UP BOARD CLASS 12TH CIVICS CHAPTER 9 (Nationalism and Internationalism, Concept of Non-alignment

UP BOARD CLASS 12TH CIVICS CHAPTER 9 (Nationalism and Internationalism, Concept of Non-alignment राष्ट्रवाद तथा अन्तर्राष्ट्रवाद, गुटनिरपेक्षता की अवधारणा

UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 1 Principles of Origin of State

राष्ट्रवाद तथा अन्तर्राष्ट्रवाद, गुटनिरपेक्षता की अवधारणा (Nationalism and Internationalism, Concept of Non—-alignment)

लघु उत्तरीय प्रश्न
1– राष्ट्रवाद के दो कारक लिखिए ।
उत्तर —- राष्ट्रवाद के दो कारक निम्नलिखित हैं
(i) भौगोलिक एकता—- भौगालिक एकता राष्ट्रवाद का एक सहायक कारक है । समान भौगोलिक परिस्थितियों में रहने के कारण लोगों की आवश्यकताएँ एवं समस्याएँ भी समान होती हैं ।
(ii) भाषा की एकता—- समान भाषा—-भाषी देशों में समान विचार एवं साहित्य का सृजन होता है । समान रीति रिवाज एवं समान रहन—-सहन के कारण लोगों में राष्ट्रीयता की भावना का उदय होता है ।

2– राष्ट्रवाद के दो गुण बताइए ।
उत्तर —- राष्ट्रवाद के दो गुण हैं
(i) देश प्रेम की भावना—- राष्ट्रवाद या राष्ट्रीयता की भावना लोगों में देश प्रेम का भाव उत्पन्न करती है ।
(ii) आत्म—-सम्मान की भावना—- राष्ट्रवाद व्यक्ति में आत्म—-सम्मान की भावना जागृत करता है और इससे आत्म गौरव के सम्मान हेतु सुरक्षा की प्रेरणा को बल मिलता है ।

3– राष्ट्रीयता के विकास में दो उत्तरदायी तत्वों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर —- उत्तर के लिए लघुउत्तरीय प्रश्न संख्या—-1 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

4– राष्ट्रीयता के मार्ग में दो बाधाओं का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर —- राष्ट्रीयता के मार्ग में दो बाधाएँ निम्नवत् हैं
(i) देशभक्ति की भावना का अभाव—- जिस देश के नागरिकों में देशभक्ति का अभाव होता है, उस देश में राष्ट्रीयता का विकास नहीं हो पाता है । ऐसा देश दूसरे देश के अधीन होकर अपनी स्वतन्त्रता खो देता है ।
(ii) साम्प्रदायिकता की भावना—-साम्प्रदायिकता की भावना से शत्रुता, फूट, मतभेद, द्वेष आदि भावनाएँ जन्म लेती हैं, जो राष्ट्रीयता की प्रबल विरोधी हैं ।

5– राष्ट्रवाद के मार्ग की बाधाओं को दूर करने के चार उपाय लिखिए ।
उत्तर —- राष्ट्रवाद के मार्ग की बाधाओं को दूर करने के चार उपाय निम्नवत् हैं
(i) शिक्षा का व्यापक स्तर पर प्रचार तथा प्रसार किया जाना चाहिए तथा शिक्षा-व्यवस्था का समुचित प्रबन्ध होना चाहिए ।
(ii) संकुचित भावनाओं का त्याग और देशप्रेम या देशभक्ति की प्रबल भावना का विकास किया जाना चाहिए ।
(iii) देशभर में परिवहन तथा संचार के साधनों का पर्याप्त विकास किया जाना चाहिए ।
(iv) देश के विभिन्न भागों में भावात्मक, साहित्यिक तथा सांस्कृतिक सम्पर्क बढ़ाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए ।

6– अन्तर्राष्ट्रीयता से आप क्या समझते हैं? इसे संक्षेप में समझाइए ।
उत्तर —- अन्तर्राष्ट्रीयता का तात्पर्य विश्व—-प्रेम, विश्व बन्धुत्व एवं वसुधैव कुटुम्बकम की भावना से ओतप्रोत होना है अन्तर्राष्ट्रीयता वह भावपूर्ण स्थिति है, जिसके द्वारा व्यक्ति अपने को विश्व का नागरिक मानता है । यद्यपि ब्लॉक निकृष्ट भावनाएँ—-संकुचित राष्ट्रीयता, राष्ट्रों की स्वार्थपूर्ण नीति, विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएँ, देश के प्रति मोह आदि अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करती है, परन्तु फिर भी आज के बदलते परिवेश और विभिन्न प्रकार के विकासों के प्रति अन्यान्योश्रितता की दृष्टि से अन्तर्राष्ट्रीयता के महत्व पर पर्याप्त बल दिया जा रहा है ।

7– अन्तर्राष्ट्रीयता की दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर —- (i) विश्व के विभिन्न राष्ट्रों में पारस्परिक वैमनस्य तथा द्वैष का अन्त होता है ।
(ii) विश्व के राष्ट्रों के मध्य शान्तिपूर्ण सहयोग में वृद्धि होती है ।

8– अन्तर्राष्ट्रीयता के पक्ष में दो तर्क दीजिए ।
उत्तर —- अन्तर्राष्ट्रीयता के पक्ष में दो तर्क निम्नवत् हैं
(i) दो विश्व युद्धों के भयानक परिणाम को देखने के बाद विश्व का प्रत्येक देश अपनी सभ्यता और संस्कृति की रक्षा के लिए अन्तर्राष्ट्रीयता को महत्व दे रहा है ।
(ii) विश्व समस्याओं जैसे—- पर्यावरण प्रदूषण की समस्या, आतंकवाद, तथा भयंकर बीमारियाँ, निशस्त्रीकरण आदि समस्याओं के समाधान के लिए विश्व के सभी राष्ट्रों के लिए अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना का होना अति आवश्यक है ।

9– अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में सहायक किन्हींचार तत्वों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर —- अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में सहायक चार तत्व निम्नवत् हैं
(i) सांस्कृतिक एकता—- एक देश की संस्कृति सम्पूर्ण विश्व में प्रसारित हो जाती है । जैसे एक देश का साहित्य, खान—-पान, जीवन—-शैली, वेश भूषा, भाषा इत्यादि । अतः प्रत्येक देश का नागरिक अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना से जुड़ा हुआ है ।

(ii) आर्थिक निर्भरता—- विश्व का प्रत्येक देश अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के माध्यम से एक—-दूसरे से परस्पर संबंधित है, जो अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में सहायक है ।


(ii) यातायात और संचार साधनों में प्रगति—- यातायात और संचार साधनों में क्रान्तिकारी परिवर्तनों ने विभिन्न देशों के बीच की दूरी कम कर दी है । फलस्वरूप विश्व के देशों में अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना में वृद्धि हुई है ।


(iv) विश्व बन्धुत्व की भावना—- सभी धर्मो का सार मानवता और विश्व बन्धुत्व की धारणा पर आधारित है, इसने
अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में बहुत योगदान दिया है ।

10– अन्तर्राष्ट्रीयता की दो बाधाओं का उल्लेख करें ।
उत्तर —- उत्तर के लिए लघु उत्तरीय प्रश्न संख्या—-4 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

11– संयुक्त राष्ट्र के दो कार्य लिखिए ।
उत्तर —- संयुक्त राष्ट्र के दो कार्य हैं
(i) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा की व्यवस्था करना ।
(ii) अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक एवं मानवीय समस्याओं को सुलझाने में सहयोग देना । 1

2– संयुक्त राष्ट्र के किन्हींचार अंगों का नाम अंकित कीजिए ।
उत्तर —- संयुक्त राष्ट्र के चार अंगों के नाम निम्नलिखित हैं(i) साधारण सभा
(ii) सुरक्षा परिषद् (iii) आर्थिक तथा सामाजिक परिषद्
(iv) न्याय या संरक्षण परिषद्

13– संयुक्त राष्ट्र के दो प्रमुख उद्देश्यों को लिखिए ।
उत्तर —- संयुक्त राष्ट्र के दो प्रमुख उद्देश्य हैं
(i) अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा एवं शान्ति बनाए रखना
(ii) समस्त मानव जाति के अधिकारों का सम्मान करना ।

14– संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में भारत की स्थायी सदस्यता के पक्ष में दो तर्क दीजिए ।
उत्तर —- संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में भारत की स्थायी सदस्यता के पक्ष में दो तर्क निम्न हैं
(i) भारत संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना करने वाला एक संस्थापक सदस्य है ।
(ii) भारत ने सदैव संयुक्त राष्ट्र संघ के आदेशों का पूर्णतः पालन किया है ।

15– गुटनिरपेक्षता की नीति की चार विशेषताएँ लिखिए ।
उत्तर —- गुटनिरपेक्षता की नीति की चार विशेषताएँ निम्नवत् हैं
(i) शान्ति एवं सद्भावना की नीति का विस्तार करना ।
(ii) स्वतंत्र विदेश नीति का निर्धारण करना ।
(iii) साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, शोषण एवं आधिपत्य का विरोध करना ।
(vi) विकासशील नीति का अनुसरण करना ।

16– गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के किन्हीं दो लाभों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर —- गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के दो लाभ निम्नवत् हैं
(i) गुटनिरपेक्षता ने तृतीय विश्व युद्ध की सम्भावना को समाप्त करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है ।
(ii) गुटनिरपेक्षता ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को व्यापक रूप से प्रभावशाली बनाया है ।

17– गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के चार आधारभूत तत्वों का उल्लेख कीजिए ।
उत्तर —- गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के चार आधारभूत तत्व निम्नवत् हैं
(i) राष्ट्रवाद की भावना
(ii) साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध
(iii) शान्ति के लिए तीव्र इच्छा
(iv) आर्थिक विकास की लालसा

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

1– राष्ट्रीयता की परिभाषादीजिए । राष्ट्रीयता के विकास में बाधक तत्वों पर प्रकाश डालिए ।

उत्तर —- राष्ट्रीयता की परिभाषा—- राष्ट्रीयता एक ऐसी भावना है जो किसी भी देश के लोगों को उनकी एकता और अखण्डता के सूत्र में बाँधे रहती है और अपने देश और देशवासियों के प्रति सद्भावपूर्वक रहने की भावना को जागृत करती है ।

राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद के विकास में बाधाएँ—- राष्ट्रीय भावना के विकास में निम्नलिखित बाधाएँ उपस्थित होती हैं
(i) देशभक्ति की भावना का अभाव—-जिस देश के नागरिकों में देशप्रेम का अभाव होता है, उस देश में राष्ट्रीयता का विकास होना असम्भव है । ऐसा देश अल्प समय में ही दूसरे देश के अधीन होकर अपनी स्वतंत्रता खो बैठता है ।

(ii) साम्प्रदायिकता की भावना-किसी वर्ग-विशेष द्वारा अपने स्वार्थों को महत्व देना और दूसरे वर्ग या वर्गों के हितों की उपेक्षा करना या उन्हें नीचा दिखाने की प्रवृत्ति साम्प्रदायिकता कहलाती है । साम्प्रदायिकता से शत्रुता, फूट, मतभेद, द्वेष आदि भावनाएँ जन्म लेती हैं, जो राष्ट्रीयता की प्रबल विरोधी है ।

(iii) जातिवाद तथा भाषावाद—- सम्प्रदायवाद के समान ही जातिवाद और भाषावाद भी राष्ट्रीयता के विकास में बड़ी बाधा है । जातिवाद विभिन्न जातियों के बीच कटुता और घृणा का भाव उत्पन्न करता है तथा भाषावाद लोगों में एकता की भावना को खण्डित करता है । इस कारण विभिन्न जाति व भाषायी लोगों में राष्ट्रीयता की भावना विकसित नहीं हो पाती है ।

(iv) अज्ञानता और अशिक्षा—- राष्ट्रीय भावना के विकास में प्रमुख बाधक तत्व अज्ञानता और अशिक्षा हैं । शिक्षा के अभाव में व्यक्ति का दृष्टिकोण संकुचित हो जाता है ओर वह राष्ट्रहित के स्थान पर व्यक्तिगत हित को सर्वोपरि समझने लगता है । इस कारण ऐसे संकुचित दृष्टिकोण वाले व्यक्ति राष्ट्रीयता के विकास में बाधक सिद्ध होते हैं ।

(v) आवागमन के अच्छे साधनों का अभाव-आवागमन के अच्छे साधनों के अभाव में देश के विभिन्न भागों में रहने वाले लोगों के मध्य सम्पर्क स्थापित नहीं हो पाता है । इस सम्पर्क के अभाव में उस पारस्परिक एकता का जन्म नहीं हो पाता, जो राष्ट्रीयता का मूल आधार है । परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से अब विकसित एवं विकासशील देशों में आवागमन के अच्छे साधनों का अभाव नहीं रह गया है ।

(vi) क्षेत्रीयता की भावना—-क्षेत्रीयता की भावना राष्ट्रीयता के विकास के लिए अत्यन्त घातक है । इस भावना के कारण एक क्षेत्र में रहने वाले लोग दूसरे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों से घृणा करने लगते हैं । इसी कारण बंगाली, मराठी, मद्रासी, पंजाबी जैसी क्षेत्रीय धारणाएँ विकसित होती हैं, जो राष्ट्रीयता के विकास को अवरुद्ध कर देती हैं । भारत में नए राज्यों के गठन की माँग उग्र क्षेत्रवाद की भावना का ही परिणाम है ।

(vii) पराधीनता—- पराधीनता सभी बुराईयों की जड़ है । पराधीन व्यक्ति अपने देश या राष्ट्र के लिए न कुछ सोच सकता है और न कुछ कर सकता है । इसलिए पराधीनता राष्ट्रीयता के मार्ग की सबसे बड़ी अवरोधक है ।

2– राष्ट्रीयता की परिभाषादीजिए और राष्ट्र एवं राज्य में अन्तर स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर —- राष्ट्रीयता—- राष्ट्रीयता एक ऐसी भावना है, जो किसी भी देश के लोगों को उनकी एकता और अखण्डता के सूत्र में बाँधे रहती है और अपने देश और देशवासियों के प्रति सद्भावपूर्ण रहने की भावना को जागृत करती है । ।

राज्य और राष्ट्र में अन्तर—- साधारणतया राज्य और राष्ट्र दोनों शब्दों का प्रयोग समानार्थक शब्दों के रूप में किया जाता है । उदाहरण के लिए, जब हम ‘पश्चिमी देश’ या ‘एशियाई राष्ट्र’ या अफ्रीकी राष्ट्र’ कहते हैं, तो इनसे हमारा मतलब राष्ट्र नहीं बल्कि राज्य है । इसी प्रकार ‘संयुक्त राष्ट्र’ वास्तव में राष्ट्र राज्यों का एक संगठन है । प्रत्येक आधुनिक राज्य एक राष्ट्र राज्य है । इसके बावजूद राज्य और राष्ट्र में कुछ महत्वपूर्ण अन्तर हैं, जो निम्नलिखित है

(i) राज्य और राष्ट्र के तत्व अलग-अलग हैं | जनसंख्या, क्षेत्र, सरकार और सम्प्रभुता ये राज्य के चार आवश्यक तत्व हैं । इनमें से किसी एक तत्व की अनुपस्थित में कोई राज्य वास्तविक राज्य नहीं हो सकता है । ये चार तत्व सदैव एक राज्य के चारित्रिक गुण होते हैं । जबकि एक राष्ट्र लोगों के समूह की एकता और आम चेतना की प्रबल भावना है । एक क्षेत्र, एक जाति, एक धर्म, एक भाषा, एक इतिहास, एक संस्कृति और समान राजनीतिक आकांक्षाएँ ऐसे तत्व हैं, जो एक राष्ट्र के गठन में सहायक हैं परन्तु इनमें से कोई भी आवश्यक तत्व नहीं है । एक राष्ट्र का निर्माण करने वाले तत्व बदलते रहते हैं ।

(ii) राज्य एक राजनीतिक संगठन है जबकि राष्ट्र भावनात्मक एकता है—- राज्य एक राजनीतिक संगठन है जो अपने लोगों की सुरक्षा और कल्याणकारी आवश्यकताओं को पूरा करता है । यह बाह्य मानव क्रियाओं के साथ संबंध है यह एक कानूनी इकाई है । दूसरी तरफ एक राष्ट्र जनसंख्या की एकजुट इकाई है जो भावनात्मक, आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक बंधनों से भरा है ।

(iii) राज्य का क्षेत्र निश्चित होता है, राष्ट्र का नहीं—- प्रत्येक राज्य के लिए एक निश्चित क्षेत्र का होना आवश्यक है, यह राज्य का भौतिक तत्व है । राज्य एक क्षेत्रीय इकाई है लेकिन किसी राष्ट्र क्षेत्र के लिए यह आवश्यक नहीं है । एक देश एक निश्चित क्षेत्र के बिना भी जीवित रह सकता है । एक सामान्य मातृभूमि का प्यार एकता के स्रोत के रूप में कार्य करता है । उदाहरण के लिए, 1948 से पहले यहूदियों का एक राष्ट्र था, हालांकि उनके पास कोई निश्चित क्षेत्र नहीं था । जब 1948 में, उन्होंने एक निश्चित और परिभाषित क्षेत्र हासिल किया और इजरायल राज्य की स्थापना की ।

(iv) सम्प्रभुता राज्य के लिए आवश्यक है, राष्ट्र के लिए नहीं—- सम्प्रभुता राज्य का एक अनिवार्य तत्व है, यह राज्य की आत्मा है । सम्प्रभुता की अनुपस्थिति में, राज्य अपने अस्तित्व को खो देता है । यह सम्प्रभुता का तत्व ही राज्य को लोगों के अन्य सभी संगठनों से भिन्न बनाता है । एक राष्ट्र के लिए सम्प्रभुता रखने की आवश्यकता नहीं है । एक राष्ट्र की बुनियादी आवश्यकता अपने लोगों के बीच भावनात्मक एकता का मजबूत बंधन है जो समान सामाजिक व सांस्कृतिक तत्वों के कारण विकसित होती है । 1947 से पहले, भारत एक राष्ट्र था, लेकिन राज्य नहीं था क्योंकि इसकी संप्रभुता नहीं थी । (राज्य = राष्ट्र + सम्प्रभुता) 1947 में आजादी के बाद, भारत एक राज्य बन गया क्योकि ब्रिटिश शासन के अंत के बाद यह एक सार्वभौमिक संस्था बन गई । हालांकि, प्रत्येक देश हमेशा दूसरे देश के नियंत्रण से स्वतंत्र होने की इच्छा रखते हैं ।

(v) राष्ट्र राज्य की तुलना में व्यापक हो सकता है—- राज्य एक निश्चित क्षेत्र तक ही सीमित है । इसकी सीमाएँ बढ़ सकती हैं या घट सकती हैं लेकिन परिवर्तन की प्रक्रिया हमेशा बहुत जटिल है । हालांकि एक राष्ट्र एक निश्चित क्षेत्र की सीमा के भीतर नहीं रह सकता है । राष्ट्र आम जातीयता, इतिहास और परंपराओं और आकांक्षाओं पर आधारित एक समुदाय है । किसी राष्ट्र की सीमाएँ राज्य की सीमाओं से परे विस्तार कर सकती हैं । उदाहरण के लिए, फ्रांसीसी राष्ट्र बेल्जियम की सीमाएँ स्विट्जरलैंड और इटली तक भी फैली हुई हैं क्योंकि इन देशों के लोग उसी जाति के हैं, जिनसे फ्रांस का संबंध है ।

(vi) एक राज्य में दो या अधिक राष्ट्रीयताएँ रह सकती हैं—- एक राज्य के भीतर दो या दो से अधिक राष्ट्र हो सकते हैं । प्रथम विश्व युद्ध से पहले, ऑस्ट्रिया और हंगरी एक राज्य थे, लेकिन दो अलग-अलग राष्ट्र आधुनिक राज्यों में से अधिकांश बहुराष्ट्रीय राज्य हैं ।

(vii) राष्ट्र राज्य की तुलना में अधिक स्थिर है—- एक राष्ट्र, राज्य की तुलना में अधिक स्थिर है । जब सम्प्रभुता समाप्त होती है, राज्य मर जाता है, लेकिन राष्ट्र नहीं । एक राष्ट्र बिना सम्प्रभुता के भी जीवित रह सकता है उदाहरण के लिए, द्वितीय विश्व युद्ध में हार के बाद, जर्मनी और जापान दोनों ने अपनी सार्वभौमिक स्थितियों को खो दिया और बाहर की शक्तियों ने उन्हें नियंत्रित करना शुरू कर दिया । राज्यों के रूप में उनका अस्तित्व समाप्त हो गया । लेकिन राष्ट्रों के रूप में वे रहना जारी रखते रहे । कुछ महीनों के बाद उनकी सार्वभौमिक प्रतिष्ठा वापस आ गई और सार्वभौमिक स्वतंत्र राज्य बन गए ।

