UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 6 कर्मनाशा की हार

UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 6 कर्मनाशा की हार

कक्षा 12 कथा भारती
UP Board Solutions for Class 12 Samanya Hindi कथा भारती Chapter 6 कर्मनाशा की हार
कर्मनाशा की हार  कहानी   लेखक पर आधारित प्रश्न

1 . शिवप्रसाद सिंह का जीवन परिचय देते हुए उनकी कृतियों का उल्लेख कीजिए ।।

उत्तर – – लेखक परिचय- प्रसिद्ध कहानीकार शिवप्रसाद सिंह का जन्म वाराणसी जनपद के जलालपुर गाँव में 19 अगस्त, सन् 1928 ई० को एक कृषक परिवार में हुआ था ।। इनके पिता का नाम चन्द्रिकाप्रसाद सिंह था ।। इन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा उदयप्रताप कॉलेज, वाराणसी से प्राप्त की ।। स्नातकोत्तर तथा पी०एच०डी० की उपाधियाँ इन्होंने ‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से प्राप्त की ।। ‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय’ में ही ये हिन्दी विभाग में ‘रीडर’ पद पर कार्यरत रहे ।। भारत सरकार की नई शिक्षा नीति के अन्तर्गत यू०जी०सी० ने सन् 1986 ई० में इन्हें हिन्दी पाठ्यक्रम विकास केन्द्र’ का समन्वयक भी नियुक्त किया ।। ये रेलवे बोर्ड के ‘राजभाषा विभाग के मानद सदस्य भी रहे और ‘साहित्य अकादमी’, ‘बिरला फाउंडेशन’ तथा ‘उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान’ जैसी अनेक संस्थाओं से किसी-न-किसी रूप में जुड़े रहे ।। सन् 1990 ई० में नीला चाँद’ उपन्यास के लिए इन्हें ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया ।। आलोचना, कहानी, सम्पादन, नाटक, उपन्यास, शोध व जीवनी आदि साहित्यिक विधाओं के क्षेत्र को इन्होंने अपनी लेखनी से समृद्ध किया ।। 28 सितम्बर, सन् 2008 ई० को यह महान कहानीकार इस असार संसार से सदैव के लिए विदा हो गया ।। कृतियाँ- शिवप्रसाद जी की प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार हैंकहानी- आर-पार की माला, मुरदा सराय, भेड़िये, बिन्दा महाराज, हाथ का दाग, सुबह के बादल, इन्हें भी इन्तजार है, कर्मनाशा की हार, दादी माँ, अँधेरा हँसता है, केवड़े का फूल, अरुन्धती ।। उपन्यास– अलग-अलग वैतरणी, दिल्ली दूर है, कुहरे में युद्ध, वैश्वानर, गली आगे मुड़ती है, औरत, नीला चाँद, चाँद फिर उगा ।। नाटक- घंटियाँ गूंजती हैं ।। जीवनी-उत्तरयोगी श्री अरविन्द ।। निबन्ध संग्रह-शिखरों के सेत, चतुर्दिक, कस्तुरी मृग ।। रिपोर्ताज-अन्तरिक्ष के मेहमान ।। आलोचना-विद्यापति, आधुनिक परिवेश और नवलेखन ।। सम्पादन- शान्तिनिकेतन से शिवालिक तक ।।
इनकी कर्मनाशा की हार’ शीर्षक कहानी का उर्दू, रूसी, जर्मन, अंग्रेजी आदि भाषाओं में अनुवाद हो चुका है ।।

2 . शिवप्रसाद सिंह के कथा-शिल्प एवं शैली पर प्रकाश डालिए ।।

उत्तर – – कथा-शिल्प एवं शैली- शिवप्रसाद सिंह की कहानियों में सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन के सम-समायिक चित्रों का अंकन किया गया है ।। ग्राम्यांचलों के प्रति इनकी विशेष रुचि है ।। व्यक्तिगत एवं सामाजिक समस्याओं तथा रूढ़ियों से ग्रस्त मानवता के प्रति इनमें गहन-संवेदना है ।। ये समन्वयशील विचारक हैं ।। जीवन के यथार्थ को ये नैतिक समाधान देते हैं ।। प्राचीन नैतिक आदर्शों पर आधारित ये कहानियाँ नैतिकता, बौद्धिकता और तर्क की कसौटी पर भी खरी उतरती हैं ।। इनकी कहानियों में निम्नवर्ग के प्रतिनिधि पात्र स्थान पाते रहे हैं ।। चरित्र-चित्रण व्यक्तिपरक तथा मनोवैज्ञानिक होता है ।। समस्यात्मक पृष्ठभूमि पर आधारित पात्रों के मनोद्वन्द्व को उभारने में ये सिद्धहस्त हैं ।। इनकी कहानियों की भाषा प्रांजन है, किन्तु उसमें व्यावहारिक और लोकजीवन की शब्दावली का सटीक प्रयोग भी देखने को मिलता है ।। इनकी रचना-शैली सरलता, सहजता तथा चित्रात्मकता से युक्त है ।। भावात्मकता एवं कवित्वपूर्ण वर्णनों के कारण इनकी कहानियाँ अतिमोहक एवं मर्मस्पर्शी बन पड़ी हैं ।। साहित्य जगत में शिवप्रसाद सिंह के महत्वपूर्ण योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा ।।

