UP BOARD SOLUTION FOR CLASS 12TH SAMANY HINDI CHAPTER 8 AKHIRI CHATTAN आखिरी चट्टान गद्य गरिमा

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UP BOARD SOLUTION FOR CLASS 12TH SAMANY HINDI CHAPTER 8 AKHIRI CHATTAN आखिरी चट्टान
UP BOARD SOLUTION FOR CLASS 12TH SAMANY HINDI CHAPTER 8 AKHIRI CHATTAN आखिरी चट्टान
कक्षा  12  गद्य  गरिमा  7 आखिरी चट्टान का सम्पूर्ण हल 


1 . मोहन राकेश का जीवन परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए ।।

उत्तर – – लेखक परिचय- प्रसिद्ध साहित्यकार मोहन राकेश का जन्म 8 जनवरी सन् 1925 ई० को अमृतसर (पंजाब) में हुआ था ।। इनके पिता श्री करमचन्द गुगलानी एक प्रसिद्ध वकील थे; परन्तु साहित्य व संगीत के प्रति उनका विशेष प्रेम था ।। , जिसका प्रभाव मोहन राकेश के कोमल हृदय पर भी पड़ा ।। ओरियण्टल कॉलेज (लाहौर) से ‘शास्त्री’ की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद हिन्दी तथा संस्कृत विषय से इन्होंने स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की ।। इसके बाद इन्होंने शिमला, जालन्धर, बम्बई (मुम्बई) और दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन-कार्य किया ।। अध्यापन करते हुए बहुत-सी परेशानियाँ आने के कारण इन्होंने अध्यापन-कार्य छोड़ दिया ।। सन् 1962-63 ई० में इन्होंने हिन्दी की प्रसिद्ध कहानी पत्रिका ‘सारिका’ के सम्पादन का दायित्व निर्वहन किया, किन्तु कार्यालय की यान्त्रिक पद्धति इनके मन के अनुकूल नहीं थी; अतः इस कार्य का भी इन्होंने परित्याग कर दिया ।। सन् 1963 ई० से इन्होंने स्वतंत्र रूप से लेखन-कार्य आरम्भ किया और यही इनके जीविकोपार्जन का माध्यम था ।। भारत सरकार द्वारा नाटक की भाषा’ पर कार्य करने के लिये इन्हें ‘नेहरू फेलोशिप’ प्रदान की गई ।। 3 जनवरी 1972 ई० को अकस्मात् इनका देहावसान हो गया ।।

कृतियाँ- इनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैंनिबन्ध संग्रह- बकलमखुद, परिवेश ।।


उपन्यास– नीली रोशनी की बाँहे, न आने वाला कल, अँधेरे बन्द कमरे, अन्तराल ।। कहानी संग्रह- वारिस, क्वार्टर, पहचान ।। नाटक- आधे-अधूरे, आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस, मृच्छकटिक और शाकुन्तलम के हिन्दी नाट्य-रूपान्तर, दूध और दाँत ।। जीवनी-संकलन- समय सारथी ।। यात्रा वृत्तान्त- आखिरी चट्टान तक ।। डायरी साहित्य- मोहन राकेश की डायरी ।।

2- मोहन राकेश की भाषा-शैली की विशेषताएँ बताते हुए हिन्दी साहित्य में उनका स्थान निर्धारित कीजिए ।।

उत्तर – – भाषा-शैली- मोहन राकेश की भाषा परिष्कृत, परिमार्जित, संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है ।। इनकी भाषा विषय, पात्र और देश काल के अनुसार बदलती रहती है ।। एक ओर इनकी भाषा में संस्कृत की तत्सम शब्दावली दिखाई देती है तो दूसरी ओर सरल एवं काव्यात्मक भाषा भी मिलती है ।। बोलचाल के सरल शब्दों और स्थान-स्थान पर उर्दू, अंग्रेजी आदि के प्रचलित शब्दों के प्रयोग से इनकी भाषा में आधुनिकता का गुण आ गया है ।। मोहन राकेश जी की भाषा यद्यपि मुख्य रूप से संस्कृत के तत्सम शब्दों से युक्त है, तथापि उसमें अंग्रेजी, उर्दू एवं क्षेत्रीय भाषा के प्रयोग भी दृष्टिगोचर होते हैं ।। इस कारण इनकी भाषा वातावरण, प्रकृति एवं पात्रों का सजीव चित्र प्रस्तुत करने में समर्थ है ।। कहानियों, उपन्यासों और यात्रा संस्मरणों में मोहन राकेश जी ने वर्णात्मक शैली का प्रयोग किया है ।। सरल भाषा के द्वारा इन्होंने यथार्थ चित्र उपस्थित करने का कार्य भी इसी शैली में किया है ।।