(viii) एक राज्य बनाया जा सकता है,जबकि एक राष्ट्र हमेशा विकास का नतीजा है—- एक राज्य को लोगों के सचेतन प्रयासों से बनाया जा सकता है । एक राज्य के जन्म में भौतिक तत्व महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । उदाहरण के लिए, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, जर्मनी को दो अलग-अलग राज्यों पश्चिम जर्मनी और पूर्वी जर्मनी में विभाजित किया गया लेकिन जर्मन भावनात्मक रूप से एक राष्ट्र के रूप में बने रहे । आखिरकार अक्टूबर 1990 में जर्मनी फिर से ही ही राज्य में एकजुट हुआ । 1947 में पाकिस्तान को भारत से अलग राज्य के रूप में बनाया गया था । एक राष्ट्र उन लोगों की एकता है जो धीरे—-धीरे और स्थिर रूप से उभरता है । किसी राष्ट्र के निर्माण में कोई खास प्रयास नहीं किए जाते ।

(ix) राज्य अपनी एकता और अखंडता को संरक्षित करने के लिए पुलिस शक्ति (बल) का उपयोग करता है, राष्ट्र मजबूत सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सम्बन्धों के द्वारा बाध्य है—- राज्य में पुलिस शक्ति होती है । जो लोग इसकी अवज्ञा करने की हिम्मत करते हैं उन्हें राज्य द्वारा दंडित किया जाता है । एक राष्ट्र में पुलिस शक्ति या बल नहीं होता है, यह नैतिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक शक्ति द्वारा समर्थित है लोगों की एकता की भावना की शक्ति पर एक राष्ट्र जीवित रहता है । राष्ट्र अपील करता है, राज्य आदेश करता है । एक राष्ट्र बहिष्कार करता है, राज्य सजा देता है । राज्य एक राजनीतिक संगठन है, जबकि राष्ट्र एकता है ।

3– राष्ट्रीयता की परिभाषादीजिए तथा इसके विभिन्न पोषक तत्वों की विवेचना कीजिए ।
उत्तर —- राष्ट्रीयता—- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या—-2 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
राष्ट्रीयता के पोषक तत्व—-राष्ट्रीयता की भावना के विकास अथवा राष्ट्रीयता के निर्माण में विभिन्न तत्व सहायक होते हैं । उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है

(i) भौगोलिक एकता—- भौगोलिक एकता राष्ट्रीय एकता का प्रेरणा-स्रोत है । जब लोग समान भौगोलिक परिस्थितियों में निवास करते हैं जो उनकी आवश्यकताएँ एवं समस्याएँ भी समान ही होती है । अत: वे मिल-जुलकर समान ढंग से अपनी समस्याएँ सुलझाने के लिए सामने आते हैं । इसके परिणामस्वरूप उनमें एकता की भावना उत्पन्न होती है, यह भावना ही कालान्तर में राष्ट्रीयता का प्रतीक बनती है । इस सन्दर्भ में यह उल्लेखनीय है कि भौगोलिक एकता राष्ट्रीयता का एक सहायक तत्व हैं । अत: इसे अनिवार्य तत्व नहीं माना जाना चाहिए ।

(ii) धार्मिक एकता—- धार्मिक एकता भी राष्ट्रीयता के विकास तथा निर्माण में वृद्धि करती है । इतिहास में इस बात के प्रमाण हैं कि धार्मिक भिन्नता के कारण ही कई देशों में अत्यधिक रक्तपात हुआ है । धार्मिक भिन्नता के आगे राष्ट्रीयता की भावना दुर्बल पड़ जाती है, जिसके परिणामस्वरूप दो भिन्न धर्मावलम्बी राष्ट्रों के मध्य युद्ध होते हैं ।
इसीलिए प्रसिद्ध विद्वान रैम्जे म्योर ने लिखा है—-
“कुछ मामलों में धार्मिक एकता राजनीतिक एकता के निर्माण में शक्तिशाली योग देती है, जबकि कुछ दूसरे मामलों में धार्मिक भिन्नता उसके मार्ग में बाधाएँ उपस्थित करती है । “

(iii) राजनीतिक एकता—- समान राजनीतिक व्यवस्था के अन्तर्गत रहने वाले लोग भी एकता का अनुभव करते हैं । इसके अतिरिक्त, वे समान राजनीतिक व्यवस्था के परिणामस्वरूप मानसिक एकता का भी अनुभव करते हैं, जो कालान्तर में राष्ट्रीयता के निर्माण में सहायक होती है । इसके साथ ही कठोर विदेशी शासन भी राष्ट्रीयता के निर्माण में सहायक सिद्ध होता है ।

(iv) भाषा की एकता—- राष्ट्रीयता के विकास में भाषा की एकता का भी विशेष महत्व है । समान भाषा—-भाषी देशों में समान विचार एवं समान साहित्य का सृजन होता है । उनके समान रीति—-रिवाज एवं समान रहन—-सहन के कारण उनमें समान राष्ट्रीयता की भावना का जन्म होता है । प्रायः देखा जाता है कि एक ही जाति तथा एक ही क्षेत्र में रहने वाले व्यक्ति एक ही भाषा का प्रयोग करते हैं जिससे उसमें राष्ट्रीयता की भावना जाग्रत होती है ।

(v) समान ऐतिहासिक परम्पराएँ—- ऐतिहासिक घटनाओं एवं स्मृतियों का भी राष्ट्रीयता के विकास में अत्यधिक महत्व होता है । विजय औरा पराजय की स्मृतियाँ, सामाजिक विकास के आदर्श, सांस्कृतिक उत्थान पतन का संकलित इतिहास राष्ट्रीयता के विकास में पर्याप्त सहायक है । सम्राट अशोक, चाणक्य, अकबर, शिवाजी, सुभाषचन्द्र बोस आदि की गौरवगाथा पढ़ने से समस्त भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना का संचार होता है ।

(vi) संस्कृति की एकता सांस्कृतिक एकता राष्ट्रीयता के प्रमुख तत्वों में से एक है । संस्कृति के अन्तर्गत एक निश्चित भू भाग में निवास करने वाले व्यक्तियों की प्राचीन परम्पराएँ, रीति-रिवाज, साहित्य इत्यादि सम्मिलित होती हैं । समान संस्कृति के आधार पर समान विचार, समान आदर्श तथा समान प्रवृत्तियों का जन्म होता है, जो राष्ट्रीयता के निर्माण में सहायक सिद्ध होती है ।

((vii) सामान्य आर्थिक हित—-आधुनिक काल में राष्ट्रीयता के निर्माण में आर्थिक तत्व सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है । भारत के परिप्रेक्ष्य में रोजगार प्राप्त करने में सभी का सामान्य आर्थिक हित है । अतः इस दिशा में किए जाने वाले प्रयास राष्ट्रीय एकता के प्रयास के अन्तर्गत आते हैं ।

(viii) जातीय एकता—- जातीय एकता भी राष्ट्रीयता के विकास में सहायक होती है । एक जाति के लोग समान संस्कारों एवं रीति रिवाजों के कारण एक संगठन में बँधे रहते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनमें एकता की भावना का उदय होता है । जिमर्न ने इसे सर्वप्रमुख तत्व माना है, जबकि ब्राइस इसे प्रमुख तत्व मानता है ।

(ix) अन्य तत्व—-समान सिद्धान्तों में आस्था, सामान्य आपदाएँ, युद्ध, लोकमत एवं सामूहिक एकता की चेतना भी राष्ट्रीयता के विकास में सहायक सिद्ध होती है । सामान्य आपदाओं जैसे गुजरात में आए भूकम्प और उत्तराखण्ड में आई आपदा के समय राष्ट्र के सभी क्षेत्रों से की गई सहायता इस बात का प्रतीक है कि हमारे अन्दर राष्ट्रीयता की भावना का एक महान् गुण विद्यमान है ।

4– राष्ट्रवाद से आप क्या समझते हैं? इसकी मुख्य विशेषताओं की विवेचना कीजिए ।
उत्तर —- राष्ट्रवाद (राष्ट्रीयता)—- राष्ट्रवाद एक भावनात्मक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक अभिव्यक्ति है, जो लोगों को एकता के सूत्र में बाँधती है । इस भावना के कारण लोग अपने राष्ट्र से प्रेम करते हैं और संकट आने पर की स्थिति में अपने तन, मन और धन का बलिदान करने से पीछे नहीं हटते हैं । राष्ट्रवाद की मुख्य विशेषताएँ—- राष्ट्रीयता या राष्ट्रवाद दोनों एक ही नाम है, अतः इनके प्रमुख गुण या विशेषताएँ निम्न प्रकार से हैं

(i) देशप्रेम की भावना—- राष्ट्रीयता की भावना लोगों में देशप्रेम का भाव उत्पन्न करती है और उन्हें देश के हित के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए प्रेरित करती है । यह प्रेरणा राष्ट्रीय पर्वो के आयोजन, राष्ट्रगान तथा राष्ट्रीय गीतों, नाटकों आदि से अधिक व्यापक होती है ।

(ii) सांस्कृतिक विकास—- राष्ट्रीयता देश के सांस्कृतिक विकास को गति प्रदान करती है । प्राचीन यूनान के महाकवि होमर, इटली के दान्ते, फ्रांस के वॉल्टेयर, इंग्लैण्ड के टेनीसन, शैली, टॉमस पेन, जर्मनी के हीगल और भारत के मैथिलीशरण गुप्त व रामधारी सिंह दिनकर ने राष्ट्रीयता से प्रेरित होकर ही साहित्यिक रचनाएँ की हैं ।

(ii) आत्म—-सम्मान की भावना—- राष्ट्रीयता व्यक्ति में आत्म—-सम्मान का गुण जागृत करती है और इससे आत्म—-गौरव के सम्मान हेतु सुरक्षा की प्रेरणा को बल मिलता है ।

(iv) राजनीतिक एकता की स्थापना में योगदान—- राष्ट्रीयता की भावना राजनीतिक एकता की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान देती है । राष्ट्रीयता से प्रेरित होकर ही विभिन्न जातियों व धर्मों के लोग एकता के सूत्र में संगठित होते हैं और एक शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण करते हैं ।

