों का संक्षिप्त विवेचन कीजिए ।
उत्तर– – मुख्यमंत्री के महत्वपूर्ण कार्य निम्नलिखित हैं
(i) मंत्रिपरिषद् का गठन
(ii) मन्त्रियों के विभागों का वितरण
(iii) नियुक्ति संबंधी अधिकार
(iv) राज्यपाल का परामर्शदाता
(v) मंत्रिमण्डल का सभापति
(vi) नीति निर्धारण का अधिकार
(vii) शासन-व्यवस्था का संचालन
(viii) शासन के विभिन्न विभागों में समन्वय
(ix) विधानसभा का नेतृत्व
(x) सरकार का प्रमुख प्रवक्ता

9– राज्य के मुख्यमंत्री के महत्वपूर्ण कार्यों कासंक्षेप में वर्णन कीजिए ।
उत्तर– – उत्तर के लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या-9 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

10– मुख्यमंत्री अपने सहयोगियों के चयन में किन-किन बातों का ध्यान रखता है?
उत्तर– – मुख्यमंत्री अपने सहयोगियों के चयन में इन बातों का ध्यान रखता है कि
(i) उसके सहयोगी शासन की नीतियों का विरोध न करते हों ।
(ii) उसके सहयोगी विश्वासपात्र होने चाहिए । तथा
(iii) उसके सहयोगी उससे मतभेद न रखते हों ।

11– यदि विधानसभा में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं है तो सरकार की रचना में राज्यपाल किन-किन विकल्पों को प्रयोग कर सकता है?

उत्तर– – यदि विधानसभा में किसी दल का स्पष्ट बहुमत नहीं है, तो राज्यपाल स्वविवेक का प्रयोग करते हुए किसी भी ऐसे दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त कर सकता है, जो बहुमत प्राप्त करने में सक्षम हो ।

12– राज्यों के मंत्रिपरिषद्का गठन किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर– – संविधान राज्य के राज्यपाल को परामर्श देने के लिए एक परिषद् की व्यवस्था करता है । इसे मंत्रिपरिषद् कहते हैं । मुख्यमंत्री इस
परिषद् का प्रधान होता है, जिसकी नियुक्ति राज्यपाल करता है । मुख्यमंत्री अपने पद की शपथ ग्रहण करने के पश्चात् मंत्रिपरिषद् के अन्य मंत्रियों के नामों तथा उन्हें दिए गए विभागों की सूची राज्यपाल को प्रस्तुत करता है जिसको साधारणतया राज्यपाल स्वीकृत कर देता है । इस प्रकार मंत्रिपरिषद् का गठन किया जाता है ।

13– राज्यपाल और मंत्रिपरिषद के संबंधों का विवेचन कीजिए ।
उत्तर– – राज्यपाल राज्य का नाममात्र का कार्यकारी और मंत्रिपरिषद् वास्तविक कार्यपालिका है । सामान्य परिस्थितियों में राज्यपाल से मंत्रिपरिषद् के मंत्रियों की मन्त्रणा के आधार पर ही कार्य करने की अपेक्षा की जाती है । अनुच्छेद 167 के अनुसार राज्य के मुख्यमंत्री का कर्त्तव्य है कि राज्य के प्रशासन से संबंधित मंत्रिपरिषद् के परामर्श के बिना भी कार्य कर सकता है; जैसे- राज्य में संवैधानिक तंत्र के विफल होने पर राज्यपाल मंत्रिपरिषद् को बर्खास्त कर सकता है ।

14– मंत्रिपरिषद् के कार्यों का संक्षेप में वर्णन कीजिए ।
उत्तर– – मंत्रिपरिषद् राज्य के प्रशासन का मुख्य रूप से संचालन करती है । संक्षेप में इसके कार्य निम्न प्रकार हैं(i) कानून-निर्माण संबंधी कार्य
(ii) प्रशासन संबंधी कार्य
(iii) नीति निर्धारण संबंधी कार्य
(iv) वार्षिक आय-व्यय का विवरण तैयार करना
(v) विधानमण्डल में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देना
(vi) राज्यपाल को उच्च पदों पर नियुक्ति के संबंध में परामर्श देना ।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

1– राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति कौन करता है? राज्यपाल की शक्तियों का वर्णन कीजिए ।
अथवा
राज्यपालों की नियुक्ति कैसे होती है? राज्य की राजनीति में राज्यपालों की भूमिका का परीक्षण कीजिए ।

उत्तर– – संविधान के अनुसार, प्रत्येक राज्य में राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है । व्यवहार में राष्ट्रपति केन्द्रीय मंत्रिपरिषद् के परामर्श पर राज्यपाल की नियुक्ति करता है । राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि यदि वह आवश्यक समझे तो दो या दो से अधिक राज्यों के लिए एक ही व्यक्ति को राज्यपाल नियुक्त कर सकता है । राज्यपाल को राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किया जाता है; जनता या राज्य की व्यवस्थापिका द्वारा उसका चुनाव नहीं होता है ।

राज्यपाल के अधिकार और शक्तियाँ- राज्य का वैधानिक अध्यक्ष राज्यपाल होता है । उसके अधिकार एवं कार्य प्रायः वही हैं जो भारतीय केंद्र के शासन में राष्ट्रपति के हैं ।
डॉ० दुर्गादास बसु के अनुसार- “संक्षेप में राज्यपाल की शक्तियाँ राष्ट्रपति के समान हैं, सिर्फ कूटनीतिक, सैनिक तथा संकटकालीन अधिकारों को छोड़कर । “
संविधान के अनुसार राज्यपाल को उसके कार्यों के सम्पादन मे सहायता देने के लिए मंत्रिपरिषद् होती है केवल उन कार्यों को छोड़कर जो संविधान के अनुसार राज्यपाल के स्वविवेक के अधीन रखे गए हैं इस प्रकार स्पष्ट है कि संविधान के अनुसार, राज्यपालों को अपने सभी कार्य मंत्रिपरिषद् की सहायता से संपादित करने होते हैं ।
राज्यपाल की इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए उसके कार्य को निम्नलिखित वर्गों में विभक्त किए जा सकते हैं

(i) कार्यकारिणी शक्तियाँ- राज्य की कार्यकारिणी शक्ति राज्यपाल में निहित होती है तथा उस शक्ति का प्रयोग राज्यपाल स्वयं या अपने अधीन अधीनस्थ कर्मचारियों के माध्यम से करता है । ये शक्तियाँ उन विषयों तक सीमित है जिनका उल्लेख राज्य सूची और समवर्ती सूची में किया गया है । संघ सूची के विषयों के संबंध में उसको कोई शक्ति प्राप्त नहीं है संक्षेप में उसकी कार्यकारिणी शक्तियाँ निम्नलिखित हैं


(क) कार्यपालिका का संचालन- राज्यपाल राज्य का अध्यक्ष है तथा शासन संबंधी समस्त कार्यवाही उसी के नाम पर होती है । वह कार्यपालिका का संचालन करता है तथा आवश्यकतानुसार उसमें परिवर्तन भी कर सकता है ।

(ख) राज्य सूची पर आधारित अधिकार- संविधान के अनुसार जो विषय राज्य सूची में रखे गए हैं, उनके संबंध में उसको समस्त अधिकार प्राप्त है । समवर्ती सूची के विषयों पर भी उसका अधिकार है किन्तु इस क्षेत्र में वह केन्द्रीय शासन की कार्यकारिणी शक्ति के अधीन है ।

