UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 2 आकाशदीप (जयशंकर प्रसाद)

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 2 आकाशदीप (जयशंकर प्रसाद)

आकाशदीप (जयशंकर प्रसाद)

लेखक पर आधारित प्रश्न


1 — जयशंकर प्रसाद का जीवन-परिचय देते हुए इनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए ।।


उत्तर — लेखक परिचय- छायावाद के आधार स्तम्भ जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी, सन् 1889 ई० को काशी के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था ।। इनके पिता का नाम देवीप्रसाद तथा पितामह का नाम शिवरत्न साहू था ।। अल्प-आयु में ही ये माता-पिता की छत्र-छाया से वंचित हो गए ।। बड़े भाई शम्भूरत्न ने इनकी शिक्षा के लिए व्यवस्था की थी ।। पिता की मृत्यु के कुछ समय बाद इनके बड़े भाई शम्भूरत्न का भी देहान्त हो गया ।। परिवार का दायित्व अब इन्हीं के कन्धों पर आ गया ।। इनके पिता तम्बाकू के व्यापारी थे, उस व्यापार का दायित्व भी अब इन पर ही आ गया ।। प्रारम्भ में इनका प्रवेश क्वीन्स कॉलिज में हुआ लेकिन वहाँ इनका मन नहीं लगा ।। अतः इन्होंने घर पर ही अंग्रेजी, संस्कृत व हिन्दी का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया ।।

इन्होंने वेदों, इतिहास, दर्शनशास्त्र व उपनिषदों का अध्ययन किया ।। संस्कृत साहित्य में इनकी विशेष रुचि थी ।। पैतृक व्यवसाय के साथ ही ये “साहित्य-सृजन’ भी करते रहे ।। इनके द्वारा रचित ‘कामायनी’ महाकाव्य पर हिन्दी-साहित्य सम्मेलन द्वारा इन्हें ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक’ प्रदान किया गया ।। साहित्यरूपी मन्दिर में अपनी वाणी रूप पुष्प अर्पित करते हुए ‘प्रसाद’ जी जीवन के अन्तिम समय में क्षय-रोग से पीड़ित हो गए ।। 15 नवम्बर, सन् 1937 ई० में यह महान् विभूति पंच तत्त्वों में विलीन हो गई ।। कृतियाँ- ‘प्रसाद’ जी ने साहित्य की विविध विधाओं (कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास व निबन्ध) में अपनी लेखनी चलाई ।। इनकी मुख्य रचनाएँ इस प्रकार हैंकहानी- आकाशदीप, ममता, आँधी, प्रतिध्वनि, इन्द्रजाल, मछुआ, ग्राम, पुरस्कार आदि ।। उपन्यास-प्रसाद जी के प्रमुख उपन्यास तितली, कंकाल और इरावती (अपूर्ण) हैं ।। नाटक-स्कन्दगुप्त, चन्द्रगुप्त, जनमेजय का नागयज्ञ, कामना, एक घुट, ध्रुवस्वामिनी, विशाख, कल्याणी, अजातशत्रु, राज्यश्री प्रसाद जी के प्रमुख नाटक हैं ।।
काव्य-कृतियाँ- कामायनी (महाकाव्य), आँसू, लहर, झरना, चित्राधार, कानन-कुसुम आदि प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं ।।

2 — जयशंकर प्रसाद के कथा-शिल्प एवं शैली पर प्रकाश डालिए ।।


उत्तर — कथा-शिल्प एवं शैली- प्रसाद जी की कहानियों का मनोवैज्ञानिक एवं भावात्मक चित्रण अत्यन्त उच्चकोटि का बन पड़ा है ।। इनकी कहानी-रचना का धरातल साहित्यिक एवं कलात्मक है ।। इनकी कहानियाँ मानवता की उद्बोधक हैं ।। प्रसाद जी की कहानियों में गहरी भावमयता एवं सूक्ष्मता देखने को मिलती है ।। इनकी कहानियों का आधार ऐतिहासिक हो अथवा काल्पनिक; काव्य तत्व एवं नाटकीयता इनकी अधिकांश कहानियों में समाहित है ।। प्रसाद जी के कथानक प्रवाहपूर्ण एवं चित्ताकर्षक हैं ।। कथावस्तु में सांस्कृतिक चेतना, प्रेम, कर्त्तव्यनिष्ठा, चरित्रगत सौन्दर्य आदि तत्व उभरकर आते हैं ।। प्रकृति के काव्यात्मक चित्र भी कथावस्तु का सौन्दर्य बढ़ाने में अत्यधिक सफल हुए हैं ।।

प्रसाद जी ने चरित्र-चित्रण में मानवीय गरिमा को महत्व दिया है तथा पात्रों के व्यक्तित्व को मार्मिकता से उभारा है ।। पात्रों की भावुकता उनको सक्रिय बनाती है तथा मानसिक संघर्षों में विवेक ऊपर उठकर कर्त्तव्य का मार्ग निर्धारित करता है ।। इनके कथोपकथन मार्मिक, सजीव एवं प्रभावशाली हैं, जिनसे कहानी की रोचकता बढ़ती है एवं उसका स्वाभाविक विकास होता है ।। साथ ही ये कथोपकथन संक्षिप्त, नाटकीय एवं मनोवैज्ञानिक हैं ।। प्रसाद जी की भाषा परिष्कृत, कलात्मक एवं संस्कृतनिष्ठ है तथा शैली में लालित्य, नाटकीयता एवं काव्यमयता है ।। स्थिति एवं पात्रों की मनोदशा के कलापूर्ण चित्रण एवं कथावस्तु का सौन्दर्य उभारने में उपयुक्त एवं कवित्वपूर्ण वातावरण की सुयोजना प्रसाद जी की कहानी-कला की अपनी प्रमुख विशेषता है ।। हिन्दी साहित्य क्षेत्र में अपने महत्वपूर्ण योगदान के कारण जयशंकर प्रसाद जी सदैव अमर रहेंगे ।। हिन्दी साहित्य जगत सदैव इनका ऋणी रहेगा ।।

