UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 4 ऋतुवर्णनम्

UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 4 ऋतुवर्णनम्

 संस्कृत दिग्दर्शिका  पाठ - 4  ऋतुवर्णनम्ः

निम्नलिखित गद्यावतरणों का ससन्दर्भ हिन्दी में अनुवाद कीजिए

  1. स्वनैर्धनानां……………………………………………..नदन्ति ।
    [स्वनैः = ध्वनि से; गर्जना से, प्लवगाः = मेढक, चिरसन्निरुद्धाम = बहुत दिनों से रुकी हुई, नवाम्बुधाराभिहता: > नव + अम्बुधारा + अभिहताः = नवीन जलधारा से प्रताड़ित होकर, नदन्ति = टर्र-टर्र कर रहे हैं ।

सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘ऋतुवर्णनम्’ पाठ के ‘वर्षा’ शीर्षक से उद्धृत है । यह श्लोक वाल्मीकि रामायण के सुन्दरकाण्ड’ का है, जिसमें माल्यवान् पर्वत पर वास करते हुए राम-लक्ष्मण से वर्षा का वर्णन करते हैं ।

अनुवाद-विविध रूप, आकृति, वर्ण (रंग) और ध्वनि वाले मेंढक (जो बहुत दिनों से सो रहे थे) (वर्षाकाल के) नवीन मेघों के शब्द (गर्जन) से अपनी समय से रोकी हुई नींद को त्यागकर जाग उठे हैं और नव-जलधाराओं से चोट खाकर (टर्र-टर्र) शब्द कर (बोल) रहे हैं ।


2- मत्ता गजेंद्रा: . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .सुरेन्द्रः ॥

मत्ता गजेन्द्रा मुदिता गवेन्द्राः वनेषु विक्रान्ततरा मृगेन्द्राः।
रम्या नगेन्द्रा निभृता नरेन्द्राः प्रक्रीडितो वारिधरैः सुरेन्द्रः।।


[गवेन्द्राः = साँड, विक्रान्ततराः = शक्तिशाली, मृगेन्द्राः = सिंह, नगेन्द्राः = पर्वत, निभृता = निश्छल या उभयरहित (विजययात्रा आदि कार्यों से रहित),प्रकीडितोः = खेल रहे ।
सन्दर्भ- पहले की तरह ।

अनुवाद- हाथी मस्त हो रहे हैं, साँड प्रसन्नचित्त हैं, वनों में सिंह अधिक पराक्रमी हो रहे हैं; पर्वत सुन्दर लग रहे हैं, राजागण शान्त या उद्यमरहित हैं, (और) इन्द्र मेघों से क्रीड़ा कर रहे हैं ।

३- एते हि …………………………………. बुनराजयः।।

एते हि समुपासीना विहगा जुलैचारिणः।
नावगाहन्ति सलिलमप्रगल्भा इवावम्।।
अवश्यायमोनद्धा नीहारतमसावृताः।
प्रसुप्ता इव लक्ष्यन्ते विपुष्पा बुनराजयः।।


सन्दर्भ प्रस्तुत श्लोक, हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘ऋतुवर्णनम्’ नामक पाठ के “हेमन्तः” खण्ड़ से, उद्धृत है।
अनुवाद- जल के समीप बैठे जल में रहने वाले ये पक्षी जल में उसी प्रकार प्रवेश नहीं कर रहे हैं, जिस प्रकार कायर (व्यक्ति) रणभूमि में प्रवेश नहीं करते। ओस तथा अन्धकार में थे, कुहरे की धुन्ध से ढके हुए पुष्प-विहीन वृक्षों की पत्तियाँ सोई हुई सी प्रतीत हो रही हैं।

3 . घनोपगूढं . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .प्रकाशाः ॥
घनोपगूढ़म् > घन + उपगूढ़म् = बादलों से ढका हुआ, दर्शनमभ्युपैति > दर्शनम् + अभ्युपैति = दिखाई दे रहा है, जलौघेः = जल की बाढ़ से, वितृप्ता- तृप्त हो गई, तमोविलिप्ता: > तमः + विलिप्ताः = अन्धकार से लिपी (दिशाएँ)]

सन्दर्भ- पहले की तरह ।
अनुवाद- आकाश के मेघों से आच्छादित हो जाने के कारण न तो तारे दिखाई पड़ रहे हैं, न सूर्य । नवीन जलराशि से पृथ्वी तृप्त हो गयी है और अन्धकार से व्याप्त दिशाएँ प्रकाशित नहीं हो रही हैं (अर्थात् दिख नहीं रही हैं) ।