(ग) मंत्रियों के कार्यों का विभाजन- राज्यपाल ही मंत्रिपरिषद् के मंत्रियों को कार्यों का विभाजन मुख्यमंत्री के
परामर्श के अनुसार करता है । वह राज्य के शासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए नियम भी बनाता है ।

(घ) नियुक्ति संबंधी शक्तियाँ- विधानसभा के बहुमत प्राप्त दल के नेता को राज्यपाल मुख्यमंत्री के पद पर नियुक्त करता है और मुख्यमंत्री के परामर्श के अनुसार मंत्रिपरिषद् के अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता है । इसके साथ साथ वह राज्य के महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल), राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों आदि की नियुक्ति भी करता है । ये सभी नियुक्तियाँ वह मंत्रिपरिषद् के परामर्श के अनुसार ही करता है । जिन राज्यों में विधानमण्डल के दो सदन हैं, उनमें उच्च सदन (विधानपरिषद्) के कुछ सदस्यों को भी मनोनीत करने का अधिकार संविधान द्वारा राज्यपाल को प्रदान किया गया है । राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों की सेवा-शर्तों का निर्धारण और उनके कार्य के संबंध में नियम बनाने के अधिकार भी राज्यपाल को प्रदान किए गए हैं ।

(ङ) राज्यपाल का स्वेच्छाधिकार- राज्यपाल को कुछ विषयों पर स्वेच्छा से विचार करने का अधिकार भी प्राप्त है । असम के राज्यपाल को अनुसूचित जातियों वाले क्षेत्र में स्वेच्छापूर्वक निर्णय तथा शासन करने का अधिकार दिया गया है । अन्य राज्यों के राज्यपालों को यह अधिकार प्राप्त नहीं हैं । राज्यपाल की स्वेच्छाधिकार शक्ति का विरोध हृदय नाथ कुँजरू, हरिविष्णु कामथ जैसे विधिवेत्ताओं ने किया था किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली थी ।

(ii) विधायी शक्तियाँ- राज्यपाल की विधायी शक्तियाँ निम्नलिखित हैं
(क) वह राज्य के विधानमण्डल का अभिन्न अंग है- यद्यपि राज्यपाल विधानमण्डल के किसी सदन का सदस्य नहीं होता तथापि उसे विधानमण्डल का अभिन्न अंग माना जाता है । अतः विधानमण्डल के संगठन तथा कार्य के संबंध में उसके अधिकार महत्वपूर्ण हैं ।

(ख) विधानमण्डल के अधिवेशन को बुलाना- राज्यपाल समय-समय पर विधानमण्डल का अधिवेशन बुला सकता है किन्तु पहले अधिवेशन की अंतिम तिथि और दूसरे अधिवेशन के प्रारंभ होने की तिथि के बीच छ: महीने से अधिक का समय नहीं होना चाहिए ।

(ग) विधानमण्डल के कुछ सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार- वह विधानपरिषद् के सदस्यों की कुल संख्या के लगभग 1/6 सदस्यों को मनोनीत करता है । यदि उसको यह विश्वास हो जाए कि सदन में आंग्लभारतीय (एंग्लो इण्डियन) सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है तो वह विधानसभा में भी उस सम्प्रदाय के एक सदस्य को मनोनीत कर सकता है ।
(घ) विधानमण्डल में संबोधन देना एवं संदेश भेजना- वह किसी एक अथवा दोनों सदनों को संबोधित कर सकता है तथा उनको संदेश भेज सकता है । वास्तव में राज्य के विधानमण्डल का प्रत्येक अधिवेशन राज्यपाल के संबोधन से ही आरंभ होता है ।
(ङ) विधानसभा को भंग करना एवं अवधि में वृद्धि करना- राज्यपाल विधानसभा को उसका कार्यकाल समाप्त होने से पूर्व भंग भी कर सकता है तथा कुछ विशेष परिस्थितियों में विधानसभा की अवधि में वृद्धि भी कर सकता है ।

(च) धन विधेयक संबंधी अधिकार- धन विधेयक केवल राज्यपाल की सिफारिश पर ही विधानसभा में प्रस्तुत किए जा सकते हैं । उस पर कोई भी संशोधन राज्यपाल की सिफारिश के बिना प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है । किन्तु राज्यपाल धन विधेयको को पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकता, बल्कि सामान्यतया वह उनको स्वीकृति दे देता है ।

(छ) संयुक्त अधिवेशन बुलाने का अधिकार- यदि किसी समय विधानमण्डल के दोनों सदनों के बीच कानून बनाने संबंधी किसी प्रश्न पर गत्यावरोध उत्पन्न हो जाता है तो राज्यपाल संयुक्त अधिवेशन बुला सकता है तथा संदेश भेज सकता है ।

(ज) विधेयक संबंधी अधिकार- अधिनियम का रूप धारण करने से पूर्व प्रत्येक विधेयक पर राज्यपाल की स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य हैं । उस समय तक कोई विधेयक अधिनियम नहीं बन सकता जब तक राज्यपाल उसको अपनी स्वीकृति प्रदान न कर दे । अत: विधानमण्डल द्वारा पारित प्रत्येक विधेयक को राज्यपाल के सम्मुख प्रस्तुत करना आवश्यक होता है । राज्यपाल को यह भी अधिकार है कि वह उस विधेयक को स्वीकृत करे या न करे उसे पुनर्विचार के लिए सदन को वापस भेज दे । पुनर्विचार के पश्चात दूसरी बार राज्यपाल को उस विधेयक पर अपनी स्वीकृति देनी ही पड़ती है । जिन विधेयकों को राज्यपाल राष्ट्रपति को विचारार्थ भेजता है, उन्हें स्वीकार करने या न करने का अधिकार राष्ट्रपति को है ।

राष्ट्रपति को यह भी अधिकार है कि वह उन विधेयकों को अपने सुझावों के साथ राज्य की विधानसभा को पुनर्विचार के लिए लौटा दे । इस प्रकार लौटाए हुए विधेयकों पर राज्य की विधानसभा को छ: माह के अन्दर विचार करना होगा । यदि यह विधेयक पुनः स्वीकृत हो जाएँ तो इन्हें फिर से राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाएगा । राष्ट्रपति को अधिकार है कि वह विधेयक पर स्वीकृति दे या न दे । अतः अप्रत्यक्ष रूप से राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेजकर समाप्त भी कर सकता है । कुछ विधेयक ऐसे भी है जिन्हें राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा जाना अनिवार्य हैं । यदि राज्यपाल की राय में किसी ऐसे विधेयक के स्वीकृत हो जाने से उच्च न्यायालय की शक्ति व स्थिति में कमी हो जाती है तो राज्यपाल के लिए अनिवार्य है कि वह उस विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ प्रेषित करे ।
इसके अतिरिक्त निम्नाकिंत विषयों से संबंधित विधेयकों को भी राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजना अनिवार्य हैं

(अ) जिन विधेयकों को उद्देश्य विद्युत शक्ति के वितरण पर कर लगाना हो ।
(ब) जिन विधेयकों को उद्देश्य व्यक्तिगत सम्पत्ति को राज्य द्वारा अनिवार्य रूप से हस्तगत करना हो ।
(स) जिन विधेयकों का संबंध ऐसी वस्तुओं के क्रय-विक्रय पर कर लगाने के साथ हो जिन्हें संघ की संसद ने अनिवार्य वस्तु घोषित कर दिया हो ।

