UP BOARD CLASS 12TH CIVICS CHAPTER 6 Political Parties FULL SOLUTION FREE PDF

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UP BOARD CLASS 12TH CIVICS CHAPTER 6 Political Parties
UP BOARD CLASS 12TH CIVICS CHAPTER 6 Political Parties
पाठ--7  राजनीतिक दल (Political Parties)

लघु उत्तरीय प्रश्न UP BOARD CLASS 12TH CIVICS CHAPTER 6 Political Parties FULL SOLUTION


1 – “राजनीतिक दल लोकतंत्र के प्राण हैं ।।” इस कथन के प्रकाश में राजनीतिक दलों के दो कार्यों का उल्लेख कीजिए ।।

उत्तर– राजनीतिक दल लोकतंत्र के प्राण हैं ।। आधुनिक लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के दो प्रमुख कार्य निम्नवत् हैं
(i) राजनीतिक शिक्षा एवं निर्वाचन का संचालन—- राजनीतिक दल निर्वाचन में अपने प्रतिनिधियों को इस उद्देश्य से खड़ा करता है कि वे निर्वाचन मे विजयी होकर अपने दल की सरकार का निर्माण कर सकें, इसलिए वे निर्वाचन में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं ।। निर्वाचन से पूर्व राजनीतिक दल जनता को निर्वाचन संबंधी शिक्षा प्रदान करते हैं ।।

“दल की विरोधी गतिविधियाँ शिक्षा प्राप्ति की इच्छा रखने वाले लोगों को शिक्षा देती हैं और कम उत्साही तथा अशिक्षित लोगों में भी कुछ न-कुछ शिक्षा ओर दिलचस्पी उत्पन्न करती हैं ।।”……—-लॉर्ड ब्राइस


(ii) सरकार का निर्माण एवं आलोचना-— निर्वाचन में जो दल बहुमत प्राप्त करता है, वह सत्तारूढ़ दल कहलाता है और जो राजनीतिक दल पराजित हो जाते हैं, विरोधी दल कहलाते हैं ।। विरोधी दल सरकार की गलत नीतियों की आलोचना कर सरकार को लोकहित का कार्य करने के लिए विवश करते हैं ।। इस प्रकार स्पष्ट है कि लोकतांत्रिक मूल्यों की सुरक्षा के लिए राजनीतिक दलों का संगठित होना आवश्यक है ।। संसदात्मक सरकार के लिए तो राजनीतिक दलों का संगठित होना अनिवार्य है, क्योकि संसदीय शासन प्रणाली में राजनीतिक दलों के अभाव में सरकार का निर्माण असम्भव हो जाता है ।।

2 – राजनीतिक दलों के चार दोषों का उल्लेख कीजिए ।।
उत्तर– राजनीतिक दलों के चार दोष निम्नलिखित हैं
(i) जनमत का विभाजन—- विभिन्न राजनीतिक दल अपने अपने पक्ष में जनमत- निर्माण का प्रयास करते हैं, इससे इन दलों द्वारा जनमत विभाजित हो जाता है ।।


(ii) व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अतिक्रमण—- अनुशासनबद्धता के कारण राजनीतिक दलों में व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का परित्याग कर राजनीतिक दलों के आदेशों तथा निर्देशों के अनुसार आचरण करता है ।। इस प्रकार राजनीतिक दलों से व्यक्तिगत स्वतंत्रता का बलिदान होता है ।।’


(iii) राष्ट्रीय हितों की क्षति—- राजनीतिक दलों के कारण जनता विभिन्न गुटों में विभाजित हो जाती है, जिसके कारण राष्ट्रीय हितों की हानि होती है ।।

“दल केवल विधानमण्डलों को ही विभाजित नहीं करता, बल्कि देश को भी दो द्वेषपूर्ण पक्षों में बाँट देता है और विदेशों में देश का विभक्त रूप प्रस्तुत कर देता है ।।”——————-लॉर्ड ब्राइस

(iv) विवादों की उत्पत्ति—- राजनीतिक दलों के कारण देश में कई प्रकार के विवाद एवं संघर्ष उत्पन्न हो जाते हैं ।। परिणामस्वरूप विद्वान एवं बुद्धिजीवी वर्ग राजनीतिक कार्यों से उदासीन रहने लगते हैं ।। धार्मिक रूढ़िवादिता पर आधारित राजनीतिक दल समाज में साम्प्रदायिक संघर्षों को प्रोत्साहित करने में अपनी सक्रिय भूमिका का निर्वाह करते हैं ।।

3 – राजनीतिक दलों की लोकतंत्र में क्या भूमिका होती है?
उत्तर– वर्तमान समय में विश्व के लगभग सभी देशों में प्रतिनिध्यात्मक प्रजातन्त्रीय शासन ही प्रचलित है ।। इस शासन—-व्यवस्था में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है और प्रतिनिधियों द्वारा शासन किया जाता है ।। इस शासन व्यवस्था की समस्त प्रक्रिया राजनीतिक दलों द्वारा ही सम्पन्न होती है ।। लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की भूमिका निम्नरूपों में स्पष्ट की जा सकती है
(i) सर्वसाधारण में जागृति
(ii) राजनीतिक शिक्षा
(iii) शक्तिशाली सरकार का संगठन
(iv) दलीय अत्याचारों से मुक्ति
(v) प्रशासकीय कुशलता
(vi) योग्य व्यक्तियों का चयन
(vii) सरकार का दायित्व
(viii) लोकतंत्र का संचालन


4 – लोकतंत्र में राजनीतिक दल क्यों आवश्यक है?दो कारण बताइए ।।
उत्तर– लोकतंत्र में राजनीतिक दल आवश्यक हैं, इसके दो कारण निम्नवत् हैं–


