UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 4 लाटी

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कक्षा 12 कथा भारती
UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 4 लाटी
लाटी कहानी -- लेखक पर आधारित प्रश्न

1 . शिवानी का जीवन परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए ।।

उत्तर – – लेखिका परिचय- सुप्रसिद्ध कथाकार शिवानी जी का जन्म 17 अक्तूबर, सन् 1923 ई० में राजकोट, (गुजरात) में हुआ था ।। इन्होंने शान्ति निकेतन और कलकत्ता विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की ।। इनका वास्तविक नाम गौरा पन्त था किन्तु ये ‘शिवानी’ के नाम से लेखन करती थी ।। अपने साहित्य-सर्जन के कारण साहित्य-जगत में शिवानी जी का महत्वपूर्ण स्थान है ।। पर्वतीय क्षेत्र से इनका व्यक्तिगत सम्पर्क रहा है, अत: इन्होंने पर्वतीय समाज को अपनी कहानियों का आधार बनाया है ।। देश की प्रमुख पत्रिकाओं में शिवानी जी की कहानियाँ प्रकाशित होती रहीं ।। 21 मार्च सन् 2003 ई० को दिल्ली में शिवानी जी का निधन हो गया ।।

कृतियाँ- शिवानी जी ने साहित्य की विविध-विद्याओं के क्षेत्र में अपना योगदान दिया ।। इन्होंने उपन्यास, कहानी, संस्मरण व रिपोर्ताज लिखे हैं ।। इनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैंकहानियाँ- सती, चील गाड़ी, फिरबे की? मौसी, लाटी, मधुयामिनी ।। कहानी-संग्रह- अपराधिनी, करिए छिमा, लाल हवेली, चार दिन, विषकन्या, पुष्पहार, मेरी प्रिय कहानियाँ ।। उपन्यास- कृष्णकली, भैरवी, चौदह फेरे, श्मशान चम्पा, मायापुरी, कैंजा, गैंडा, रथ्या, सुरंगमा, चल खुसरो घर आपने ।। संस्मरण- चार दिन का झूला, आमोदर, अमादेर शान्ति-निकेतन, समृति कलश, वातायन ।।

2 . शिवानी के कथा-शिल्प एवं शैली पर प्रकाश डालिए ।।

उत्तर – – कथा-शिल्प एवं शैली- शिवानी जी की कहानियों में अधिकांशतः पर्वतीय समाज से सम्बद्ध समस्याओं, प्रथाओं एवं मनोभावों का सहज चित्रण हुआ है ।। इन्होंने भावात्मक और सामाजिक-आर्थिक समस्याओं से जूझती-टकराती नारी को बड़े रोचक और मार्मिक रूप में अभिचित्रित किया है ।। शिवानी जी के कथानक निजी अनुभवों पर आधारित हैं ।। इनकी कहानियाँ प्राय: घटना-प्रधान और चरित्र-प्रधान हैं ।। घटना-प्रधान कहानियों में कौतूहल व चमत्कार देखने को मिलता है ।। चरित्र-प्रधान कहानियाँ प्रायः किसी गम्भीर सामाजिक अथवा मानसिक समस्या का चित्रण करती हैं ।। कहानियों के चरित्र प्रायः उच्चवर्गीय होते हैं ।। इनकी कहानियों में नारी तथा पुरुष दोनों के ही जीवन्त शब्दचित्र प्रस्तुत किए गए हैं ।। शिवानी जी की कहानियों पर बाँग्ला कथा-शैली का व्यापक प्रभाव है ।। इनकी भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ी बोली है, जिसमें प्राय: तत्सम शब्दावली का प्रयोग किया गया है ।। साथ ही आंचलिक शब्दावली, मुहावरों, लोकोक्तियों और काव्य-पंक्तियों का सुरुचिपूर्ण प्रयोग भी देखने को मिलता है ।। शब्द-रचना कोमल तथा मोहक है ।। कवित्वपूर्ण चित्रण और सटीक उपमाओं के कारण इनकी कहानियों में एक विशेष वातावरण मिलता है ।। यह लालित्य और कवित्वपूर्ण सम्मोहन, कहानी के अन्त तक पाठक पर छाया रहता है,जो शिवानी की निजी विशेषता है ।। इनकी कहानियाँ व्यंग्य प्रधान हैं ।। बड़े सीधे और शालीन ढंग से ये सामाजिक रूढ़ियों, विडम्बनाओं और बाह्याडम्बरों पर व्यंग्य करती हैं ।। कहानी के क्षेत्र में अपने योगदान के कारण शिवानी जी हिन्दी-साहित्य जगत में हमेशा अमर रहेंगी ।।

