UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 5 स्वयंवर-कथा, विश्वामित्र और जनक की भेंट (केशवदास) free pdf

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 5 स्वयंवर-कथा, विश्वामित्र और जनक की भेंट (केशवदास)

class 11 hindi solution
UP Board Class 11 Samanya hindi chapter 4

स्वयंवर-कथा, विश्वामित्र और जनक की भेंट (केशवदास)
कवि पर आधारित प्रश्न
1 — केशवदास जी का जीवन-परिचय देते हुए उनकी रचनाओं का उल्लेख कीजिए ।।
उत्तर — कवि परिचय
– महाकवि केशवदास का जन्म अनुमानत: मध्य भारत के ओरछा राज्य (वर्तमान मध्य प्रदेश का ओरछा जिला) में सन् 1546 ई० में हुआ था ।। इनके पिता पं० काशीनाथ मिश्र तथा पितामह कृष्णदत्त मिश्र संस्कृत के प्रकाण्ड पंडित थे ।। इनके परिवार में दैनिक जीवन में लोकभाषा हिन्दी का प्रयोग नहीं किया जाता था ।। वे बोलचाल में भी संस्कृत भाषा का ही प्रयोग करते थे ।। केशवदास ओरछा नरेश महाराजा रामसिंह के राजकवि थे ।। ओरछा नरेश के अनुज इन्द्रजीत सिंह केशवदास जी को अपना गुरु मानते थे ।। काशी-यात्रा के अवसर पर ये तुलसीदास जी के सम्पर्क में आए ।। ओरछा नरेश के अनुज इन्द्रजीत सिंह इनके प्रधान आश्रयदाता थे, जिन्होंने इन्हें इक्कीस गाँव भेंट में दिए थे ।। केशवदास जी ऐसे पहले महाकवि हुए हैं, जिन्होंने संस्कृत में आचार्यों की परम्परा का हिन्दी में सूत्रपात किया था ।। इन्होंने साहित्य, धर्मशास्त्र, राजनीति, ज्योतिष, वैद्यक व संगीत आदि विषयों का गहन अध्ययन किया ।। ये संस्कृत के विद्वान व अलंकारवादी थे; अतः इन्होंने काव्य-क्षेत्र में शास्त्रानुमोदित रीति पर ही साहित्य का प्रचार करना उचित माना ।। कुछ साहित्यकारों ने इन्हें तुलसीदास का समकालीन माना है ।। सन् 1618 ई० में केशवदास का देहावसान हो गया ।।

रचनाएँ– केशवदास द्वारा रचित ग्रन्थों की संख्या सोलह मानी गई है ।। जिनमें से आठ ग्रन्थों की प्रामाणिकता अभी सन्दिग्ध है ।। शेष आठ ग्रन्थ असन्दिग्ध रूप से इन्हीं के द्वारा रचित माने जाते हैं ।। इनकी प्रामाणिक आठ कृतियाँ इस प्रकार हैंरामचन्द्रिका- यह ग्रन्थ श्रीराम-सीता को इष्टदेव मानकर पाण्डित्यपूर्ण भाषा-शैली एवं छन्द में लिखा गया है, जो कि इनके छन्द-शास्त्र व काव्यात्मक प्रतिभा का परिचायक है ।। वीरसिंहदेव-चरित, जहाँगीर-जस-चन्द्रिका, रतन-बावनी- ये तीनों ग्रन्थ ऐतिहासिक प्रबन्ध-काव्यों की कोटि में आते हैं ।।
विज्ञान-गीता- यह एक आध्यात्मिक ग्रन्थ है ।।
नख-शिख- इसमें नख-शिख वर्णन किया गया है ।।
कविप्रिया- इसमें कवि-कर्त्तव्य एवं अलंकार-वर्णन है ।।
रसिक-प्रिया- इसमें रस-विवेचन किया गया है ।।