(i) स्वस्थ लोकमत के निर्माण के लिए आवश्यक—- प्रजातन्त्र शासन लोकमत पर आधारित होता है तथा स्वस्थ लोकमत के अभाव में सच्चे प्रजातन्त्र की कल्पना असम्भव है ।। इस लोकमत के निर्माण तथा उसकी अभिव्यक्ति राजनीतिक दलों के आधार पर ही सम्भव है ।। इस सम्बन्ध में राजनीतिक दल जलसे एवं अधिवेशन आयोजित करते हैं तथा एजेण्ट, व्याख्यानदाताओं और प्रचारकों के माध्यम से जनता में राजनीतिक जागृति उत्पन्न करने का प्रयास करते हैं ।। राजनीतिक दल स्थानीय एवं राष्ट्रीय समाचार- पत्रों एवं प्रचार के आधार पर अपनी नीति जनता के सम्मुख रखते हैं ।।


(ii) चुनावों के संचालन के लिए आवश्यक—- जब मताधिकार बहुत अधिक सीमित था और निर्वाचक की संख्या कम थी, तब स्वतन्त्र रूप से चुनाव लड़े जा सकते थे, लेकिन अब सभी देशों में व्यस्क मताधिकार को अपना लिए जाने के कारण स्वतन्त्र रूप से चुनाव लड़ना असम्भव हो गया है ।। ऐसी स्थिति में राजनीतिक दल अपने दल की ओर से उम्मीदवारों को खड़ा करते और उसके पक्ष में प्रचार करते हैं ।। यदि राजनीतिक दल न हो तो आज के विशाल लोकतान्त्रिक राज्यों में चुनावों का संचालन लगभग असम्भव हो जाए ।।

5 – राजनीतिक दल के किन्हीं चार कार्यों का उल्लेख कीजिए ।।
उत्तर– राजनीतिक दल के चार कार्य निम्नलिखित हैं
(i) संविधान में परिवर्तन-— सामान्यतया संविधान लिखित होते हैं, राजनीतिक दल नागरिकों की आवश्यकताओं के अनुसार संविधान में संशोधन कराने के लिए जनमत का निर्माण करते हैं और सफलता मिलने पर संविधान में आवश्यकतानुसार संशोधन कर लोक—-कल्याण की योजनाओं को क्रियान्वित करते हैं ।।

(ii) राजनीतिक शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार–— राजनीतिक दल राजनीतिक शिक्षा और चेतना का प्रसार करते हैं ।। वे नागरिकों को मतदान प्रक्रिया के बारे में ज्ञान प्रदान करते हैं ।। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता मतदान केन्द्रों तक मतदाताओं को ले जाते हैं तथा उन्हें सही ढंग से मत डालने की जानकारी प्रदान करते हैं ।।
इस संबंध में लावेल का विचार है—- “राजनीतिक दल राजनीतिक विचारों के दलाल के रूप में कार्य करते हैं ।।”

(iii) राष्ट्रीय नीति का निर्माण—- प्रत्येक राजनीतिक दल अपनी किसी विशिष्ट राष्ट्रीय नीति का प्रतिपादन करता है ।। निर्वाचन में अपने प्रतिनिधियों को विजयी बनाकर राजनीतिक दल राष्ट्रीय नीति का निर्माण करते हैं तथा उस नीति को क्रियान्वित भी करते हैं ।।

(iv) सामाजिक और सांस्कृतिक कार्य—- राजनीतिक दल महत्वपूर्ण सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यों को भी सम्पन्न करते हैं ।। यह बहुमत निर्दलीय विधायकों का नहीं हो सकता, क्योंकि उनकी न तो समान विचारधारा होती है और न ही वे सर्वसम्मति से अपने में से किसी एक व्यक्ति को अपना नेता स्वीकार कर सकते हैं ।। बहुमत केवल राजनीतिक दलों का ही हो सकता है ।।

6 – द्विदलीय प्रणाली के कोई दो लाभ बताइए ।।
उत्तर– द्विदलीय प्रणाली के दो लाभ निम्नवत् हैं
(i) प्रशासन में एकरूपता—- द्विदलीय शासन—-प्रणाली में सरकार की बागडोर एक ही दल के हाथों में होने से शासन में एकरूपता पायी जाती है ।।


(ii) निरंकुशता से मुक्ति—-द्विदलीय शासन—-प्रणाली में विरोधी दल सत्तारूढ़ दल की आलोचना करता है ।। इसलिए सत्तारूढ़ दल नियमित और संयमित रूप से अपना कार्य करता रहता है, जिसके कारण सत्तारूढ़ दल निरंकुश नहीं हो पाता है ।।

7 – द्विदलीय प्रणाली के कोई चार गण लिखिए ।।
उत्तर– द्विदलीय प्रणाली के चार गुण निम्नवत् हैं
(i) जनतंत्रात्मक शासन प्रणाली
(ii) उत्तरदायी शासन—-प्रणाली
(iii) प्रशासन की स्थिरता
(iv) सरकार व जनता में घनिष्ठता

8 – द्विदलीय प्रणाली की कोई दो विशेषताएँबताइए ।।
उत्तर– उत्तर के लिए प्रश्न संख्या—-7 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।।

