Up board class 12th civics solution chapter 14 egislative Assembly राज्यों का विधानमंडल- विधानपरिषद् और विधानसभा free pdf

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UP Board Solutions for Class 12 Civics Chapter 1 Principles of Origin of State

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न— राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों के नाम लिखिए।
उ०- राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों के नाम निम्नलिखित हैं
(i) विधानपरिषद्
(ii) विधानसभा

प्रश्न— विधानसभा की सदस्यता की अर्हताएँ क्या हैं?
उ०- विधानसभा की सदस्यता की अर्हताएँ निम्नलिखित हैं
(i) वह भारत का नागरिक हो।
(ii) उसकी आयु 25 वर्ष से कम न हो।
(iii) वह भारत सरकार अथवा राज्य सरकार के अन्तर्गत किसी लाभ के पद पर न हो।
(iv) उसमें वे योग्यताएँ हों जो संसद ने कानून द्वारा निश्चित की हैं। वह पागल, दिवालिया व अपराधी न हो।

प्रश्न— विधानसभा के चार कार्य लिखिए।
उ०- विधानसभा के चार कार्य निम्नलिखित हैं
(i) विधानसभा राज्य सीमा के अन्दर अनेक प्रकार के कानून-निर्माण का कार्य करती है।
(ii) विधानसभा राज्य के बजट को स्वीकृति प्रदान करती है।
(iii) विधानसभा मंत्रिपरिषद् पर पूर्ण नियंत्रण रखती है।
(iv) राज्य की विधानसभा संविधान संशोधन संबंधी कार्यों में संसद का सहयोग करती है।

प्रश्न— विधानसभा अध्यक्ष के कार्य लिखिए।
उ०- विधानसभा अध्यक्ष के कार्य निम्नलिखित हैं
(i) वह विधानसभा की बैठकों की अध्यक्षता करता है।
(ii) सदन की बैठकों की कार्यवाही नियमानुसार करता है।
(iii) वह सदन के सदस्यों के विशेषाधिकारों की रक्षा करता है।
(iv) सदस्यों को प्रश्न पूछने, प्रस्ताव रखने तथा भाषण करने की अनुमति देता है।

प्रश्न— विधानपरिषद् की सदस्यता की अर्हताएँ लिखिए।

उ०- (i) वह भारत का नागरिक हो।
(ii) वह 30 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो।
(iii) केन्द्र या राज्य सरकार के अन्तर्गत किसी लाभ के पद पर न हो।
(iv) पागल व दिवालिया न हो।
(v) संसद द्वारा निर्धारित योग्यताएँ पूरी करता हो

प्रश्न— . विधानपरिषद् के सभापति के कार्य बताइए।
उ०- विधानपरिषद् के सभापति के कार्य निम्नलिखित हैं
(i) वह विधानपरिषद् की बैठकों की अध्यक्षता करता है।
(ii) सदन की बैठकों की कार्यवाही नियमानुसार करता है।
(iii) वह सदन में शांति और अनुशासन बनाए रखता है। यदि कोई सदस्य अनुशासन भंग करे तो उसे निष्कासित कर सकता है।
(iv) वह सदस्यों को प्रश्न पूछने, प्रस्ताव रखने तथा भाषण की अनुमति प्रदान करता है।
(v) वह दलगत राजनीति से ऊपर उठकर निष्पक्ष रूप से कार्य करता है।
(vi) आवश्यकता पड़ने पर वह सदन की कार्यवाही स्थगित कर सकता है।

प्रश्न— राज्य विधानसभा की दो शक्तियाँ लिखिए।
उ०- राज्य विधानसभा की दो शक्तियाँ निम्नलिखित हैं
(i) विधायी शक्तियाँ
(ii) वित्तीय शक्तियाँ

प्रश्न— विधानसभा मंत्रिपरिषद् परकिस प्रकार नियंत्रण रखती है?
उ०- विधानपरिषद विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है। विधानसभा के सदस्य विधानपरिषद् के मंत्रियों से प्रश्न व पूरक प्रश्न पूछकर, विधानसभा अविश्वास प्रस्ताव, काम रोको प्रस्ताव, निन्दा प्रस्ताव प्रस्तुत करके, मंत्रियों के कटौती द्वारा अथवा किसी महत्वपूर्ण विधेयक को पारित न करके विधानपरिषद् पर पूर्ण नियंत्रण रखती है।