2 — केशवदास जी की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए ।।
उत्तर — भाषा-शैली- भाषा पर केशवदास जी का असाधारण अधिकार था ।। इन्होंने प्रसंगों ने अनुकूल भाषा का प्रयोग किया है ।। इनकी भाषा में विषय के अनुरूप प्रसाद, माधुर्य और ओज गुण विद्यमान है ।। ओजस्विता, लाक्षणिकता तथा प्रवाह इनकी भाषा की प्रमुख विशेषताएँ हैं ।। केशवदास जी की भाषा ब्रजभाषा है, जिसमें बुन्देलखण्डी का पुट है ।। इसलिए अधिकांश आलोचकों ने इनकी भाषा को बुन्देलखण्डी मिश्रित ब्रजभाषा कहना अधिक उचित समझा है ।। केशवदास जी ने पाण्डित्य प्रदर्शन और चमत्कार दिखाने के लिए संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग अधिक किया है ।। वस्तुत: केशवदास जी में भाव के अनुकूल भाषा का प्रयोग करने की पूर्ण क्षमता है ।। शैली की दृष्टि से इन्होंने प्रबन्ध और मुक्तक दोनों शैलियों को अपनाया है ।। ‘रामचन्द्रिका’ में प्रबन्ध शैली है तो ‘कविप्रिया’ और ‘रसिक-प्रिया’ में मुक्तक शैली ।।

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 3 भरत-महिमा, कवितावली, गीतावली, दोहावली, विनयपत्रिका (गोस्वामी तुलसीदास) free pdf
केशवदास जी का दृष्टिकोण था- “भूषण बिनु न बिराजई, कबिता बनिता मित्त’ अर्थात् आभूषण के अभाव में कविता और नारी का सौन्दर्य फीका पड़ जाता है ।। अपने काव्य में केशवदास जी ने अलंकारों का इतना अधिक प्रयोग किया है कि इन्हें अलंकारवादी कहा जाता है ।। इनके काव्य में रूपक, यमक, श्लेष, अतिशयोक्ति, विरोधाभास, सन्देह एवं अनुप्रास आदि अलंकारों के बहुत अधिक प्रयोग हुए हैं ।। हिन्दी के किसी अन्य कवि ने इतना अधिक छन्दों का प्रयोग नहीं किया, जितना कि केशव ने किया है ।। केशवदास जी ने रामचन्द्रिका में लगभग 82 प्रकार के छन्दों का प्रयोग किया है, जिनमें 24 मात्रिक और 58 वर्णिक हैं ।।
काव्य को काव्यशास्त्र के सिद्धान्तों के अनुरूप ढालने एवं उसके वस्तु-निरूपण, शब्द-योजना, अलंकार-योजना एवं छन्द विधान आदि को नियमबद्धता प्रदान करने के लिए महाकवि आचार्य केशवदास जी को सदैव स्मरण किया जाता रहेगा ।।
व्याख्या संबंधी प्रश्न

1 — निम्नलिखित पद्यावतरणों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए


(क) सोभित मंचन …………………………..देखन आई॥
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ के कवि ‘केशवदास’ द्वारा रचित ‘रामचन्द्रिका’ महाकाव्य से ‘स्वयंवर-कथा’ नामक शीर्षक से उद्धृत है ।।
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने सीता जी की स्वयंवर सभा का मनोहारी वर्णन किया है ।।

व्याख्या- कवि सीता जी की स्वयंवर सभा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि मंच पर हाथियों के दाँतों से बने हुए सिंहासन पर बैठे हुए राजाओं तथा राजकुमारों की पंक्ति की आभा चारों ओर छाई हुई है ।। मानों ब्रह्मा जी ने स्वयं पृथ्वी पर आकर चन्द्रमा के मंडल की ज्योति चारों ओर फैला दी हो अर्थात सिंहासन पर बैठे हुए राजागण तथा राजकुमार की शोभा देखते ही बनती है ।। सिंहासन पर सभी राजकुमार सुखपूर्वक विराजमान है तथा सीता से स्वयंवर को लेकर उत्सुक है ।। सीता के शुभ स्वयंवर का अवलोकन करने के लिए देवताओं सहित अपार जनों का समूह भी इस सभा में आया है ।।

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काव्य-सौन्दर्य- (1) कवि ने सीता जी की स्वयंवर सभा का उद्भुत वर्णन किया है ।। (2) भाषा- ब्रज ।। (3) शैली- प्रबन्ध ।। (4) रस- संयोग श्रृंगार ।। (5) अलंकार- अनुप्रास ।। (6) छन्द- सवैया ।।

(ख) पावक पवन …………………………………….आए हैं ।।
सन्दर्भ- पूर्ववत् ।।
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में स्वयंवर में उपस्थित होने वाले समुदाय का वर्णन किया जा रहा है ।।

