Up Board Class 12th Civics Chapter 3 Liberty and Equality स्वतन्त्रता एवं समानता

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UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 1 Principles of Origin of State
 पाठ - ३ स्वतन्त्रता एवं समानता (Liberty and Equality)

लघु उत्तरीय प्रश्न स्वतन्त्रता एवं समानता


1– स्वतंत्रता का महत्व बताइए ।

उत्तर — मनुष्य का सम्पूर्ण सामाजिक, आर्थिक, नैतिकता, राजनीतिक तथा मानसिक विकास स्वतंत्रता के वातावरण में ही सम्भव है । स्वतंत्रता मानव जीवन का मूल आधार है । स्वतंत्रता के अत्यधिक महत्व के कारण ही विभिन्न देशों में लाखों व्यक्तियों ने इसकी रक्षार्थ हेतु अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया । स्वतंत्रता समाज और राष्ट्र की प्रगति के लिए आवश्यक है । स्वतंत्रता के महत्व को निम्नलिखित प्रकार से समझा जा सकता है
(i) स्वतंत्रता अधिकार दिलाने में आवश्यक है ।
(ii) स्वतंत्रता आर्थिक प्रगति में सहायक है ।
(iii) स्वतंत्रता नैतिक गुणों के विकास में सहायक है ।
(iv) स्वतंत्रता व्यक्तित्व के विकास में सहायक है ।
(v) स्वतंत्रता समाज एवं राष्ट्र की प्रगति में सहायक है ।
(vi) स्वतंत्रता राष्ट्रीय सम्मान में सहायक है ।

2– स्वतंत्रता कितने प्रकार की होती है? संक्षेप में वर्णन कीजिए ।
उत्तर — स्वतंत्रता का प्रयोग हम विभिन्न अर्थों में करते हैं । अत: इसके अनेक प्रकार हैं, जिनमें निम्नलिखित प्रमुख हैं
(i) प्राकृतिक स्वतंत्रता
(ii) नागरिक स्वतंत्रता
(iii) राजनीतिक स्वतंत्रता
(iv) आर्थिक स्वतंत्रता
(v) व्यक्तिगत स्वतंत्रता
(vi) धार्मिक स्वतंत्रता
(vii) सामाजिक स्वतंत्रता
(viii) नैतिक स्वतंत्रता
(ix) राष्ट्रीय स्वतंत्रता

3– “स्वतंत्रता उचित प्रबन्धों की व्यवस्था है ।”विवेचना कीजिए ।
उत्तर — स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ मानव के मूल अधिकारों की सुरक्षा तथा ऐसे नियंत्रण का अभाव है जो मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास में बाधक हो । नकारात्मक रूप से स्वतंत्रता का अर्थ अनुचित प्रबन्धों को हटाने से है तथा सकारात्मक रूप से इसका अर्थ उन सुविधाओं व प्रबन्धों को प्रस्तुत करने से है, जिनकी व्यवस्था से मानव के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास होता है । मानव अधिकारों की सुरक्षा में ही स्वतंत्रता की रक्षा निहित है । राज्य की शान्ति, बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा आदि कार्यों के अतिरिक्त व्यक्तियों की उचित व्यवस्था ही वास्तविक स्वतंत्रता है, जो मनुष्य की उन्नति में सहायक है ।

4– समानता के विभिन्न प्रकारों को स्पष्ट कीजिए । कौन-सा अधिक महत्वपूर्ण है?
उत्तर — समानता के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित हैं
(i) प्राकृतिक समानता
(ii) सामाजिक समानता
(iii) सांस्कृतिक एवं शिक्षा संबंधी समानता
(iv) नागरिक समानता
(v) धार्मिक समानता
(vi) आर्थिक समानता
(vii) राजनीतिक समानता
प्रजातंत्र में राजनीतिक समानता अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह प्रजातंत्र की आधारशिला है ।

5– स्वतंत्रता और समानता का संबंध स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर — स्वतंत्रता एवं समानता के आपसी संबंधों के संदर्भ में विभिन्न विद्वानों के अलग-अलग विचार हैं । कुछ विद्वानों के अनुसार स्वतंत्रता एवं समानता परस्पर विरोधी हैं तथा समानता स्थापित करने के लिए किए गए प्रयासों के द्वारा स्वतंत्रता नष्ट होती है । दूसरी और अन्य विद्वानों का मत है कि स्वतंत्रता तथा समानता एक-दूसरे की सहयोगी हैं । इनको एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है । दोनों मतों को निम्न प्रकार से प्रकट किया जा सकता है


(i) स्वतंत्रता तथा समानता परस्पर विरोधी हैं- इस मत के समर्थक इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क देते हैं
(क) समान स्वतंत्रता का सिद्धान्त गलत है । (ख) प्रकृति ने सभी मानवों को समान नहीं बनाया है ।
(ग) आर्थिक स्वतंत्रता एवं समानता विरोधी हैं ।
(घ) योग्य व्यक्तियों को अपनी क्षमता प्रदर्शित करने का अवसर नहीं मिलता है ।
(ii) स्वतंत्रता तथा समानता परस्पर पूरक हैं- इस मत के समर्थन में निम्न तर्क प्रस्तुत किए जा सकते हैं
(क) नागरिक स्वतंत्रता हेतु कानून के समक्ष समानता आवश्यक है ।
(ख) दोनों का उद्देश्य समान है ।
(ग) स्वतंत्रता के उपभोग हेतु समानता आवश्यक है ।
(घ) स्वतंत्रता एवं समानता का विकास साथ-साथ हुआ ।
(ङ) राजनीतिक स्वतंत्रता हेतु समान अवसर आवश्यक हैं ।

6– कानून और स्वतंत्रता के मध्य संबंधों की विवेचना कीजिए ।
उत्तर — कानून एवं स्वतंत्रता दोनों शब्द एक-दूसरे के परस्पर विरोधी प्रतीत होते हैं । कानून व्यक्ति की कार्यशीलता को नियमित करता है तथा उसको मनमानी करने से रोकता है, इसीलिए अराजकतावादी एवं व्यक्तिवादी विद्वानों की मान्यता है कि कानून, सत्ता, प्रभुसत्ता इत्यादि स्वतंत्रता के शत्रु हैं । इसके विपरीत आदर्शवादी विद्वानों का मत है कि कानून एवं स्वतंत्रता एक दूसरे के विरोधी न होकर सहयोगी है क्योंकि स्वतंत्रता अवरोध में रह कर ही प्राप्त की जा सकती है । राज्य के कानून स्वतंत्रता की प्राप्ति हेतु उचित वातावरण तैयार करते हैं । इस प्रकार कानून, व्यक्ति तथा स्वतंत्रता के संबंधों के सन्दर्भ में अलग-अलग विचार है तथा वास्तविकता जानने के लिए दोनों पक्षों का अध्ययन आवश्यक है ।