इन्होंने अपनी रचनाओं में भावात्मक शैली का सर्वाधिक प्रयोग किया है ।। भावात्मक एवं काव्यात्मक गुणों पर आधारित इनकी यह शैली बड़ी रोचक एवं लोकप्रिय रही है ।। मोहन राकेश मूलतः नाटककार हैं; अतः इनके निबन्धों में संवाद शैली की बहुलता है ।। इससे नाटकीयता तो आती ही है, साथ की रोचकता भी बढ़ती है और पात्र का चरित्र भी निखर उठता है ।। इन्होंने यात्रा निबन्धों में प्राय चित्रात्मक शैली का प्रयोग किया है ।। इससे प्राकृतिक चित्र सजीव हो उठे है ।। इन्होंने अपनी रचनाओं में अपनी बिम्ब-विधायिनी शक्ति का परिचय दिया है ।। राकेश जी ने अपने यात्रा वृत्तान्तों में विवरणात्मक शैली का भी अद्भुत प्रयोग किया है ।। मोहन राकेश जी की भाषा-शैली किसी भी पाठक को सहज ही आकर्षित कर लेने में समर्थ है ।। विचारों एवं भावों के अनुकूल प्रयुक्त की गई उनकी भाषा-शैली अत्यन्त प्रभावपूर्ण है ।। हिन्दी साहित्य में स्थान-आधुनिक साहित्यकारों में मोहन राकेश अद्वितीय हैं ।। इन्होंने अपनी प्रखर बुद्धि से हिन्दी-साहित्य जगत की जो श्रीवृद्धि की है, उसके लिए हिन्दी-साहित्य जगत सदैव इनका आभारी रहेगा ।।

व्याख्या सम्बन्धी प्रश्न

1 . निम्नलिखित गद्यावतरणों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए

(क) पृष्ठभूमि में . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . यात्री,एक दर्शक ।।

सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्यपुस्तक ‘गद्य गरिमा’ के ‘मोहन राकेश’ द्वारा लिखित ‘आखिरी चट्टान’ नामक यात्रा वृत्तांत से अवतरित है ।।
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक ने कन्याकुमारी के पास दिखाई देनेवाले समुद्री दृश्य का बड़ा ही सुन्दर, मोहक और सजीव चित्र प्रस्तुत किया है ।।

व्याख्या-लेखक मोहन राकेश बताते हैं कि जब वे केप होटल के बाथ टैंक के बाईं तरफ समुद्र में उभरी एक चट्टान पर खड़े होकर भारत की स्थल सीमा की आखिरी चट्टान को देख रहे थे तो उनके पीछे कन्याकुमारी के मन्दिर की रोशनी की लाल और सफेद लकीरें चमक रही थी ।। वह चट्टान जिस पर स्वामी विवेकानन्द ने समाधि लगाई थी वह, अरब सागर, हिन्द सागर और बंगाल की खाड़ी की संगम स्थली बन गई थी, जो स्वामी विवेकानन्द की तरह ही समाधि में लीन प्रतीत हो रही थी ।। लेखक कहता है कि उसके चारों ओर विशाल सागर फैला हुआ था और उसकी लहरें चट्टान से टकरा रही थी ।। समुद्र के इस विस्तार को देखकर लेखक चिन्तन में लीन हो गया ।। वह अपनी पूरी चेतना से समुद्र की शक्ति के विस्तार का और उस विस्तार की शक्ति का अनुभव करता रहा ।। तीनों तरफ जहाँ भी दृष्टि जाती थी, वहाँ पानी-ही-पानी दिखाई देता था, किन्तु सामने हिन्द महासागर का क्षितिज, उनमें अधिक दूर तथा और अधिक गहरा मालूम दे रहा था ।। लगता था उस ओर धरती का तट ही नहीं है ।। समुद्र के जल और क्षितिज के सौन्दर्य को देखकर लेखक भाव-विभोर हो गया और सोचने लगा कि उसकी जन्मभूमि कितनी सुन्दर और मनमोहक है ।। उसके सौन्दर्य को देखकर लेखक अपने आप को ही भूल गया ।। आत्म-लीनता के इन क्षणों में वह अपने जीवित होने का आभास भी न कर सका ।। वह तो यह भी भूल गया कि वह बहुत दूर से आया हुआ एक यात्री है, एक दर्शक मात्र है ।।

साहित्यिक सौन्दर्य- 1 . भाषा- सरल साहित्यिक खड़ीबोली ।। 2 . शैली- वर्णनात्मक और चित्रात्मक ।। 3 . वाक्य विन्याससुगठित ।। 4 . शब्द-चयन- विषय के अनुरूप ।। 5 . प्रस्तुत अंश में विशेष रूप से लेखक की अनूठी संवेदना-शक्ति का परिचय मिलता है ।।

