UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 9 प्रेम-माधुरी, यमुना-छवि (भारतेन्दु हरिशचन्द्र) free solution

UP Board Solutions for Class 11 Samanya Hindi काव्यांजलि Chapter 9 प्रेम-माधुरी, यमुना-छवि (भारतेन्दु हरिशचन्द्र)

class 11 hindi solution
UP Board Class 11 Samanya hindi chapter 4

प्रेम-माधुरी, यमुना-छवि (भारतेन्दु हरिशचन्द्र)



1 — भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी का जीवन परिचय देते हुए हिन्दी साहित्य में इनके योगदान पर प्रकाश डालिए ।।


उत्तर— कवि परिचय- प्रसिद्ध कवि होने के साथ ही भारतेन्दु हरिश्चन्द्र कुशल पत्रकार, नाटककार, आलोचक, निबन्धकार के रूप में भी प्रसिद्ध हैं ।। सेठ अमीचन्द के वंश में उत्पन्न हुए भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितम्बर, 1850 ई० में काशी में हुआ था ।। इनके पिता का नाम गोपालचन्द्र गिरिधरदास था ।। पाँच वर्ष की अवस्था में ही ये माता की छत्रछाया से वंचित हो गए ।। सात वर्ष कीअवस्था में एक दोहा लिखकर इन्होंने अपने पिता को सुनाया, जिससे प्रसन्न होकर पिता ने इन्हें महान् कवि होने का आशीर्वाद दिया ।। जब इनकी आयु दस वर्ष थी तब इनके पिता इस संसार से विदा हो गये ।। इन्होंने घर पर रहकर मराठी, बंग्ला, संस्कृत तथा हिन्दी आदि भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया ।।
इसके बाद इन्होंने क्वीन्स कॉलेज में प्रवेश लिया, किन्तु काव्य-रचना में रुचि के कारण इनका मन अध्ययन में नहीं लगा ।। इन्होंने कॉलेज छोड़ दिया ।। 13 वर्ष की अवस्था में मन्नो देवी से इनका विवाह हुआ ।। भारतेन्दु जी युग प्रवर्तक साहित्यकार थे ।। सन् 1868 ई० से 1900 ई० तक की अवधि में साहित्य क्षेत्र में इनके महत्वपूर्ण योगदान के कारण इस अवधि को ‘भारतेन्दु युग’ कहा गया ।। भारतेन्दु जी ने समाज में व्याप्त कुरीतियों व विसंगतियों पर व्यंग्य बाणों का प्रहार किया ।। कविता व नाटक के क्षेत्र में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा ।। अत्यधिक उदार व दानशील होने के कारण इनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो गयी और ये ऋणग्रस्त हो गए ।। हर सम्भव प्रयास के बाद भी ये ऋण-मुक्त नहीं हो पाए ।। साथ ही इन्हें ‘क्षय रोग’ ने घेर लिया, जिसके चलते 6 जनवरी, सन् 1885 ई० को 34 वर्ष 4 मास की अल्पायु में इनका निधन हो गया ।।

हिन्दी साहित्य में स्थान- गद्यकार के रूप में भारतेन्दु जी को हिन्दी गद्य का जनक’ माना जाता है तो काव्य के क्षेत्र में उनकी कृतियों को उनके युग का दर्पण ।। भारतेन्दु जी की विलक्षण प्रतिभा के कारण ही इनको ‘युग-प्रवर्तक साहित्यकार’ के रूप में जाना जाता है ।।