(झ) अध्यादेश जारी करने का अधिकार- यदि राज्य में विधानमण्डल का अधिवेशन नहीं चल रहा हो तो राज्यपाल आवश्यकता पड़ने पर उन सभी विषयों पर अध्यादेश जारी कर सकता है जिन पर राज्य के विधानमण्डल को कानून बनाने का अधिकार है । ऐसे किसी अध्यादेश का प्रभाव वहीं होगा जो राज्य के विधानमण्डल द्वारा बनाए हुए किसी कानून का होता है । किन्तु इस प्रकार के अध्यादेश को विधानमण्डल के सम्मुख रखना पड़ता है और विधानमण्डल के अधिवेशन के आरंभ होने की तिथि से छ: सप्ताह बाद तक ही यह लागू रह सकता है । इससे पूर्व भी विधानसभा यदि चाहे तो इसे रद्द कर सकती है उन विषयों के बारे में जिनके संबंध में राष्ट्रपति की आज्ञा के बिना राज्य के विधानमण्डल में कोई विधेयक प्रस्तुत नहीं किया जा सकता, राज्यपाल राष्ट्रपति की अनुमति के बिना अध्यादेश जारी नहीं कर सकता है ।

(iii) वित्तीय शक्तियाँ- राज्यपाल को वित्तीय वर्ष के आरंभ में राज्य की उस वर्ष की अनुमानित आय-व्यय का विवरण (बजट) विधानमण्डल के सम्मुख प्रस्तुत करने का अधिकार है । उसकी संस्तुति के बिना किसी अनुदान की माँग स्वीकृत नहीं की जा सकती है और न ही कोई धन विधेयक उसकी संस्तुति के बिना विधानसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है । किन्तु किसी कर के घटाने के लिए प्रावधान करने वाले किसी संशोधन को उसकी संस्तुति की आवश्यकता नहीं होती है । राज्य की आकस्मिक निधि (Contingency Fund) उसके अधीन होती है, जिसमें से वह आकस्मिक व्यय के लिए विधानमण्डल की अनुमति के पूर्व भी धन दे सकता है ।

(iv) न्यायिक शक्तियाँ- संविधान के अनुच्छेद 161 के अनुसार राज्यपाल को यह अधिकार प्राप्त है कि वह उन अपराधों के लिए दण्ड पाए हुए व्यक्तियों के दण्ड को कम कर सकता है, स्थगित कर सकता है या पूर्णतया समाप्त कर सकता है जिसका संबंध राज्य के अधिक-क्षेत्र से है । मृत्यु दण्ड को क्षमा करने या कम करने का अधिकार उसे नहीं है । इसी प्रकार जिन अपराधों का संबंध संघ सरकार के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत हो, उनके विषय में भी राज्यपाल को कोई अधिकार नहीं है ।

(v) संकटकालीन अधिकार- राज्यपाल यदि यह अनुभव करता है कि राज्य पर कोई वैधानिक संकट या राज्य में आंतरिक शान्ति के भंग होने की संभावना है, तो वह राष्ट्रपति को इसकी तुरंत सूचना देता है । संकटकाल में वह राष्ट्रपति के आदेशानुसार शासन का समस्त भार अपने हाथ में ले सकता है । स्वविवेक से किए जाने वाले कार्य- कुछ कार्य ऐसे भी है जिन्हें राज्यपाल मंत्रिपरिषद् से सलाह लेने के बाद भी अपने विवेक से करता है । इस प्रकार के कार्यों को किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है । राज्यपाल किस विषय पर अपने विवेक से कार्य करेगा, इसका निर्णय भी वह स्वयं ही करता है । राष्ट्रपति शासन लागू करने के लिए राष्टपति को रिपोर्ट भेजना, कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति की अनुमति के लिए अपने पास रोक लेना आदि मामलों में राज्यपाल, मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद् से सलाह नहीं लेता है ।

राज्य की राजनीति में राज्यपाल की वास्तविक स्थिति या भूमिका- राज्यपाल की स्थिति या भूमिका के संबंध में सामान्य तौर पर दो परस्पर विरोधी दृष्टिकोण प्रचलित हैं । इनमें से प्रथम के अनुसार राज्यपाल को राज्य का केवल संवैधानिक अध्यक्ष माना गया है, लेकिन अध्यक्ष की अपेक्षा बहुत अधिक महत्वपूर्ण है । राज्यपाल की वास्तविक स्थिति समझने के लिए इन दोनों दृष्टिकोणों का अध्ययन उचित होगा ।

राज्यपाल संवैधानिक प्रधान के रूप में- संविधान द्वारा राज्यों में भी संघीय क्षेत्र के समान संसदीय शासन की व्यवस्था की गई है तथा संसदीय व्यवस्था में शासन की शक्तियाँ ऐसी मंत्रिपरिषद् में निहित होती है जो व्यवस्थापिका के निम्न सदन के प्रति उत्तरदायी हों । अत: मंत्रिपरिषद् राज्य की वास्तविक प्रधान है और राज्यपाल केवल एक संवैधानिक प्रधान । डा० अम्बेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि उन सिद्धान्तों के अनुसार, जिन पर राज्यों का शासन आधारित है, राज्यपाल को प्रत्येक कार्य में मंत्रिपरिषद् की सलाह अनिवार्य रूप से माननी होगी और ऐसा कोई भी अन्य कार्य नहीं करना होगा जिसके करने में उसे स्वविवेक या व्यक्तिगत निर्णय का प्रयोग करना पड़े । राज्यपाल को पूर्ण रूप से शक्तिहीन भी नहीं कहा जा सकता । वह शासन न करते हुए भी राज्य के विषयों में पर्याप्त प्रभाव रखता है ।

के०एम० मुंशी के मतानुसार- “ऐसा समय आ सकता है कि संकटकाल में मुख्यमंत्री विभिन्न दलों के बीच सामंजस्य स्थापित करने में विफल रहे, विशेष रूप से जब विधानमण्डल में अनेक दल हों । ऐसे समय में राज्यपाल से मंत्रियों को बहुत अधिक सहायता मिल सकती है । वे उससे सभी प्रकार की गुप्त सूचना व सलाह प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि उसका सम्पर्क सभी दलों से होता है । ”
इसके अतिरिक्त जब राज्यपाल स्वयं कोई कार्य नहीं करता और उसे मंत्रियों के निर्णय को अस्वीकार करने की कोई शक्ति प्राप्त नहीं होती, तो उसका यह नैतिक कर्त्तव्य हो जाता है कि वह महत्वपूर्ण विषयों पर मंत्रिपरिषद को सलाह दे । यह कार्य वह किसी दल के प्रतिनिधि के रूप में नहीं, वरन् सम्पूर्ण जनता के प्रतिनिधि के रूप में करता है ।

