UP BOARD SOLUTION FOR CLASS 9 HINDI CHAPTER 7 DAN KAVY KHAND (SOORY KANT TRIPATHI “NIRALA”)

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UP BOARD SOLUTION FOR CLASS 9 HINDI CHAPTER 7 DAN KAVY KHAND (SOORY KANT TRIPATHI “NIRALA”) पाठ —-7 दान (सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’)

पाठ ----7 दान (सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला')


(क) अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
1– निराला जी किस छंद के प्रवर्तक माने जाते हैं ?
उत्तर — – निराला जी मुक्त छंद के प्रवर्तक माने जाते हैं ।
2– निराला जीद्वारा संपादित किसी एक पत्रिका का नाम लिखिए ।
उत्तर — – निराला जी ने 1922 से 1923 के दौरान कोलकाता से प्रकाशित ‘समन्वय’ का संपादन किया ।
3– निराला जी का जन्म कब और कहाँ हुआ ?
उत्तर — – निराला जी का जन्म सन् 1897 में बंगाल के मेदिनीपुर जिले में हुआ था ।
4– निराला जी साहित्य के अतिरिक्त और क्या शौक रखते थे ? ।
उत्तर — – निराला जी को बचपन से ही कुश्ती, घुड़सवारी तथा कृषि कार्य का शौक था ।


5– अपनी पुत्री की याद में निराला जी ने कौन-सी रचना लिखी ?
उत्तर — – निराला जी ने अपनी पुत्री की याद में ‘सरोज स्मृति’ नामक रचना लिखी ।
6– ‘अनामिका’ और ‘गीतिका’ किस कवि की रचनाएँ हैं ? ।
उत्तर — – ‘अनामिका’ और ‘गीतिका’ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी की रचनाएँ हैं ।
7– निराला जी की पहली नियक्ति कहाँहई और इन्होंने यह नौकरी कितने समय से कितने समय तक की ?
उत्तर — – निराला जी की पहली नियुक्ति महिषादल में हुई । उन्होंने नौकरी सन् 1918 से सन् 1922 तक की ।
8– निराला जी की काव्यकला की सबसे बड़ी विशेषता क्या थी ?
उत्तर — – निराला जी की काव्यकला की सबसे बड़ी विशेषता चित्रण कौशल थी ।
9– निराला जी ने अपने काव्य में किस भाषा और शैली का प्रयोग किया ?
उत्तर — – निराला ने अपने काव्य में शुद्ध परिमार्जित खड़ीबोली तथा कठिन एवं दुरुह, सरल व सुबोध शैली का प्रयोग किया ।

(ख) लघु उत्तरीय प्रश्न


1– निराला जी ने प्रकृति को सदया क्यों कहा है ?
उत्तर — – निराला जी ने प्रकृति को सदया इसलिए कहा है क्योंकि प्रकृति दया भाव से सभी मनुष्यों को उनके कर्मों का फल प्रदान करती है ।
2– मनुष्य को प्रकृति से क्या प्राप्त हुआ है ?
उत्तर — – मनुष्य को प्रकृति से सौंदर्य, गीतात्मकता, विविध रंग, गंध, भाषा, भाव-रचना, छंदों के बंध आदि वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं ।
3– ‘दान’ कविता में वर्णित प्रातःकाल की सुंदरता का वर्णन अपने शब्दों में लिखिए ।
उत्तर — – प्रात:काल में सूर्य की किरणों के साथ प्रकृति के श्रृंगार को देखने के लिए कमल उपवन में खिलते हैं । हवा प्रात: काल में ऐसी लगती है; जैसे सुगंधित वस्त्र पहने बह रही हो । जब यह हवा कानों के पास से बहती है तो ऐसा प्रतीत होता है; जैसे चुपचाप हृदय की बात कानों में कह रही हो । अतः प्रात:काल का दृश्य सुहावना व आनंददायक है ।