आकाशदीप कहानी पर आधारित प्रश्न

1 — ‘आकाशदीप’ कहानी का सारांश अपने शब्दों में लिखिए ।।


उत्तर — चम्पा जाह्नवी नदी के तट पर बसी हुई चम्पा नगरी में रहने वाली एक क्षत्रिय बालिका है ।। चम्पा के पिता पोताध्यक्ष मणिभद्र के यहाँ प्रहरी थे ।। माता की मृत्यु के बाद वह पिता के साथ पोत पर ही रह रही थी ।। आठ वर्ष से पोत ही उसका घर है ।। बुद्धगुप्त एक युवा जलदस्यु है ।। वह ताम्रलिप्ति का क्षत्रिय है ।। बुद्धगुप्त के आक्रमण के समय चम्पा के पिता ने सात जलदस्युओं को मारकर जल-समाधि ली थी ।। अब वह अनाथ की भाँति खुले आकाश के नीचे जीवन बिता रही थी ।। एक दिन मणिभद्र ने उससे घृणित प्रस्ताव रखा, चम्पा ने उसका विरोध किया ।। उसी दिन से वह बन्दी बना दी गई ।। कहानी का प्रारम्भ समुद्र की लहरों पर हिचकोले खाते पोत पर बन्दी बनाकर, रखे गए दो बन्दियों (चम्पा व बुद्धगुप्त) के वार्तालाप से होता है ।। वे दोनों ही एक-दूसरे से अपरिचित हैं ।। तूफान के कारण पोत की व्यवस्था भंग हो जाने पर जब वह डगमगाने लगा, तब वे दोनों रात्रि के गहन अन्धकार में लुढ़कते हुए एक-दूसरे से टकरा जाते हैं ।।

टकराने पर ज्ञात होता है कि उनमें एक स्त्री है और दूसरा पुरुष है ।। दोनों ही बन्धनमुक्त होने के अपने प्रयास में सफल हो जाते हैं और तब चम्पा ने बुद्धगुप्त को (जो दुर्भाग्य से जलदस्यु बन गया था) अपनी आत्मकथा सुनाई ।। बुद्धगुप्त के आक्रमण के समय ही चम्पा के पिता की मृत्यु हुई थी ।। बाद में किसी आक्रमण के कारण बुद्धगुप्त भी बन्दी बना लिया गया था ।। गहन रात्रि में तूफान के कारण कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था ।। चम्पा उसे स्वतन्त्र होने का अवसर बताते हुए नाविक की कृपाण लाकर देती है ।। वह लुढ़कते हुए उस रज्जु के पास पहुँचा, जो पोत में संलग्न थी ।। उसने रज्जु काट दी, जिससे नाव स्वतन्त्र हो गई ।। प्रात:काल बुद्धगुप्त नाव का स्वामी बन बैठा ।। वे दोनों एक नए द्वीप पर पहुंचे ।। वह द्वीप चम्पा व बुद्धगुप्त का स्थायी निवास स्थान बन गया ।। बुद्धगुप्त ने उस द्वीप का नाम चम्पा-द्वीप रखा ।। चम्पा के सम्पर्क में रहने कारण बुद्धगुप्त के कठोर हृदय में कोमलता उत्पन्न हो गई ।। वह व्यापार करने लगा ।। उस द्वीपवासी सभी लोग बुद्धगुप्त को राजा और चम्पा को महारानी मानते थे ।। चम्पा प्रतिदिन समुद्र तट पर ऊँचे स्थान पर दीपक जलाकर उसे रस्सी की सहायता से ऊपर पहुँचाती थी ।।

महानाविक के इस विषय में पूछने पर उसने बताया कि मैं अपने पिता के लिए, भूले-भटके लोगों को पथ दिखाने के लिए दीप जलाती हूँ ।। चम्पा कहती है- “भगवान भी भटकते हैं, भूलते हैं, अन्यथा बुद्धगुप्त को इतना ऐश्वर्य क्यों देते?’ बुद्धगुप्त ने कहा- “तो इसमें बुरा क्या हुआ? इस द्वीप की अधीश्वरी चम्पा रानी ।। ” चम्पा कहती है- “मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता, वही अच्छा लगता था ।। खुले आकाश के नीचे थके-हारे, पालों से शरीर लपेटकर पड़े रहते थे ।। ‘ बुद्धगुप्त बोला- “तो चम्पा अब हम अच्छी प्रकार से रह सकते हैं ।। तुम मेरी प्राणदात्री, मेरी सर्वस्व हो ।। ‘ बुद्धगुप्त चम्पा से प्रणयनिवेदन करता है लेकिन अपने पिता का स्मरण करके क्रोध में आकर चम्पा उसे अस्वीकार कर देती है ।। बुद्धगुप्त पुनः उससे प्रणय-निवेदन करता है ।। चम्पा प्रतिशोध का कृपाण निकालकर समुद्र में फेंक देती है ।। बुद्धगुप्त कहता है कि आज से मैं समझू कि मुझे क्षमा कर दिया गया ।। चम्पा कहती है- “कदापि नहीं बुद्धगुप्त, जब मैं अपने हृदय पर विश्वास नहीं कर सकी, उसी ने धोखा दिया, तब मैं कैसे कहूँ? मैं तुमसे घृणा करती हूँ, फिर भी तुम्हारे लिए मर सकती हूँ ।। अँधेर है जलदस्यु! मैं तुम्हें प्यार करती हूँ ।। ” चम्पा रो पड़ी ।। बुद्धगुप्त कहता है- “जीवन की इस पुण्यतम घड़ी की स्मृति में एक प्रकाश-गृह बनाऊँगा ।। चम्पा! यहीं उस पहाड़ी पर ।। सम्भव है मेरे जीवन की धुंधली सँध्या उससे आलोकमय हो जाए ।। ” द्वीप-स्तम्भ बना ।। फूलों से सजी वनबालाएँ नृत्य कर रही थीं ।। बाँसुरी व ढोल आदि बज रहे थे ।।

