UP Board Solution for Class 8 Sanskrit Chapter 11 रामभरतयो: मेलनम्

UP Board Solution for Class 8 Sanskrit Chapter 1 aashram आश्रमः
UP Board Solution for Class 8 Sanskrit

UP Board Solution for Class 8 Sanskrit Chapter 11 रामभरतयो: मेलनम्


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रामभरतयो: मेलनम् पाठ का सम्पूर्ण हल

(ततः प्रविशति भरतः रथेन सुमन्त्रः सूतश्च)

भरतः- भोः तात!

सुमन्त्रः- कुमार! अयमस्मि ।

भरतः क्व तत्र भवान् मम आर्यः रामः ?

सुमन्त्रः- कुमार एतस्मिन् एव आश्रमे रामः सीता लक्ष्मणश्च स्थिताः ।

भरतः- भोः तात! निवेद्यतां निवेद्यताम् ।

सुमन्त्रः- कुमार ! किमिति निवेद्यते ?

भरतः- राज्यलुब्धायाः कैकेय्याः पुत्रः भरतः प्राप्तः इति ।

रामः- सर्वथा न अयम् अबान्धवस्य स्वरसंयोगः क्लेदयतीव मे हृदयम् । वत्स लक्ष्मण!

दृश्यतां तावत्!

लक्ष्मणः यदाज्ञापयति आर्य (परिक्रामति) एहि एहि इक्वाकु कुमार! स्वागतम् ।

भरत:- अनुगृहीतोस्मि ।

हिन्दी अनुवाद :-

भरत – हे तात!
सुमन्त्र – कुमार! यह हैं ।
भरत – मेरे पूजनीय आर्य राम कहाँ हैं?
सुमन्त्र – कुमार! इसी आश्रम में राम, सीता और लक्ष्मण रहते हैं ।
भरत – हे तात! सूचित किया जाए । सूचित किया जाए ।

सुमन्त्र – कुमार! क्या सूचित करना है?
भरत – राज्य लोभी कैकेयी का पुत्र भरत आया है, यह ।
राम – सब प्रकार से यह अपरिचत के स्वर का संयोग नहीं है, मेरे हृदय को आर्द्र कर रहा है । वत्स लक्ष्मण! देखो तो । ।
लक्ष्मण – जो आज्ञा आर्य । (घूमता है) आओ, आओ इक्ष्वाकु कुमार स्वागत है ।
भरत – अनुगृहीत हूँ ।

लक्ष्मणः- बाढम्। (उपेत्य) जयतु आर्यः ।

अयं ते दयितो भ्राता भरतो भ्रातृवत्सलः ।

संक्रान्तं यत्र ते रूपमादर्श इव तिष्ठति ।।

सीता आर्यपुत्र किं भरतः आगतः ?

रामः- सत्कृत्य शीघ्रं प्रवेश्यतां कुमारः । सीता स्वयं गच्छतु ।

सीता यदार्यपुत्र आज्ञापयति (उत्थाय परिक्रामति)

भरतः आयें! अभिवादये भरतोहमस्मि

सीता चिरं जीव एहि वत्स भ्रातृमनोरथं पूरय

भरतः (राममुपगम्य) आर्य! अभिवादये, भरतोहमस्मि ।

राम:- (सहर्षम्) स्वस्ति आयुष्मान् भवः सुविपुलेन भुजद्वयेन माम् अलिङ्ग

भरतः- अनुगृहीतोस्मि । प्रसीदतु आर्यः ।

हिन्दी अनुवाद :-

लक्ष्मण – बहुत अच्छा । (पास आकर) आर्य की जय हो । “यह तुम्हारा प्रिय भाई ‘भरत’ भाई से स्नेह रखने वाला है, जिसमें तुम्हारी छवि दर्पण की भाँति प्रतिबिम्बित रहती है । ”
सीता – आर्यपुत्र! क्या भरत आ गया है?
राम – सत्कृत्य कुमार को शीघ्र प्रवेश कराया जाए । सीता (उसे लेने के लिए) स्वयं जाएँ ।
सीता – जो आर्यपुत्र की आज्ञा । (जो आर्यपुत्र आज्ञा देते हैं । ) (उठकर घूमती है । )
भरत – आर्या! मैं, भरत अभिवादन करता हूँ ।
सीता – चिरकाल तक जीवित रहो । आओ वत्स, भाई का मनोरथ पूरा करो ।
भरत – (राम के पास जाकर) आर्य! मैं, भरत अभिवादन करता हूँ ।
राम – (खुशी से) कल्याण हो! आयुष्मान हो! दोनों विशाल भुजाओं से मुझे आलिंगन करो ।
भरत – अनुगृहीत हूँ । आर्य कृपा करें ।

सुमन्त्रः- अथेदानीम् अभिषेकोदकं क्व तिष्ठतु । रामः यत्र में मात्रोभिहितं तत्रैव तावत् तिष्ठतु ।

भरत:- हन्त ! अनुत्तरमभिहितम्। परं तु मम हस्ते निक्षिप्तं तव राज्यं चतुर्दश वर्षान्ते प्रतिग्रहीतुमिच्छामि।

राम: एवमस्तु ।

भरतः आर्य! अन्यमपि वरं इच्छामि रामः- वत्स! किम् इच्छसि ? किम् अहं ददामि ? भरतः पादोपभुक्ते एते तव पादुके मे प्रयच्छ । रामः तथास्तु । वत्स! गृह्यताम् ।