व्याख्या- सीता जी के स्वयंवर का दृश्य देखने के लिए समस्त संसार के सभी चर-अचर रूपवान राजाओं का आकार धारण करके आए हैं ।। इन प्राणियों में अग्नि, वायु, मणियों वाले शेष, वासुकि आदि सर्प, पक्षी, पितृगण (मनुष्यों के पितृलोकवासी पितर) आदि जितने भी ज्योतियुक्त प्राणियों का उल्लेख ज्योतिषियों ने किया है; राक्षस (असुर), विख्यात सिद्धगण, समस्त तीर्थोंसहित सागर आदि सारे चर (सजीव) और अचर (जड़) जीव जिनका उल्लेख वेदों में मिलता है तथा अजर (कभी वृद्ध न होने वाले), अमर (कभी न मरने वाले), अजन्मा, शरीरधारी (अंगी) और शरीररहित (अनंगी) उस स्वयंवर में उपस्थित थे ।। वे इतने अगणित थे कि उनका पूरा वर्णन कर सकने की क्षमता किसी भी कवि में नहीं है ।।

काव्य-सौन्दर्य- (1) इसमें सीताजी के असीम रूप गुण की अप्रत्यक्ष रूप से व्यंजना की गई है जिसके कारण समस्त चराचर विश्व उनको पाना चाहता था ।। (2) भाषा- ब्रज ।। (3) छन्द- घनाक्षरी ।। (4) अलंकार- अतिशयोक्ति ।।

(ग) केशव ये………………………………………………………………………….योगमयी है ।।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ के कवि ‘केशवदास’ द्वारा रचित ‘रामचन्द्रिका’ महाकाव्य से ‘विश्वामित्र और जनक की भेंट’ नामक शीर्षक से उद्धृत है ।।
प्रसंग- इस पद्यांश में विश्वामित्र जी श्रीराम जी को महाराज जनक का परिचय दे रहे हैं ।।
व्याख्या- हे रामचन्द्र! देखो ये मिथिला-नरेश (जनक) हैं, जिन्होंने संसार में अपनी कीर्ति की बेल लगाई है; अर्थात संसार भर में इनका यश फैला हुआ है ।। जैसे- बेल की सुगन्धि चारों ओर फैलती है, वैसे ही इनका यश भी चारों ओर फैल रहा है ।। दानवीरता और युद्धवीरता द्वारा इन्होंने सारी पृथ्वी को अपने वश में में कर लिया है ।। वेद के छ: राज्य के सात और योग के आठ अंगों से उत्पन्न सिद्धि द्वारा इन्होंने तीनों लोकों में अपना कार्य सिद्ध कर लिया है; अर्थात् तीनों लोकों के भोग प्राप्त किए हैं ।। इनमें वेदत्रयी और राजश्री की परिपूर्णता का अच्छा योग जुड़ा है; (अर्थात् महाराजा जनम महान् वेदज्ञ विद्वान् होने के साथ-साथ राजोचित ऐश्वर्य से भी संपन्न है ।। इस प्रकार इनमें विद्या और ऐश्वर्य- सरस्वती और लक्ष्मी दोनों का पूर्ण योग हैं ।। अस्तु, राजा में जितने गुण होने चाहिए, वे सब इनमें हें, वरन् कुछ अधिक ही हैं (अर्थात् ये राजा होते हुए भी पूरे योगी हैं) ।।UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 3 भरत-महिमा, कवितावली, गीतावली, दोहावली, विनयपत्रिका (गोस्वामी तुलसीदास) free pdf

काव्य-सौन्दर्य- (1) राजा जनक के वैभव और वैराग्य का सुन्दर समन्वय किया गया है ।। (2) वेद के छह अंग हैं-शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द ।। राज्य के सात अंग हैं-राजा, मंत्री, मित्र, कोष, देश, दुर्ग और सेना ।। योग के आठ अंग हैं- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ।। (3) वेदत्रयी- ऋक, यजुः और साम ।। (4) भाषा- ब्रज ।। (5) छन्द- सवैया ।। (6) रस- शांत ।। (7) अलंकार- रूपक (कीर्ति-बेलि में) और श्लेष ।।

(घ) आपने आपने………………………………………………तनया उपजाई॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ।।
प्रसंग- इस पद्यांश में मुनि विश्वामित्र राजा जनक की प्रशंसा कर रहे हैं ।।