प्रश्न— अपने राज्य की विधानपरिषद्के गठन पर प्रकाश डालिए।
उ०- उत्तर प्रदेश की विधानपरिषद् का गठन इसके सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा किया जाता है। जिनकी संख्या विधानसभा के सदस्यों की संख्या की 1/3 से अधिक नहीं होनी चाहिए। इनका निर्वाचन निम्न प्रकार से होता है


(i) कुल सदस्यों की संख्या के एक-तिहाई सदस्य नगर पंचायतों, नगरपालिका परिषदों, नगर निगमों, जिला पंचायतों तथा अन्य स्थानीय संस्थाओं द्वारा चुने जाते हैं, जैसा कि संसद कानून द्वारा निर्धारित करे। सदस्यों का 1/12 भाग राज्य के स्नातकों द्वारा निर्वाचित होता है। इसमें वे स्नातक होते हैं, जिन्हें स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण किए हुए 3 वर्ष हो गए हों।


(iii) सदस्यों का 1/12 भाग राज्य के अध्यापकों द्वारा निर्वाचित होता है। इसमें वे अध्यापक होते हैं, जो माध्यमिक विद्यालयों तथा उच्च शिक्षण संस्थाओं में 3 वर्ष से शिक्षण कार्य कर रहे हों।


(iv) एक-तिहाई सदस्यों का निर्वाचन उस राज्य की विधानसभा के सदस्य ऐसे व्यक्तियों में से करते हैं, जो विधानसभा के सदस्य न हों।

(v) कुल संख्या के 1/6 सदस्य राज्यपाल द्वारा उन व्यक्तियों में से मनोनित किए जा सकते हैं, जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला, समाज सेवा अथवा सहकारिता आन्दोलन का विशेष ज्ञान होता है। विधानपरिषद् के सदस्यों को एम० एल०सी० कहा जाता है। विधानपरिषद् के सदस्यों की योग्यताएँ वही हैं, जो विधानसभा के सदस्यों के लिए हैं, किन्तु विधानपरिषद् की सदस्यता की न्यूनतम आयु 30 वर्ष निर्धारित की गई है। विधानपरिषद् एक स्थायी सदन है। इसके 1/3 सदस्य प्रत्येक दो वर्ष पश्चात् अपना स्थान रिक्त कर देते हैं और उनके स्थान पर नए सदस्य निर्वाचित किए जाते हैं। इस प्रकार प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष होता है।

प्रश्न— विधानसभा विधानपरिषद से अधिक शक्तिशाली है दो कारण बताइए।
उ०- विधानसभा विधानपरिषद् की तुलना में अधिक शकितशाली है। इसका कारण यह है कि विधानसभा का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से होता है और यह जनता का सदन है। इसके विपरीत विधानपरिषद् का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से होता है और यह कुछ वर्गों का प्रतिनिधित्व करता है। विधानसभा को विधानपरिषद् पर नियंत्रण रखने का अधिकार प्राप्त होता है।

विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न— उत्तर प्रदेश की विधानपरिषद् की रचना एवं कार्यों का वर्णन कीजिए।
उ०- विधानपरिषद का संगठन या रचना- जिन राज्यों के विधानमंडल में दो सदन हैं, वहाँ द्वितीय सदन अथवा उच्च सदन को विधानपरिषद् कहते हैं। किसी राज्य की विधानसभा यदि अपनी पूरी सदस्य संख्या के बहुमत से और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या के दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करके संसद से प्रार्थना करे तो संसद उस राज्य के लिए विधानपरिषद् की स्थापना अथवा उन्मूलन कर सकती है। वर्तमान समय में केवल पाँच राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक और जम्मू-कश्मीर) में ही विधान परिषदें हैं। विधानपरिषद् के सदस्य को एम०एल०सी० कहते हैं।


(i) सदस्य संख्या- संविधान द्वारा द्वि-सदनात्मक व्यवस्था वाले राज्य की विधानपरिषद् के सदस्यों की कुल संख्या उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं होगी, परन्तु ऐसे किसी राज्य में विधानपरिषद् के सदस्यों की कुल संख्या किसी भी दशा में 40 से कम नहीं होगी। यहाँ जम्मू-कश्मीर इसका अपवाद हैं, जहाँ विधानपरिषद् में 36 सदस्य हैं। विधानपरिषद् के सदस्यों का निर्वाचन-विधानपरिषद् के सदस्यों का निर्वाचन परोक्ष रूप से अनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार एकल संक्रमणीय मत पद्धति द्वारा होता है। निर्वाचन प्रणाली के अनुसार कुल सदस्यों की संख्या का विभाजन निम्न प्रकार है