(i) स्वतंत्रता तथा कानून परस्पर विरोधी हैं- कुछ विद्वानों का विचार है कि स्वतंत्रता तथा कानून परस्पर विरोधी हैं क्योंकि
कानून स्वतंत्रता पर अनेक बन्धन लगाता है । इस विचार को मान्यता देने वालों में व्यक्तिवादी, अराजकतावादी श्रमसंघवादी आदि विद्वान हैं ।
(ii) स्वतंत्रता तथा कानून परस्पर विराधी नहीं हैं- इस विचारों के पक्ष में समर्थकों के निम्न तर्क हैं
(क) कानून वास्तविक स्वतंत्रता की उत्पत्ति करता है ।
(ख) कानून स्वतंत्रता का रक्षक है ।
(ग) कानून स्वतंत्रता में वृद्धि करते हैं ।
(घ) स्वतंत्रता की उत्पत्ति कानून द्वारा होती है ।

7– “कानून स्वतंत्रता का पूरक है ।” व्याख्या कीजिए ।

अथवा
कानून एवं स्वतंत्रता के मध्य संबंधों की विवेचना कीजिए ।


उत्तर — यदि मानव सभ्यता के विकास की कथा पर एक दृष्टि डाली जाए तो हम देखेंगे कि कानून के निर्माण के मूल में मानव स्वंतत्रता की भावना रही है । मनुष्य अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कानूनों का निर्माण करता है । अत: कानून के बिना स्वतंत्रता की कल्पना नहीं की जा सकती है । व्यक्ति की स्वतंत्रता पर कानून का नियंत्रण अनिवार्य है; अन्यथा व्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित नहीं रह सकती हैं कानून और स्वतंत्रता एक सिक्के के दो पहलू हैं । वे एक-दूसरे पर अवलम्बित हैं । अत: हम कह सकते हैं कि कानून और स्वतंत्रता एक-दूसरे के पूरक हैं ।
कानून एवं स्वतंत्रता के मध्य सम्बन्ध- इसके लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या- 6 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न ( स्वतन्त्रता एवं समानता )


1– स्वतंत्रता से आप क्या समझते हैं? क्या स्वतंत्रता और समानता परस्पर विरोधी सिद्धान्त हैं?
उत्तर — स्वतंत्रता- स्वतंत्रता का तात्पर्य उस वातावरण से है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक हितों को समझते हुए अपने जीवन का आर्थिक, सामाजिक एवं अध्यात्मिक विकास कर सके । दूसरे शब्दों में “स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ राज्य की ओर से ऐसे वातावरण का निर्माण करना है, जिसमें कि व्यक्ति आदर्श नागरिक जीवन व्यतीत करने योग्य बन सके तथा अपने व्यक्तित्व का पूर्ण निर्माण कर सके । स्वतंत्रता एवं समानता का संबंध- स्वतंत्रता एवं समानता के आपसी संबंधों के सन्दर्भ में विभिन्न विद्वानों के अलग-अलग विचार हैं । कुछ विद्वान मानते हैं कि स्वतंत्रता एवं समानता परस्पर विरोधी है तथा समानता स्थिर करने के लिए किए गए प्रयासों के द्वारा स्वतंत्रता नष्ट होती है । दूसरी ओर अन्य विद्वानों का मत है कि स्वतंत्रता तथा समानता एक-दूसरे की सहयोगी हैं । इनको एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता । दोनों मतों को निम्न प्रकार से प्रकट किया जा सकता है


(i) स्वतंत्रता तथा समानता परस्पर विरोधी हैं- इस विचारधारा के समर्थकों में डी– टॉकविल, लॉर्ड एक्टन तथा क्रोचे प्रमुख हैं । इनके अनुसार स्वतंत्रता एवं समानता एक-दूसरे के विरोधी है । स्वतंत्रता समानता को नष्ट करती है तथा समानता स्वतंत्रता का विनाश करती है । इस विचारधारा के अनुसार स्वतंत्रता का अर्थ व्यक्ति की इच्छानुसार कार्य करने की शक्ति है । व्यक्ति के ऊपर सभी प्रकार के बन्धनों तथा नियंत्रणों का अभाव ही स्वतंत्रता है । समानता का आशय सभी क्षेत्रों में बराबरी से है । अत: स्वतंत्रता से समानता का हनन होता है तथा समानता से स्वतंत्रता का अन्त हो जाता है, ऐसी स्थिति में स्वतंत्रता एवं समानता में से एक की स्थापना की सम्भव है, अत: ये दोनों परस्पर विरोधी हैं । “समानता की अभिलाषा ने स्वतंत्रता की आशा को व्यर्थ कर दिया है ।’
-लार्ड एक्टन इस मत के समर्थक इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क देते हैं

(क) समान स्वतंत्रता का सिद्धान्त गलत- सभी व्यक्तियों का एक ही स्तर पर रखना, एक जैसी समानता देना गलत
ही नहीं बल्कि अनैतिक भी है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति समान नहीं होता । बुद्धिमान-मूर्ख, ज्ञानी-अज्ञानी, देशद्रोही
देशभक्त इत्यादि सभी को समान पद देना मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण है । डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, वैज्ञानिक, मजदूर तथा बेकारों को समान समझना अन्याय ही होगा ।

(ख) प्रकृति ने सभी मानवों को समान नहीं बनाया है- समाज में असमानता प्रकृति की ही देन है क्योंकि प्रकृति ने सभी लोगों को समान नहीं बनाया है । कुछ लोग बुद्धिमान होते हैं तो कुछ बुद्धिहीन, कुछ सुन्दर होते है तो कुछ कुरूप । इसके विरुद्ध हम शक्ति प्रयोग द्वारा बुद्धिहीनों और विवेकशीलों में समानता स्थापित करने का प्रयास करते हैं तो प्रकृति के असमानता के सिद्धान्त के विरुद्ध कार्य करते हैं ।

(ग) आर्थिक स्वतंत्रता एवं समानता विरोधी हैं- व्यक्तिवादियों की मान्यता है कि आर्थिक क्षेत्र में खुली प्रतियोगिता एवं स्वतंत्र व्यापार होना चाहिए, जिससे प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्रता से अपनी आर्थिक प्रगति कर सके । लेकिन आज जब हम आर्थिक क्षेत्र में समानता स्थापित करने का प्रयत्न करते हैं तो इससे हम आर्थिक स्वतंत्रता के मार्ग में बाधक बनते हैं जिसके फलस्वरूप व्यक्ति की आर्थिक स्वतंत्रता सीमित हो जाती है ।

(घ) योग्य व्यक्तियों को अपनी क्षमता प्रदर्शित करने का अवसर नहीं मिलता- जब हम योग्य तथा अयोग्य व्यक्ति को समान अधिकार एवं अवसर देते हैं तो इससे योग्य व्यक्ति को अपनी क्षमता प्रदर्शित करने का अवसर नहीं मिलता । उदाहरणार्थ, लोकतंत्र में योग्य तथा अयोग्य व्यक्ति को समान राजनीतिक अधिकार प्रदान किए जाते हैं जिससे योग्य तथा अयोग्य व्यक्तियों का अन्तर करना कठिन हो जाता है ।