बी०जी० खेर ने संविधान सभा में कहा था- “एक अच्छा राज्यपाल बहुत लाभ पहुँचा सकता है और एक बुरा राज्यपाल दुष्टता भी कर सकता है, यद्यपि संविधान ने उसको बहुत कम शक्तियाँ दी हैं । ” केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में राज्यपाल की स्थिति- भारतीय संविधान ने राज्यपाल को दोहरी भूमिका प्रदान की है । एक ओर तो वह राज्य का प्रधान है तथा दूसरी ओर, वह राज्य में केन्द्र सरकार का प्रतिनिधि या एजेण्ट है । संविधान निर्माताओं की इच्छा भारत में एक ऐसी संघीय व्यवस्था स्थापित करने की थी, जो सहयोगी संघवाद की भावना पर आधारित हो और केन्द्र तथा राज्य में सद्भावनापूर्ण संबंध स्थापित हो सकें । इसके साथ ही प्रशासनिक एकरूपता और राष्ट्रीय एकता के लक्ष्य को भी प्राप्त किया जा सके । इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उन्होंने राज्यपाल के पद की व्यवस्था केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में की । इस संबंध में के० एम० मुंशी ने विधानसभा में कहा था- “राज्यपाल संवैधानिक औचित्य का प्रहरी तथा वह कड़ी है, जो राज्य को केन्द्र के साथ जोड़ते हुए भारत की एकता के लक्ष्य को प्राप्त करती है । ” केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में राज्यपाल निम्नलिखित कार्य करता है

(i) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 256 तथा 257 में कहा गया है कि केन्द्र सरकार राज्यों की कार्यपालिकाओं को आवश्यक निर्देश दे सकती है । केन्द्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों को राष्ट्रीय महत्व की सड़कों तथा संचार साधनों की रक्षा का दायित्व सौंपा जा सकता है तथा अनुच्छेद 258 के अन्तर्गत केन्द्र सरकार अपने कुछ प्रशासनिक कार्यों को भी राज्य सरकार को हस्तान्तरित कर सकती है । केन्द्र सरकार के द्वारा राज्य सरकार को इस प्रकार के निर्देश और आदेश राज्यपाल के माध्यम से ही दिए जाते हैं तथा राज्यपाल का यह कर्त्तव्य है कि वह देखे कि राज्य सरकार इन निर्देशों, आदेशों का पालन कर रही है अथवा नहीं ।

(ii)यदि राज्य का मन्त्रिमण्डल राज्यपाल को राष्ट्रपति के निर्देशों के विरुद्ध कार्य करने की सलाह देता है तो वह इस प्रकार की सलाह को अस्वीकार कर सकता है तथा राज्य सरकारों को राष्ट्रपति के निर्देश मानने के लिए बाध्य कर सकता है । केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में राज्यपाल का एक महत्वपूर्ण कार्य यह भी है कि वह राज्य के प्रशासन के संबंध में समय-समय पर राष्ट्रपति को रिपोर्ट देता रहे । इस रिपोर्ट में वह अपने सुझाव भी दे सकता है । राज्यपाल का सबसे प्रमुख कार्य यह देखना है कि राज्य सरकार संविधान के अनुसार कार्य कर रही है अथवा नहीं । यदि राज्य में संविधान के अनुरूप कार्य नहीं हो रहा है, तो राज्यपाल इस संबंध में राष्ट्रपति को रिपोर्ट देता है तथा इस रिपोर्ट के आधार पर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है । राज्यपाल राष्ट्रपति को ऐसी रिपोर्ट स्वविवेक से भेजता है । इस संबंध में वह राज्य मंत्रिमण्डल की सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं है ।

(iii) अनुच्छेद 200 के अनुसार- राज्य विधानमण्डल द्वारा पारित किए गए किसी विधेयक को राज्यपाल राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रख सकता है । उदाहरण के लिए सम्पत्ति के अनिवार्य अधिग्रहण अथवा उच्च न्यायालय की स्वीकृति की शक्तियों को कम करने से संबंधित विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रखे जाएँगे । राज्यपाल इस संबंध में स्वविवेक से ही कार्य करता है ।

(iv) अनुच्छेद 213 के अनुसार- राज्यपाल को अध्यादेश जारी करने का अधिकार दिया गया है, किन्तु उसको कुछ विषयों के संबंध में अध्यादेश जारी करने से पूर्व राष्ट्रपति से स्वीकृति लेनी होती है । इन सब कार्यों के अतिरिक्त केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में यह देखना है कि राज्य सरकार संकीर्ण प्रान्तीयतावाद को न अपनाकर समस्त संघ के हितों को ध्यान में रखे । तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने एक राज्यपाल सम्मेलन में कहा था- “संकीर्ण प्रान्तीयवाद पर विजय प्राप्त करने में राज्यपाल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है । “

2– किसी राज्य में राज्यपाल के पद का क्या महत्व है? राज्यपाल के पद को निष्पक्ष बनाने के लिए सुझाव दीजिए ।
उत्तर– – उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 1 के उत्तर में राज्य में राज्यपाल की भूमिका’ का अवलोकन कीजिए ।

3– राज्यपाल के कार्यों तथा शक्तियों की आलोचनात्मक विवेचना कीजिए ।
उत्तर– – राज्यपाल के कार्य-श्री दुर्गादास बसु और एम०सी० सीतलवाड़ ने अपनी रचनाओं में राज्यपाल के कुछ स्वविवेकी कार्यों
का उल्लेख किया है, जो इस प्रकार हैं
(i) मुख्यमंत्री की नियुक्ति- यदि राज्य की विधानसभा में किसी एक राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त है और बहुमत वाले राजनीतिक दल ने अपना नेता चुन लिया है, तो राज्यपाल के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह उसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद पर नियुक्त करे, लेकिन यदि राज्य की विधानसभा में दलीय स्थिति स्पष्ट नहीं है, या बहुमत वाले दल में नेता पद के लिए एक से अधिक दावेदार हैं, तो इस संबंध में राज्यपाल स्वविवेक का प्रयोग कर सकता है । ऐसी स्थिति में स्वयं राज्यपाल के द्वारा ही निर्णय किया जाएगा कि किस व्यक्ति के नेतृत्व में स्थायी सरकार का गठन हो सकता है । यही राज्यपाल का प्रथम कार्य होता है । मंत्रीमण्डल को भंग करना- राज्यपाल को यह भी स्वविवेक शक्ति प्राप्त है कि वह मंत्रिपरिषद् को अपदस्थ कर राष्ट्रपति से सिफारिश करे कि संबंधित राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया जाए । राज्यपाल निम्नलिखित परिस्थितियों में मंत्रिमण्डल को भंग कर सकता हैं
(क) यदि राज्यपाल को विश्वास हो जाए कि मंत्रिमण्डल का विधानसभा में बहुमत समाप्त हो गया है तो राज्यपाल
मुख्यमंत्री को त्याग-पत्र देने अथवा विधानसभा का अधिवेशन बुलाकर अपना बहुमत साबित करने के लिए कह सकता है । ऐसी स्थिति में यदि मुख्यमंत्री अधिवेशन बुलाने के लिए तैयार न हो तो राज्यपाल मंत्रिमण्डल को
पदच्युत कर सकता है ।
(ख) यदि किसी मंत्रीमण्डल के प्रति विधानसभा में अविश्वास का प्रस्ताव पारित हो जाने पर मंत्रीमण्डल त्यागपत्र न दे
तो राज्यपाल उसे पदच्युत कर सकता है ।
(ग) यदि मंत्रिमण्डल संविधान के अनुसार कार्य न कर रहा हो या उसकी नीतियों में राज्य या देश को खतरा हो या उसके द्वारा केन्द्र और राज्य के संघर्ष की स्थिति को जन्म दिया जा रहा हो तब भी मंत्रिमण्डल को पदच्युत किया जा सकता है ।
(घ) यदि स्वतंत्र ट्रिब्युनल द्वारा मुख्यमंत्री को भ्रष्टाचार के आरोपों में दोषी घोषित किया गया हो तो राज्यपाल उसे पदच्युत कर सकता है । श्री एम० वी० पायली लिखते हैं कि, “यद्यपि वे सामान्य परिस्थितियाँ नहीं है फिर भी एक ऐसे देश में जहाँ लोकतांत्रिक संस्थाएँ अभी विकास की ही अवस्था में है और कुछ भागों में प्रादेशिक, भाषागत तथा अन्य विघटनकारी निष्ठाएँ जोर पकड़े हुए हैं, इस प्रकार की आकस्मिक घटनाओं की संभावना विरल नहीं है और अवसर पर उपस्थित एकमात्र ऐसा व्यक्ति राज्यपाल ही है जो संपूर्ण स्थिति को समझकर उचित कार्यवाही, जिसमें
मंत्रीमण्डल को पदच्युत भी सम्मिलित है, कर सकता है । ” विधानसभा का अधिवेशन बुलाना- सामान्य रूप से राज्यपाल मुख्यमंत्री के परामर्श पर विधानसभा का अधिवेशन बुलाता है, किन्तु असाधारण परिस्थितियों में राज्यपाल स्वविवेक से भी विधानसभा का अधिवेशन बुला सकता है । यदि राज्यपाल के अनुसार कुछ ऐसे महत्वपूर्ण मामले हैं जिन पर तुरंत विचार किया जाना चाहिए, तो अनुच्छेद 174 के अंतर्गत वह विधानमण्डल के अधिवेशन की कोई भी तिथि निर्धारित कर सकता है । इस संबंध में वह मुख्यमंत्री के परामर्श को मानने के लिए विवश है, चाहे मुख्यमंत्री को विधानसभा का बहुमत का समर्थन प्राप्त हो । श्री संथानम और अन्य कुछ विद्वानों के द्वारा ऐसा ही विचार व्यक्त किया गया है । इसके अतिरिक्त यदि राज्यपाल को मुख्यमंत्री के बहुमत में सन्देह हो जाए तो वह मुख्यमंत्री को शीघ्र अधिवेशन बुलाने के लिए कह सकता है और मुख्यमंत्री द्वारा उसके परामर्श को स्वीकार न किए जाने पर वह स्वयं अधिवेशन बुला सकता है ।

