UP Board Solutions for Class 12 Sahityik Hindi संस्कृत Chapter 9 महामना मालवीयः

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एकादशः पाठः    महामना मालवीयः

निम्नलिखित गद्यावतरणों का ससन्दर्भ हिन्दी में अनुवाद कीजिए

1 . महामनस्विनः . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .कुर्तमारभत् ।
[महामनस्वी = बहुत बुद्धिमान, आरब्धवान् = प्रारम्भ किया, अमोहयत् = मोह लिया, प्राड्विवाकपदवीं = वकील की पदवी, विधेः = कानून के, प्राड्विवाककर्म = वकालत] सन्दर्भ- प्रस्तुत श्लोक हमारी पाठ्यपुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘महामना मालवीय:’ नामक पाठ से उद्धृत है ।

अनुवाद– महामना (महा बुद्धिमान्) मदनमोहन मालवीय का जन्म प्रयाग के प्रतिष्ठित (सम्मानित) परिवार में हुआ था । इनके पिता पण्डित ब्रजनाथ संस्कृत के प्रतिष्ठित विद्वान् थे । इन्होंने प्रयाग में ही संस्कृत पाठशाला, राजकीय विद्यालय एवं म्योर सेण्ट्रल महाविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करके यहाँ ही राजकीय विद्यालय में पढ़ाना आरम्भ किया । युवक मालवीय अपने प्रभावपूर्ण भाषण से मनुष्यों का मन मोह लेते थे । इसलिए इनके मित्रों ने इन्हें वकील की पदवी प्राप्त करके देश की उच्चतर सेवा करने को प्रेरित किया । उसी के अनुसार इन्होंने कानून की परीक्षा उत्तीर्ण करे प्रयोग में उच्च न्यायालय में वकालत आरम्भ कर दी ।

2-महापुरुषाः . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .नात्यजत् ।
[नियतलक्ष्यान्न > नियत् -लक्ष्यात + न = नियत् (निश्चित) लक्ष्य से नहीं, भ्रश्यन्ति = विचलित होते हैं, देशसेवानुरक्तोऽयं > देशसेवा + अनुरक्तः + अयम् = देशसेवा में अनुरक्त यह, परिधौ = सीमा में, भीताः जाताः = भयभीत हो गए, निक्षिप्तोऽपि > निक्षिप्तः + अपि = बन्दी बनाए जाने पर भी, नात्यजत् >न + अत्यजत् = नहीं छोड़ा]

सन्दर्भ– पहले की तरह
अनुवाद– महापुरुष सांसारिक प्रलोभनों में फँसकर (अपने) निश्चित लक्ष्य से कभी विचलित नहीं होते । देश-सेवा में अनुरक्त यह युवक उच्च न्यायालय की सीमाओं में बँधकर) न रह सका । पण्डित मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपतराय जैसे अन्य राष्ट्रीय नेताओं के साथ वे भी देश के स्वतन्त्रता संग्राम में उतरे । दिल्ली में कांग्रेस के तेईसवें अधिवेश के अध्यक्ष पद को इन्होंने सुशोभित किया । ‘रोलट ऐक्ट’ के विरोध में इनके ओजस्वी भाषण को सुनकर अंग्रेज शासक भयभीत हो उठे । बहुत बार जेल में डाले जाने पर भी इस वीर ने देशसेवा का व्रत नहीं छोड़ा ।

3 . हिन्दी, संस्कृत . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .विभाति ।
[प्रभूतं = बहुत-सा, प्रायच्छन् = दिया, प्रतिमूर्तिरिवः > प्रतिमूर्तिः + इव = प्रतिकृति-सा]

सन्दर्भ– पहले की तरह
अनुवाद– इनका हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाओं पर समान अधिकार था । हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान की उन्नति के लिए ये निरन्तर प्रयन्त करते रहे । शिक्षा द्वारा ही देश और समाज में नवीन प्रकाश का उदय होता है, इसलिए श्री मालवीय ने वाराणसी में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की । इसके निर्माण के लिए इन्होंने लोगो से धन माँगा और लोगों ने इस महान ज्ञानयज्ञ में इन्हें प्रचुर धन दिया । इनके द्वारा बनवाया हुआ यह विशाल विश्वविद्यालय भारतीयों की दानशीलता और श्री मालवीय के यश की प्रतिमूर्ति की भाँति सुशोभित हो रहा है ।