चम्पा ने सहचरी जया से पूछा- “यह क्या है जया?’ जया हँसकर कहती है- “आज रानी का ब्याह है न?” चम्पा को विश्वास नहीं होता है, वह उसे झकझोरकर पुनः पूछती है- “क्या यह सच है?” इस पर बुद्धगुप्त कहता है- “तुम्हारी इच्छा हो तो यह सच भी हो सकता है चम्पा ।। ” चम्पा प्रतिप्रश्न करती है”मुझे निस्सहाय और कंगाल जानकर तुमने सब प्रतिशोध लेना चाहा ।। ‘ बुद्धगुप्त कहता है- “मैं तुम्हारे पिता का हत्यारा नहीं हूँ चम्पा, वह एक-दूसरे दस्यु के शस्त्र से मरे ।। ” अन्त में बुद्धगुप्त चम्पा से कहता है- “मुझे अपने देश, भारतवर्ष की याद बहुत सताती है, मै वहाँ लौटना चाहता हूँ, चलोगी चम्पा? पोतवाहिनी पर असंख्य धनराशि लादकर राजरानी-सी जन्मभूमि के अंक में?’ चैतन्य होकर (सँभलकर) चम्पा कहती है- “मेरे लिए सब भूमि मिट्टी है, सब जल तरल है, सब पवन शीतल है ।। प्रिय नाविक! तुम स्वदेश लौट जाओ, वैभवों का सुख भोगने के लिए मुझे छोड़ दो इन निरीह भोले-भाले प्राणियों के दुःख में सहानुभूति और सेवा के लिए ।। ” महानाविक स्वदेश लौट गया ।। चम्पा उसी द्वीप पर रहकर आजीवन ‘द्वीप-स्तम्भ’ पर दीप जलाती रही ।। वह भी जलती रही जैसे आकाशदीप ।।

2 — ‘आकाशदीप’कहानी के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए ।।

उत्तर — प्रस्तुत कहानी ‘आकाशदीप’ का शीर्षक सारगर्भित व आकर्षक है ।। कहानी की मुख्य पात्र चम्पा आजीवन चम्पा-दीप में द्वीप स्तम्भ पर दीप जलाती रही और इसके माध्यम से मानो स्वयं आकाशदीप के समान जलते हुए अपूर्व त्याग का प्रकाश फैलाकर विश्व का मार्ग दर्शन करती रही ।। कर्त्तव्य व प्रेम के संघर्ष के परिणामस्वरूप चम्पा की इस त्याग-भावना को दृष्टिगत रखते हुए ही इस कहानी का शीर्षक आकाशदीप रखा गया है ।। अतः स्पष्ट है कि कहानी का शीर्षक मूलभाव को स्वयं में समाहित किए हुए, आकर्षक, रोचक व सार्थक है ।।

3 — ‘आकाशदीप ( कहानी में जयशंकर प्रसाद का क्या उद्देश्य रहा है? स्पष्ट कीजिए ।।

उत्तर — ‘आकाशदीप’ कहानी में जयशंकर प्रसाद का उद्देश्य- प्रस्तुत कहानी ‘आकाशदीप’ में भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रभाव का अतीतकाल में सुदूरपूर्वक विस्तार दिखाना ही मुख्य उद्देश्य है ।। साथ ही प्रेम और कर्त्तव्य के सुन्दर संघर्ष में अन्ततः प्रेम पर कर्त्तव्य की विजय की घोषणा के द्वारा कर्त्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा देना भी इस कहानी का एक महान् उद्देश्य रहा है ।।
निष्कर्ष रूप में यही कह सकते हैं कि प्रसाद जी ने ‘आकाशदीप’ कहानी में अतिसाधारण एवं नगण्य मानवों (चम्पा और बुद्धगुप्त) में भी भावना और मानवता का उत्कृष्ट विकास दिखाकर मानव-जीवन की तात्विक एवं संवेदनशील एकता का उद्घोष किया है और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना का प्रचार एवं प्रसार करके उल्लेखनीय कार्य किया है ।।