(v) राज्यों को स्थायित्व—- राष्ट्रीयता राज्यों को स्थायित्व भी प्रदान करती है । राष्ट्रीय चेतना के आधार पर निर्मित राज्य अधिक स्थायी सिद्ध होते हैं । (

vi) विश्वबन्धुत्व की पोषक—- राष्ट्रीयता व्यक्ति के दृष्टिकोण को व्यापक बनाकर अन्तर्राष्ट्रीय मैत्री और सहयोग को प्रोत्साहन प्रदान करती है । इस प्रकार राष्ट्रीयता विश्वबन्धुत्व की पोषक भी है । उदाहरण के लिए भारत का पंचशील सिद्धान्त वसुधैव कुटुम्बकम् का पोषक है । ।

(vii) आर्थिक विकास में योगदान—- राष्ट्रीयता राष्ट्र के आर्थिक विकास को भी प्रोत्साहित करती है । राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित होकर ही व्यक्ति अपने राष्ट्र को आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न बनाने के लिए एकजुट होकर कार्य करती हैं । (viii) उदारवादी दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करना—- राष्ट्रीयता आत्म—-निर्णय के सिद्धान्त को मान्यता देती है । इसलिए राष्ट्रीयता मानवीय स्वतंत्रता को स्वीकार कर उदारवादी दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करती है ।

5– “स्वस्थ राष्ट्रीयता अन्तर्राष्ट्रीयता की आधारशिला है । ” इस कथन के आधार पर राष्ट्रीयता तथा अन्तर्राष्ट्रीयता के संबंधों की व्याख्या कीजिए ।


उत्तर —- राष्ट्रीयता तथा अन्तर्राष्ट्रीयता में सम्बन्ध—- राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता वाद का पारस्परिक सम्बन्ध वर्तमान समय की एक महत्वपूर्ण समस्या है । इन दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में दो परस्पर विरोधी धारणाएँ प्रचलित हैं । प्रथम और मात्र सतही अध्ययन पर आधारित धारणा के अन्तर्गत राष्ट्रवाद और अन्तर्राष्ट्रीय वाद को परस्पर विरोधी कहा जाता है । इस श्रेणी के विचारकों का कथन है कि राष्ट्रवाद का तात्पर्य व्यक्ति को अपने देश के प्रति अन्नयतापूर्ण प्रेम है, जबकि अन्तर्राष्ट्रवाद का आशय है कि व्यक्ति अपने आप को सम्पूर्ण मानवीय जगत का एक सदस्य समझकर सम्पूर्ण मानवीय जगत के प्रति आस्था रखे । अन्तर्राष्ट्रीयवाद का तात्पर्य यह नहीं है कि व्यक्ति अपने राष्ट्र के प्रति निष्ठा न रखे । अन्तर्राष्ट्रवाद राज्यों के विलय या अन्त की माँग नहीं करता, वरन् यह तो केवल यह चाहता है कि राष्ट्रीय हितों को मानवता के व्यापक हितों के साथ इस प्रकार से समन्वित किया जाए कि सभी राष्ट्र समानता और पारस्परिक सहयोग के आधार पर शान्तिपूर्ण, सुख और समृद्धि का जीवन व्यतीत कर सकें ।

हेज के शब्दों में, “आदर्श अन्तर्राष्ट्रीय विश्व का तात्पर्य सर्वोत्कृष्ट स्थिति वाले राष्ट्रों के एक विश्व से ही है । ” अतः स्वस्थ्य राष्ट्रीयता के आधार पर ही अन्तर्राष्ट्रीयता का सफल संगठन हो सकता है । एक सफल अन्तर्राष्ट्रीय संगठन राष्ट्रीयता की स्वस्थ भावना पर ही निर्भर करता है । राष्ट्रवाद और अन्तर्राष्ट्रीयवाद परस्पर विरोधी नहीं, वरन् राष्ट्रवाद अन्तर्राष्ट्रवाद की भूमिका या उसका प्रथम चरण है । जोसेफ के शब्दों में कहा जा सकता है कि, “राष्ट्रीयता व्यक्ति को मानवता से मिलाने वाली आवश्यक कड़ी है । “महात्मा गाँधी भी इस प्रकार का विचार व्यक्त करते हुए लिखते हैं कि “मेरे विचार से बिना राष्ट्रवादी हुए अन्तर्राष्ट्रवादी होना असंभव है । अन्तर्राष्ट्रवाद तभी सम्भव हो सकता है, जबकि राष्ट्रवाद एक यर्थात बन जाए ।

” प्रबुद्ध मनीषी लास्की लिखते है “यूरोप का मानसिक जीवन सीजर और नेपोलियन का नहीं, ईसा का है, पूर्व की सभ्यता पर चंगेज खाँ और अकबर की अपेक्षा बुद्ध का प्रभाव कहीं अधिक गहरा और व्यापक है । अगर हमें जीना है, तो इस सत्य को सीखना-समझना पड़ेगा । घृणा को प्रेम से जीता जाता है, असद् को सद से, अधर्मता का परिणाम भी उसी जैसा होता है । “

6– राष्ट्रवाद के अर्थ को स्पष्ट कीजिए । यह किस प्रकार अन्तर्राष्ट्रीयता से सम्बन्धित है?

उत्तर —- राष्ट्रवाद के लिए प्रश्न संख्या—-4 तथा इसके अन्तर्राष्ट्रीयता से सम्बन्ध के लिए प्रश्न संख्या—-5 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

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Up Board Class 12th Civics Chapter 3 Liberty and Equality स्वतन्त्रता एवं समानता

7– क्या उग्र राष्ट्रवाद विश्व–शान्ति के मार्ग की बाधा है? व्याख्या कीजिए ।
उत्तर —- राष्ट्रवाद को साम्राज्यवाद की आधारशिला कहा जाता है । क्योंकि विकृत राष्ट्रवाद से ही साम्राज्यवाद की प्रवृत्ति जन्म लेती है तथा उसी भावना से प्रेरित एक राष्ट्र के कर्णधार अन्य राष्ट्रों को अपने अधीन करने का प्रयास करते हैं । इस बात को विश्वकवि रविन्द्र नाथ टैगोर ने भी स्वीकार किया है । उनका कथन है कि “राष्ट्रवाद ही साम्राज्यवाद की जड़ है, जो कि शिकार की तलाश में घूमा करते हैं । एशिया और अफ्रीका की जातियाँ राष्ट्र नहीं थी, इसलिए शान्तिप्रिय थीं और संगठन की दृष्टि से कमजोर थीं । यही कारण है कि वह पश्चिम की बर्बर अकर्मण्यता का शिकार बन गयी । ”


अतः राष्ट्रीयता अपना शुद्ध रूप शुद्ध छोड़ देती है, तो साम्राज्यवाद में परिणित हो जाती है । साम्राज्यवाद के कारण विभिन्न राज्यों में साम्राज्य बढ़ने की स्पर्धा बढ़ती है । यह स्पर्धा अंत में राष्ट्रों में सहयोग तथा मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों के लिए घातक बन जाती है । उनकी साम्राज्य लिप्सा का अंतिम परिणाम अन्तर्राष्ट्रीय संघर्ष तथा युद्ध होता है इस प्रकार अशुद्ध राष्ट्रीयता विश्वशान्ति की शत्रु है ।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ठीक ही लिखा है, “राष्ट्रीयता एक ऐसा विचित्र तत्व है, जो एक देश के इतिहास में जीवन, विकास, शक्ति और एकता का संचार करता है, वह संकुचित भी बनता है, क्योंकि इसके कारण ही व्यक्ति अपने देश के बारे में विश्व के अन्य देशों से अलग रूप में सोचता है । “
संकुचित राष्ट्रीयता के परिणाम स्वरूप ही विश्व को दो प्रलयकारी महायुद्धों का सामना करना पड़ा तथा आज वह तृतीय विश्वयुद्ध के संभावित संकट से ग्रसित है । विश्व के सभी देशों के राजनीतिज्ञ इस बात का अनुभव करते हैं कि

“यदि मानव जाति को विनाश से बचना है, तो अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना का विकास करना नितान्त आवश्यक है । ”
इस सन्दर्भ में एक प्रसिद्ध विद्वान का यह कथन उल्लेखनीय है
“भयंकर विनाशकारी परिणाम वाले दो विश्वयुद्धों ने कम—-से—-कम यह सिद्ध कर दिया है कि क्षुद्र एवं आक्रमणकारी राष्ट्रीयता के संकीर्ण बन्धनों को तोड़ डालना चाहिए और प्रेम, दया तथा सहानुभूति पर आधारित मानव सम्बन्धों का विकास करने के लिए मानव जाति के स्वतन्त्र संघ का निर्माण किया जाना चाहिए । ‘ ‘
वास्तव में उग्र राष्ट्रीयता अत्यन्त हानिकारक सिद्ध हुई है, किन्तु इस बात में भी कोई संदेह नहीं है कि इसका विशुद्ध रूप अत्यन्त लाभदायक भी सिद्ध हुआ है ।

8– अन्तर्राष्ट्रीयता से आप क्या समझते हैं?अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग में कौन-सी बाधाएँ हैं? ।
उत्तर —- अन्तर्राष्ट्रवाद का अर्थ एवं परिभाषाएँ—- अन्तर्राष्ट्रीयता का तात्पर्य विश्व-प्रेम, विश्व बन्धुत्व एवं वसुधैव कुटुम्बकम की भावना से ओतप्रोत होना है अन्तर्राष्ट्रीयता वह भावपूर्ण स्थिति है, जिसके द्वारा व्यक्ति अपने को विश्व का नागरिक मानता है । यद्यपि ब्लॉक निकृष्ट भावनाएँ संकुचित राष्ट्रीयता, राष्ट्रों की स्वार्थपूर्ण नीति, विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएँ, देश के प्रति मोह आदि अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करती है, परन्तु फिर भी आज के बदलते परिवेश और विभिन्न प्रकार के विकासों के प्रति अन्यान्योश्रितता की दृष्टि से अन्तर्राष्ट्रीयता के महत्व पर पर्याप्त बल दिया जा रहा है ।

(i) “हमारा देश विश्व है, हमारे देशवासी सम्पूर्ण मानव जाति के हैं, हम अपनी जन्मभूमि को उसी प्रकार प्यार करते हैं, जिस प्रकार हम अन्य देशों से प्रेम करते हैं । ” —-विलियम लॉयड गैरीसन

(ii) “अन्तर्राष्ट्रीयता राष्ट्रों के मध्य उनके सर्वोच्च और सर्वोत्कृष्ट तथा विशिष्ट प्रतिनिधियों तथा रूपों के मध्य सहयोग हैं । ” —-प्रो० जिमर्न

(iii) “अन्तर्राष्ट्रीयता एक भावना है, जिसके अनुसार व्यक्ति केवल अपने राज्य का ही सदस्य नहीं, वरन् समस्त विश्व का नागरिक है । ” —-गोल्डस्मिथ