4– मनुष्य के बारे में कवि पहले क्या सोचते थे ?
उत्तर — – मनुष्य के बारे में कवि पहले सोचते थे कि मनुष्य इस जड़ चेतन संसार में सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि मानव अपने प्रयत्नों से प्रकृति की दी हुई या मनुष्य द्वारा निर्मित सुंदर चीजों को प्राप्त कर सकता है ।

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5– मनुष्य के बारे में कवि की धारणा क्यों परिवर्तित हुई ?
उत्तर — – कविता के अनुसार, पहले कवि मनुष्य के अंदर दयाभाव को देखकर यह सोचा करता था कि वास्तव में मनुष्य सभी प्राणियों में श्रेष्ठ है । परंतु एक दिन एक दृश्य को देखकर उसकी धारणा परिवर्तित हो गई । उसने देखा कि उसके पड़ोस में रहने वाले एक सज्जन नित्य गोमती नदी के तट पर स्नान करने के लिए आते थे और बंदरों को कुछ-न-कुछ खिलाते रहते थे । परंतु इन्हीं सज्जन ने एक दिन बंदरों को तो मालपुए खिलाए लेकिन एक दीन-हीन भिखारी के माँगने पर उसे दानव कहकर झिड़क दिया । उस दिन से ही कवि की मनुष्य के प्रति धारणा में यह परिवर्तन हुआ कि यदि मनुष्य, एक मनुष्य के प्रति दयाभाव नहीं दिखला सकता तो वह श्रेष्ठ कहलाने के योग्य भी नहीं हो सकता ।

6– पुल से नीचे देखने पर कवि के मन में क्या विचार उत्पन्न हुए ?
उत्तर — – पुल से नीचे देखने पर कवि को एक विप्रवर को देखकर उनके मन में विचार उत्पन्न हुए कि ये विप्रवर बहुत धार्मिक व दयालु हैं, जो बंदरों को रोज कुछ-न-कुछ खिलाते हैं, वे दीन-हीन भिखारी पर भी दया भाव दिखाते हुए उसकी सहायता करते हुए उसे भी कुछ-न-कुछ देंगे ।

(ग) विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

1– ‘दान’शीर्षक का मूल भाव अपने शब्दों में लिखिए ।
उत्तर — – ‘दान’ कविता में कवि ने पहले मनुष्य को ईश्वर की श्रेष्ठ कृति बताया है, जो अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति प्रकृति से करता है । प्रकृति भी मनुष्य को उनके कर्मों के अनुसार फल देती है । इसलिए कवि ने प्रकृति को सदया कहा है । प्रकृति ने मनुष्य को बहुत-सी सुंदर चीजें दी हैं, जो उसका मन हर लेती हैं । प्रकृति द्वारा दी गई चीजें और मनुष्य द्वारा निर्मित अधिक सुंदर चीजें उसके प्रयत्नों द्वारा या अनायास ही उसके पास चली आती हैं । इसलिए कवि ने मानव को विश्व में श्रेष्ठ बताया है । परंतु एक दृश्य को देखकर कवि की धारणा परिवर्तित हो जाती है, जब एक दिन एक विप्रवर गोमती नदी के तट पर स्नान करने व शिव जी की उपासना करके ऊपर आते हैं तब वह गोमती के पुल पर बैठे बंदरों को तो मालपुए खिलाते हैं परंतु उसी मार्ग पर बैठे दीन-हीन भिखारी को मालपुए माँगने पर दानव कहकर झिड़क देते हैं । पृथ्वी पर मनुष्य को ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना समझने वाले कवि को मानव की ऐसी निंदनीय उपेक्षा देखकर दुःख होता है । अचानक उनके मुँह से व्यंग्य निकलता है”श्रेष्ठ मानव! तुम धन्य हो । ‘ अर्थात् मानव पर दया न दिखाने से न तो तुम श्रेष्ठ हो और न ही धन्य हो ।