(क) स्थानीय संस्थाओं का निर्वाचक मंडल-विधानपरिषद् के कुल एक-तिहाई सदस्यों का निर्वाचन उस राज्य की स्थानीय संस्थाओं (नगरपालिका, जिला बोर्ड आदि) के सदस्यों द्वारा होता है।
(ख) विधानसभा का निर्वाचक मंडल- विधानपरिषद् के कुल सदस्यों के एक-तिहाई राज्य की विधानसभा के सदस्यों द्वारा उन सदस्यों में से निर्वाचित किए जाएंगे जो विधानसभा के सदस्य नहीं है।
(ग) स्नातकों का निर्वाचक मंडल- विधानपरिषद की कुल सदस्य संख्या के 1/12 सदस्य विश्वविद्यालय के कम से-कम तीन वर्ष पुराने स्नातकों द्वारा निर्वाचित किए जाएंगे।
(घ) शिक्षकों का निर्वाचक मंडल- विधानपरिषद् की कुल सदस्य संख्या के 1/12 सदस्य राज्य की माध्यमिक शिक्षा संस्थाओं एवं उनसे उच्च स्तर की शिक्षा संस्थाओं के कम-से-कम तीन वर्ष पुराने शिक्षकों द्वारा निर्वाचित होंगे।

(ङ) राज्यपाल द्वारा नामजद सदस्य- शेष 1/6 सदस्य राज्य के राज्यपाल द्वारा नामजद किए जाएंगे।
(iii) विधानपरिषद् के सदस्यों की योग्यताएँ
(क) वह भारत का नागरिक हो।
(ख) वह 30 वर्ष की उम्र पूरी कर चुका हो।
(ग) केन्द्र या राज्य सरकार के अन्तर्गत किसी लाभ के पद पर न हो।
(घ) पागल व दिवालिया न हो।
(ङ) संसद द्वारा निर्धारित योग्यताएँ पूरी करता हो।
इसके अतिरिक्त निर्वाचित सदस्य को उस राज्य की विधानसभा के किसी निर्वाचन क्षेत्र का निर्वाचक होना चाहिए और उस राज्य का निवासी होना चाहिए, जहाँ वह विधानपरिषद् का सदस्य बनना चाहता है विधानपरिषद् के सदस्यों का निर्वाचन, निर्वाचक मंडल द्वारा अनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर एकल संक्रमणीय मत पद्धति के अनुसार होता है।


(iv) राज्य विधानपरिषद् के सदस्यों द्वारा शपथ ग्रहण- राज्य विधानपरिषद् में अपना आसन ग्रहण करने से पहले सदस्यों को राज्यपाल या उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के समक्ष देश की प्रभुसत्ता व अखण्डता की रक्षा व संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेनी पड़ती है।


(v) विधानपरिषद् का कार्यकाल- राज्यसभा की भाँति विधानपरिषद् भी एक स्थानीय सदन है। इसे कभी भंग नहीं किया जा सकता है। इसके एक-तिहाई सदस्य प्रति दूसरे वर्ष अवकाश ग्रहण करते हैं। इस प्रकार प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष होता है।


(vi) स्थान की रिक्तता- यदि कोई सदन की आज्ञा बिना लगातार 60 दिनों तक विधानमंडल (दोनों सदनों के लिए समान नियम) की बैठकों से अनुपस्थित रहता है, तो सदन उसके स्थान को रिक्त घोषित कर सकता है।
(vii) वेतन एवं भत्ते- विधानपरिषद् के सदस्यों को भी विधानसभा के सदस्यों के समान वेतन, भत्ते एवं अन्य सुविधाएँ प्राप्त होती हैं।


(viii) विधानपरिषद की गणपूर्ति व अधिवेशन- विधानपरिषद की गणपूर्ति व अधिवेशन के नियम विधानसभा के अनुरूप ही हैं। यह कोरम 1/10 सदस्यों का है।


(ix) विधानपरिषद् के पदाधिकारी- विधानपरिषद् अपने ही सदस्यों में से एक सभापति व एक उपसभापति निर्वाचित करती है। सभापति के वही कार्य हैं जो राज्यसभा के सभापति के हैं। सभापति को निर्णायक मत देने का अधिकार होता है। 14 दिन की पूर्व सूचना के द्वारा पारित प्रस्ताव के द्वारा सभापति व उपसभापति को हटाया भी जा सकता है। विधानपरिषद् के कार्य एवं शक्तियाँ- राज्य विधानपरिषद् को निम्नलिखित शक्तियाँ प्राप्त हैं–