(iv) “अन्तर्राष्ट्रीयता भिन्न—-भिन्न राज्यों के पारस्परिक संबंधों की उस नीति का नाम है, जो सभी राज्यों की स्वतंत्रता, समानता एवं सहयोग की समर्थक होती है और युद्ध तथा साम्राज्यवाद की विरोधी होती है । ” —-डॉ० महादेव प्रसाद

निष्कर्ष—- उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि अन्तर्राष्ट्रीयता एक ऐसा विचार या कार्य—-प्रणाली है, जिसके फलस्वरूप
(i) विश्व के विभिन्न राष्ट्रों में पारस्परिक वैमनस्य तथा द्वेष का अन्त होता है ।
(ii) विश्व के राज्यों के बीच शान्तिपूर्ण सहयोग में वृद्धि होती है ।
(iii) अन्तर्राष्ट्रीयता का लक्ष्य आत्मसम्मान और सुशासित राष्ट्रों का एक ऐसा परिवार बनाना है, जो समानता, शान्ति और पारस्परिक सहयोग के माध्यम से एकता के सूत्र में बंधा हो ।

अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग में बाधाएँ अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास के मार्ग में निम्नलिखित बाधाएँ हैं
(i) साम्राज्यवाद—- शक्तिशाली राष्ट्र दुर्बल राष्ट्रों के प्रति प्रायः साम्राज्यवादी नीति अपनाते हैं । साम्राज्यवादी नीति अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास में एक बड़ी बाधा है । वर्तमान में यद्यपि साम्राज्यवादी नीति का प्रायः अन्त हो गया है, किन्तु राजनीतिक साम्राज्यवाद के स्थान पर आर्थिक साम्राज्यवाद बहुत तेजी से फैल रहा है, यह आर्थिक साम्राज्यवाद भी अन्तर्राष्ट्रीयता के लिए अनेक दृष्टियों से घातक है ।

(ii) उग्र राष्ट्रीयता तथा सैन्यवाद—- उग्र राष्ट्रीयता की भावना भी अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना के विकास में बाधा उत्पन्न करती है । इसमें सन्देह नहीं है कि जब मनुष्य अपने राष्ट्र के लिए पूर्ण समर्पित होगा, तभी वह अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना का महत्व समझेगा । लेकिन अति राष्ट्रवाद की भावना उग्र होकर विशुद्ध देश प्रेम की भावना को नष्ट कर देती है । अत: उग्र राष्ट्रीयता के स्थान पर शुद्ध राष्ट्रीयता की भावना का विकास होना चाहिए ।

(iv)राजनीतिक क्षेत्र में सैद्धान्तिक मतभेद—- अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग में सैद्धान्तिक राजनीतिक मतभेद एक बड़ी बाधा है । पूँजीवाद तथा साम्यवाद इसके उदाहरण हैं । )

iii) राज्यों की सम्प्रभुता—- अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग की एक बड़ी बाधा राज्यों की सम्प्रभुता भी है । सम्प्रभुता की अवधारणा के कारण विश्व की महाशक्तियाँ अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर अपने वर्चस्व को बनाए रखना चाहती हैं । इससे अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति के लिए संघर्ष उत्पन्न हो जाता है तथा अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना प्राय नष्ट हो जाती है ।

(v) क्षेत्रवाद—- अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग में एक अन्य उल्लेखनीय बाधा क्षेत्रवाद की भावना का प्रसार है, जिसे पारस्परिक अविश्वास का ही परिणाम कहा जा सकता है । इसका अद्यतन उदाहरण सोवियत संघ का विघटन (1991 ई०) है ।

(vi) राष्ट्रों की स्वार्थपूर्ण नीति—- वर्तमान प्रगतिशील युग में प्रत्येक राष्ट्र उन्नति के शिखर पर पहुँचने के लिए प्रयत्नशील है । इसलिए वह अपने देश की उन्नति के सम्मुख दूसरे देशों की चिन्ता नहीं करता है । प्रत्येक राष्ट्र स्वार्थी होता जा रहा है, जिससे अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना को बड़ी ठेस पहुँच रही है ।

(vii) पारस्परिक सन्देह—- आज प्रत्येक राष्ट्र दूसरे राष्ट्रों को सन्देह की दृष्टि से देखता है, जिसके परिणामस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना को बड़ा आघात पहुँचा है ।

9– अन्तर्राष्ट्रीयता से आप क्या समझते हैं? इसके विकास और सफलताओं पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर —- अन्तर्राष्ट्रीयता—- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या—-8 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
अन्तर्राष्ट्रीयता का विकास और सफलताएँ—-19वीं शताब्दी के पहले से ही राजनीतिज्ञों ने इस बात के प्रयास किए कि यूरोप की सभी जातियों और देशों को एक—-दूसरे के निकट सम्पर्क में लाया जाए । मध्य युग में राज्यों के मध्य मतभेदों को बोलबाला था और पारस्परिक जीवन बहुत ही संघर्षमय था । अत: एक दूसरे के बीच स्थायी शांति लाने के बहुत प्रयत्न किए गए, लेकिन प्रायः वे असफल रहे फिर भी सन् 1648 ई० की वेस्टफेलिया की संधि ने यूरोप में अन्तर्राष्ट्रीयता का बीजारोपण अवश्य ही कर दिया । 18वीं शताब्दी में एक फ्रांसीसी राजनीतिज्ञ डयूक डसली ने आपस में शान्ति स्थापित करने की एक महान् योजना बनाई । इसके अन्तर्गत एक गणराज्य की स्थापना की जानी थी, जिसके बहुत से सदस्य राज्य होते और रोम जर्मन सम्राट उसका अध्यक्ष होता ।

लेकिन किन्ही कारणों से यह योजना सफल न हो सकी । इसके बाद स्टोहकवाद का विकास हुआ, जिसका प्रमुख उद्देश्य विश्व समुदाय को संगठित करना था, लेकिन इसका विकास भी सफल नहीं रहा । सन् 1785 ई० में काण्ट का प्रसिद्ध निबन्ध ‘अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति की ओर’ प्रकाशित हुआ । इसके बाद रूस के जार, आस्ट्रिया तथा प्रशा के सम्राटों के बीच होली एलान्इस (पवित्र संघ) हुई । यह विश्व का पहला संगठन था । इसके बाद यूरोप के सभी राष्ट्रों के कई सम्मेलन हुए, जिनमें वियाना, कांग्रेस, वाशिंगटन सम्मेलन आदि प्रमुख थे, जिनका उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग को बढावा देना था । लेकिन अन्तर्राष्ट्रीयता का मुखर विकास प्रथम विश्व युद्ध के बाद ही हुआ । इस महायुद्ध से आक्रांत लोगों ने युद्ध की भयावहता और भीषण कष्टों से बचने के लिए लीग ऑफ नेशन्स (राष्ट्र संघ) की स्थापना की । परन्तु कुछ विशेष कारणों से कुछ वर्षों के बाद ही यह छिन्न—-भिन्न हो गया । अत: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ही राष्ट्र संघ को समाप्त कर सन् 1945 ई० में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई । संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना अन्तर्राष्ट्रीयता का चरम उत्कर्ष हैं ।

10– अन्तर्राष्ट्रीयता से आप क्या समझते हैं? इसके विकास के मार्ग की प्रमुख बाधाओं का उल्लेख कीजिए । अथवा अन्तर्राष्ट्रीयतावाद के विकास के मार्ग में चार प्रमुख बाधक तत्वों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर —- उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या—-8 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
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11– अन्तर्राष्ट्रीयवाद के विकास में बाधक तत्वों का वर्णन कीजिए ।
उत्तर —- उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या—-8 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
12– अन्तर्राष्ट्रीयता से क्या तात्पर्य है? अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना विकसित करना क्यों आवश्यक है? दो कारण लिखिए तथा उदाहरण देकर समझाइए ।
उत्तर —- अन्तर्राष्ट्रीयता—- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या—-8 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
अन्तर्राष्ट्रीयता की आवश्यकता के कारण(i) आर्थिक निर्भरता—- आधुनिक युग में प्रत्येक विकासशील देश के लिए अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का बहुत महत्व है, क्योकि प्रत्येक देश की प्राकृतिक सम्पदा सीमित मात्रा में होती है । औद्योगिक दृष्टि से उन्नतिशील देशों को अपने उद्योगों को चलाने के लिए पर्याप्त मात्रा में कच्चे माल की आवश्यकता पड़ती है । इसके अतिरिक्त, देश में आवश्यकता से अधिक माल का उत्पादन हो जाने पर उसकी बिक्री के लिए भी अन्य देश विपणन केन्द्र के रूप में सहायक सिद्ध होते हैं । विश्व व्यापार संगठन इसका उदाहरण है ।

(ii) विश्व समस्याएँ—- आधुनिक समय में कुछ ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई हैं, जिनका प्रभाव एक देश पर न पड़कर पूरे विश्व के राष्ट्रों पर पड़ रहा है जैसे पर्यावरण प्रदूषण की समस्या, आतंकवाद, भयंकर बीमारियाँ, विनाशक अस्त्रों की होड़ आदि ऐसी ही अन्य समस्याओं ने विश्व के सभी राष्ट्रों का ध्यान अपनी ओर खीचा है । इसके समाधान के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रयास किए जा रहे हैं । इस प्रवृत्ति ने भी अन्तर्राष्ट्रीयता के मार्ग को प्रशस्त किया है । आज प्रत्येक देश का नागरिक यह अनुभव कर रहा है कि जब तक लोग अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना को महत्व नहीं देंगे, तब तक प्रत्येक देश का भविष्य अन्धकारमय रहेगा । आज पर्याप्त सीमा तक सभी राष्ट्र परस्पर विश्वास, सद्भाव तथा सहयोग का महत्व समझने लगे हैं । राष्ट्रों के बीच इन्हीं संबंधों को मैत्रीपूर्ण बनाने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई हैं । सन् 1945 ई० से निरन्तर संयुक्त राष्ट्र अपने विभिन्न घटकों के माध्यम से अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सद्भावना की दिशा में सार्थक प्रयास कर रहा है ।