2– निराला जी का हिंदी साहित्य में स्थान निर्धारित कीजिए ।
उत्तर — – निराला जी का हिंदी साहित्य में विशिष्ट स्थान है । निराला जी छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक थे । वे हिंदी में मुक्त छंद के प्रवर्तक थे । उन्होंने संपादन, स्वतंत्र लेखन और अनुवाद आदि किए । 1922 से 1923 के दौरान कोलकाता से प्रकाशित ‘समन्वय’ का संपादन किया, 1923 में अगस्त से ‘मतवाला’ के संपादक मंडल में कार्य किया । इसके बाद लखनऊ में गंगा पुस्तक माला कार्यालय में उनकी नियुक्ति हुई, जहाँ वे संस्था की मासिक पत्रिका ‘सुधा’ से 1935 के मध्य तक संबद्ध रहे । 1935 से 1940 तक का कुछ समय उन्होंने लखनऊ में भी बिताया । इसके बाद 1942 से मृत्यु-पर्यंत इलाहाबाद में रहकर स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य किया ।

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उनकी पहली कविता ‘जन्मभूमि प्रभा’ नामक मासिक पत्र में 11034जून 1920 में, पहला कविता संग्रह 1923 में ‘अनामिका’ नाम से तथा पहला निबंध ‘बंग भाषा का उच्चारण’ अक्टूबर 1920 में मासिक पत्रिका ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुआ । वे जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा के साथ हिंदी साहित्य में छायावाद के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं । उन्होंने कहानियाँ, उपन्यास और निबंध भी लिखे हैं किंतु उनकी ख्याति विशेषरूप से कविता के कारण ही है । निराला की काव्यकला की सबसे बड़ी विशेषता है- चित्रण-कौशल । आंतरिक भाव हो या बाह्य जगत के दृश्य-रूप, संगीतात्मक ध्वनियाँ हों या रंग और गंध, सजीव चरित्र हों या प्राकृतिक दृश्य, सभी अलग-अलग लगने वाले तत्वों को घुला-मिलाकर निराला ऐसा जीवंत चित्र उपस्थित करते हैं कि पढ़ने वाला उन चित्रों के माध्यम से ही निराला के मर्म तक पहुँच सकता है । निराला के चित्रों में उनका भावबोध ही नहीं, उनका चिंतन भी समाहित रहता है । इसलिए उनकी बहुतसी कविताओं में दार्शनिक गहराई उत्पन्न हो जाती है । । निराला जी की रचनाओं में आग है, पौरुष है और सड़ी-गली परंपराओं के विरुद्ध विद्रोह भी है । कुल मिलाकर निराला जी क्रांतिकारी कवि हैं । शायद ही हिंदी के किसी अन्य कवि को इतने वैषम्यों और विरोधों का सामना करना पड़ा हो । प्रलयंकर शिव के समान स्वयं कटु गरल का पान करके इन्होंने हिंदी काव्य जगत को पीयूष वितरित किया । अपने विलक्षण व्यक्तित्व एवं निराले कवित्व के कारण निराला जी हिंदी काव्य जगत के सम्राट माने जाते हैं ।

3– महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के जीवन परिचय एवं काव्य-कृतियों पर प्रकाश डालिए ।
उत्तर — – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हिंदी कविता के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं । अपने समकालीन अन्य कवियों से अलग उन्होंने कविता में कल्पना का सहारा बहुत कम लिया है और यथार्थ को प्रमुखता से चित्रित किया है । वे हिंदी में मुक्तछंद के प्रवर्तक भी माने जाते हैं । 1930 में प्रकाशित अपने काव्य संग्रह ‘परिमल’ की भूमिका में वे लिखते हैं-”मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है । मनुष्यों को मुक्ति कर्म के बंधन से छुटकारा पाना है और कविता की मुक्ति छंदों के शासन से अलग हो जाना है । जिस तरह मुक्त मनुष्य कभी किसी तरह दूसरों के प्रतिकूल आचरण नहीं करता, उसके तमाम कार्य औरों को प्रसन्न करने के लिए होते हैं फिर भी स्वतंत्र । इसी तरह कविता का भी हाल है । ” जीवन परिचय- छायावाद के आधार-स्तंभ महाकवि निराला जी का जन्म बंगाल के मेदिनीपुर जिले में सन् 1897 ई० में हुआ । उनके पिता पं–रामसहाय त्रिपाठी उन्नाव (बैसवाड़ा) के रहने वाले थे और महिषादल में सिपाही की नौकरी करते थे । निराला की शिक्षा हाईस्कूल तक हुई । बाद में हिंदी, संस्कृत और बांग्ला का स्वतंत्र अध्ययन किया । पिता की छोटी-सी नौकरी की असुविधाओं और मान-अपमान का परिचय निराला को आरंभ में ही प्राप्त हुआ ।