(ii) स्वतंत्रता तथा समानता परस्पर पूरक हैं- इस विचारधारा के अनुसार स्वतंत्रता एवं समानता परस्पर पूरक हैं तथा दोनों में घनिष्ठ संबंध है । इस मत के समर्थक लास्की, सी०ई०एम० जोड, पोलार्ड, आर०एच० टोनी तथा जी०ए० स्मिथ हैं । इस विद्वानों का विचार है कि स्वतंत्रता एवं समानता को परस्पर विरोधी मानने वाले इनका गलत अर्थ समझते हैं । वास्तव में स्वतंत्रता बन्धनों तथा नियंत्रणों का अभाव नहीं अपितु समाज तथा राज्य के विवेकशील कानूनों का पालन है । स्वतंत्रता व्यक्तित्व विकास के लिए उचित अवसर प्रदान करती है । इस प्रकार स्वतंत्रता और समानता का लक्ष्य एक ही है । व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक समानता के अभाव में असम्भव है । “समानता की प्रचुर मात्रा स्वतंत्रता की विरोधी नहीं है, बल्कि उसके लिए आवश्यक है ।”

-टॉनी “स्वतंत्रता की समस्या का सिर्फ एक समाधान है और वह यह है कि इसका निवास समानता में हैं ।”

-पोलार्ड इस मत के समर्थन में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं
(क) नागरिक स्वतंत्रता हेतु कानून के समक्ष समानता आवश्यक है- नागरिक स्वतंत्रता से अभिप्राय वह स्वतंत्रता होती है, जिसका उपभोग व्यक्ति राज्य का सदस्य होने के कारण उपभोग करता है । ऐसी स्वतंत्रता का उपभोग तभी किया जा सकता है जब व्यक्ति को कानून के सम्मुख समान पद दिया जाए । यदि ऐसा नहीं होता तो नागरिक स्वतंत्रता निरर्थक बन जाती है ।

(ख) दोनों का उद्देश्य समान- यदि सूक्ष्म रूप में अध्ययन किया जाए तो ज्ञात होगा कि स्वतंत्रता एवं समानता का उद्देश्य व्यक्ति की प्रगति हेतु उचित वातावरण तैयार करना है । जब दोनों के उद्देश्य समान है तो विरोध किस प्रकार हो सकता है? “फ्रांस के क्रान्तिकारियों ने जब स्वतंत्रता समानता तथा भ्रातृत्व का उद्घोष किया, तब वे न तो मुर्ख थे और न ही पागल ।”

(ग) स्वतंत्रता के उपभोग हेतु समानता की आवश्यकता- समानता की अनुपस्थिति में स्वतंत्रता का उपभोग नहीं किया जा सकता । अत: स्वतंत्रता के लिए समानता का स्थापित किया जाना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है ।

(घ) स्वतंत्रता एवं समानता का विकास साथ-साथ हुआ- यदि हम दोनों के इतिहास का अध्ययन करें तो इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि दोनों की प्राप्ति हेतु मानव ने समान प्रयत्न किए हैं । फ्रांस के क्रान्तिकारियों ने जहाँ स्वतंत्रता की मांग की थी वहीं उन्होंने समानता की भी मांग की थी क्योंकि उनको पता था कि इनमें से किसी एक की कमी में दूसरी निरर्थक हो जाएगी । (ङ) राजनीतिक स्वतंत्रता हेतु समान अवसर आवश्यक हैं- इससे हमारा अभिप्राय यह है कि प्रत्येक नागरिक को राज्य के कार्य में भाग लेने के समान अवसर दिए जाएँ । यदि ऐसा नहीं होगा तो राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं होगा । आज निर्धन व्यक्ति पूँजीपति की तुलना में राजनीतिक स्वतंत्रता का उपभोग नहीं कर सकता । इसलिए प्रत्येक क्षेत्र में समानता आवश्यक है ।

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2– स्वतंत्रता की परिभाषा दीजिए और उसका कानून के साथ संबंध स्थापित कीजिए ।
उत्तर — स्वतंत्रता की परिभाषा- स्वतंत्रता उस वातावरण की स्थापना है, जिसमें लोगों को अपने पूर्ण विकास के अवसर प्राप्त होते हैं ।

स्वतंत्रता तथा कानून का संबंध– कानून एवं स्वतंत्रता दोनों शब्द एक-दूसरे के परस्पर विरोधी प्रतीत होते हैं । कानून व्यक्ति की कार्यशीलता को नियमित करता है तथा उसको मनमानी करने से रोकता है, इसीलिए अराजकतावादी एवं व्यक्तिवादी विद्वानों की मान्यता है कि कानून, सत्ता, प्रभुसत्ता इत्यादि स्वतंत्रता के शत्रु हैं । इसके विपरीत आदर्शवादी विद्वानों का मत है कि कानून एवं स्वतंत्रता एक दूसरे के विरोधी न होकर सहयोगी है क्योंकि स्वतंत्रता अवरोध में रह कर ही प्राप्त की जा सकती है । राज्य के कानून स्वतंत्रता की प्राप्ति हेतु उचित वातावरण तैयार करते हैं । इस प्रकार कानून, व्यक्ति तथा स्वतंत्रता के संबंधों के सन्दर्भ में अलग-अलग विचार है तथा वास्तविकता जानने के लिए दोनों पक्षों का अध्ययन आवश्यक है ।


(i) स्वतंत्रता तथा कानून परस्पर विरोधी हैं– कुछ विद्वानों का विचार है कि स्वतंत्रता तथा कानून परस्पर विरोधी हैं क्योंकि कानून स्वतंत्रता पर अनेक प्रकार के बन्धन लगाता है । इस विचार को मान्यता देने वालों में व्यक्तिवादी, अराजकतावादी, श्रमसंघवादी तथा कुछ अन्य विद्वान हैं । इस मत के अलग-अलग विचार निम्नलिखित हैं

(क) अराजकतावादियों के विचार– अराजकतावादियों की मान्यता है कि राज्य अपनी शक्ति के प्रयोग से व्यक्ति की स्वतंत्रता को नष्ट करता है । अराजकतावादी राज्य को समाप्त कर देने के समर्थक हैं । अराजकतावादी विचारक विलियम गाडविन के मतानुसार– “कानून सर्वाधिक घातक प्रकृति की संस्था है ।’ वह आगे कहता है- “राज्य का कानून दमन तथा उत्पीड़न का एक नवीन यंत्र है ।”

(ख) श्रम संघवादियों के विचार– मजदूर संघवादियों की मान्यता है कि राज्य के कानून व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं । इन कानूनों का प्रयोग सदैव ही पूँजीपतियों के हितों को बढ़ावा देने हेतु किया गया है । इससे मजदूरों की स्वतंत्रता नष्ट होती है । राज्य के कानून मजदूरों के हितों का विरोध कर पूँजीपतियों का समर्थन करते है इसलिए मजदूर संघवादी भी राज्य को समाप्त करने के पक्षधर हैं ।

(ग) बहुलवादियों के विचार– बहुलवादियों की मान्यता है कि राज्य के पास जितनी अधिक सत्ता होगी, व्यक्ति को उतनी ही कम स्वतंत्रता प्राप्त होगी । इसीलिए राज्य सत्ता को अलग-अलग समूहों में विभाजित कर दिया जाना चाहिए ।

(घ) व्यक्तिवादियों के विचार– व्यक्तिवादी विचारधारा राज्य के कार्यों को सीमित करने के पक्ष में है । व्यक्तिवादियों के अनुसार- “वही शासन-प्रणाली श्रेष्ठ है, जो सबसे कम शासन करती है ।” जितने कम कानून होंगे, उतनी की अधिक स्वतंत्रता होगी ।