३-खजूरपुष्पाकृतिभिः ……………………………………. कनकप्रभाः

खजूरपुष्पाकृतिभिः शिरोभिः पूर्णतण्डुलैः।
शोभन्ते किञ्चिदालम्बाः शालय: कनकप्रभाः।।

सन्दर्भ पूर्ववत्।
अनुवाद – खजूर के फूल के समान आकृति वाले, चावलों से पूर्ण बालों से कुछ झुके हुए, सोने के समान चमक चाले धान शोभित हो रहे हैं।

4 . महान्ति . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .लम्बमानैः॥

[महान्ति कूटानि = बड़े पर्वत शिखर, धाराविधौतानि = जलधाराओं से घुले, विभान्ति = शोभित हो रहे हैं, महाप्रमाणैः = बड़े चौड़े, विपुलैः = विशाल, प्रपातैः = झरनों से, मुक्ता-कलापैः = मोतियों की लड़ियों से, लम्बमानैः = लटकती हुई]

सन्दर्भ- पहले की तरह ।

अनुवाद- पर्वतों के बड़े-बड़े शिखर, जिन पर बहुत चौड़े और प्रचुर जल वाले झरने मोतियों की लड़ियों के समान लटक रहे हैं, जलधाराओं से घुलकर बहुत शोभा पा रहे हैं ।

5 . अत्यन्त-सुख-सञ्चारा . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .छायासलिलदर्भगाः ॥

[स्पर्शतः = स्पर्श से, सुभगादित्याः > सुभग + आदित्याः = अच्छे सूर्य वाले (दिवसाः का विशेषण, छायासलिलदुर्भगा: = जिनमें छाया और जल प्रिय नहीं लगते ऐसे ।

सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘ऋतुवर्णनम’ पाठ के हेमन्तः’ शीर्षक से उद्धृत है । यह श्लोक वाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड’ का हैं, जहाँ पंचवटी में निवास करते हुए श्रीराम-लक्ष्मण से ‘हेमन्त’ का वर्णन करते हैं ।

अनुवाद- (हेमन्त ऋतु के) दिन सुखपूर्वक इधर-उधर आने-जाने के योग्य हैं, मध्याह्न (धूप के) स्पर्श से सुखदायक हैं, यह सूर्य के कारण सुखकर (किन्तु) छाया और जल के कारण कष्टप्रद हैं (भाव यह है कि शीतकाल में दिन में कहीं आना-जाना अच्छा लगता है; क्योंकि धूप का स्पर्श सुखकर होता है । इन दिनों में सूर्य की धूप में रहना बहुत अच्छा लगता है किन्तु शीतलता के कारण छाया और जल कष्टप्रद लगते हैं । )

6 . एते हि . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .इवाहतम् ।

[समुपासीना: बैठे हुए (जल के समीप), विहगाः = पक्षी, नावगाहन्ति > न + अवगाहन्ति = प्रवेश नहीं कर रहे हैं, अप्रगल्भाः = कायर (व्यक्ति), इव = सदृश, आहवम् = युद्धभूमि]

सन्दर्भ- पहले की तरह ।
अनुवाद-जल के पास बैठे ये जलचर पक्षी (शीत के कारण) जल में उसी प्रकार स्नान नहीं कर पा रहे हैं, जिस प्रकार कायर युद्धभूमि में (युद्धार्थ) प्रविष्ट नहीं होते ।

7 . अवश्यायतमोनद्वा . . . . . . . . . . . . . . . . . . .वनराजयः ।
[अवश्यायतमोनद्धाः > अवश्याय-तमः + नद्धाः = ओस के अन्धकार से बँधी, नीहारतमसावृताः > नीहारतमसा + आवृताः = कुहरे की धुन्ध से ढकी, लक्ष्यन्ते = प्रतीत हो रही है, विपुष्पाः = पुष्परहित, वनराजयः = वृक्षों की पंक्तियाँ सन्दर्भ- पहले की तरह । अनुवाद- ओस तथा अन्धकार से जकड़े (निश्छल) तथा कुहरे की धुन्ध से ढके हुए पुष्पहीन वृक्षों की पंक्तियाँ सोती हुई प्रतीत हो रही हैं ।

8 . सुखानिलोऽयं . . . . . . . . . . . . . . .जातपुष्पफलद्रुमः ।

सुखानिलोऽयं सौमित्रे कालः प्रचुरमन्मथः।।
गन्धवान् सुरभिर्मासो जातपुष्पफलद्रुमः।।


[सुखानिलोऽयं > सुख + अनिल: + अयम् = यह सुखदायक पवन वाला, सौमित्रे = सुमित्रा के पुत्र (लक्ष्मण), प्रचुरमन्मथः = अत्यधिक कामोद्दीपक, सुरभिर्मास: > सुरभिः + मासः = वसन्त का महीना, जातः = उत्पन्न हुए है]

