UP Board Solution for Class 12 Home Science Chapter 3 श्वासोच्छ्वास

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बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1 – श्वसन क्रिया पूर्ण होती है ।।

(a) एक चरण में
(b) दो चरण में
(C) चार चरण
(d) ये सभी

उत्तर:(b) दो चरण में

प्रश्न 2मानव शरीर में श्वसन का अंग नहीं है

(a) नासिका
(b) कण्ठ
(c) श्वासनली
(d) पटेला

उत्तर:(d) पटेला

प्रश्न 3 – नाक के छिद्र को कहा जाता है
(a) नथुने
(b) कुपिकाएँ
(c) कण्ठद्वार
(d) श्वसनी

उत्तर:(a) नथुने

प्रश्न 4 – ग्रसनी में भोजन निगलने वाला कहलाता है

(a) नासाद्वार
(b) अवटु
(c) कण्ठद्वार
(d) ये सभी

उत्तर:(c) कण्ठद्वार

प्रश्न 4 – ग्रसनी में भोजन निगलने वाला द्वार कहलाता है

(a) नासाद्वार
(b) अवटु
(c) कण्ठद्वार
(d) ये सभी

उत्तर:(c) कण्ठद्वार

प्रश्न 5 – श्वसन तन्त्र का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है

(a) वायु
(b) प्रश्वसन
(c) स्नायुतन्त्र
(d) फेफड़े

उत्तर: (d) फेफड़े

प्रश्न 6 – व्यायाम से श्वसन क्रिया होती है

(a) गहरी
(b) उथली
(c) तीव्र
(d) स्फूर्ति

उत्तर: (a) गहरी

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1 – श्वासोच्छ्वास किसे कहते हैं?

उत्तर:– वायुमण्डल से ऑक्सीजन ग्रहण करना और शरीर से कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर निकालने की क्रिया को श्वासोच्छ्वास कहते हैं ।।

प्रश्न 2 – मानव के श्वसन तन्त्र में सहायक अंगों के नाम लिखिए ।।

उत्तर:- मानव श्वसन तन्त्र के निम्नलिखित अंग हैं- नासिका, कण्ठ, श्वासनली, श्वसनी तथा फेफड़े ।।

प्रश्न 3 – नासाद्वार किसे कहते हैं?

उत्तर:–वायु के आवागमन के लिए नाक में जो छिद्र होता है, उसे नासाद्वार कहते हैं ।।

प्रश्न 4 – स्वर यन्त्र से आप क्या समझते हैं?

उत्तर:- कण्ठ को ही स्वर यन्त्र कहते हैं ।। कण्ठ उपास्थि का बना हुआ एक ढक्कन होता है, जो कण्ठद्वार पर स्थित होता है ।।

प्रश्न 5 – श्वासनली कितने भागों में विभाजित होती है?

उत्तर:- श्वासनली वक्ष में जाकर दो भागों में विभाजित होती है श्वसनी तथा ब्रॉन्कस

लघु उत्तरीय प्रश्न


प्रश्न 1 – श्वसन क्रिया की उपक्रियाएँ या चरण की प्रक्रिया समझाइए ।।

उत्तर: श्वसन क्रिया की दो उपक्रियाएँ निम्न प्रकार हैं ।।

1 – अन्तःश्वास ( Inspiration) इस प्रक्रिया में वायु अन्दर ली जाती है, जिससे डायाफ्राम की पेशियाँ संकुचित होती हैं एवं डायाफ्राम समतल (Flattened) हो जाता हैं ।। निचली पसलियाँ बाहर एवं ऊपर की ओर फैलती हैं तथा छाती फूल जाती है ।। फेफड़ों में वायु का दाब कम हो जाता है और वायु फेफड़ों में प्रवेश कर जाती है ।।

2 – निःश्वसन / उच्छवास (Expiration) निःश्वसन की क्रिया में वायु फेफड़ों से बाहर निकाली जाती है ।। इसमें डायाफ्राम एवं पसलियों की पेशियाँ शिथिल हो जाती हैं तथा डायाफ्राम फिर से गुम्बद आकार (Dome Shaped) का हो जाता है ।। छाती संकुचित होती है तथा वायु बाहर की ओर नाक एवं वायुनाल द्वारा निकलती है ।। मनुष्य एक मिनट में 12-15 बार साँस लेता हैं, जबकि नवजात शिशु एक मिनट में लगभग 40 बार साँस लेता है ।। सोते समय श्वसन की दर सबसे कम होती है ।।
मनुष्य में वायु का मार्ग इस प्रकार होता हैं ।।
नासारन्ध्र+ ग्रसनी ने कण्ठ + श्वासनाल= श्वसनी
कोशिका – रुधिर– वायुकोष्ठक – श्वसनिकाएँ

प्रश्न 2 – श्वसन तन्त्र में श्वासोच्छ्वास का क्या प्रयोजन है?