व्याख्या- हे जनक! अपने-अपने स्थानों पर तो सभी राजा सर्दव ही भूमि का पालन करते हैं, पर वे केवल नाम ही के भूमिपाल हैं, वास्तव में वे नृपति नहीं; क्योंकि उनसे भूमि का पालन यथार्थ (पतिवत्) नहीं हो पाता ।। केवल आप ही एक ऐसे व्यक्ति हैं.जो शरीर तो राजाओं का धारण किए हुए हैं, पर हैं ऐसे कि विदेहों (जीवनमुक्त लोगों) में आपकी निर्मल कीर्ति पाई जाती है ।। ऐवे विदेह होकर भी आप सच्चे भूपति हैं; क्योंकि आपने पृथ्वी के गर्भ से अत्यन्त सुन्दर कन्या पैदा की है (पति वहीं है, जो स्त्री से सन्तान पैदा करे) ।। सीता जैसी पुत्री का जन्म पृथ्वी से होना ही आपके ‘भूपति’ (राजा) होने को सार्थक करता है ।।
काव्य-सौन्दर्य- (1) विश्वामित्र ने राजा जनक की प्रशंसा करते हुए उन्हें सच्चा भूपति दर्शाया है ।। (2) भाषा- ब्रज ।। (3) छन्द-विजय ।। (4) रस- शांत ।। (5) अलंकार- विधि और विरोधाभास ।।

(ङ) दानिन के………………………………………………………………..दशरथ राय के॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ।। प्रसंग- प्रस्तुत पद्यांश में मुनि विश्वामित्र राजा जनक को राम-लक्ष्मण का परिचय दे रहे हैं ।।

व्याख्या- ये राम और लक्ष्मण बड़े-बड़े दानियों (शिव, दधीचि, हरिश्चन्द्रादि) के से स्वाभाव वाले हैं सदैव शत्रुओं से दंडस्वरूप धन-दान लेने वाले हैं, शत्रुओं का दान( मद) नष्ट करने वाले हैं तथा युद्धवीर हैं और अन्ततः (विचारपूर्वक देखने से) विष्णु के-से स्वभाव वाले हैं ।। ये समस्त द्वीपों के राजाओं के भी राजा हैं, राजा पृथु के समान चक्रवर्ती हैं, फिर भी ब्राह्माण और गाय के दास हैं (सेवक हैं) ।। ये बालक आनन्द-वारि बरसाने वाले बादल हैं, देवताओं के पालक- से (इन्द्रसम) हैं, लक्ष्मी के वल्लभ हैं, पर मन, वचन, कर्म से शुद्ध हैं ।। देहधारी हैं, पर विदेह समान हैं ।। हे राजन्! ऐसे गुण वाले ये बालक अयोध्या- नरेश राजा दशरथ के पुत्र हैं (ध्वनि से विश्वमित्र ने यह बतला दिया कि ये विष्णु के अवतार हैं) ।।

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काव्य-सौन्दर्य- (1) श्रीराम और लक्ष्मण दोनों के दिव्य गुणों की झाँकी प्रस्तुत की गई है ।। (2) भाषा- ब्रज ।। (3) छन्दघनाक्षरी ।। (4) शब्द-शक्ति- लक्षणा ।। (5) अलंकार- विरोधाभास ।। (6) ‘देहधर्मधारी पै विदेहराज जू से’ का आशय यह है कि यद्यपि ये साधारण मानवों का सा शरीर धारण किए हैं, परंतु वस्तुत: निराकार और जीवनमुक्त हैं ।।

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(च) ब्रज तें कठोर ………………………………………..कैसे ल्यावई॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ।। प्रसंग- यहाँ राजा जनक ने शिव-धनुष की कठोरता तथा विशालता एवं राम की सुकुमारता का वर्णन किया है ।।