उन्होंने दलित-शोषित किसान के साथ हमदर्दी का संस्कार अपने अबोध मन से ही अर्जित किया । इनकी तीन वर्ष की अवस्था में माता का और बीस वर्ष की अवस्था में पिता का देहांत हो गया । बाल्यावस्था में इन्हें कुश्ती, घुड़सवारी तथा कृषि कार्य में भी विशेष रुचि थी । हिंदी, संस्कृत भाषाओं के साथ-साथ इन्हें बंगला भाषा का अच्छा ज्ञान था । साहित्य क्षेत्र में रुचि रखने वाली युवती मनोहरा देवी से इनका विवाह हुआ लेकिन ये अधिक समय तक इनका साथ न दे पाई । एक पुत्र और पुत्री का दायित्व निराला जी को सौंपकर वह पंचतत्वों में विलीन हो गई । इसके बाद का उनका सारा जीवन आर्थिक-संघर्ष में बीता । निराला के जीवन की सबसे विशेष बात यह है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने सिद्धांत त्यागकर समझौते का रास्ता नहीं अपनाया, संघर्ष का साहस नहीं गँवाया । 15 अक्टूबर सन् 1961 को सरस्वती का यह साधक पंचतत्वों में विलीन हो गया ।

कृतियाँ—- (अ) काव्य संग्रह– जूही की कली, अनामिका, परिमल, गीतिका, अनामिका के दूसरे भाग में सरोज-स्मृति और राम की शक्ति पूजा, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नए पत्ते, अर्चना, आराधना, गीता कुंज, सांध्यकाकली, अपरा । पुत्री सरोज के देहांत के बाद इन्होंने सरोज-स्मृति नामक कविता लिखी दुःख ही जीवन की कथा रही, क्या कहें आज जो नहीं कही । कन्ये, गत कर्मों का अर्पण कर सकता मैं तेरा तर्पण॥
(ब) उपन्यास– अप्सरा, अलका, प्रभावती, निरूपमा, कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा
(स) कहानी संग्रह– लिली, चतुरी चमार, सुकुल की बीवी, सखी, देवी
(द) निबंध– रवींद्र कविता कानन, प्रबंध पद्म, प्रबंध प्रतिमा, चाबुक, चयन, संग्रह
(य) पुराण कथा– महाभारत
(र) अनुवाद– आनंद मठ, विष वृक्ष, कृष्णकांत का वसीयतनामा, कपालकुंडला, दुर्गेश नंदिनी, राज सिंह, राजरानी,
देवी चौधरानी, युगलांगुल्य, चंद्रशेखर, रजनी, श्री रामकृष्ण वचनामृत, भरत में विवेकानंद तथा राजयोग का बांग्ला
से हिंदी में अनुवाद ।