डा० एल०एम० सिंघवी के अनुसार, “मंत्रिमण्डल को बहुमत की जाँच करना वह अपना ऐसा स्वविवेक अधिकार समझ सकता है जिसके लिए वह मंत्रिमण्डल के परामर्श के विपरीत भी अपनी इच्छानुसार विधानसभा का अधिवेशन बुला सकता है । ” विधानमण्डल को भंग करना- उत्तरदायी शासन की धारणा के अनुसार सामान्यतया यह माना जाता है कि विधानसभा को भंग करने का कार्य राज्यपाल उसी समय करेगा, जब मुख्यमंत्री उन्हें ऐसा करने के लिए परामर्श दे, लेकिन विशेष परिस्थितियों में राज्यपाल विधानसभा भंग करने के संबंध में मुख्यमंत्री के परामर्श को मानने से इंकार कर सकता है, अथवा मुख्यमंत्री के परामर्श के बगैर ही विधानसभा भंग कर सकता है । ऐसे उदाहरण हैं जिनमें इस संबंध में राज्यपाल ने अपने ही विवेक से कार्य किया । उपर्युक्त बातों से यह बिलकुल स्पष्ट है कि, “यद्यपि राज्यपाल को राज्य की कार्यपालिका का वास्तविक प्रधान नहीं कहा जा सकता, लेकिन इसके साथ ही वह केवल नाममात्र का अध्यक्ष नहीं है । वह एक ऐसा अधिकारी है जो राज्य के शासन में महत्वपूर्ण रूप से भाग ले सकता है । राज्यपाल केंद्रीय सरकार के प्रतिनिधि के रूप में- भारतीय संविधान के अन्तर्गत राज्यपाल की दोहरी भूमिका है

(i) वह राज्य में संघीय सरकार का अभिकर्ता या प्रतिनिधि है ।
(ii) वह राज्य का प्रधान है । संविधान- निर्माता भारत में एक ऐसी संघीय व्यवस्था स्थापित करना चाहते थे जिससे ‘सहयोगी संघवाद’ धारणा के आधार पर केन्द्र और राज्य में सद्भावनापूर्ण संबंध कायम हो सकें और प्रशासनिक एकरूपता तथा राष्ट्रीय एकता के लक्ष्य को प्राप्त कर किया जा सके और उनके द्वारा राज्यपाल के पद की व्यवस्था इस लक्ष्य की पूर्ति के एक साधन के रूप में की गई है । श्री के०एम० मुंशी ने विधानसभा में कहा था, “राज्यपाल संवैधानिक औचित्य का प्रहरी और वह कड़ी है जो राज्य को केंद्र के साथ जोड़ते हुए भारत की एकता के लक्ष्य को प्राप्त करती है । ‘

4– राज्यों के शासन में राज्यपाल की स्थिति एवं महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालिए ।
उत्तर– – उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

5– उत्तर प्रदेश में राज्यपाल की भूमिका पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर– – उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
6– “राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रधान है । ” इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए ।
उत्तर– – उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या- 3 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

7– मुख्यमंत्री की नियुक्ति कैसे होती है? इसकी प्रमुख शक्तियों और कार्यों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर– – केंद्रीय मंत्रिपरिषद में जो स्थिति प्रधानमंत्री की होती है, वही राज्य की मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री की होती है । मुख्यमंत्री राज्य की मंत्रिपरिषद् का प्रधान होता है । संविधान के अनुच्छेद 164(1) में कहा गया है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्य का राज्यपाल करेगा । विधानसभा में जिस राजनीतिक दल को बहुमत प्राप्त होता है, उसी दल के नेता को राज्यपाल मुख्यमंत्री नियुक्त करता है । यदि कभी ऐसी स्थिति आती है कि किसी एक दल का स्पष्ट बहुमत नहीं होता है, तो राज्यपाल स्वविवेक का प्रयोग करते हुए किसी भी ऐसे दल के नेता को मुख्यमंत्री बना देता है, जो बहुमत प्राप्त करने में सक्षम हो । इसके पश्चात वह मुख्यमंत्री के परामर्श से अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है । मुख्यमंत्री के कार्य तथाशक्तियाँ- मुख्यमंत्री के कार्य एवं शक्तियाँ निम्नलिखित हैं
(i) मंत्रिपरिषद् का गठन- मुख्यमंत्री का सर्वप्रथम तथा अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य मंत्रिपरिषद् का गठन करना होता है । मुख्यमंत्री मंत्रियों का चयन कर उसकी सूची राज्यपाल को प्रेषित करता है, जिसे राज्यपाल स्वीकार कर लेता है । मुख्यमंत्री की इच्छा के विरुद्ध सामान्यतया राज्यपाल किसी को भी मंत्री नियुक्त नहीं कर सकता है ।
(ii) नियुक्ति संबंधी अधिकार- राज्यपाल को अनेक उच्च पदाधिकारियों, जैसे महाधिवक्ता और लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष को नियुक्त करने का अधिकार होता है, किन्तु इन पदों पर नियुक्तियाँ राज्यपाल प्रायः मुख्यमंत्री के परामर्श से ही करता है । (ii) मंत्रियों के विभागों का वितरण- मुख्यमंत्री ही अन्य मंत्रियों के बीच विभागों और राज्य के अन्य कार्यों का वितरण करता है । वह चाहे तो अपने लिए कुछ अन्य मंत्रालयों का कार्यभार भी संरक्षित कर सकता है ।