4- महामना विद्वान . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .. . . . . . . . . . . . . . . . .क्वचित् ।

[पटुः = निपुण, पीड्यमानान् = पीड़ितों को, सर्वविधं = सब प्रकार की, अन्धे तमसि = गहन अन्धकार में, निमग्नान् = डूबे, जरामृत्युभयं = वृद्वावस्था और मृत्यु का भय, कीर्तितनोः = यशरूपी शरीर को । ।


सन्दर्भ– पहले की तरह
अनुवाद– महामना विद्वान् वक्ता (भाषणकर्ता), धार्मिक नेता एवं कुशल पत्रकार थे, किन्तु इनका सर्वोच्च गुण जनसेवा ही था । जहाँ कहीं भी ये लोगों को दुःखित और पीड़ित देखते थे, वहीं शीघ्र उपस्थित होकर सब प्रकार की सहायता करते थे । प्राणियों की सेवा इनका स्वभाव ही था । आज हमारे बीच विद्यमान न होने पर भी महामना मालवीय अमूर्तरूप से अपने यश का प्रकाश फैलाते हुए घोर अन्धकार में डूबे मनुष्यों को सन्मार्ग दिखाते हुए स्थान-स्थान पर प्रत्येक मनुष्य के अन्दर उपस्थित हैं ही । जनसेवा में लगे महापुरुष की जय हो, जिनके यशरूपी शरीर को कहीं भी बुढ़ापे और मृत्यु का भय नहीं है ।

निम्नलिखित सूक्तिपरक पंक्तियों की ससन्दर्भ व्याख्या कीजिए

1 . महापुरुषाः लौकिक-प्रलोभनेषु बुद्धा नियतलक्ष्ययानकदापि भ्रश्यन्ति ।

सन्दर्भ- प्रस्तुत सूक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘संस्कृत दिग्दर्शिका’ के ‘महामना मालवीय:’ नामक पाठ से उद्धृत है ।
प्रसंग- इस सूक्ति में यह बात कही गयी है कि महान् पुरुष अपने लक्ष्य के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं ।

व्याख्या– इस सूक्ति का अर्थ यह है कि सांसारिक विषयों के प्रलोभनों में बँधकर भी महापुरुष कभी अपने निश्चित लक्ष्य से विचलित नहीं होते । संसार में जन्म लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं का उपभोग करता है । महापुरुष सांसारिक वस्तुओं का उपभोग केवल जीवित रहने के लिए करते हैं; वे इनसे बँधते नहीं । रामकृष्ण परमहंस, महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, महात्मा गाँधी, मदनमोहन मालवीय आदि अनेक ऐसे महापुरुष इस संसार में अवतरित हुए; जिन्होंने संसार में रहते हुए भी अनासक्त होकर मानव-मात्र की भलाई के लिए कार्य किये । ये सभी महापुरुष अपना समस्त वैभव त्यागकर जन-कल्याण के लिए साधारण व्यक्ति के रूप में जिये । इनको अपने उद्देश्य-प्राप्ति की दिशा में कोई प्रलोभन भी नहीं रोक सका । अतः यह सत्य ही है कि महापुरुष सांसारिक विषयों के प्रलोभनों के होते हुए भी अपने निश्चित लक्ष्य से कभी विचलित नहीं होते ।

2-साधारणस्थितिकोऽपि जन: महतोत्साहेन मनस्वितया पौरुषेण च असाधारणमपि कार्यं कर्तुं क्षमः इत्यदर्शयत् मनीषिमूर्धन्यः मालवीयः ।

सन्दर्भ– पहले की तरह
प्रसंग– इस सूक्ति का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति के पास यदि पुरुषार्थ, विवेकशीलता एवं एकाग्रता है तो वह निश्चित ही बड़ेसे-बड़े कार्य को करने में समर्थ हो सकता है ।