(ख) पीछे दायीं तरफ……………………………… . . . उड़ेलागया हो ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में लेखक ने कन्याकुमारी में सूर्यास्त के अनुपम सौन्दर्य का सजीव चित्रण किया है ।। व्याख्या- लेखक जिस स्थान पर बैठकर सूर्यास्त की छटा को देख रहा था, उसके पीछे दायीं ओर नारियल के वृक्षों के झुरमुट दिखाई दे रहे थे ।। गूंजती हुई तेज हवा चल रही थी और उस हवा से नारियल के वृक्षों की टहनियाँ ऊपर को उठ रही थीं ।। समुद्र के पश्चिमी तट के किनारे-किनारे सूखी पहाड़ियों; ऐसी पहाड़ियाँ जिस पर हरियाली न हो; की एक पंक्ति दूर तक फैली हुई थी ।। उसके आगे रेत-ही-रेत फैला हुआ था, जिससे रूखापन, भयानकता और अकेलापन प्रकट हो रहा था ।। सूर्य समुद्र के जल की सतह के पास पहुंचा गया था; अर्थात् सूर्यास्त होने ही वाला था ।। सूर्य की सुनहली किरणें रेत पर पड़ रही थीं, जिनकी आभा ने उस रेत को एक नवीन रंग दे दिया था ।। उस रंग में चमकती हुई रेत को देखकर ऐसा लगता था, मानो इसका निर्माण अभी किया गया हो और उसे समुद्र तट पर बिखेर दिया गया हो ।।

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साहित्यिक सौन्दर्य-1 . भाषा- सरल खड़ी बोली ।। 2 . शैली- वर्णनात्मक और चित्रात्मक ।। 3 . वाक्य-विन्यास- सुगठित ।। 4 . शब्द-चयन-विषय-वस्तु के अनुरूप ।। 5 . कन्याकुमारी के सूर्यास्त के मनोरम दृश्य का गतिशील सौन्दर्य चित्रित हुआ है ।।

(ग) सूर्य का गोला . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . फैल गयी थी ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग-इन पंक्तियों में लेखक ने कन्याकुमारी के समुद्र-तट पर समुद्र में डूबते सूर्य का मनोहारी चित्रण किया है ।।

व्याख्या- सन्ध्या समय सुनहरे सूर्य का बड़ा-सा गोला अन्ततः पश्चिमी समुद्र के पानी की सतह को छू गया, सूर्य का स्पर्श पाते ही सारा समुद्र-जल जैसे सोने में बदल गया, किन्तु उसका यह सुनहरा रंग बहुत देर तक स्थायी न रह सका ।। उस समय पानी की रंगत प्रतिक्षण बदल रही थी ।। उसके रंग बदलने की गति इतनी तीव्र थी कि उसके रंग को किसी भी एक पल के लिए कोई नाम देना सम्भव न था ।। कुछ ही क्षणों में सूर्य की सुनहरी आभा लालिमा में बदल गई और उसके प्रभाव से सारा समुद्र ज्वालामुखी के दहकते लाल लावे के रूप में परिवर्तित हो गया अर्थात् समुद्री जल की आभा लालिमायुक्त हो गई ।। उस लाल जल में डूबता सूर्य ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो उसे उस दहकते लावे में डूबने के लिए मजबूर किया जा रहा हो ।। क्षण-क्षण पानी में डूबता सूर्य अन्ततः पूरी तरह समुद्र में डूब गया और सम्पूर्ण आकाश लालिमा से युक्त हो गया ।। उस लालिमा के जल में प्रतिबिम्बित होने के कारण सारा समुद्री जल लाल रंग में बदल गया ।। अभी कुछ क्षण पहले तक जिस समुद्र में सोना बहता नजर आ रहा था, अब वहाँ लहू-सा बहता नजर आने लगा ।। कुछ क्षण बीतते-बीतते उस रक्तिम जल की आभा पहले बैंगनी और फिर काली पड़ गई ।। लेखक आगे कहते हैं कि उसी क्षण मैंने अपने दाईं ओर पीछे मुड़कर समुद्र-तट की ओर देखा तो मुझे नारियलों की टहनियाँ पहले की भाँति ही हवा में ऊपर उठी हुई दिखाई दी ।। उनके व्यवहार में किसी प्रकार का परिवर्तन न हुआ था ।। वृक्षों की टहनियाँ दिन में जैसे हवा के झोंकों के साथ गूंज उत्पन्न कर रही थीं, वैसे ही वे सूर्यास्त के पश्चात् भी गूंज उत्पन्न कर रही थीं ।। उस समुद्री तट के दृश्य में यदि कोई परिवर्तन हुआ था तो केवल इतना कि उस पर कालिमा की चादर छा गई थी ।। इसकी तुलना लेखक ने उस चित्र से की है, जिस पर स्याही गिरकर फैल गई हो ।।