9 – द्विदलीय प्रणाली के दो दोषों का उल्लेख कीजिए ।।
उत्तर– द्विदलीय प्रणाली के दो दोष निम्नवत् हैं
(i) मत प्रदर्शन का संकुचित क्षेत्र—-द्विदलीय शासन-प्रणाली में मतदाताओं को केवल दो ही दलों के बीच मत प्रदान करने का विकल्प रहता है, इसलिए इस प्रणाली में मत प्रदर्शन का क्षेत्र अत्यन्त संकुचित रहता है ।।
(ii) विधायिका के महत्व में कमी—- द्विदलीय व्यवस्था में विधायिका का महत्व कम हो जाता है क्योंकि बहुमत दल के
समर्थन के कारण मन्त्रिमण्डल की प्रधानता हो जाती है ।।

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विस्तृत उत्तरीय प्रश्न


1 – राजनीतिक दलों से आप क्या समझते हैं? लोकतंत्र में इनका क्या महत्व है?
उत्तर– राजनीतिक दल—- राजनीतिक दल ऐसे नागरिकों का एक समुदाय कहा जा सकता है जिसका सार्वजनिक महत्व के प्रश्नों पर सामान्य दृष्टिकोण होता है, जो अपने सिद्धान्तों को कार्यान्वित करने के लिए शासन पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है ।।
लोकतंत्र में राजीतिक दलों का महत्व—- प्रजातंत्र में राजनीतिक दलों के महत्व को निम्न रूपों में स्पष्ट किया जा सकता है


(i) सर्वसाधारण में जागृति—- राजनीतिक दल निर्वाचनों में अपने प्रतिनिधियों को खड़ा करते हैं और निर्वाचन के समय _ विभिन्न राजनीतिक समस्याओं को जनता के समक्ष प्रस्तुत करते हैं ।। इस कार्य के माध्यम से राजनीतिक दल जनता में पूर्ण रूप से राजनीतिक जागृति उत्पन्न कर देते हैं, जिससे जनसामान्य को राजनीतिक समस्याओं का पूर्ण ज्ञान हो जाता है ।।


(ii) राजनीतिक शिक्षा—- राजनीतिक दल नागरिकों को निर्वाचन में भाग लेने, मतों का उचित रूप से प्रयोग करने तथा मत प्रदान करने आदि से संबंधित बातों का ज्ञान प्रदान करते हैं ।। इस प्रकार राजनीतिक दल जनता के राजनीतिक ज्ञान में भी वृद्धि करते हैं ।।

(iii) शक्तिशाली सरकार का संगठन—- राजनीतिक दल अपने प्रतिनिधियों को चुनाव में सफल बनाकर एक शक्तिशाली सरकार का निर्माण करते हैं ।। यह शक्तिशाली सरकार जनता के हितों का ध्यान रखती है और अपने पक्ष में जनमत का निर्माण करती है ।। इस प्रकार राजनीतिक दल सुसंगठित सरकार का निर्माण करके लोक—-कल्याण को प्रोत्साहन देते हैं ।।


(iv) दलीय अत्याचारों से मुक्ति—-निर्वाचन में विजयी दल सरकार का निर्माण करता है और अन्य विरोधी दल संगठित होकर सरकार के जन—-विरोधी कार्यों की आलोचना करते हैं ।। इस आलोचना के भय से सत्तारूढ़ दल की निरंकुशता नहीं बढ़ती है ।। इसलिए कहा जाता है कि राजनीतिक दलों के कारण नागरिक को दलीय अत्याचारों से मुक्ति मिल जाती है ।।


(v) प्रशासकीय कुशलता—- राजनीतिक दल जटिल समस्याओं का अध्ययन करते हैं और सर्वसाधारण को सरल भाषा में उन्हें समझाते हैं ।। सरकार को समय-समय पर अनेक महत्वपूर्ण सुझाव देते हैं, जिससे शासन में कार्यकुशलता तथा उत्तरदायित्व की भावना में वृद्धि हो ।।


(vi) योग्य व्यक्तियों का चयन—- राजनीतिक दलों का उद्देश्य निर्वाचन में विजयी होकर सरकार की शक्तियों को अपने हाथों में लेना होता है ।। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए राजनीतिक दल ऐसे योग्य व्यक्तियों का चयन करते हैं, जो विजयी दल की सरकार को स्थायित्व प्रदान कर सकें ।। इस प्रकार राजनीतिक दलों द्वारा योग्यतम व्यक्तियों को प्रोत्साहन दिया जाता है ।।


(vii) सरकार का स्थायित्व—-विरोधी दलों की आलोचना के भय से सत्तारूढ़ दल लोक—-कल्याण के कार्यों की ओर अग्रसर रहता है और अपने पक्ष में कुशल जनमत का निर्माण करके अपने दल की सरकार को स्थायी बनाने का प्रयास करता है ।। वस्तुतः राजनीतिक दलों से शासन में दृढ़ता रहती है ।।


(viii) लोकतंत्र का संचालन सम्भव—-राजनीतिक दलों द्वारा ही लोकतंत्र सम्भव होता है ।। वस्तुतः लोकतंत्र राजनीतिक दलों के बिना सम्भव नहीं हो सकता ।।


(ix) सरकार तथा नागरिकों में सहयोग—- राजनीतिक दल विधानमण्डलों में अपने प्रतिनिधियों को निर्वाचित कराकर भेजते हैं और विजयी प्रतिनिधियों का निर्वाचकों से परिचय कराते हैं ।। इस प्रकार राजनीतिक दलों के माध्यम से सरकार और नागरिक के बीच संबंध स्थापित हो जाता है और सरकार को नागरिकों का सहयोग मिलने लगता है ।।