पाठ पर आधारित प्रश्न

1 . ‘लाटी’ कहानी का सारांश अपने शब्दों में लिखिए ।।

उत्तर – – कप्तान जोशी अपनी बीमार पत्नी के साथ टी .बी . अस्पताल गोठिया सेनेटोरियम के बँगला नम्बर तीन में पलंग के पास आराम की डाले बैठा रहता है ।। कभी टेम्प्रेचर चार्ट भरता है तथा कभी उसके दवाई देता है ।। कभी-कभी अपनी मीठी आवाज में पहाड़ी झोड़े गाता है; जिनकी मिठास में तिब्बती बकरियों के गले में बँधी घण्टियों की-सी छुनक रहती है ।। उसे सुनकर पहाड़ी मरीज कहते है- “वाह कप्तान साहब, एक और ।। ” अपनी पत्नी सुन्दरी बानो को देखकर वह धीमे से मुस्करा देता था ।। बानो भी बार-बार अपने पति को देखती रहती थी ।। बीमारी के कारण उसका चेहरा एकदम पीला हो गया था ।। वहाँ के डॉक्टर ने एक दिन कप्तान से कहा- “तुम जरा भी परहेज नहीं करते, मरीज को दवा से जीतना होगा, मुहब्बत से नहीं ।। ” कप्तान का चेहरा शर्म से लाल हो गया ।। कपतान के माता-पिता का पत्र आता है ।। वे लिखते हैं- “उनके कोई दस-बीस पूत नहीं हैं, यह बीमारी सत्यनाशी है ।। ” कप्तान अभी भी पहले की ही तरह अपनी पत्नी से प्रेम करता है ।। कभी उसके चिकने केशों को चूमता है तो कभी उसकी पलकों को ।। कप्तान उदास रहने लगा ।। बानो भी अब उदास रहने लगी ।। कप्तान को अपने वे पुराने दिन याद आने लगे, जब वह बानो को अपने ओवरकोट में लपेटकर अपनी देह से सटाए लम्बे चीड़ के वृक्ष की छाया में बैठा रहता था ।। वह बानो की हर जिद पूरी करता था ।। एक दिन डॉक्टर ने कमरा खाली करने का नोटिस दे दिया और कहा कि ‘मरीज तीन दिन से अधिक नहीं बचेगी ।। ‘ इसका मतलब था कि मृत्यु समीप है ।। मृत्यु का पासपोर्ट पाए बानो जैसे मरीजों के लिए भुवाली के पास ही चाय की दुकान के नीचे एक कमरा था ।। कप्तान ने भूमिका बाँधते हुए कहा- “सैनेटोरियम छोड़कर हम कल दूसरी जगह चलेंगे बानो, यहाँ साली तबीयत बोर हो गई है ।। ” बानो समझ गई कि आज उसे भी नोटिस दे दिया गया ।। रात को वह बानो के पास गुनगुनाता रहा, उसके बाद बानो को नींद आ गई ।। कप्तान भी सो गया ।। सुबह उठकर देखा तो बानो पलंग पर नहीं थी ।। उसने बहुत ढूँढ़ा लेकिन बानो का कहीं पता नहीं चला ।। दूसरे दिन रथी घाट पर बानो की साड़ी मिली ।। मृत्यु के आने से पूर्व वह अभागी स्वयं ही मृत्यु से मिलने चली गई ।। कप्तान एक साल के अन्दर ही दूसरी शादी कर लेता है ।। एक सन्त बानो को बचा लेता है और उपचार के बाद उसका क्षयरोग भी ठीक हो जाता है लेकिन उसकी जबान व स्मृति नहीं रहती है ।। कप्तान अपनी पत्नी प्रभा के साथ घूमने जाता है ।। भुवाली में चाय की दुकान पर उसकी भेंट बानो से होती है ।। वह समझ जाता है कि यह बानो है लेकिन अपनी पत्नी प्रभा के सामने वह उसे स्वीकार नहीं कर पाता है ।। चाय वाले दुकानदार ने बताया- “यह लाटी है, असली नाम क्या है, पता नहीं ।। ” जिस दल के साथ लाटी आई थी उसकी हेड वैष्णवी ने कहा- हमारे गुरु महाराज को इसकी देह नदी में तैरती हुई मिली ।। जीभड़ी कटकर गिर गई होगी ।। इसके गले में मंगलसूत्र था, ब्याह हो गया होगा ।। इसे भयंकर क्षय रोग था, गुरु की शरण में रोग ठीक हो गया ।। कप्तान की पत्नी प्रभा ने कहा- “अपने आदमी को भी भूल गई क्या?” वैष्णवी बोली- उसे कुछ याद नहीं है ।। चाय के पैसे देकर वैष्णवी हल्की-हल्की सी ठोकर मारकर कहती है- “उठ साली लाटी ।। ” सब चले गए लाटी भी दल के पीछे-पीछे चली गई ।।