सन्दर्भ- प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘ऋतुवर्णनम्’ पाठ के ‘बसन्तः’ शीर्षक से उदधृत है । यह श्लोक वाल्मीकि रामायण के ‘किष्किन्धाकाण्ड’ का है, जहाँ सीता को खोजते हुए श्रीराम पम्पा सरोवर पर पहुँचकर लक्ष्मण से वहाँ के वन की वसन्तकालीन शोभा का वर्णन करते हैं ।
अनुवाद- हे लक्ष्मण! सुखदायक पवन वाला यह (वसन्त) काल बड़ा कामोद्दीपक है । सुगन्ध से भरे हुए इस चैत्र मास में वृक्षों में पुष्प और फल लग गये हैं ।


9 . प्रस्तरेषु . …………………………. . . .गाम् ।

प्रस्तरेषु च रम्येषु विविधा काननद्रुमाः।
वायुवेगप्रचलिताः पुष्पैरवकिरन्ति गाम्।।

[प्रस्तरेषु = समतल शिखरों पर; पत्थरों पर, रम्येषु = सुन्दर, अवकिरन्ति = बिखेर रहे हैं, गाम् = पृथ्वी पर]

सन्दर्भ- पहले की तरह ।
अनुवाद- सुन्दर शिलातलों पर उगे हुए भाँति-भाँति के जंगली वृक्ष वायु से हिलकर पृथ्वी पर पुष्प बिखेर रहे हैं ।

10 . सुपुष्यिततांस्तु . . . . . . . . . . . . . . .पीताम्बरा निव ।
[सुपुष्पितांस्तु = भली प्रकार पुष्पों से युक्त, कर्णिकारान् = कनेर के वृक्षों को, समन्ततः = सब ओर, हाटकप्रतिसञ्छन्नान् = स्वर्ण-आभूषणों से ढके । ]

सन्दर्भ- पहले की तरह ।
अनुवाद- हे लक्ष्मण! इस कनेर के वृक्षों को देखो, जो कि पीले पुष्पों से लदे हुए हैं । इन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि स्वर्णाभूषणों से युक्त पीताम्बर ओढ़े हुए मनुष्य बैठे हुए हैं ।

निम्नलिखित सूक्तिपरक पंक्तियों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए

1 . प्रक्रीडितोवारिधरैः सुरेन्द्रः ।
सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘ऋतुवर्णनम’ पाठ के ‘वर्षा’ शीर्षक से अवतरित है ।

प्रसंग – प्रस्तुत सूक्तिपरक पंक्ति में श्रीराम लक्ष्मण से वर्षा का वर्णन कर रहे हैं ।


व्याख्या- प्रस्तुत पंक्ति में श्रीराम वर्षा का वर्णन करते हुए लक्ष्मण से कह रहे हैं कि इन्द्र मेघों से क्रीड़ा कर रहे हैं । अन्तरिक्ष के देवता इन्द्र भारतीय आर्यों के वृष्टि देवता हैं । पुराणों के अनुसार यह वज्र धारण करते हैं, बिजली को भेजते हैं तथा वर्षा करते हैं । वर्षा के देवता होने के कारण ही इनको मेघों (वर्षा कराने में सहायक) के साथ क्रीड़ा करते हुए कहा गया है । इनके वर्षा का देवता होने के प्रमाण यह भी है कि द्वापर युग में कृष्ण के कहने पर मथुरावासियों ने जब इन्द्र की पूजा-आराधना बन्द कर दी थी तो इन्द्र ने कुपित होकर अनवरत वृष्टि की थी जिससे त्रस्त मथुरावासियों की रक्षा कृष्ण ने की थी । यह साक्ष्य इन्द्र को वर्षा का देवता सिद्ध करता है । वर्षा के देवता का तो मेघों से क्रीड़ा करना स्वाभाविक ही है । इसीलिए प्रस्तुत सूक्ति में यह बात कह गयी है ।

2 . नावगाहन्ति सलिलमप्रगल्भा इवाहवम् ।
सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘ऋतुवर्णनम’ पाठ के ‘हेमन्तः’ शीर्षक से अवतरित है । प्रसंग-प्रस्तुत सूक्ति में राम-लक्ष्मण से हेमन्त ऋतु का वर्णन करते हैं ।