व्याख्या– संसार में कोई भी व्यक्ति जन्म से नहीं; वरन् कर्म से महान् होता है । सामान्य व्यक्ति भी यदि अपने कार्य के प्रति उत्साह, विचारशीलता एवं पुरुषार्थ रखता है तो निश्चित ही उसके लिए सफलता के द्वार स्वयं खुल जाते हैं । बिना उत्साह के कार्य करने से जो परिणाम निकलता है, वह चाहे गुणात्मक ही क्यों न हो, उसमें प्रायः आनन्द की प्राप्ति नहीं होती । निरुत्साहित होकर किये गये कार्यों में व्यक्ति प्रायः सफल नहीं होता । कार्य को प्रारम्भ करने से पहले उसके औचित्य एवं अनौचित्य पर विचार कर लेना आवश्यक होता है । बिना विचारे कार्य करना मूर्खता है । अच्छी तरह विचार करके जब यह निश्चित हो जाए कि अमुक कार्य करने से यह उचित लाभ होगा, तभी उसे प्रारम्भ करना चाहिए । ऐसा करने से हमारा उत्साह एवं पुरुषार्थ व्यर्थ नहीं होगा । किसी भी कार्य से पूर्व विचार करके उत्साहपूर्वक कार्य करने कार्य में एकाग्रता तो आती ही है, उद्देश्य तक पहुँचने की आकाक्षां भी तीव्र हो जाती है । किसी ने उचित ही कहा है

उत्साहो बलवानार्य, नास्त्युसाहात्परं बलम् ।
सोत्साहस्य हि लाकेषु, न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥


अर्थात् उत्साह ही बलवान् होता है । उत्साह से बढ़कर दूसरा कोई बल नहीं । उत्साही पुरुष के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नही है ।

3 . जयन्ति ते महाभागा जन-सेवा-परायणाः ।

सन्दर्भ- पहले की तरह ।

प्रसंग– इस सूक्ति में महान् व्यक्तियों के यशरूप से अमर होने की बात को समझाया गया है ।

व्याख्या– संसार में अनेक व्यक्ति जन्म लेते हैं और मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं, लेकिन उनका कोई नाम भी नहीं लेता । जो महापुरुष जन-सेवा में ही जीवन बिताते हैं और जन-सेवा ही जिनके जीवन का अन्तिम लक्ष्य होता है, उन्हें समाज, जाति और देश सदैव स्मरण रखता है । ऐसे महापुरुषों पर अनेकानेक काव्यों की रचना की जाती है और विभिन्न प्रकार से देश उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता है । ऐसे ही महापुरुषों का जीवन सार्थक है । महामना मालवीय भी ऐसे ही जन-सेवा के लिए समर्पित महापुरुष थे; अत: वे यश के रूप में सदा हमारे बीच अमर रहेंगे ।

4-जरामृत्युभयं नास्ति येषा कीर्तितनो: क्वाचित् ।

सन्दर्भ- पहले की तरह
प्रसंग- पहले की तरह

व्याख्या– यह सूक्ति महामना मदनमोहन मालवीय के जन-सेवा के कार्यों के कारण चहुँ ओर फैली उनकी धवल कीर्ति का गुणगान करती है । साधारण मनुष्य अपने विषय में सोचता हुआ ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है । अपनी अनन्त इच्छाओं की पूर्ति के लिए वह अधिक-से-अधिक जीना चाहते है और इसीलिए उसे बुढ़ापे और मृत्यु का भय सताता रहता है । उसकी मृत्यु के पश्चात् सभी लोग उसे भूल जाते हैं, किन्तु जो परोपकारी, जनसेवक एवं सहृदय लोग होते हैं, वे मरने के बाद भी अपनी कीर्ति से इस संसार में अमर हो जाते हैं । लोग सदैव उसके नाम का स्मरण करते हैं । भौतिक शरीर तो प्रकृति के नियमों के अनुसार वृद्धावस्था और मृत्यु की अनिर्वायता से मुक्त नहीं हो सकता । भले ही वह कितना ही बलशाली, धनवान या ऐश्वर्यावान् व्यक्ति हो, किन्तु यश रूपी शरीर तो अजर-अमर और अनन्त काल तक अपना अस्तित्व रख सकता है । मालवीय जी इस भारतमाता के ऐसे ही महान् सपूत थे । वे कीर्तिरूपी शरीर से सदैव अमर रहेंगे ।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में दीजिए

1 . महामनामालवीयस्य जन्मस्थानं कुत्र आसीत्?
उत्तर- महामनामालवीयस्य जन्म प्रयागनगरेऽभवत् ।

2 . महामना मालवीयः कस्य पुत्रः आसीत्?
उत्तर -मदनमोहनमालवीयस्य पण्डित ब्रजनाथमालवीयः पुत्रः आसीत् ।