4 — पात्र और चरित्र चित्रण की दृष्टि से जयशंकर प्रसाद की आकाशदीप’कहानी की समीक्षा कीजिए ।।
उत्तर — प्रसाद जी की पात्र-योजना बड़ी उदात्त होती है ।। उनके अधिकांश पात्रों का चयन भारत के उस प्राचीन गौरवमय अतीत से है,
जिस पर वे आधुनिक समाज की नींव रखना चाहते हैं ।। प्रस्तुत कहानी में चम्पा और बुद्धगुप्त दो ही मुख्य पात्र हैं ।। अन्य सभी पात्र मात्र कथा-प्रसंग की समुचित पूर्ति के लिए ही सम्मिलित किए गए हैं ।। चम्पा के माध्यम से कहानीकार ने अन्तर्द्वन्द्व, कर्त्तव्यनिष्ठा एवं उत्सर्ग की उदात्त भावनाओं को चित्रित किया है ।। चम्पा के चरित्र का ताना-बाना मानवीयता के चतुर्दिक उच्च आदर्श के धागों से बुना हुआ है ।। उसके आन्तरिक द्वन्द्व का सजीव चित्रण कर कहानीकार ने कर्तव्यनिष्ठा एवं उत्सर्ग की उदात्त भावनाओं को उजागर किया है ।। बुद्धगुप्त भी वीर, साहसी, सौन्दर्य का उपासक, कर्मठ, संयमी एवं आदर्श प्रेमी है ।। प्रसाद जी की इस कहानी के पात्र भी स्वाभाविक, सजीव तथा मनोवैज्ञानिक आधार पर पूर्ण रूप से खरे उतरते हैं ।। चरित्र-चित्रण की दृष्टि से यह कहानी एक सफल कहानी है ।।

5 — कथोपकथन की दृष्टि से आकाशदीप’कहानी की समीक्षा कीजिए ।।


उत्तर—- इस कहानी का कथोपकथन संक्षिप्त, नाटकीय एवं अर्थ-गाम्भीर्य से परिपूर्ण होने के कारण सजीव, मार्मिक एवं प्रभावशाली है ।। कहानी के पात्र स्वयं के संवादों द्वारा अपना परिचय प्रस्तुत करते हैं ।। प्रसाद जी श्रेष्ठ नाटककार हैं, इसी कारण प्रस्तुत कहानी की संवाद-योजना नाटकीय है ।। इस कहानी के संवाद संक्षिप्त, सारगर्भित, कथानक को गति देने वाले, वातावरण की सृष्टि में सहायक तथा पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं को प्रकट करने वाले हैं ।। इस कहानी के संवाद सार्थक, मार्मिक और प्रभावशाली हैं ।। एक उदाहरण द्रष्टव्य है’बन्दी ।। ‘ ‘क्या है? सोने दो ।। ‘ ‘मुक्त होना चाहते हो ।। ‘ ‘अभी नहीं, निद्रा खुलने पर, चुप रहो ।। ‘ ‘फिर अवसर न मिलेगा ।। ‘ ।। ‘बड़ी शीत है, कहीं से एक कम्बल डालकर कोई शीत से मुक्त करता ।। ‘ ‘आँधी की संभावना है ।। यही अवसर है, आज मेरे बन्धन शिथिल हैं ।। ‘तो क्या तुम भी बन्दी हो?’

6 — ‘आकाशदीप’कहानी की प्रमुख नारी-पात्र चम्पा का चरित्र-चित्रण कीजिए ।।
उत्तर— हिन्दी कथा-साहित्य की कुछ अमर कृतियों में से जयशंकर प्रसाद की ‘आकाशदीप’ कहानी भी एक है ।। इस कहानी की नायिका चम्पा ही कहानी की मुख्य नारी पात्रा है ।। वह अपने वीर और बलिदानी पिता की एकमात्र सन्तान है ।। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(i) सुन्दर बालिका- चम्पा अति सुन्दर बालिका है ।। वह सौन्दर्य की साक्षात् प्रतिमूर्ति है ।। यह उसके अतीव सौन्दर्य का ही प्रभाव था कि बुद्धगुप्त जिसके नाम से बाली, जावा और चम्पा का आकाश गूंजता था, पवन थर्राता था, घुटनों के बल चम्पा के सामने प्रणय-निवेदन करता, छलछलाई आँखों से बैठा था ।।
(ii) निडर, स्वाभिमानी और साहसी- चम्पा निडर, स्वाभिमानी और साहसी है ।। उनकी निडरता का पता तब चलता है जब मणिभद्र उसके समक्ष घृणित प्रस्ताव रखता है और वह उसके आश्रय में रहते हुए भी उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर देती है ।। उसके स्वाभिमानी होने का प्रमाण उसके बन्दी बनाए जाने पर मिलता है ।। उसे बन्दी होना स्वीकार है, लेकिन घृणित प्रस्ताव स्वीकार नहीं ।। उसके साहस का परिचय अनजाने द्वीप पर सबसे पहले उतरने पर मिलता है ।।

(iv) आदर्श प्रेमिका- चम्पा के हृदय में प्रेम का अथाह सागर हिलोरें लेता है, परन्तु वह इस प्रेम-सागर की लहरों को नियन्त्रण में रखना जानती है ।। बुद्धगुप्त जब भी उसके पास आता है, वह उस पर न्योछावर हो जाती है ।। उसके प्रेम का वर्णन स्वयं कहानीकार ने इन शब्दों में किया है- ‘उस सौरभ से पागल चम्पा ने बुद्धगुप्त के दोनों हाथ पकड़ लिए ।। वहाँ एक आलिंगन हुआ, जैसे क्षितिज में आकाश और सिन्धु का ।। ”

(v) आदर्श सन्तान- चम्पा अपने माता-पिता की आदर्श सन्तान है ।। उसे अपनी माता के द्वारा पिता के पथ-प्रदर्शन के प्रतीक रूप में आकाशदीप जलाना सदैव याद रहता है ।। उसके पिता की मृत्यु का कारण एक जलदस्यु था, यह वह कभी नहीं भूल पाती ।। वह बुद्धगुप्त से कहती है कि ये आकाशदीप मेरी माँ की पुण्य स्मृति हैं ।। वह बुद्धगुप्त को जलदस्यु से सम्बोधित कर अपने सामने से हट जाने के लिए भी कहती है ।।