पाठ पर आधारित प्रश्न

1 . ‘कर्मनाशा की हार’ कहानी का सारांश लिखिए ।।

उत्तर – – फुलमतिया और कुलदीप साधारण युवती-युवक हैं ।। कुलदीप के वंश-मर्यादा के विपरीत मल्लाह की विधवा बेटी फूलमत के प्रति अनुरक्त होने से कुलदीप के बड़े भाई भैरो पाण्डे दुःखी हैं ।। वे दोनों कर्मनाशा नदी के तट पर चुपचाप मिलने जाते हैं, भैरो पाण्डे उन्हें डाँटते हैं ।। लज्जा व भय से कुलदीप घर से भाग जाता है ।। भैरो पाण्डे विचारशील हैं ।। ‘कर्मनाशा’ नदी में जब बाढ़ आती है तो वह नरबलि अवश्य लेती है ।। ‘विधवा फुलमत अब कुलदीप के बच्चे की माँ है’ यह जानकर सभी ग्रामीण कर्मनाशा नदी की बाढ़ का कारण फुलमत को मानते हुए कहते हैं कि फुलमत को उसके बच्चे सहित कर्मनाशा नदी में फेंक दिया जाए ।। ‘फुलमत’ भयभीत होकर अपने बच्चे को प्यार से चिपकाए हुए खड़ी थी, तभी भैरो पाण्डे वहाँ आकर इस क्रूरता को रोकते हैं ।। वे बच्चे को गोद में लेकर निर्भीकतापूर्वक कहते हैं कि फूलमत उनके छोटे भाई की पत्नी है, उनकी बहू है, उसका बच्चे उनके छोटे भाई का पुत्र है ।। गाँव का मुखिया कहता है कि पाप का दण्ड तो भोगना ही पड़ेगा ।। भैरो पाण्डे दृढ़तापूर्वक कहते हैं कि यदि यहाँ उपस्थिति सभी लोगों के पाप गिनाने लगूं तो यहाँ खड़े सभी लोगों को कर्मनाशा नदी की धारा में जाना होगा ।। उपस्थित जन-समुदाय में सन्नाटा छा गया ।। सहमे हुए सभी लोग अपाहिज भैरो पाण्डे के चट्टान की तरह अडिग व्यक्तित्व को देखते ही रह गए ।। कर्मनाशा नदी की बाढ़ भी उतर गई थी ।।

2 . ‘कर्मनाशा की हार’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता पर प्रकाश डालिए ।।

उत्तर – – प्रस्तुत कहानी ‘कर्मनाशा की हार’ का शीर्षक संक्षिप्त, रोचक व सारगर्भित है ।। प्रस्तुत कहानी का शीर्षक पूरी कहानी को स्वयं में समाहित किए हुए है ।। अतः स्पष्ट है कि प्रस्तुत कहानी का शीर्षक सर्वथा उपयुक्त एवं सार्थक है ।।

3 . ‘कर्मनाशा की हार’कहानी के आधार पर भैरो पाण्डे का चरित्र-चित्रण कीजिए ।।

उत्तर – – भैरो पाण्डे; श्री शिवप्रसाद सिंह की ‘कर्मनाशा की हार’ कहानी का प्रमुख पात्र और नयी डीह गाँव का आदर्श व्यक्ति है ।। उसका चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –
(i) कर्मठ और गम्भीर- भैरो पाण्डे पैर से लाचार होते हुए भी बहुत कर्मठ है ।। वह सारे दिन काम में लगा रहता है ।। वह गम्भीर प्रकृति का व्यक्ति है ।। फुलमत और अपने भाई कुलदीप के परस्पर टकरा जाने पर वह इतनी कटु दृष्टि से उन्हें देखता है कि दोनों इधर-उधर भाग खड़े होते हैं ।।