हिन्दी अनुवाद :-

सुमत्र – इसके पश्चात् अभिषेक का जल कहाँ रखा जाये?
राम – जहाँ मेरी माता के द्वारा कहा गया है, वहीं पर रखा जाये । ।
भरत – दुःख है । (माता के द्वारा) नहीं कहा गया । परन्तु मेरे हाथ में रखा हुआ आपका राज्य चौदह वर्ष के बाद मैं वापस देना (कि आप उसे वापस ग्रहण कर लो, ऐसा) चाहता हूँ ।
राम – राम ऐसा हो ।
भरत – आर्य! दूसरा भी वर (वरदान) चाहता हूँ ।
राम – वत्स! क्या चाहते हो? मैं क्या देता हूँ?
भरत – पैरों में पहनी हुई आपकी ये (दो) खड़ाऊँ मुझे दे दीजिए ।
राम – ऐसा हो! वत्स! गृहण करो ।

(शब्दार्थः)

मेलनम् =मिलन। निवेद्यताम् =सूचित किया जाय। राज्यलुब्धायाः =राज्य का लोभी । स्वरसंयोगः =आवाज का संयोग । क्लेदयति =आर्द्र या गीला करता है । बाढम्त्र -बहुत अच्छा। उपेत्य = आकर। दयितः= प्रिय। भ्रातृवत्सल =भाई के प्रति स्नेह रखने वाला । संक्रान्तम् =प्रतिफलित या प्रतिबिम्बित । रूपम्-=छवि / प्रतिबिम्ब । आदर्शः =दर्पण। तिष्ठति =स्थित है। अभिषेकोदकम् =अभिषेक हेतु जल। तिष्ठतु =रखा जाय ( डाला जाय ) मात्रोभिहितम् = माता के लिए । प्रतिग्रहीतुम्= स्वीकार करने हेतु । पादोपभुक्ते =पैरों में पहना हुआ। पादुके =दोनों खड़ाऊँ। प्रयच्छ= दे दीजिए।

1- उच्चारणं कुरुत पुस्तिकायां च लिखत

राज्यलुब्धायाः क्लेदयतीव इक्ष्वाकुकुमारः
अनुगृहीतोस्मि अनुत्तरमभिहितम् चतुर्दशवर्षान्ते

2- एकपदेन उत्तरत
(क) रामः सीता लक्ष्मणश्च कुतः स्थिताः आसन् ?
(ख) पितुः नियोगात् कः वनम् आगतः ?
(ग) अन्यमपि वरं कः इष्टवान् ?
(घ) पादोपभुक्तौ चरणपादुका कः अयाचत ?

उत्तर –

आश्रमे।
भरतः।
भरतः।
भरतः।

3- पूर्णवाक्येन उत्तरत

(क) भोः तात! निवेद्यतां निवेद्यतां कः उक्तावन् ?
(ख) भरतः कस्याः पुत्रः आसीत् ?
(ग) लक्ष्मणेन भरतस्य स्वागताय किम् अकथयत् ?
(घ) सीतायाः भरतं प्रति कः आशीषः आसीत् ?

उत्तर –

(क)भोः तात! निवेद्यतां निवेद्यतां भरतः उक्तावन।
(ख)भरतः कैकेय्याः पुत्रेः आसीत्।।
(ग)लक्ष्मणेन भरतस्य स्वागताय अकथयत् एहि एहि इक्ष्वाकु कुमार! स्वागतम्।
(घ) सीतायाः भरतं प्रति आशीषः आसीत्-‘चिरंजीव!”

4- संस्कृतभाषायाम् अनुवादं कुरुत

(क) दूसरा वर भी प्राप्त करना चाहता हूँ ।
(ख) राम सीता व लक्ष्मण इस आश्रम में रहते हं ।
(ग) भरत आ गये।
(घ) मैं अनुगृहीत हुआ

उत्तर – (क अन्यमपि वरं इच्छामि।
(ख) रामः सीता लक्ष्मणश्च एतास्मिन्।
(ग) भरतः आगतः।।
(घ) अहं अनुगृहीतोऽस्मि।

5- अधोलिखितवाक्येषु रेखांकितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत

(क) आश्रम एव रामः सीता लक्ष्मणश्च स्थिताः ।
(ख) एहि वत्स भ्रातृमनोरथं पूरय ।
(ग) अन्यमपि वरम् इच्छामि ।
(घ) तव पादुके प्रणताय में प्रयच्छ ।

उत्तर –

(क) रामः सीता लक्ष्मणश्च कुत्र स्थिताः?
एहि वत्स कि पूरय?
(ग) अन्यमपि किम् इच्छामि?
तव के प्रणताय में प्रयच्छ?

6- अधोलिखितपदेषु सन्धिं कृत्वा लिखत

(क) अयम्+अस्मि…………..अयमस्मि

(ख) सु + आगतम्……………… स्वागतम्

(ग) अथ+ इदानीम् ……………….अ थे दानीम्

(घ) अभिषेक + उदकम् ………………..अभिषेकोदकम्

7- अधोलिखितानि पदानि प्रयुज्य वाक्यरचनां कुरुत

यथा- भरतः भरतः भ्रातृवत्सलः आसीत् ।

(क) अनुगृहीत – भरतः- अनुगृहीतोस्मि

(ख) स्वागतम् – एहि एहि इक्वाकु कुमार! स्वागतम् ।

(ग) वरम्- अन्यमपि वरं इच्छामि |

(घ) अन्यमपि – अन्यमपि वरं इच्छामि ।

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