4– छायावादी गीतों में प्रयुक्त सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की भाषा-शैली की विशेषताएँ संक्षेप में बताइए ।
उत्तर — – भाषा-शैली- निराला जी ने अपनी रचनाओं में शुद्ध परिमार्जित खड़ीबोली का प्रयोग किया । निराला जी की भाषा संस्कृतनिष्ठ है, कहीं भी नीरसता नहीं है । इनकी कृतियों में छायावाद व रहस्यवाद के साथ ही प्रगतिवादी भावनाएँ भी परिलक्षित होती हैं । निराला जी की कविताएँ संगीतात्मकता से युक्त हैं तथा उनमें कहीं-कहीं पर मुहावरों का प्रयोग भी दिखाई देता है । निराला जी ने संदेह, अनुप्रास व सांगरूपक अलंकार तथा मुक्त छंद को अपनाया है । शृंगार, वीर, रौद्र
आदि रस भी उनकी कविताओं में विद्यमान हैं । निराला जी ने कठिन एवं दुरुह, सरल व सुबोध शैली का प्रयोग किया है ।

(ङ) पद्यांशों की व्याख्या एवं पंक्ति भाव–


1– निम्नलिखित पद्यांशों की ससंदर्भ व्याख्या कीजिए और इनका काव्य सौंदर्य भी स्पष्ट कीजिए ।

(अ) निकला पहला अरविन्द————————————————————————–आवेश चपल ।
संदर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘हिंदी’ के ‘काव्यखंड’ में संकलित ‘सूर्यकांत त्रिपाठी निराला’ द्वारा रचित ‘अपरा’ काव्य-संग्रह से ‘दान’ शीर्षक से उद्धृत है ।
प्रसंग- इन पंक्तियों में कवि ने प्रातःकालीन प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किया है । पौष मास के प्रातःकाल की यह सुंदरता उसे प्रकृति का रहस्यमय शृंगार लगती है ।


व्याख्या- कविवर निराला जी का कहना है कि प्रकृति के रहस्यमय सुंदर शृंगार को देखने के लिए पौ फटते ही पहला कमल खिल गया अथवा प्रकृति के रहस्यों को निर्दोष भाव से देखने के लिए आज ज्ञान का प्रतीक सूर्य निकल आया है । सुगंधरूपी वस्त्र धारण कर वायु मंद-मंद बह रही है । वह जब कानों के निकट से गुजरती है तो ऐसा मालूम पड़ता है कि वह प्राणों को पुलकित करने वाली गतिशीलता का संदेश दे रही हो । गोमती नदी में कहीं-कहीं पानी कम होने से वह एक पतली कमर वाली नवेली नायिका-सी जान पड़ती है । उसमें उठती-गिरती लहरों के कारण वह धारा मधुर उमंग से भरकर नृत्य करती हुई -सी जान पड़ती है ।
काव्यगत सौंदर्य- 1– इन पंक्तियों में कवि ने प्रकृति के सौंदर्य का चित्रण करते हुए उसमें रहस्यात्मक अनुभूति का निरूपण किया है । 2– सूर्य की पहली किरण से प्रातःकालीन प्रथम कमल के खिलने की कल्पना इस प्रकृति सौंदर्य को कोमल सुंदरता के भाव से प्लवित करती है । 3– गोमती नदी को नवयौवना नर्तकी कहकर नदी का मानवीकरण किया गया है । 4– भाषा- परिष्कृत खड़ीबोली 5– रस- शांत और शृंगार 6– गुण- माधुर्य 7– अलंकार- मानवीकरण, रूपक तथा
अनुप्रास ।