2 — भारतेन्दु हरिशचन्द्र जी की रचनाओं का उल्लेख कीजिए ।।
उत्तर— भारतेन्दु जी की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं
काव्य कृतियाँ- भारत-वीणा, वैजयन्ती, प्रेम-सरोवर, दान-लीला, प्रेम-मालिका, कृष्ण-चरित्र, प्रेम-तरंग, प्रेम-माधुरी, प्रेमाश्रु-वर्षण, सतसई शृंगार, प्रेम-प्रलाप, प्रेम-फुलवारी ।।
नाटक- पाखण्ड विडम्बनम, प्रेमजोगिनी, धनंजय विजय, सत्य हरिश्चन्द्र, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, श्रीचन्द्रावली, भारतदुर्दशा, अंधेर नगरी, नीलदेवी, विद्या-सुन्दर, रत्नावली, मुद्राराक्षस, कर्पूर मंजरी, भारत-जननी, विषस्य विषमौषधम्, दुर्लभबन्धु, सती-प्रताप ।।
जीवनी- सूरदास, महात्मा मुहम्मद, जयदेव ।। उपन्यास- पूर्ण प्रकाश और चन्द्रप्रभा इनके द्वारा रचित उपन्यास हैं ।।
पत्र-पत्रिकाएँ (सम्पादन)- हरिश्चन्द्र-चन्द्रिका, हरिश्चन्द्र मैगजीन (हरिश्चन्द्र मैगजीन का नाम आठ अंकों के बाद हरिश्चन्द्र-चन्द्रिका हो गया था), कवि-वचन-सुधा ।।
इतिहास व पुरातत्व सम्बन्धी कृतियाँ- रामायण का समय, कश्मीर-कुसुम, चरितावली महाराष्ट्र देश का इतिहास, बूंदी का राजवंश, अग्रवालों की उत्पत्ति ।।
यात्रा-वृत्तान्त- लखनऊ की यात्रा, सरयू पार की यात्रा ।।
निबन्ध संग्रह- परिहास-वंचक, दिल्ली दरबार दर्पण, लीलावती, सुलोचना, मदालसा ।।

3 — भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी की भाषा शैली की विशेषताएँ बताइए ।।

उत्तर— भाषा-शैली- भातरेन्दु हरिश्चन्द्र अनेक भारतीय भाषाओं में कविता करते थे, किन्तु ब्रजभाषा पर इनका विशेष अधिकार था ।। ब्रजभाषा में इन्होंने अधिकतर शृंगारिक रचनाएँ की हैं ।। भारतेन्दु जी के काव्य में प्रकृति के रमणीक चित्र उपलब्ध होते हैं ।। भारतेन्दु जी ने श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का बहुत ही सुन्दर चित्रण किया है ।। भारतेन्दु जी ने अपने काव्य में शिष्ट, सरल एवं माधुर्य से परिपूर्ण ब्रजभाषा का प्रयोग किया है ।। प्रचलित शब्दों, लोकोक्तियों तथा मुहावरों आदि के यथास्थान प्रयोग से भाषा में प्रवाह उत्पन्न हो गया है ।। इन्होंने अपनी रचनाओं में कवित्त, सवैया, लावनी, चौपाई, दोहा, छप्पय तथा कुण्डलिया आदि छन्दों को अपनाया है ।। भारतेन्दु जी की शैली इनके भावों के अनुकूल है ।। इन्होंने मुख्य रूप से मुक्तक शैली को अपनाया है और उसमें अनेक नवीन प्रयोग करके अपनी मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया है ।। लोकगीतों की शैली में भी भारतेन्दु जी ने राष्ट्रीयता से परिपूर्ण काव्य की रचना की है और इसमें वे पूर्णतया सफल भी रहे हैं ।। भारतेन्दु जी के काव्य में अलंकारों का सहज प्रयोग हुआ है ।। इन्होंने अलंकारों को अपने काव्य के साधन रूप में ही अपनाया है, साध्य-रूप में नहीं; अर्थात् अलंकारों की साधना करना इनका लक्ष्य नहीं था ।।

व्याख्या संबंधी प्रश्न

1 — निम्नलिखित पद्यावतरणों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए

(क) मारगप्रेम को……………………………..कौन बिथा है ॥
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘काव्यांजलि के ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र’ द्वारा रचित काव्य ग्रन्थ ‘भारतेन्दु ग्रन्थावली’ से ‘प्रेम माधुरी’ नामक शीर्षक से उद्धृत है ।।
प्रसंग-इस पद में प्रेम के मार्ग पर चलने से होने वाली निन्दा और कष्टों का वर्णन करते हुए ब्रजबाला अपनी सखी से कहती है