उत्तर:- मनुष्य में फुफ्फुसीय वायु आयतन और क्षमता को निम्नलिखित रूपों में समझाया जा सकता है ।। 1 – अवरीय या प्रवाही आयतन (Tidal Volume or TV) सामान्य श्वसन के दौरान एक बार में ली गई या निकाली गई वायु का आयतन प्रवाही आयतन कहलाता है ।। यह लगभग 500 मिली होता है ।।

2 – उच्छव सन आरक्षित आयतन (Expiratory Reserve Volume or ERV) — उच्छव सन के बाद फेफड़ों में कुछ वायु रह जाती है, उसमें से बलपूर्वक निकाली गई वायु के आयतन को उच्छव सन आरक्षित आयतन (ERV) कहते हैं ।। इसका आयतन लगभग 1000 मिली होता है ।।

3 – निःश्वसन आरक्षित आयतन (Inspiratory Reserve Volume or IRV) एक सामान्य निःश्वसन के बाद बलपूर्वक फेफड़ों के द्वारा ली जाने वाली वायु के आयतन को निःश्वसन आरक्षित आयतन (IRV) कहते हैं ।। इसका आयतन लगभग 2500-3000 मिली होता है ।।

4 – अवशेषी आयतन (Residual Volume or RV)— पूरे प्रयास से फेफड़ों से वायु निकालने के बाद फेफड़ों में शेष बची वायु का आयतन अवशेष आयतन (RV) कहलाता है ।। यह लगभग 1500 मिली होता है ।।

5 – निःश्वसन क्षमता ( Inspiratory Capacity or IC) — प्रवाही आयतन के अतिरिक्त अभ्यास द्वारा फेफड़ों में अधिक-से-अधिक ली जा सकने वाली वायु की मात्रा को निःश्वसन क्षमता कहते हैं ।।
IC = TV + IRV= 500 मिली + 3000 मिली = 3500 मिली

प्रश्न 3 – उचित श्वसन क्रिया के लिए आप किन-किन बातों का ध्यान रखेंगी?

उत्तर:– श्वसन क्रिया, मानवीय स्वास्थ्य एवं शरीर के लिए लाभकारी होती है, जो मानवीय कार्यक्षमता के साथ-साथ कार्यक्षमता को भी व्यापक रूप से प्रभावित करती हैं ।। इस प्रकार से सामान्य श्वसन एक आवश्यक क्रिया होती है ।। इसके लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता हैं ।।

1 – हमेशा शुद्ध वायु का उपयोग श्वसन क्रिया में हो, इसके लिए शुद्ध वायु में श्वास लेनी चाहिए, जिसमें ऑक्सीजन की मात्रा अधिक तथा कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा कम होती है ।। ऐसा वातावरण अधिकांशतः गाँवों, पार्को एवं उद्यानों में मिलता है ।।

2 – श्वास सदैव गहरी लेनी चाहिए, क्योंकि इससे फेफड़े एवं श्वसन अंगों की क्रियाशीलता बढ़ती है, जो स्वास्थ्य के लाभकारी होती है, इसलिए दिन में कई बार गहरी श्वास लेनी चाहिए ।।

3 – श्वास सदैव नाक से ही लेनी चाहिए, क्योंकि श्वास लेने की यह एक उचित विधि है ।। नाक से श्वास लेने पर अशुद्धियाँ नाक के रोएँ एवं नाक की नम झिल्ली में फंसकर रह जाती हैं और शुद्ध वायु आन्तरिक भाग तक पहुँचती है ।।

4 – धूल के कणों आदि में श्वास हल्की लेनी चाहिए, अन्यथा अशुद्ध वायु का प्रवेश अधिक मात्रा में श्वास के द्वारा शरीर में हो जाता है ।।

5 – बैठने एवं चलने के समय शरीर की उचित स्थिति होनी चाहिए, क्योंकि इससे श्वसन क्रिया प्रभावित होती है ।।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1 – मानव के श्वसन में सहायक अंगों के नाम लिखते हुए उनके कार्यों का उल्लेख कीजिए ।।