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(ब) मैं प्रातः पर्यटनार्थ————————————-श्रेष्ठ धन्य मानव ।
संदर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में प्रातः भ्रमण के लिए निकले हुए निराला जी ने प्रकृति के विविध साधनों को देखा और उनमें मनुष्य को ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति बताया है ।
व्याख्या- कवि निराला जी कहते हैं कि मैं एक दिन सवेरे गोमती नदी के तट पर घूमने के लिए गया और लौटकर पुल के समीप आकर खड़ा हो गया । वहाँ मैं विचार करने लगा कि इस संसार के सभी नियम अटल हैं । जो जैसा करता है, उसको वैसा ही फल मिलता है । प्रकृति दया भाव से सभी मनुष्यों को उनके कर्मों का फल प्रदान करती है अर्थात् मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार ही फल पाते हैं । इस प्रकार उनके सोचने के लिए कुछ भी नवीन नहीं होता । निराला जी पुनः विचार करते हैं कि इस संसार में एक से बढ़कर एक सुंदर चीजें हैं जिनमें सुंदरता है, गीत हैं, अनेक रंग और सुगंधियाँ हैं, भाषा हैं, भाव है और सुंदर छंद भी हैं । ये सब हमारा मन मोह लेते हैं । प्रकृति की दी हुई या मनुष्य द्वारा निर्मित और भी अधिक सुंदर चीजें और क्रियाकलाप हो सकते हैं, जो हमें सुंदर लगते हैं और जो मनुष्य के पास प्रयत्न करने पर या अनायास ही चले आते हैं । इसलिए इस जड़ चेतन संसार में मनुष्य सबमें श्रेष्ठ है, इसलिए वह धन्य है । तात्पर्य यह है कि विश्व में मनुष्य ही ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है ।
काव्यगत सौंदर्य- 1–प्रस्तुत पंक्तियाँ निराला जी के दार्शनिक चिंतन की परिचायक है । 2–अपने उपयोग की सभी वस्तुएँ मानव प्रकृति से ही प्राप्त करता है । इसलिए प्रकृति को दयालु कहा गया है । 3– भाषा- शुद्ध संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली
4–रस- शांत 5– गुण- प्रसाद 6– अलंकार- अनुप्रास ।

(स) फिर देखा, उस पुल के———————————————————– एक, उपायकरण!
संदर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी ने दान करने का ढोंग करने वाले व्यक्तियों से संबंधित एक घटना का वर्णन करते हुए मानव की मानव के प्रति संवेदनहीनता का वर्णन किया है ।
व्याख्या- निराला जी ने देखा कि गोमती के पुल पर बहुत बड़ी संख्या में बंदर इकट्ठे होकर बैठे हुए हैं तथा सड़क के एक ओर दुबला-पतला काले रंग का एक भिखारी बैठा हुआ था । वह हड्डियों का ढाँचा मात्र दिखाई दे रहा था और ऐसा लग रहा था कि जैसे उसकी मृत्यु निकट आ गई हो अथवा जैसे गरीबी स्वयं दुर्बल शरीर धारण कर वहाँ बैठी हो । वह भिक्षा पाने के लिए अपलक नेत्रों से ऊपर की ओर देख रहा था । उसका कंठ भूख के कारण बहुत कमजोर पड़ गया था
और उसकी श्वास भी तीव्र गति से चल रही थी । ऐसा लग रहा था मानो वह जीवन से बिल्कुल उदास होकर शेष घड़ियाँ व्यतीत कर रहा हो । न जाने जीवन के इस रूप में वह कौन-सा शाप ढो रहा था और किन पापों का फल भोग रहा था ? मार्ग से गुजरने वाले सभी लोग यही सोचते थे, किंतु कोई भी इसका उत्तर नहीं दे पाता था । कोई अधिक दया दिखाता तो एक पैसा उसकी ओर फेंक देता जैसे कि उस एक पैसे की दया से उसकी दरिद्रता दूर हो जाएगी । UP BOARD SOLUTION FOR CLASS 9 HINDI CHAPTER 5 PUNARMILAN KAVY KHAND (JAYSHANKAR PRASAD)

काव्यगत सौंदर्य- 1– कवि ने ईश्वर की श्रेष्ठ रचना, मानव की दुर्दशा तथा उसके प्रति लोगों की उपेक्षा का मार्मिक चित्रण किया है । 2– उपर्युक्त भावना सभ्य समाज में व्याप्त संवेदनहीनता का उदाहरण है । 3– भाषा- शुद्ध संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली
4– रस- शांत तथा करुण 5–गुण- प्रसाद 6– अलंकार- अनुप्रास तथा उत्प्रेक्षा ।