(ii) स्वतंत्रता तथा कानून परस्पर विरोधी नहीं है– स्वतंत्रता एवं कानून परस्पर विरोधी न होकर सहयोगी है । जो लोग स्वतंत्रता का सही अर्थ नहीं जानते वहीं लोग इन्हें परस्पर विरोधी मानते हैं । स्वतंत्रता का तात्पर्य कभी भी प्रतिबंधों की अनुपस्थिति नहीं होता । स्वतंत्रता प्रतिबन्धों में रहकर ही प्राप्त की जा सकती है । प्रतिबन्धों की अनुपस्थिति अर्थात् कानूनों की अनुपस्थिति में सिर्फ बलशाली ही स्वतंत्रता प्राप्त कर सकेंगे । स्वतंत्रता से अभिप्राय व्यक्ति पर अनुचित, अनैतिक तथा अन्यायपूर्ण प्रतिबन्धों का नहीं होना है । स्वतंत्रता एवं कानून के परस्पर संबंधों को प्रकट करने हेतु निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं

(क) स्वतंत्रता के लिए कानून परमावश्यक है– कानून प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को नियमित करता है तथा एक-दूसरे को असहज हस्तक्षेप से बचाता है । इसलिए कानून स्वतंत्रता की प्रथम शर्त है ।
(ख) स्वतंत्रता का अभिप्राय प्रतिबन्धों की अनुपस्थिति नहीं- स्वतंत्रता का अभिप्राय प्रतिबन्धों की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि यह प्रतिबन्धों में रहकर ही प्राप्त की जा सकती है ।

(ग) कानून के अभाव में अराजकता का राज्य होगा– राज्य कानूनों द्वारा ही व्यक्ति के जीवन को नियमबद्ध करता है । कानून के अभाव में प्रत्येक व्यक्ति मनमानी करेगा, जिसके परिणामस्वरूप अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी ।

(घ) कानून सरकार की शक्तियों को भी सीमित करते हैं– कानून से सरकार की शक्तियों को भी सीमित किया जाता है और उसे मनमानी करने से रोका जाता है । इससे व्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रहती है ।

(ङ) कानून, स्वतंत्रता की प्राप्ति हेतु उचित वातावरण निर्मित करता है– कानून एक ऐसा वातावरण तैयार करता है जो व्यक्ति की प्रगति के लिए परमावश्यक है । उदाहरणार्थ, राज्य कानून द्वारा श्रमिकों के कार्य करने के घण्टे निश्चित करता है, मजदूरी तय करता है तथा उनके स्वास्थ्य की रक्षा हेतु कानून निर्मित करता है । इसके फलस्वरूप श्रमिकों की स्वतंत्रता की रक्षा होती है । यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि प्रत्येक कानून व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा नहीं करता । तानाशाही राज्यों में कानून व्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने के लिए निर्मित किए जाते हैं, केवल लोकतान्त्रिक राज्यों में ही कानून व्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रहरी होते हैं ।

3– स्वतंत्रता के विभिन्न प्रकारों का सविस्तार वर्णन कीजिए
। उत्तर — स्वतंत्रता के प्रकार- स्वतंत्रता का प्रयोग हम विभिन्न अर्थों में करते हैं । अत: इसके अनेक प्रकार हैं, जिनमे निम्नलिखित प्रमख हैं
(i) प्राकृतिक स्वतंत्रता- प्राकृतिक स्वतंत्रता से आशय मनुष्यों को अपनी इच्छानुसार कार्य करने की स्वतंत्रता से है । इस स्वतंत्रता का प्रचार समझौतावासियों ने किया था । समझौतावासियों के मतानुसार राज्य के अस्तित्व में आने से पूर्व व्यक्ति प्रकृति के राज्य में रहता था जहाँ वह पूरी तरह स्वतंत्र था । रूसो के शब्दो, “मनुष्य जन्म से स्वतंत्र हैं, किन्तु सर्वत्र जंजीरों में जकड़ा हुआ है ।” इसलिए अब सभ्य समाज में प्राकृतिक स्वतंत्रता के विचार को स्वीकार नहीं किया जाता हैं प्राकृतिक स्वतंत्रता, स्वतंत्रता न होकर आज्ञा-पत्र है उचित स्वतंत्रता केवल राज्य द्वारा निर्धारित अवरोधों में रहकर ही भोगी जा सकती है यदि प्राकृतिक स्वतंत्रता के सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया जाए तो इसमें ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस के सिद्धान्त को बल मिलेगा तथा शक्तिहीन की स्वतंत्रता छिन जाएगी ।


ii) नागरिक स्वतंत्रता- समाज का सदस्य होने के कारण व्यक्ति को जो स्वतंत्रता प्राप्त होती है उसको नागरिक स्वतंत्रता कहते हैं । इस प्रकार की स्वतंत्रता की रक्षा राज्य करता है । इसमें नागरिकों की निजी स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, सम्पत्ति का अधिकार, विचार तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, इकट्ठे होने तथा संघ इत्यादि बनाने की स्वतंत्रता सम्मिलित है । विभिन्न राज्यों में नागरिक स्वतंत्रता अलग-अलग रूपों में होती है । वहीं लोकतान्त्रिक राज्यों में यह स्वतंत्रता अधिक होती है, तथा तानाशाही राज्यों में कम । भारत के संविधान में नागरिक स्वतंत्रता का उपबन्ध मिलता है ।

(iii) राजनीतिक स्वतंत्रता– राजनीतिक स्वतंत्रता का आशय नागरिकों का राज्य के कार्यों में सक्रिय भाग लेने की स्वतंत्रता से है । राजनीतिक स्वतंत्रता के अन्तर्गत मताधिकर, निर्वाचित होने का अधिकार, शासकीय पद प्राप्त करने का अधिकार तथा विचार अभिव्यक्ति का अधिकार इत्यादि सम्मिलित किए जाते हैं । व्यक्ति के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता का अत्यधिक महत्व है । इसके अभाव में नागरिक स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं रह जाता क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के उपयोग से ही ऐसे समाज का अस्तित्व सम्भव होता है, जिससे नागरिक स्वतंत्रताएँ अक्षुण्ण बनी रहती हैं । ।

iv) आर्थिक स्वतंत्रता- आर्थिक स्वतंत्रता का आशय आर्थिक सुरक्षा सम्बन्धी उस स्थिति से हैं, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए अपना जीवनयापन कर सके । जिस राज्य में भूख, गरीबी, दीनता, नग्नता तथा आर्थिक अन्याय होगा, वहाँ व्यक्ति कभी भी स्वतंत्र नहीं होगा । व्यक्ति को पेट की भूख, अपने बच्चों की भूख तथा भविष्य में दिखाई देने वाली आवश्यकताएँ प्रत्येक पल दुःखी करती रहेंगी । व्यक्ति भी स्वयं को स्वतंत्र अनुभव नहीं करेगा तथा न ही वह नागरिक एवं राजनीतिक स्वतंत्रता का भली-भांति उपयोग कर सकेगा । अत: राजनीतिक एवं नागरिक स्वतंत्रता को प्राप्त करने के लिए स्वतंत्रता का होना आवश्यक है ।