3 . मालवीयः कुत्र प्राड्विवाककर्म कर्तुमारभत्?
उत्तर – मालवीयः प्रयागस्थे उच्चन्यायालये प्राड्विवाककर्म कर्तुमार भत् ।

4 . श्रीमालवीयस्य चरित्रे कः सर्वोच्चगुणः आसीत्?
उत्तर – श्रीमालवीयस्य चरित्रे सर्वोच्चगुणः जनसेवैवासीत् ।

5 . मालवीयः कथं सम्मानभाजनमभवत्?
उत्तर – महामनामालवीयः विधेः प्रकृष्टज्ञानेन, मधुरापालेन, उदारण्यवहारेण च सर्वेषां सम्मानभाजनमभवत् ।

6 . श्रीमालवीयः कस्य विश्वविद्यालयस्य संस्थापनम्करोत?
उत्तर- काशीविश्वविद्यालस्य स्थापनं महामनामदनमोहनमालवीयेन वाराणस्यां कृतम् ।

7 . हिन्दुविश्वविद्यालयस्य संस्थापकः कः आसीत्?
उत्तर – हिन्दुविश्वविद्यालयस्य संस्थापकः महामनामदनमोहनमालवीयः आसीत् ।

8 . मालवीयः कीदृशः पुरुषः आसीत्?
उत्तर – मालवीयः प्रकृष्टज्ञानवान्, मधुरभाषी उदारः च पुरुषः आसीत् ।

9 . मालवीय केशामुत्थानाय निरन्तरं प्रयत्नमकरोत्?
उत्तर – मालवीय हिन्दी-हिन्दु हिन्दुस्थानानामुत्थानाय निरन्तरं प्रयत्नमकरोत् ।

10 . काशीविश्वविद्यालयः कस्य यशसः प्रतिमूर्तिरिव विभाति?
उत्तर – काशीविश्वविद्यालय: महामनामालवीयस्य यशसः प्रतिमूर्तिरिव विभाति ।

11 . युवकः मालवीयः कथं जनानां मनांसि अमोहयत्?
उत्तर – युवक: मालवीयः स्वकीयेन प्रभावपूर्णभाषणेन जनानां मनांसि अमोहयत् ।

12 . मालवीयमहोदयः कस्मिन् वर्षे काङ्ग्रेसस्य अध्यक्षः अभवत्?
उत्तर – मालवीयमहोदयस्य: त्रयोविंशतितमे वर्षे काङ्ग्रेसस्य अध्यक्षः अभवत् ।

13 . कासु भाषासु मालवीय महोदयस्य समानः अधिकारः आसीत्?
उत्तर – हिन्दी-संस्कृत-आङ्ग्ल-भाषासु मालवीय महोदयस्य समानः अधिकारः आसीत् ।

14 . मालवीयमहोदयः अध्यापनकार्यं कुत्रआरब्धवान्? ।
उत्तर – मालवीयमहोदय: अध्यापनकार्यं प्रयागे राजकीय विद्यालये आरब्धवान् ।

15 . शिक्षायाःक्षेत्रे श्रीमालवीयः किमकरोत्?
उत्तर – शिक्षायाः क्षेत्रे श्रीमालवीय: काशीहिन्दुविश्वविद्यालयस्य संस्थापनमकरोत् ।

1-निम्नलिखित वाक्यों का संस्कृत में अनुवाद कीजिए

1 . मदनमोहन मालवीय का जन्म प्रयाग में हुआ था ।
अनुवाद- मदनमोहन मालवीयस्य जन्म प्रयागे अभवत् ।

2 . महामना मालवीय एक निपुण पत्रकार थे ।
अनुवाद – महामनामालवीयः एकः पटुः पत्रकारः आसीत् ।

3 . मालवीय जी एक श्रेष्ठ वक्ता थे ।
अनुवाद – मालवीयः एकः श्रेष्ठो: वक्तासीत् ।

4 . मालवीय सदैव पीड़ितों की सहायता करते थे ।
अनुवाद – मालवीयः सदैव पीडितानां साहाय्यमकरोत् ।

5 . वे आज भी हमारे समक्ष प्रकाशस्तम्भ की भाँति हैं ।
अनुवाद – सोऽद्यापि अस्मत्समक्ष प्रकाशस्तम्भ इव राजते ।

6 . मदनमोहन मालवीय ने काशी विश्वविद्यालय की स्थापना की ।
अनुवाद – मदनमोहनमालवीय: काशीविश्वविद्यालयस्य स्थापनामकरोत् ।