13– संयुक्त राष्ट्र की उपलब्धियों पर टिप्पणी लिखिए ।
उत्तर —- संयुक्त राष्ट्र की उपलब्धियाँ ( सफलताएँ)—-आज विश्व का हर देश दूसरे देश पर अधिकार जमाने के लिए तत्पर उत्साहित रहता है, परिणामस्वरूप कई देशों में आन्तरिक कलह इतना अधिक हो चुका है कि वहाँ मानवीय मूल्यों की आहूति दी जाने लगी है । कई देशों में तानाशाहों का आतंक है तो कही आतंकवादी आए दिन लोगों की जिन्दगी से खेल रहे हैं इन सबको नियन्त्रण में करने के लिए हर देश अपने स्तर पर तो कार्य करता ही है साथ ही इन सबके ऊपर नजर रहती है, दुनिया की सबसे बड़ी अन्तर्राष्ट्रीय संस्था संयुक्त राष्ट्र की । यह अन्तर्राष्ट्रीय संस्था जाति, धर्म और देश से ऊपर उठकर पूरे संसार के कल्याण के लिए कार्य करती है । संयुक्त राष्ट्र का मुख्य उद्देश्य विश्व में युद्ध रोकना, मानव अधिकारों की रक्षा करना, अन्तर्राष्ट्रीय कानून को निभाने की प्रक्रिया जुटाना, सामाजिक और आर्थिक विकास उभारना, जीवन स्तर सुधारना और बीमारियों से लड़ना है । इस संगठन ने दुनिया भर में कई अहम मौकों पर मानव जीवन की सेवा कर एक आदर्श प्रस्तुत किया है । आज विश्व में कई देश हैं जो दूसरे देशों पर प्रभुत्व जताने और उन्हें हड़पने को तैयार रहते हैं पर संयुक्त राष्ट्र की कड़ी नजर की वजह से वह कुछ भी नहीं कर पाते । चाहे विश्व में शिक्षा को बढ़ावा देना हो या फिर एड्स जैसी बीमारी के प्रति जागरूकता फैलानी हो या तकनीक को आगे बढ़ाना हो संयुक्त राष्ट्र हमेशा आगे रहता है । पर इन सबके अलावा इसकी कुछ उपलब्धियाँ उल्लेखनीय हैं । संयुक्त राष्ट्र के कुछ विभाग विशेष एजेंसियों को रूप में जाने जाते हैं । जैसे यूनेस्कों, यूनिसेफ, विश्व स्वास्थ्य संगठन, आई–एल–ओ, एफ–ए–ओ । इन्होंने दुनियाभर में आम इंसान की जिन्दगी को बेहतर बनाने का कार्य सार्थक ढंग से किया है । आर्थिक रूप से अत्यधिक पिछड़े और कमजोर देशों को इनके माध्यम से जरूरी आर्थिक और तकनीकी सहायता मिल सकती है । संयुक्त राष्ट्र ने कुछ ऐसे विषयों पर सरकारों और जनता का ध्यान आकर्षित किया है, जो इसके अभाव में अछुते व उपेक्षित ही रह जाते । मानवाधिकारों का मुद्दा इनमें से एक है और पर्यावरण का दूसरा । इसके अलावा लिंगभेद दूर करने, शरणार्थी समस्या का समाधान और परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के लिए संवाद को जारी रखने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है ।

परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की भूमिका ने विश्व—-शान्ति को बढ़ावा दिया है ।

14– विश्व राजनीति में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका की विवेचना कीजिए । अपने उद्देश्य की प्राप्ति में इसे कहाँ तक सफलता
मिली है? उत्तर —- विश्व राजनीति में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका—- संयुक्त राष्ट्र की स्थापना ही विभिन्न प्रकार के संघर्षों के निदान हेतु की गई तथा इस दिशा में इसने अनेक संघर्षों के निदान का प्रयास भी किया । कम से कम उन्हें नियन्त्रित करने अथवा सहनीय सीमाओं तक रखने की दिशा में सराहनीय कदम तो उठाये ही हैं साथ ही मूल्यों के सार्थक विभाजन में आदेशात्मक अनुकूलता लाने में इसकी सम्भावित भूमिका है । संयुक्त राष्ट्र का समसमायिक विश्व में, राजनैतिक परिवर्तन लाने हेतु एक साधन के रूप में प्रयोग चिंता का विषय बनता जा रहा है । इस क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र द्वारा एक कारगर भूमिका निभाना और भी कठिन होता जा रहा है क्योंकि कुछ देशों के लिए राजनैतिक परिवर्तन मूल्यों का पुनर्वितरण करता ही है और यह आशा कि, संयुक्त राष्ट्र द्वारा अपना लेने के पश्चात् भी प्रभावशाली राष्ट्र अपने पतन को स्वीकार कर लेंगे, अनुचित ही लगती है । इसीलिए, संयुक्त राष्ट्र अपने सम्पूर्ण इतिहास में राजनैतिक परिवर्तन लाने की भूमिका निभाने से हिचकिचाता रहा है । यह बात खासकर उन परिस्थितियों में लागू राजनैतिक परिवर्तन लाने के लिए सैनिक शक्ति का प्रयोग आवश्यक हो । अतः मुद्दों का समाधान करने के बजाय खतरनाक संघर्षों का स्थिरीकरण करना भी अप्रत्यक्ष रूप से सुरक्षा परिषद् में वर्चस्व की लड़ाई आज भी जारी है । सदस्य राष्ट्रों की संख्या 51 से बढ़कर 193 तक पहुँच जाने के बावजूद विकसित देश विकासशील देशों को इसमें प्रतिनिधित्व देने के पक्ष में नहीं है, क्योंकि विश्व के इन कर्णधारों को डर है कि यदि विकासशील राष्ट्र प्रवेश पा गये तो फिर मनमानी नहीं चल पायेगी । इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है कि विकसित राष्ट्र विशेष रूप से अमरीका, जापान जैसे छोटे राष्ट्र को तो परिषद् भी स्थायी सदस्यता देने के पक्ष में है किन्तु भारत व दक्षिण अफ्रीका की दावेदारी को नहीं पचा रहा है । वर्चस्व की यह लड़ाई संगठन तक ही सीमित नहीं रही अपितु उसकी अन्य संस्थाओं जा पहुँची है । विश्वयुद्ध में हुई व्यापक जनधन की क्षतिपूर्ण तथा पुनर्निमाण के लिए स्थायी अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष व विश्व बैंक पर विकसित देशों ने कब्जा कर उसका राजनीतिक इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है ।

15– विश्व—-शान्ति की स्थापना की दिशा में संयुक्त राष्ट्र की उपलब्धियों का परीक्षण कीजिए ।

उत्तर —- उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या—- 13 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

16– “स्वस्थ राष्ट्रीयता अन्तर्राष्ट्रीयता की आधारशिला है । ” इस कथन पर परीक्षण कीजिए ।
उत्तर —- उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या—-5 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

17– गुटनिरपेक्षता का क्या अर्थ है? वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति सन्दर्भ में उसकी सार्थकता का विवेचन कीजिए । अथवा
गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की प्रासंगिकता पर टिप्पणी लिखिए । उत्तर —- गुटनिरपेक्षता—- सामान्य अर्थ में, गुटनिरपेक्षता का अर्थ विश्व के शक्तिशाली गुटों से पृथक या तटस्थ रहकर अपनी स्वतंत्र
विदेश नीति का संचालन करना और अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा करना है । विद्वानों ने गुटनिरपेक्षता को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया हैं“गुटनिरपेक्षता की नीति का अर्थ युद्ध में तटस्थ रहना नहीं है । इसका अर्थ है—-स्वतंत्रता, शान्ति तथा सामाजिक न्याय के कार्य में सक्रिय योगदान । “
—-सुकर्णो “मेरे विचार में गुटनिरपेक्षता की नीति का सार यह है कि किसी भी राजनीतिक या सैनिक गुट में सम्मिलित होने से अस्वीकृति प्रकट करना । “
—-लिस्का “गुटनिरपेक्षता शान्ति और युद्ध से बचाव का मार्ग है । इसका उद्देश्य सैनिक गुटबन्दियों से दूर रहना है । यह एक निषेधात्मक नीति नहीं है, यह एक सकारात्मक, एक निश्चित नीति है और मैं आशा करता हूँ कि यह एक निरन्तर विकासशील नीति हैं । “……………..—-पं० जवाहरलाल नेहरू

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि गुटनिरपेक्षता एक ऐसी सकारात्मक एवं रचनात्मक नीति है जो सामूहिक सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त करती है । संक्षेप में गुटनिरपेक्षता का आशय कि सी भी सैनिक गुटबन्दी से दूर रहकर राष्ट्रीय हितों का ध्यान रखते हुए न्यायोचित रूप में अपनी विदेश नीति का संचालन करना है ।

गुटनिरपेक्षता की प्रासंगिकता/अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में सार्थकता—- गुटनिरपेक्षता विश्व राजनीति में राष्ट्रों के लिए विकल्प के रूप में निश्चय ही स्थायी रूप धारण कर चुका है । इसने विशेषतः राष्ट्र समाज के छोटे—-छोटे और अपेक्षाकृत निर्बल सदस्यों के सन्दर्भ में राष्ट्रों की स्वतन्त्रता और समता कायम रखने में योग दिया है । इसने विश्व के पूर्ण ध्रुवीकरण को रोककर विचारधारा शिविरों के विस्तार की ओर प्रभाव को संयत करके तथा गुटों के अन्दर भी स्वतन्त्रता की शक्तियों को प्रोत्साहन देकर अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा बनाए रखने तथा उसे प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण योग दिया है । इसने संयुक्त राष्ट्र संगठन के अन्दर और बाहर दोनों जगह अनेक कल्याणकारी क्षेत्रों में, जैसे कि उपनिवेशों को स्वतन्त्र कराने, प्रजातीय समता को साकार करने तथा अल्प—-विकसित देशों के आर्थिक विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योग दिया है । आज संयुक्त राष्ट्र संघ के दो—-तिहाई से अधिक देश गुटनिरपेक्षता की सन्धि की परिधि में आ चुके हैं । संयुक्त राष्ट्र संघ के विभिन्न मंचों से गुटनिरपेक्ष राष्ट्रों ने विश्व—-शान्ति, उपनिवेशवाद के अन्त, परमाणु शस्त्रों पर रोक, निःशस्त्रीकरण, हिन्द महासागर को शान्ति क्षेत्र घोषित करना, नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के निर्माण आदि विषयों पर संगठित रूप से कार्यवाही की है और सफलता प्राप्त की है ।
.संक्षेप में वर्तमान में निम्नलिखित क्षेत्रों में गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की प्रासंगिकता दृष्टिगत होती हैं
(i) नई अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था की पुरजोर माँग करना ।
(ii) आणविक निःशस्त्रीकरण के लिए दबाव डालना ।
(iii) दक्षिण—-दक्षिण सहयोग को प्रोत्साहन देना ।
(iv) एक—-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अमेरिकी चौधराहट का विरोध करना ।
(v) विकसित और विकासशील देशों के बीच सार्थक वार्ता के लिए दबाव डालना ।
(vi) अच्छी वित्तीय स्थिति वाले गुट—-निरपेक्ष देशों (जैसे ओपेक राष्ट्रों) को इस बात के लिए सहमत करना है कि वे अपना
फालतू धन पश्चिमी देशों के बैंको में जमा कराने के स्थान पर विकासशील देशों में विकासात्मक उद्देश्यों के लिए प्रयोग करें ।
(vii) नव—-औपनिवेशिक शोषण का विरोध किया जाए ।

