upboard solution for class 9 hindi chapter 6 nishthamoorti kastooraba निष्ठामूर्ति कस्तूरबा ( काका कालेलकर) गद्य खण्ड

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पाठ -- 6 -- निष्ठामूर्ति कस्तूरबा ( काका कालेलकर)


अभ्यास (क) लघु उत्तरीय प्रश्न
1 — काका कालेलकर जी की जन्म-तिथि एवं जन्म-स्थान बताइए ।। उत्तर — काका कालेलकर जी का जन्म 1 दिसंबर सन् 1885 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था ।।
2 — काका जी का परिवार मूल रूप से कहाँका निवासी था ? ।।
उत्तर — काका जी का परिवार मूल रूप से कर्नाटक के करवार जिले का रहने वाला था ।।
3 — काका जी की मातृभाषा कौन-सी थी ?

उत्तर — काका जी की मातृभाषा कोंकणी थी ।।
4 — कालेलकर जी काका’ नाम से कब जाने गए ?
उत्तर — कालेलकर जी जब गाँधी जी के निकटतम सहयोगी रहे तब से काका के नाम से जाने गए ।।
5 — काका जी को किस पत्र के संपादक होने का गौरव प्राप्त हुआ ? ।।
उत्तर — काका जी को ‘सर्वोदय पत्रिका’ का संपादक होने का गौरव प्राप्त हुआ ।।


6 — भारत सरकार द्वारा काका जी किस उपाधि से अलंकृत हुए ?
उत्तर — भारत सरकार द्वारा काका जी ‘पद्मभूषण’ उपाधि से अलंकृत किए गए ।।
7 — काका जी ने हिंदी के प्रचार को किसका दर्जा दिया तथा किस ओर प्रचार कार्य किया ?
उत्तर — काका जी ने हिंदी के प्रचार को राष्ट्रीय कार्यक्रम का दर्जा दिया तथा दक्षिण में सम्मेलन की ओर से प्रचार किया ।।


8 — काका जी किस-किस भाषा के ज्ञाता थे ?
उत्तर — काका जी कोंकणी, हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, गुजराती और बांग्ला आदि भाषाओं के ज्ञाता थे ।।
9 — गुजरात में हिंदी प्रचार में जो सफलता मिली, उसका श्रेय किसे जाता है ?
उत्तर — गुजरात में हिंदी प्रचार में जो सफलता मिली, उसका श्रेय काका कालेलकर को जाता है ।।


(ख) विस्तृत उत्तरीय प्रश्न

1 — काका कालेलकर का जीवन परिचय देते हुए उनके कृतित्व पर प्रकाश डालिए ।।
उत्तर — काका कालेलकर भारत के स्वाधीनता संग्राम के निर्भीक सेनानी, संत पुरुष तथा गाँधी जी के अनुयायी थे ।। हिंदी के मूक साधक काका कालेलकर का एक साहित्यिक संत के रूप में और दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है ।। जीवन परिचय- काका कालेलकर का जन्म 1 दिसंबर सन् 1885 को महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था ।। इनके पिता का नाम बालकृष्ण कालेलकर था ।। इन्होंने बी०ए० की उपाधि मुंबई विश्वविद्यालय से प्राप्त की तथा बड़ौदा के गंगानाथ भारतीय सार्वजनिक विद्यालय में आचार्य पद को सुशोभित किया ।। काका कालेलकर के नाम से विख्यात दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर भारत के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री, पत्रकार और स्वतंत्रतासंग्राम सेनानी थे ।। उनका परिवार मूल रूप से कर्नाटक के करवार जिले का रहने वाला था और उनकी मातृभाषा कोंकणी थी ।। लेकिन सालों से गुजरात में बस जाने के कारण गुजराती भाषा पर उनका बहुत अच्छा अधिकार था और वे गुजराती के प्रख्यात लेखक समझे जाते थे ।। काका कालेलकर साबरमती आश्रम में प्रधानाध्यापक के पद पर सुशोभित थे और अहमदाबाद में गुजरात विद्यापीठ की स्थापना में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया ।। गाँधी जी के निकटतम सहयोगी होने के कारण ही वे काका के नाम से जाने गए ।। वे ‘सर्वोदय पत्रिका’ के संपादक भी रहे ।। 1930 में पूना की यरवदा जेल में गाँधी जी के साथ उन्होंने महत्वपूर्ण समय बिताया ।। कार्यक्षेत्र- काका कालेलकर सच्चे बुद्धिजीवी व्यक्ति थे ।। लिखना सदा से उनका व्यसन रहा ।। सार्वजनिक कार्य की अनिश्चितता और व्यस्तताओं के बावजूद यदि उन्होंने बीस से ऊपर ग्रंथों की रचना कर डाली तो इस पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए ।। इनमें से कम-से-कम 5-6 ग्रंथ उन्होंने मूल रूप से हिंदी में लिखे ।।