(ii) भाई के प्रति अपार प्रेम– भैरो पाण्डे को अपने भाई कुलदीप से अपार प्रेम था ।। कुलदीप की दो वर्ष की अवस्था में उसके माता-पिता की मृत्यु हो गयी थी ।। इसलिए उसका लालन-पोषण पूरे प्यार से भैरो पाण्डे ने ही किया था ।। कुलदीप के घर से भाग जाने पर पाण्डे दु:ख के सागर में डूबने-उतराने लगता है- “अपने से तो कौर भी नहीं उठ पाता था ।। भूखा बैठा होगा कहीं ।। “

(iii) मर्यादावादी और मानवतावादी– भैरो पाण्डे अपनी मर्यादावादी भावनाओं के कारण फुलमत को पहले अपने परिवार का अंग नहीं बना पाता, लेकिन मानवतावादी भावना से प्रेरित होकर वह फुलमन और उसके बच्चे की कर्मनाशा नदी में बलि देने का विरोध करता है और उन्हें अपने परिवार का सदस्य स्वीकार करता है- “मेरे जीते-जी बच्चे और उसकी माँ का कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता ।। “

(iv) निर्भीक और साहसी-भैरो पाण्डे निर्भीक व्यक्ति है ।। वह मुखिया से इस वक्तव्य से कि- ‘समाज कादण्ड तो झेलना ही होगा’- भयभीत नहीं होता ।। वह बड़े साहस से उसका उत्तर देता है- “जरूर भोगना होगा मुखिया जी . . .”मैं आपके समाज को कर्मनाशा से कम नहीं समझता ।। किन्तु मैं एक-एक के पाप गिनाने लगूं, तो यहाँ खड़े सारे लोगों को परिवार समेत कर्मनाशा के पेट में जाना पड़ेगा ।। “

(v) प्रगतिशील विचारों का पोषक- भैरो पाण्डे अन्धविश्वासों का खण्डन और रूढ़िवादिता का विरोध करने को तत्पर रहता है ।। वह कर्मनाशा की बाढ़ को रोकने के लिए निर्दोष प्राणियों की बलि दिये जाने का विरोध करता है तथा बाढ़ को रोकने के लिए बाँधों को ठीक करने पर बल देता है ।। इस प्रकार भैरो पाण्डे प्रस्तुत कहानी का एक प्रगतिशीलल विचारों वाला मानवतावादी पात्र है ।। अपनी मानवतावादी भावना के बल पर वह सामाजिक रूढ़ियों का डटकर विरोध करता है और कर्मनाशा को हारने पर विवश कर देता है ।।

4 . कुलदीप का चरित्र-चित्रण कर्मनाशा की हार’ कहानी के आधार पर कीजिए ।।


उत्तर – – कहानी ‘कर्मनाशा की हार’ में कुलदीप एक मुख्य पात्र है ।। उसके चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(i) नवयुवक- कुलदीप 18 वर्षीय एक नवयुवक है ।। जिसका शरीर छरहरा था ।। उसके काले बाल कनपटी तक लटकते थे ।। वह एक सुन्दर नवयुवक था ।।
(ii) जाँत-पात का विरोधी– कुलदीप जाँत-पाँत को न मानने वाला नवयुवक है ।। तभी तो वह मल्लाह की विधवा पुत्री फुलमत से प्रेम करने लगता है ।।

(iii) प्रेम में मग्न- कुलदीप विधवा फुलमत से प्रेम करने लगता है ।। जब वह किताब खोलकर पढ़ने बैठता तो दीये की रोशनी में सफेद कपड़ों में लिपटी फुलमत खड़ी हो जाती, पुस्तक के पन्ने खुले रहते तथा वह दीये की लौ को देखता रहता ।।

(iv) कायर एवं डरपोक-कुलदीप एक कायर एवं डरपोक नवयुवक है ।। वह अपने व फुलमत के प्रेम के बारे में अपने दादा को नहीं बता पाता ।। जब भैरों पाण्डे उसे फुलमत के साथ देखकर डाटते हैं तो वह, गाँव से भाग जाता है ।। जिसे फुलमत और उसके बच्चे की बलि के समय भैरों पाण्डे कहते है, “कुलदीप कायर हो सकता है वह अपने बहू-बच्चे को छोड़कर भाग सकता है, किन्तु मैं कायर नहीं हूँ ।। मेरे जीते-जी बच्चे और उसकी माँ का कोई बाल बाँका नहीं कर सकता” . . .”समझे ।। ” निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि कुलदीप एक शिक्षित युवक था एवं वह जाँत पाँत को नहीं मानता था ।। परंतु उसमें समाज का सामना करने का साहस नहीं था ।। इसलिए वह फुलमत को गर्भावस्था में छोड़कर भाग जाता है ।।