(x) राष्ट्रीय एकता का साधन—- राजनीतिक दल समाज में उस व्यापक दृष्टिकोण की रचना करने में सहायक होते हैं, जिससे राष्ट्रीय एकता के बन्धन दृढ़ होते हैं ।।
(xi) शासन में लचीलापन उत्पन्न करने में सहायक—- राजनीतिक दल संविधान और सरकार में लचीलापन उत्पन्न करते हैं ।। राजनीतिक दल शासन के विभिन्न अंगों में समन्वय और सामंजस्य उत्पन्न करते हैं ।।

2 – राजनीतिक दल की परिभाषा लिखिएतथा इसके कार्यों की विवेचना कीजिए ।।
उत्तर– राजनीतिक दल की परिभाषा—-राजनीतिक दल कुछ लोगों का एक ऐसा संगठन होता है, जो किसी सिद्धान्त पर एकमत होकर अपने सामूहिक प्रयत्नों द्वारा जनता के हित के कार्य करना चाहते हैं ।। राजनीतिक दलों के कार्य—- आधुनिक लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं
(i) राजनीतिक शिक्षा एवं निर्वाचन का संचालन—- राजनीतिक दल निर्वाचन में अपने प्रतिनिधियों को इस उद्देश्य से खड़ा करता है कि वे निर्वाचन मे विजयी होकर अपने दल की सरकार का निर्माण कर सकें, इसलिए वे निर्वाचन में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं ।। निर्वाचन से पूर्व राजनीतिक दल जनता को निर्वाचन संबंधी शिक्षा प्रदान करते हैं ।।

(ii) सरकार का निर्माण एवं आलोचना—-निर्वाचन में जो दल बहुमत प्राप्त करता है, वह सत्तारूढ़ दल कहलाता है और जो राजनीतिक दल पराजित हो जाते हैं, विरोधी दल कहलाते हैं ।। विरोधी दल सरकार की गलत नीतियों की आलोचना कर सरकार को लोकहित का कार्य करने के लिए विवश करते हैं ।। इस प्रकार स्पष्ट है कि लोकतांत्रिक मूल्यों की सुरक्षा के लिए राजनीतिक दलों का संगठित होना आवश्यक है ।। संसदात्मक सरकार के लिए तो राजनीतिक दलों का संगठित होना अनिवार्य है, क्योंकि संसदीय शासन प्रणाली में राजनीतिक दलों के अभाव में सरकार का निर्माण असम्भव हो जाता है ।।

(ii) शासन के विभिन्न अंगों में समन्वय—- सरकार के तीन अंग होते हैं ।। इन्हें व्यवस्थापिका (विधायिका), कार्यपालिका और न्यायपालिका कहा जाता है ।। इन तीन अंगों में पारस्परिक मतभेद होने से सरकार का कार्य अवरुद्ध हो जाता है और सरकार के कार्य में गतिरोध की स्थिति उत्पन्न हो जाती है ।। राजनीतिक दल सरकार के इन अंगों में समन्वय स्थापित कर गतिरोध की समस्या को हल करते हैं ।।

(iv) जनमत का निर्माण—- लोकतंत्रात्मक शासन—-प्रणाली में जनता द्वारा अपने प्रतिनिधियों का निर्वाचन किया जाता है ।। राजनीतिक दल इन प्रतिनिधियों के व्यक्तिगत गुणों का प्रचार—-प्रसार कर अपने पक्ष में कुशल जनमत का निर्माण करते हैं ।। ऐसा कर राजनीतिक निर्वाचकों का पथ—-प्रदर्शन करते हैं ।।


(v) समस्याओं की व्याख्या—- लोकतंत्रात्मक शासन—-प्रणाली में जनता के हितों का विशेष ध्यान रखा जाता है ।। लोक–कल्याण के कार्यों से संबंधित विभिन्न समस्याएँ उत्पन्न होती हैं ।। राजनीतिक दल इन समस्याओं की व्याख्या ऐसी सरल भाषा में करते हैं कि सर्वसाधारण भी उन समस्याओं से परिचित हो जाता है और नागरिक उन समस्याओं का समाधान करने में प्रशासन की सहायता करता है ।।


(vi) स्थानीय संस्थाओं को प्रोत्साहन—- राजनीतिक दल स्थानीय संस्थाओं की विशेषताओं और महत्व को स्पष्ट कर नागरिकों की ऐसी स्थानीय संस्थाओं को जन्म देने की प्रेरणा देते हैं, जो उनकी समस्याओं का समाधान करने में योगदान दे सकें ।। निगम, नगरपालिका परिषद्, ग्राम–पंचायत, जिला-पंचायत आदि का निर्माण राजनीतिक दलों की प्रेरणा के ही परिणाम होते हैं ।। इस प्रकार राजनीतिक दल लोकतांत्रिक शासन की सफलता के लिए अनिवार्य हैं ।।


(vii) जनता और प्रतिनिधियों के मध्य सीधे सम्पर्क की व्यवस्था– राजनीतिक दल अपने—-अपने प्रतिनिधियों को निर्वाचन में प्रत्याशी बनाते हैं ।। साथ—-ही—-साथ वे इन प्रतिनिधियों का निर्वाचकों से परिचय भी कराते हैं ।। इस प्रकार राजनीतिक दल प्रतिनिधियों और निर्वाचकों के बीच सीधा सम्पर्क स्थापित कर दोनों के संबंधों में घनिष्ठता उत्पन्न करते हैं तथा समय पड़ने पर निर्वाचकगण अपने प्रतिनिधियों से मिलकर सरकार से अपनी समस्याओं का समाधान कराते हैं ।।