साहित्यिक सौन्दर्य- 1 . कन्याकुमारी के सूर्यास्त का अत्यन्त स्वाभाविक आलंकारिक और हृदयकारी वर्णन हुआ है ।। 2 . भाषा- प्रवाहपूर्ण शुद्ध साहित्यिक ।। 3 . शैली-वर्णनात्मक एवं आलंकारिक ।।

(घ) कारण था, तट की . . . . . . . . . . . . . . . . . . . पैरों से मसल दिया ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- प्रस्तुत अवतरण में लेखक ने कन्याकुमारी की रेत पर फैले विभिन्न मनमोहक रंगों का वर्णन किया है ।।

व्याख्या- लेखक कहता हैं कि जब उन्हें ध्यान आया कि उन्हें रेत के टीलों से होकर वापस जाना है तो वह घबरा गया ।। उसे तुरंत निश्चय करना था कि कैसे वापस जाया जाए ।। ऐसा विचारकर वह रेत पर नीचे फिसल गया ।। पर समुद्र तट पर पहुँचकर वह अँधेरे को भूल गया ।। इसका प्रमुख कारण था समुद्र तट की रेत ।। लेखक कहता है मैंने इससे पहले भी समुद्र तट पर कई रंगों-सुरमई, खाकी, पीली और लाल रेत देखी थी, परन्तु जिस प्रकार के रंग कन्याकुमारी के समुद्र तट की रेत के थे ऐसे इससे पहले कभी नहीं देखे थे ।। उस रेत में कितने अनाम रंग थे जो एक-एक इंच पर भी एक-दूसरे से अलग थे और एक-एक अनाम रंग कई-कई रंगों की झलक लिए हुआ था ।। अर्थात् वहाँ अनेक प्रकार के आकर्षक रंग थे ।। लेखक कहता है कि यदि काली घटा और लाल आँधी का मिश्रित कर दिया जाए तो जितने रंग प्राप्त होंगे वे सभी रंग इस रेत पर उतरे हुए थे और इनके अतिरिक्त भी अनेक रंग थे जिनका वर्णन करना अकल्पनीय है ।। लेखक कहता है कि मैंने उन रंगों को छने के लिए कई-अलग-अलग रंगों की रेत को अपने हाथों में लिया और उसे वापस गिरा दिया, मैं उन रंगों को छूने का अभिलाषी था इसलिए जिन रंगों मैं नहीं छू पाया उन रंगों को मैंने अपने पैरों से कुचल दिया अर्थात् मैंने उन रंगों का आभास करने का पूरा प्रयत्न किया ।।

साहित्यिक सौन्दर्य-1 . यहाँ लेखक ने कन्याकुमारी में सूर्यास्त के समय वहाँ के समुद्र तट की रेत पर उभरे अनाम असंख्य रंगों का मनमोहक वर्णन किया है ।। 2 . भाषा- शुद्ध सरल साहित्यिक खड़ीबोली, 3 . शैली- वर्णनात्मक एवं चित्रात्मक ।।

4 . वाक्य-विन्यास-सुगठित ।। 5 . शब्द चयन-विषय के अनुरूप ।।

(ङ) मन बहुत बैचेन . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . दराज में बंद थे ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह प्रसंग-प्रस्तुत गद्यावतरण में लेखक ने अपने मन के भावों को प्रदर्शित किया है ।।

व्याख्या- लेखक कहता है कि जब रात्रि में केप होटल के लॉन में बैठकर मैं कन्याकुमारी के सागर तट की प्राकृतिक छटा का रसास्वादन कर रहा था, तो मेरा मन ऐसा व्याकुल हो रहा था- मानो कोई मिट्टी न तो भीगी हो और न पूरी तरह से सूखी हो ।। लेखक को वह स्थान इतना पसंद आया था कि, उसका मन कर रहा था कि वह अधिक समय तक इस प्राकृतिक छटा का आस्वादन करता रहे ।। परन्तु अपने भुलक्कड़पन की आदत के कारण ऐसा प्रतीत हो रहा था कि उसे तुरंत उस स्थान से प्रास्थान करना पड़ेगा क्योंकि जब उसने अपना सूटकेस खोला तो उसे पता चला कि कनानोर में सत्रह दिन व्यतीत करके उसने जो अस्सी-नब्बे पन्नों का लेखन कार्य किया था वह वही कनानोर के सेवाय होटल के मेज की दराज में छूट गया है ।। अब लेखक को यह निश्चय करना था कि वह दो में से किसे चुने कन्याकुमारी के प्राकृतिक सौन्दर्य को या कनानोर के सेवाय होटल के मेज की दराज में बंद अपने लिखे पन्नों को ।। जो शायद अभी तक वहीं पर बंद थे ।। इस प्रकार लेखक दो परस्पर विरोधी विचारों के कारण बैचेने अनुभव कर रहा था ।।