2- ‘लाटी’कहानी के शीर्षक की उपयुक्तता पर प्रकाश डालिए ।।

उत्तर – – प्रस्तुत कहानी का शीर्षक ‘लाटी’ पूरी कथा को स्वयं में समाहित किये हुए है ।। लाटी के जीवन की त्रासदपूर्ण व्यथा को स्पष्ट करना कहानीकार का मन्तव्य है ।। शीर्षक संक्षिप्त, सारगर्भित, कथा का वाहक और कथा के मूल-भाव पर आधारित है ।। अतः कहा जा सकता है कि प्रस्तुत कहानी का शीर्षक ‘लाटी’ सर्वथा उपयुक्त एवं सार्थक है ।।

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3 . ‘लाटी’ कहानी में लेखिका शिवानी को अपने उद्देश्य में कहाँ तक सफलता प्राप्त हुई है?स्पष्ट कीजिए ।।


उत्तर – – आलोच्य कहानी का उद्देश्य मध्यमवर्गीय समाज में पति के बिना अकेली रहनेवाली पत्नी के जीवन की त्रासद को दिखाना रहा है, जिसमें लेखिका को पूर्ण सफलता प्राप्त हुई है ।। लेखिका ने यह भी सन्देश दिया कि आज महिला ही महिला के शोषण में लगी है; अत: उन्हें अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करते हुए उनके साथ सहयोग करते हुए अपनी उन्नति के मार्ग को प्रशस्त करना चाहिए ।। लेखिका का एक उद्देश्य यह भी है कि यदि क्षयरोग जैसे असाध्य रोग में परिजनों का सहयोग और सहानुभूति रोगी को मिले तो व्यक्ति को मृत्यु के आगोश में जाने से बचाया भी जा सकता है ।। यही कारण है कि लम्बी-चौड़ी देहेवाली नेपाली भाभी एक दिन अचानक दम तोड़ देती है और हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गई रुई के फाये जैसी बानो का क्षयरोग बाल भी बाँका न कर सका ।।

4 . ‘लाटी’ कहानी के आधार पर कहानी की नायिका का चरित्र चित्रण कीजिए ।।

उत्तर – – कहानी के आरम्भ में लाटी का नाम बानो है ।। जब कप्तान जोशी से उसका विवाह हुआ था, उसका आयु केवल सोलह वर्ष थी ।। वह अत्यन्त सुन्दर और दुबली-पतली थी ।। वही कहानी की नायिका भी है ।। उसके चरित्र की विशेषताओं का वर्णन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है(i) अत्यन्त मोहक और भोली-भाली- लाटी अर्थात् बानो अत्यन्त मोहक व्यक्तित्व की भोली-भाली किशोरी है ।। गोल, गोरा-सुन्दर चेहरा, बड़ी-बड़ी शान्त आँखें उसके भोलेपन को दर्शाती हैं यह उसके भोलेपन का ही प्रमाण है कि विवाह के दो दिन बाद भी वह अपने पति कप्तान जोशी को बड़ी मुश्किल से अपना नाम बता पाता है ।।
(ii) जिद्दी और चिड़चिड़ी- बानो यद्यपि स्वभाव से हँसमुख और प्रसन्नचित्त युवती है, किन्तु असाध्य क्षयरोग ने उसे चिड़चिड़ी और जिद्दी बना दिया था ।। शिवानी ने उसके इस स्वभाव का वर्णन इस प्रकार किया है- “नित्य निकट आती मौत ने बानों को चिड़चिड़ा बना दिया, “कभी वह खिली चाँदनी में बाहर जाने को मचलती ।। “
(iii) अत्यन्त भावुक- बानो अत्यन्त चावुक स्वभाव की शर्मिली किशोरी है ।। विवाह के पश्चात् वह बड़ी कठिनाई से अपनानाम बता पाती है ।। जब पति जोशी उससे कहता हैं कि तुम्हारा बानो नाम तो मुसलमानी है ।। इस पर उसकी आँखें छलछला आती हैं- “सब यही कहते हैं, मैं क्या करूँ?” पति कप्तान जोशी के बसरा जाते समय तो वह स्वयं को रोक ही नहीं पाती और उसके पैरों में पड़ जाती है-“उसकी पलकें भीगी थीं और पति की आहट पाकर उसने घुटनों में सिर डाल दिया ।। . . .” उसका गला भर आया ।।