यहाँ इस बात का उल्लेख भी अनुपयुक्त न होगा कि दो-चार को छोड़ बाकी ग्रंथों का अनुवाद स्वयं काका साहब ने किया, अत: मौलिक ग्रंथ हो या अनूदित, वह काका साहब की ही भाषा-शैली का परिचायक है ।। आचार्य काका साहब कालेलकर जी का नाम हिंदी भाषा के विकास और प्रचार के साथ जुड़ा हुआ है ।। 1938 में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के अधिवेशन में भाषण देते हुए उन्होंने कहा था, ‘राष्ट्रभाषा प्रचार हमारा राष्ट्रीय कार्यक्रम है ।।’ अपने इसी वक्तव्य पर दृढ़ रहते हुए उन्होंने हिंदी के प्रचार को राष्ट्रीय कार्यक्रम का दर्जा दिया ।। उन्होंने पहले स्वयं हिंदी सीखी और फिर कई वर्ष तक दक्षिण में सम्मेलन की ओर से प्रचार-कार्य किया ।। अपनी सूझबूझ, विलक्षणता और व्यापक अध्ययन के कारण उनकी गणना प्रमुख अध्यापकों और व्यवस्थापकों में होने लगी ।। हिंदीप्रचार के कार्य में जहाँ कहीं कोई दोष दिखाई देते अथवा किन्हीं कारणों से उसकी प्रगति रुक जाती, गाँधी जी काका कालेलकर को जाँच के लिए वहीं भेजते ।। इस प्रकार के नाजुक काम काका कालेलकर ने सदा सफलता से किए ।। साहित्य अकादमी में काका साहब गुजराती भाषा के प्रतिनिधि रहे ।। गुजरात में हिंदी-प्रचार को जो सफलता मिली, उसका मुख्य श्रेय काका साहब को है ।। निरंतर हिंदी साहित्य की सेवा करते हुए 21 अगस्त 1981 को इनकी मृत्यु हो गई ।। कृतियाँ- काका कालेलकर जी की भारतीय संस्कृति के प्रति अटूट आस्था थी ।। इनकी रचनाओं में भी भारतीय संस्कृति के विभिन्न आयामों की झलक दिखाई देती है ।।
इनकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं

(अ) निबंध संग्रह- जीवन-साहित्य एवं जीवन-काव्य
(ब) यात्रावृत-हिमालय प्रवास, यात्रा, लोकमाता, उस पार के पड़ोसी
(स) संस्मरण- बापू की झाँकियाँ
(द) आत्मचरित- सर्वोदय, जीवन लीला

2 — भाषा-शैली की दृष्टि से काका कालेलकर का मूल्यांकन कीजिए ।। ।।
उत्तर — भाषा-शैली का मूल्यांकन- काका कालेलकर की भाषा शुद्ध परिष्कृत खड़ीबोली है ।। उसमें प्रवाह, ओज तथा अकृत्रिमता है ।। काका जी अनेक भाषाओं को जानते थे, जिसके कारण उनके पास शब्दों का विशाल भंडार था ।। तत्सम, तद्भव आदि इनकी भाषा में एक साथ देखे जा सकते हैं ।। इनकी रचनाओं में गुजराती व मराठी शब्दों का प्रयोग व मुहावरे
और कहावतों का प्रयोग देखने को मिलता है ।। यद्यपि काका जी अहिंदी भाषी थे, फिर भी हिंदी के प्रति उनके समर्पण ने उनकी भाषा को सशक्त एवं प्रौढ़ बना दिया है ।। इन्होंने भाव, विषय एवं प्रसंग के अनुसार विभिन्न शैलियाँ अपनाई हैं ।।
(अ) परिचयात्मक शैली- किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना का परिचय देते समय इन्होंने इस शैली को अपनाया है ।। इस
शैली पर आधारित इनकी भाषा सरल, सुबोध तथा प्रवाहमयी है ।। प्रसाद गुण इस शैली की मुख्य विशेषता है ।।
(ब) विवेचनात्मक शैली- जहाँ भी गंभीर विषयों की विवेचना करनी पड़ी है, वहाँ काका साहब ने इस शैली का
प्रयोग किया है ।। इस शैली के प्रयोग से भाषा गंभीर तथा संस्कृतनिष्ठ हो गई है ।। विचार-तत्व प्रधान हो गया है ।।
तार्किकता इस शैली की मुख्य विशेषता है ।।