(vi) अंतर्द्वन्द्व– चम्पा का पूरा चरित्र अन्तर्द्वन्द्व की भावना से भरा हुआ है ।। द्वीपवासियों के प्रति उसका प्रेम और व्यक्तिगत प्रेम का सहज अन्तर्द्वन्द्व उसको घेरे रहता है ।। एक ओर वह कर्त्तव्य-निर्वाह के लिए अपने प्रेम को न्योछावर कर देती है तो दूसरी ओर व्यक्तिगत प्रेम के गौरव की रक्षा के लिए आत्मोत्सर्ग भी कर देती है ।। उसका अन्तर्द्वन्द्व इन शब्दों में व्यक्त हुआ है- “बुद्धगुप्त! मेरे लिए सब भूमि मिट्टी है; सब जल तरल है; सब पवन शीतल है ।। कोई विशेष आकांक्षा हृदय में अग्नि के समान प्रज्जवलित नहीं ।। सब मिलाकर मेरे लिए एक शून्य है ।। और मुझे, छोड़ दो इन निरीह भोलेभाले प्राणियों के दुःख की सहानुभूति और सेवा के लिए ।। ” इस प्रकार चम्पा के चरित्र का गौरवपूर्ण और सजीव चित्रण करते हुए प्रसाद जी ने उसको द्वीपवासियों के प्रेम और व्यक्तिगत प्रेम के अन्तर्द्वन्द्व में घिरा दिखाया है तथा व्यक्तिगत प्रेम के उत्सर्ग को चित्रित कर चम्पा के चरित्र को गरिमामय अभिव्यक्ति प्रदान की है ।।

(vii) धैर्यशालिनी– चम्पा के जीवन में अनेक बाह्य तथा आन्तरिक संघर्ष आते हैं, परन्तु वह विचलित नहीं होती और धैर्यपूर्वक उनका सामना करती है ।। वह अनाथ है ।। माता की मृत्यु के बाद पिता के साथ जल-पोत पर रहती है ।। पिता की मृत्यु के बाद बन्दिनी हो जाती है ।। इसके बाद भी वह मुक्ति के लिए संघर्ष करती है ।। वह अपना धैर्य कभी नहीं छोड़ती ।। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि चम्पा का चरित्र ‘आकाशदीप’ कहानी का प्राण है ।। वह एक आदर्श नायिका है, एक आदर्श प्रेमिका है और साथ ही प्रसाद जी के अन्य नारी पात्रों के समान वन्दनीय है ।। स्वयं प्रसाद जी लिखते हैं, “चम्पा आजीवन उस दीप-स्तम्भ में आलोक जलाती रही ।। किन्तु उसके बाद भी बहुत दिन तक, द्वीप निवासी, उस माया ममता और स्नेह-सेवा की देवी की समाधि सदृश पूजा करते थे ।। “

7 — ‘आकाशदीप’कहानी के आधार पर बुद्धगुप्त का चरित्र-चित्रण कीजिए ।।

उत्तर — श्री जयशंकर प्रसाद’ द्वारा रचित कहानी ‘आकाशदीप’ की मुख्य पात्रा चम्पा ही है ।। कहानी के अन्य पात्रों का चित्रण चम्पा के चरित्र की विशेषताओं को ही स्पष्ट करने के लिए हुआ है ।। ऐसे ही एक पात्र के रूप में बुद्धगुप्त भी है ।। इस कहानी में बुद्धगुप्त के चरित्र की विशेषताएँ निम्नवत् दर्शाई गई है —

(i) साहसी- बुद्धगुप्त ताम्रलिप्ति का एक क्षत्रिय कुमार है ।। साहस उसमें कूट-कूटकर भरा हुआ है ।। नौका के स्वामित्व को लेकर नायक और बुद्धगुप्त में द्वन्द्वयुद्ध होता है ।। उस समय बुद्धगुप्त अपने साहस का परिचय देता है और द्वन्द्वयुद्ध में उसे हरा देता है ।। मानवतावादी- बुद्धगुप्त मानवतावादी है ।। उसमें मानवीयता के गुण विद्यमान हैं ।। इसी कारण चम्पा के प्रति उसके मन में दया की भावना उत्पन्न हो जाती है, जो बाद में प्रेम में परिवर्तित हो जाती है ।। चम्पा के सानिध्य से उसकी दस्युगत मानसिकता और कठोरता समाप्त होकर मानवता और मृदुलता में परिवर्तित हो जाती है ।।

(iii) संवेदनशील और प्रेमी व्यक्ति– बुद्धगुप्त एक संवेदनशील व्यक्ति है ।। जब चम्पा कहती है कि उसके पिता की मृत्यु एक जलदस्यु के हाथों हुई थी तब वह स्पष्ट रूप से कहता है कि, “मैं तुम्हारे पिता का घातक नहीं हूँ, चम्पा! वह एक दूसरे दस्यु के शस्त्र से मरे ।। ” चम्पा के प्रति उसका प्रेम संवेदनशीलता की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ है ।। वह चम्पा से कहता है, “इतना महत्व प्राप्त करने पर भी मैं कंगाल हूँ ।। मेरा पत्थर-सा हृदय एक दिन सहसा तुम्हारे स्पर्श से चन्द्रकान्तमणि की तरह द्रवित हुआ ।। ”