(i) कानून निर्माण संबंधी शक्तियाँ- कानून निर्माण से संबंधित कोई भी साधारण विधेयक विधानपरिषद् के समक्ष भी प्रस्तुत किया जा सकता है। वह दोनों सदनों द्वारा पारित होना चाहिए, लेकिन यदि विधानसभा द्वारा पारित विधेयक विधानपरिषद् 4 माह तक पारित करके न भेजे तो वह अपने आप पारित किया हुआ मान लिया जाता है। विधानपरिषद् के संशोधन को भी विधानसभा रद्द कर सकती है। इससे सिद्ध होता है कि कानून निर्माण के क्षेत्र में विधानपरिषद् कम शक्तिशाली है।


(ii) वित्तीय शक्तियाँ- वित्तीय मामलों में विधानपरिषद् एक शक्तिहीन सदन है। कोई भी विधेयक विधानपरिषद के समक्ष प्रस्तावित नहीं किया जा सकता। वित्त विधेयक सर्वप्रथम विधानसभा के समक्ष ही प्रस्तुत किया जाता है। विधानसभा द्वारा पारित वित्त विधेयक को 14 दिन के अन्दर विधानपरिषद् द्वारा पारित करके भेजना आवश्यक है। यदि विधानपरिषद् 14 दिन के अन्दर इसको पारित करके न भेजे तो वह अपने आप पारित किया हुआ मान लिया जाता है। विधानपरिषद् द्वारा की गई सिफारिशों को मानना या न मानना विधानसभा की इच्छा पर है।

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Up Board Class 12th Civics Chapter 3 Liberty and Equality स्वतन्त्रता एवं समानता

कार्यपालिका संबंधी शक्तियाँ- विधानपरिषद् को कार्यपालिका पर नियंत्रण लगाने का अधिकार है। विधानपरिषद् में मंत्रिमंडल की नीतियाँ, कार्यों, सफलताओं तथा असफलताओं के संबंध में प्रश्न पूछे जा सकते हैं। काम रोको, ध्यानाकर्षण, निन्दा के प्रस्ताव भी प्रस्तुत किए जा सकते हैं परन्तु विधानपरिषद् का मंत्रिमंडल पर नियंत्रण नगण्य है। मंत्रिमंडल केवल विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है, विधानपरिषद् के प्रति नहीं। विधानपरिषद् मंत्रिमंडल को अविश्वास प्रस्ताव पारित करके अपदस्थ नहीं कर सकती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि विधानसभा की तुलना में विधानपरिषद् एक कमजोर सदन है। सच यह है कि विधानसभा ही राज्य की वास्तविक विधायिका है।

प्रश्न— विधानमंडल के अधिकार एवं कार्यों का वर्णन कीजिए।
उ०- विधानमंडल के अधिकार एवं कार्य-संविधान ने विधानमंडल को अनेक अधिकार प्रदान किए हैं, जो निम्नलिखित हैं
(i) वित्तीय शक्तियाँ-विधानमंडल का महत्वपूर्ण कार्य राज्य सरकार की आय और व्यय को निश्चित एवं नियन्त्रित करना है। परन्तु वित्त से संबंधित धन विधेयक केवल विधानमंडल के निम्न सदन (विधानसभा) में ही प्रस्तुत किया जा सकता है। इन धन विधेयकों को विधानसभा में केवल वित्तमंत्री को ही प्रस्तुत करने का अधिकार होता है। प्रायः वित्तमंत्री ऐसे विधेयक मुख्यमंत्री के परामर्श पर ही सदन में प्रस्तुत करता है। राज्य सरकार की आय-व्यय का वार्षिक विवरण (बजट) राज्यपाल की पूर्व स्वीकृति से ही विधानसभा में प्रस्तुत किया जाता है। बजट की स्वीकृति एवं राज्य की वित्तीय नीति विधानसभा ही निश्चित करती है। इसके अतिरिक्त, पुराने करों को समाप्त करने और नए करों को लागू करने का अधिकार केवल विधानसभा को ही होता है। अतः राज्य की आर्थिक व्यवस्था पर विधानसभा का पूर्ण अधिकार होता है।