(स) आत्मकथात्मक शैली- काका कालेलकर ने अपने संस्करणात्मक निबंधों और आत्मरचित में इस शैली का
प्रयोग किया है ।।
(द) विवरणात्मक शैली- इस शैली का प्रयोग इनके यात्रावृत्तों में हुआ है ।। इनके द्वारा प्रस्तुत यथार्थ विवरणों में
चित्रोपमता और सजीवता विद्यमान है ।।
(य) हास्य-व्यंग्यात्मक शैली- सामयिक समस्याओं पर लिखते समय इस संत की शैली में कहीं-कहीं पर बहुत ही
शिष्ट हास्य और चुभता हुआ व्यंग्य भी उभरकर आता है ।। इस शैली की भाषा चुलबुली तथा मुहावरेदार हो गई है ।।


3 — काका कालेलकर का हिंदी साहित्य में स्थान निर्धारित कीजिए ।।
उत्तर — हिंदी साहित्य में स्थान- काका साहब मँजे हुए लेखक थे ।। किसी भी सुंदर दृश्य का वर्णन अथवा पेचीदा समस्या का सुगम विश्लेषण उनके लिए आनंद का विषय रहे ।। उन्होंने देश, विदेशों का भ्रमण कर वहाँ के भूगोल का ही ज्ञान नहीं कराया, अपितु उन प्रदेशों और देशों की समस्याओं, उनके समाज और उनके रहन-सहन, उनकी विशेषताओं इत्यादि का स्थान-स्थान पर अपनी पुस्तकों में बड़ा सजीव वर्णन किया है ।। वे जीवन-दर्शन के जैसे उत्सुक विद्यार्थी थे, देश-दर्शन के भी वैसे ही शौकीन रहे ।। हिंदी के मूक साधक काका कालेलकर का एक साहित्यिक संत के रूप में और दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है ।। वे भारतीय संस्कृति के अनन्य उपासक और सदैव अध्ययनरत रहने वाले साहित्यकार थे ।। इनकी रचनाओं में प्राचीन भारत की झलक देखने को मिलती है ।। किसी भी घटना का सजीव चित्र उपस्थित करने में ये बहुत कुशल थे ।। काका साहब महान देशभक्त, उच्चकोटि के विद्वान, विचारक थे ।। हिंदी जगत उनकी नि:स्वार्थ सेवाओं के लिए सदैव उनका कृतज्ञ रहेगा ।।

4 — ‘निष्ठामूर्ति कस्तूरबा’ पाठ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए ।।
उत्तर — ‘निष्ठामूर्ति कस्तूरबा’ श्री काका कालेलकर द्वारा रचित एक संस्मरणात्मक निबंध है ।। प्रस्तुत निबंध में राष्ट्रमाता कस्तूरबा के पतिव्रत धर्म, त्याग व सेवापरायणता जैसे महान् गुणों का वर्णन किया गया है ।। यह निबंध भारतीय नारियों को एक आदर्श जीवन की प्रेरणा प्रदान करता है ।। लेखक कहते है कि कस्तूरबा महात्मा गाँधी जैसे महापुरुष की पत्नी थी ।। जिसे राष्ट्र ने आदर से ‘बापूजी’ कहा ।। उसी प्रकार कस्तूरबा को ‘बा’ का उपनाम दिया ।। परंतु कस्तूरबा ने यह उपाधि अपने सद्गुणों के आधार पर प्राप्त की ।। कस्तूरबा के गुणों के कारण ही राष्ट्र उनका आदर करता है ।। उन्होंने राष्ट्र के सामने आदर्श की एक जीवित प्रतिमा प्रस्तुत की ।। लेखक कहते हैं कि कस्तूरबा निरक्षर थी ।। दक्षिण अफ्रीका में रहने के कारण वह कुछ अंग्रेजी शब्द बोल और समझ सकती थी और विदेशी मेहमानों के आगमन पर उन्हीं शब्दों के द्वारा उनका आतिथ्य करती थी ।। कस्तूरबा को गीता और रामायण पर अपार श्रद्धा थी ।। वह उन्हें पढ़ने का प्रयास करती थी ।। लेखक कहते हैं कि भले ही कस्तूरबा सती सीता का वृत्तांत न पढ़ सकी, परंतु यथार्थ जीवन में उन्होंने सीता का ही अनुसरण किया ।। कस्तूरबा ने दुनिया की दो अमोघ शक्तियों शब्द और कृति में से कृति की नम्र उपासना करके अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त किया ।। कस्तूरबा अपने निर्णय पर अटल रहती थी ।।

