UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 7 महर्षिर्दयानन्दः

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UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi
  सप्तम पाठ   महर्षिर्दयानन्दः

निम्नलिखित गद्यावतरणों का ससन्दर्भ हिन्दी में अनुवाद कीजिए

1 . सौराष्ट्रप्रान्ते . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .प्रसिद्धोऽभूत ।
[औदीच्यविप्रवंशीयस्य = औदीच्य ( उत्तरी) ब्राह्मणवंशीय, एकाशीत्युन्तराष्टादशशततमे > एकाशीति + उत्तर + अष्टदशशततमे = सन् 1881 ई० में, वैक्रमाब्दे >वैक्रम + अब्दे = विक्रम संवत में, चोपरि > च+ उपरि = और ऊपर, मूषिकम = चूहे को, इतस्तत: > इतः + ततः = इधर-उधर, ततःप्रभृत्येव > ततः प्रभृति + इव = तब से लेकर ही]

सन्दर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘महर्षिर्दयानन्दः’ नामक पाठ से उद्धृत है ।
अनुवाद- सौराष्ट्र प्रान्त के टंकारा नामक ग्राम में औदीत्य ब्राह्मण वंश के श्री कर्षण तिवारी नामक एक धनी की पत्नी ने, शिव की (अर्धांगिनी) पार्वती के सदृश, विक्रम संवत् 1881 के भाद्रपद के महीने में नवमी तिथि को बृहस्पतिवार के दिन मूल नक्षत्र में पुत्ररत्न को जन्म दिया । जन्म से दसवें दिन पिता ने (इस) विचार से कि ‘यह (बालक) शिव को भजे’ (शिव की उपासना करे) अपने पुत्र का नाम मूलशंकर रखा और आठवें वर्ष में इनका उपनयन (यज्ञोपवित संस्कार) किया । तेरह वर्ष के हो जाने पर मूलशंकर से पिता ने शिवरात्रि का व्रत करने को कहा । पिता की आज्ञानुसार मूलशंकर ने व्रत के सभी विधान (पूरे) किये । रात में शिवालय में अपने पिता समेत सबको सोता देख ये स्वयं जागते रहे और शिवलिंग पर एक चूहे को इधर-उधर घूमते देख मन में शंका उत्पन्न हो जाने से (कि जो शिवलिंग अपनी रक्षा नहीं कर सकता, वह हमारी रक्षा क्या करेगा) सत्यम् , शिवम, सुन्दरम् (तथा) लोककल्याणकारी शंकर का साक्षात्कार करने का हृदय में निश्चय किया । तभी से लेकर शिवरात्रि का उत्सव श्रीमद्दयानन्द के अनुयायी आर्यसमाजियों में ‘ऋषिबोधोत्सव’ (ऋषि दयानन्द को सच्चा ज्ञान प्राप्त होने का उत्सव) के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।

2 . यदा अयं . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .गृहमत्यजत् ।

[षोडशवर्षदेशीयः = लगभग सोलह वर्ष के, कनीयसी = छोटी, भगिनी = बहन, विषूचिकया = हैजे से, पञ्चत्वं = मृत्यु को, गता = प्राप्त हो गई, पितृव्योऽपि > पितृव्यः + अपि = चाचा भी, दिवङ्गत = स्वर्ग सिधार गए, आसीदस्य > आसीत् + अस्य = हुआ इनके (मन में) वायं> व+ अयम् = अथवा यह (संसार), भास्वान् = सूर्य]

सन्दर्भ- पहले की तरह
अनुवाद- जब ये लगभग सोलह वर्ष के थे, इनकी छोटी बहन हैजे से मर गयी । तीन वर्ष बाद इनके चाचा भी स्वर्ग को सुधार गये । इन दो मौतों को देखकर इनके मन में (विचार) आया कि मैं अथवा यह संसार मृत्युभय से कैसे छुटकारा पाये । यह सोचते हुए इनके हृदय में सहसा ही वैराग्य का दीपक जल उठा । एक दिन भगवान् सूर्य के अस्त हो जाने पर मूलशंकर ने घर त्याग दिया ।


3 . सप्तदशवर्षाणि . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .न्यवेदयत ।

[ यावत् = तक, नाविन्दतातितरां> न + अविन्दत + अतितराम = अधिक संतुष्टि नहीं पाई, सकाशात् = पास से, अङ्गीकृतवान = स्वीकार किया, श्रावं-श्रावं = बार-बार सुनकर, सप्तदशैकोनविंशतिशततमे = सन् 1917 ई० में, गुरुकल्पवृक्ष = गुरु-रूपी कल्पवृक्ष, विलोचनम् = नेत्रहीन, आगमलोचनं = शास्त्र या ज्ञानरूपी नेत्रों वाले, औत्सुक्यं = उत्सुकता से]
सन्दर्भ- पहले की तरह