(iv) मंत्रिपरिषद्का सभापति- मुख्यमंत्री मंत्रिपरिषद् का अध्यक्ष होता है । वह मंत्रिपरिषद् के बैठकों की अध्यक्षता करता है । इस प्रकार मुख्यमंत्री का मंत्रिपरिषद् पर पूरा नियंत्रण रहता है ।
(v) नीति-निर्धारण का अधिकार- व्यावहारिक रूप में मुख्यमंत्री राज्य के शासन की वास्तविक नीति निर्धारित करता है ।
(vi) राज्यपाल का परामर्शदाता- मुख्यमंत्री ही राज्यपाल का प्रमुख परामर्शदाता है और वही राज्यपाल को विधानसभा भंग
करने का परामर्श दे सकता है । वहीं मंत्रिपरिषद् के निर्णयों से उसे अवगत भी कराता है और राज्यपाल की आज्ञाओं एवं संदेशों को अन्य मंत्रियों तक पहुँचाता है । इस प्रकार वह राज्यपाल और मंत्रिपरिषद् के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य
करता है ।
(vii) शासन के विभिन्न विभागों में समन्वय- मुख्यमंत्री इस बात का प्रयत्न करता है कि शासन के सभी विभागों में समन्वय बना रहे अर्थात् शासन के सभी विभाग एक इकाई के रूप में कार्य करें ।

(viii) शासन-व्यवस्था का संचालक-संवैधानिक दृष्टि से राज्य का अध्यक्ष राज्यपाल होता है किन्तु व्यावहारिक रूप से राज्य के शासन का अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है । वही अपने मंत्रियों के बीच विभागों को बँटवारा करता है, उन पर नियंत्रण रखता है तथा विभागों के बीच मतभेद होने की स्थिति में उनमें आपस में समझौता करवाता है । मंत्रियों को सभी महत्वपूर्ण विषयों में उससे परामर्श आवश्यक रूप से लेना होता है । इस प्रकार मुख्यमंत्री कार्यपालिका का वास्तविक प्रमुख होता है । विधानसभा का नेता- मुख्यमंत्री का व्यक्तित्व दोहरा है । एक ओर तो वह शासन का प्रधान होता है तथा दूसरी ओर वह विधानसभा का नेता भी होता है । विधानसभा के नेता के रूप में उसे कानून बनाने के क्षेत्र में महत्वपूर्ण शक्तियाँ प्राप्त होती हैं । उसके परामर्श से ही विधानमण्डल के अधिवेशन बुलाए जाते हैं ।

(x) सरकार का प्रमुख प्रवक्ता- मुख्यमंत्री राज्य सरकार का प्रमुख प्रवक्ता होता है । राज्य सरकार की ओर से अधिकृत घोषणाएँ मुख्यमंत्री द्वारा ही की जाती है ।

8– मुख्यमंत्री की शक्तियों एवं महत्व का संक्षेप में वर्णन कीजिए । अथवा मुख्यमंत्री के कार्यों एवं शक्तियों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर– – मुख्यमंत्री की शक्तियाँएवं कार्य- इससे लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-7 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
मुख्यमंत्री का महत्व अथव वा भूमिका तथा स्थिति-प्रान्तीय प्रशासन में मुख्यमंत्री की भूमिका तथा स्थिति का वर्णन हम निम्नलिखित आधारों पर कर सकते हैं
(i) प्रशासनिक स्थिति- वास्तव में प्रान्तीय प्रशासन का मुख्य सूत्रधार मुखिया तथा संचालनकर्ता मुख्यमंत्री ही होता है । कोई भी महत्वपूर्ण कार्य उसके बिना सम्पादित नहीं किया जा सकता और न कोई महत्वपूर्ण निर्णय ही लिया जा सकता है । वह प्रशासन पर नियन्त्रण, निर्देशन की सर्वोच्च शक्ति रखता है । प्रान्त के सभी महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियाँ उसी के द्वारा होती हैं । व्यवहार में प्रान्तीय प्रधानों का मुखिया वही है ।

(ii) विधायी शक्तियाँ-विधि निर्माण में भी वह निर्णायक भूमिका निभाता है । प्रान्तीय तथा प्रशासन की सक्षम एवं प्रभावशाली
बनाने के लिए वह विधियों के निर्माण तथा उसके क्रियान्वयन में प्रभावशाली भूमिका प्रदान करता है । जब तक सदन में
उसका बहुमत होता है वह मनचाही विधियाँ पारित करा सकता है । विधि निर्माण कार्य वास्तव में आज मंत्रिपरिषद् ही
करती है और उसमें मुख्यमंत्री की महत्वपूर्ण स्थिति होती है ।

(iii) न्यायिक तथा वित्तीय स्थिति- उसकी न्यायिक तथा वित्तीय स्थिति भी अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है । वित्तीय प्रशासन पर नियन्त्रण तथा निर्देशन कार्य उसी का होता है । बजट निर्माण तथा विधानसभा में प्रस्तुत करने में उसकी प्रभावशाली भूमिका रहती है । प्रमुख वित्तीय नीतियों की घोषणा वहीं करता है । राज्य के द्वारा न्यायिक क्षेत्र में जो भी कार्य किए जाते हैं, वास्तव में मुख्यमंत्री द्वारा ही किये जाते हैं ।

(iv) जन-प्रतिनिधि के रूप में-जन प्रतिनिधि के रूप में भी प्रान्तीय प्रशासन में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है । जनता की भलाई हेतु वह सार्वजनिक घोषनाएँ, कल्याणकारी नीतियों का सम्पादन तथा प्रादेशिक विकास के कार्यक्रमों की घोषणा करता है । वह प्रशासन को इस घोषणाओं के कार्यान्वयन के लिए निर्देशित करता है तथा लोगों का विश्वास अपने नेता पर होता है । इसी रूप में जनता का विश्वास तथा सहयोग प्राप्त होता है ।

9– उत्तर प्रदेश के प्रशासन में मुख्यमंत्री की भूमिका का वर्णन कीजिए तथा राज्यपाल के साथ उसके संबंधों की विवेचना कीजिए ।

उत्तर– – राज्य प्रशासन में मुख्यमंत्री की भूमिका- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-8 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
मुख्यमंत्री तथा राज्यपाल के संबंध-निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर मुख्यमंत्री और राज्यपाल के संबंधों का निर्धारण किया जा सकता है
(i) राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की नियुक्ति होती है ।
(ii) यदि राज्य का शासन संविधान के अनुरूप नहीं चल रहा होता है तो राज्यपाल की रिपोर्ट पर राष्ट्रपति राज्य मंत्रिपरिषद् को भंग कर सकता है ।
(iii) मुख्यमंत्री के परामर्श पर मंत्रिपरिषद् के अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा होती है ।
(iv) मुख्यमंत्री के परामर्श पर राज्यपाल विधानसभा को भंग कर सकता है ।
(v) मुख्यमंत्री राज्यपाल का प्रमुख परामर्शदाता होता है ।