वह अपनी धर्मनिष्ठा पर स्थायी थी भले ही इसके लिए कुछ भी सहन क्यों न करना पड़े ।। कस्तूरबा सहनशील थी ।। लेखक कस्तूरबा से प्रथम बार शांति निकेतन में मिले ।। लेखक को लगा उसे आध्यात्मिक मातापिता प्राप्त हो गए हैं जब सरकार ने कस्तूरबा को सभा में जिसमें महात्मा जी बोलने वाले थे, न जाने के लिए कहा, उन्होंने बिना किसी डर के अपना जाने का निर्णय सुना दिया ।। कस्तूरबा एक सादा जीवन व्यतीत करती थी ।। उनके लिए परतंत्रता का विचार असहनीय था ।। इसी परतंत्रता के बंधन से मुक्त होने के लिए उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए ।। कस्तूरबा को अपना कर्तव्य ज्ञान था, वह दो शब्दों में अपना फैसला सुना देती थी ।। आश्रम में कस्तूरबा सभी के लिए माँ के समान थी ।। वह छोटे व बड़े सभी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करती थी ।। कस्तूरबा में आलस्य नहीं था ।। वृद्धावस्था में भी वह रसोई में जाकर कार्य किया करती थी ।। अध्यक्षीय भाषणों के समय उनके विशिष्ट गुण प्रकट होते थे ।। इन्हीं गुणों के कारण राष्ट्र ने इनका आदर किया ।। ये गुण कस्तूरबा को अपने परिवार से प्राप्त हुए, जिनके बल पर वह असाधारण परिस्थितियों का सामना कर लेती थी ।। आज राष्ट्र के सभी लोग- हिंदू, सिक्ख, मुस्लिम सभी उनको याद करते हैं और उनके जैसे गुण अपनाने की प्रेरणा लेते हैं ।।


(ग) अवतरणों पर आधारित प्रश्न

1 — उनकी निष्ठा —————– जीवनसिद्धि प्राप्त की ।।
संदर्भ- प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक हिंदी के ‘गद्य खंड’ के ‘काका कालेलकर’ द्वारा लिखित ‘निष्ठामूर्ति कस्तूरबा’ नामक निबंध से अवतरित है ।।
प्रसंग- इस अवतरण में लेखक ने कस्तूरबा के पढ़े-लिखे न होने पर भी उनकी रामायण के प्रति अगाध श्रद्धा के बारे में बताया है ।। लेखक ने महात्मा गाँधी व कस्तूरबा का उदाहरण देते हुए शब्द (वचन) और कर्म में से कर्म को अधिक महत्वपूर्ण बताया है ।।

व्याख्या- काका जी कहते है कि कस्तूरबा को गीता पर अपार श्रद्धा थी तथा दूसरा ग्रंथ जिसके प्रति उनकी श्रद्धा थी, रामायण था ।। कस्तूरबा जी को दोपहर में जो समय मिलता उसमें वह चश्मा लगाकर मोटे अक्षरों में छपी रामायण के दोहे पढ़ने बैठ जाती ।। अर्थात फुरसत के समय में वह आराम न करके रामायण के दोहे पढ़ती थी ।। वह दृश्य देखकर लेखक व उसके मित्रों को बड़ा आनंद आता था ।। कस्तूरबा निरक्षर होने के कारण रामायण का सही पाठ नहीं कर पाती थी ।। लेखक कहते हैं कि कस्तूरबा भले ही सही रूप से तुलसीदास जी कृत रामायण में सती-सीता का वृत्तांत न समझ पाई, परंतु उन्होंने साक्षात रूप में सती सीता का उदाहरण हमारे सामने प्रस्तुत किया ।। वे सीता के समान कर्तव्यनिष्ठ, पतिव्रता, शीलवती नारी थी ।। जिनका अनुसरण कर कोई भी नारी महान बन सकती है ।। संसार में दो अचूक शक्तियाँ हैं- एक है वचन तथा दूसरी है कर्म ।। ये शक्तियाँ अचूक इसलिए हैं कि ये कभी निष्फल नहीं होती ।। कुछ व्यक्ति अपने वचन (शब्द) से संसार का मार्गदर्शन करते हैं, किंतु शब्दों का इतना महत्व होते हुए भी कोरे शब्द तब तक बिल्कुल बेकार होते हैं, जब तक कि शब्द के साथ कर्म जुड़ा हुआ न हो ।। कर्म के बिना वचन और व्यवहार के बिना सिद्धांत खोखले सिद्ध होते हैं ।। उनका कोई महत्व नहीं होता, अतः लेखक ने कर्म या व्यवहार को अंतिम शक्ति कहा है ।। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने अपने जीवन में वचन तथा कर्म दोनों को ही अपनाया, अर्थात् जो कुछ उन्होंने कहा, उसे व्यवहार में भी कर दिखाया ।। उनके वचन और कर्म में कोई भेद नहीं था ।। ‘शब्द’ की तुलना में भी ‘कृति’ (कर्म) अधिक श्रेष्ठ है ।। कस्तूरबा ने इसीलिए कर्म की साधना की ।। उन्होंने अपने दैनिक जीवन में कर्म को महत्व दिया ।। उन्होंने शब्दों की अपेक्षा कर्म पर अधिक विश्वास किया ।। उन्होंने शास्त्रीय तथा सैद्धांतिक शब्दावली नहीं सीखी; अर्थात् किसी कार्य को दिखावा करके नहीं किया ।। वे जीवनभर विनम्रता के साथ ‘कर्म-साधना’ में लगी रही ।। इसी कर्म-साधना ने उन्हें राष्ट्रमाता के गौरवपूर्ण उच्च-सिंहासन पर प्रतिष्ठित किया ।।