साहित्यिक सौन्दर्य-1 . यहाँ लेखक ने अपनी विवशता का वर्णन किया है ।। यहाँ लेखक की भुलक्कड़पन की आदत का भी पता चलता है ।।
2 . भाषा- शुद्ध सरल साहित्यिक खड़ीबोली ।।
3 . शैली- वर्णनात्मक ।।
4 . वाक्य-विन्यास- सुगठित ।।
5 . शब्द-चयन-विषय के अनुरूप ।।

2 . निम्नलिखित सूक्तिपरक वाक्यों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए

(क) मैं देख रहा था और अपनी पूरी चेतना से महसूस कर रहा था-शक्ति का विचार, विस्तार की शक्ति ।।

सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘गद्यगरिमा’ में संकलित ‘आखिरी चट्टान’ नामक यात्रा वृतांत से अवतरित है ।। इसके लेखक ‘मोहन राकेश’ जी हैं ।।
प्रसंग-प्रस्तुत सूक्ति में लेखक ने समुद्र के विस्तार को देखकर अपने मन में उठने वाले भावों का वर्णन किया है ।।


व्याख्या- लेखक का कहना है कि कन्याकुमारी में चट्टान पर खड़े होकर जब उसने अरब सागर, हिन्द महासागर तथा बंगाल की खाड़ी द्वारा निर्मित विशाल समुद्र को देखा, तो वह अपनी पूरी चेतना और मन से उस समुद्र की शक्ति के विस्तार अर्थात् जल को और उस विस्तार की शक्ति अर्थात् जल की शक्ति को देखता रहा तथा उसका अनुभव करता रहा क्योंकि जल में इतनी शक्ति होती है कि बड़ी से बड़ी चट्टान को भी खण्ड-खण्ड कर सकती है ।। (ख) पानी पर दूर तक सोना-ही-सोना ढुल आया ।। सन्दर्भ- पहले की तरह प्रसंग-सायंकाल में सूर्यास्त से पहले जब सूर्य समुद्र पर झुका था, तब उसकी पीली आभा से समुद्र के जल के भी पीला होने का वर्णन यहाँ किया गया है ।। व्याख्या- सायंकाल समुद्र पर झुके सूर्य की पीली किरणों की आभा के संयोग से समुद्र के पानी की आभा भी पीली हो गई ।। समुद्र का सारा जल पीला दिखाई देने लगा ।। समुद्र की इस मोहक छटा का वर्णन करता हुआ लेखक कहता है कि समुद्र को देखकर ऐसा लगता है मानो समुद्र की सतह पर पिघला हुआ सोना दूर-दूर तक फैल गया है और उसी की पीली छटा मन को मोह रही है ।।

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(ग) जिन रंगों को हाथों से नहीं छू सका, उन्हें पैरों से मसल दिया ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्ति में लेखक ने कन्याकुमारी में समुद्र के किनारे फैली विभिन्न रंगों की रेत का वर्णन किया है ।।
व्याख्या- समुद्र-तट पर रात हो चुकी थी और लेखक श्री मोहन राकेश को होटल पहुँचने की जल्दी थी ।। समुद्र के किनारे फैली रेत रात्रि की कालिमा और सूर्यास्त की लालिमा के मिश्रण से अनेकानेक रंगों की प्रतीत हो रही थी ।। ये रेत एक-एक इंच पर अलग रंग का आभास करा रही थी ।। इन अलग रंगों में भी कई-कई रंगों की झलक मिश्रित थी ।। लेखक चाहता था कि वह प्रत्येक रंग की थोड़ी-थोड़ी रेत अपने पास रख ले, जो कि सम्भव नहीं था ।। इसलिए चलते हुए ही उसने विभिन्न रंगों की रेत को हाथ से उठाकर देखा, उनको मसलकर उनके स्पर्श का सुख प्राप्त किया और फिर उन्हें गिर जाने दिया ।। जिन रंगों को वह हाथों से नहीं छु सका, उन्हें पैरों से ही मसल दिया ।। आशय यह है कि जैसे भी सम्भव हो सका उसने रेतों के स्पर्श का सुख प्राप्त किया ।।

(घ) मन बहुत बैचेन था-बिना पूरी तरह भीगे सूखती मिट्टी की तरह ।।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग-प्रस्तुत सूक्ति में लेखक के अन्तर्मन के द्वन्द्व का आलंकारिक चित्रण हुआ है ।।