(द) मैंने झुकनीचे को देखा———————— ———————————-धन्य,श्रेष्ठ मानव!
संदर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग-प्रस्तुत पंक्तियों में सूर्यकांत त्रिपाठी”निराला’ ने ढोंग करने वाले कट्टरपंथी धार्मिक लोगों की प्रवृत्ति पर तीखा व्यंग्य किया है ।
व्याख्या- कवि कहता है कि मैंने झुककर पुल के नीचे देखा तो मेरे मन में कुछ आशा जगी । वहाँ एक ब्राह्मण स्नान करके शिवजी पर जल चढ़ाकर और दूब, चावल, तिल आदि भेंट करके अपनी झोली लिए हुए ऊपर आया । उनको देखकर बंदर शीघ्रता से दौड़े । ये ब्राह्मण भगवान् राम के भक्त थे । उन्हें भक्ति करने से कुछ मनोकामना पूरी होने की आशा थी । वह बारह महीने भगवान् शिव की आराधना किया करते थे । वे ब्राह्मण महाशय प्रतिदिन प्रातःकाल रामायण का पाठ करने के बाद ‘श्रीमन्नारायण’ मंत्र का जाप करते थे । कभी दुःखी होते या असहाय दशा का अनुभव करते, तब हाथ जोड़कर बंदरों से कहते कि वे इनका दुःख दूर कर दें ।

कवि इस ब्राह्मण का परिचय देते हुए कहता है कि ये सज्जन मेरे पड़ोस में रहते थे और प्रतिदिन गोमती नदी में स्नान करते थे । इन्होंने पुल के ऊपर पहुँचकर अपनी झोली से पुए निकाल लिए और हाथ बढ़ाते हुए बंदरों के हाथ में पुए रख दिए । कवि को यह देखकर दुःख हुआ कि उन्होंने बंदरों को तो बड़े चाव से पुए खिलाए, परंतु उधर घूमकर भी नहीं देखा, जिधर वह भिखारी कातर दृष्टि से देखता हुआ बैठा था । जब उस भिखारी ने अपनी क्षीण आवाज में उनसे पुआ माँगा तो उन्होंने उसे ‘दानव! दूर ही रहो’ कहकर झिड़क दिया । पृथ्वी पर मनुष्य को ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना समझने वाले निराला जी को मानव की ऐसी निंदनीय उपेक्षा देखकर अत्यधिक दुःख हुआ और अत्यधिक विषादमय स्वर में वे बोल उठे- ‘तू धन्य है श्रेष्ठ मानव । ‘ तात्पर्य यह है कि मनुष्य होकर मनुष्य पर दया न दिखाने वाले मनुष्य! न तो तुम श्रेष्ठ हो और न ही धन्य हो ।
काव्यगत सौंदर्य- 1– कवि ने अंधविश्वासी मानवों के धार्मिक ढोंग पर तीव्र व्यंग्य किया है । 2– कवि के हृदय की करुणा एवं मानव प्रेम की अभिव्यक्ति इन पंक्तियों में रस की धारा बनकर बहती है । 3– भाषा- साहित्यिक खड़ीबोली 4– रस- शांत व करुण 5–गुण- प्रसाद 6–अलंकार- उत्प्रेक्षा, अनुप्रास तथा वक्रोक्ति ।

2– निम्नलिखित पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए
(अ) कर रामायण का पारायण जपते हैं श्रीमन्नारायण ।
भाव स्पष्टीकरण- कवि का तात्पर्य है कि जो सज्जन विप्रवर प्रतिदिन प्रात:काल रामायण का पाठ करने के बाद ‘श्रीमन्नारायण’ मंत्र का जाप करते रहते हैं और प्रत्यक्ष में धार्मिक व दयालु प्रतीत होते हैं, परंतु जो ऐसा अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए ही करते हैं, उनके मन में किसी के प्रति दयाभाव नहीं होता है । यह केवल एक ढोंग है ।UP BOARD SOLUTION FOR CLASS 9 HINDI CHAPTER 5 PUNARMILAN KAVY KHAND (JAYSHANKAR PRASAD)