अनुवाद- सत्रह वर्ष तक अमरता-प्राप्ति का उपाय सोचते हुए मूलशंकर एक गाँव से दूसरे गाँव, एक शहर से दूसरे शहर, एक वन से दूसरे वन, एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर घूमते रहे, किन्तु अधिक सन्तोष न पा सके । अनेक विद्वानों से व्याकरण, वेदान्त आदि शास्त्रों और योग विद्या को सीखा । नर्मदा तट पर पूर्णानन्द सरस्वती नामक संन्यासी से संन्यास ग्रहण कर ‘दयानन्द सरस्वती’ नाम धारण किया । क्रमश: मथुरा नगर से आये हुए व्यक्तियों से दण्डी विरजानन्द स्वामी के पवित्र यश को सुनते-सुनते संवत् 1917 विक्रमी में ये भगवान् श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा पहुंचे । वहाँ गौरवशाली कल्पवृक्ष के सदृश (शिष्य की ज्ञानप्राप्ति की कामना को पूर्ण करने वाले)वेद-वेदाङ्गों में निष्णात, नेत्रहीन होते हुए भी शास्त्ररूपी नेत्रों वाले, साधु स्वभाव वाले गुरु विरजानन्द के पास उपस्थित हो और भक्तिपूर्वक प्रणाम कर विद्याध्ययन की उत्सुकता प्रकट की ।

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4 . गुरु विरजानन्दोऽपि . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .में गुरुदक्षिणाम्

[कुशाग्रबुद्धिमिमं = कुशाग्र बुद्धि वाले; तीव्र बुद्धिवाले, अष्टाध्यायीमन्यानि > अष्टध्यायीम् + अन्यनि = अष्टध्यायी तथा दूसरे, अध्यापयामास = अध्ययन कराया, समाप्तविद्यः = जिसकी शिक्षा पूरी हो गई हो, अकिञ्चनतया = निर्धन होने के कारण, तनुमनोभ्यां = शरीर और मन के, समं = साथ, लवङ्गजातम् = लौंग का जोड़ा, मदीयामिमां> मदीयाम + इमाम = मेरी इस]
सन्दर्भ- पहले की तरह


अनुवाद- गुरु विरजानन्द ने भी इन कुशाग्र बुद्धियुक्त दयानन्द को तीन वर्ष तक पाणिनी की ‘अष्टाध्यायी’ एवं अन्यान्य शास्त्र पढ़ाये । पढ़ाई समाप्त होने पर दयानन्द ने परम श्रद्धापूर्वक गुरु से कहा- “भगवान, दरिद्रता के कारण मैं तन-मन (के समर्पण रूप में) केवल लौंग का एक जोड़ा लाया हूँ (आशय यह है कि गुरु की सेवा तन, मन, धन से करनी चाहिए, किन्तु दयानन्द जी के पास धन तो था ही नही, इसलिए तन-मन से गुरु के प्रति समर्पण के प्रतीक-रूप में लौंग का एक जोड़ा अर्पित किया) आज मेरी इस गुरुदक्षिणा को स्वीकार कर मुझे अनुगृहीत करें ।”

4 . गुरुणा एवम् . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .नुनमनुकरणीयमस्ति ।
[आज्ञप्तः = आज्ञा पाकर, पाखण्डखण्डिनीं पताकाम् = पाखण्ड का नाश करने वाली ध्वजा को, ईश्वरकर्तृकाः = ईश्वरकृत, नाधीयाताम् > न + अधीयाताम = नहीं पढ़ने चाहिए, प्रतिपाद्य = प्रतिपादन करके, प्रयतमानः = प्रयन्त करते हुए, उद्वाराय = उद्वार के लिए, नूनम् = निश्चय ही]
सन्दर्भ- पहले की तरह