व्याख्या- रात्रि में लेखक केप होटल के लॉन में बैठा हुआ कन्याकुमारी के सागर तट की प्राकृतिक छटा का रसास्वादन कर रहा होता है कि इतने में उसे कनानोर में स्वयं के द्वारा लिखे गये अस्सी-नब्बे पृष्ठों के छूट जाने का ध्यान आ जाता है ।। उनका ध्यान आते ही उसका मन ऐसे व्याकुल हो जाता है, मानो कोई मिट्टी न तो भीगी हो और न पूरी तरह सूखी हो ।। तात्पर्य यह है कि लेखक न तो वहाँ रुककर प्राकृतिक सौन्दर्य का रसास्वादन कर पा रहा था और न निश्चय ही कर पा रहा था कि अपने लिखे पृष्ठों को कनानोर से जाकर वापस ले आए ।। इस प्रकार लेखक दो परस्पर विरोधी विचारों में आबद्ध होने के कारण बैचेन हो उठा था ।। यहाँ लेखक के मन की यथार्थ स्थिति को सर्वथा नवीन उपमा द्वारा साकार किया गया है ।।

अन्य परीक्षोपयोगी प्रश्न

1 . ‘आखिरी चट्टान’ पाठ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए ।।

उत्तर – – ‘आखिरी चट्टान’ नामक यात्रा-वृत्तांत में मोहन राकेश जी ने कन्याकुमारी के असीम सौन्दर्य का वर्णन किया है ।। लेखक ने कन्याकुमारी को सुनहरे सूर्योदय और सूर्यास्त की भूमि कहा है ।। लेखक कहता हैं कि केप होटल के बाथ टैंक के बाई तरफ समुद्र के उभरी चट्टानों पर खड़ा होकर वह भारत की अन्तिम स्थल सीमा- विवेकानन्द चट्टान को देख रहा था ।। यह चट्टान अरब सागर, हिन्द महासागर तथा बंगाल की खाड़ी के संगम पर स्थित है ।। इस चट्टान पर स्वामी विवेकानन्द ने समाधि लगाई थी ।। लेखक कहता है कि चारों ओर विशाल समुद्र की लहरें हिलोरें ले रही थी ।। इस सौन्दर्य को देखकर लेखक चिन्तन में डूब गया ।। वह अपनी पूरी चेतना से उस समुद्र की शक्ति व विस्तार को और उस विस्तार की शक्ति को देखता रहा तथा उसका अनुभव करता रहा ।। तीनों तरफ जहाँ भी दृष्टि जाती थी, वहाँ पानी-ही-पानी दिखाई देता था, किन्तु हिन्द महासागर का क्षितिज, उनमें अधिक दूर तथा और अधिक गहरा मालूम पड़ रहा था ।। समुद्र के जल और क्षितिज के सौन्दर्य को देखकर लेखक भाव-विभोर हो गया और सोचने लगा कि उसकी जन्मभूमि कितनी सुन्दर और मनमोहक हैं इस सौन्दर्य को देखकर लेखक स्वयं को ही भूल गया ।।

लेखक जब अपनी चेतना में वापस आया तो उसने पाया कि जिस चट्टान पर वह खड़ा था, वह बढ़ते पानी से चारों ओर से घिर गई है ।। यह देखकर लेखक का पूरा शरीर सिहर गया ।। सूर्य धीरे-धीरे अस्त होने लगा ।। लेखक ने सोचा कि क्यों न वह भी पश्चिमी तट रेखा के टीले पर जाकर सूर्यास्त देखे ।। उस तरफ कितने ही यात्रियों की टोलियाँ वहाँ जा रही थी ।। लेखक के आगे कुछ मिशनरी युवतियाँ मोक्ष पर विचार करती जा रही थी ।। स्याह सफेद रंग के टीले लेखक को बहुत आकर्षक लगे ।। लेखक टीले पर पहुँच गया, यह वही सैण्डहिल थी जिसके सूर्यास्त के दर्शन के बारे में लेखक पहले ही सुन चुका था ।। वहाँ बहुत से लोग सूर्यास्त देख रहे थे ।। लेखक को महसूस हुआ कि सैण्डहिल से सामने का विस्तार तो दिखाई दे रहा है, परन्तु अरब सागर की तरफ जो टीला है वह उस तरफ के विस्तार को ओट में लिए हैं ।। इसलिए लेखक सैण्डहिल से आगे टीले की तरफ चल दिया ।। लेखक ने जल्दी-जल्दी कई टीलों को पार किया और अन्त में वह उस टीले पर पहुँच गया जहाँ से समुद्र का अनन्त विस्तार दिखाई दे रहा था ।।