5 . ‘कर्मनाशा की हार’ कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए ।।

उत्तर – – उद्देश्य-आज के प्रगतिशील युग में भी भारतीय ग्राम रूढ़ियों, अन्धविश्वासों तथा वर्गगत ऊँच-नीच के विषैले संस्कारों में डूबे हुए हैं ।। प्रस्तुत कहानी में अन्धविश्वासों और रूढ़ियों का विरोध करते हुए मानवावाद और प्रगतिशलता का समर्थन किया गया है ।। इस घटनाक्रम में ब्राह्मण युवक का मल्लाह विधवा की लड़की से प्रेम-प्रसंग चित्रित किया है ।। पहले ‘भैरों’ इसका विरोध करते हैं, फिर ‘फुलमत’ को अपने छोटे भाई की पत्नी के रूप में स्वीकार करके ऊँच-नीच के वर्गगत भेद को नकारते हैं ।। इस प्रकार उपेक्षितों के प्रति संवेदना, रूढ़ियों का विरोध तथा मानवतावादी विचारों की स्थापना कथा का उद्देश्य है ।। इसी उद्देश्य को व्यक्त करते हुए भैरो पाण्डे कहते हैं- “मैं आपके समाज को कर्मनाशा से कम नहीं समझता ।। “

6 . ‘कर्मनाशा की हार’कहानी का अन्त मर्मान्तक एवं नाटकीय है ।। ” इस कथन पर प्रकाश डालिए ।।

उत्तर – – श्री शिवप्रसाद द्वारा लिखित कहानी ‘कर्मनाशा की हार’ अपने सम्पूर्ण स्वरूप में एक ऐसे भारतीय गाँव की कहानी है, जहाँ अन्धविश्वास है, रूढ़ि है, ईर्ष्या है तथा बाहरी प्रतिष्ठा को बनाये रखने के लिए चिन्ताग्रस्त लोगों का समुदाय है ।। फुलमत एक विजातीय विधवा है, जो कुलदीप से प्रेम करती है ।। इस प्रेम को कुलदीप का भाई भैरो पाण्डे समझ जाता है ।। भैरो पाण्डे जानता है कि कुलदीप की किसी भी हालत में फुलमत से शादी नहीं हो सकती, अतः वह अपने भाई को डाँटता है ।। फुलमत कुलदीप के बच्चे की माँ बन जाती है ।। गाँव में यह अन्धविश्वास व्याप्त है कि कर्मनाशा के पानी का विकराल रूप किसी गाँववासी के कुकर्म का ही परिणाम है ।। इसी कारण गाँव वाले फुलमत और उसके मासूम बच्चे को कर्मनाशा की उफनती धारा में फेंक देना चाहते हैं ।। भैरो पाण्डे अन्तर्द्वन्द्व का शिकार है ।। उसकी आत्मा यह स्वीकार नहीं करती है कि खानदान, प्रतिष्ठा और सामाजिक मान्यताओं की बलिवेदी पर फुलमत और उसके मासूम बच्चे की बलि चढ़ा जी जाए ।। वह वहाँ जाकर घोषणा करता है कि फुलमत उसकी बहू है और उसे अपना लेता है ।। जब गाँववाले फुलमत के पापकर्म के दण्ड की बातें करते हैं तो वह कहता है कि गाँव में कौन ऐसा है, जिसने पाप नहीं किया ।। उनके पापों को वह गिनाने लगे तो कर्मनाशा में भी उन्हें जगह नहीं मिलेगी ।। इस कहानी का अन्त विधवा पुनर्विवाह तथा अन्तर्जातीय विवाह के आदर्शों का समर्थन करता हुआ और गाँव के समर्थ वह सम्मानित कहलाने वाले लोगों की पोल खोलता हुआ; समाज में व्याप्त अन्धविश्वास पर प्रहार करता है, किन्तु कहानी का यह अन्त नाटकीयता से भरा हुआ है ।।

कहानीकार ने कहानी की रचना करते समय इस अन्त की योजना की है, अत: यह नाटकीय हो गया है ।। फिर भी कहानी का अन्त मर्मस्पर्शी है और पाठकों पर अपना प्रभाव छोड़ता है ।।