(iv) वीर– बुद्धगुप्त एक वीर युवक है ।। बन्धन मुक्त होने पर जब उससे पूछा जाता है कि तुम्हें किसने बन्धमुक्त किया तो वह कृपाण दिखाकर नायक को बताता है ‘इसने’ ।। नायक और बुद्धगुप्त के द्वन्द्वयुद्ध में विजयश्री बुद्धगुप्त को मिलती है ।। चम्पा भी उसकी वीरता से प्रभावित हुए बिना नहीं रहती ।। स्वयं प्रसाद जी कहते हैं, “चम्पा ने युवक जलदस्यु के समीप आकर उसके क्षतों को अपनी स्निग्ध दृष्टि और कोमल करों से वेदना-विहीन कर दिया ।। ”


(v) भारत के प्रति प्रेम– बुद्धगुप्त भारतभूमि के ही एक स्थल ताम्रलिप्ति का एक क्षत्रिय कुमार है ।। भारतभूमि के प्रति उसके मन में अगाध स्नेह है ।। वह चम्पा से कहता है, “स्मरण होता है वह दार्शनिकों का देश! वह महिमा की प्रतिमा! मुझे वह स्मृति नित्य आकर्षित करती है ।। ” चम्पा के अस्वीकार कर देने पर वह स्वयं भारत लौट आता है ।। निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि इस कहानी का नायक होते हुए भी बुद्धगुप्त चम्पा के चरित्र की विशेषता को उजागर करने वाला मात्र एक सहायक पात्र है, तथापि उसके चरित्र की उपर्युक्त विशेषताएँ उसकी एक अलग छवि प्रस्तुत करती हैं ।।

8 — ‘आकाशदीप’ कहानी में सजीव ऐतिहासिक वातावरण की सृष्टि किस प्रकार की गई है? भाषा-शैली के आधार पर बताइए ।।
उत्तर — प्रसाद जी ने ‘आकाशदीप’ कहानी के वातावरण निर्माण में इतिहास और कल्पना का सहारा लेकर रचना को सजीव बना दिया है ।। इसको जीवन्त स्वरूप देने में उनकी कवित्वपूर्ण भाषा और नाटकीय शैली का अपूर्व सहयोग रहा है ।। इससे ऐतिहासिक वातावरण साकार हो उठा है ।। उन्होंने तत्कालीन वातावरण के अनुकूल ही संस्कृतबहुल शब्दावली का प्रयोग किया है ।। काव्यात्मक भाषा का एक उदाहरण द्रष्टव्य है-

जाह्ववी के तट पर ।। चम्पा नगरी की एक क्षत्रिय बालिका हूँ ।। पिता इसी मणिभद्र के यहाँ प्रहरी का काम करते थे ।।

“मैं भी ताम्रलिप्ति का एक क्षत्रियहँ,चम्पा! परन्त दर्भाग्य से जलदस्य बनकर जीवन बिताता हूँ ।। ” प्रस्तुत कहानी में प्रसाद जी की नाटकीय शैली ने वातावरण को स्वाभाविक और सरल बना दिया है; जैसे’बावली हो क्या? यहाँ बैठी हुई अभी तक दीप जला रही हो, तुम्हें यह काम करना है?’ ‘क्षीरनिधिशायी अनंत की प्रसन्नता के लिए क्या दासियों से आकाशदीप जलवाऊँ?’ ‘हँसी आती है ।। तम किसको दीप जलाकर पथ दिखलाना चाहती हो? उसको, जिसको तमने भगवान मान लिया है?’ ‘हाँ, वह कभी भटकते हैं, भूलते हैं; नहीं तो, बुद्धगुप्त को इतना ऐश्वर्य क्यों देते?’ ‘तो बुरा क्या हुआ, इस द्वीप की अधीश्वरी चम्पारानी!’ ‘मुझे इस बन्दीगृह से मुक्त करो ।। अब तो बाली, जावा और सुमात्रा का वाणिज्य केवल तुम्हारे ही अधिकार में है महानाविक! परन्तु मुझे उन दिनों की स्मृति सुहावनी लगती है, जब तुम्हारे पास एक ही नाव थी और चम्पा के उपकूल में पण्य लादकर हम लोग सुखी जीवन बिताते थे ।। ‘

इस प्रकार प्रसाद जी ने कहानी में देश-काल के अनुकूल भाषा-शैली का प्रयोग करके ऐतिहासिक वातावरण को सहज ही साकार कर दिया है ।।

9 — कहानी के तत्वों के आधार पर आकाशदीप’कहानी की समीक्षा कीजिए ।।
उत्तर — जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘आकाशदीप’ कहानी ऐतिहासिक धरातल पर आधारित है ।। प्रसाद जी की कहानी-साहित्य भाव और शिल्प दोनों दृष्टियों से अद्वितीय है ।। इस कहानी की तात्विक समीक्षा निम्नवत् है

