UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 3 आत्मज्ञ एवं सर्वज्ञः

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 3 आत्मज्ञ एवं सर्वज्ञः

पञ्चमः पाठः आत्मज्ञ एवं सर्वज्ञः

निम्नलिखित गद्यावतरणों का ससन्दर्भ हिन्दी में अनुवाद कीजिए


1 . याज्ञवल्कयो . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .उवाच-नेति ।
[उवाच = बोले, उद्यास्यन अहम् अस्मात् = (मैं) ऊपर जाने वाला हूँ (इस गृहस्थाश्रम को छोड़कर ऊपर के आश्रम अर्थात् संन्यासाश्रम में जाने वाला हूँ), अस्मात् स्थानात् = इस स्थान से (गृहस्थाश्रम से), ततस्तेऽनया > तत: + ते + अनया = तो तुम्हारा इस, कात्यायन्या = कात्यायनी नामक दूसरी (पत्नी)से, विच्छेदम् = सम्पत्ति का बँटवारा, यदीयम् > यदि + इयम् = यदि यह, तेनाहममृता > तेन + अहम + अमृता = उससे मैं अमर]
सन्दर्भ-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘आत्मज्ञ एवं सर्वज्ञः’ नामक पाठ से उद्धृत है ।
अनुवाद- (ऋषि) याज्ञवल्क्य ने (अपनी पत्नी) मैत्रेयी से कहा- “मैत्रेयी! मैं इस स्थान (गृहस्थाश्रम) से ऊपर (संन्यासाश्रम में) जाने वाला हूँ, तो मैं तेरा इस (अपनी दूसरी पत्नी) कात्यायनी के साथ विच्छेद (सम्पत्ति का बँटवारा) कर दूँ । ” मैत्रेयी बोली- “यदि इस धन से सम्पन्न सारी पृथ्वी मेरी हो जाए तो क्या मैं उससे अमर हो सकती हूँ ?” याज्ञवल्क्य ने कहा-“नहीं । “

2- यथैवोपकरणवतां . . . . . . . . . . . . . . . . .ते अमृतत्वसाधनम् ।
[यथैवोपकरणवततां > यथा + एव + उपकरणवताम् = जैसा ही साधनसम्पन्न या धनवानों का, नाशास्ति > न + आशा + अस्ति = आशा नहीं है, भगवान् = आप, केवलम् = अकेला, अमृतत्वस्य = अमरता की, व्याख्यास्यामि = व्याख्या करूँगा; समझाऊँगा]

सन्दर्भ- पूर्ववत् UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 2 संस्कृतभाषायाः महत्त्वम्

अनुवाद- “जैसा साधनसम्पन्नों (धनिकों) का जीवन होता है, वैसा ही तुम्हारा भी जीवन होगा । धन से अमरता की आशा नहीं है । ” (जैसे सभी धनवान् लोगों का अध्यात्मक की ओर ध्यान ही नहीं है, वैसी ही तुम भी हो । ) (तब) उसे मैत्रेयी ने कहा“जिससे मैं अमर न हो सकूँ, उसे (लेकर) क्या करूँगी ?” भगवान् (आप) जो केवल अमरता (की प्राप्ति) का साधन जानते हो, वही मुझे बताएँ” याज्ञवल्क्य बोले-“तू (पहले भी) मेरी प्रिया रही है(मुझे अच्छी लगने वाली बात कह रही है) । आ बैठ, तुझसे अमृतत्व (अमरता-प्राप्ति) के साधन की व्याख्या करूँगा । “

३- याज्ञवल्क्य उवाच . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .विदित भवति ।