(v) व्यक्तिगत स्वतंत्रता- व्यक्तिगत स्वतंत्रता से आशय है- व्यक्ति को ऐसे कार्य करने की स्वतंत्रता प्रदान करना है जो सिर्फ उसी तक सीमित हो तथा अन्य लोगों पर उसके इन कार्यों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता हो । यहाँ स्मरणीय यह बात है कि आज व्यक्ति का कोई कार्य ऐसा नहीं है जो अन्य लोगों को प्रभावित न करता हो । इसलिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी कुछ सीमाओं में रहकर ही प्राप्त की जा सकती है । इस प्रकार की स्वतंत्रता के अन्तर्गत वस्त्र, धर्म, भोजन तथा पारिवारिक जीवन को सम्मिलित किया जाता है । धार्मिक स्वतंत्रता- अपने धर्म पर व्यक्ति किसी प्रकार का बन्धन स्वीकार नहीं करता । यही कारण है कि आज विश्व के अधिकांश राज्यों में व्यक्ति को कोई भी धर्म मानने, धर्म का प्रचार करने तथा धारण करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है । भारतीय संविधान में भी धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान किया गया है । धर्मतंत्र राज्यों में राज्य का एक धर्म होता है तथा उसी धर्म के अनुयायियों को विशेष सुविधाएँ दी जाती है जबकि धर्मनिरपेक्ष राज्य में व्यक्ति को अपनी इच्छा का कोई भी धर्म धारण करने की स्वतंत्रता प्राप्त होती है तथा सभी धर्म एकसमान होते हैं ।


(vii) सामाजिक स्वतंत्रता- इस स्वतंत्रता का तात्पर्य समस्त व्यक्तियों को समाज से अपना विकास करने की सुविधा प्राप्त होने से है ।
(viii) नैतिक स्वतंत्रता- नैतिक स्वतंत्रता का आशय अन्तरात्मा के अनुसार सत्य का पालन करते हुए आचरण करने की स्वतंत्रता से है । यह स्वतंत्रता सत्य परोपकार, अहिंसा तथा नैतिक आचरण पर बल देती है । यह कथन स्वतंत्रता के समर्थक काण्ट के द्वारा दिया गया है- “इस प्रकार आचरण करो कि तम्हारी इच्छा से सार्वजनिक नियमों का प्रतिपादन किया जा सके ।’ प्राकृतिक दृष्टि से परतंत्र व्यक्ति को स्वतंत्र नहीं कहा जा सकता तथा इसके अभाव में मानव व्यक्तित्व का विकास अभी असम्भव है । अतः समाज में प्रत्येक व्यक्ति के साथ सहयोग, सदभावना तथा विनम्रतापूर्वक व्यवहार करना ही नैतिक स्वतंत्रता है । राष्ट्रीय स्वतंत्रता- यह स्वतंत्रता सभी प्रकार की स्वतंत्रताओं तथा अधिकारों की आधारशिला है । राष्ट्रीय स्वतंत्रता का आशय राष्ट्र की स्वतंत्रता से हैं । जिस प्रकार व्यक्ति को स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए, ठीक उसी प्रकार से एक राष्ट्र को भी अपने पूर्ण विकास के लिए स्वतंत्रता का होना आवश्यक है । राष्ट्रीय स्वतंत्रता राज्य की आन्तरिक एवं बाह्य स्वाधीनता है । जो राष्ट्र अपने आन्तरिक प्रशासन तथा बाहरी संबंधों की स्थापना में स्वतंत्र होता है, किसी दसरे देश के अधीन नहीं होता– वह स्वतंत्र और सम्प्रभु राष्ट्र होता है । लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों तथा नियमों के अधीन प्रत्येक राष्ट्र की स्वतंत्रता पर कुछ प्रतिबन्ध रहता है ।

4– स्वतंत्रता से आप क्या समझते हैं? नागरिकों को प्राप्त विभिन्न स्वतंत्रताओं का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर — स्वतंत्रता- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
नागरिकों को प्राप्त विभिन्न स्वतंत्रताएँ- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-3 के उत्तर में स्वतंत्रता के प्रकार का
अवलोकन कीजिए ।

5– “स्वतंत्रता व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिए आवश्यक है ।” विवेचना कीजिए ।
अथवा स्वतंत्रता क्यों आवश्यक है?
सकारात्मक स्वतंत्रता तथा नकारात्मक स्वतंत्रता की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए ।
उत्तर — मनुष्य का सम्पूर्ण सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, राजनीतिक तथा मानसिक विकास स्वतंत्रता के वातावरण में ही सम्भव है । जे० एस० मिल ने अपनी पुस्तक ‘On Liberty’ में स्वतंत्रता को मानव जीवन का मूलाधार बताया है । स्वतंत्रता के अत्यधिक महत्व के कारण ही विभिन्न देशों में लाखों व्यक्तियों ने इसकी रक्षार्थ हेतु अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया । स्वतंत्रता समाज एवं राष्ट्र की प्रगति के लिए आवश्यक है । स्वतंत्रता के आवश्यकता को निम्नलिखित प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है

(i) स्वतंत्रता नैतिक गुणों के विकास में सहायक- स्वतंत्रता व्यक्ति में प्रेम, दया, सहानुभूति, त्याग एवं सहयोग इत्यादि नैतिक गुणों को विकसित करके सामाजिक सभ्यता का विकास करती है, जो मानवीय मूल्यों के लिए आवश्यक है ।

(ii) स्वतंत्रता व्यक्तित्व के विकास में सहायक- स्वतंत्रता के बिना व्यक्ति के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास नहीं हो सकतां स्वतंत्रता के माध्यम से ही वह साधन उपलब्ध कराए जाते हैं, जिनसे व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास का मार्ग प्रशस्त होता है ।

(iii) स्वतंत्रता अधिकार दिलाने में सहायक- व्यक्ति के सम्पूर्ण विकास के लिए अनेक परिस्थितियाँ आवश्यक होती हैं । यह समस्त परिस्थितियाँ ही वास्तव में अधिकार हैं, जिन्हें स्वतंत्रता द्वारा ही निर्मित किया जाता है ।

(iv) स्वतंत्रता समाज एवं राष्ट्र की प्रगति में सहायक- जब व्यक्ति स्वतंत्र होता है तो उसके मस्तिष्क में नवीन विचारों का उदय होता है । इसके आधार पर नए-नए आविष्कार होते हैं, जिससे राष्ट्र की वैज्ञानिक प्रगति होती है । अत: कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता समाज एवं राष्ट्र की प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती है ।

(v) स्वतंत्रता आर्थिक प्रगति में सहायक- व्यक्ति की आर्थिक प्रगति में भी स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण योगदान है । स्वतंत्रता प्रगति में भी स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण योगदान है । स्वतंत्रता के कारण ही प्रत्येक व्यक्ति को दैनिक जीविका उपार्जित करने की सुरक्षा प्राप्त होती है । Up board class 12th civics chapter 2 राज्यों के कार्यों के सिद्धान्त (Theories of the Functions of States)