(i) शीर्षक- ‘आकाशदीप’ कहानी का शीर्षक संक्षिप्त, सरल और कौतूहलवर्द्धक है ।। ‘आकाशदीप’ शब्द में ही कहानी का कथानक समाया हुआ है ।। यह वस्तु-व्यंजक होने के साथ-साथ सांकेतिक भी है ।। इसका सीधा सम्बन्ध कहानी की मूल चेतना से है और इसमें कहानी का केन्द्रबिन्दु स्वयं सिमट आया है ।। कहानी की सभी मूलघटनाओं का केन्द्र चम्पा द्वारा प्रज्जवलित ‘आकाशदीप’ ही है ।। कथा के अनेक वैशिष्ट्यों को अपने में समाविष्ट करने के कारण शीर्षक उपयुक्त एवं समीचीन है ।। कथानक- जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित ‘आकाशदीप’ शीर्षक कहानी का कथानक चम्पा और बुद्धगुप्त के जीवन और कार्य के इतिवृत्त पर आधारित है ।। चम्पा मणिभद्र के दिवंगत प्रहरी की क्षत्रिय कन्या है और बुद्धगुप्त ताम्रलिप्ति का क्षत्रिय कुमार ।। दोनों ही जलपोत पर बन्दी के रूप में रहते हैं ।। कहानीकार ने इस कहानी के कथानक को क्रमबद्धता देने के लिए एक, दो, तीन, चार जैसे उपविभागों में विभाजित किया है ।। कहानी का आरम्भ चम्पा और बुद्धगुप्त; दोनों बन्दियों; के मुक्ति-सम्बन्धी संवादों से होता है ।। दूसरे उपविभाग में युद्ध में विजयी होकर बुद्धगुप्त चम्पा पर अपनी वीरता का प्रभाव छोड़ता है ।। तीसरे उपविभाग में चम्पा बुद्धगुप्त को अपनी व्यथाकथा सुनाती है, जिससे यह पता चलता है कि वह वासना-लिप्त वणिक मणिभद्र के यहाँ बन्दी जीवन व्यतीत कर रही थी ।।

इसी कथा-व्यापार में बुद्धगुप्त नये द्वीप पर पहुँचता है और उसका नाम चम्पा द्वीप रखता है ।। चम्पा के सानिध्य में आने से जलदस्यु बुद्धगुप्त के हृदय में प्रेम और संवेदना का अविर्भाव होता है ।। धीरे-धीरे पाँच वर्ष बीत जाते हैं ।। चम्पा आकाशदीप जलाकर द्वीपवासी जनता का मार्ग आलोकित करती है ।। वह अपनी माँ द्वारा जलाए गए आकाश-दीपक की परम्परा का निर्वाह करती है ।। चम्पा और बुद्धगुप्त के परस्पर सान्निध्य से प्रेम के आविर्भाव के साथ-साथ बुद्धगुप्त की दस्युगत नास्तिकता समाप्त होकर मानवता और मृदुलता के रूप में परिवर्तित होती है ।। उसका हृदय और मस्तिष्क दोनों ही परिवर्तित होकर संवेदनशील बन जाते हैं ।। बुद्धगुप्त के यह कहने पर कि वह उसके पिता का हत्यारा नहीं, चम्पा प्रेम और प्रतिशोध के अन्तर्द्वन्द्व से जन्मे संशय में बँधे जाती है ।। अनास्तिक और अनास्थावादी बुद्धगुप्त द्रवित होकर चम्पा के साथ जीवनयापन के लिए प्रतिज्ञाबद्ध होता है परन्तु प्रेम, आशा और उत्साह का संचार होते हुए भी चम्पा उस द्वीप के मूल निवासियों को छोड़कर महानाविक के साथ भारत नहीं लौटती है ।। UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 1 बलिदान free solution

चम्पा आजीवन उस दीपस्तम्भ में आलोक जलाती रही और एक दिन काल कवलित हो गई ।। इस कहानी का कथानक प्रतीकात्मक होते हुए भी सेवा, त्याग और प्रेम की भावना से कथानक को गतिशील बनाता है ।। पात्र और चरित्र-चित्रण- प्रसाद जी का पात्र-योजना बड़ी उदात्त होती है ।। उनके अधिकांश पात्रों का चयन भारत के उस प्राचीन गौरवमय अतीत से है, जिस पर वे आधुनिक समाज की नींव रखना चाहते हैं ।। प्रस्तुत कहानी में चम्पा और बुद्धगुप्त दो ही मुख्य पात्र हैं ।। अन्य सभी पात्र मात्र कथा-प्रसंग की समुचित पूर्ति के लिए ही सम्मिलित किए गए हैं ।। चम्पा के माध्यम से कहानीकार ने अन्तर्द्वन्द्व, कर्त्तव्यनिष्ठा एवं उत्सर्ग की उदात्त भावनाओं को चित्रित किया है ।। चम्पा के चरित्र का ताना-बाना मानवीयता के चतुर्दिक उच्च आदर्श के धागों से बना हुआ है ।। उसके आन्तरिक द्वन्द्व का सजीव चित्रण कर कहानीकार ने कर्त्तव्यनिष्ठा एवं उत्सर्ग की उदात्त भावनाओं को उजागर किया है ।। बुद्धगुप्त भी वीर, साहसी,सौन्दर्य का उपासक, कर्मठ, संयमी एवं आदर्श प्रेमी है ।। प्रसाद जी की इस कहानी के पात्र भी स्वाभाविक, सजीव तथा मनोवैज्ञानिक आधार पर पूर्ण रूप से खरे उतरते हैं ।। चरित्र-चित्रण की दृष्टि से यह कहानी एक सफल कहानी है ।।