[कामायः = कामना के लिए (इच्छापूर्ति के लिए), जाया = पत्नी, निदिध्यासितव्यश्च = ध्यान करने योग्य । ]
सन्दर्भ- पूर्ववत्
अनुवाद- याज्ञवल्क्य बोले- “अरी मैत्रेयी! पति की इच्छापूर्ति के लिए (नारी को) पति प्रिय नहीं होता, अपनी ही इच्छापूर्ति के लिए पति प्रिय होता है । (अपने स्वार्थ से ही वह पति को चाहती अथवा प्रेम करती है । ) अरी न ही, पत्नी की इच्छापूर्ति के लिए (पति को) पत्नी प्रिय होती है, (वरन्) अपनी इच्छापूर्ति के लिए पत्नी प्रिय होती है । न ही अरे, पुत्र या धन की कामना से पुत्र या धन प्रिय होता है, (वरन्) अपनी ही कामना (पूर्ति) के लिए सब प्रिय होते हैं । ” (आशय यह है कि मनुष्य जो कुछ भी कामना इस संसार में करता है, वह दूसरों के सुख के लिए नहीं, अपितु अपने ही सुख के लिए, अपनी ही आत्मा की तृप्ति के लिए करता है । मनुष्य का एकमात्र लक्ष्य दूसरे किसी को सुख देना नहीं, केवल अपने को ही सुख देना है । इस प्रकार आत्मतृप्ति के लिए ही पति, पत्नी पुत्र, सम्बन्धी का हित चाहना अथवा उन्हें सुख देना नहीं, केवल अपने को ही सुख देना है । इस प्रकार आत्म-तृप्ति के लिए ही पति, पत्नी, पुत्र, सम्बन्धी आदि प्रिय होते हैं । ) इसलिए हे मैत्रेयी! आत्मा ही देखने योग्य है, देखने के लिए (अर्थात् यदि देखना हो तो उसके लिए वह) सुनने योग्य है, मनन करने योग्य है और ध्यान करने योग्य है । निश्चय ही आत्म-दर्शन से (आत्मा के स्वरूप के ज्ञान से) इस सबका ज्ञान हो जाता है । “

निम्नलिखित सूक्तिपरक पंक्तियों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए

1 . आत्मनस्तु वै कामायः पतिः प्रियो भवति ।
सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘आत्मज्ञ एवं सर्वज्ञः’ नामक पाठ से उद्धृत है ।

प्रसंग- अपने पति याज्ञवल्क्य से जब मैत्रेयी अमरता-प्राप्ति के साधनों के विषय में पूछती है, तब याज्ञवल्क्य उसे उसके विषय में बताना आरम्भ करते हैं । इसी सन्दर्भ में यह सूक्ति कही गयी है ।


व्याख्या- याज्ञवल्क्य मैत्रेयी से कहते हैं कि संसार में प्रत्येक व्यक्ति को जो कुछ भी प्रिय लगता है, वह उस व्यक्ति या वस्तु के हित की दृष्टि से नहीं, अपितु केवल अपने हित या सुख की दृष्टि से ही प्रिय लगता है । आशय यह है कि पुत्र, पत्नी, धन, मित्र आदि जो कुछ भी पाना चाहते हैं, वह इसीलिए नहीं कि हम पुत्र, पत्नी मित्र आदि को सुख देना चाहते हैं, उनका प्रिय करना चाहते हैं, अपितु केवल अपना ही प्रिय करना चाहते हैं, स्वयं को सुख देना चाहते हैं । उन्हें पाकर हमें सुख मिलता है, इसलिए हम उनके सुख की कामना करते हैं । यदि किसी पत्नी को अपना पति प्रिय लगता है तो इसलिए कि उसमें पत्नी का अपना स्वार्थ छिपा है । वह पति की हित-कामना के लिए उसे प्रेम नहीं करती, वरन् अपने स्वार्थों के लिए करती है । इस प्रकार संसार में प्रत्येक व्यक्ति केवल आत्मसन्तुष्टि के लिए ही विविध पदार्थों की कामना करता है, दूसरों के हितार्थ नहीं । वस्तुतः याज्ञवल्क्य ऋषि का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि “संसार में सब कुछ सबकी कामना के लिए प्रिय नहीं होता, वरन् सब कुछ अपनी कामना के लिए प्रिय होता है । ” अन्यत्र तुलसीदास जी ने कहा है- “तुलसी स्वारथ मीत सब, परमारथ रघुनाथ । “

2- आत्मनः खलु दर्शनेन इदं सर्वं विदितं भवति ।
सन्दर्भ- पूर्ववत्
प्रसंग- प्रस्तुत सूक्ति में याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से अमरता-प्राप्ति के साधन के बारे में बताया है ।