(viii) प्रतिनिधियों की कर्त्तव्यपरायणता—- लोकतांत्रिक शासन—-प्रणाली में राजनीतिक दल निर्वाचकों द्वारा प्रतिनिधियों को निर्वाचित कराकर विधानमण्डलों में भेजते हैं ।। साथ—-ही—-साथ ये राजनीतिक दल निर्वाचकों को ऐसे प्रतिनिधियों के संबंध में भी बताते रहते हैं जो अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करते है ।। कुछ देशों में इन राजनीतिक दलों से प्रेरणा लेकर निर्वाचक मण्डल ने अपने प्रतिनिधियों को वापस बुला लेने की प्रथा प्रारम्भ की है ।। इस प्रकार राजनीतिक दल प्रतिनिधियों को कर्त्तव्यपरायण बनाते हैं ।।


(ix) संविधान में परिवर्तन—- सामान्यतया संविधान लिखित होते हैं, राजनीतिक दल नागरिकों की आवश्यकताओं के अनुसार संविधान में संशोधन कराने के लिए जनमत का निर्माण करते हैं और सफलता मिलने पर संविधान में आवश्यकतानुसार संशोधन कर लोक—-कल्याण की योजनाओं को क्रियान्वित करते हैं ।।

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Up Board Class 12th Civics Chapter 3 Liberty and Equality स्वतन्त्रता एवं समानता

(X) राजनीतिक शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार—- राजनीतिक दल राजनीतिक शिक्षा और चेतना का प्रसार करते हैं ।। वे नागरिकों को मतदान प्रक्रिया के बारे में ज्ञान प्रदान करते हैं ।। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता मतदान केन्द्रों तक मतदाताओं को ले जाते हैं तथा उन्हें सही ढंग से मत डालने की जानकारी प्रदान करते हैं ।।
इस संबंध में लावेल का विचार है—- “राजनीतिक दल राजनीतिक विचारों के दलाल के रूप में कार्य करते हैं ।।”


(xi) राष्ट्रीय नीति का निर्माण—- प्रत्येक राजनीतिक दल अपनी किसी विशिष्ट राष्ट्रीय नीति का प्रतिपादन करता है ।। निर्वाचन में अपने प्रतिनिधियों को विजयी बनाकर राजनीतिक दल राष्ट्रीय नीति का निर्माण करते हैं तथा उस नीति को क्रियान्वित भी करते हैं ।।


(xii) सामाजिक और सांस्कृतिक कार्य—- राजनीतिक दल महत्वपूर्ण सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यों को भी सम्पन्न करते हैं ।। यह बहुमत निर्दलीय विधायकों का नहीं हो सकता, क्योंकि उनकी न तो समान विचारधारा होती है और न ही वे सर्वसम्मति से अपने में से किसी एक व्यक्ति को अपना नेता स्वीकार कर सकते हैं ।। बहुमत केवल राजनीतिक दलों का ही हो सकता है ।।

3 – लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की क्या उपयोगिता है? क्या अधिक राजनीतिक दल होने से लोकतंत्र अधिक सुदृढ़ हो सकता है? दो तर्क देकर समझाइए ।।
अथवा
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का महत्व बताइए ।।

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उत्तर– लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की उपयोगिता ( महत्व)——- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या—-1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।। अधिक दल होने से लोकतंत्र अधिक सुदृढ नहीं बनता बल्कि कमजोर हो जाता है ।। इसके दो कारण निम्न हैं–


(i) निर्बल सरकार—- बहुदलीय व्यवस्था मिले—-जुले मन्त्रिमंडल को जन्म देती है जो बहुत अधिक अस्थिर होते हैं ।। जहाँ कहीं शासन में शामिल राजनीतिक दलों के हित परस्पर टकराते हैं, वहीं विवाद हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप शासन का पतन हो जाता है ।।
(ii) शक्तिशाली विरोधी दल का अभाव—- लोकतंत्र में अधिक दल होने से शक्तिशाली विरोधी दल का अभाव होता है, शक्तिशाली विपक्ष न होने से जनहित की अवहेलना की आशंका बनी रहती है ।।


4 – राजनीतिक दलों अथवा दल प्रणाली के गुणों व दोषों की विवेचना कीजिए
अथवा
राजनीतिक दल से क्या तात्पर्य है? दल—-पद्धति के गुण—-दोषों की व्याख्या कीजिए ।।

उत्तर– दल प्रणाली के गुण-दल प्रणाली के प्रमुख गुण इस प्रकार हैं
(i) प्रजातन्त्र शासन के लिए अनिवार्य—- राजनीतिक दल प्रजातन्त्र–शासन के लिए आधार रूप होते हैं ।। जनता में राजनीति शिक्षा का कार्य वहीं सम्पन्न करते हैं ।। यदि राजनीतिक दल न हों तो देश में संगठित बहुमत का होना सम्भव नहीं हो सकता ।। बहुमत के अभाव में सरकार का निर्माण नहीं किया जा सकता ।। इसीलिए लीकॉक ने कहा है, “दलबन्दी एक ऐसी चीज है जो प्रजातन्त्र को सम्भव बनाती है ।।”


(ii) अराजकता पर नियन्त्रण—- इन दलों के कारण ही एक सरकार के बदलने पर जब दूसरी सरकार की स्थापना होती है तो उस समय अराजकता नहीं फैलती ।।


(iii) निर्वाचकों को राजनीतिक शिक्षा प्रदान करना—- राजनीतिक दल निर्वाचकों को शिक्षित, अनुशासित तथा संयमी बनाने के कार्य में अत्यन्त महत्वपूर्ण भाग लेते हैं ।। वे राजनीतिक साहित्य, समाचार—-पत्रों तथा सभाओं के द्वारा जनता को राजनीतिक शिक्षा प्रदान करते हैं तथा उस देश की समस्याओं से अवगत कराके सार्वजनिक कार्यों की ओर रूचि बढ़ाते हैं ।।