व्याख्या-हे सखी! प्रेम के मार्ग को भला कौन समझ सकता है ? यह तो जीवन के कटु यथार्थ (वास्तविकता) के सदृश ही कठोर और कष्टकर है ।। बार-बार अपनी कथा लोगों को सुनाने से भी क्या लाभ; क्योंकि इससे तो बदनामी के अतिरिक्त और कुछ भी हाथ आने वाला नहीं; अर्थात् जो यह प्रेम-कहानी सुनेगा, वह सहानुभूति दिखाना तो दूर, मुझे ही बुरा कहेगा और संसार में मेरी बदनामी भी करेगा ।। मैं इस बात को भली प्रकार समझ गयी हूँ कि इस प्रेम-व्यथा से छुटकारा पाने के सारे उपाय व्यर्थ हैं अत: चुपचाप इसे सहते जाना भी उत्तम है ।। ) लगता है ब्रज के सारे लोग बावले हो गए हैं, जो मुझसे व्यर्थ ही बार-बार मेरी पीड़ा के विषय में पूछते हैं कि मुझे क्या कष्ट है (भला प्रेम-पीड़ा भी क्या किसी पर प्रकट करने की वस्तु है) ।। मैं अत्यन्त दुःखी हूँ ।। इस दुःख को कह भी नहीं सकती हूँ और सहना भी मुश्किल हो रहा है ।।

काव्य-सौन्दर्य- (1) प्रेम-पीड़ा को भुक्तभोगी ही जान सकता है ।। अन्य लोग तो उसका उपहार ही करते हैं ।। इसलिए सच्चे प्रेमी उसे प्रकट न करके चुपचाप सहते हैं ।। (2) भाषा- ब्रज ।। (3) छन्द- सवैया ।। (4) रस- विप्रलम्भ श्रृंगार ।। (5) शब्द-शक्तिलक्षणा ।। (6) गुण- माधुर्य ।। (7) अलंकार- अनुप्रास, रूपक ।। (8) भावसाम्य- किसी कवि ने कहा भी है
कहिबौ को व्यथा, सुनिबै को हँसी ।।
को दया सुन कै डर आनतु है ।।

(ख) रोकहिं जो तौ……………………………..हमै समुझाइए ॥
सन्दर्भ- पहले की तरह ।।
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में नायिका (गोपिका) परदेश-गमन के लिए प्रस्थान करने वाले अपने पति से अपने हृदय के प्रेम-भाव की चतुरतापूर्ण अभिव्यक्ति करती है ।।


व्याख्या- गोपिका का पति परदेश-गमन के लिए प्रस्थान करने वाला है ।। गोपिका उससे कहती है कि यदि मैं आपको परदेश जाने से रोकती हूँ तो अमंगल होगा (यह मान्यता है कि प्रस्थान करने वाले व्यक्ति को रोकने-टोकने से उसका अमंगल होता है) और यदि मैं कहती हूँ कि प्रिय जाओ, तो मेरे प्रेम का नाश होगा; अर्थात् इससे आप यही समझेंगे कि आपके लिए मेरे हृदय में प्रेम नहीं है ।। यदि मैं इस समय कहती हूँ कि “प्रिय मत जाओ तो यह आप पर प्रभुता प्रदर्शित करने वाले आदेश के समान होगा; अर्थात् आप यह समझेंगे कि मैं आप पर अपनी प्रभुत्ता का प्रदर्शन कर रही हूँ और यदि मैं कुछ भी न कहूँ तो भी प्रेम का अन्त हो जाएगा; क्योंकि आप समझेंगे कि मेरे हृदय में आपके लिए कोई मोह या प्रेम-भावना नहीं है ।। हे प्रियतम! यदि मैं आपसे कहूँ कि मैं आपके बिना जी नहीं सकती तो आपको इस पर विश्वास कैसे होगा ? अतः आप ही समझाइए कि आपके इस प्रस्थान के समय मैं आपसे क्या कहूँ?’