(ii) कार्यपालिका पर नियंत्रण रखने का अधिकार- विधानमंडल का दूसरा महत्वपूर्ण कार्य मंत्रिपरिषद् पर नियंत्रण रखना है। इस संबंध में भी विधानसभा को विधानपरिषद् से अधिक शक्तियाँ प्राप्त है। विधानसभा कार्यपालिका पर पूर्ण नियंत्रण रखती है क्योंकि मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। विधानसभा मंत्रिपरिषद् पर अनेक उपायों द्वारा नियंत्रण रखती है। विधानसभा के सदस्य मंत्रिपरिषद् के सदस्यों से प्रश्न पूछ सकती है, पूरक प्रश्न पूछ सकते हैं, उनकी आलोचना कर सकते हैं, किसी भी विधेयक को अस्वीकृत कर सकते हैं तथा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर मंत्रिपरिषद् को त्यागपत्र देने के लिए बाध्य कर सकते हैं। मंत्रिपरिषद् के सदस्य मंत्रियों से प्रश्न एवं पूरक प्रश्न पूछ सकते हैं उनके कार्यों की आलोचना कर सकते हैं परन्तु वे मंत्रिपरिषद् के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव नहीं ला सकते हैं।


(iii) विधायिनी शक्तियाँ- राज्य विधानमंडल को राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है। वह समवर्ती सूची के विषयों पर भी कानून बना सकता है। परन्तु वह कानून संसद के कानून के विरुद्ध नहीं होनी चाहिए। वरना वह अमान्य समझा जाएगा। उल्लेखनीय है कि संसद भी कई स्थितियों में राज्य सूची के विषयों पर कानून बना सकती है Up Board Class 12th civics Chapter 12 Human Rights मानवाधिकार free pdf

(क) संसद संकटकाल के समय राज्य सूची के सभी विषयों पर कानून बना सकती है।
(ख) राज्यसभा दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित कर दे कि राष्ट्रीय हित में राज्य सूची में सम्मिलित किसी विषय पर
संसद द्वारा कानून बनाया जाना जरूरी है तो संसद ऐसे विषय पर कानून बना सकती है।
(ग) विधानसभा द्वारा स्वीकृति हो जाने पर कुछ विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के पास स्वीकृति के लिए भेजे जा सकते हैं।


(घ) कुछ विधेयकों को राज्य विधानसभा में पेश किए जाने से पहले उन पर राष्ट्रपति की अनुमति जरूरी है।

(ङ) राष्ट्रपति शासन लागू हो जाने पर राज्य विधानसभा के सभी अधिकार संसद को प्राप्त हो जाते हैं। साधारण विधेयक विधानमंडल के किसी भी सदन में पेश किया जा सकते हैं, परन्तु धन-विधेयक निचले सदन में ही प्रस्तुत किए जा सकते हैं। किसी विधेयक को कानून रूप देने के लिए सदनों की स्वीकृति आवश्यक है, परन्तु केन्द्र की ही भाँति राज्यों में भी निर्णायक शक्ति निचले सदन के पास हैं।


(iv) संविधान के संशोधन की शक्ति- यद्यपि भारतीय संविधान के अधिकांश अनुच्छेदों के संसद ही अकेले संशोधन कर सकती है, फिर भी कुछ ऐसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद हैं जिनमें संसद के विशेष बहुमत के साथ कम-से-कम आधे राज्यों के विधानसभा की स्वीकृति के बाद ही संविधान संशोधन हो सकता है। राज्य विधानमंडलों को संविधान में संशोधन प्रस्ताव रखने का अधिकार नहीं है।


(v) निर्वाचन संबंधी शक्ति- राज्य की विधानसभा के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग लेते हैं।

प्रश्न— “राज्य की विधानसभा, विधानपरिषद् से अधिक शक्तिशाली है।”इस कथन की उदाहरण सहित विवेचना कीजिए।
उ०- संविधान के अनुसार कुछ राज्यों के विधानमंडल में दो सदन है और शेष में एक। द्वि-सदनीय विधानमंडल में निम्न सदन को विधानसभा और उच्च सदन को विधानपरिषद् कहते हैं। विधानसभा के सदस्यों का चुनाव वयस्क मताधिकार द्वारा प्रत्यक्ष रीति से होता है। इसके सदस्यों की संख्या कम-से-कम 60 तथा अधिक-से-अधिक 500 तक हो सकती है। इसका कार्यकाल 5 वर्ष है। किन्तु विधानपरिषद् का चुनाव अप्रत्यक्ष विधि द्वारा होता है। इसके सदस्यों की संख्या कम-से-कम 40 होगी तथा विधानसभा के सदस्यों की संख्या से इसके सदस्यों की संख्या 1/3 से अधिक नहीं होगी। यह एक स्थायी सदन है तथा इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष है। विधानसभा विधानपरिषद् की अपेक्षा काफी समर्थ एवं अधिकार सम्पन्न होती है यह निम्नांकित शीर्षकों के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है-