मुख्यमंत्री के कार्यों के विवरण के आधार पर राज्य के प्रशासन में मुख्यमंत्री की स्थिति स्पष्ट हो जाती है । मुख्यमंत्री राज्यपाल एवं मंत्रिपरिषद् के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करता है । वह राज्यपाल को मंत्रिपरिषद् के निर्णयों के संबंध में सूचना देता है । वास्तव में, मंत्रिपरिषद् का अध्यक्ष होने के नाते संविधान ने उसका यह कर्त्तव्य निश्चित किया है कि वह राज्यपाल को न केवल मंत्रिपरिषद् के निर्णयों के संबंध में सूचना देगा अपितु उसे शासन और विधान संबंधी सुझावों के संबंध में भी सूचित करेगा उसे राज्यपाल के कहने पर किसी भी ऐसे मामले को, जिस पर मंत्रिपरिषद् ने विचार न किया हो मंत्रिपरिषद् के समक्ष प्रस्तुत करना होता है । इस प्रकार राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच घनिष्ठ संबंध होता है ।

10– उत्तर प्रदेश राज्य के मंत्रिपरिषद् और राज्यपाल के संबंधों का विवेचन कीजिए ।
उत्तर– – मंत्रिपरिषद् और राज्यपाल में संबंध- संविधान (अनुच्छेद 163) राज्यपाल को परामर्श देने के लिए एक परिषद् की
व्यवस्था करता है । इसे मंत्रिपरिषद् कहा गया है । मुख्यमंत्री इस परिषद् का अध्यक्ष होता है । मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करता है तथा मुख्यमंत्री के परामर्श पर वह अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है । संवैधानिक शब्दों में, मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद् के सदस्य राज्यपाल के प्रसाद-पर्यन्त ही पदासीन रह सकते हैं । सामान्यत मंत्रिपरिषद् के समस्त सदस्य राज्य विधानमण्डल के सदस्य होते हैं । यद्यपि संविधान के अनुच्छेद 163 में मंत्रिपरिषद् का कार्य राज्यपाल को सहायता और परामर्श देना ही उल्लिखित किया गया है, परन्तु वास्तविक स्थिति इसके विपरित है । संविधान द्वारा ‘राज्यपाल को राज्य के शासन के संबंध में जो शक्तियाँ प्रदान की गई हैं, व्यवहार में उन सबका उपयोग मंत्रिपरिषद् के द्वारा ही किया जाता है । मंत्रिपरिषद् शासन संबंधी सभी महत्वपूर्ण निर्णय लेती है और मुख्यमंत्री इन निर्णयों से राज्यपाल को सूचित करता है । अतः राज्य कार्यपालिका शक्ति मंत्रीपरिषद् में निहित है ।

राज्य के शासन का संपूर्ण उत्तरदायित्व मंत्रीमण्डल का होता है । यह राज्य के शासन की नीति-निर्धारण करता है । राज्य में शांति व्यवस्था बनाए रखना, विकास हेतु योजनाएँ बनाना और उन्हें क्रियान्वित करने के अतिरिक्त, संघीय सरकार के आदेशों और योजनाओं को क्रियान्वित करना भी मंत्रिमण्डल का ही कर्त्तव्य है । इस प्रकार राज्यपाल को प्राप्त प्रशासकीय शक्तियों का वास्तविक प्रयोग मंत्रिपरिषद की करती है । इस प्रकार राज्यपाल नाममात्र का कार्यकारी और मन्त्रिपरिषद् वास्तविक कार्यपालिका है । सामान्यत परिस्थितियों में राज्यपाल से मंत्रियों की मन्त्रणा के आधार पर ही कार्य करने की अपेक्षा की जाती है । अनुच्छेद 167 के अनुसार राज्य के मुख्यमंत्री का कर्तव्य है कि राज्य के प्रशासन से संबंधित मंत्रिपरिषद् के निर्णयों की सूचना राज्यपाल को दे । कुछ परिस्थितियों में राज्यपाल मंत्रीपरिषद् के परामर्श के बिना भी कार्य कर सकता है । जैसे- राज्य में संवैधानिक तन्त्र के विफल होने पर राज्यपाल मंत्रिपरिषद् को कुछ परिस्थितियों में बर्खास्त कर सकेगा ।

11– राज्य मंत्रिपरिषद्का गठन कैसे होता है? राज्यपाल और मंत्रिपरिषद्के पारस्परिक संबंधों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर– – राज्य मंत्रिपरिषद् का गठन- भारतीय संविधान द्वारा संघ की भाँति इकाई राज्यों में भी संसदात्मक शासन-प्रणाली स्थापित की गई हैं । इस प्रकार राज्यों में भी वास्तविक कार्यपालिका शक्ति मंत्रिपरिषद् में ही निहित होती है ।
संविधान के अनुच्छेद 163 के अनुसार- “उन बातों को छोड़कर जिनमें राज्यपाल स्वविवेक से कार्य करता है, अन्य कार्यों को करने में उसकी सहायतार्थ एवं परामर्श हेतु एक मंत्रिपरिषद् होगी जिसका अध्यक्ष मुख्यमंत्री होगा । ”
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि मंत्रिपरिषद् जो भी परामर्श राज्यपाल को देती है उसकी जाँच करने का अधिकार किसी भी न्यायालय को नहीं है ।
(i) मंत्रियों की नियक्ति- राज्यपाल विधानसभा के बहुमत प्राप्त दल के नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है । यदि किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता है तो राज्यपाल ऐसे दल के व्यक्ति को मुख्यमंत्री नियुक्त करता है जो बहुमत प्राप्त करने में सक्षम हो सके । तत्पश्चात् उसके परामर्श से वह मंत्रिपरिषद् के अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है ।
(ii) मंत्रियों की योग्यताएँ- मंत्री बनने के लिए संविधान में किसी विशेष योग्यता का उल्लेख नहीं है, मंत्री बनने के लिए उन्हें केवल विधानमण्डल के किसी सदन का सदस्य होना आवश्यक है । यदि किसी मंत्री को मुख्यमंत्री के परामर्श से राज्यपाल ने मंत्री नियुक्त कर दिया है और वह किसी भी सदन का सदस्य नहीं है तो उसे छ: माह की अवधि में किसी भी सदन की सदस्यता ग्रहण करनी होगी अन्यथा उसे अपना पद त्यागना पड़ेगा ।

(iii) मंत्रिपरिषद् की कार्यावधि- संविधान के अनुसार मंत्रिपरिषद् अपने पद पर उस समय तक ही कार्यरत रहेगी, जब तक राज्यपाल की इच्छा होगी किन्तु व्यवहार में मंत्रिपरिषद् उस समय तक कार्यरत रहती है जब तक विधानसभा में उसका बहुमत और विश्वास बना रहता है । सामान्य रूप से मंत्रिपरिषद् का कार्यकाल विधानसभा के कार्यकाल के समान 5 वर्ष ही है ।

(iv) सामूहिक उत्तरदायित्व- मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है अतः किसी एक मंत्री के विभाग की आलोचना सब मंत्रियों के विभागों की आलोचना समझी जाती है । इस प्रकार नीति संबंधी मामलों में भी मंत्रिपरिषद् का सामूहिक उत्तरदायित्व होता है ।