काव्य-सौन्दर्य- (1) नायिका का कथन कि ‘मैं अपनी प्रभुता व्यक्त नहीं कर सकती ।। ‘ से उसका समर्पण भाव व्यक्त हुआ है ।। (2) अन्तिम पंक्तियों में नायिका के भोलेपन की सुन्दर व्यंजना हुई हैं; क्योंकि वह जानेवाले से ही पूछती है कि वह ऐसे समय पर उससे क्या कहे ।। (3) भाषा- ब्रजभाषा ।। (4) अलकार- अनुप्रास ।। (5) रस-शृगार ।। (6) शब्दशक्ति – लक्षणा ।। (7) गुणमाधुर्य ।। (8) छन्द- सवैया ।।

(ग) आजुलौं जौ. ………………………………………………………………………….कंठ लगावै ॥

सन्दर्भ- पहले की तरह ।।
प्रसंग- प्रस्तुत भावपूर्ण छन्द में गोपियों को श्रीकृष्ण के विरह में मरणासन्न दिखाया गया है ।। अपनी मृत्यु से पहले एक बार गोपियों को श्रीकृष्ण से मिलन की उनकी उत्कट अभिलाषा है ।।

व्याख्या- गोपियाँ श्रीकृष्ण से कहती हैं कि प्रिय! जब से तुम यहाँ से गये हो, तब से आज तक नहीं मिले ।। किन्तु इससे क्या; हम तो हर प्रकार से तुम्हारी हैं ।। सब लोग तुम्हारी प्रेमिका के रूप में ही जानते हैं ।। तुम हमें नहीं मिल पाये, इसका हम तुम्हें कोई उलाहना नहीं दे रही हैं सब अपने-अपने भाग्य का फल भोगते हैं ।। आपसे भेंट होना हमारे भाग्य में ही नहीं था ।। आपका इसमें क्या दोष है ? हमारे भाग्य में यह बिछोह ही लिखा था, फिर उलाहना काहे का ।। हे प्रिय! जो हुआ सो हुआ; किन्तु अब तो हमारे प्राण शरीर छोड़कर चल देने को तत्पर हैं ।। अन्त समय में हम तुमसे एक बात कहती हैं-हे प्रिय! दुनिया की यह परम्परा है कि जब कोई विदा होता है तो सब लोग उसे गले लगाकर विदा करते हैं (अर्थात् अब हम भी चलने वाली हैं, अब तुम भी हमें गले से लगा लो) ।। आशय यह है कि जीते जी तो आपने स्नेह नहीं किया, परन्तु मरते समय ही मिल जाइए ।। काव्य सौन्दर्य- (1) गोपियों ने जग की रीति का स्मरण कराते हुए बड़ी चतुराई से श्रीकृष्ण से मिलने की प्रार्थना की है ।। (2) प्रस्तुत छन्द में गहन भावानुभूति की मार्मिक व्यंजना हुई है ।। (3) भाषा- ब्रज ।। (4) छन्द- सवैया ।। (5) रस- शृंगार ।। (6) अलंकार- लोकोक्ति ।।

(घ) तरनि-तनूजा ……………………………………………………………………..सुख लहत ।।
सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘काव्यांजलि’ के ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र’ द्वारा रचित काव्य-ग्रन्थ ‘भारतेन्दु ग्रन्थावली’ से ‘यमुना-छवि’ नामक शीर्षक से उद्धृत है ।।