(iv) परिश्रमी और सहिष्ण- परिश्रमशीलता और सहिष्णुता स्त्री का गहना है और लाटी इससे सुशोभित है ।। वह सात-सात ननदों के ताने चुपचाप सुनती हैं, भतीजों के कपड़े धोती है, ससुर के होज बीनती है और पाँच-पाँच सेर उड़द की बड़ियाँ तोड़ने के बाद भी सास के व्यंग्य-बाण सहती है, किन्तु मुख से कुछ नहीं कहती ।। वह मन-ही-मन घुलती रहती है ।। वह दो साल वापस आये अपने पति भी इसके विषय में कुछ नहीं कहती”कप्तान को देखकर उसकी तरल आँखें खुली ही रह गयीं, फिर आँसू टपकने लगे ।। कहने और कैफियत देने की कोई गुंजाइश नहीं रही ।। बानों के बहते आँसुओं की धारा ने दो साल के सारे उलाहने सुना दिये ।। दोनों ने समझ लिया कि मिलन के वे क्षण मुट्ठी भर ही रह गये थे ।। ” पतिव्रता- बानो पतिव्रता स्त्री है ।। जब वह अपनी मृत्यु को सन्निकट देखती है तो चुपचाप पति के जीवन से चले जाने का निर्णय कर लेती है, जिससे उसे दुःख न पहुँचे ।। अपने पति को दुःख से मुक्ति प्रदान करने के लिए वह रात्रि में किराये के कमरे से चुपचाप निकलकर नदी में छलाँग लगा लेती है ।। इस प्रकार बानो अर्थात् लाटी का चरित्र अत्यन्त भावपूर्ण और आकर्षक है ।।

5 . कप्तान जोशी का चरित्र-चित्रण ‘लाटी’ कहानी के आधार पर कीजिए ।।

उत्तर – – सुप्रसिद्ध कथा-लेखिका शिवानी की ‘लाटी’ कहानी के प्रमुख पात्र कप्तान जोशी की चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित है

(i) आकर्षक व्यक्तित्व- कप्तान का व्यक्तित्व बहुत ही आकर्षक था ।। लेखिका ने लिखा है कि उसका छह फुट का कसा हुआ शरीर और भरी-भरी मूछे थी ।। वह ठसकेदार बाँका कप्तान था ।।
(ii) चरित्रवान्- फौजी अफसरों में कप्तान की सबसे छोटी उम्र का था ।। उसके बारे में लेखिका ने लिखा है कि “बर्मा की युद्ध से स्तब्ध सड़कों पर चपल बर्मी रमणियों के कुटिल कटाक्षों का अभाव नहीं था, फिर भी कप्तान अपनी जवानी को दाँतों के बीच जीभ-सी बचाता सेंत गया ।। “

(ii) पत्नी स्नेही- कप्तान जोशी के हृदय में अपनी पत्नी के प्रति विशेष स्नेह है ।। छूत की बीमारी टी०बी० से ग्रसित होने पर भी वह उसे अकेला नहीं छोड़ता ।। उसके माता-पिता सभी उसे इस सम्बन्ध में चेतावनी देते हैं, लेकिन वह किसी को नहीं सुनता ।। वह कभी बानो के चिकने केशों को चूमता, कभी उसकी रेशमी पलकों को ।। कहानी के अन्त में; लाटी के चले जाने के बाद; लेखिका कहती है कि, “कुछ ही पलों में वह बूढ़ा और खोखला हो गया था ।। ” ये बाते स्पष्ट करती हैं कि वह अपनी पूर्व पत्नी बानों से अत्यधिक प्रेम करता था ।।

(iv) समय का पाबन्द और सेवा-भावना से युक्त- कप्तान समय के महत्त्व को अच्छी तरह से समझता था ।। इसलिए वह अपनी रोगिणी पत्नी को समय से दवाई देता और समय से उसके शरीर का तापक्रम नापता था ।। उसके अन्दर सेवा-भावना भी कूट-कूटकर भरी हुई थी ।। वह अपनी बीमार पत्नी के साथ हर समय रहता था और उसकी हर-सम्भव सेवा करना अपना फर्ज समझता था ।। उसकी सेवा-भावना को देखकर आस-पास के मरीज भी उसकी सराहना करते थे ।।

(v) प्रसन्नचित्त- कप्तान बहुत ही प्रसन्नमिजाज का व्यक्ति था ।। वह अपनी बातों से दूसरे रोगियों को भी प्रसन्न रखता था ।। उसके आनन्दित चेहरे पर भी खीझ या झुंझलाहट दिखाई नहीं पड़ती थीं ।। हँसने की कोई भी बात वह बानो को भी सुनाना नहीं भूलता था ।।