व्याख्या- राजा जनक राम के आदर्श गुरु विश्वामित्र से परिचय प्राप्त करने के बाद कहते हैं कि शिव-धनुष ब्रज के समान कठोर है, यह धनुष कैलाश पर्वत के समान विशाल है अर्थात् बहुत विशाल है तथा मृत्यु के समान भयानक है, जो केवल मृत्युमृत्यु शब्द उच्चारित करता है ।। कवि केशवदास जी कहते हैं कि तीनों लोकों के सब देव इसकी प्रत्यंचा चढ़ाने में हार चुके हैं अर्थात तीनों लोकों में कोई भी इसकी प्रत्यंचा नहीं चढ़ा पाया है ।। महादेव को छोड़कर केवल एक व्यक्ति अर्थात परशुराम जी ही इसकी प्रत्यंचा चढ़ा सके हैं ।। बड़े-बड़े सर्यों के राजा अर्थात् राजा वासुकि स्वयं इस धनुष की प्रत्यंचा में विराजमान है ।। इन्द्र एवं दैत्यगण भी इसकी प्रत्यंचा चढ़ाने का मान नहीं प्राप्त कर सके है ।। यहाँ तक कि स्वयं गणेश जी भी इस धनुष को नहीं उठा पाए हैं तब कमल के सदृश कोमल हाथ वाले (राम) इस धनुष को उठाकर इसकी प्रत्यंचा किस प्रकार चढ़ा सकते हैं ? अर्थात् इस धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाना एक दुष्कर कार्य है जिसे कोमल गात वाले राम कैसे करेंगे ?

काव्य-सौन्दर्य- (1) यहाँ कवि ने राजा जनक के माध्यम से शिव-धनुष के महत्व का वर्णन किया है तथा राम की कोमलता का भी वर्णन किया है ।। (2) भाषा- ब्रज ।। (3) शैली- प्रबंध ।। (4) रस-वीर ।। (5) अलंकार- अनुप्रास, उपमा ।। (6) छन्द- दंडक ।।

(छ) उत्तम गाथ………………………………………….शरासन कीनो॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ।। UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 3 भरत-महिमा, कवितावली, गीतावली, दोहावली, विनयपत्रिका (गोस्वामी तुलसीदास) free pdf
प्रसंग- प्रस्तुत पद्यांश में श्रीराम द्वारा शिव-धनुष तोड़े जाने की घटना का सुन्दर वर्णन हआ है ।।
व्याख्या- (आज तक जिस धनुष को हाथ में लेकर किसी ने शरसन्धान नहीं किया था) उस अति प्रशंसित धनुष को जब राम ने उठा लिया, तब वह सनाथ (स्वामीवाला) हो गया; अर्थात् धनुष को धारण करने वाला ही उसका स्वामी होता है और शिवधनुष को क्योंकि अभी तक कोई धारण नहीं कर सकता था; अतः वह अभी तक अनाथ (बिना स्वामी के) था ।। राम के धारण करते ही वह सनाथ (स्वामीयुक्त) हो गया ।। उस धनुष से उत्तम गाथाएँ जुड़ी हुई थी ।। श्रीराम ने जब धनुष को उठाया तो उसमें प्रत्यंचा नहीं चढ़ी थी, जब उन्होंने प्रत्यंचा चढ़ा दी, तब असंख्य सन्तों (जिनमें विश्वामित्र, मुनि-मण्डली, जनक, शतानन्दादि भी थे) को सुख हुआ ।। जब श्रीराम ने उसे ताना, तब अपना नवीन तीक्ष्णकटाक्षरूपी बाण उस पर रख दिया ।। (धनुष की प्रत्यंचा खींचते समय स्वाभाविक रूप से दृष्टि भी तीर की तरह उस पर पड़ती है) ।। इसके बाद राजकुमार श्रीराम ने राजकुमारी सीता को प्रेमदृष्टि से देखकर उस शम्भु-धनुष को सच्चा शरासन बना दिया, अर्थात् आज उसका शरासन नाम सार्थक हुआ; क्योंकि श्रीराम ने कटाक्षरूपी बाण का उस पर सन्धान किया और उसे सीता जी की ओर छोड़ दिया ।।

काव्य-सौन्दर्य- (1) धनुर्भंग के समय की श्रीराम की ओजपूर्ण मुद्रा का बहुत ही मनोहारी और सजीव चित्रण किया गया है ।। (2) यहाँ केशवदास जी की काव्य-कलात्मकता का सौन्दर्य अत्यन्त दर्शनीय है ।। (3) भाषा- ब्रज ।। (4) छन्द- सवैया ।। (5) अलंकार- रूपक, श्लेष और विधि ।।

2 — निम्नलिखित सूक्तिपरक पंक्तियों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए

(क) जानकि के जनकादिक के सब फूलि उठेतरुपुण्य पुराने॥
सन्दर्भ- प्रस्तुत सुक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ के कवि केशवदास’ द्वारा रचित ‘स्वयंवर कथा’ शीर्षक से अवतरित है ।।
प्रसंग- प्रस्तुत सूक्ति में जनक की निराशा एवं श्रीराम का आगमन वर्णित है ।।
व्याख्या- सीता स्वयंवर के अवसर पर सातो द्वीपों के राजकुमार जब शिवजी का धनुष उठा तक न सके, तब राजा जनक का हृदय शोकाग्नि में जलने लगा, परन्तु उनके शोक की आग बुझाने प्रात: के बादलों के समान श्यामवर्ण वाले श्रीराम मंच पर आ विराजे ।। तब ऐसा लगा, मानो सीता और जनक के साथ सबके पूर्वजन्म के पुण्यरूपी वृक्षों पर फूल खिल गए हैं ।।

(ख) आपने आपने ठौरनि तौ भुवपाल सबै भुव पालै सदाई॥
सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ के ‘कवि केशवदास’ द्वारा रचित ‘विश्वामित्र और जनक की भेंट’ शीर्षक से अवतरित है ।।
प्रसंग- प्रस्तुत सूक्ति में विश्वामित्र जी ने महाराजा जनक जी की प्रशंसा की है ।।
व्याख्या- महाराजा जनक जी की सराहना करते हुए विश्वामित्र जी कहते हैं कि अपने-अपने स्थान पर तो सभी राजा भूमि का पालन करते ही हैं, लेकिन हैं वे सभी नाममात्र के ही राजा ।। तात्पर्य यह है कि राजा को भूपति अर्थात् भूमि का पति कहा जाता है और यथार्थ रूप में केवल राजा जनक ने ही अपने को सच्चा भूपति सिद्ध किया है, क्योंकि उन्होंने ही पृथ्वी के गर्भ से एक कन्या का उत्पन्न किया है ।।

(ग) ऋषिहिं देखि हरष्यो हियो, राम देखि कुम्हलाइ॥
सन्दर्भ- पूर्ववत् ।। प्रसंग- यहाँ कवि ने स्वयंवर में उपस्थित सीता जी को मनोस्थिति का अति सुन्दर चित्रण किया है ।।

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व्याख्या- कवि कहते हैं कि मुनि विश्वामित्र जब राम को शिव धनुष उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ाने की आज्ञा देते हैं तब राम अपने स्थान से उठकर जब शिव-धनुष के पास पहुँचते है तब मुनि विश्वामित्र तो राम को देखकर मन में आनन्दित होते है परन्तु सीता जी राम को देखकर चिन्तित होती है कि जिस शिव-धनुष को बड़े-बड़े महान् योद्धा तक नहीं उठा पाए, उसे कमल के समान कोमल शरीर वाले श्रीराम किस प्रकार उठाकर उसकी प्रत्यंचा चढ़ा पाएँगे ।।


अन्य परीक्षोपयोगीप्रश्न

1 — ‘स्वयंवर कथा’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए ।।
उत्तर — ‘स्वयंवर कथा’ महाकवि केशवदास द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचंद्रिका’ से लिया गया है ।। इसमें कवि ने सीता स्वयंवर में उपस्थित होने वाले समुदाय का वर्णन किया है, जिसमें समस्त संसार के समस्त चर-अचर उपस्थित थे ।। कवि कहते हैं कि महादेव जी का धनुष सभा के बीच विराजमान है जैसे वह समस्त चर-अचरों को धारण करने वाला प्रबल धारणकर्ता हो ।। सभा के मंच पर राजकुमारों की पंक्ति शोभित है जिनकी शोभा चारों ओर फैल रही है ।। जैसे ब्रह्मा स्वयं पृथ्वी पर आकर चंद्रमंडल की ज्योति बिखेर रहे हो ।। सभी राजकुमार मंच पर सुखपूर्वक विराजमान है ।। UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 3 भरत-महिमा, कवितावली, गीतावली, दोहावली, विनयपत्रिका (गोस्वामी तुलसीदास) free pdf