(i) वित्तीय क्षेत्र में- धन विधेयक केवल विधानसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है। विधानपरिषद् में नहीं, किन्तु विधानपरिषद् से पारित होने के लिए प्रत्येक धन विधेयक उसके पास भेजा अवश्य जाता है। परन्तु विधेयक पर परिषद् द्वारा दी गई राय मानने के लिए विधानसभा बाध्य नहीं है। 14 दिन के अन्दर विधानपरिषद् को अपनी राय भेज देनी आवश्यक होती है। यदि इस अवधि में वह अपनी राय नहीं भेजती है तो भी विधेयक उसके द्वारा स्वीकृत माना जाता है। अर्थात उसकी स्वीकृति मात्र एक औपचारिकता है, उसकी राय का वास्तविक महत्व कुछ भी नहीं होता है। 14 दिन में स्वीकृति न आने पर विधेयक को स्वीकृत मानकर राज्यपाल के पास हस्ताक्षर हेतु भेज दिया जाता है। इस प्रकार धन विधेयकों के संबंध में विधानसभा शक्तिशाली है और विधानपरिषद विधेयक को रोककर केवल 14 दिन का विलम्ब कर सकती है।

(ii) विधायी क्षेत्र में- साधारण विधेयक राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन में प्रस्तावित किया जा सकता है, परन्तु ये विधेयक दोनों सदनों द्वारा स्वीकृत होने चाहिए। जब कोई साधारण विधेयक विधानसभा द्वारा स्वीकृत हो जाता है, तब उस पर मंत्रिपरिषद् की स्वीकृति लेने के लिए उसे विधानपरिषद् के पास भेजा जाता है। यदि विधानपरिषद् के समक्ष विधेयक रखे जाने की तिथि से तीन माह तक उसे पारित न किया जाए तो विधानसभा पुनः इसे पारित करके विधानपरिषद् में भेजती है। इस बार भी यदि विधानपरिषद् इसे अस्वीकृत करती है या उसे संशोधित करती है अथवा एक महीने तक उस पर कोई निर्णय नहीं लेती है, तो ऐसी स्थिति में साधारण विधेयक स्वीकृत मान लिया जाता है और उसे राज्यपाल के पास हस्ताक्षर हेतु भेज दिया जाता है। इस प्रकार विधानपरिषद् साधारण विधेयक को चार माह तक विलम्बित अवश्य कर सकती है किन्तु उसे पारित होने से रोक नहीं सकती है।


(iii) कार्यपालिका के क्षेत्र में- सम्पूर्ण मंत्रिपरिषद् विधानसभा के प्रति ही सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। विधानपरिषद् मंत्रिपरिषद् के सदस्यों से प्रश्न एवं पूरक-प्रश्न पूछ सकती है, उनकी आलोचना कर सकती है किन्तु उसे मंत्रिपरिषद् के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव रखने का अधिकार नहीं है। वास्तव में विधानसभा को ही मंत्रिपरिषद् पर नियंत्रण रखने का अधिकार प्राप्त होता है क्योकि यह उसके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित कर सकती है।

(iv) अन्य क्षेत्रों में- राष्ट्रपति के निर्वाचन में विधानसभा के केवल निर्वाचित सदस्य ही भाग लेते हैं, विधानपरिषद् के नहीं।
संविधान के संशोधन करने के संबंध में विधानमंडल के दोनों सदनों की शक्तियाँ अवश्य समान हैं। उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि राज्य विधानमंडल का द्वितीय सदन अथवा उच्च सदन एक शक्तिहीन सदन है। दोनों सदनों की शक्तियों के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर यह पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि विधानसभा
विधानपरिषद् की तुलना में अधिक शक्ति-सम्पन्न है। इसका कारण यह है कि विधानसभा का निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से होता है और यह जनता का सदन है। इसके विपरीत विधानपरिषद् का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से होता है और यह कुछ वर्गों का प्रतिनिधित्व करता है। वस्तुत: विधानपरिषद् द्वितीय सदन ही नहीं है, बल्कि यह द्वितीय श्रेणी का सदन भी है। यथार्थतः विधानपरिषद् सम्मान का सदन है शक्ति का नहीं।