प्रसंग-इन काव्य पंक्तियों में यमुना नदी की शोभा का सुन्दर व आलंकारिक वर्णन किया गया है ।।
व्याख्या- यमुना के किनारे तमाल के अनेक सुन्दर वृक्ष सुशोभित हैं ।। वे तट पर आगे को झुके हुए ऐसे लगते हैं, मानो यमुना के पवित्र जल का स्पर्श करना चाहते हों अथवा जलरूपी दर्पण में अपनी शोभा देखने के लिए उचक-उचककर आगे झुक गये हैं; अथवा यमुना-जल को परम पवित्र जानकर उसे प्रणाम कर रहे हों, जिससे उन्हें उत्तम फल की प्राप्ति हो सके अथवा वे तट को धूप के ताप से बचाने के लिए साथ सिमटकर खड़े हो गए हैं, जिससे तट पर घनी छाया हो जाए अथवा ये भगवान् कृष्ण के प्रति नमन कर रहे हैं, उनकी सेवा में झुके हुए हैं, जिससे इन्हें देखकर नेत्रों को और मन को बड़ा सुख प्राप्त होता है ।। ये वृक्ष बहुत ही परोपकारी, सुखकारी और दुःखनाशक हैं, इन पंक्तियों में यह भाव ध्वनित हो रहा है ।।

काव्य-सौन्दर्य- (1) यमुना के किनारे खड़े वृक्षों की शोभा का वर्णन किया गया है ।। (2) भाषा- ब्रज ।। (3) छन्द- छप्पय (छ: का छन्द, जिसके प्रथम चार चरण ‘रोला के और अन्तिम दो चरण उल्लास के होते हैं) (4) रस- शृगार ।। (5) शब्द-शक्ति-लक्षणा ।। (6) गुण- माधुर्य ।। (7) अलंकार- अनुप्रास, सन्देह और उत्प्रेक्षा ।।

(ङ) परत चन्द्र………………………….प्रतिबिम्ब लखात है ।।
सन्दर्भ- पहले की तरह ।।
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने यमुना के चंचल जल में पड़ते हुए चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब का सजीव सौन्दर्य बड़े कलात्मक रूप में प्रस्तुत किया है ।।


व्याख्या- यमुना में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब जल के मध्य चमकता हुआ दिखाई पड़ता है ।। वह जब कभी चंचलता के साथ नृत्य करने लगता है, तब वह बड़ा मनभावन लगता है; अर्थात् जब पानी की लहर चंचल होकर हिलती है, तब चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब भी हिलता हुआ और नाचता हुआ दिखाई पड़ता है ।। चन्द्रमा के इस प्रतिबिम्ब की शोभा ऐसी लगती है, मानो विष्णु (जल में वास करने वाले नारायण) के दर्शन करने के लिए चन्द्रमा जल में वास करता हुआ शोभा पा रहा है अथवा चन्द्रमा इस भाव से आकाश से यमुना-जल में उतर आया है कि जब कृष्ण यमुना-तट पर विहार करने आएँगे, तब उनके दर्शन प्राप्त हो जाएँगे अथवा चन्द्रमा की छवि ऐसी शोभा पा रही है, जैसे लहरें अपने हाथ में चन्द्रमा का प्रतिबिम्बरूपी दर्पण लिये हुए हों अथवा रास-क्रीडा में रमे हुए श्रीकृष्ण के चमकते हुए मुकुट की कान्ति ही इस चन्द्र-बिम्ब के रूप में जल में दिखाई दे रही है अथवा चन्द्रमा के रूप में यमुना के हृदय में परम कान्तिवान् भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति बसी हुई है, यह उसी का प्रतिबिम्ब मालूम पड़ रहा है ।।
काव्य सौन्दर्य- (1) यहाँ कवि ने प्रकृति का आलम्बन रूप में चित्रण किया है ।। 2 — जल में पड़ते चन्द्र-प्रतिबिम्ब की चंचल छवि विविध कल्पनाओं के द्वारा प्रस्तुत की गई है ।। (2) भाषा- ब्रज ।। (3) छन्द- छप्पय ।। (4) रस- शृंगार ।। (5) अलंकार अनुप्रास, उत्प्रेक्षा, सन्देह तथा मानवीकरण ।।

2 — निम्नलिखित सूक्तिपरक पंक्तियों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए


(क) प्यारेजू है जग की यह रीति बिदा के समै सबकंठ लगावै ॥
सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र’ द्वारा रचित ‘प्रेम माधुरी’ शीर्षक से अवतरित है ।।
प्रसंग- इस सूक्ति में भारतेन्दु जी ने विदाई-वेला के समय की लोक-परम्परा के माध्यम से नायक कृष्ण को उलाहना दिया है ।। व्याख्या- विरहिणी नायिका विरहाग्नि से संतप्त होकर मरणासन्न अवस्था को प्राप्त हो गई है ।। अपनी इस अन्तिम अवस्था में वह अपने निष्ठुर प्रियतम का स्मरण करती हुई कहती है कि अब तो मैं इस संसार से विदा ले रही हूँ; अत: मुझे अपने गले से लगाकर यहाँ से विदा करो; क्योंकि यह लोक-परम्परा है कि लोग एक-दूसरे के गले मिलकर उसे विदाई देते हैं ।।

(ख) पिय प्यारे तिहारे निहारे बिना अँखिया दुखियाँ नहीं मानती हैं ।।
सन्दर्भ- पहले की तरह ।।
प्रंसग- प्रस्तुत सूक्ति में गोपी अपने प्रेम की निश्छल अभिव्यक्ति कर रही है ।।
व्याख्या- गोपी उद्धव से कहती है कि हे उद्धव यह बात तो हम भी भली-भाँति जानती हैं, आपका निर्गुण ब्रह्म इस सम्पूर्ण संसार में व्याप्त है, किन्तु हम क्या करें, हमारी ये आँखें हमारा कहा नहीं मानती हैं ।। तुम प्रियतम श्रीकृष्ण से जाकर हमारा यह सन्देश कह दो कि हे प्यारे! तुम्हारी गोपियों की आँखें तुम्हें देखे बिना नहीं मानती हैं ।। तुम्हारे दर्शन के अभाव में वे प्रत्येक क्षण दुःखी रहती हैं ।।

(ग) मनु जुग पच्छ प्रतच्छ होत मिटि जात जमुन जल ।।
सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘काव्यांजलि’ में संकलित ‘भारतेन्दु हरिश्चन्द्र’ द्वारा रचित ‘यमुना-छवि’ शीर्षक से अवतरित हैं ।।
प्रसंग- प्रस्तुत सूक्ति में कवि ने यमुना नदी के जल में चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब का अलंकारपूर्ण वर्णन किया है ।।

व्याख्या- कवि कहते हैं कि यमुना के चंचल जल में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब कभी तो दिखाई देता है और कभी नहीं ।। इससे ऐसा प्रतीत होता है, मानो यमुना के जल में दोनों पक्ष (कृष्ण और शुक्ल) मिल गए हैं; और उनका भेद समाप्त हो गया है अर्थात् चन्द्रमा के छिप जाने पर लगता है कि कृष्ण पक्ष आ गया है और निकल आने पर लगता है कि कृष्ण पक्ष समाप्त हो गया है और शुक्ल पक्ष आ गया है ।।

अन्य परीक्षोपयोगीप्रश्न

1 — ‘प्रेम-माधुरी’ कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखिए ।।
उत्तर— ‘प्रेम-माधरी’ कविता भारतेन्द हरिश्चन्द्र द्वारा रचित ‘भारतेन्द ग्रन्थावली’ से संकलित है ।। इस शीर्षक में कवि ने कष्ण के विरह में व्याकुल गोपियों की विरह वेदना का वर्णन किया है ।। एक गोपी अपनी सखी से कहती हैं कि प्रेम के मार्ग एवं उसके वास्तविक रूप को संसार में कौन समझ पाया है बार-बार अपनी कथा दूसरों से कहने का भी कोई लाभ नहीं है क्योंकि इससे तो केवल बदमानी के अतिरिक्त कुछ भी हाथ नहीं आने वाला ।। मेरा मन यह भली-भाँति जानता है कि इस प्रेम-व्यथा से छुटकारा पाने के सारे उपाय व्यर्थ है इसलिए इसे चुपचाप सहना ही उत्तम है ।। गोपी कहती है कि हे सखी मुझे तो लगता है कि ब्रज के सारे लोग बावले हो गए हैं, जो मुझसे व्यर्थ में ही मेरी पीड़ा का कारण पूछते रहते हैं कि मुझे क्या दुःख है ।। वह गोपी जिसका पति परदेश-गमन के लिए प्रस्थान करने वाला है वह अपने भावों को प्रदर्शित करते हुए उससे कहती है कि यदि मैं आपको परदेश जाने से रोकती हूँ तो अमंगल होगा क्योंकि यात्रा के लिए प्रस्थान करने वालो को टोकने से उसका अमंगल होता है ऐसी मान्यता है, परन्तु यदि मैं कहती हूँ कि प्रिय आप जाओ, तो मेरे प्रेम का नाश होगा ।। यदि मैं इस समय कहती हूँ कि ‘प्रियतम मत जाओ तो आप समझेंगे कि मैं आप पर अपनी प्रभुता प्रदर्शित कर रही हूँ, और यदि कुछ न कहूँ तो भी प्रेम का अन्त हो जाएगा ।। इसलिए हे प्रियतम! आप ही बताइए कि मैं आपसे कैसे कहूँ कि मैं आपके बिना जी नहीं सकती और आपके प्रस्थान के समय आपको क्या कहूँ ?