(vi) भविष्य के प्रति चिन्तित- जब कप्तान की नेपाली भाभी की मौत हो गयी, जो कि लाल, गोरी और हृष्ट-पुष्ट थी, उसकी तुलना में बानों तो रुई का फाहा थी ।। अब वह बानो के बारे में सोच-समझकर उदास रहने लगा था ।। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कप्तान जोशी में एक श्रेष्ठ इन्सान के समस्त मौजूद हैं ।।

6 . कहानी के तत्वों के आधार पर लाटी’कहानी की समीक्षा कीजिए ।।

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उत्तर – – शिवानी हिन्दी की एक प्रसिद्ध महिला कथाकार रही हैं ।। इनकी कहानियों में नारी के विभिन्न रूपों का सुन्दर चित्रण हुआ है ।। सामाजिक रूढ़ियों और आडम्बरों पर वे शालीन व्यंग्य करती हैं ।। प्रस्तुत कहानी ‘लाटी’ में एक महिला की कथा है ।। कहानीकला के तत्त्वों के आधार पर इस कहानी की समीक्षा निम्नवत् है

(i) शीर्षक- कहानी का शीर्षक संक्षिप्त, सरल, कौतूहलवर्द्धक तथा आकर्षक है ।। कहानी का मूल भाव शीर्षक के साथ जुड़ा है ।। शीर्षक पढ़ते ही जिज्ञासा होती है, कौन लाटी? ‘लाटी’ के अतिरिक्त अन्य कोई भी शीर्षक पाठकों की जिज्ञासा में इतनी वृद्धि नहीं कर सकता था, जितना ‘लाटी’ ने किया ।। अतः प्रस्तुत कहानी का यह शीर्षक पूर्णतया उपयुक्त है ।।

(ii) कथानक- बानो से विवाह के तीसरे ही दिन कप्तान को बरस जाना पड़ा ।। अपनी खिलौने-सी बहू से उसे अतिशय प्यारहै ।। दो वर्ष बाद जब वह वापस लौटता है तो उसे पता चलता है कि उसकी पत्नी एक टी० बी० सैनेटोरियम में भर्ती है ।। इन दो वर्षों में सास-ननदों के ताने सुने; घर के समस्त काम किये और अन्ततः बीमार होकर सैनेटोरियम की चारपाई पकड़ ली ।। कप्तान आता है, उसे हर प्रकार की सुविधा उपलब्ध कराता है और उसकी समस्त सेवा-शुश्रूषा स्वयं करता है ।। डॉक्टरों ने उसके बचने की उम्मीद छोड़ दी और उसके तीन बच्चे भी बड़े हो जाते हैं ।। सोलह-सत्रह वर्षों के बाद जब वह नैनीताल घूमने आता है तो एक चाय की दुकान पर बानो लाटी के रूप में जीवित मिलती है, जिसकी याददाश्त जा चुकी है और वह बोल नहीं सकती ।। प्रस्तुत कहानी का अन्त नाटकीय है, कहानी में उत्सुकता, आकर्षण तथा सुगठन है ।। बानो को लाटी के रूप में जीवित दिखाकर लेखिका ने कथा में एक अकल्पनीय मोड़ प्रस्तुत किया है ।। कथा-लेखिका ने मुख्य घटना के घटने तक पाठकों की जिज्ञासा को बनाये तथा उन्हें कहानी से बाँधे रखा है ।। घटना का क्रम, उदय, विकास और उपसंहार अत्यधिक सुनियोजित ढंग से हुआ है ।। कहानी में प्रवाह और गतिशीलता अन्त तक बनी हुई है ।। अत: कहा जा सकता है कि कथानक के तत्त्वों की दृष्टि से लाटी एक उत्कृष्ट कहानी है ।।

(iii) पात्र और चरित्र-चित्रण- कहानी में मुख्य पात्र सिर्फ दो हैं-कप्तान और बानो ।। शेष सभी पात्र गौण हैं: जिसमें बानों के सास-ससुर, प्रभा और उसके बेटे-बेटी, वैष्णव साध्वियाँ आदि ।। ये सभी केवल कथाकन को गतिमयता प्रदान करने के उद्देश्य से ही कथा में आये हैं ।। कहानी के मुख्य पात्र कप्तान का चरित्र-चित्रण करने में लेखिका ने कोई कसर नहीं छोड़ी है ।। एक उदाहरण देखिए