अनुवाद- गुरु से इस प्रकार आज्ञा पाकर महर्षि दयानन्द इस देश के निवासियों का उद्धार करने के लिए कर्मक्षेत्र में उतर पड़े । सबसे पहले उन्होंने हरिद्वार में कुम्भ के पर्व पर गंगा किनारे ‘पाखण्डखण्डिनी’ पताका स्थापित की (फहरायी) । इसके बाद हिमालय पर जाकर तीन वर्ष तक तप किया । तत्पश्चात् इन्होंने प्रतिपादित किया कि ऋग्, यजु, साम, अथर्व (ये चारों) वेद नित्य और ईश्वरकृत हैं, ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र का विभाजन कर्म, स्वभाव के आधार पर किया गया है, न कि जन्म के (आधार पर) । आश्रम चार ही हैं । ईश्वर एक ही है । ब्रह्म, पितृ, देवता, अतिथि और बलिवैश्वदेव- ये पाँच महायज्ञ नित्य करने चाहिए । ‘स्त्री-शूद्रों को वेद न पढ़ाया जाए’ इस कथन की निस्सारता प्रतिपादित करके वेद के अध्ययन का सबको अधिकार है, ऐसी व्यवस्था दी । इस प्रकार ये (महर्षि दयानन्द) पाखण्ड के उन्मूलन और वैदिक धर्म की स्थापना के लिए सर्वत्र घूमते रहे । अस्तु, आर्यज्ञान के महादीपक देव दयानन्द ने सारा जीवन देश और जाति के उद्धार के लिए प्रयन्त करते हुए उसी के लिए अपना जीवन तक दे दिया और मुक्ति प्राप्त की । इस प्रकार इन महर्षि का जीवन निश्चय ही अनुकरण करने योग है ।

निम्नलिखित सूक्तिपरक पंक्तियों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए

1 . सत्यं शिवं सुन्दरम् ।
सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘महर्षिर्दयानन्दः’ नामक पाठ से अवतरित है ।
प्रसंग-प्रस्तुत सूक्ति में महर्षि दयानन्द द्वारा किया गया निराकार ईश्वर के महत्व पर प्रकाश डाला है ।
व्याख्या- प्रस्तुत सूक्ति में बताया गया है कि महर्षि दयानन्द मूर्ति पूजा के विरोधी थे । वे निराकार ईश्वर के उपासक थे । वह ईश्वर को सत्य का रूप मानते थे, सत्य ही शिव का रूप है और शिव ही सुन्दर है । उन्होनें मन में लोककल्याणकारी ईश्वर का साक्षात्कार करने का निश्चय किया । उन्होंने निराकार ईश्वर को ही महत्व दिया ।

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2- स्त्रीशूदौ वेदनाधीयाताम् ।

सन्दर्भ- पहले की तरह

प्रसंग- इस सूक्ति में प्राचीनकाल की उस परिपाटी पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें स्त्री और शूद्रों को वेदों का अध्ययन करने की अनुमति नहीं थी ।

व्याख्या- प्राचीनकाल में समाज में ऐसी व्यवस्था थी कि स्त्रियों और शूद्रों को वेद न पढ़ाये जाएँ । उस समय ऐसा सम्भवत: इसलिए कहा गया होगा कि उस समय स्त्रियों के लिए परदा-प्रथा का कठोर नियम था । उनका घर से बाहर निकलना वर्जित था और वेद के अध्ययन के लिए उन्हें गुरु के आश्रम में जाना पड़ता, जिससे सामाजिक व्यवस्था बिगड़ती । सम्भवत: यही बात शूद्रों के विषय में भी जारी रहेगी । जाति और आश्रम-व्यवस्था के कड़ाई से पालन किये जाने के कारण शूद्रों को वेदाध्ययन के अधिकार से वंचित किया गया होगा । आज इस सूक्ति को स्त्री और शूद्रों के दमन का पोषक मानकर इसका विरोध किया जाता है, जो कि उचित भी है । महर्षि दयानन्द ने भी इसका विरोध कर स्त्री और शूद्रों को समाज में समानाधिकार दिलाने के लिए आन्दोलन चलाया । यहाँ यह बात भी उल्लेखनीय है कि यह सूक्ति आज भले ही प्रासंगिक न रही हो, किन्तु जिस काल में इसकी रचना हुई होगी, उस समय की सामाजिक परिस्थितियों में इसका सामाजिक व्यवस्था बनाये रखने में महत्वपूर्ण योगदान रहा होगा । आशय यह है कि स्वामी दयानन्द ने सदियों से चली आ रही रूढ़ि को समाप्त किया तथा स्त्री-पुरुष व उच्च-शूद्र वर्ण के मध्य व्याप्त भेदभाव को दूर किया ।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में दीजिए