गोपियाँ श्रीकृष्ण से कहती हैं कि जब से तुम गोकुल से गए हो, तब से आज तक तुम हमसे मिलने नहीं आए परन्तु इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हम तो पूर्ण रूप से तुम्हारी है ।। हम आपको उलाहना नहीं देते क्योंकि सब अपने-अपने भाग्य का फल भोगते हैं जब हमारे भाग्य में आपसे मिलना लिखा ही नहीं तो आपका क्या दोष ।। हे प्रिय, जो होना था हो चुका परन्तु अब तो हमारे प्राण हमारा शरीर छोड़कर जाने को तैयार है ।। इसलिए हम आपको सुनाते हुए कह रही हैं कि दुनिया की यह परम्परा है कि विदा होकर जाते हुए को गले से लगाकर विदा किया जाता है ।। गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव हमें पता है कि परमात्मा जल-थल सभी जगह विद्यमान है परन्तु हमें तो नदंलाल श्रीकृष्ण के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता ।। इसलिए हम तुम्हारे ज्ञानमार्ग को हम कोई महत्व नहीं देती है ।। हमारा हृदय श्रीकृष्ण के बिना कही भी अनुरक्त नहीं है इसलिए हे उद्धव तुम श्रीकृष्ण से जाकर कह देना कि गोपियाँ और कुछ नहीं जानती और हमारी ये दु:खी आँखे श्रीकृष्ण से मिलन अर्थात् दर्शन के बिना मानने वाली नहीं हैं ।।

2 — ‘यमुना-छवि’ कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखिए ।।

उत्तर— ‘यमुना-छवि’ कविता में कवि भारतेन्दु जी ने सूर्य-पुत्री यमुना नदी के सौन्दर्य का वर्णन किया है ।। कवि कहते हैं कि यमुना नदी के तट पर तमाल के सुन्दर वृक्ष किनारे की ओर झुके हुए ऐसे सुशोभित हो रहे हैं, मानों वे जल का स्पर्श करने के लिए झुक गए हो ।। ऐसा लग रहा है कि वे जल में झुक-झुककर अपनी शोभा देख रहे हो या जल को देखकर पवित्र जल के लोभ में उसे प्रणाम कर रहे हों, ऐसा लगता है जैसे वे अपने ताप को दूर करने के लिए सिमटकर किनारे पर एकत्र हो गए हैं ।। और भगवान की सेवा के लिए झुक गए है जिसे देखकर हमारे नेत्रों को सुख प्राप्त हो रहा है ।। कवि कहते हैं कि पूर्णिमा की रात में जब चन्द्रमा की किरणें नदी के जल में पड़ती है तो ऐसा प्रतीत होता है कि इन किरणों ने पृथ्वी से आकाश तक तम्बू लगा दिया हो ।। उस समय उनका उज्जवल प्रकाश दर्पण-सा प्रतीत होता है ।। यमुना की सुन्दरता को देखकर तन, मन और नेत्रों को आनन्द मिलता है ।।