बँगले के बरामदे में पत्नी के पलंग के पास वह दिन भर आराम-कुर्सी डाले बैठा रहता है, कभी अपने हाथों से टेम्प्रेचर चार्ट भरता और कभी समय देखकर दवाइयाँ देता ।। . . . . . . . . कभी उसके चेहरे पर झुंझलाहट या खीझ की अस्पष्ट रेखा भी नहीं उभरती ।। कभी वह घुघराले बालों को बुश से सँवारता, बड़े ही मीठे स्वर में पहाड़ी झोड़े गाता, जिनकी मिठास में तिब्बती बकरियों के गले में बँधी, बजती-रुनकती घण्टियों की-सी छुनक रहती ।। पहाड़ी मरीज बिस्तरों से पुकार कर कहते, “वाह कप्तान साहब, एक और ।। ” कप्तान अपने पलँग से घुली मिली सुन्दरी ‘बानो’ की ओर देख बड़े लाड़ से मुस्करा देता ।।
अत: पात्र और चरित्र-चित्रण की दृष्टि से लाटी को एक श्रेष्ठ कहानी माना जा सकता है ।।

(iv) कथोपकथन- इस कहानी के कथोपकथन सरल, सरस, सुरुचिपूर्ण, संक्षिप्त तथा पात्रानुकूल है ।। घटना तथा चरित्रों को सजीवता प्रदान करने का गुण शिवानी के संवादों में मिलता है ।। नारी पात्रों का यथार्थवादी चित्रण प्रस्तुत करने में उन्हें सफलता मिली है ।। संवाद कथा को प्रवाह प्रदान करने में समर्थ हैं ।। संवादों का पैनापन रोचकता उत्पन्न करता है; यथाप्रभा ने गाड़ी रुकवा दी, “इसी दुकान में आज एकदम पहाड़ी स्टाइल से कलई के गिलास में चाय पिएँगे, हनी ।। ” वह बोली ।। कप्तान अब मेजर था, “मेजर की डिग्निटी कहाँ जाएगी ।। ?”वह बोला ।।
“भाड़ में!”कहकर प्रभाअपनी पेंसिल हील की जूतियाँ चटकातीदुकान में घुस गयी ।।

(v) भाषा-शैली- शिवानी घटनाप्रधान अथवा चरित्रप्रधान कहानियाँ लिखती हैं ।। कौतूहल तथा चमत्कार की उत्पत्ति शिवानी जी की शैली की विशेषताएँ हैं ।। नारी के जीवन्त शब्द-चित्र उकेरने में वे अप्रतिम हैं ।। इनकी भाषा तत्समप्रधान है ।। आंचलिक शब्दावली, अंग्रेजी के वाक्यों, मुहावरों तथा कहीं-कहीं कवित्वपूर्ण पंक्तियों का प्रयोग इनकी भाषा की विशिष्टता है ।। इनकी कथा-शैली में अद्भुत सम्मोहन रहता है ।। निम्नलिखित उदाहरणों में सजीव शब्द-चित्र देखते ही बनते हैं
(क) सैनेटोरियम की मनहूस जिन्दगी के काले आकाश में रोबदार ठकुरानी ही एकमात्र द्युतिमान तारिका थीं ।। भरे-भरे हाथ-पैर की, चिकनी चेहरे पर सदा मुस्कान बिखेरती वह पूरे सैनेटोरियम की भाभी थी ।। उसके स्वास्थ्य के दुर्गम दुर्ग में भी नजाने बीमारी का घुन किस आरक्षित छिद्र से प्रवेश पा गया था ।। टी०बी लगने की पीड़ा से कराहती वह अपनी कदर्य गालियों का अक्षय भण्डार खोल देती ।। कभी लक्षपति श्वसुर को लक्ष्य बनाती, “हैं हमारे बुडज्यू’ आधी कमाऊँ के छत्रपति, पर बहू तिाण (श्मशान)कोजा रही है तो उनका बलासे!

(ख) कुत्सित बूढ़ी अधेड़ वैष्णवियों के बीच देवांगन-सी सुन्दरी लाटी अपनी दाडिम-सी दंतपंक्ति दिखाकर हँस दी ।। मेजर का शरीर सुन्न पड़ गया ।। स्वथ्य होकर जैसे साक्षात् बानो ही बैठी थी ।। गालों पर स्वास्थ्य की लालिमा थी, कान तक फैली आँखों में वही तरल स्निग्धता थी और गूंगी जिह्वा का गूंजापन चेहरे पर फैलकर उसे और भी भोला बना रहा था ।।