(vi) स्वतंत्रता राष्ट्रीय सम्मान में सहायक- स्वतंत्रता राष्ट्र के सम्मान में गौरव में अभिवृद्धि करती है । इसी कारण अनेक देशों में लाखों देशभक्तों ने स्वतंत्रता प्राप्त करने हेतु अपने प्राणों का बलिदान कर दिया तथा देश को स्वतंत्र कराया । इटली के देशभक्त मैजिनी ने कहा, “स्वतंत्रता के अभाव में आप अपना कोई कर्त्तव्य पूरा नहीं कर सकते । अत: आपको स्वतंत्रता का अधिकार दिया जाता है तथा जो भी शक्ति आपको इस अधिकार से वंचित रखना चाहती है कि उससे जैसे भी बने, अपनी स्वतंत्रता छीन लेना आपका कर्त्तव्य है ।”

प्रसिद्ध विधिवेत्ता नानी पालकीवाला के कथानुसार– “व्यक्ति सदैव स्वतंत्रता की बलिवेदी पर सर्वाधिक मूल्यवान बलिदान देते रहे हैं । वे भाषण तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आत्मा एवं धर्म की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर करते रहे हैं ।” स्वतंत्रता की आवश्यकता- इसके लिए उपर्युक्त उत्तर का अवलोकन करें ।

(i) स्वतंत्रता का सकारात्मक अथवा वास्तविक पहलू- स्वतंत्रता के सकारात्मक पहलू से अभिप्राय है कि व्यक्ति को ऐसे कार्य करने देना जो उसकी प्रगति के लिए आवश्यक है, किन्तु समाज के हितों को किसी प्रकार की हानि न पहुँचाते हों । स्वतंत्रता के इस पहलू के विचारकों में ग्रीन, गाँधी, मैकेन्जी, लास्की आदि का नाम उल्लेखनीय है । “सकारात्मक स्वतंत्रता एक पूर्ण मानव के रूप में कार्य करने की स्वतंत्रता है । यह मानव को अपना विकास करने की शक्ति है । एक व्यवस्थित समाज की अव्यवस्थित सामाजिक परिस्थितियों में स्वतंत्रता की कल्पना नहीं की जा सकती ।”
-मैक्फरसन का कथन इस प्रकार सकारात्मक स्वतंत्रता का तात्पर्य उस वातावरण से हैं, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक हितों को समझते हुए अपने जीवन का आर्थिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक विकास कर सके । आज के युग में स्वतंत्रता के निषेधात्मक स्वरूप को स्वीकार नहीं किया जाता है बल्कि स्वतंत्रता के सकारात्मक स्वरूप को ही उचित माना जाता है ।

(ii) स्वतंत्रता का नकारात्मक अथवा निषेधात्मक पहलू-निषेधात्मक रूप से स्वतंत्रता का अभिप्राय सम्पूर्ण तथा बाधारहित स्वतंत्रता से लिया है और व्यक्ति बिना किसी बाधा की चिन्ता किए जो चाहे वह कर सकता है । साधारण शब्दों में, हम इसी को ‘बाधारहित स्वतंत्रता’ कहते हैं । स्वतंत्रता के इस पहलू के विचारकों में हॉब्स, रूसो, कोल तथा सीले का नाम उल्लेखनीय हैं । मानव स्वभाव को देखते हुए स्वतंत्रता का निषेधात्मक रूप सभ्य समाज में सम्भव नहीं है । मनुष्य समाज में रहते हुए कोई ऐसा कार्य नहीं सकता जो अन्य लोगों को हानि पहुँचाता हो अथवा उनकी स्वतंत्रता में रुकावट पैदा करता हो ।
इस संबंध में लॉस्की ने भी ठीक कथन दिया है- “समाज में रहते हुए मनुष्य जो चाहे वह नहीं कर सकता । स्वतंत्रता कभी भी आज्ञापत्र नहीं बन सकती है ।” |
तात्पर्य यह है कि किसी व्यक्ति को चोरी करने अथवा किसी की हत्या करने की छूट नहीं दी जा सकती हैं ।

6– समानता के अर्थ को स्पष्ट कीजिए तथा प्रजातान्त्रिक राज्य में इसके महत्व का विवेचन कीजिए ।
उत्तर — समानता-समानता का तात्पर्य ऐसी परिस्थितियों के अस्तित्व से है जिनमें सभी व्यक्तियों को अपने व्यक्तित्व के विकास हेतु अवसर प्राप्त हो सके तथा जिनसे उसके व्यक्तित्व के विकास में आने वाली रुकावटे तथा सामाजिक-आर्थिक विषमताओं को दूर किया जा सके । जाति, धर्म, लिंग इत्यादि के आधार पर नागरिकों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए । अर्थात् व्यक्ति को उसकी क्षमतानुसार प्रगति के समान अवसर प्रदान करना ही समानता है । प्रजातांत्रिक राज्य में समानता का महत्व

(i) स्वतंत्रता के लिए समानता का होना आवश्यक है ।
(ii) समानता होने से नागरिकों के मध्य जाति, धर्म, भाषा, लिंग, वंश, रंग आदि के आधार पर कोई भेदवभाव नहीं होता है । (iii) सामाजिक न्याय और स्वतंत्रता के लिए समानता का होना बहुत आवश्यक है ।
(iv) प्रजातंत्र में अच्छी कानून व्यवस्था के लिए समानता आवश्यक है अन्यथा प्रजातंत्र का कोई मूल्य नहीं है ।
(v) मौलिक आधारों की सार्थकता भी समानता से ही है ।
(vi) सभी के विकास के लिए समानता होना अति आवश्यक है ।
(vii) आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समानता आवश्यक है ।

7– “समानता के आवेश ने स्वतंत्रता की आशा को व्यर्थ कर दिया है ।” इस कथन का परीक्षण कीजिए ।
उत्तर — “समानता के आदेश ने स्वतंत्रता की आशा को व्यर्थ कर दिया है’ इस मत के समर्थक इसके पक्ष में निम्न तर्क प्रस्तुत करते हैं
(i) समान स्वतंत्रता का सिद्धान्त गलत- सभी व्यक्तियों का एक ही स्तर पर रखना, एक जैसी समानता देना गलत ही नहीं बल्कि अनैतिक भी है क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति समान नहीं होता । बुद्धिमान-मूर्ख, ज्ञानी-अज्ञानी, देशद्रोही-देशभक्त इत्यादि सभी को समान पद देना मौलिक रूप से त्रुटिपूर्ण है । डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, वैज्ञानिक, मजदूर तथा बेकारों को समान समझना अन्याय ही होगा । प्रकृति ने सभी मानवों को समान नहीं बनाया है- समाज में असमानता प्रकृति की ही देन है क्योंकि प्रकृति ने सभी लोगों को समान नहीं बनाया है । कुछ लोग बुद्धिमान होते हैं तो कुछ बुद्धिहीन, कुछ सुन्दर होते है तो कुछ कुरूप । इसके विरुद्ध हम शक्ति प्रयोग द्वारा बुद्धिहीनों और विवेकशीलों में समानता स्थापित करने का प्रयास करते हैं तो प्रकृति के असमानता के सिद्धान्त के विरुद्ध कार्य करते हैं ।