लेखक जिस स्थान पर बैठकर सूर्यास्त की छोटा को देख रहा था, उसके पीछे दायीं ओर नारियल के वृक्षों के झुरमुट दिखाई दे रहे थे ।। हवा गूंजती हुई चल रही थी ।। समुद्र के पश्चिमी तट के किनारे-किनारे सूखी पहाड़ियों, ऐसी पहाड़ियाँ जिस पर हरियाली न हो, की एक पंक्ति दूर तक फैली हुई थी ।। सूर्य समुद्र के जल की सतह तक पहुँच गया था ।। सूर्य की सुनहरी किरणें रेत पर पड़ रही थीं, जिन्होंने उस रेत को नवीन रंग दे दिया था ।। उस रंग की चमकती रेत को देखकर ऐसा लगता था, मानो इसका निर्माण अभी किया गया हो और उसे समुद्र के तट पर बिखेर दिया हो ।। लेखक का कहना है कि सन्ध्या के समय सूर्य पश्चिम दिशा में क्षितिज पर पहुंचकर समुद्र के जल-तल को छूता हुआ प्रतीत होता है ।। इस समय सूर्य की सुनहरी किरणें जल पर ऐसी प्रतीत हुई जैसे वहाँ सोना ही सोना फैल गया हो, परन्तु सूर्यास्त के समय यह बहुत तेजी से रंग बदलता है ।। जैसे-जैसे सूर्य अस्त होता जाता है यह सुनहरी किरणें समाप्त एवं लुप्त हो जाती हैं और वहाँ केवल लालिमा शेष रह जाती है ।। इसके बाद यह लालिमा भी समाप्त होने लगती है और उसके बाद वहाँ का रंग पहले बैंगनी और बाद में काला पड़ जाता है ।। WWW.UPBOARDINFO.IN

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लेखक कहता है कि मैंने फिर से अपने दायीं तरफ मुड़कर देखा ।। नारियल की डालियाँ हवा से हिल रही थी ।। सभी तरफ अँधकार फैल गया था ।। अचानक वह अपने स्थान से उठा और कभी वह समुद्र और कभी नारियल के वृक्षों को देखने लगा ।। अचानक लेखक को ध्यान आया कि उसे वापस भी जाना है यह सोचकर उसने सैण्डहिल की तरफ देखा वहाँ उसे कुछ धुंधले रंग हिलते नजर आए ।। लेखक के मन में डर समाने लगा कि क्या अंधकार होने से पहले वह इन टीलों को पार कर पाएगा ।। परन्तु वह उन टीलों से फिसलकर नीचे समुद्र तट पर पहुँच गया, वहाँ पहुँचकर वह अंधेरे को भूल गया ।। जिसका कारण समुद्र की तट की रेत पर उभरे विभिन्न प्रकार के रंग थे ।। एक-एक रंग अलग-अलग कई-कई रंगों की छटा लिए हुए था ।। लेखक ने उन रंगों को छूने के लिए उन्हें हाथों में लिया तथा पैरों से मसलकर उन्हें छूने का आनन्द प्राप्त किया ।। समुद्र में बढ़ते पानी से लेखक को डर लगने लगा ।। लेखक उस स्थान से निकलने के लिए दौड़ने लगा ।। दौड़ते समय सामने की चट्टान से टकराने के कारण लेखक को खरोंच आ गई ।। समुद्र के पानी में जाने के बजाय लेखक चट्टान पर चढ़ गया और देखा दूसरी तरफ खुला तट था ।। रात में लेखक केप होटल के लॉन में बैठा हुआ था और कन्याकुमारी के तट के सौन्दर्य का आनन्द ले रहा था कि अचानक उसे याद आया कि कनानोर में सत्रह दिन रहकर उसने जो लेखन कार्य किया था वह वहीं होटल के मेज की दराज में रह गया था ।।