(iv) कथोपकथन या संवाद- इस कहानी का कथोपकथन संक्षिप्त, नाटकीय एवं अर्थ- गाम्भीर्य से परिपूर्ण होने के कारण सजीव, मार्मिक एवं प्रभावशाली है ।। कहानी के पात्र स्वयं के संवादों द्वारा अपना परिचय प्रस्तुत करते हैं ।। प्रसाद जी श्रेष्ठ नाटककार हैं, इसी कारण प्रस्तुत कहानी की संवाद-योजना नाटकीय है ।। इस कहानी के संवाद संक्षिप्त, सारगर्भित, कथानक को गति देने वाले, वातावरण की सृष्टि में सहायक तथा पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं को प्रकट करने वाले हैं ।। इस कहानी के संवाद सार्थक, मार्मिक और प्रभावशाली हैं ।। एक उदाहरण द्रष्टव्य है’बन्दी ।। ‘ ‘क्या है? सोने दो ।। ‘ ‘मुक्त होना चाहते हो ।। ‘ ‘अभी नहीं, निद्रा खुलने पर, चुप रहो ।। ‘ ‘फिर अवसर न मिलेगा ।। ‘ ‘बड़ी शीत है, कहीं से एक कम्बल डालकर कोई शीत से मुक्त करता ।। ‘ ‘आँधी की संभावना है ।। यही अवसर है, आज मेरे बन्धन शिथिल हैं ।। ‘तो क्या तुम भी बन्दी हो?’ UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 1 बलिदान free solution

(v) भाषा-शैली- प्रसाद जी की भाषा कलात्मक, संस्कृतनिष्ठ और परिष्कृत है ।। प्रस्तुत कहानी की भाषा संस्कृत प्रधान है और उसमें तत्सम शब्दों की बहुलता है ।। प्रसाद जी की शब्दावली समृद्ध और व्यापक तथा शैली अलंकृत है ।। कहानी की भाषा-शैली कथावस्तु की गरिमा और पात्रों की भाव-व्यंजना के अनुकूल है ।। भाषा सरस और मार्मिक है ।। मोहक अलंकार-विधान और तत्समप्रधान ओजमयी भाषा के कारण ‘आकाशदीप’ को प्रसाद जी की प्रतिनिधि कहानी कहा जा सकता है ।। इस कहानी में नाटकीय शैली तो प्रधान है ही, चित्रात्मक, वर्णनात्मक और भावात्मक शैलियों का भी यथास्थान प्रयोग हुआ है ।। उदाहरण द्रष्टव्य हैचम्पा और बुद्धगुप्त के परस्पर सानिध्य में सौन्दर्यजन्य प्रेम के आविर्भाव के साथ-साथ बुद्धगुप्त की दस्युगत नास्तिकता समाप्त होकर मानवता ओर मृदुलता के रूप में परिवर्तित होती है ।। शरद के धवल नक्षत्र नील गगन में झिलमिला रहे थे ।। चन्द्र की उज्जवल विजय पर अन्तरिक्ष में शरदलक्ष्मी ने आशीर्वाद के फूलों और खीलों को बिखेर दिया ।।

(vi) देश-काल व वातावरण- प्रसाद जी ने अपनी कहानियों में देश-काल और वातावरण का यथोचित निर्वाह किया है ।। ‘आकाशदीप’ कहानी में वातावरण ऐतिहासिक तथा पात्र काल्पनिक हैं ।। द्वीप के आंचलिक वातावरण का सुन्दर चित्रण है ।। भाषा तथा घटनाएँ देश-काल के सर्वथा अनुरूप हैं ।। वातावरण को सजीव करने के लिए चित्रात्मक शैली का प्रयोग किया गया है ।। दृश्य-वर्णन के साकार रूप का यह उदाहरण द्रष्टव्य हैसमुद्र में हिलोरें उठने लगी ।। दोनों बन्दी आपस में टकराने लगे ।। पहले बन्दी ने अपने को स्वतंत्र कर लिया ।। दूसरे का बन्धन खोलने का प्रयत्न करने लगा ।। लहरों के धक्के एक-दूसरे को स्पर्श से पुलकित कर रहे थे ।। मुक्ति की आशास्नेह का असम्भावित आलिंगन ।। दोनों ही अन्धकार में मुक्त हो गए ।। वातावरण के निर्माण में प्रसाद जी कवित्वमयी, अलंकृत और साहित्यिक शैली से काम लेते हैं तथा प्रकृति के दृश्यों का वर्णन बड़ी कुशलता से करते हैं ।। अपनी बहुमुखी कल्पना के द्वारा प्रसाद जी सूक्ष्म से सूक्ष्म रेखाओं को पाठकों के सामने उपस्थित कर देते हैं ।। इस प्रकार यह कहानी देश-काल और वातावरण की दृष्टि से एक सफल कहानी है ।।


(vii) उद्देश्य- प्रसाद जी का साहित्य आदर्शवादी हैं ।। प्रस्तुत कहानी में भावना की अपेक्षा कर्त्तव्यनिष्ठा का आदर्श प्रस्तुत किया गया है ।। चम्पा एक आदर्श प्रेमिका है और इन सबसे ऊपर है उसका उत्सर्ग भाव ।। वह अपने कर्त्तव्य का पालन करती हुई अपने व्यक्तिगत प्रेम और जीवन को समर्पित कर देती है ।। उसका चरित्र एक आदर्श उदात्त नारी का चरित्र है ।। कहानीकार का उद्देश्य उसके चरित्र के माध्यम से समाज में प्रेम का आदर्श स्वरूप उपस्थित करना है, जिसमें कहानीकार को पूर्ण सफलता मिली है ।। इस प्रकार ‘आकाशदीप’ कहानी की कथावस्तु जीवन्त तथा मार्मिक है ।। चम्पा प्रेम, कर्त्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति के प्रति सजग है ।। वह अपने प्रेम का बलिदान करती है तथा प्रेम के गौरव की रक्षा के लिए स्वयं का आत्मोत्सर्ग भी करती है ।। निष्कर्ष रूप से यह कहा जा सकता है कि प्रस्तुत कहानी; कहानी-कला की कसौटी पर खरी उतरती है ।।

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