(viii) संयुक्त राष्ट्र संघ के पुनर्गठन के लिए दबाव डाला जाये, ताकि बड़े राष्ट्र प्रस्तावित पुनर्गठन के लिए तैयार हो सकें यानि उनके ‘वीटो’ परिषद् की सदस्यता में पर्याप्त वृद्धि की जा सके या महासभा को और अधिकार प्रदान किए जा सकें । संक्षेप में, विकासशील देशों के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का अस्तित्व लम्बे समय तक नहीं रह पाएगा, विशेषकर ऐसे में जबकि शीत—-युद्ध की समाप्ति के पश्चात् इसके सामने कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं रह गया है । निष्कर्ष—- गुटनिरपेक्ष आन्दोलन ने स्वतन्त्र विदेश नीति का सिद्धान्त प्रदान कर नवोदित देशों को रंगमंच पर उपलब्ध कराकर सैनिक टकराव की दिशा में सम्भावित व्यापक रूझान को रोक दिया और शीत—-युद्ध का तनाव कम करने तथा शान्ति स्थापना की दिशा में प्रोत्साहन दिया ।

आपसी विचार—-विमर्श द्वारा समझा—-बुझाकर और व्यापक प्रचार करके आन्दोलन में उपनिवेशवाद उन्मूलन की प्रक्रिया को भी गति प्रदान की । 1960 ई० के पश्चात् यह अनुभव किया गया कि राजनीतिक उपनिवेशवाद का उन्मूलन हो रहा है, लेकिन नव—-स्वाधीन राष्ट्र आर्थिक दृष्टि से बहुत निर्बल थे और औद्योगिक देशों पर निर्भर थे, जिससे ज्ञात होता था कि निर्धन देशों की चौधराहट लगातार बनी हुई थी । अत: नवीन अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था स्थापित करने की माँग की जाने लगी । अब अन्तर्राष्ट्रीय चिन्ता के विषय आर्थिक समस्या और पर्यावरण प्रदूषण रोकने की समस्या रह गयी है । इससे सिद्ध होता है कि गुटनिरपेक्ष आन्दोलन शान्तिपूर्ण, समतावादी, विश्व व्यवस्था स्थापित करके विकासशील देशों का भविष्य उज्वल बनाने के प्रयासों में निरन्तर प्रयत्नशील हैं । गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को संस्था का रूप धारण किए लगभग 40 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं । वास्तव में, संयुक्त राष्ट्र संघ के पश्चात् गुटनिरपेक्ष आन्दोलन सबसे बड़ा अन्तर्राष्ट्रीय मंच है, इस दृष्टि से यदि वह वास्तव में चाहे तो सामूहिक रूप में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है ।

18– गुटनिरपेक्षता से क्या तात्पर्य है? इसके गुण—-दोषों की विवेचना कीजिए ।
उत्तर —- गुटनिरपेक्षता—- इसके लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या—- 17 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।
गुटनिरपेक्षता के गुण या लक्षण—-गुटनिरपेक्षता की नीति के प्रमुख लक्षण निम्न प्रकार हैं

(i) सैनिक गुटों से पृथक रहने की नीति—- गुटनिरपेक्षता का सबसे प्रमुख लक्षण है सैनिक गुटों से पृथक रहने की नीति । अर्थात् गुटनिरपेक्ष देश किसी भी महाशक्ति के साथ सैनिक समझौता नहीं करेगा ।

(ii) स्वतन्त्र विदेश नीति—-गुटनिरपेक्षता का आशय हैं कि सम्बद्ध देश अन्तर्राष्ट्रीयता नीति में किसी शक्ति गुट के साथ बँधा
हुआ नहीं है, वरन् उसका अपना स्वतन्त्र मार्ग है जो सत्य और शान्ति पर आधारित है । (ii) शान्ति की नीति—- गुटनिरपेक्षता की नीति शान्ति की नीति है । इसका प्रमुख लक्षण है—-तनाव की प्रवृत्तियों को कमजोर
करते हुए शान्ति का विस्तार करना है । (iv) गुटनिरपेक्षता एक आन्दोलन है, गुट नहीं—- गुटनिरपेक्षता एक नीति वरन् एक आन्दोलन है जो राष्ट्रों के बीच स्वैच्छिक सहयोग चाहता है, प्रतिद्वन्द्विता या टकराव नहीं ।

(v) साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद का विरोधी—- गुटनिरपेक्षता साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, रंगभेद और शोषण आदि का

विरोध करने वाली नीति है । गुटनिरपेक्षता विभिन्न राष्ट्रों के आपसी व्यवहार में राष्ट्रीय प्रभुसत्ता, स्वतन्त्रता, समानता और विकास में विश्वास करती है । संघर्ष, अन्याय, दमन, अत्याचार का विरोध करती है तथा समानता को स्थापित करने पर बल देती है ।

(vi) संयुक्त राष्ट्र का सहायक—- गुटनिरपेक्षता आन्दोलन संयुक्त राष्ट्र का सहायक है, विकल्प नहीं । इसका विश्वास है कि “संयुक्त राष्ट्र के बिना आज के विश्व की कल्पना नहीं की जा सकती । ” गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का उद्देश्य है संयुक्त राष्ट्र को सही दिशा में आगे बढ़ाते हुए उसे शक्तिशाली बनाना । ऐतिहासिक पृष्ठभूमि—- युद्धोतर अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का सबसे प्रमुख और दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य विश्व का दो विरोधी गुटों में बँट जाना था । एक गुट का नेता संयुक्त राज्य अमेरिका था और दूसरे गुट का नेता सोवियत संघ । इन दोनों गुटों के बीच मतभेदों की एक ऐसी खाई उत्पन्न हो गई थी और दोनों गुट एक-दूसरे के विरोध में इस प्रकार सक्रिय थे कि इसे शीतयुद्ध का नाम दिया गया । सन् 1947 ई० में जब भारत स्वतन्त्र हुआ, तो एशिया और विश्व में भारत की अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थिति को देखते हुए दोनों विरोधी गुटों के देशों द्वारा भारत को अपनी ओर शामिल करने के प्रयत्न प्रारम्भ कर दिए गए और परस्पर विरोधी गुटों के इन प्रयासों ने वैदेशिक नीति के क्षेत्र में भारत के लिए एक समस्या खड़ी कर दी । लेकिन इन कठिन परिस्थितियों में भारत के द्वारा अपने विवेकपूर्ण मार्ग का शीघ्र ही चुनाव कर लिया गया और वह मार्ग था, गुटनिरपेक्षता अर्थात् अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में दोनों ही गुटों से अलग रहते हुए विश्वशान्ति, सत्य और न्याय का समर्थन करने की स्वतन्त्र विदेश नीति । प्रारम्भ में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में गुटनिरपेक्षता को सही रूप में नहीं समझा जा सका । न केवल दोनों महाशक्तियों ने इसे ‘अवसरवादी नीति’ बतलाया, वरन् अन्य अनेक देशों द्वारा भी यह सोचा गया था कि ‘आज की अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में गुट निरपेक्षता कोई मार्ग नहीं हो सकता । लेकिन समय के साथ ये भ्रान्तियाँ कमजोर पड़ी और शीघ्र ही कुछ देश गुट निरपेक्षता की ओर आकर्षित हुए । ऐसे देशों में सबसे प्रमुख थे । मार्शल टीटो के नेतृत्व में यूगोस्लाविया और कर्नल नासिर के नेतृत्व में मिस्त्र । अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में गुट निरपेक्षता की एक त्रिमूर्ति’ बन गयी, नेहरू नासिर और टीटो । कालान्तर में, एशियाईअफ्रीकी देशों ने सोचा कि गुटनिरपेक्षता को अपनाना न केवल सम्भव है वरन् उनके लिए यह लगभग एकमात्र स्वाभाविक और उचित मार्ग है । सन् 1961 तक 25 देशों ने इस मार्ग को अपना लिया था और आज निर्गुट आन्दोलन के सदस्यों की संख्या 120 हो गई है । इन 120 सदस्यों के अतिरिक्त चीन सहित 11 देश ‘पर्यवेक्षक देश’ के रूप में इस आन्दोलन के साथ जुड़े हुए हैं । वस्तुत: गुटनिरपेक्षता आज अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की सबसे अधिक लोकप्रिय धारणा बन गई है ।
गुटनिरपेक्षता के दोष—-गुटनिरपेक्ष की कमजोरियों या विफलताओं का वर्णन निम्न प्रकार किया जा सकता है
(i) अवसरवादी और काम निकालने की नीति—- आलोचकों का मानना है कि गुटनिरपेक्षता एक अवसरवाद और काम निकालने की नीति बनकर रह गयी है, क्योंकि गुटनिरपेक्षता देश सिद्धान्तहीन है, साम्यवादी और गैर—-साम्यवादी गुटों के साथ अपने सम्बन्धों के सन्दर्भ में वे ‘दोहरी कसौटी’ का प्रयोग करते हैं और यह कि उनका उद्देश्य पश्चिमी और साम्यवादी दोनों गुटों से अधिक—-अधिक लाभ प्राप्त करने का और जिसका पक्ष मजबूत हो, उसकी ओर मिल जाने को रहता है । उपयुक्त आलोचना के सन्दर्भ में डॉ–एम–एस–राजन का विचार है कि “गुटनिरपेक्षता की नीति अवसरवादिता की नीति हो
सकती है, परन्तु उतनी ही जितनी गुटबद्धता की अथवा कोई अन्य नीति हो सकती है, उससे अधिक नहीं । “