(v) शपथ ग्रहण- प्रत्येक मंत्री को मंत्री पद ग्रहण करने के लिए राज्यपाल के समक्ष अपने पद के प्रति निष्ठा एवं मंत्रिपरिषद् के कार्यों को गुप्त रखने की शपथ लेनी होती है ।
(vi) मंत्रियों के वेतन और भत्ते- मंत्रियों के वेतन एवं भत्ते राज्य के विधानमण्डल द्वारा निश्चित किए जाते हैं । अतः भारतीय
संघ के विभिन्न राज्यों में इस संबंध में अन्तर है ।

(vii) मंत्रियों की संख्या एवं कार्य विभाजन- 91 वें संविधान संशोधन (2003 ई०) के अनुपालन में अब मंत्रियों की संख्या पर अंकुश लगा दिया गया है । यह संख्या विधानसभा के कुलसदस्यों की संख्या का 15 प्रतिशत होगी । सिक्किम, मिजोरम जैसे छोटे राज्यों में तो यह संख्या 12 से अधिक नहीं होगी । जहाँ तक मंत्रियों के बीच विभागों के बँटवारे का प्रश्न है, मुख्यमंत्री को यह अधिकार प्राप्त है कि वह अपनी इच्छानुसार मंत्रियों के बीच विभाग बाँट दें । राज्य के मंत्रिपरिषद् में भी तीन स्तर के मंत्री होते हैं- कैबिनेट स्तर के मंत्री, राज्यमंत्री और उपमंत्री ।

12– राज्य में मंत्रिपरिषद् की शक्तियों का वर्णन करते हुए राज्य सरकार में मुख्यमंत्री की स्थिति स्पष्ट कीजिए । उत्तर– – राज्य मंत्रिपरिषद् की शक्तियाँएवं कर्त्तव्य- मंत्रिपरिषद् की शक्तियों एवं कर्तव्य निम्नलिखित हैं

(i) शासन की नीति निर्धारित करना अथवा प्रशासनिक शक्तियाँ- राज्य के शासन का संपूर्ण उत्तरदायित्व मंत्रिमण्डल का होता है । यह राज्य के शासन की नीति-निर्धारित करता है । राज्य में शांति व्यवस्था बनाए रखना, विकास हेतु योजनाएँ बनाना और उन्हें क्रियान्वित करने के अतिरिक्त, संघीय सरकार के आदेशों और योजनाओं को क्रियान्वित करना भी मंत्रिमण्डल का ही कार्य है । राज्य की समस्याओं का समाधान करना भी मंत्रिमण्डल का ही कर्तव्य है । इस प्रकार राज्यपाल को प्राप्त प्रशासकीय शक्तियों का वास्तविक प्रयोग मंत्रिपरिषद् ही करती है ।

(ii) विधायी शक्तियाँ- संसदीय शासन-प्रणाली में विधानमण्डल घनिष्ठ रूप से संबंधित होने के कारण राज्य के समस्त कानून मंत्रिमण्डल द्वारा ही बनाये जाते हैं । जिन विषयों पर कानून बनाने की शक्ति राज्य विधानमण्डल को प्राप्त है, उन विधेयकों का प्रारूप मंत्रिमण्डल द्वारा ही तैयार किया जाता है और किसी मंत्री द्वारा उसे विधानमण्डल में प्रस्तुत किया जाता है । विधानमण्डल में मंत्रिमण्डल के दल का बहुमत होने के कारण सामान्यतया विधेयक विधानमण्डल द्वारा पारित कर दिए जाते हैं ।

(iii) वित्तीय शक्तियाँ- राज्य के लिए वित्तीय नीति का निर्धारण और उसका क्रियान्वयन मंत्रिमण्डल द्वारा ही किया जाता है । कर लगाना, करों की दर निर्धारित करना, करों को समाप्त करना, वित्तीय विनियोग को कम या अधिक करना । आदि राज्य मंत्रिमण्डल के ही कार्य हैं । वित्तीय वर्ष के आरम्भ के पूर्व में राज्य का वार्षिक बजट वित्तमंत्री द्वारा विधानसभा में प्रस्तुत किया है लेकिन यह बजट मंत्रिमण्डल द्वारा निश्चित की गई नीति के आधार पर ही तैयार किया जाता है । बजट को पारित कराने का उत्तरदायित्व मंत्रिपरिषद् का होता है ।

(iv) न्यायिक शक्तियाँ- संविधान द्वारा राज्यपाल को जो क्षमादान एवं अन्य न्याय संबंधी शक्तियाँ प्रदान की गई हैं, उसका प्रयोग वह मंत्रिमंडल के परामर्श से ही करता है । राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति
संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श लेता है । राष्ट्रपति को दिए जाने वाले परामर्श के लिए भी राज्यपाल मंत्रिपरिषद् का परामर्श लेता है ।

(v) उच्च पदों पर नियुक्ति के संबंध में राज्यपाल को परामर्श- संविधान के अनुसार राज्यपाल को राज्य के जिन उच्च पदाधिकारियों की नियुक्ति की शक्ति प्राप्त हैं, उनकी नियुक्ति का वास्तविक निर्णय मंत्रिपरिषद् द्वारा ही किया जाता है । केवल औपचारिक रूप से ही ये नियुक्तियाँ राज्यपाल द्वारा की जाती हैं व्यवहार में राज्य के महाधिवक्ता; लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों एवं अन्य पदाधिकारियों की नियुक्ति का निर्णय मंत्रिपरिषद् द्वारा ही लिया जाता है । विधानमण्डल में शासन का प्रतिनिधित्व- विधानमण्डल की बैठकों में मंत्रीगण शासन का प्रतिनिधित्व करते हैं । मंत्रिगण विधानपरिषद् में उपस्थित होकर सदस्यों के प्रश्नों तथा आलोचनाओं का उत्तर देते हैं और शासन की नीति का समर्थन करते हैं ।
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचना से स्पष्ट है कि मंत्रिपरिषद् राज्य के प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है ।

राज्य सरकार में मुख्यमंत्री की स्थिति- स्वतंत्र भारत की राजनीति में मुख्यमंत्रियों की स्थिति परिवर्तनशील रही है । अनेक राज्यों के कुछ मुख्यमंत्री तो बहुत प्रभावशाली और शक्तिशाली रहे हैं और उन्हें ‘किंग मेकर्स’ की संज्ञा दी गई हैं । कुछ मुख्यमंत्री ऐसे भी हुए हैं, जिनका व्यक्तित्व तथा कार्यप्रणाली विवादास्पद रही है और उनके विरुद्ध जाँच आयोग भी बिठाए गए है । कुछ मुख्यमंत्रियों ने अपने घटक दलों के बलबूते पर अपना पद कायम रखा है । कुछ मुख्यमंत्रियों को केन्द्र सरकार का पिछलगू भी माना गया है । कुछ मुख्यमंत्रियों की गणना कठपुतली मुख्यमंत्री के रूप में की जाती है । सी०पी० भाम्भरी ने इन्हें ‘पोस्टमैन’ की संज्ञा दी है । वास्तव में, सत्ता की राजनीति में मुख्यमंत्री की स्थिति परिवर्तनशील होती है । साठ और सत्तर के दशक में मुख्यमंत्री राज्य की शक्ति के स्तम्भ समझे जाते थे, किन्तु इसके बाद मुख्यमंत्री पद की गरिमा निरन्तर घटती गई और आज मिली-जुली सरकारों के युग में तो मुख्यमंत्री को स्वयं अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए दाँव-पेंच से काम लेना पड़ता है ।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top