प्रश्नोत्तर (अ) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए ।।
उत्तर — पाठ- निष्ठामूर्ति कस्तूरबा लेखक- काका कालेलकर
(ब) लेखक ने कस्तूरबा की तुलना किससे की है ?
उत्तर — लेखक ने कस्तूरबा की तुलना सती सीता से की है ।।
(स) शब्द की शक्ति के बारे में बताइए ।।
उत्तर — शब्द की शक्ति से आशय मनुष्य के वचनों की शक्ति से है ।। जिससे वे संसार का मार्गदर्शन करते हैं ।।
(द) संसार में कौन-सीदो महान शक्तियाँ हैं ?
उत्तर — संसार में दो महान् शक्तियाँ हैं- शब्द की शक्ति और कर्म की शक्ति ।।
(य) कस्तूरबा ने जीवनसिद्धि को किस प्रकार प्राप्त किया ?
उत्तर — कस्तूरबा ने कृति की विनम्र उपासना करके जीवनसिद्धि प्राप्त की ।।
(र) महात्मा जी ने किसकी उपासना की ?
उत्तर — महात्मा गाँधी अपने मुख से जो वचन कह देते थे, फिर कर्म से उसका पालन भी करते थे ।। इस प्रकार उन्होंने शब्द
और कृति दोनों की असाधारण उपासना की ।।
2 — सरकार ने ——————माँ के समान थीं ।।
संदर्भ- पूर्ववत् प्रसंग- इन पंक्तियों में कस्तूरबा की कर्मनिष्ठा और कर्तव्यों के संदर्भ में उनके स्पष्ट दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला गया है ।। व्याख्या- काका कालेलकर जी कस्तूरबा की कर्मनिष्ठा और स्वाभिमान का वर्णन करते हुए कहते हैं कि जब आगा खाँ महल में सरकार ने उन्हें कैद किया हुआ था तब सभी सुविधाओं और महात्मा जी का साथ होते हुए भी वह परतंत्रता का अनुभव करती थी ।। सरकार ने उनके शरीर को कैद कर लिया था परंतु उनकी आत्मा यह कैद स्वीकार नहीं कर पाई और सारे बंधन तोड़कर उसी प्रकार स्वतंत्र हो गई जिस प्रकार से किसी पिंजड़े में बंद पक्षी पिंजड़े से स्वतंत्र होने के लिए अपने प्राणों का त्याग कर देता है ।। उसी प्रकार कस्तूरबा भी सरकार का यह बधंन तोड़ स्वतंत्र हो गई ।। उनके इस मौन त्याग ने भारत के स्वतंत्रता के आंदोलन में तेजी ला दी और भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी ।। इनके इस अभूतपूर्व बलिदान के कारण भारत में अंग्रेजी शासन की भारत पर हुकूमत कमजोर हो गई ।। कस्तूरबा ने अपने सद्गुणों और कर्मनिष्ठा के कारण अपार ख्याति प्राप्त की ।। उन्होंने अपनी कर्मनिष्ठा के द्वारा यह सिद्ध कर दिया कि छोटे से कार्य को भी यदि पूर्ण निष्ठा के साथ किया जाए, तो उसका महत्व अधिक हो जाता है ।।
बहुत-सी पुस्तकों को पढ़ लेने मात्र से ही कोई महान् नहीं बन सकता, वरन् अपने प्रत्येक कार्य को लगन, रुचि, तत्परता और निष्ठा के साथ संपन्न करने वाला व्यक्ति ही महान् बन सकता है ।। कस्तूरबा की कर्मनिष्ठा इसका स्पष्ट प्रमाण है ।। जिन लोगों को केवल पुस्तकीय ज्ञान होता है, वे कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य के संबंध में प्रायः भ्रमित हो जाते हैं ।। उन्हें स्पष्ट रूप में यह ज्ञात नहीं हो पाता कि उन्हें किसी स्थिति विशेष में क्या करना चाहिए और क्या नहीं ।। इसके विपरीत कर्मनिष्ठ लोगों के सामने इस प्रकार की संदेहजनक स्थिति कभी भी उत्पन्न नहीं होती ।। कस्तूरबा की कर्म में प्रबल निष्ठा थी, इसलिए उन्हें भी अपने किसी कर्त्तव्य का निर्धारण करने में किसी भी प्रकार की दुविधा का सामना नहीं करना पड़ता था ।। अंधकार में दीपक के प्रकाश की भाँति, उन्हें अपने कर्तव्यों का स्पष्ट ज्ञान हो जाया करता था ।। किसी भी परिस्थिति में वे निश्चयपूर्वक यह निर्णय सुना दिया करती थी कि वे क्या कर सकती हैं और क्या नहीं ।। लेखक कहते हैं कि आश्रम में कस्तूरबा उनकी माँ के समान ही देखभाल करती थी ।।