अथवा

श्वसन तन्त्र के विभिन्न अंगों का नामांकित चित्र सहित वर्णन कीजिए ।।

उत्तर:– श्वसन क्रिया सम्पन्न करने के लिए विभिन्न अंगों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है ।। मानव के प्रमुख श्वसनांग फेफड़े होते हैं तथा इनके सहायक अंग नासिका, कण्ठ या स्वर यन्त्र, श्वासनली तथा श्वसनी होते हैं ।। श्वसन तन्त्र के मुख्य अंग निम्नलिखित हैं ।।

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1 – नासिका श्वसन के लिए वायु सर्वप्रथम नासिका (नाक) में प्रवेश करती है ।। वायु आवागमन के लिए नाक में जो छिद्र होता है, उसे नासाद्वार या नथुने कहा जाता है ।। इससे अन्दर की ओर दो मार्ग जाते हैं ।। दोनों मागों को एक पर्दे के माध्यम से एक-दूसरे से पृथक् किया जाता है ।। तालु की हड्डी”नासिका को मुँह से पृथक करती है, जो नासागहा के निचले आधार में स्थित होती है ।। श्लेष्मिक कला द्वारा स्रावित चिपचिपे पदार्थ से नासागुहा को मार्ग चिकना बना रहता है ।। वायु में उपस्थित धूल के कणों एवं जीवाणुओं को रोकने के लिए नासागुहा की सतह पर छोटे-छोटे रोएँ होते हैं ।। श्लेष्मिक कला का चिपचिपा पदार्थ भी जीवाणुओं को चिपकाकर अन्दर प्रवेश करने से रोकता है ।। दोनों नासाद्वारों को मिलाकर एक नली बनती है, जोकि ग्रसनी में खुलती है ।। नाक से श्वास लेने के निम्नलिखित लाभ हैं

• वायु में उपस्थित धूल के कण एवं अन्य प्रकार की गन्दगी को नाक में स्थित बालों द्वारा रोक लिया जाता है, जिससे फेफड़ों तक स्वच्छ वायु पहुँचती है ।।

• नाक तथा श्वासनली आदि की रक्त केशिकाओं द्वारा नाक से प्रवेश करने वाली वायु को गर्म किया जाता है, जिससे कि फेफड़ों को गर्म वायु उपलब्ध होती है ।। अधिक ठण्डी वायु फेफड़ों के लिए हानिकारक होती है ।।

• श्लेष्मिक कला से मढ़ी हुई वायु नलिका भित्ति द्वारा वायु में उपस्थित जीवाणुओं एवं धूल के कणों को रोक लिया जाता है ।। इस कारण फेफड़ों तक पहुँचने वाली वायु जीवाणुओं से मुक्त होती है ।।

2 – कण्ठ या स्वर यन्त्र ग्रसनी में भोजन निगलने वाले द्वार से पहले एक छिद्र होता हैं, जो घाँटी या कण्ठद्वार कहलाता है ।। कण्ठ उपास्थि का बना हुआ एक ढक्कन होता है, जो कण्ठद्वार पर स्थित होता है ।। कण्ठ भोजन को श्वासनली में जाने से रोकता है ।। श्वासनली को बनाने वाली उपास्थि के अधूरे छल्लों में से ऊपरी छल्ला अवटु उपास्थि सामने से चौड़ा तथा उभरा हुआ होता है ।।

पुरुषों के कण्ठ में इसे बाहर से कर अनुभव किया जा सकता है अर्थात् यह सामने की और उभरा हुआ होता है, जिसे टेंटुआ या आदम ऐपल कहा जाता है ।। दूसरा छल्ला चारों ओर से पूरा होता है तथा मुद्रिका उपास्थि कहलाता है ।। दोनों छल्लों के बीच रेशेदार तन्तु भरे रहते हैं ।।

3 – श्वासनली या वायुनलिका कण्ठ से होकर वायु श्वासनली अथवा वायुनलिका में प्रवेश करती है ।। इसकी गोलाई 2 – 5 सेमी तथा लम्बाई लगभग 10-12 सेमी होती है, जो कण्ठ से लेकर पूर्ण ग्रीवा (Neck) में विद्यमान होती है ।। यह नली ‘C’ के आकार के रेशेदार तन्तुओं से निर्मित छल्लों से बनी होती हैं, जोकि पीछे की ओर खुले रहते हैं ।। इनके ऊपर श्लेष्मिक कला ढकी होती है ।। नली के ऊपर तथा पिछले भाग में श्लेष्मिक कला ढकी होती है ।। जब भोजन ग्रासनली से गुजरता है, तो प्रासनली फूलती है और श्वासनली की पिछली झिल्ली दब जाती है ।। इस प्रकार ग्रासनली को फूलने का स्थान मिल जाता हैं ।।