(iv) अनुसंधानशालाओं की स्थापना—- बड़े—-बड़े राजनीतिक दल की एक आर्थिक एवं वैज्ञानिक उन्नति के लिए अन्वेषण एवं शोध संस्थायें करते हैं और उन समस्याओं के वास्तविक कारण एवं उन पर दल तथा देश की उन्नति के लिए विचार करते हैं ।।

(v) समाज सुधार के कार्य करना—- कभी—-कभी राजनीतिक दल सामाजिक सुधार का कार्य भी करते हैं ।। कांग्रेस दल ने हरिजनों के उद्धार, स्त्री शिक्षा, अस्पृश्यता निवारण का प्रयत्न किया ।।

(vi) नागरिकों को राजनीतिक अधिकारों के उचित प्रयोग की शिक्षा प्रदान करना—- राजनीतिक दल प्रत्येक नागरिक को इस बात की शिक्षा देते हैं कि वे अपने राजनीतिक अधिकारों का अधिक से अधिक उपयोग किस प्रकार करें? वे नागरिकों की शक्ति में वृद्धि करके उस शक्ति का प्रयोग रचनात्मक कार्यक्रम में करते हैं ।।

(vii) कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका के मध्य सामंजस्य स्थापित करना—- अध्यक्षात्मक सरकार में राजनीतिक दल विधानमण्डल तथा कार्यपालिका में सामंजस्य स्थापित करते हैं ।।

(vii) निर्धन व्यक्तियों को चुनाव लड़ने का अवसर प्रदान करना—- राजनीतिक दलों के माध्यम से निर्धन व्यक्ति भी चुनाव में खड़े हो सकते हैं, क्योंकि उनको चुनाव का खर्चा दलों से मिल जाता है ।।

(ix) सरकार की निरंकुशता पर नियन्त्रण—-राजनीतिक दलों के कारण सरकार की निरंकुशता पर नियन्त्रण रहता है ।। विरोधी दल सरकार की कार्यवाही की जाँच—-पड़ताल करते हैं और उसको स्वेच्छाचारी बनने से रोकते हैं ।।

(x) जनता तथा सरकार के बीच सम्पर्क स्थापित करना—- राजनीतिक दल ही वह माध्यम है जो जनता और सरकार के बीच आवश्यक सम्पर्क स्थापित कराते हैं ।। जनता की आवाज को सरकार तक पहुँचाना इन्हीं का कार्य है ।।

(xii) अनुशासन की भावना में वृद्धि करना—- दल प्रणाली एक विशेष प्रकार की अनुशासन व्यवस्था लागू करती है ।। इस प्रणाली के अभाव में प्रत्येक व्यक्ति ममनानी करेगा और अपने हित का ध्यान रखेगा ।। अत: आत्मानुशासन के लिए दल अनिवार्य है ।। दल प्रणाली के दोष—- दल प्रणाली के गुणों के साथ—-साथ भयंकर दोष भी हैं, जो निम्नलिखित हैं

(i) प्रजातन्त्रीय सिद्धान्त के विरूद्ध—- दल—-प्रथा सच्चे प्रजातन्त्रीय सिद्धान्त के विरुद्ध हैं क्योंकि इसमें दल के अनुशासन के नाम पर व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अपहरण किया जाता है ।।

(ii) नैतिक स्तर का गिरना—- राजनीतिक दलों का नेतृत्व कुछ ऐसे लोगों के हाथ में आ जाता है जो सिद्धान्तहीन होते हैं और चुनाव लड़ने में उचित और समुचित उपायों का भेद नहीं करते ।। योग्य व्यक्तियों का राजनीति से पृथक रहना—- राजनीतिक दलबन्दी के परिणामस्वरूप कभी—-कभी इन दलों में अयोग्य और निम्नकोटी के व्यक्तियो का इस प्रकार प्रभाव स्थापित हो जाता है कि विचारशील एवं योग्य व्यक्तियों का राजनीति में भाग लेना असम्भव हो जाता है ।।

(iv) जनता को वास्तविकता का ज्ञान नहीं हो पाता—- राजनीतिक दलों के पक्षपातपूर्ण प्रचार के कारण जनता को सत्य एवं वास्तविक बात का पता लगाना असम्भव हो जाता है और वह दलों के हाथों की कठपुतली बन जाती है ।।

(v) अयोग्य व्यक्तियों का सत्तारूढ़ होना—- राजनीतिक दलों के कारण जब मन्त्रिमण्डल का निर्माण होता है तो कभी—-कभी ऐसे व्यक्ति भी सत्तारूढ़ हो जाते हैं, जिनमें शासन सम्बन्धी कुछ भी योग्यता नहीं होती ।।

(vi) भ्रष्टाचार का प्रसार—- राजनीतिक दलों के कारण पक्षपात, रिश्वत, बेईमानी तथा ऐसी ही अन्य बुराईयों का बाजार गर्म हो जाता है ।। दलों के नेता चुनाव के समय धनिकों को अपनी पार्टी की ओर से चुनाव में खड़े करने का प्रलोभन देकर बहुत रिश्वत ले लेते है ।। जिस दल की सरकार बन जाती है वह अपने दल के व्यक्तियों को ही बड़े—-बड़े पदों पर रखते हैं, चाहे उनमें उस पद को सम्भालने की योग्यता हो या न हो ।।

(vii) राष्ट्र अनेक समूहों में विभक्त हो जाता है—- दलों के कारण राष्ट्र अनेक समूहों में विभक्त हो जाता है ।। दल के सदस्य अपने दल के हितों के सामने देश के हितों की उपेक्षा कर देते हैं ।।