(ii) गुटनिरपेक्ष देशों में पारस्परिक तनाव एवं वैमनस्य—- गुटनिरपेक्ष देश पर्याप्त रूप से संगठित नहीं हैं । उसमें तनाव,
वैमनस्य और भयंकर विवाद उठते रहते हैं । उदाहरणार्थ, भारत और बांग्लादेश दोनों ही गुटनिरपेक्षता के समर्थक हैं, किन्तु कोलम्बो शिखर सम्मेलन में बांग्लादेश ने भारत के साथ गंगा के पानी के बँटवारे के प्रश्न को उठाकर विश्व के सामने अपने आपसी तनावों को उजागर किया ।

(iii) संकुचित नीति—- विदेश नीति का क्षेत्र इतना विशाल है कि उसे गुटनिरपेक्षता की नीति में बाँधा नहीं जा सकता । गुटनिरपेक्षता का दायरा बहुत सीमित है । गुटों से बाहर स्वयं को यह अवधारणा क्रियाशील बनाए इस पर कोई विचार नहीं किया जाता । सारी नीति गुटों की राजनीति के आस—-पास घूमती है । महाशक्ति गुटों की राजनीति पर प्रतिक्रिया करते रहना ही इस नीति का मुख्य उद्देश्य बन जाता है ।

(iv) गुटनिरपेक्षता एक दिशाहीन आन्दोलन—- कुछ आलोचकों का कथन है कि नई विश्व—-व्यवस्था का जिसमें शक्ति नहीं, सद्भावना नियामक तत्व हो, निर्माण करना, तो दूर रहा, गुटनिरपेक्षता आन्दोलन अपने आप में ही टूटता जा रहा है । हवाना सम्मेलन (1979) की कार्यवाहियों से स्पष्ट हो गया था कि सम्पूर्ण आन्दोलन तीन गुटों में विभाजित हो गया हैं—- एक में क्यूबा, अफगानिस्तान, वियतनाम, इथियोपिया, दक्षिणी यमन जैसे रूस—-परस्त देश हैं तो दूसरे में सोमालिया, सिंगापुर, जायरे, फिलीपीन्स, मोरक्को, मिस्र आदि अमेरिका परस्त देश है । तीसरे खेमे में भारत, यूगोस्लाविया और श्रीलंका जैसे देश है । यह इस बात का प्रमाण है कि गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की अपनी कोई दिशा नहीं रह गयी है और वह अब महाशक्तियों के उपहार का प्रतिबिम्ब मात्र रह गया है ।

(v) शीत युद्ध की समाप्ति—- कुछ विद्वान ऐसा मानते है कि शीत युद्ध की समाप्ति के परिणामस्वरूप हुए हाल ही के परिवर्तनों में गुटनिरपेक्षता की सार्थकता समाप्त हो गई है । गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का जन्म विश्व राजनीति में एक शक्ति के रूप में उस समय हुआ था जब कि दोनों महान् शक्तियों के बीच शीत युद्ध चल रहा था ।
(vi) पश्चिमी जर्मनी तथा उत्तरी जर्मनी का एकीकरण—- जर्मनी के एकीकरण ने शीत युद्ध को समाप्त कर दिया है । एक विद्वान का कथन है कि बर्लिन की दीवार के मलबे के साथ गुटनिरपेक्ष आन्दोलन भी दफन हुआ पड़ा है ।

(vii) वारसा संधि की समाप्ति—- वारसा संधि अब समाप्त हो चुकी है । इसके स्थान पर अब एक समिति का गठन यह बताने के लिए किया गया है कि समय की भावना के साथ इसकी क्या संगत भूमिका हो सकती है

। (viii) नाटो की भूमिका में परिवर्तन आना अनिवार्य है—- नाटो अभी जीवित है, किन्तु पश्चिमी यूरोप तथा यूरोपीय राज्यों के
मध्य बढ़ते नवीन तालमेल तथा सहयोग के प्रभाव के अधीन इसकी भूमिका में परिवर्तन होना निश्चित है । पश्चिमी जर्मनी
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नागरिकशास्त्र—-12
तथा उत्तरी जर्मनी के एकीकरण के कारण नाटो की भूमिका में परिवर्तन आना अपरिहार्य है । नाटो के देशों में अब इस बात
की सम्भावना है कि सैनिक पक्ष की अपेक्षा राजनीतिक पक्ष का अधिमान होना चाहिए । (ix) यूरोपीय राजनीति में परिवर्तन—- यूरोप की राजनीति तेजी से परिवर्तित हो रही है । अनेक स्थानीय युद्ध समाप्त हो चुके हैं ।
इसके अतिरिक्त सुरक्षा तथा सहयोग सम्मेलन ने वहाँ कि राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना शुरू कर दिया है । नामीबिया स्वतन्त्र हो चुका है । प्रजाति पार्थक्यवाद के विरुद्ध संघर्ष अपने अन्तिम चरण में है । द्विध्रुवीकरण का स्थान बहु
केन्द्रीयवाद ने ग्रहण कर लिया है ।

(x) समकालीन अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था—- इन सभी परिवर्तनों के साथ समकालीन अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था बड़ी तीव्रता से शीत युद्ध के तनावों से हटकर शान्ति, सुरक्षा, सहयोग तथा विकास में परिवर्तित हो गई है । (खाड़ी युद्ध एक अपवाद माना जा सकता है । ) इन परिवर्तनों के कारण विशेष रूप से शीत युद्ध की समाप्ति तथा सोवियत संघ के बिखराव ने सन्धि की राजनीति को गम्भीर चोट पहुंचाई है । ‘नाम’ के आलोचकों ने यह तर्क देना प्रारम्भ कर दिया है कि ‘नाम’ का मुख्य कार्य विश्व के गुटों में विभाजन से मुक्त करना था और यह विभाजन अब प्रायः समापन की ओर अग्रसर है इसलिए नाम निरर्थक होकर रह गया है । वह ये तर्क देते हैं कि या तो नाम को समाप्त करना पड़ेगा अथवा किसी ‘नवीन’ आन्दोलन में रूपान्तरित करना पड़ेगा ।

19– गुटनिरपेक्षता की नीति के प्रमुख तत्वों का वर्णन कीजिए ।

उत्तर —- स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उपस्थित होता है कि कौन—-से—-तत्व थे, जिनके कारण भारत ने गुटनिरपेक्षता को अपनाया और समय के साथ अन्य देश इसकी ओर आकर्षित हुए । गुटनिरपेक्षता की नीति के प्रेरक तत्वों का उल्लेख निम्न प्रकार है

(i) राष्ट्रवाद की भावना—- एशियाई—-अफ्रीकी देशों ने राष्ट्रवाद की भावना के आधार पर लम्बे संघर्ष के बाद यूरोपियन साम्राज्यवाद से मुक्ति प्राप्त की थी । ऐसी स्थिति में सबसे पहले भारत और बाद में अन्य देशों ने स्वाभाविक रूप से सोचा कि किसी शक्ति गुट की सदस्यता को स्वीकार कर लेने पर अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में वे उसके पिछलग्गू बन जायेंगे, जिससे उनके आत्म—-सम्मान, राष्ट्रवाद और सम्प्रभुता को आघात पहुँचेगा । इस प्रकार राष्ट्रवाद की भावना ने उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में स्वतन्त्र मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित किया ।
ii) साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध—- भारत और अन्य एशियाई अफ्रीकी देशों ने लम्बे समय तक साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के अत्याचार भोगे थे और साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद के प्रति उनकी विरोध भावना बहुत अधिक तीव्र थी । उन्होंने सही रूप से यह महसूस किया कि दोनों ही शक्ति गुटों के प्रमुख नव—-साम्राज्यवादी हैं तथा साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध करने के लिए शक्ति गुटों से अलग रहना बहुत अधिक आवश्यक है ।

(iii) शान्ति के लिए तीव्र इच्छा—- दीर्घकालीन संघर्ष के बाद स्वतन्त्रता प्राप्त करने वाले अनेक एशियाई—-अफ्रीकी देशों ने सत्य रूप में महसूस किया कि यूरोपियन देशों की तुलना में उनके लिए शान्ति बहुत अधिक आवश्यक है । उन्होंने यह भी सोचा कि उनके लिए युद्ध और तनाव की सम्भावना बहुत कम हो जाएगी, यदि वे अपने आपको शक्ति गुटों से अलग रखें ।

(iv) आर्थिक विकास की लालसा—- नवोदित राज्य शास्त्रास्त्रों की प्रतियोगिता से बचकर अपने देश का आर्थिक पुनर्निर्माण करना चाहते है । आर्थिक पुनर्निर्माण तीव्र गति से हो सके, इसके लिए विकसित राष्ट्रों से आर्थिक और तकनीकी सहयोग प्राप्त करना जरूरी है । गुटनिरपेक्षता का मार्ग अपनाकर ही कोई राष्ट्र बिना शर्त विश्व की दोनों महाशक्तियों—-साम्यवादी और पूँजीवादी गुटों से आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग प्राप्त कर सकता था ।

(v) जातीय एवं सांस्कृतिक पक्ष—- गुटनिरपेक्षता की नीति का एक प्रेरक तत्व ‘जातीय एवं सांस्कृतिक पक्ष’ भी है । गुटनिरपेक्षता की नीति के अधिकांश समर्थक यूरोपियन राष्ट्रों का शोषण भुगत चुके हैं और अश्वेत जाति के हैं । इनमें सांस्कृति एवं जातीय समानताएँ भी विद्यमान हैं और कमजोर ही सही, लकिन इन समानताओं ने उन्हें शक्ति गुटों से अलग रहने के लिए प्रेरित किया है ।

(vi) गुटनिरपेक्षता तथा गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के लक्ष्य—-गुटनिरपेक्षता एक गतिशील नीति और आन्दोलन है तथा आज की परिस्थितियों में गुटनिरपेक्षता और गुटनिरपेक्ष आन्दोलन के प्रमुख लक्ष्य निम्न प्रकार हैं

(क) शान्ति और विश्व शान्ति के मार्ग की सभी बाधाओं को दूर करते हुए राष्ट्रों के बीच सद्भावनापूर्ण सम्बन्ध और विश्व शान्ति बनाए रखना ।
(ख) महाशक्तियों की दबावकारी भूमिका को नियन्त्रित करते हुए विकासशील देशों की सम्प्रभुता और हितों की रक्षा करना ।
(ग) गुटनिरपेक्ष (विकासशील) देशों के आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना ।
(घ) अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ को शक्तिशाली बनाना ।

20– गुटनिरपेक्षता की अवधारणा स्पष्ट कीजिए । वर्तमान समय में यह कहाँ तक प्रासंगिक है
उत्तर —- उत्तर के लिए विस्तृत उत्तरीय प्रश्न संख्या—- 17 के उत्तर का अवलोकन कीजिए ।

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