प्रश्नोत्तर (अ) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए ।।
उत्तर — पाठ- निष्ठामूर्ति कस्तूरबा
लेखक- काका कालेलकर
(ब) ‘पिंजड़े का पक्षी’ और सरकार की कैद’ से लेखक का क्या आशय है ?
उत्तर — ‘पिंजड़े का पक्षी’ और ‘सरकार की कैद’ से लेखक का आशय परतंत्रता से है, जिसमें किसी की स्वतंत्रता को
बाधित किया जाता है ।।
(स) कस्तूरबा कैसे स्वतंत्र हुई ?

उत्तर — कस्तूरबा अपने प्राणों को त्याग कर स्वतंत्र हो गई ।।
(द) कृति का एक कण किससे अधिक मूल्यवान होता है ?
उत्तर — कृति का एक कण शुद्ध और रोचक साहित्य के पहाड़ों से अधिक मूल्यवान होता है ।।
(य) शब्द शास्त्र में निपुण व्यक्तियों को कैसी दुविधा का सामना करता पड़ता है ?
उत्तर — शब्द शास्त्र में निपुण अर्थात् जिन लोगों का पुस्तकीय ज्ञान विस्तृत है, उन्हें अनेक बार ‘क्या करना चाहिए और
क्या नहीं की दुविधा का सामना करना पड़ता है ।।
(र) लेखक के अनुसार आश्रम में कस्तूरबा उन लोगों के लिए किसके समान थी ?
उत्तर — लेखक के अनुसार आश्रम में कस्तूरबा उन लोगों के लिए माँ के समान थी ।।

3 — आज के जमाने में —– ——– काफी मजबूत हैं ।।
संदर्भ- पूर्ववत् प्रसंग- स्त्री जीवन के संबंध में परिभाषा बदल जाने के पश्चात् आज भी हमारी सांस्कृतिक धरोहर चहुँ ओर बिखरी पड़ी
व्याख्या- आज स्त्रियों के जीवन संबंधी प्रतिमान (आदर्श) बदल गए हैं ।। पुराने जमाने में स्त्री-शिक्षा पर बल नहीं दिया जाता था, बल्कि जो स्त्री अधिक लज्जाशील और घरेलू होती थी, उसे ही सद्गृहणी माना जाता था ।। इसीलिए कस्तूरबा अशिक्षित थीं ।। आज सभी के लिए स्कूली पढ़ाई आवश्यक हो चुकी है ।। कस्तूरबा गाँधीजी की तरह घर पर ही रहकर गृहस्थी में रहने वाली नारी स्फूर्तिहीन और दक्षता से विरत मानी जाएगी ।। लेकिन कस्तूरबा ने अशिक्षित और महत्वाकांक्षारहित होने पर भी अपने आचरण से अनूठे आदर्श प्रस्तुत किए ।। जब अनूठे आदर्शों में एकांकी इस नारी की मृत्यु हुई तो स्मारक बनवाने हेतु आशा से कहीं अधिक धन एकत्रित कर लिया गया ।। यह इस बात का प्रमाण है कि नारी का प्राचीन रूप आज भी सार्वभौमिक है अर्थात् सब जगह उसी रूप को पूजनीय माना जाता है ।। निश्चित रूप से हमारी वैदिक संस्कृति आज भी हमारे संस्कारों में सुवासित हो रही है ।। हमारे पुरातन संस्कार आज भी हमारे मानस में गहराई तक जुड़े हुए हैं ।।
प्रश्नोत्तर (अ) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम बताइए ।।
उत्तर — पाठ-निष्ठामूर्ति कस्तूरबा
लेखक- काका कालेलकर
(ब) आज के जमाने में अशिक्षित स्त्री का जीवन यशस्वी या कृतार्थ क्यों नहीं कहा जा सकता ?
उत्तर — आज के जमाने में अशिक्षित स्त्री का जीवन यशस्वी या कृतार्थ इसलिए नहीं कहा जा सकता; क्योंकि उसमें किसी
तरह की महत्वाकांक्षा का उदय नहीं दिखाई देता ।।
(स) आज के जमाने के स्त्री के आदर्श और पुराने जमाने के स्त्री के आदर्श कैसे भिन्न हैं ?
या नए व पुराने जमाने की स्त्रियों के आदर्शों में क्या अंतर है ?
उत्तर — आज उच्चशिक्षा प्राप्त और अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील स्त्री को यशस्विनी और कृतार्थ माना जाता है, जबकि पुराने जमाने में स्त्री के आदर्श इसके विपरीत थे ।। स्त्री-शिक्षा को अच्छा नहीं माना जाता था ।। महत्वाकांक्षिणी स्त्री को भी उच्छृखल माना जाता था ।। उस समय लज्जाशीलता, संकोची, महत्वाकांक्षारहित घरेलू स्त्री को आदर्श माना जाता था ।।
(द) कस्तूरबा के मृत्योपरांत पूरे देश ने क्या तय किया ? ।।
उत्तर — कस्तूरबा के मृत्योपरांत पूरे देश ने उनका स्मारक बनाने का निश्चय किया ।।
(य) कस्तूरबा का स्मारक बनाने के लिए एकत्रित हुई बड़ी धनराशि क्या सिद्ध करती है ?
उत्तर — कस्तूरबा का स्मारक बनाने के लिए स्वेच्छा से एकत्र हुई बड़ी निधि यह सिद्ध करती है कि स्त्री-विषयक हमारा
प्राचीन तेजस्वी आदर्श आज भी देश को मान्य है ।।