(vi) देश-काल तथा वातावरण- शिवानी सजीव वातावरण के चित्रण में सिद्धहस्त हैं ।। ‘लाटी’ नामक कहानी में भी आधुनिक महिला के वस्त्र, भाषा तथा वाक्-चातुर्य से वातावरण का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया है ।। देश-काल तथा वातावरण की दृष्टि से ‘लाटी’ एक सफल रचना है ।। कहानी के वातावरण को स्वाभाविक और सजीव बनाने की पूरी कोशिश की गयी है, जो निम्नलिखित उदाहरण से स्पष्ट हैलम्बे देवदारों का झुरमुट झुक-झुककर गोठिया सैनेटोरियम की बलैया-सी ले रहा था ।। काँच की खिड़कियों पर सूरज की आड़ी-तिरछी किरणें मरीजों के क्लांत चेहरों पर पड़कर उन्हें उठा देती थीं ।। मौत की नगरी के मुसाफिरों के रोग-जीर्ण पीले चेहरे सुबह की मीठी धूप में क्षणभर को खिल उठते ।। आज टी०बी०, सिरदर्द और जुकाम-खाँसी की तरह आसानी से जीतने वाली बीमारी है, पर आज से कोई बीस साल पहले टी०बी० मृत्यु का जीवन्त आह्वान थी ।। भुवाली से भी अधिक माँग तब गोठिया सैनेटोरियम की थी ।। काठगोदाम से कुछ ही मील दूर एक ऊँचे पहाड़ पर गाठिया सैनेटोरियम के लाल लाल छत्तों के बँगले छोटे-छोटे गुलदस्ते से सजे थे ।।

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(vii) उद्देश्य- शिवानी की कहानियाँ चित्रण अथवा घटनाप्रधान होती है ।। इन कहानियों का उद्देश्य मुख्यतः मनोरंजन प्रदान करना ही होता है ।। इसके साथ-ही लेखिका अपने पाठक को आज के समाज की वास्तविकता से भी अवगत कराना चाहती हैं ।। इस प्रकार कहानी-कला के तत्त्वों की दृष्टि से शिवानी जी की ‘लाटी’ कहानी सफल कहानी है ।। इसमें प्रारम्भ से अन्त तक पाठक के हृदय को बाँध लेने का गुण विद्यमान है ।।

7 . पात्र योजना और चरित्र-चित्रण की दृष्टि से ‘लाटी’ कहानी का मूल्यांकन कीजिए ।।

उत्तर – – कहानी में मुख्य पात्र सिर्फ दो हैं-कप्तान और बानो ।। शेष सभी पात्र गौण हैं; जिसमें बानों के सास-ससुर, प्रभा और उसके बेटे-बेटी, वैष्णव साध्वियाँ आदि ।। ये सभी केवल कथाकन को गतिमयता प्रदान करने के उद्देश्य से ही कथा में आये हैं ।। कहानी के मुख्य पात्र कप्तान का चरित्र-चित्रण करने में लेखिका ने कोई कसर नहीं छोड़ी है ।।
एक उदाहरण देखिए
बँगले के बरामदे में पत्नी के पलंग के पास वह दिन भर आराम-कुर्सी डाले बैठा रहता है, कभी अपने हाथों से टेम्प्रेचर चार्ट भरता और कभी समय देखकर दवाइयाँ देता ।। . . . . . . . . . कभी उसके चेहरे पर झुंझलाहट या खीझ की अस्पष्ट रेखा भी नहीं उभरती ।। कभी वह घुघराले बालों को ब्रुश से सँवारता, बड़े ही मीठे स्वर में पहाड़ीझोड़े गाता, जिनकी मिठास में तिब्बती बकरियों के गले में बँधी, बजती-रुनकती घण्टियों की-सी छुनक रहती ।। पहाड़ी मरीज बिस्तरों से पुकार कर कहते, “वाह कप्तान साहब, एक और ।। ” कप्तान अपने पलँग से घुली मिली सुन्दरी ‘बानो’ की ओर देख बड़े लाड़ से मुस्करा देता ।।
अत: पात्र और चरित्र-चित्रण की दृष्टि से लाटी को एक श्रेष्ठ कहानी माना जा सकता है ।।

8 . वातावरण चित्रण की दृष्टि से लाटी’ कहानी की लेखिका शिवानी ने कहाँ तक सफलता प्राप्त की है?