4 – वायु प्रणालियाँ या श्वसनी श्वासनली वक्ष में जाकर दो भागों में विभक्त हो जाती है-श्वसनी तथा ब्रॉन्कस ।। ये दोनों शाखाएँ ही वायु प्रणालियों कहलाती हैं ।। दोनों वायु प्रणालियां दोनों भागों के फेफड़ों में अलग-अलग प्रवेश करके असंख्य उप-शाखाओं में बँट जाती हैं ।।

श्वसनिका के अन्त में छोटे-छोटे थैले लगे रहते हैं, जिनको वायुकोष कहते हैं ।। वायुकोण लौह तत्त्व के कारण लाल रंग का होता है ।। इन वायुकोषों में वायु रुकी रहती है, जहाँ पर रक्त का शुद्धिकरण होता है ।।

5 – फेफड़े ये मानव श्वसन तन्त्र के सबसे महत्त्वपूर्ण अंग हैं ।। इनकी संख्या दो होती है एवं ये वक्षगुहा में दाई तथा बाईं ओर स्थित होते हैं ।। इनका रंग नीलापन लिए भूरा होता है ।। जन्म से पहले इनका रंग लाल तथा नवजात शिशु के फेफड़ों का रंग गुलाबी होता है ।।

प्रश्न 2 – फेफड़ों का चित्र बनाते हुए इसकी संरचना तथा कार्य लिखिए ।। –

उत्तर:– फेफड़ों की संरचना

दायाँ फेफड़ा बाएँ फेफड़े की अपेक्षा बड़ा होता है ।। फेफड़े वक्षगुहा के बाएँ एवं दाएँ स्थित होते हैं तथा तन्तुपट (Diaphragm) पर उभरे हिस्से पर चिपके रहते हैं ।। इनकी संरचना अत्यन्त कोमल, लचीली, स्पंजी तथा गहरे स्लेटी भूरे रंग की होती है ।। इनके चारों ओर एक पतली झिल्ली का आवरण होता हैं, जिनके भीतर एक लसदार तरल पदार्थ भरा रहता है, जिसे प्लूरा अथवा फुफ्फुसीय आवरण कहा जाता है ।। गुहा को फुफ्फुसीय गुहा कहते हैं ।। ये सब रचनाएँ फेफड़ों की सुरक्षा करती हैं ।। दायाँ फेफड़ा दो अधूरी खाँचों द्वारा तीन पिण्डों में बँटा रहता है ।।

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बाएँ फेफड़े में एक अधूरी खाँच होती है तथा यह दो पिण्ड़ों में बँटा होता है ।। फेफड़ों में मधुमक्खी के छत्ते की तरह असंख्य वायुकोष होते हैं ।। एक वयस्क मनुष्य में इन वायुकोषों की संख्या लगभग 15 करोड़ तक होती है ।। प्रत्येक वायुकोष का सम्बन्ध एक श्वसन (Bronchue) से होता है ।। प्रत्येक श्वसनी, जो श्वासनाल के दो भागों में बँटने से बनती है, फेफड़े के अन्दर प्रवेश कर अनेक शाखा अर्थात् उप शाखाओं में बंट जाती है ।।


अत्यन्त महीन उप-शाखाएँ, जो अन्तिम रूप से बनती हैं, कूपिका-नलिकाएँ (Alveolar ducts) कहलाती हैं ।। प्रत्येक कुपिका नलिका के सिरे पर अंगूर के गुच्छे की भांति अनेक वायुकोष (Alveoli) जुड़े रहते हैं ।। प्रत्येक वायुकोष अति महीन झिल्ली का बना होता है ।। इसको बनाने वाली कोशिकाएँ चपटी होती हैं ।। इसकी बाहरी सतह पर रुधिर केशिकाओं (Blood capillariou) का जाल फैला रहता है ।। यह जाल फुफ्फुस धमनी के अत्यधिक शाखान्वित होने से बनता है ।। इन केशिकाओं में शरीर का ऑक्सीजन रहित रक्त आता है तथा इसमें कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा अधिक होती है ।। यह कार्बन डाइऑक्साइड वायुकोष की वायु में विसरित हो जाती है, बाद में ये केशिकाएँ मिलकर फुफ्फुस शिरा बनाती हैं ।।