1 . महर्षेः दयानन्दस्य जन्म कस्मिन् स्थानेऽभवत्?
उत्तर – महर्षिदयानन्दस्य (मूलशङ्करस्य) जन्म सौराष्ट्रप्रान्ते टङ्कारानाम्नि ग्रामे भाद्रपदमासस्य नवम्यां तिथौ गुरुवासरे मूलनक्षत्रे एकाशीत्युत्तराष्टादशशतमे वैक्रमाब्दे अभवत् ।

2 . महर्षेः दयानन्दस्य बाल्यकालिकं किं नाम आसीत्? ।
उत्तर – महर्षेः दयानन्दस्य बाल्यकालिकं मूलशङ्करः इति नाम आसीत् ।

3 . महर्षेः दयानन्दस्य पितुः नाम किम् आसीत्?
उत्तर – महर्षेः दयानन्दस्य पितुर्नाम श्रीकर्षणातिवारी आसीत् ।

4 . दयानन्दस्य जनकः मूलशङ्कर’ इति नाम कथं कृतवान्?
उत्तर – ‘शिवं भजेदयम्’ इति विचार्य पिता अस्य नाम ‘मूलशङ्कर’ इत्यकरोत ।

5 . मूलशङ्करः शिवरात्रिव्रते किमन्वपभवत्?
उत्तर – मूलशङ्करः शिवरात्रिव्रते मूर्तिपूजनात् किमन्वपभवत् ।

6 . शिवलिङ्गस्योपरि मूषकं विचरन्तं दुष्ट्वा मूलशंङ्करः किम् अचिन्तयत्?
उत्तर – शिवलिङ्गस्योपरि मूषकं विचरन्तं दुष्ट्वा मूलशंङ्करः लोकशङ्करं शिवं प्राप्तुम् अचिन्तयत् ।

7 . कोः गुरु दयानन्दं व्याकरणं अध्यपयामास?
उत्तर – विरजानन्दः दयानन्दं व्याकरणं अध्यपयामास ।

8 . दयानन्दः किमर्थं सर्वत्र भ्रमति स्मः?
उत्तर – दयानन्दः पाखण्डोन्यूलनाय वैदिकधर्मसंस्थापनाय च सर्वत्राभ्रमत् ।

9 . गुरुः इमां कांदक्षिणामयाच?
उत्तर – ‘उन्नमय पतिवान्, समुद्धर स्त्रीजातिम्, खण्डय पाखण्डम्’ इति गुरुदक्षिणारूपे तमयाचत् ।

10 . मूलशङ्करे वैराग्यं कथमभवत्?
उत्तर – स्वभगिन्याः पितृव्यस्य च मृत्युं दृष्ट्वा मूलशङ्करस्य हृदये वैराग्यप्रदीपः प्रज्वलितः ।

11 . महर्षेः दयानन्दस्य गुरुः कः आसीत्?
उत्तर – दण्डिविरजानन्दः स्वामिनः महर्षेदयानन्दस्य गुरुः आसीत् ।

12 . दयानन्दः मथुरानगरं किमर्धम् अगच्छत्?
उत्तर – विरजानन्दस्य यशः श्रुत्वा दयानन्दः (मूलशङ्करः) मथुराम् अगच्छत् ।

13 . दयानन्दः सर्वप्रथमं कां पताकां कुत्र अस्थापयत्?
उत्तर – दयानन्दः सर्वप्रथमं हरिद्वारे पाखण्डनाशाय पाखण्डखण्डिनी पताकामस्थापयत् ।

14 . मूलशङ्करः कस्य संन्यासिनः सकाशात् संन्यासंगृहीतवान्?
उत्तर – मूलशङ्करः पूर्णानन्दसरस्वतीनाम्नः संन्यासिनः सकाशात् संन्यासं गृहीतवान् ।

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15 . महर्षेः दयानन्दस्य पिता कस्मिन वर्षं तस्य उपनयनमकरोत्?
उत्तर – महर्षेः दयानन्दस्य पिता अष्टमे वर्षं तस्य उपनयनमकरोत् ।

निम्नलिखित वाक्यों का संस्कृत में अनुवाद कीजिए

1 . मूलशंकर ने शिवरात्रि का व्रत विधि विधान से किया ।
अनुवाद- मूलशङ्करः शिवरात्रेस्यव व्रतविधानमकरोत ।

2 . पाखण्ड एवं अन्धविश्वास का महर्षि दयानन्द ने विरोध किया ।
अनुवाद- पाखण्डान्धविश्वासयो: महर्षिर्दयानन्दः विरोधमकरोत् ।

3 . आज समाज महर्षि दयानन्द का ऋणी है ।
अनुवाद- अद्य समाज: महर्षिर्दयानन्दः ऋणी विद्यते ।