सीता का स्वयंवर देखने के लिए देवताओं सहित समस्त चर-अचरों का अपार जन समूह सभा में उपस्थित हुआ है ।। सीता जी के स्वयंवर में सभी चर-अचर सुंदर राजाओं का रूप धारण कर उपस्थित हुए हैं ।। इनमें अग्नि, वायु, मणियों वाले सर्प, पक्षी, पितृलोक निवासी आदि जितने भी ज्योतियुक्त प्राणियों का उल्लेख ज्योतिषों ने किया है; राक्षस (असुर), विख्यात सिद्धगण, समस्त तीर्थों सहित सागर आदि सभी जड़, चेतन जिनका वर्णन वेदों में मिलता है तथा अजर, अमर, अजन्मा, शरीरधारी और शरीर रहित उस सभा में उपस्थित थे ।। वे इतने अगणित थे उनका वर्णन नहीं किया जा सकता ।। सातों द्वीपों के राजकुमार जब महादेव जी का धनुष उठाने में विफल हो गए, तब राजा जनक का हृदय शोकाग्नि में जलने लगा, परंतु उनके शोक की आग बुझाने प्रातः के बादलों के समान श्यामवर्ण वाले राम, सीता जी से विवाह करने के लिए मंच पर आकर विराजमान हो गए ।। तब ऐसा लगा मानो सीता और जनक के साथ सबके पूर्व जन्मों के पुण्यरूपी तरु (वृक्ष) पर फूल खिल गए हैं ।।

2 — गुरु विश्वामित्र ने राजा जनक का परिचय किस प्रकार दिया है ?
उत्तर — गुरु विश्वामित्र राम से कहते हैं राम! देखो ये मिथिला नरेश राजा जनक है जिनका यशोगान चारों तरफ फैला हुआ है ।। इन्होंने दानवीरता तथा युद्धवीरता द्वारा सारी पृथ्वी को अपने वश में कर लिया है ।। वेद के छः, राज्य के सात और योग के आठ अंगों से उत्पन्न सिद्धि के द्वारा इन्होंने तीनों लोकों के भोग प्राप्त कर लिए हैं ।। ये महाराज जनक महान् वेद विद्वान होने के साथ-साथ राजोचित ऐश्वर्य से भी संपन्न है ।। इनमें विद्या और ऐश्वर्य का पूर्ण योग है ।। अस्तु, राजा में जितने गुण होने चाहिए, वे सब इनमें हैं, अपितु अधिक ही है अर्थात् ये राजा होते हुए भी पूर्ण रूप से योगी हैं ।।

3 — गुरु विश्वामित्र ने राजा जनक को भूपति क्यों कहा ?
उत्तर — गुरु विश्वामित्र ने राजा जनक जी को इसलिए भूपति कहा है क्योंकि केवल उन्होंने ही इस नाम को यथार्थ रूप में सार्थक किया है ।। उन्होंने ही पृथ्वी के गर्भ से एक कन्या (सीता) उत्पन्न किया है ।। पति वही है, जो स्त्री से सन्तान उत्पन्न करे ।। सीता जैसी पुत्री का जन्म पृथ्वी से होने के कारण ही वह भूपति कहलाएँ ।।

काव्य-सौन्दर्य से संबंधित प्रश्न

1 — “सोभित मंचन …………………………….देखन आई॥”पंक्तियों में प्रयुक्त छन्द का नाम बताइए ।।
उत्तर — प्रस्तुत पंक्तियों में सवैया छन्द प्रयोग हुआ है ।।
2 — “केशव ये मिथिलाधिप………………………………योगमयी है॥” पंक्तियों में प्रयुक्त रस तथा अलंकार का नाम बताइए ।।
उत्तर — प्रस्तुत पंक्तियों में शान्त रस तथा रूपक और श्लेष अलंकार है ।।
3 — “सब छत्रिन …………………………….ज्योति जगै॥”पंक्तियों में प्रयुक्त छन्द का नाम लिखिए ।।
उत्तर — प्रस्तुत पंक्तियों में विजय छन्द प्रयुक्त हुआ है ।।
4 — “ब्रज तें कठोर ………………………………….कैसे ल्यावई॥”पंक्तियों में निहित छन्द का नाम लिखिए ।।
उत्तर — प्रस्तुत पंक्तियों में दंडक छन्द निहित है ।।
5 — “प्रथम टंकोर …………………………………………………………..ब्रह्मांड को ।।”पंक्तियों का काव्य-सौन्दर्य स्पष्ट कीजिए ।।
उत्तर — काव्य सौन्दर्य- (1) यहाँ धनुष की टंकार के व्यापक प्रभाव का वर्णन हुआ है ।। (2) भाषा- ब्रज, (3) छन्द- दंडक, (4) गुण- ओज, (5) अलंकार- अनुप्रास, विरोधाभाष और सहोक्ति ।।

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