(iii) आर्थिक स्वतंत्रता एवं समानता विरोधी हैं- व्यक्तिवादियों की मान्यता है कि आर्थिक क्षेत्र में खुली प्रतियोगिता एवं स्वतंत्र व्यापार होना चाहिए, जिससे प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्रता से अपनी आर्थिक प्रगति कर सके । लेकिन आज जब हम आर्थिक क्षेत्र में समानता स्थापित करने का प्रयत्न करते हैं तो इससे हम आर्थिक स्वतंत्रता के मार्ग में बाधक बनते हैं जिसके फलस्वरूप व्यक्ति की आर्थिक स्वतंत्रता सीमित हो जाती है ।

(iv) योग्य व्यक्तियों को अपनी क्षमता प्रदर्शित करने का अवसर नहीं मिलता- जब हम योग्य तथा अयोग्य व्यक्ति को समान अधिकार एवं अवसर देते हैं तो इससे योग्य व्यक्ति को अपनी क्षमता प्रदर्शित करने का अवसर नहीं मिलता । उदाहरणार्थ, लोकतंत्र में योग्य तथा अयोग्य व्यक्ति को समान राजनीतिक अधिकार प्रदान किए जाते हैं जिससे योग्य तथा अयोग्य व्यक्तियों का अन्तर करना कठिन हो जाता है ।

8– “स्वतंत्रता और समानता एक दूसरे के पूरक हैं ।” इस कथन की विवेचना कीजिए ।
उत्तर — उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

9– स्वतंत्रता और समानता के पारस्परिक संबंधों की विवेचना कीजिए ।अथवा
स्वतंत्रता की समस्या का केवल एक ही समाधान है और वह समाधान समानता में निहित है । परीक्षण कीजिए ।
उत्तर — उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या-1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

10– निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए
(i) स्वतंत्रता की आवश्यकता व रूप (ii) समानता के विविध रूप

उत्तर — (i) स्वतंत्रता की आवश्यकता व रूप- स्वतंत्रता शब्द का वास्तविक अर्थ समझ लेने के उपरान्त यह प्रश्न उठता है कि स्वतंत्रता की क्या आवश्यकता है? क्या इसके अभाव में व्यक्ति की उन्नति सम्भव है? इन प्रश्नों का वास्तविक उत्तर यही है कि स्वतंत्रता मानव जीवन की एक आवश्यक शर्त है और इसके बिना जीवन शून्य है । इस स्वतंत्रता का उपयोग समाज के अन्तर्गत ही किया जा सकता है । स्वतंत्रता की आवश्यकता के विषय में विभिन्न दृष्टिकोण है, जिनका संक्षिप्त विवरण देना परम आवश्यक है ।

फासिस्ट दृष्टिकोण- इस विचारधारा के लोगों का मत है कि स्वतंत्रता के द्वारा मनुष्य अपनी उन्नति नहीं कर सकता । वह स्वतंत्रता का इच्छुक भी नहीं है, क्योंकि इससे मानव के विकास में बाधा पड़ती है । इस विचार के समर्थकों का कथन है कि मनुष्य मूर्ख होते हैं, इसलिए स्वतंत्रता का उपभोग ठीक प्रकार से नहीं कर सकते । उनका दृष्टिकोण संकुचित होता है और वे अपने स्वार्थ की ही सोचते है । स्वतंत्रता उन्हीं लोगों को मिलनी चाहिए जिसके हाथ में शासन की बागडोर हो । स्वतंत्रता विचार के सिद्धान्त में उनका विश्वास नहीं है । फासिस्ट शासन में जनता का कोई महत्व नहीं होता । उसमें एक नेता तथा उसके अधीन कार्य करने वाले कुछ व्यक्ति ही सम्पूर्ण समाज एवं राष्ट्र के कार्यों का संचालन करते हैं । Up board class 12th civics chapter 2 राज्यों के कार्यों के सिद्धान्त (Theories of the Functions of States)

जनतन्त्रात्मक दृष्टिकोण- स्वतंत्रता के संबंध में फासिस्ट दृष्टिकोण ठीक नहीं । यह विचार समाज एवं व्यक्ति दोनों के लिए ही अहितकर है । प्रजातंत्रवादी यह कहते हैं कि स्वतंत्रता मानव हित का साधन है और इसके अभाव में व्यक्ति अपनी उन्नति नहीं कर सकता । उनके विचार में स्वतंत्रता एक अपूर्ण शक्ति है जो व्यक्ति को पशुता से पृथक करके उसको उन्नति के लिए प्रेरित करती है । व्यक्ति और समाज के लिए स्वतंत्रता बहुत महत्वपूर्ण तत्व है । मानव जीवन में स्वतंत्रता का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है । मानव का विकास स्वतंत्रता पर ही निर्भर है और उसके लिए स्वतंत्रता की परम आवश्यकता है । मनुष्य में विविध गुणों का समावेश इसी के द्वारा होता है । स्वतंत्रता मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है और उसका अपहरण वह कभी सहन नहीं कर सकता । वह कानूनों का पालन भी तभी तक करता है जब तक कि कानून उसकी स्वतंत्रता में बाधक नहीं होता । व्यक्ति स्वतंत्रता का प्रेमी है और वे दासता को पसन्द नहीं करता ।

(ii) समानता के विविध रूप- समानता के विविध रूप और उनका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है(क) प्राकृतिक समानता- इस प्रकार की समानता का आशय यह है कि मानव जन्म से ही समान है तथा उनमें किसी प्रकार की असमानता स्वीकार नहीं की जानी चाहिए । संविदाकारी विचारकों ने प्राकृतिक समानता पर अत्यधिक जोर दिया है, लेकिन वर्तमान में इसे काल्पनिक माना जाता है । आधुनिक विचारकों की मान्यता है कि प्रकृति स्वयं मनुष्यों को असमान वृद्धि, बल, प्रतिभा इत्यादि प्रदान करती है अत: यह सिद्धान्त अनुचित है । यह सिद्धान्त अपने आदर्श रूप में इस बात पर जोर देता है कि समस्त व्यक्तियों के व्यक्तित्व को समान समझा जाना चाहिए ।

(ख) सामाजिक समानता- सामाजिक समानता का अभिप्राय है कि समाज से विशेष अधिकारों का अन्त हो जाए तथा सामाजिक दृष्टिकोण से समस्त व्यक्ति समान समझे जाने लगे । समाज में जाति, वंश, नस्ल, लिंग तथा सम्प्रदाय के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए । उदाहरणार्थ, भारत में जाति प्रथा तथा अस्पृश्ता और अमेरिका एवं अफ्रीका के कुछ देशों में रंग के आधार पर भेदभाव सामाजिक विषमता के ही प्रतीक हैं ।

(ग) सांस्कृतिक एवं शिक्षा सम्बन्धी समानता- इसका तात्पर्य यह है कि सांस्कृतिक दृष्टि से समाज के समस्त वर्गों को अपनी भाषा– लिपि तथा संस्कृति को सुरक्षित बनाए रखने का अधिकार प्राप्त होना चाहिए । इसके साथ ही सभी व्यक्तियों को बिना किसी भेदभाव के शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिए ।