उत्तर – – शिवानी सजीव वातावरण के चित्रण में सिद्धहस्त हैं ।। ‘लाटी’ नामक कहानी में भी आधुनिक महिला के वस्त्र, भाषा तथा वाक्चातुर्य से वातावरण का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया है ।। देश-काल तथा वातावरण की दृष्टि से ‘लाटी’ एक सफल रचना है ।। कहानी के वातावरण को स्वाभाविक और सजीव बनाने की पूरी कोशिश की गयी है, जो निम्नलिखित उदाहरण से स्पष्ट हैलम्बे देवदारों का झुरमुट झुक-झुककर गोठिया सैनेटोरियम की बलैया-सी ले रहा था ।। काँच की खिड़कियों पर सूरज की आड़ी-तिरछी किरणें मरीजों के क्लांत चेहरों पर पड़कर उन्हें उठा देती थी ।। मौत की नगरी के मुसाफिरों के रोग-जीर्ण पीले चेहरे सुबह की मीठी धूप में क्षणभर को खिल उठते ।। आज टी०बी० सिरदर्द और जुकाम-खाँसी की तरह आसानी से जीतने वाली बीमारी है, पर आज से कोई बीस साल पहले टी०बी० मृत्यु का जीवन्त आह्वान थी ।। भुवाली से भी अधिक माँग तब गोठिया सैनेटोरियम की थी ।। काठगोदाम से कुछ ही मील दूर एक ऊँचे पहाड़ पर गाठिया सैनेटोरियम के लाल-लाल छत्तों के बँगले छोटे-छोटे गुलदस्ते से सजे थे ।।

9 . लाटी कहानी का अंत आपको कैसा लगा तथा इससे आपको क्या शिक्षा मिली?

उत्तर – – लाटी अत्यन्त संवेदनशील तथा मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने वाली कहानी है ।। जिसका अंत बहुत ही भावुक तथा मर्मस्पर्शी है ।। कप्तान जोशी जो बानो (लाटी) को मृत मान चुका था, जब बानो उन्हें लाटी के रूप में मिलती है तो वह असंमजस की स्थिति में आ जाता है ।। जो लाटी भयंकर क्षय रोग से पीड़ित थी और मृत्यु के द्वार पर थी, वही आज गालों पर स्वास्थ्य की लालिमा लिए उसके सामने उपस्थित थी ।। मेजर के जिन्दगी में आगे बढ़ जाने से तथा उसका लाटी को, जो अपनी याददाश्त तथा आवाज खो चुकी थी, को बानो के रूप में न पहचानना कहानी का अत्यन्त मार्मिक क्षण है ।। कहानी ‘लाटी’ से हमें शिक्षा मिलती है कि समाज में आज महिलाएँ ही महिलाओं के शोषण का कारण बनी हुई है, उन्हें अपनी विचार-धारा, अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करके उनके साथ सहयोग करना चाहिए ।। ‘इस कहानी से यह भी शिक्षा मिलती है कि यदि परिजनों का सहयोग व सहानुभूति मिले तो क्षयरोग, जैसे असाध्य रोगों से ग्रसित रोगी को भी मृत्यु के आगोश में जाने से बचाया जा सकता है ।। परिजनों का सहयोग तथा प्रेम इस प्रकार के असाध्य रोगियों के लिए संजीवनी का कार्य करता है ।।

10 . कथानक की दृष्टि से लाटी’ कहानी की समीक्षा कीजिए ।।


उत्तर – – बानो से विवाह के तीसरे ही दिन कप्तान को बरस जाना पड़ा ।। अपनी खिलौने-सी बहू से उसे अतिशय प्यार है ।। दो वर्ष बाद जब वह वापस लौटता है तो उसे पता चलता है कि उसकी पत्नी एक टी० बी० सैनेटोरियम में भर्ती है ।। इन दो वर्षों में सासननदों के ताने सुने; घर के समस्त काम किये और अन्ततः बीमार होकर सैनेटोरियम की चारपाई पकड़ ली ।। कप्तान आता है, उसे हर प्रकार की सुविधा उपलब्ध कराता है और उसकी समस्त सेवा-शुश्रूषा स्वयं करता है ।। डॉक्टरों ने उसके बचने की उम्मीद छोड़ दी और उसके तीन बच्चे भी बड़े हो जाते हैं ।। सोलह-सत्रह वर्षों के बाद जब वह नैनीताल घूमने आता है तो एक चाय की दुकान पर बानो लाटी के रूप में जीवित मिलती है, जिसकी याददाश्त जा चुकी है और वह बोल नहीं सकती ।। प्रस्तुत कहानी का अन्त नाटकीय है, कहानी में उत्सुकता, आकर्षण तथा सुगठन है ।। बानो को लाटी के रूप में जीवित दिखाकर लेखिका ने कथा में एक अकल्पनीय मोड़ प्रस्तुत किया है ।। कथा-लेखिका ने मुख्य घटना के घटने तक पाठकों की जिज्ञासा को बनाये तथा उन्हें कहानी से बाँधे रखा है ।। घटना का क्रम, उदय, विकास और उपसंहार अत्यधिक सुनियोजित ढंग से हुआ है ।। कहानी में प्रवाह और गतिशीलता अन्त तक बनी हुई है ।। अत: कहा जा सकता है कि कथानक के तत्त्वों की दृष्टि से लाटी एक उत्कृष्ट कहानी है ||

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