प्रश्न– राज्य विधानमंडल में विधिनिर्माण प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उ०- राज्य विधानमंडल में कानून निर्माण की प्रक्रिया- विधानमंडल में कोई विधेयक किस प्रकार पारित होकर विधि (कानून) का स्वरूप प्राप्त करता है। इसे इस प्रकार समझा जा सकता है। सामान्यत: विधेयक दो प्रकार के होते हैंसाधारण विधेयक और धन विधेयक। साधारण विधेयकों के संबंध में-साधारण विधेयक मंत्रिपरिषद् के किसी सदस्य या राज्य विधानमंडल के किसी सदस्य द्वारा विधानमंडल के किसी भी सदन में रखे जा सकते हैं। यदि विधेयक किसी मंत्रिपरिषद् के सदस्य द्वारा रखा जाता है, तो इसे सरकारी विधेयक और राज्य विधानमंडल के किसी अन्य सदस्य द्वारा रखा जाता है, तो इसे निजी सदस्य विधेयक कहा जाता है। राज्य विधानमंडल को भी कानून-निर्माण के लिए लगभग वैसी ही प्रकिया अपनानी होती है, जैसी प्रक्रिया संसद के द्वारा अपनायी जाती है। ऐसे विधेयक को कानून का रूप ग्रहण करने के लिए निम्नलिखित चरणों से गुजरना होता है


(i) विधेयक को प्रेषित करना तथा प्रथम वाचन- सरकारी विधेयक के लिए कोई पूर्व सूचना आवश्यक नहीं होती है, परन्तु निजी सदस्य विधेयकों के लिए एक महीने पहले ही सूचना देना आवश्यक है। सरकारी विधयेक साधारणत: सरकारी गजट में छापा जाता है। निजी सदस्य विधेयक को प्रस्तुत करने के लिए दिन निश्चित किया जाता है। निश्चित दिन को विधेयक प्रस्तुत करने वाला सदस्य अपने स्थान पर खड़ा होकर उस विधेयक को पेश करने के लिए सदन से आज्ञा माँगता है और विधेयक के शीर्षक को पढ़ता है। यदि विधेयक अधिक महत्वपूर्ण है, तो विधेयक पेश करने वाला सदस्य विधेयक पर एक संक्षिप्त भाषण भी दे सकता है। यदि उस सदन में उपस्थित और मतदान में भाग देने वाले सदस्य बहुमत से विधेयक का समर्थन करते हैं, तो विधेयक सरकारी गजट में छाप दिया जाता है। यही विधेयक का प्रथम वाचन समझा जाता है।


(ii) द्वितीय वाचन- निश्चित तिथि को वह विधेयक पुनः उसी सदन में प्रस्तुत किया जाता है। द्वितीय वाचन के समय विधेयक
पर विस्तार से वाद-विवाद होता है। इस वाचन में विधेयक के साधारण सिद्धान्तों पर ही विचार होता है, प्रत्येक धारा पर नहीं।
(क) प्रवर समिति अवस्था- द्वितीय वाचन के बाद विधेयक को प्रवर समिति के पास भेज दिया जाता है। समिति विधेयक की प्रत्येक धारा पर विचार करती है तथा उसमें संशोधन हेतु समिति के द्वारा सुझाव प्रस्तुत किए जाते हैं। विधेयक पर विचार करके समिति अपना प्रतिवेदन सदन को भेजती है।
(ख) प्रतिवेदन अवस्था- समिति द्वारा प्रस्तुत सुझाव पर सदन द्वारा मतदान होता है। सदन के सदस्यों को भी अपने सुझाव पेश करने का अधिकार होता है। इस प्रकार की प्रत्येक धारा पर विचार और वाद-विवाद के उपरान्त विधेयक पारित किया जाता है।

(iii) तृतीय वाचन- जब विधेयक की प्रतिवेदन अवस्था समाप्त हो जाती है, तो कुछ समय पश्चात् इसका तृतीय वाचन प्रारम्भ होता है। इस अवस्था में विधेयक में संशोधन प्रस्तुत नहीं किए जा सकते हैं, विधेयक के साधारण सिद्धान्तों पर बहस की जाती है। इस अवस्था में विधेयक की धाराओं में कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता, या तो सम्पूर्ण विधेयक स्वीकार कर लिया जाता है या अस्वीकार। किन्तु इस अवस्था में विधेयक प्रायः अस्वीकार नहीं किया जाता है।