फेफड़ों की सामर्थ्य

फेफड़े कभी रिक्त नहीं रहते हैं ।। इनमें लगभग 2,500 मिली हवा या वायु हमेशा भरी रहती है ।। यह वायु कार्यात्मक अवशेष वायु (Functional residual air) कहलाती है ।। सामान्य रूप से प्रत्येक श्वास में लगभग 500 मिली वायु हम फेफड़ों में भरते च निकालते हैं ।। यह प्रवाही वायु (Tidal hir) कहलाती है ।। लम्बी श्वास लेकर हम प्रवाही वायु को 3,500 मिली तक अर्थात् सामान्य से 3 मिली अधिक ले सकते हैं ।। यह प्रश्वसन सामर्थ्य (Inspiratory capacity) कहलाती है ।। प्रश्वसन सामर्थ्य तथा कार्यात्मक अवशेष वायु का आयतन संयुक्त रूप से लगभग 6,000 मिली हो जाता है ।। यह फेफड़ों की मूल सामर्थ्य (Total lung capacity) कहलाती है ।।

मनुष्य प्रश्वसन सामर्थ्य द्वारा वायु से फेफड़ों को पूरी तरह से भरकर एक निःश्वसन में प्रवाही वायु के अतिरिक्त लगभग 4,000 मिली वायु और बाहर निकाल सकता है ।। दूसरे शब्दों में कुल 4,500 मिली वायु बाहर निकाल सकता है ।। यह फेफड़ों की सजीव सामर्थ्य (Vital capacity) कहलाती है ।। सजीव सामर्थ्य प्रश्वसन सामर्थ्य से लगभग 1,000 मिली अधिक होती है, फिर भी फेफड़ों में लगभग 1,500 मिली वायु रह जाती है, जो अवशेष वायु (Reaidual air) कहलाती है ।। ग्रहण की गई 500 मिली वायु में से 150 मिली वायु श्वासनल तथा श्वसनी ( Bronchioles) में बची रह जाती है ।। यह मात्रा गैसीय विनिमय में भाग नहीं लेती है ।। यह मृत स्थान वायु (Dead space air) कहलाती हैं ।।

फेफड़ों में रुधिर का शुद्धिकरण या फेफड़ों के कार्य श्वसन क्रिया में दो प्रकार की क्रियाएँ होती हैं-प्रश्वसन व निःश्वसन प्रश्वसन में बाहरी वायु (ऑक्सीजन युक्त) को ग्रहण किया जाता है, जबकि निःश्वसन में वायु (कार्बन डाइऑक्साइड युक्त) बाहर निकलती है ।।

रुधिर में पाई जाने वाली असंख्य लाल रुधिर कणिकाओं में हीमोग्लोबिन नामक प्रोटीन होता है ।। इस पदार्थ में विद्यमान लौह तत्त्व की प्रचुरता के कारण रुधिर का रंग लाल होता है ।। हीमोग्लोबिन वायु की ऑक्सीजन को • सरलता से अपने साथ बन्धित कर लेता है, इस कारण इस पदार्थ को श्वसनरंगा कहते हैं ।।

अवशोषित ऑक्सीजन के कारण हीमोग्लोबिन तथा सम्पूर्ण रुधिर का रंग अधिक चटकीला लाल हो जाता है ।। ऐसे रुधिर को शुद्ध रुधिर कहते हैं ।।


फुफ्फुसीय धमनी के द्वारा आया हुआ रुधिर पर्याप्त कार्बन डाइऑक्साइड से युक्त होता है तथा इसमें ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम होती है ।। ऐसे रुधिर को अशुद्ध रुधिर कहते हैं ।। अशुद्ध रुधिर में कार्बन डाइऑक्साइड रुधिर के तरल भाग प्लाज्मा में घुली रहती है ।।

जब यह अशुद्ध रुधिर, ग्रहण की गई वायु (ऑक्सीजन युक्त) के सम्पर्क में आता है, तो रुधिर में उपस्थित हीमोग्लोबिन ऑक्सोजन को तुरन्त ग्रहण कर लेता है ।। रक्त में घुली हुई कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण की गई वायु में कार्बन डाइऑक्साइड की कमी के कारण, रुधिर से निकलकर फेफड़ों में भरी वायु में आ जाती है तथा निःश्वसन के दौरान बाहर निकल जाती है ।।

फेफड़ों द्वारा रक्त को शुद्ध करने की प्रक्रिया को प्रश्वसन तथा निःश्वसन की प्रक्रिया के दौरान वायु में ऑक्सीजन (O2) तथा कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की मात्रा देखकर समझा जा सकता है ।।


प्रश्न 3 – उचित रूप से श्वास का योग पर क्या प्रभाव पड़ता है?