लेखक यह निश्चय नहीं कर पा रहा था कि वह वही रहकर प्राकृतिक सौन्दर्य का रसास्वादन करे या वापस कनानोर जाकर अपने लेखन कार्य के पन्ने लाए ।। तभी होटल में लड़कियों की एक बस आकर रुकी ।। वे लड़कियाँ अंग्रेजी में गीत गा रही थीं ।। लेखक का मन वहाँ की सुन्दरता तथा बसों के प्रस्थान के टाइम-टेबिल में उलझा हुआ था ।। सूर्योदय देखने के लिए लेखक अन्य सात लोगों के साथ विवेकानन्द चट्टान पर मौजूद था ।। जिनमें से तीन कन्याकुमारी के युवक व चार मल्लाह थे ।। चट्टान पर पहुँचने में लेखक को बहुत डर लगा ।। उनमें से एक नवयुवक ने लेखक को बताया कि कन्याकुमारी की आठ हजार की आबादी में से लगभग चार-पाँच सौ नवयुवक बेरोजगार है ।। सूर्य, पानी और आकाश में अलग-अलग रंग बिखेरकर उदित हो रहा था ।। घाट पर बहुत से लोग सूर्य को अर्घ्य दे रहे थे ।। वहाँ से वापस लौटते समय लेखक के साथियों ने नाव को घाट की तरफ से लाने का प्रस्ताव किया ।। यह मार्ग उससे बहुत खतरनाक था, जिनसे वे चट्टान तक पहुँचते थे ।। लेखक बहुत डर महसूस कर रहा था क्योंकि खतरनाक लहरें नाव को पलटने को तैयार थीं ।। तभी लेखक की नाव भँवर में प्रवेश कर गई जिससे लेखक की चेतना लगभग समाप्त ही हो गई ।। अन्त में लेखक घाट के पास पहुँच गया ।। कन्याकुमारी के मंदिर में पूजा की घंटियाँ बज रही थी, चारों तरफ चहल-पहल थी ।। नाव के किनारे पर पहुँचने पर लेखक को फिर से वहाँ से प्रास्थान के लिए बसों का टाइम-टेबिल याद आने लगा ।।

2 . पाठ के आधार पर सूर्यास्त के समय कन्याकुमारी के सौन्दर्य का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए ।।

उत्तर – समय कन्याकुमारी में सूर्य पश्चिम दिशा में क्षितिज पर पहुँचकर समुद्र के जल-तल को छूता हुआ प्रतीत होता है, सूर्य की किरणें जल पर बिखरी हुई ऐसी दिखाई देती हैं जैसे वहाँ सोना फैल गया हो ।। यहाँ सूर्यास्त के समय तेजी से रंग बदलते रहते हैं, जैसे-जैसे सूर्य अस्त होता है ये रंग परिवर्तित होने लगते हैं ।। जब समुद्र तल पर सुनहरी किरणें समाप्त होती है वहाँ केवल लालिमा शेष रह जाती है, धीरे-धीरे यह लालिमा भी बैंगनी और फिर काली हो जाती है ।। यहाँ सूर्यास्त के समय समुद्र तट की रेत में भी असंख्य रंग दृष्टिगोचर होते हैं, जो एक-एक इंच की दूरी पर भी अलग-अलग होते हैं ।।

3 . विवेकानन्द चट्टान कहाँ स्थित है और वह क्यों प्रसिद्ध है?

उत्तर – – विवेकानन्द चट्टान कन्याकुमारी में भारत की अन्तिम स्थल सीमा है जो अरब सागर, हिन्द महासागर तथा बंगाल की खाड़ी इन तीनों के संगम पर स्थित है ।। इस चट्टान पर स्वामी विवेकानन्द ने समाधि लगाई थी, जिस कारण यह चट्टान प्रसिद्ध है ।।

4 . लेखक ने कन्याकुमारी के सागर तट की रंगीन रेत का वर्णन किस प्रकार किया है? अपने शब्दों में लिखिए ।।

उत्तर – – लेखक कहता है कि कन्याकुमारी के समुद्र तटों पर रेत जो रंग बिखरे पड़े थे वे अद्भुत थे, इससे पहले भी उसने समुद्र तट पर सुरमई खाकी, पीली, लाल कई रंगों की रेत देखी थी, परन्तु कन्याकुमारी में समुद्र तट पर फैली रेत रात्रि की कालिमा और सूर्यास्त की लालिमा के मिश्रण से अनेकानेक रंगों की प्रतीत हो रही थी ।। ये रेत एक-एक इंच पर अलग रंग का आभास करा रही थी ।। इन अलग रंगों में भी कई-कई रंगों की झलक मिश्रित थी ।। लेखक ने उन बिखरे रंगों को छूने के लिए रेत को हाथ में उठाकर देखा, उनको मसलकर उसने सुख का अनुभव किया और फिर नीचे गिर जाने दिया ।। जिन रंगों को वह हाथों से नहीं छू सका, उन्हें पैरों से मसल दिया अर्थात् जैसे भी संभव हो सका उसने रेतों के स्पर्श का आनन्द प्राप्त किया ।।

5 . लेखक वापस कनानोर क्यों जाना चाहता था?

उत्तर – – लेखक वापस कनानोर इसलिए जाना चाहता था क्योकि लेखक ने अपने कनानोर प्रवास से सत्रह दिनों में जो अस्सी-नब्बे पेजों का लेखन कार्य किया था, वह सभी कार्य कनानोर के सेवाय होटल की एक दराज में रह गया था ।।

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