व्याख्या- प्रस्तुत सूक्ति में श्रीराम लक्ष्मण से हेमन्त ऋतु का वर्णन करते हुए कहते हैं, जिस प्रकार भय के कारण कायर व्यक्ति, जो युद्ध से घबराते हैं, युद्धभूमि मे प्रवेश नहीं करते है, अपितु बाहर से ही अवलोकन करते रहते हैं उसी प्रकार हेमन्त ऋतु में भी जलचर पक्षी स्नान करने के लिए जल के समीप होते हुए भी उसमें प्रवेश नहीं करते ।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में दीजिए |

1 . वर्षर्तौ  कीदृशं भवति ?
उत्तर – वर्षर्तौ  गगनं घनोपगूढ़म् अन्धकारपूर्णं च भवति ।


2 . कः कालः प्रचुरमन्मथः भवति ?
उत्तर – वसन्तः कालः प्रचुरन्मथः भवति ।


3 . वर्षौ निद्रां विहास के नदन्ति ?
उत्तर – वर्षौं निद्रां विहाय प्लवगाः नदन्ति ।

4 . हेमन्ते विपुष्पा वनराजयः कथं प्रतीयन्ते ?
उत्तर – हेमन्ते विपुष्पा वनराजयः प्रसुप्ताः इव प्रतीयन्ते ।

5 . हेमन्ततौ वृक्षाःलताश्च कथं सुप्ता इव लक्ष्यन्ते ?
उत्तर – हेमन्तौ वृक्षाः लताश्च तुषारपतनेन पुष्पहीनत्वेन च प्रसुप्ताः इव लक्ष्यन्ते ।

6 . वर्षाकाले पर्वतशिखराणां तुलना केन सह कृता अस्ति ?
उत्तर – वर्षाकाले प्रतापैभूषितानि शिखराणि मुक्ताकलापैर्भूर्षिता: पुरुषाः इव प्रतीयन्ते ।

7 . वसन्तकाले वृक्षा कीदृशाः भवन्ति ?
उत्तर – वसन्तकाले वृक्षाः पुष्पयुक्ताः फलयुक्ताः च भवन्ति ।

8 . वसन्तौ पुष्पिता: कर्णिकाराः कीदृशाः प्रतीयन्ते ?
उत्तर – वसन्तौ पुष्पिताः कर्णिकाराः स्वर्णयुक्ता पीताम्बरा नरा इव प्रतीयन्ते ।

9 . काननद्रुमाः गांपुष्पैः कदा अवकिरन्ति ?
उत्तर – काननद्रुमाः गां पुष्पैः वसन्ते अवकिरन्ति ?

10 . हेमन्तौ दिवसाः कीदृशाः भवन्ति ?
उत्तर – हेमन्तौ दिवसाः अत्यन्तं सुखसञ्चाराः, सुखगादित्याः, छाासलिल-दुर्भगाः च भवन्ति ।

11 . हेमन्ते जलचारिणःजले किं नावगाहन्ति ?
उत्तर – हेमन्ते जलचारिणः शीतस्य कारणात् जले नावगाहन्ति ।

निम्नलिखित वाक्यों का संस्कृत में अनुवाद कीजिए

1 . सिंह वनों में गरजते हैं ।
अनुवाद-सिंह: वने गर्जति ।


2 . कायर मनुष्य युद्ध-भूमि में प्रवेश नहीं करते ।
अनुवाद-का पुरुषाः संग्रामे प्रवेशं न कुर्वन्ति ।

3 . नदियाँ किनारों को तोड़कर बहती हैं ।
अनुवाद- नद्यः कूला: प्रनष्टः प्रवहति ।


4 . हे लक्ष्मण! फूलों से युक्त इस वन की शोभा को देखो ।
अनुवाद- भो लक्ष्मण! पुष्पेन युक्तः इदं वनः शोभाख पश्य ।

5 . वनों में भौरे गूंजते हैं ।
अनुवाद- वनें षटपदैः कूजन्ति ।


6 . सुखद हवा बह रही है ।
अनुवाद- सुखदं वायुः प्रहवति ।


7 . सोने की चमकवाले शालि शोभा देते हैं ।
अनुवाद- कनकप्रभा: शालयः शोभन्ते ।


8 . वर्षा ऋतु में तालाब में मेढ़क बोलेंगे ।
अनुवाद- वर्षातौ तडागे दादुरः नदष्यिति ।


9 . हेमन्त में वृक्षों से पीले पत्ते गिरते हैं ।
अनुवाद-हेमन्ते वृक्षेभ्यः पीतानि पर्णाति पतन्ति ।


10 . बसन्त ऋतु में कोयल बोलती है ।
अनुवाद- वसन्तौ पिक: कूजति ।

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