4 . उन्होंने वैदिक मत का प्रचार किया ।
अनुवाद-स: वैदिकमवस्य प्रचारमरकरोत् ।

5 . गुणों के अनुसार वे मनुष्यों को श्रेष्ठ मानते थे ।
अनुवाद- सः गुणानुसारं मनुष्यं श्रेष्ठमन्यत् ।

6 . महर्षि दयानन्द के गुरु विरजानन्द थे ।
अनुवाद- महर्षिर्दयानन्दस्य गुरु: विरजानन्दः आसीत् ।

7 . महर्षि दयानन्द का जीवन निश्चय ही अनुकरणीय है ।
अनुवाद- महर्षेः दयानन्दस्य जीवनं निश्चितमेव अनुकरणीयः अस्ति ।

8 . महर्षि दयानन्द ने आर्य समाज की स्थापना की ।
अनुवाद- महर्षिर्दयानन्दः आर्यः समाजस्य स्थापनां अकरोत् ।

9 . महर्षि दयानन्द ने आँग्लों वैदिक स्कूलों की स्थापना की ।
अनुवाद- महर्षिर्दयानन्दः आँग्लों वैदिकं विद्यालयस्य स्थापनां अकरोत् ।

10 . महर्षि दयानन्द ने अपना जीवन देश के उद्धार के लिए समर्पित कर दिया ।
अनुवाद- महर्षिर्दयानन्दः स्वं जीवन: देशस्य उद्धारस्य समर्पितं अकरोत् ।

संस्कृत व्याकरण संबंधी प्रश्न

1 . निम्नलिखित शब्दों में समास-विग्रह करते हुए समास का नाम लिखिए
समस्तपद . . . . . .समास-विग्रह/ . . . . . . . . . समास का नाम
वेदाध्ययनम् . . . . . .वेदस्य अध्ययनम् . . . . . . . . . . . . . . . . .तत्पुरुष समास
वैराग्यप्रदीपः . . . .वैराग्यस्य प्रदीपः . . . . . . . . . . तत्पुरुष समास
तनुप्रदीप . . .तनु च मन . . . . . . . . . . . . . चद्वन्द्व समास
स्त्रीशूदौ . . . . . . . . .स्त्री च शूद्रः च . . . . . . . . . . . . द्वन्द्व समास
लोकशङ्करम . . . . . . . . . . . . .लोकस्य शङ्करम् . . . . . . .तत्पुरुष समास
ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्राणाम् . . . . . . . . . ब्राह्मण च क्षत्रिय च वैश्य . . . . . . . . .द्वन्द्व समास
च शूद्रः च आज्ञानान्धकारे . . . .आज्ञानेस्य अन्धकारः . . . . . . . . . . . . .तत्पुरुष समास

3 . निम्नलिखित शब्दों में सन्धि-विच्छेद कीजिए

सन्धिशब्द . . . . . . . . . . . . . . . सन्धि-विच्छेद . . . . . . . . . .सन्धिका नाम
पार्वतीव . . . . . . . . . . . .पार्वती + इव . . . . . . . . . . . . . .दीर्घ सन्धि
बोधोत्सवः . . . . . . . . . बोध+ उत्सवः . . . . . . . . . .गुण सन्धि
यावज्जीवनम् . . . . . . . .यावत् + जीवनम् . . . . . . . . . .श्चुत्व सन्धि
जात्युद्वाराय . . . . . . जाति + उद्वाराय . . . . . . . . .यण सन्धि
नगरात्रगरम् . . . . . . . . . . नगरात् + नगरम् . . . . . . . . . . .परसवर्ण सन्धि
अस्योपनयनम् . . . . . . . . . . अस्य + उपनयनम् . . . . . . . . . . . .गुण सन्धि
प्रभृत्येव . . . . . . . . . . . . . प्रभृति + एव . . . . . . . . . .यण सन्धि
पितुराज्ञानुसारम् . . . .पितुः + आज्ञा + अनुसारम् . . . . . . . . . रुत्व, दीर्घ सन्धि
द्वयोरनयोः . . . . . . . . . .द्वयोः + अनयोः . . . . . . . . . . . . . . . .रुत्व सन्धि
मूषिकमेकमितस्ततः . . . . . . . . . .मूषिकम् + एकम् + इतः + ततः . . . . . . . . . . .अनुस्वार,सत्व सन्धि
नाविन्दत . . . . . . . . . न+ अविन्दत . . . . . .दीर्घ सन्धि ।

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