व्याख्या- याज्ञवल्क्य मैत्रेयी से कहते हैं- “व्यक्ति जब आत्मदर्शन कर लेता है, अपने सच्चे स्वरूप को जान लेता है और उसे सभी बातों का सच्चा ज्ञान हो जाता है । वह जाना जाता है कि क्यों उसे कोई वस्तु प्रिय या अप्रिय लगती है । उसे अपना और इस विश्व का, आत्मा का और परमात्मा का भी सच्चा ज्ञान उपलब्ध हो जाता है । तब उसे सासांरिक पदार्थों की निस्सारता और आत्मा की अमरता का बोध हो जाता है और वह माना-जीवन के सच्चे उद्देश्य अर्थात् अमृतत्व की प्राप्ति को ही परम पुरुषार्थ मानकर यत्नवान् होता है । इसलिए मनुष्य के लिए एकमात्र आत्मा ही दर्शनीय, श्रवणीय, मननीय और निदिध्यासान अर्थात् ध्यान करने योग्य है । जो आत्मा को जानता है, वह सब कुछ जानता है । ” प्रस्तुत सूक्ति में याज्ञवल्क्य ने ‘आत्मज्ञ एवं सर्वज्ञः’ की सार्थकता को स्पष्ट किया है । उनके कहने का आशय यह है कि जो व्यक्ति आत्मा के भेद को समझ जाता है, वह इस संसार के मोह-माया, दुःख-सुख से परे हो जाता है; अर्थात् मोक्ष को प्राप्त हो जाता है ।


निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में दीजिए

1 . कः सर्वज्ञः भवति ?
उत्तर— आत्मज्ञानेन साधक सर्वज्ञः भवति ।
2 . मैत्रेयी याज्ञवल्क्यम् किम् अपृच्छत ?
उत्तर— मैत्रेयी याज्ञवल्क्यम् केवलम् अमृतत्त्वसाधनम् अपृच्छत ।
3 . आत्मज्ञानेन साधकः कथम् सर्वज्ञो भवति ?
उत्तर— आत्मज्ञानेन साधक: आत्मदर्शनीय श्रोतव्यं शृणोति, मन्तव्यं मनुते, निदिध्यासितव्यं निदिध्यासति चएवं सः सर्वज्ञो भवति ।
4 . याज्ञवल्क्य: मैत्रेयीं कस्य विषयस्य व्याख्यनां कृतवान् ?
उत्तर— याज्ञवल्क्यः मैत्रेयीं अमृतत्त्वस्य विषस्य व्याख्यां कृतवान् ।
5 . कस्य खलु दर्शनेन इदं सर्वं विदितं भवति ?
उत्तर— आत्मनः खलु दर्शनेन इदं सर्वं विदितं भवति ।
6 . कस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति ?
उत्तर— आत्मनस्तु वैकामाय सर्वं प्रियं भवति ।
7 . वित्तेन कस्य आशान अस्ति ? उत्तर— वित्तेन अमृतत्त्वस्य आशा न अस्ति ।
8 . मैत्रेयी किमुवाच ?
उत्तर— मैत्रेयी उवाच- “येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम् ?”

निम्नलिखित वाक्यों का संस्कृत में अनुवाद कीजिए

1 . याज्ञवल्कयने मैत्रेयी से क्या कहा ?
अनुवाद-याज्ञवल्क्यः मैत्रेयीं किम् अकथयत् ?


2 . पति की कामना के लिए पति प्रिय होता है ।
अनुवाद- पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति ।


3 . अपनी कामना के लिए सब प्रिय होते हैं ।
अनुवाद-आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति ।


4- वृक्ष पर मोर बैठे हैं ।
अनुवाद- वृक्षाणि मयूरः तिष्ठति ।


5 . मैं कल हरिद्वार गया था ।
अनुवाद- अहम् ह्मः हरिद्वारम् अगच्छम् ।


6 . सूर्य प्रतिदिन पूर्व दिशा में उदित होता है ।
अनुवाद- रविः प्रतिदिनं पूर्वदिशायाम् उदेति ।


7 . आत्मदर्शन से यह सब विदित होता है ।
अनुवाद- आत्मदर्शनेन इदं सर्वं विदितं भवति ।


8 . धन से अमरता की आशा नहीं है ।
अनुवाद-वित्तेन अमृतत्वस्य नाशास्ति ।


9 . लोभ पापका कारण होता है ।
अनुवाद-लोभः पापस्य कारणम् भवति ।


10 . कश्मीर अत्यधिक सुन्दर प्रदेश है ।
अनुवाद-कश्मीर: अतीवसुन्दरः प्रदेशः अस्ति ।


1 . निम्नलिखित शब्दों में से सन्धि-विच्छेद करते हुए सन्धिका नाम लिखिए
सन्धि-रूप…………… सन्धि-विच्छेद…………… सन्धिका नाम
मैत्रीयमुवाच …………… मैत्रीयम + उवाच…………… अनुस्वार सन्धि
ततस्तेऽनया …………… ततः +ते+अनया…………… सत्व, पूर्वरूप सन्धि

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