(घ) नागरिक समानता- नागरिक समानता का तात्पर्य उस दृष्टि से है, जिसमें कानून के लिए सभी लोग समान हों । राज्य का सदस्य होने के कारण प्रत्येक नागरिक को समुचित विकास हेतु नागरिक सुविधाएँ प्राप्त होनी चाहिए । शिक्षा, सम्पत्ति, भाषण की स्वतंत्रता इत्यादि को प्रदान करने में राज्य को जाति, धर्म, लिंग, सम्पत्ति इत्यादि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करना चाहिए । हॉब्स ने तो नागरिक समानता को मूलभूत अधिकार तथा कर्तव्यों की समानता कहा है ।

(ङ) धार्मिक समानता- धार्मिक समानता का अभिप्राय यह है कि सभी धर्म समान हैं तथा सभी व्यक्तियों को समान रूप से अपने-अपने धर्म का पालन करने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए । राज्य द्वारा धार्मिक आधार पर किसी व्यक्ति या सम्प्रदाय के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए । यहाँ यह उल्लेखनीय है कि धर्मनिरपेक्ष राज्य में ही धार्मिक समानता सम्भव होती है । इस दृष्टि से भारतीय समाज आदर्श है क्योंकि यहाँ पूर्ण धार्मिक समानता है ।

(च) आर्थिक समानता- आर्थिक समानता का आशय यह है कि व्यक्तियों की आय में बहुत अधिक समानता नहीं होनी चाहिए । उनकी आय के मध्य इतना अधिक अन्तर नहीं होना चाहिए कि एक व्यक्ति अपने धन के आधार पर दूसरे का शोषण करे । समाज में धन का उचित वितरण होना चाहिए तथा समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति होनी चाहिए । “मुझे केक खाने का कोई अधिकार नहीं है, जब मेरे पड़ोसी को बिना रोटियों के गुजारा करना पड़ता है

” -लास्की लास्की आगे चलकर कहता है- “कुछ व्यक्तियों के पास आवश्यकता से अधिक वस्तुएँ होने से पूर्व सभी व्यक्तियों के पास आवश्यक पदार्थ हो जाने चाहिए ।

‘ (छ) राजनीतिक समानता- राजनीतिक समानता का तात्पर्य है कि सभी व्यक्तियों को समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त होने चाहिए । वोट देने, संसद तथा विधानमण्डलों में निर्वाचित होने तथा शासकीय पद प्राप्त करने जैसे क्षेत्रों में सभी समान अवसर और सुविधाएँ प्राप्त होनी चाहिए । राज्य को इन अधिकारों को प्रदान कराने में किसी भी
आधार पर पक्षपात नहीं करना चाहिए । लेकिन इन अधिकारों की प्राप्ति में पागल, कोढ़ी, दिवालिया एवं अपराधी
अपवाद होते हैं । आधुनिक लोकतान्त्रिक देशों में राजनीतिक समानता पर विशेष जोर दिया जाता है ।

11– “कानून और स्वतंत्रता एक-दूसरे के पूरक हैं ।”इस कथन की विवेचना कीजिए ।
उत्तर — कानून और स्वतंत्रता एक-दूसरे के पूरक हैं । यह कथन निम्नलिखित विवरण से स्पष्ट होता है

(i) कानून वास्तविक स्वतंत्रता की उत्पत्ति करता है- अनेक विचारकों की यह धारणा है कि कानून वास्तविक स्वतंत्रता का जम्नदाता है । राज्य कानून का निर्माण करता है, परन्तु राज्य व्यक्ति की ही भावनाओं का प्रतीक होता है । राज्य की आज्ञा के पालन में व्यक्ति अपनी ही आज्ञा का पालन करता है । वस्तुत: स्वतंत्रता राज्य में ही संभव है । स्वतंत्रता का अस्तित्व इसलिए है कि राज्य का अस्तित्व है । स्वतंत्रता के लिए यह आवश्यक होता है कि उसकी रक्षा हो । राज्य इस आवश्यकता की पूर्ति करता है । यह कानून द्वारा ऐसी अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण करता है, जिससे व्यक्ति स्वतंत्रता के अधिकार का रसास्वादन कर सकें ।

(ii) कानून स्वतंत्रता का संरक्षक है- कानून स्वतंत्रता का जनक नहीं वह उसका संरक्षक भी है । कल्पना कीजिए उस स्थिति की जबकि कोई व्यवस्था नहीं है, न अपराधियों को दण्ड देने के लिए कानून है और न उनका पालन कराने के लिए सरकार । ऐसी स्थिति में मत्स्य न्याय या जिसकी लाठी उसकी भैंस की कहावत चरितार्थ होगी । ऐसी दशा में स्वतंत्रता की आशा व्यर्थ है । इस प्रकार कानून से ही स्वतंत्रता की सुरक्षा होती है ।

(iii) कानून और स्वतंत्रता एक-दूसरे के पूरक हैं- कानून और स्वतंत्रता एक-दूसरे के पूरक हैं । यदि मानव सभ्यता के विकास की कथा पर एक दृष्टि डालें तो हम देखेंगे कि कानून के निर्माण के मूल में मानव स्वतंत्रता की भावना रही । मनुष्य अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कानूनों का निर्माण करता है । वस्तुत: कानून के बिना स्वतंत्रता की कल्पना नहीं की जा सकती और कानून तथा स्वतंत्रता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । वे एक-दूसरे पर अवलम्बित हैं-
“Law and Liberty are thus-dependent and complementary to each other–“

(iv) कानून स्वतंत्रता में वृद्धि करते हैं- अधिकार पत्र (Bill of Rights) जैसे अनेक कानून मानव स्वतंत्रता की वृद्धि में सहायक हुए हैं । इस संबंध में लॉक ने ठीक ही लिखा है कि, “कानूनों का उद्देश्य स्वतंत्रता का उन्मूलन करना अथवा उसको रोकना नहीं हैं, अपितु इसका उद्देश्य स्वतंत्रता की रक्षा तथा वृद्धि करना है ।”

(v) स्वतंत्रता पर कानून का नियंत्रण अनिवार्य है- व्यक्ति की स्वतंत्रता पर कानून का नियंत्रण अनिवार्य है, अन्यथा व्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित नहीं रह सकती । हाइट का कथन है कि, “केवल स्वतंत्रता ही एक ऐसी वस्तु है, जिसमें तुम तब तक प्राप्त नहीं कर सकते हो, जब तक तुम इसे दूसरे को देने के लिए तत्पर न हो ।” समाज में रहकर कोई भी व्यक्ति स्वेच्छानुसार कार्य नहीं कर सकता है । उसे दूसरों के हितों का ध्यान रखना भी आवश्यक है । कानून इस बात पर नियंत्रण रखते हैं कि व्यक्ति को कौन से कार्य करने चाहिए और कौन से नहीं । इसलिए स्वतंत्रता पर कानून का नियंत्रण होना अनिवार्य माना जाता है । इस प्रकार स्पष्ट है कि कानून मनुष्य की स्वतंत्रता का मित्र है । वास्तव में स्वतंत्रता की उत्पत्ति कानून द्वारा होती है ।

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