4 — यह सब —————- करने का होता है ।।
संदर्भ- पूर्ववत् प्रसंग- इस अवतरण में लेखक ने कस्तूरबा के चारित्रिक गुणों पर प्रकाश डाला है ।। अशिक्षित होते हुए भी कस्तूरबा के चरित्र में श्रेष्ठता दिखाई देती है ।। लेखक इसके कारणों पर प्रकाश डालते हुए कहता हैव्याख्या- काका जी कहते हैं कि कस्तूरबा जी निरक्षर थी फिर भी, उनमें सद्गुण कूट-कूट कर भरे हुए थे जिनसे वह अपनी जीवन की तपस्या को साक्षात रूप दे पाई ।। यह सब सद्गुण और महानता कस्तूरबा ने कहाँ से ग्रहण की जबकि उन्होंने शिक्षा के द्वारा तो कुछ भी ज्ञान प्राप्त नहीं किया था ।। ‘राष्ट्रमाता कस्तूरबा’ ने किसी शिक्षा-संस्था में जाकर सदाचार तथा महान् जीवन की शिक्षा ग्रहण नहीं की थी ।। उनमें पारिवारिक संस्कारों के फलस्वरूप विकसित ऐसे श्रेष्ठ गुण विद्यमान थे, जो आर्य-जाति में आदर्श माने जाते हैं ।। उनके पारिवारिक संस्कार बहुत दृढ़ थे ।। असामान्य परिस्थितियों का सामना करने के लिए वे अपने पारिवारिक संस्कारों को विस्तार दे देती थीं ।। अपने इन्हीं सदगुणों के बल पर वे अपने जीवन में सफलता प्राप्त करती रही ।। उनकी इस सफलता का रहस्य यह भी है कि उनका हृदय शुद्ध था ।। जब कोई व्यक्ति छोटी-छोटी बातों में भी शुद्ध भाव से साधना करता है, तो उस साधना की शक्ति अलौकिक होती है ।। साधना के लिए मन, वचन और कर्म की शुद्धता बहुत ही आवश्यक है ।। छोटी-छोटी बातों में शुद्ध भावना से साधना करने वाले व्यक्ति के सम्मुख चाहे कोई बड़ी बात ही क्यों न आ पड़े, उसका तेज व्यापक होकर कार्य करने लगता है ।। लेखक का मत है कि छोटी-छोटी बातों में सदाचारी रहने वाले व्यक्ति को बड़ी बात करने पर अपने सद्गुणों का केवल विस्तारभर करना होता है; अत: असाधारण परिस्थिति का सामना करने में भी उसे कोई कठिनाई नहीं होती ।। यही गुण माता कस्तूरबा में विद्यमान थे; अत: वे अपने सद्गुणों के विस्तार से प्रत्येक कठिनाई का सामना कर लेती थीं ।।


प्रश्नोत्तर (अ) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए ।।
उत्तर — पाठ- निष्ठामूर्ति कस्तूरबा
लेखक- काका कालेलकर
(ब) कस्तूरबा को ये श्रेष्ठ गुण कहाँ से मिले थे ?
उत्तर — कस्तूरबा को ये श्रेष्ठ गुण अपने परिवार से मिले थे ।।
(स) असाधारण मौका आने पर कस्तूरबा ने कैसे जीवनसिद्धि हासिल की ?
उत्तर — असाधारण मौका आने पर कस्तूरबा ने अपने स्वाभाविक कौटुंबिक सदगुणों को विस्तार देकर जीवनसिद्धि
हासिल की ।। (द) चरित्रवान् मनुष्य की विशेषता पर प्रकाश डालिए ।।
उत्तर — चरित्रवान् व्यक्ति की यह विशेषता होती है कि वह कितना भी गंभीर प्रसंग आ जाए अथवा जीवन की परीक्षा का
प्रश्न उपस्थित होने पर विचलित नहीं होता, बल्कि अपने चारित्रिक सद्गुणों को विस्तृतभर करता है और वह
अपने प्रयासों में सफलता प्राप्त कर लेता है ।।
(य) कस्तूरबा जी में किस प्रकार के सद्गुण थे ?
उत्तर — कस्तूरबा जी में कर्मनिष्ठ, चरित्रवान, पतिव्रता आदि सद्गुण थे ।।
(र) किस पैमाने पर साधना का तेज लोकोत्तरी होता है ?
उत्तर — छोटी-छोटी बातों में भी शुद्ध भाव से जो साधना की जाती है, उसका तेज लोकोत्तरी होता है ।।