(iv) विधेयक द्वितीय सदन में- इसके पश्चात् विधेयक दूसरे सदन में भेज दिया जाता है। वहाँ पर भी यही प्रक्रिया अपनायी जाती है। यदि द्वितीय सदन उसे पारित कर देता है तो वह विधेयक राज्यपाल की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है। यदि कभी ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो जाए कि विधेयक एक सदन में तो पारित हो जाए और दूसरा सदन उसे पारित न करें या उसमें ऐसे संशोधन कर दे, जो पहले सदन को स्वीकार न हों, अथवा दूसरा सदन (विधानपरिषद्) तीन माह तक उस पर कोई कार्यवाही न करे, तो ऐसी दशा में यदि विधानसभा उस विधेयक को मूल रूप में अथवा संशोधन सहित पुनः पारित कर देती है तो वह विधेयक विधानपरिषद् की स्वीकृति के लिए पुनः भेजा जाएगा। विधानपरिषद् यदि उस विधेयक को अस्वीकार कर दे या एक माह तक कोई कार्यवाही न करें, अथवा उसमें ऐसे संशोधन करे जिनसे विधानसभा सहमत न हो तो भी वह विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाएगा। इस प्रकार स्पष्ट है कि विधानपरिषद् किसी साधारण विधेयक को अधिक से अधिक 4 माह तक रोक सकती है।


(v) राज्यपाल की स्वीकृति- जब विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित हो जाता है, तो उसे राज्यपाल की स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। राज्यपाल उस पर या तो हस्ताक्षर कर देता है या उसको अपने संशोधनों सहित विधानमंडल के पास पुनर्विचार के लिए भेज देता है। यदि राज्य विधानमंडल उस विधेयक को राज्यपाल द्वारा किए गए संशोधनों सहित अथवा उसके बिना पुनः पारित कर देता है, तो राज्यपाल को उस पर हस्ताक्षर करने ही होते हैं। राज्यपाल को कुछ विशेष प्रकार के विधेयकों
को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रखना होता है। राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह उस विधेयक को स्वीकार कर अथवा न करे। इस प्रकार यदि विधानमंडल उस विधेयक को राष्ट्रपति की सिफारिशों के अनुरूप पारित कर देता है तो उसे स्वीकृति मिल जाएगी अन्यथा नहीं।

विधेयक के संबंध में विवाद की स्थिति- विवाद की स्थिति में केंद्रीय विधायिका में संयुक्त अधिवेशन आहूत करने की परम्परा है, लेकिन राज्य विधायिका में ऐसा कोई नियम अथवा शिष्टाचार नहीं है। यदि विधानपरिषद् तीन माह तक किसी विधेयक पर निर्णय नहीं लेती है अथवा विधानसभा से असहमति रखती है तो संयुक्त अधिवेशन का प्रावधान न होने के कारण बहुमत निर्णय के अनुसार विधानसभा का संख्या बल अधिक होने पर उसी का संशोधन अथवा प्रस्ताव अंतिम रूप से पारित माना जाएगा।

धन विधेयक प्रस्तुत करने की प्रक्रिया- धन विधेयक के पारित होने की प्रक्रिया साधारण विधेयक से भिन्न है। धन विधेयक सर्वप्रथम विधानसभा में ही प्रस्तुत किया जाता है। विधानसभा उसे पारित कर विधानपरिषद् के पास भेज देती है। विधानपरिषद् को 14 दिन के अन्दर ही उस विधेयक को स्वीकृत अथवा अस्वीकृत कर विधानसभा को लौटा देना पड़ता है। यदि वह इस अवधि में उस विधेयक को नहीं लौटाती है, तो भी वह विधेयक दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाता है। विधानपरिषद् उस विधेयक में कुछ संशोधन कर प्रथम सदन को लौटा सकती है, किन्तु उन संशोधनों को मानना या न मानना विधानसभा की इच्छा पर निर्भर होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि विधानपरिषद् धन विधेयक को केवल 14 दिन के लिए ही रोक सकती है। विधानपरिषद् के सम्मान को दृष्टिगत रखते हुए यह एक औपचारिकता मात्र है। दोनों सदनों द्वारा पारित धन विधेयक राज्यपाल की स्वीकृति के लिए भेज दिया जाता है ओर उसके हस्ताक्षर हो जाने के बाद वह विधेयक कानून बन जाता है।

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