(viii) सरकार को अस्थिरता—- जिस देश में विधानमण्डल में बहुत से दल पहुँच जाते हैं, वहाँ स्थायी सरकार बनना असम्भव हो जाता है ।।

(ix) राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा—- दलबन्दी प्रथा से व्यक्तियों का नैतिक पतन हो जाता है और वे किसी भी विषय पर निष्पक्ष रूप से विचार नहीं करते, अपितु अपने दल के अनुसार ही सोचते हैं ।। दल प्रणाली से राष्ट्रीय हित की उपेक्षा होती है ।। दलबन्दी में पड़कर लोग दलीय हितों के लिए राष्ट्रीय हितों का बलिदान कर देते हैं ।। मैरियट ने ठीक ही कहा है, कि “दल—-भक्ति के आधिक्य से देश—-भक्ति की आवश्यकताओं पर पर्दा पड़ सकता है ।। वोट प्राप्त करने के धन्धे पर अत्यधिक ध्यान देने से दलों के नेता और उनके प्रबन्धक देश की उच्चतम आवश्यकताओं को भुलाते हैं ।।”

(x) देश योग्य व्यक्तियों की सेवाओं से वंचित रह जाता है—- इस प्रथा के कारण सरकार में केवल वही व्यक्ति सम्मिलित होते हैं, जिनका विधानमण्डल में बहुमत होता है ।। दूसरे दल के योग्य व्यक्ति भी सरकार से वंचित रह जाते है ।। इस प्रकार देश को योग्य व्यक्तियों की सेवायें उपलब्ध नहीं हो पाती ।।

(xi) बहुमत दल की तानाशाही—- व्यवस्थापिका सभा में जिस दल को बहुमत प्राप्त होता है वह सरकार का निर्माण करता है ।। सरकार का निर्माण करने के उपरान्त बहुमत दल निरंकुश बनने का प्रयत्न करता है ।। इसी कारण अलेक्जेण्डर पोप ने लिखा है, “दल कुछ व्यक्तियों के लाभ के लिए अधिकतम व्यक्तियों का पागलपन है ।।”

(xii) स्थानीय वायुमण्डल का दूषित हो जाना—- दल पद्धति के कारण नगर पालिकाओं, नगर—-निगमों, जिला परिषदों तथा ग्राम पंचायतों आदि स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं में भी दलीय राजनीति का प्रवेश हो जाता है ।। इसके कारण इन संस्थाओं में किसी विषय पर निष्पक्ष रूप से विचार होना असम्भव हो जाता है ।।

निष्कर्ष—-दल प्रणाली में दोषों के होते हुए भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आधुनिक प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों का बहुत महत्व है ।। राजनीतिक दल हमारे राजनीतिक विचार का अभिन्न अंग बन गये हैं ।। हम राजनीतिक दलों के अभाव में आधुनिक जनतन्त्र प्रणाली की कल्पना भी नहीं कर सकते ।।

5 – एकदलीय व्यवस्था के गुण तथा दोषों पर टिप्पणी लिखिए ।।
उत्तर– एकदलीय पद्धति- जिस शासन–व्यवस्था में शासन पर एक ही राजनीतिक दल का नियन्त्रण हो और शासन की नीति का निर्धारण करने में भी एक ही राजनीतिक दल प्रभावशाली हो, तो वह पद्धति एकदलीय पद्धति कहलाती है ।। इस व्यवस्था में अन्य राजनीतिक दल भी हो सकते हैं, परन्तु इन दलों का शासन की नीतियों या निर्वाचन की प्रक्रिया पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता ।। गुण—- एकदलीय पद्धति के प्रमुख गुण निम्नलिखित हैं

(i) लोक—-कल्याण की भावना—- एकदलीय पद्धति में लोकहित की भावना रहती है ।। लोक—-कल्याण की भावना होना ही एकदलीय पद्धति का सर्वश्रेष्ठ गुण है ।।

(ii) प्रशासकीय कुशलता—- एकदलीय पद्धति में शासन की नीतियों का निर्माण एक ही दल के राजनीतिज्ञों द्वारा किया जाता है ।। इस प्रकार की नीति में स्थायित्व तथा दृढ़ता होती है ।। इससे प्रशासन में कुशलता पाई जाती है ।।

(iii) मितव्ययिता—- एकदलीय पद्धति का प्रभाव रहने के कारण राज्य के कार्यों में कम खर्च तथा कम समय लगता है ।। इसमें सभी कार्य सरलता से पूर्ण हो जाते हैं ।। अतएव एकदलीय शासन प्रणाली मितव्ययी होती है ।।

(iv) गुणों की प्रधानता—- एकदलीय पद्धति में विवेकशील व्यक्तियों को ही प्रशासन में कार्य करने का अवसर दिया जाता है ।। अतएव इस पद्धति में योग्यतम व्यक्तियों की सेवा शासन को प्राप्त हो जाती है ।।

(v) पिछड़े हुए देशों के विकास के लिए अधिक उपयुक्त—-पिछड़े हुए देशों के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की दृष्टि से एकदलीय प्रणाली ही अच्छी मानी जाती है ।।

(vi) राष्ट्रीय एकता—- एकदलीय व्यवस्था में जनता में विभाजन तथा गुटबन्दी का भय समाप्त हो जाता है तथा राष्ट्रीय एकता बनी रहती है ।।