उत्तर:- योग श्वसन तन्त्र का एक विशेष व्यायाम है, जो फेफड़ों को मजबूत बनाने और रक्तसंचार बढ़ाने में मदद करता है ।। फिजियोलॉजी के अनुसार, जो वायु हम श्वसन क्रिया के दौरान भीतर खींचते हैं, वह हमारे फेफड़ों में जाती है और फिर पूरे शरीर में फैल जाती है ।।

इस तरह शरीर को जरूरी ऑक्सीजन मिलती है ।। यदि श्वसन कार्य नियमित और सुचारू रूप से चलता रहे, तो फेफड़े स्वस्थ रहते हैं, लेकिन सामान्यतः लोग गहरी साँस नहीं लेते, जिसके चलते फेफड़े का एक चौथाई हिस्सा ही काम करता है और बाकि का तीन चौथाई हिस्सा स्थिर रहता है ।। मधुमक्खी के छत्ते के समान फेफड़े लगभग 75 मिलियन कोशिकाओं से बने होते हैं ।।


इनकी संरचना स्पंज के समान होती है ।। सामान्य श्वास जो हम सभी आमतौर पर लेते हैं, उससे फेफड़ों के मात्र 20 मिलियन छिद्रों तक ही ऑक्सीजन पहुँचती है, जबकि 55 मिलियन छिद्र इसके लाभ से वंचित रह जाते हैं ।। इस कारण से फेफड़ों से सम्बन्धी कई बीमारियाँ, जैसे-ट्यूबरक्युलोसिस, रेस्पिरेटरी डिजीज (श्वसन सम्बन्धी रोग) खाँसी और ब्रॉन्काइटिस आदि पैदा हो जाती हैं ।।

फेफड़ों के सही तरीके से काम न करने से रक्त शुद्धिकरण की प्रक्रिया प्रभावित होती है ।। इस कारण हृदय भी कमजोर हो जाता है और असमय मृत्यु की आशंका बढ़ जाती है, इसलिए लम्बे एवं स्वस्थ जीवन के लिए योग बहुत जरूरी है ।। नियमित योग से बहुत सी बीमारियों से छुटकारा मिल सकता है ।।

व्यायाम मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है, जो मनुष्य के शरीर को स्वस्थ एवं सुदृढ़ बनाता है ।।

व्यायाम से श्वसन क्रिया पर पड़ने वाले प्रभावों का विवरण निम्नलिखित हैं ।।

1 – श्वास का गहरा होना व्यायाम से साँस तेजी से चलती हैं, जिसके कारण ऑक्सीजन अधिक मात्रा में तीव्रता से फेफड़े में पहुँचती है, जिससे उसी मात्रा में रक्त भी शुद्ध होता है ।। अतः यह मानव स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है ।।

2 – रक्त प्रवाह की गति को तीव्र होना तीव्र गति से रक्त प्रवाहित होने से शरीर के विभिन्न भागों में उचित मात्रा में ऊर्जा का संचरण होता है और कार्बन डाइऑक्साइड भी जल्दी बाहर निकल जाती है ।।

3 – कोशिकाओं का अधिक क्रियाशील होना व्यायाम से शरीर की विभिन्न कोशिकाएँ अधिक क्रियाशील हो जाती हैं, जिसके फलस्वरूप शरीर से यूरिया, यूरिक एसिड, लवण आदि पसीने के साथ बाहर निकलने से शरीर चुस्त एवं स्वस्थ होता है ।।

4 – अधिक भूख लगना व्यायाम से शरीर की ऊर्जा का ह्रास होता है, जिसके बाद मनुष्य को पर्याप्त भूख लगती है, तत्पश्चात् सन्तुलित भोजन ग्रहण करने के पश्चात् शरीर को आवश्यक पोषक तत्त्व एवं ऊर्जा पुनः प्राप्त होते हैं ।।

5 – स्फूर्ति व्यायाम से अधिक मात्रा में शरीर में प्राण वायु (ऑक्सीजन) का प्रवेश होता है, जिससे मनुष्य का रक्त उचित अनुपात में शरीर के विभिन्न भागों में पहुँचता है, जिससे मस्तिष्क तो सुचारू रूप से कार्य करता ही है तथा साथ ही मनुष्य भी स्फूर्ति महसूस करता है ।।

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