2- ‘कर्मनाशा की हार’ कहानी की संवाद-योजना पर प्रकाश डालिए ।।


उत्तर – – कहानी में प्राणतत्त्व की प्रतिष्ठा का कार्य संवादों के द्वारा होता है ।। इस कहानी के संवाद संक्षिप्त तथा पात्रानुकूल हैं ।। पात्रों की चरित्रगत विशेषताओं को मनोवैज्ञानिक संवादों के माध्यम से सुन्दर रूप में प्रस्तुत किया गया है ।। संवादों में पैनापन तथा चुभते व्यंग्य हैं”मेरे जीते-जी बच्चे और उसकी माँका कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता” . . .”समझे ।। ” “पापका फल तो भोगना ही होगा पाण्डे जी, समाज का दण्ड तोझेलना ही होगा ।। ” ” . . . . . . . . . . . .”मैं आपके समाज को कर्मनाशा से कम नहीं समझता ।। किन्तु मैं एक-एक के पाप गिनाने लगें, तो यहाँ खड़े सारे लोगों को परिवार समेत कर्मनाशा के पेट में जाना पड़ेगा ।। ” . . .” ।। “
इस प्रकार संवाद की दृष्टि से कर्मनाशा की हार’ एक सफल रचना है ।।

8 . ‘कर्मनाशा की हार’ कहानी की भाषा-शैली की दृष्टि से समीक्षा कीजिए ।।


उत्तर – – शिल्प की दृष्टि से यह एक सफल रचना है ।। शिवप्रसाद सिंह ने बाढ़ का सजीव चित्रण प्रस्तुत किया है ।। भाषा में ग्रामीण शब्दों के साथ-साथ उर्दू के शब्द भी प्रयुक्त किये गये हैं;- जैसे- हौंसला, जान, जार-बेजार इत्यादि ।। मुहावरों तथा लोकोक्तियों को प्रयोग भी सुन्दर ढंग से हुआ है; जैसे ‘न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी’, ‘कालिख पोतना’, ‘खाक-छानना’ इत्यादि ।। एक उदाहरण द्रष्टव्य है- “परलय न होगी, तब क्या बरक्कत होगी? हे भगवान् जिस गाँव में ऐसा पाप करम होगा वह बहेगा नहीं, तब क्या बचेगा ।। ” माथे के लुग्गे को ठीक करती धनेसरा चाची बोली, “मैं तो कहूँ कि फुलमतिया ऐसी चुप काहे है ।। राम रे राम, एक ने पाप किया, सारे गाँव के सिर बीता ।। उसकी माई कैसी सतवन्ती बनती थी ।। आग लाने गयी तो घर में जाने नहीं दिया ।। मैं तो तभी छनगी कि हो नहो दाल में कुछ काला है ।। ” शिल्प की दृष्टि से कहानी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है ।। शिल्प की विशेषताओं में फुलमत के कारुणिक वियोग का चित्रण है ।। फुलमत विधवा है ।। पिछले दर्द को भुलाने के लिए उसने कुलदीप से प्रेम-सम्बन्ध बनाये, परन्तु वह भी उसे असहाय छोड़क भाग गया ।। फुलमत की दर्दीली हूक भैरो को सुनाई पड़ती है- “मोहे जोगनी बनाके कहाँ गइले रे जोगिया?” कथाशिल्प में रहा है ।। कथा में चित्रण सजीव है तथा उपमाओं का यथोचित उपयोग हुआ है ।। इस प्रकार यह कहानी भाषा-शिल्प की दृष्टि से एक सफल रचना है ।।

9 . देशकाल और वातावरण की दृष्टि से कर्मनाशा की हार’ कहानी की विवेचना कीजिए ।।


उत्तर – – वातावरण तथा देश-काल के प्रस्तुतीकरण की दृष्टि से यह कहानी एक सफल रचना है गाँव में ऊँच-नीच का भेद, युवक युवतियों का प्रेम तथा धनेसरा चाची और मुखिया जैसे लोगों की कमी आज भी नहीं है ।। बाढ़ का चित्रण बड़ा सजीव बन पड़ा है ।। ‘कर्मनाशा’ को प्रतीकात्मक रूप से चित्रित करने में कथाकार सफल रहे हैं ।। इस प्रकार कहानी-कला के तत्त्वों के आधार पर प्रस्तुत रचना में देश-काल और वातावरण तत्त्व का सुन्दर निर्वाह हुआ है ।। एक उदाहरण द्रष्टव्य है- “पूरबीआकाश पर सूरज दो लठे ऊपर चढ़ आया था ।। काले-काले बादलों की दौड-धप जारी थी, कभी-कभी हलकी हवा के साथ बँदें बिखर जातीं ।। दूर किनारे पर बाढ़ के पानी की टकराहट हवा में गूंज उठती ।। “

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