(घ) वस्तुनिष्ठ प्रश्न
1 — काका कालेलकर जी का जीवन काल है
(अ) सन् 1885-1981 (ब) सन् 1897-1976 (स) सन् 1870-1981 (द) सन् 1891-1970
2 — काका कालेलकर का पूरा नाम था
(अ) बालकृष्ण कालेलकर (ब) दत्तात्रेय कालेलकर (स) काका जी (द) दत्तात्रेय बालकृष्ण कालेलकर
3 — काका कालेलकर जी ने प्रधानाध्यापक के पद को सुशोभित किया
(अ) गुजरात विद्यापीठ में (ब) इलाहाबाद विश्वविद्यायल में (स) काशी विद्यापीठ में (द) साबरमती आश्रम में
4 — काका कालेलकर जी बड़ौदा के ‘गंगानाथ भारतीय सार्वजनिक विद्यालय में किस पद पर नियुक्त हुए ?
(अ) कोषाधिकारी (ब) आचार्य पद पर (स) प्रधानाध्यापक के पद पर
(द) अंग्रेजी विभाग के आचार्य
5 — काका कालेलकर जी को पद्मभूषण की उपाधि से सम्मानित किया गया
(अ) भारत सरकार द्वारा (ब) कानपुर विश्वविद्यालय द्वारा (स) बनारस हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा (द) लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा

(ङ) व्याकरण एवं रचनाबोध
1 — निम्नलिखित शब्दों में संधि विच्छेद कीजिए और संधि का नाम लिखिए
संधिशब्द ——– संधि विच्छेद——-संधि का नाम
निस्तेज ———-निः + तेज ———-विसर्ग संधि
एकाक्षरी ———-एक + अक्षरी ———-दीर्घ संधि
महत्वाकांक्षा ———-महत्व + आकांक्षा———-दीर्घ संधि
गुणाकार———- गुण + आकार———-दीर्घ संधि
सत्याग्रह ———-सत्य + आग्रह———-दीर्घ संधि
प्रत्युत्पन्न———- प्रति + उत्पन्न———-यण संधि
निर्भर्तना ———-निः + भर्त्सना———-विसर्ग संधि
स्वागत ———-सु + आगत———-यण संधि
लोकोत्तर ———-लोक + उत्तर———-गुण संधि
कृतार्थ ———-कृत + आर्थ———-दीर्घ संधि

2 — निम्नलिखित शब्दों में समास विग्रह कीजिए और समास का नाम भी लिखिए
समस्तपद———- समास विग्रह———-समास का नाम
राष्ट्रमाता ———-राष्ट्र की माता———-संबंध तत्पुरुष समास
जीवनसिद्धि———- जीवन की सिद्धि———-संबंध तत्पुरुष समास
प्राणघातक———- प्राणों के लिए घातक———-संप्रदान तत्पुरुष समास
शब्द-शास्त्र ———-शब्दों का शास्त्र———-संबंध तत्पुरुष समास
बंधनयुक्त ———-बंधन से मुक्त———-अपादान तत्पुरुष समास
देशसेवा———- देश की सेवा———-संबंध तत्पुरुष समास
माँ-बाप ———-माँ और बाप———-द्वंद्व समास
धर्मनिष्ठा———- धर्म में निष्ठा———-अधिकरण तत्पुरुष समास

3 — निम्नलिखित विदेशी शब्दों के लिए हिंदी शब्द लिखिए
विदेशी शब्द———-हिंदी शब्द
कतई———-बिलकुल
कायम———-स्थायी
हठ———-जिद
खुद———-स्वयं
हासिल———-प्राप्त
आबदार———-कांतिमान
अमलदार———-कर्मचारी

4 — ‘मुझसे यही होगा’ और यह नहीं होगा’ ये दो वाक्य उनके (कस्तूरबा जी के )किस गुण को प्रकट करते हैं ?
उत्तर — ‘मुझसे यही होगा’ और ‘यह नहीं होगा’ कस्तूरबा जी के दृढ़ निश्चयी होने के गुण को प्रकट करते हैं ।।

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