(vii) अनुशासनबद्धता—- एक दल की प्रधानता के कारण सरकार के कार्यों में अनुशासनबद्धता बनी रहती है ।। इसके अतिरिक्त एकदलीय पद्धति में सदस्यों की संख्या भी सीमित होती है ।।

(viii) संकटकालीन सुरक्षा—- एकदलीय पद्धति में प्रशासन पर एक ही दल का नियन्त्रण स्थापित होता है ।। एकदलीय पद्धति में राज्य का सैनिक संगठन सुदृढ़ होता है ।। जो संकटकाल में उपयुक्त सुरक्षा प्रदान करता है ।। दोष—- एकदलीय पद्धति के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं

(i) दलीय अत्याचारों में वृद्धि—- एकदलीय पद्धति में शासन पर एक ही दल का नियन्त्रण बना रहता है, अतएव एकदलीय पद्धति में एक दल की निरंकुशता बढ़ने का अधिक भय रहता है ।।

(ii) लोक-कल्याण की उपेक्षा—- एकदलीय सरकार में सत्तारूढ़ दल केवल अपने ही हितों को पूरा करता है, इसलिए वह लोक—-कल्याण व लोकहितों की उपेक्षा करता है ।।


(iii) लोकतंत्र के सिद्धान्तों की उपेक्षा—- लोकतांत्रिक शासन में सत्तारूढ़ दल की गलत नीतियों की आलोचना के लिए विरोधी दल का होना आवश्यक है, किन्तु एक दलीय पद्धति में इस प्रकार के विरोधी दल नहीं पाए जाते ।। अतएव एकदलीय पद्धति लोकतंत्र शासन की विरोधी कहलाती है ।।

(iv) वैयक्तिक स्वतंत्रता का अभाव—- एकदलीय पद्धति में केवल एक ही दल का शासन पर नियन्त्रण रहता है, इसलिए इस पद्धति में व्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक दल का ही नियन्त्रण होने से उसे पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होती है ।।

(v) नेता को अधिक महत्व—- एकदलीय पद्धति में नेता को अत्यधिक महत्व दिया जाता है ।। उदाहरण के लिए मुसोलिनी ने इटली की जनता को यह शपथ दिलाई थी—-“ईश्वर और देश के नाम पर मै प्रतिज्ञा करता हूँ कि अपने नेता की प्रत्येक आज्ञा का प्रत्येक स्थिति में पालन करूंगा ।।”


“स्टालिन महान् सभी कुछ जानता है ।। वह सभी कुछ कर सकता है ।। वह कोई गलती नहीं कर सकता है ।।” —————-स्टलिन


(vi) प्रगतिशील विचारों का विरोधी—- एकदलीय शासन सभी प्रगतिशील विचारो, यथा—- लोकतंत्र, उदारवाद, समानता तथा स्वतंत्रता का विरोधी हो जाता है ।।

(vii) राष्ट्रीय हितों की क्षति—- एकदलीय पद्धति में दल के सदस्य अपने दल के प्रति भक्तिभाव रखते हैं और राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा करते हैं ।।

6 – दलीय प्रणाली के गुण—-दोषों की विवेचना कीजिए ।।
उत्तर– उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या—-4 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।।

7 – राजनीतिक दलों की परिभाषा दीजिए और आधुनिक लोकतंत्रों में राजनीतिक दलों का महत्व समझाइए ।।
उत्तर– उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या—-1 का अवलोकन कीजिए ।।

8 – लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का क्या महत्व है? इसके संगठन का क्या आधार होना चाहिए ।।
उत्तर– लोकतंत्र में राजनीति दलों का महत्व—- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या—-1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।।
राजनीतिक दलों के निर्माण का आधार—- वर्तमान राजनीतिक दलों के निर्माण या उत्पत्ति के दो प्रमुख आधार माने गए हैं, जिनका विवेचन इस प्रकार है—


(i) मनोवैज्ञानिक आधार-— मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से मानव स्वभाव में भिन्नता पाई जाती है लोगों के स्वभाव में निहित प्रवृत्तियाँ भी एक—-दूसरे से बिलकुल भिन्न होती हैं ।। कुछ लोगों का स्वभाव शान्तिप्रिय होता है ।। वे समाज के प्रचलित जीवन ढंग में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं चाहते ।। कुछ लोग स्वभाव से ही उग्र होते हैं ।। वे विद्यमान समाज व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन चाहते हैं, स्वभाव की यह भिन्नता ही विचारों में मतभेद उत्पन्न कर देती है, जो बाद में राजनीतिक दल के गठन का प्रमुख आधार बन जाती है ।।

उदाहरण के लिए इंग्लैण्ड की लेबर पार्टी वैधानिक उपायों से समाजवादी व्यवस्था स्थापित करने के पक्ष में है, जबकि कंजर्वेटिव पार्टी (अनुदार दल) देश में प्राचीन परिपाटी को ही बनाए रखने के पक्ष में है ।। इटली में फासिस्ट दल और जर्मनी में नाजी दल भी इसी प्रकार के उदाहरण रहे हैं ।।


(ii) आर्थिक आधार—- आर्थिक स्थिति की विषमता समाज को विभिन्न वर्गों में विभाजित करती है प्रत्येक वर्ग के हित एक दूसरे से भिन्न होते हैं ।। आर्थिक हितों की भिन्नता से प्रत्येक दल का कार्यक्रम भी एक- दूसरे से भिन्न होता है ।। “राष्ट्रीय दल क्षणिक आवेगों या अस्थायी आवश्यकताओं के आधार पर नहीं टिक सकते, इन्हें स्थायी सामुदायिक हितों, विशेषकर आर्थिक हितों पर आधारित होना चाहिए ।।” —-हैलकोम्ब

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