7 . वे बड़े दयालु थे ।
अनुवाद – सः अतिदयालुः आसीत् ।

8 . पण्डित ब्रजनाथ मालवीय इनके पिता थे ।
अनुवाद – पण्डित ब्रजनाथ मालवीयः तस्य पितुः आसीत् ।

9 . जनसेवा इनका सर्वोच्च गुण था ।
अनुवाद – जनसेवा: तस्य सर्वोच्चगुणः आसीत् ।

10 . मालवीय जी का हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी भाषा पर समान अधिकार था ।
अनुवाद – मालवीयस्य हिन्दी-संस्कृत-आङ्ग्ल च भाषासु समानः अधिकारः आसीत् ।

संस्कृत व्याकरण संबंधी प्रश्न

1 . निम्नलिखित धातु-रूपों में लकार, पुरुष तथा वचन लिखिए

धातु-रूप …………..लकार…………..पुरुष…………..वचन
अमोहयत्………….लङ्……………प्रथम…………..एकवचन
प्रायचछन्……………..लङ्………..प्रथम…………..बहुवचन
आरभत्………….लङ्……..प्रथम…………..एकवचन
भ्रश्यन्ति…………..लट ……….प्रथम…………..बहुवचन
आसीत्……..लङ् ………प्रथम…………..एकवचन
जयन्ति…………..प्रथम…………..बहुवचन
उदेति…………..लट…………..प्रथम…………..एकवचन
अत्यजत् …………..लङ्…………..प्रथम…………..एकवचन
अशक्नोत्………….लङ्/………प्रथम…………..एकवचन

2-निम्नलिखित शब्द-रूपों में प्रयुक्त विभक्ति तथा वचन लिखिए

शब्द-रूप………. विभक्ति………वचन
उपाधिने………चतुर्थी………एकवचन
भाषाणेन……….तृतीया……..एकवचन
राष्ट्रनायके:………. तृतीया……बहुवचन
दुःखिताम् …………..द्वितीया…….बहुवचन
विधेः ……….पञ्चमी/षष्ठी……..एकवचन
परिवारे…….सप्तमी……..एकवचन
उत्साहेन ………..तृतीया…….एकवचन
येषां……..षष्ठी………….बहुवचन
भाषासु……….सप्तमी……….बहुवचन
अस्मिन् ………..सप्तमी……….एकवचन
उत्थानाय्………..चतुर्थी………एकवचन
भारतीयनाम् …….षष्ठी……..बहुवचन
मित्राणां………..षष्ठी……….बहुवचन

3 . निम्नलिखित शब्दों में सन्धि-विच्छेद कीजिएतथा सन्धि का नाम लिखिए

सन्धिशब्द………. सन्धि-विच्छेद………सन्धिका नाम
देशसेवानुरक्तोऽयं ……….देशसेवा + अनुरक्तः + अयम् ………दीर्घ, पूर्णरूप सन्धि
अत्रैव …..अत्र + एव…………वृद्धि सन्धि
नात्यजत् …………..न + अत्यजत्………दीर्घ सन्धि
महतोत्साहन ……….महत + उत्साहन………..गुण सन्धि
सोऽपि,…….सो + अपि ………….पूर्वरूप संधि
सर्वोच्च………सर्व + उच्च …………….गुण सन्धि
मधुरालापेन……….मधुर + आलेपन………….दीर्घ संधि
तदनुसारम्………..तट् + अनुसारम्……………जश्त्व संधि
इत्युपाधिना………..इति + उपाधिना …………..यण संधि
धर्मेऽस्य…………धर्मे + अस्य …………..पूर्वरूप संधि
चायम्…….च + अयम्…………..दीर्घ संधि
अभिधातुमारब्धवन्तः …….अभिधातुम् + आरब्धवन्तः …….दीर्घ संधि

4 . निम्नलिखित शब्दों के विपरीतार्थक शब्द लिखिए

शब्द………………..विपरीतार्थक
उच्चः………….निम्नः
लौकिकः…………अलौकिक:
वीरः…………..कायर:
प्रकाशः……………..अन्धकारः
उदेति……………….अस्ते
विद्वानः……………मूर्खः
वृद्धः……………युवकः
मित्रः…………………..शत्रुः
जन्म:………………..मृत्युः
सम्मानम् ………अनादरं

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