इस समय यमुना नदी के जल की सुन्दरता का वर्णन कोई कवि नहीं कर सकता ।। ऐसे समय नभ और पृथ्वी की आभा एक समान रहती है ।। जब चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब यमुना के जल में पड़ता हैं तो यमुना की चंचल लहरें नृत्य करती हुई प्रतीत होती है उस समय ऐसा लगता है जैसे चन्द्रमा स्वयं जल में निवास करने वाले भगवान विष्णु के दर्शन करने के लिए जल में उतर गया हो ।। अथवा यह सोचकर यमुना के जल में उतर गया हो कि भगवान श्रीकृष्ण यमुना के किनारे रास रचाने, या स्नान करने के लिए आएँगे, तब वह उनके सौन्दर्य के दर्शन कर सकेगा ।। ऐसा लगता है कि तरंगों ने अपने हाथ में दर्पण ले लिया हो और यमुना के किनारे रास रचाने वाले श्रीकृष्ण के मुकुट की आभा ही चन्द्रबिम्ब के रूप में यमुना-जल में दिखाई पड़ रही है ।। कवि कहते हैं कि हवा चलने के कारण यमुना नदी के जल में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब कभी सैकड़ों की संख्या में दिखाई देता है और कभी छिप जाता है ।।

हवा के कारण चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब ऐसा लग रहा है जैसे प्रेम से परिपूर्ण होकर यमुना जल में लोटता हुआ घूम रहा हों अथवा तरंगरूपी रस्सियों के कारण हिंडोले में झूलता लगता है या ऐसा लगता है कि किसी बालक की पतंग आकाश में इधर-उधर दौड़ रही है या ऐसा लगता है कि कोई ब्रजबाला जल-विहार कर रही है ।। यमुना के जल पर पूर्णिमा के चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब पड़ने से ऐसा आभास होता है कि मानो चन्द्रमा दोनों पक्षों (कृष्ण व शुक्ल पक्ष दोनों) में उदित होकर यमुना के जल में विलीन हो गया है तथा चन्द्रमा तारों के समूहों को ठगने का प्रयास कर रहा है या यमुना अपने जल में जितनी अधिक लहरें उत्पन्न करती है चन्द्रमा उतने ही रूप धरकर उनसे मिलने को दौड़ रहा है अथवा जल में चाँदी की चकई चल रही है अथवा जल की फुहारें उठ रही है अथवा चन्द्रमारूपी पहलवान अनेक प्रकार से कसरत कर रहा है ।। यमुना के जल में कहीं राजहंस कूजते हुए विहार कर रहे हैं तो कहीं कबूतरों का समूह स्नान कर रहा है, कहीं पर कारण्डव हंस उड रहे हैं तो कहीं पर जल मुर्गा दौड़ रहा है, कहीं पर चक्रवाकों के जोड़े विहार करते हैं तो कही बगुला ध्यान लगाए खड़ा है, कहीं पर तोते और कोयल जल पी रहे हैं कहीं भ्रमर गूंज रहे है कहीं तट पर मोर नाच रहे हैं ।। सब पक्षी सब प्रकार का सुख पाते हुए यमुना तट की शोभा को बढ़ा रहे हैं ।।

काव्य-सौन्दर्य से संबंधित प्रश्न


1 — “मारगप्रेम………………………….बिथा है ।। “पंक्तियों में निहित रस व उसका स्थायी भाव लिखिए ।।
उत्तर— प्रस्तुत पद में विप्रलम्भ शृंगार है जिसका स्थायी भाव रति है ।।
2 — “तरनि-तनूजा तट तमाल तरूवर बहु छाए ।। “पंक्ति में निहित अलंकार का नाम लिखिए ।।
उत्तर— इस पंक्ति में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है ।।
3 — “आजु लौं जौ………………………………………कंठ लगावैं ।। “पंक्तियाँ किस छन्द पर आधारित हैं ?
उत्तर— प्रस्तुत पंक्तियाँ सवैया छन्द पर आधारित हैं ।।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top