(ब) चिल्लाया किया दूर दानव,
बोला मैं-“धन्य श्रेष्ठ मानव!” भाव स्पष्टीकरण- यहाँ कवि ने ईश्वर की श्रेष्ठ कृति मानव की संवेदनहीनता को स्पष्ट किया है । एक विप्रवर बंदरों को तो प्रेमपूर्वक मालपुए खिलाते हैं परंतु एक दीन-हीन भिखारी के माँगने पर उसे ‘दानव’ कहकर झिड़क देते हैं । कवि को ईश्वर की श्रेष्ठ कृति मानव का मानव के प्रति निंदनीय व्यवहार देखकर दुःख होता है । वह मानव होकर मानव पर दया न दिखाने वाले मनुष्य को व्यंग्यपूर्वक श्रेष्ठ मानव कहते हैं ।

(ङ) वस्तुनिष्ठ प्रश्न—

1– निराला जी का जन्म सन् है
(अ) सन् 1887 ई– (ब) सन् 1897 ई० (स) सन् 1875 ई– (द) सन् 1891 ई०
2– निम्नलिखित में से कौन-सी कृति निराला जी की है ?
(अ) प्रिय प्रवास (ब) अपरा (स) बीजक (द) कवितावली

3– निम्नलिखित में से कौन-सी कृति निरालाजी की नहीं है ?
(अ) कुकुरमुत्ता (ब) कामायनी (स) नए पत्ते (द) अपरा
4 ‘अणिमा’ के रचयिता कौन हैं ?
(अ) प्रसाद (ब) पंत (स) निराला (द) महादेवी वर्मा
5– आपनी पुत्री सरोज की स्मृति में निराला जी की करुण वेदना किस कृति में मुखरित हुई है ?
(अ) तोड़ती पत्थर (ब) अनामिका (स) सरोज-स्मृति (द) जूही की कली

(च) काव्य सौंदर्य एवं व्याकरण बोध

1– निम्नलिखित शब्दों में समास-विग्रह कीजिए
समस्त पद……………………..समास-विग्रह
राम-भक्त……………………..राम का भक्त
दूर्वादल……………………..दूर्वा का दल
सरिता-मज्जन……………………..सरिता में मज्जन
कृष्णकाय……………………..कृष्ण शरीर
छंद-बंध……………………..छंद का बंध
अनिन्द्य……………………..निंदा से रहित,
प्रशंसनीय,…………………….. अति सुंदर

2– निम्नलिखित शब्दों में संधि-विच्छेद कीजिएसंधि
शब्द……………………..संधि विच्छेद
अनायास……………………..अन + अयास
निश्चल……………………..निः + चल
पर्यटनार्थ……………………..पर्यटन + अर्थ
उपायकरण……………………..उपाय+करण
सज्जन……………………..सत् + जन
श्रीमन्नारायण……………………..श्रीमत् + नारायण

3– विलोम शब्द लिखिए
शब्द……………………..विलोम
अनायास……………………..सायास
मौन……………………..वाचाल
आशा……………………..निराशा
पाप……………………..पुण्य
निश्चल……………………..चलायमान
स्थूल……………………..क्षीण
सदा……………………..कदा
.मंद …………………….तीव्र

4– निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार का नाम बताइए
(अ) गोमती क्षीण-कटि नरी नवल
उत्तर — – प्रस्तुत पंक्ति में रूपक अलंकार है ।
(ब) जीता ज्यों जीवन से उदास ।
उत्तर — – प्रस्तुत पंक्ति में अनुप्रास और उत्प्रेक्षा अलंकार है ।
(स) कर रामायण का पारायण, जपते हैं श्रीमन्नारायण ।
उत्तर — – प्रस्तुत पंक्ति में अनुप्रास अलंकार है ।
(द) सौरभ वसना समीर बहती ।
उत्तर — – प्रस्तुत पंक्ति में मानवीकरण और रूपक अलंकार है ।

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